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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

हमारे देश में ज़हर घोल रही है… Twitter पर इनकी अभ‍िव्यक्त‍ि


 सीमा…जी हां, सीमा देश की हो…, संबंधों की हो…आचरण की हो …प्रेम अथवा दुश्मनी की हो.. सीमा व‍िरोध की हो या अभ‍िव्यक्त‍ि की, सभी में व्‍यक्‍ति को मर्यादा का भान होना जरूरी होता है। देश-काल अथवा मानवीय व‍िचारों की अभ‍िव्यक्त‍ि में बहुत काम आती हैं ये सीमाएं परंतु जब इन्हीं का अत‍िक्रमण क‍िया जाने लगे तब…?

तब यही होता है जो प‍िछले क‍िसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी को लाल क‍िले पर द‍िखा, सीमाओं के अत‍िक्रमण तो कल भी द‍िखा जब व‍िदेशी सेलीब्र‍िटीज (पॉप स‍िंगर रिहाना, पॉल‍िट‍िकल, एक्ट‍िव‍िस्ट ग्रेटा थनबर्ग, और तो और पॉर्न स्टार म‍िया खलीफा  तक) द्वारा ट्व‍िटर के माध्यम से भारत के आपसी व अंदरूनी मामले में दखल द‍िया गया। इसे हमारे देश के ज‍िन ”राजनैत‍िक व बुद्ध‍िजीवियों” ने क‍िसान के ह‍ित में प्रचार‍ित क‍िया… क्या ये सही था।

अपनी सीमा का अत‍िक्रमण तो सोशल मीड‍िया प्लेटफॉर्म ट्व‍िटर ने भी क‍िया, क‍ि प्रधानमंत्री के ख‍िलाफ ”क‍िसान नरसंहार” वाले हैशटैग्स को जानबूझकर पहले तो ”षडयंत्रकार‍ियों” द्वारा चलाने द‍िया, फ‍िर सरकार द्वारा आपत्त‍ि क‍िए जाने पर मात्र एक घंटे के ल‍िए अकाउंट सस्पेंड कर खानापूरी कर पुन: उन्‍हीं वैमनस्यकारी हैशटैग को आगे बढ़ाने की छूट दे दी ताक‍ि अराजकता फैले।

ट्व‍िटर के माध्यम से रोह‍ित वेमुला प्रकरण, सीएए-एनआरसी, द‍िल्ली दंगों, बेंगलुरू ह‍िंसा, जेएनयू में ह‍िंसक व‍िरोध, कश्मीर को देश में जोड़ने का व‍िरोध और अब क‍िसान आंदोलन के बहाने व‍िदेश‍ियों का कुप्रचार … अभ‍िव्यक्त‍ि की सारी सीमायें तोड़ने का ही तो उदाहरण है।

सीमाओं के अत‍िक्रमण से ही व‍िवाद पैदा कर कमाई करने वाले ट्व‍िटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम हों या फ‍िर व्हाट्सएप जैसे अन्य कोई माध्यम…हमें देशह‍ित में इनके हर प्रोपेगंडा पर न‍िगाह रखनी होगी।

हो सकता है सरकार के राजनैत‍िक व‍िरोधी ये सोच रहे हों क‍ि उन्होंने व‍िरोध के ल‍िए ट्व‍िटर को माध्यम बनाया जबक‍ि है इसका उल्टा ही… दरअसल, ये ट्व‍िटर के टूल बने हुए हैं क्योंक‍ि ये ड‍िज‍िटल माध्यम अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता के नाम पर स्वयं तो पैसा बना रहे हैं और भारत जैसे लोकतंत्र में ज़हर घोल रहे हैं…। सीधी सी बात है ज‍ितना ज़हर घुलेगा..उतना ही इनके व्यूज बढ़ेंगे और व्यूज़ की अध‍िकता इन्हें धन द‍िलाएगी इसल‍िए कल ट्व‍िटर पर कार्यवाही की चेतावनी सरकार की ओर से तो दी गई है, हमें अर्थात् आम नागर‍िक को भी यह ध्यान रखना होगा क‍ि कोई भी व‍िरोध सरकार के व‍िरोध तक सीम‍ित रहे, कहीं वह देश का व‍िरोध ना बन जाए।

क‍िसान आंदोलन का सच हम सब पढ़ ही रहे हैं जहां व‍िरोध की सब सीमायें टूट कर लालक‍िले तक पहुंच गईं, इसील‍िए तो कोरोना वैक्सीन की सफलता तक पर दुष्प्रचार क‍िया गया। जब हम ही अपने देश की उपलब्ध‍ियों पर शक करेंगे तो हर तरह की सीमाओं के अत‍िक्रमणकारी क्यों न इसका फायदा उठायेंगे। अभ‍िव्यक्त‍ि के नाम पर ये समय सावधान रहने और क‍िसी का टूल ना बनने का है।

