सोमवार, 25 मई 2026

अज फ‍िर चर्चा में है इलीट ग्रुप की 'मीट‍िंग्स' का आलीशान ठिकाना... जिमखाना क्लब


 केंद्र सरकार ने लुटियंस दिल्ली के ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब पर बड़ा फैसला लेते हुए 5 जून तक उन्हें कैंपस खाली करने का आदेश दिया है. इसी आदेश के बाद अब आमजन के ल‍िए कौतूहल का व‍िषय बना ज‍िमखाना क्लब अब चर्चा के केंद्र में आ गया है और साथ ही चर्चा में आ गए हैं वो लोग भी जो इस क्लब और इसकी रवायतों की आड़ में ना जाने क्या क्या कुचक्र रचते रहे हैं।

करीब 1200 सदस्यों वाले इस क्लब में एंट्री बहुत मुश्किल से मिलती है. हर साल 100 नए लोगों को मेंबरशिप मिलती है. इस क्लब में मेंबरशिप के लिए 35-37 सालों का इंतजार करना पड़ता है. क्लब में 14000 लोगों की मेंबरशिप होगी. 3000 से अधिक एप्लीकेशन अभी भी वेटिंग  में है. लोग मोटी फीस चुकाकर इस क्लब की सदस्यता लेते हैं. अब ये क्लब मुश्किल में फंस गया है. 


बात अब सोचने की ये है क‍ि भारी भरकम मेंबरश‍िप फीस का इस्तेमाल क्या स‍िर्फ क्लब के रखरखाव में क‍िया जाता था, आख‍िर 27 एकड़ में बनी क‍िसी भी ब‍िल्ड‍िंंग के रखरखाव में क्या करोड़ों खर्च हो सकते है , वह भी कागजों दर्ज है क‍ि साफसफाई माली, फीस और केटर‍िंंग में  ये बड़ी रकम खर्च होी थी...मगर ये तो रहा वो तथ्य जो कागजों में है परंतु तस्वीर का दूसरा रुख एक ऐसे जमावड़े को रेखांक‍ित करता है जो क‍िसी तरह से न तो देशह‍ित का सोचता था और ना ही जनह‍ित का। ये क‍िसी से छुपा नहीं है क‍ि शाहीन बाग और यूसीसी और सीआईए  तथा क‍िसान आंदोलानों को हवा देने का काम इसी क्लब में बैठे ''इलीट'' लोग करते थे। 


बहरहाल अब फि‍लहाल तो केंद्र सरकार ने इनके पेट और मंसूबों पर जोरदार लात मारी ही दी है तो अब क‍िसी ''तोड़फोड़'' वाले आंदोलन को अगर देखें तो आश्चर्य  ना करें। 


दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास भले ही 113 साल पुराना हो, लेकिन देश में अंग्रेजों के जमाने में बने ऐसे एलीट क्लब की नींव 150 साल पहले पड़ी. सबसे पहले जिमखाना क्लब मुंबई में 1875 में खुला, जबकि दिल्ली में 1913 में. लुटियंस दिल्ली के पावर सेंटर 2 सफदरजंग रोड) में दिल्ली जिमखाना क्लब (DGC) महज सोशल क्लब नहीं है, बल्कि ब्रिटिश इतिहास, सत्तानशीनों के सियासी चर्चा के साथ एलीट क्लास के के मनोरंजन का केंद्र रहा है. केंद्र सरकार ने 27.3 एकड़ में फैले जिमखाना क्लब की बेशकीमती जमीन का लीज डीड रद्द कर 5 जून तक क्लब खाली करने का आदेश दिया है. ये प्रधानमंत्री आवास (लोक कल्याण मार्ग) के ठीक बगल  में है. सरकार ने इस क्लब को सुरक्षा और सैन्य जरूरतों की वजह से हाथ में लेने का फैसला किया है.

सेना प्रमुख की एंट्री रोक दी थी
भारत के पहले कमांडर इन चीफ फील्ड मार्शल केएम करियप्पा (तब जनरल) एक शाम क्लब के डाइनिंग हॉल में प्रवेश कर रहे थे, लेकिन कैजुअल ड्रेस में होने के कारण स्टाफ मेंबर ने उन्हें गेट पर ही रोक दिया. करियप्पा बिना किसी गुस्से के चुपचाप अपनी गाड़ी में लौटे, कपड़े बदले और फिर अंदर आए. उन्होंने उस स्टाफ की तारीफ की. 1930 और 1940 के दशक में जब भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था, तब यह क्लब ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय नेताओं के बीच एक अनौपचारिक चर्चा का केंद्र था. जिन्ना, नेहरू और पार्टी पॉलिटिक्स का ये केंद्र था.

कलकत्ता से दिल्ली आई राजधानी तो बना दिल्ली जिमखाना क्लब
किंग जॉर्ज पंचम ने 1911 में दिल्ली दरबार के दौरान इंडिया की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने की घोषणा की. इसके बाद दिल्ली में अंग्रेजी प्रशासनिक अधिकारियों और सैन्य अफसरों की बाढ़ सी आ गई. इन्हीं नौकरशाहों, फौजी अफसरों के मनोरंजन, खेलकूद के लिए 3 जुलाई 1913 को इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब बना, जिसमें से इंपीरियल शब्द आजादी के बाद हटाया गया.इस क्लब की मुख्य इमारत को 1920-30 के दशक में ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट टी रसेल ने डिजाइन किया था. रसेल ने कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति हाउस, जो पहले कमांडर इन चीफ का आवास था और बाद में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आधिकारिक निवास बना.

वायसराय की बीवी का स्विमिंग पूल
शुरुआत में जिमखाना क्लब का स्विमिंग पूल नहीं था. वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) में भी नहीं. वायसराय लॉर्ड विलिंगडन की पत्नी को स्विमिंग का बेहद शौक था, लेकिन उन्हें प्राइवेट  स्विमिंग पूल का इस्तेमाल करना पड़ता था. फिर उन्होंने खुद 21 हजार का डोनेशन देकर जिमखाना क्लब में स्विमिंग पूल बनवाया. 

विंबलडन के बाहर सबसे ज्यादा ग्रास कोर्ट
दिल्ली जिमखाना क्लब परिसर में 26 एक्टिव ग्रास टेनिस कोर्ट (घास के मैदान) हैं. लंदन के विंबलडन जैसी कुछ जगहों को छोड़कर ये सबसे बड़ी संख्या है. भारत के कई डेविस कप मैचों की मेजबानी इस क्लब ने की है.

देश के विभाजन का वक्त
देश का बंटवारा 1947 में हुआ तो भारत-पाकिस्तान की सेनाएं भी अलग हुईं. सेना की रेजीमेंटों के सिख, हिंदू और मुस्लिम अफसर यहीं आखिरी बार मिले और आखिरी ड्रिंक शेयर की थी. वो उनके लिए भावुक विदाई का पल था.

टक्सीडो से कुर्ता-पायजामा तक ड्रेस कोड
जिमखाना क्लब में कठोर ब्रिटिश ड्रेस कोड लागू थे. क्लब के डाइनिंग हॉल और ऑफिशियल स्थानों पर डिनर जैकेट (टक्सीडो) पहनना अनिवार्य था. लंबी लड़ाई के बाद जिमखाना क्लब ने जोधपुरी, बंदगला और कुर्ता-पायजामा जैसे पारंपरिक भारतीय पोशाकों को जगह ही.