- अलकनंदा स‍िंंह 

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

क‍िसान आंदोलन: परत दर परत खुल रहे हैं राज़


 ‘इंद‍िरा ठोक दी, मोदी क्या चीज़ है, मोदी को भी…’  के साथ खाल‍िस्तान की मांग वाले पोस्टर्स,  पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे, शाहीनबाग वाली दादी ब‍िल्क‍िस बानो, धारा 370 वापसी की मांग, नागर‍िकता संशोधन ब‍िल के व‍िरोधी, सरदार जी के वेश में नज़ीर की उपस्थ‍ित‍ि, मस्ज़‍िदों से पहुंचता खाना, हाथरस वाली भाभी की उपस्थ‍ित‍ि, जेएनयू की छात्राओं के गुट, क‍िसान नेता महेंद्र स‍िंह ट‍िकैत ज‍िस बेटे की हरकतें पसंद नहीं करते थे, वो राकेश ट‍िकैत, पीएफआई के साथ संबंध रखने वाला चंद्रशेखर और द‍िल्ली दंगों के आरोपी अमानतुल्ला खान, इंद‍िरा गांधी को म‍िटाया और अब मोदी को म‍िटाने की धमकी देने वाले तत्व, आंदोलन स्थल से पीछे की ओर अपनी आलीशान गाड़‍ियां खड़ी कर आईफोन से सेल्फी लेने वाले तथाकथ‍ित ”बेचारे गरीब क‍िसान” …..।

ये मजमा है उन लोगों का है जो केंद्र सरकार के व‍िरोध से ज्यादा स्वयं ”मोदी व‍िरोध” में स्वयं अपना ही चेहरा मैला क‍िये जा रहे हैं और क‍िसान ब‍िल के व‍िरोध की आड़ में कोरोना के बाद पटरी पर आती देश की अर्थव्यवस्था को तहस नहस करने पर आमादा हैं। यही वजह है क‍ि आंदोलन को अब हर खासोआम हिकारत की नजर से देखने लगा है।

आंदोलन का सच बताने में रही-सही कसर अवार्ड वापसी गैंग्स और उन ख‍िलाड़ि‍यों व कलाकारों ने पूरी कर दी जो कभी क‍िसान रहे ही नहीं। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि जिन्होंने कायदे से गांव नहीं देखे, खेत से जिनका साबका नहीं पड़ा, फसल की निराई-गुड़ाई नहीं की, उपज की मड़ाई-कटाई नहीं की, जो नहीं जानते क‍ि घर पर खेतों से अनाज कैसे आता है, वे लोग किसानों के हमदर्द बनने चले हैं। और दावा यह भी कि ये तो “किसान आंदोलन” है, इसका राजनीति से कोई भी लेना-देना नहीं।

न‍िश्च‍ित रूप से इसका राजनीत‍ि से लेना देना नहीं है परंतु उन तत्वों से अवश्य लेना-देना है ज‍िनके एनजीओ को फंड‍िंग के लाले पड़े हैं। जो मंड‍ियों के ब‍िचौल‍िए थे, करोड़ों में खेलते थे और उनका एकाध‍िकार टूट रहा है। क‍िसान अपनी फसल क‍िसी को भी बेचे, यह कोई भी ब‍िचौल‍िया कैसे बर्दाश्त करेगा भला।

बेशक हम सोशल मीड‍िया को तमाम नकारात्मक गत‍िव‍िध‍ियों के ल‍िए गर‍ियाते रहते हैं परंतु यही मीड‍िया ‘इन जैसे’ तत्वों की पोल खोलने का माध्यम भी बना है, ठीक हाथरस कांड की तरह ज‍िसमें एक कांग्रेस नेता की पीएफआई के साथ सांठगांठ को दलि‍त अत्याचार के रूप में प्रचार‍ित क‍िया गया था।

इस कथ‍ित क‍िसान आंदोलन में मेधा पाटकर, चंद्रशेखर, जेएनयू छात्र, सीएए व‍िरोधी और खाल‍िस्तानी अलगाववाद‍ियों की उपस्थ‍ित‍ि के साथ साथ पाक‍िस्तानी मौलवी और कनाडा के पीएम के बयानों ने पूरा पैटर्न ही समझा दिया क‍ि आख‍िर आंदोलन का प्रोपेगंडा क्या है और क्यों पंजाब से ही इसकी अगुवाई की जा रही है।

दरअसल कश्मीर में अलगाववाद‍ियों को जेल, धारा 370 हटाने, स‍िख फॉर जस्ट‍िस, बब्बर खालसा जैसे तमाम एनजीओ’ज की फंड‍िंग बंद कर इन्हें बैन करने के बाद से तो ये सरकार व‍िरोधी भूचाल आना ही था, और बहाना बन गया कृषि कानून का अंधा विरोध, ज‍िसे पंजाब की कांग्रेस सरकार ने पूरा साथ दिया।