दिल्ली जिमखाना क्लब की मेंबरशिप
दिल्ली जिमखाना क्लब की सदस्यता का आवेदन शुल्क अफसरों के लिए 1 और आम नागरिकों के लिए 1.5 लाख रुपये आवेदन शुल्क है. जबकि एक बार के शुल्क के तौर पर डेढ़ लाख अफसरों और 7.5 लाख रुपये तक का चार्ज आम नागरिकों को देना पड़ता है. फिर भी यहां कोटा होने के कारण मेंबरशिप के लिए 30-40 साल की वेटिंग होती है. क्लब के करीब 5600 मेंबरों में 40 फीसदी मेंबरशिप आईएएस, आईपीएस अफसरों, 40 फीसदी डिफेंस और 20 प्रतिशत ही आम नागरिकों को मिलती हैं. हालांकि फैमिली और अन्य को मिलाकर कुल 11 से 12 हजार की तादाद होती है.

मुंबई का जिमखाना क्लब
बॉम्बे के तत्कालीन गवर्नर सर फिलिप वोडहाउस ने साउथ मुंबई के आजाद मैदान के पास बेशकीमती जमीन इसके लिए दी. पहले यहां केवल ब्रिटिश पुरुषों को प्रवेश की अनुमति थी. भारतीय नागरिकों और महिलाओं को सदस्यता मिलना तो दूर मुख्य भवन में प्रवेश तक की मनाही थी.

भारतीयों के प्रवेश की मनाही
पहले ये क्लब नस्लवाद के प्रतीक थे.भारतीयों के प्रवेश की मनाही थी. 1920-1947 के बीच भारतीय राजाओं-महाराजाओं (पटियाला, ग्वालियर और जोधपुर के महाराजा) और अमीर कारोबारियों के लिए भी जिमखाना के दरवाजे खुले.1947 के बाद भारतीय सेना के जनरलों और आईएएस (IAS) अधिकारियों के हाथ में नियंत्रण आ गया. 

जिमखाना क्लब का विवाद
क्लब में गुटबाजी, वित्तीय गड़बड़ी और प्रबंधन में वर्चस्व का विवाद बढ़ा है.प्रशासनिक अफसरों और सैन्य अधिकारियों के गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई कोर्ट तक पहुंची. सरकार ने फिर इसका मैनेजमेंट संभालने के लिए एक समिति बनाई.

जिमखाना का मतलब
जिमखाना (Gymkhana) इंग्लिश वर्ड Gymnasium (व्यायामशाला) से मिलता है, लेकिन ये हिंदुस्तानी और फारसी से बना है. ये गेंदखाना से जिमखाना बना, जहां ब्रिटिशकाल में अफसर बॉल से खेलने आते थे. लेकिन उच्चारण की वजह से इसे अंग्रेजी के जिम दूसरा फारसी शब्द  खाना (घर/स्थान) मिलाकर जिमखाना किया गया. 

शनिवार, 16 मई 2026

सभ्यता के च‍िन्ह हैं भोजशाला के ये साक्ष्य.. हम अपनी धरोहरों के ल‍िए कोर्ट का मुंह ताकने को क्यों बाध्य हैं


 धार की भोजशाला को लेकर कोर्ट में फैसला एक ऐसे मुकदमे का है, जो स्वयंसिद्ध ही था। कोई नेत्रहीन व्यक्ति भी राजा भोज के इस महान स्मारक के खंडित पत्थरों को टटोलकर बता सकता है कि वह एक मंदिर में खड़ा है। मगर भारतीय लोकतंत्र में सब कुछ संभव है। प्रकरण में दूसरे पक्ष को इस ऐतिहासिक सच का सामना करना ही चाहिए कि पहचानें केवल स्मारकों की नहीं बदली गई थीं। जब मंदिरों को तोड़कर उनके स्वरूप बदले गए तब स्थानीय आबादी की पहचानें भी साथ ही बदली गईं। इसलिए दूसरा कोई पक्ष है ही नहीं। 

दिल्ली के कुतुबमीनार कॉम्पलैक्स से लेकर गुजरात में भरूच की मस्जिद तक आप तस्वीरों को इंटरनेट पर देखिए। जूम करके देखिए। सबकी कहानी एक जैसी है। सात सौ साल का समय कम नहीं होता, जब दिल्ली-लाहौर पर कब्जा जमाने के बाद तुर्कों और मुगलों ने पूरे देश में विध्वंस मचाया। मूर्तिपूजा के जन्मजात विरोध से उपजी धर्मांधता के शिकार हुए मंदिर भारत के लिए केवल पूजास्थल नहीं थे। वे भारत की बहुकलाओं और ज्ञान परंपरा के केंद्र थे, जिन्हें मिटाकर उनकी पहचानें बदली गईं। कश्मीर का मार्त्तण्ड मंदिर, बिहार में नालंदा-विक्रमशिला, बंगाल में पंडुआ के मंदिर, मध्यप्रदेश में विदिशा, धार, उज्जैन और मांडू, गुजरात में सोमनाथ, भरूच, चांपानेर, यूपी में अयोध्या और मथुरा तो चंद बड़े नाम हैं। गाँव-गाँव में खंडित मंदिरों और मूर्तियों का अंबार लगा है। 

भारत के हर राजवंश ने अपने समय में महान निर्माण कराए। आठवीं से बारहवीं सदी के बीच कोणार्क से होलेविडु और तंजौर तक लाखों शिल्पियों, वास्तुविदों, गणितज्ञों की पीढ़ियाँ सृजन में लगी रहीं। परमार राजवंश में राजा भोज 11 वीं सदी में अपनी राजधानी धार में ही भोजशाला का निर्माण नहीं कराया था। ऐसी दो और भोजशालाएँ थीं, जिन्हें इस्लामी आक्रांताओं ने मिटाया। पहली भोजशाला थी-उज्जैन में, दूसरी धार में और तीसरी मांडू में। राजा भोज के समय इनके नाम भोजशाला नहीं थे। ये संस्कृत में भारत की ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र थे, जिनका मूल नाम था-सरस्वती कंठाभरण।

 ग्यारहवीं सदी में अपने निर्माण के बाद तीन सौ वर्षों तक ये केंद्र सक्रिय रहे। परमारों के पराभव के बाद इनका वैभव भी इस्लामी आक्रांताओं के हाथों ध्वस्त कर दिया गया। उज्जैन परमार राजाओं की पहली राजधानी थी, जिसे राजा भोज धार लेकर आए। धार का मूल नाम धारा नगरी है और मांडू उनके समय "मंडपदुर्ग' के रूप में प्रतिष्ठित पर्वतीय मनोरम केंद्र था।

परमार राजवंश और उनके महान रचनात्मक योगदान पर तीन दशक तक अध्ययन और शोध करने वाले भारतीय मुद्रा एवं मुद्रिका अकादमी के निदेशक डॉ. शशिकांत भट्ट के अनुसार उज्जैन में महाकाल मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर अनंत पेठ मोहल्ले में 1990 के दशक तक एक उपेक्षित स्मारक था, जिसका डिजाइन बिल्कुल धार की प्रसिद्ध भोजशाला जैसा है। डॉ. भट्‌ट इतिहास के विद्यार्थियों को लेकर यहाँ कई बार आए थे। उनके अनुसार कोई नहीं जानता कि कब इस पर किसी इंतजामिया कमेटी का साइन बोर्ड टंग गया और पुरातत्व विभाग का यह लावारिस स्मारक नाजायज कब्जे में चला गया। मैंने इसके भीतर देखा कि किसी प्राचीन मंदिर के स्तंभों को निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें ताजे हरे गाढ़े ऑइल पेंट से पोता गया था।

 इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान भगवतीलाल राजपुरोहित की पुस्तक "भोजराज' में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ यह वर्णन है कि धार के समान ही उज्जैन और मांडू में भी राजा भोज ने संस्कृत की पाठशालाएं निर्मित कराई थीं। उज्जैन में वह शिप्रा के पूर्वी तट पर "बिना नींव की मस्जिद' कहलाता है। इंतजामिया कमेटी के साइन बोर्ड पर इसे मस्जिद बगैर नींव ही लिखा गया। यानी एक ऐसा स्मारक जो पहले से रहा होगा, अलग से नींव की आवश्यकता ही नहीं थी।

मांडू में शाही परिसर के लंबे किंतु विस्तृत क्षेत्र के एक आखिरी कोने पर दिलावर खाँ का मकबरा है। "विक्रम स्मृति ग्रंथ' में एक अध्याय है-मांडव के प्राचीन अवशेष। इसमें लिखा है कि मकबरा 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था। किंतु मकबरे की दक्षिणी दीवार के ढहने से नटराज शिव और देवियों की अनेक प्रतिमाओं सहित शिलालेख के काले पाषाण के टुकड़े मिले थे। सरस्वती की एक खंडित प्रतिमा भी यहीं मिली थी। उज्जैन में हुई एक संगोष्ठी में डॉ. भट्‌ट "परमारों की तीन भोजशालाएं' विषय पर शोध पत्र भी पढ़ा था। किंतु मीडिया की उपेक्षा के कारण जनसामान्य में यह तथ्य आ नहीं पाए। 

इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में एक पुस्तक है-"धार एंड मांडू।' 1912 में मेजर सी.ई. लुआर्ड द्वारा लिखी गई इस किताब में दिलावर खां के मकबरे की निर्माण सामग्री के आधार पर उसने इसे एक मुस्लिम इमारत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। वह कहता है कि यहां कभी मंदिर था।

कौन था दिलावर खाँ

दिल्ली में काबिज तुगलकों के समय 1392 में दिलावर खाँ गौरी को मालवा के नियंत्रण के लिए भेजा गया था। अलाउद्दीन खिलजी के समय परमार राजवंश के आखिरी राजा महलकदेव की पराजय के बाद वे मांडू के किले पर काबिज हो चुके थे। तुगलकों के खात्मे के बाद 1401 में मालवा में दिलावर खाँ ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। संभवत: पहले ही ध्वस्त किए जा चुके परमारों के इन महान् स्मारकों को उसी मलबे से एक साथ मस्जिद और मकबरों की शक्ल दिलावर खां के समय दी गई। मांडू के हिंडोला महल, अशर्फी महल और जहाज महल में प्राचीन हिंदू भवनों के ही पत्थरों का उपयोग आज भी साफ दिखाई देता है। मांडू म्युजियम में इस्लामी दौर के विध्वंस के सबूत भी देखे जा सकते हैं।

राजा भोज का रचना संसार

संग्रहालय की लाइब्रेरी में 417 पेज का यह शोध ग्रंथ भी भगवतीलाल राजपुरोहित की रचना है। इसके विभिन्न अध्यायों में राजा भोज के महान निर्माण कार्यों की चर्चा है। वे कहते हैं कि राजा भोज स्वयं एक कवि थे। उन्होंने उच्च कोटि के 60 ग्रंथों की रचना स्वयं की थी। उनकी विद्वानों की परिषद में पाँच सौ से अधिक सृजनशील लोग थे। इनके लिए ही धार में सरस्वती कंठाभरण या शारदासदम् नाम की एक सभा का निर्माण किया गया था। इसके पेज 309 पर शारदासदम को भारती भवन भी कहा गया है। यहीं 1034 में राजा भोज ने वाग्देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई थी, जो लंदन के ब्रिटिश म्युजियम में है। यह शोध ग्रंथ हमें बताता है कि धार की तरह ही उज्जैन में भी सरस्वती कंठाभरण के नाम से एक प्रासाद निर्मित किया गया था, जिसका गर्भग्रह प्रशस्तियों के शिलाखंडों से भरा हुआ था।

गुजरात के राजा जय सिंह सिद्धराज का उज्जैन आगमन

राजपुरोहित के अनुसार राजा जयसिंह सिद्धराज 1132 में यहाँ आए थे और उन्होंने राजा भोज द्वारा लिखित विविध विषयों के ग्रंथ स्वयं देखे थे। यही नहीं, सरस्वती कंठाभरण के नाम से भी राजा भोज ने दो ग्रंथ लिखे थे। एक व्याकरण का और दूसरा काव्यशास्त्र का। पेज 315 पर उल्लेख है कि मंडपदुर्ग के छात्रावास के अध्यक्ष गोविंद भट्‌ट के पुत्र धनपति भट्‌ट को भोज ने भूमिदान की थी। एक छात्रावास का संदर्भ यह संकेत करता है कि मांडू में भी कोई विद्यापीठ अवश्य रही होगी। 

शनिवार, 9 मई 2026

बनारस के एक डोम से सुनी एक कहानी- पिशाच की प्यास

 काशी में मणिकर्णिका घाट पर एक जगह है जहाँ चिताएँ कभी ठंडी नहीं होतीं। वहीं रहता था 'कालू पिशाच'। लोग कहते थे वो 1943 के अकाल में मरा था। मरते वक्त उसके मुँह में न पानी था, न किसी ने राम नाम लिया। भूख और अपमान से मरी आत्मा पिशाच बन गई।

उसकी प्यास खून की नहीं थी। वो हर रात जलती लाशों के पास बैठ कर लोगों की गर्मी चूस लेता था। कोई रोता हुआ बेटा, कोई विधवा — वो पास आता, उसकी छाती पर बैठता, और फुसफुसाता, "दे दे... थोड़ी जिंदगी दे दे..." सुबह तक वो इंसान आधा मरा मिलता।

तांत्रिक आए, कील ठोकी, सरसों फेंकी। पिशाच हँसता रहा। क्योंकि उसे बांधा नहीं जा सकता था, उसे सिर्फ तृप्त किया जा सकता था।

फिर आया शिवा। उम्र 24, चित्रकूट का लड़का। उसकी छोटी बहन डूब कर मरी थी, अस्थि कलश लेकर आया था। शिवा की माँ देवी की परम भक्त थी। बचपन में उसने शिवा को एक ही चीज़ रटाई थी —

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

माँ कहती थी, "बेटा, ये मारण मंत्र नहीं है। ऐं सरस्वती है, ह्रीं महालक्ष्मी, क्लीं महाकाली। चामुण्डा वो है जो अंधेरे को भी माँ की तरह गोद में ले लेती है। जब डर लगे तो लड़ना मत, माँ को बुलाना।"

रात के दो बजे शिवा अकेला घाट पर बैठा था। पंडित ने कहा था सुबह विसर्जन होगा। वो माला नहीं लाया था, बस बहन की फ्रॉक हाथ में थी। मन भारी था तो होंठ अपने आप चल पड़े — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे... ॐ ऐं ह्रीं क्लीं...

तभी राख में से ठंडी हवा उठी। चिताओं की लपटें नीली पड़ गईं। सामने वो खड़ा था — कालू। आठ फुट लंबा, पेट पीठ से चिपका, आँखें अंगारे जैसी, नाखूनों में चिता की राख।

वो शिवा पर झपटा। शिवा गिरा, पर मंत्र रुका नहीं। डर में भी उसके होंठ हिल रहे थे।

पिशाच ने उसकी गर्दन पकड़ी। बर्फ जैसी पकड़। शिवा की सांस रुकने लगी। तभी कुछ अजीब हुआ। मंत्र की आवाज़ शिवा के गले से नहीं, उसकी छाती से निकल रही थी। हर 'क्लीं' पर पिशाच का हाथ काँपा।

पिशाच चिल्लाया, "बंद कर! ये आग है!"

शिवा ने आँखें खोलीं। उसने देखा पिशाच की आँखों में भूख नहीं, दर्द था। उसने मंत्र बंद नहीं किया, पर एक हाथ आगे बढ़ा कर पिशाच के जलते हुए माथे को छू लिया।

सत्तर साल में पहली बार किसी ने उसे मारा नहीं, छुआ था।

जैसे ही शिवा की गर्म उंगलियाँ उसके माथे पर लगीं, मंत्र बदल गया। अब वो सिर्फ ध्वनि नहीं थी, वो करुणा बन गई। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे — हर बीज एक देवी बन कर उतरा। ऐं ने उसे ज्ञान दिया कि वो कौन था, ह्रीं ने उसे लज्जा दी कि वो क्या बन गया, क्लीं ने उसके अंदर की भूख को प्रेम में बदला।

पिशाच घुटनों पर आ गया। उसकी देह से काला धुआँ निकलने लगा। वो रोया, "मुझे मत जलाओ... मुझे सिर्फ एक बार किसी ने 'बेटा' कहा होता... मैं भूखा नहीं, अकेला मरा था।"

शिवा ने उसे गले लगा लिया। जलती चिता के पास एक जिंदा लड़का एक मरे हुए पिशाच को पकड़ कर रो रहा था, और लगातार जप रहा था — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

धीरे धीरे पिशाच का रूप बदला। लंबी जीभ सिमट गई, नाखून गिर गए। वो एक दुबला पतला बूढ़ा बन गया, आँखों में आँसू।

उसने कहा, "माँ आ गई।"

उसी पल घाट की सबसे पुरानी चिता अपने आप बुझ गई, और उस राख से एक नीली लौ उठी जो सीधा आकाश में चली गई। बूढ़ा वहीं बैठे बैठे मुस्कुराया और राख बन कर गंगा में मिल गया।

सुबह डोम ने शिवा से पूछा, "रात में चीखें सुनीं, तू जिंदा कैसे?"

शिवा ने सिर्फ इतना कहा, "मैंने मंत्र से उसे मारा नहीं, मैंने मंत्र से उसे माँ सुनाई। चामुण्डा मारती नहीं, वो अपने बच्चों को — चाहे वो देव हों या पिशाच — गोद में लेती है।"

उस दिन के बाद मणिकर्णिका पर 'कालू' कभी नहीं दिखा। पर लोग कहते हैं अमावस की रात जब कोई अकेला घाट पर रोता है, तो हवा में हल्की सी आवाज़ आती है —

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे...

और रोने वाले को लगता है जैसे किसी ठंडे हाथ ने नहीं, किसी माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया हो।

कहानी का सार: मंत्र में बिजली नहीं, ममता होती है। पिशाच की सबसे बड़ी प्यास खून नहीं, स्पर्श थी। और जब इंसान डर कर भागने की जगह गले लगा ले, तभी निर्वाण होता है।

- संकल‍ित कहान‍ियां

बुधवार, 6 मई 2026

चले मरुत उनचास... इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है


 सुंदरकांड पढ़ते हुए 25 वें दोहे पर ध्यान थोड़ा रुक गया। तुलसीदास ने सुन्दर कांड में, जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

अर्थात : जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो -

भगवान की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगे। हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे।

मैंने सोचा कि इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? यह तुलसी दास जी ने भी नहीं लिखा। फिर मैंने सुंदरकांड पूरा करने के बाद समय निकालकर 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी खोजी और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ।

तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।

दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।

ये 7 प्रकार हैं- 1.प्रवह, 2.आवह, 3.उद्वह, 4. संवह, 5.विवह, 6.परिवह और 7.परावह।

1. प्रवह : पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं।

2. आवह : आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।

3. उद्वह : वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है।

4. संवह : वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।

5. विवह : पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है।

6. परिवह : वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।

7. परावह : वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।

इन सातों वायु के सात सात गण हैं जो निम्न जगह में विचरण करते हैं -

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक कि दक्षिण दिशा। इस तरह 7 x 7 = 49 । कुल 49 मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।

हम अक्सर रामायण, भगवद् गीता पढ़ तो लेते हैं परंतु उनमें लिखी छोटी-छोटी बातों का गहन अध्ययन करने पर अनेक गूढ़ एवं ज्ञानवर्धक बातें ज्ञात होती हैं ।