फ‍िलहाल ”पंजाब ही क्यों”… के सवाल उठने पर अब बाकायदा धन देकर उन गैर भाजपा शाष‍ित राज्यों से भी क‍िसान संगठनों को बुलाने की कोश‍िश हो रही है जो पहले ही एमएसपी पर फसल खरीद में बड़ा र‍िकॉर्ड बना चुके हैं परंतु बात तो खुल ही चुकी है… बस देखना यह है क‍ि ख‍िंचेगी कब तक ।

बहरहाल, देश को खंड-खंड करने और क‍िसान को गरीब बनाए रखने की मंशा पालने वाले ”कथ‍ित क‍िसानों” की चाल पर ”अब्दुल मन्नान तरज़ी” का शेर और बात खत्म क‍ि-

नालों ने ये बुलबुल के बड़ा काम किया है
अब आतिश-ए-गुल ही से चमन जलने लगा है।

-Alaknanda singh

सोमवार, 28 सितंबर 2020

‘कौवा कान ले गया’ जैसा है क‍िसान आंदोलन का सच

 

अनियंत्रित अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता के दुष्‍परिणाम: 
कुछ नासूर ऐसे होते हैं जो क‍िसी एक व्यक्त‍ि नहीं बल्क‍ि पूरे समाज को अराजक स्थ‍ित‍ि में झोंक देते हैं, ऐसा ही एक नासूर है अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता और लोकतंत्र बचाने के नाम पर ''आंदोलन'' की बात करना, फि‍र चाहे इसके ल‍िए कोई भी अराजक तरीका क्यों ना अपनाया जाये। हाल ही में क‍िया जा रहा क‍िसान आंदोलन इसी अराजकता और भ्रम की पर‍िणत‍ि है। ''क‍िसानों के नाम पर'' क‍िये जाने वाले इस आंदोलन के कर्ताधर्ता दरअसल भयभीत हैं क‍ि उनकी सूदखोर लॉबी के हाथ से न‍िकल कर क‍िसान अपनी उपज का खुद माल‍िक बन जायेगा। 

आंदोलन का जोर हर‍ियाणा, पंजाब में ज्यादा रहा क्योंक‍ि इन दोनों ही प्रदेशों में मंडी कारोबारी हों या कोल्ड स्टोरोज चेन के माल‍िक सभी नेता हैं। हर‍ियाणा में देवीलाल के पोते दुष्यंत चौटाला या पंजाब के अकाली दल की बादल फैम‍िली का करोबारी ह‍ित इससे प्रभाव‍ित हो रहा है। ठीक यही स्थ‍िति महाराष्ट्र में एनसीपी के पवार फैम‍िली की भी है, तभी तो अज‍ित पवार ने कहा क‍ि वे कानून को महाराष्ट्र में लागू नहीं होने देंगे।  पश्च‍िमी उत्तरप्रदेश में भी भाक‍ियू ने प्रदर्शन क‍िये, इसमें भाग लेने वाले ''क‍िसान'' दरअसल मंडी में कमीशन एजेंटों  व आढ़त‍ियों के वे गुर्गे ही न‍िकले परंतु यहां उनकी '' नेताग‍िरी'' की सारी हवा पढ़े ल‍िखे क‍िसानों ने ही न‍िकाल दी।  

संसद में भी आपराध‍िक पृष्ठभूम‍ि वालों ने तो भरपूर अराजकता फैलाने की कोश‍िश की, संसद के बाहर धरना द‍िया, राष्ट्रपत‍ि से जाकर भी म‍िले क‍ि व‍िधेयकों को पास न क‍िया जा सके और कहीं से भी प्राणवायु म‍िल सके परंतु अब यह कानून ''कृषि उत्पाद व्यापार व वाणिज्य विधेयक-2020'' बन गया। इसमें  किसानों के हित में ऐसे प्रावधान किए गए हैं जो कृषि उत्पाद बाजार की खामियों को दूर करेंगे। अब किसानों को अपना उत्पाद बेचने के लिए एपीएमसी यानी कृषि मंडियों तक सीमित रहने के लिए मजबूर नहीं होना होगा। कानून बनने के बाद राज्य की मंडियां या व्यापारी किसी प्रकार की फीस या लेवी नहीं ले पाएंगे। ज‍िस एमएसपी को लेकर संशय पैदा क‍िया जा रहा है , केंद्र सरकार ने अगले ही कदम में रबी की फसलों का एमएसपी बड़ा कर ये शंका भी न‍िर्मूल साब‍ित‍ कर दी। अब...? अब ये क्या करें .. कहने को कुछ नहीं ..बचा तो कुलम‍िलाकर ये कौआ कान ले गया जैसी कहावत को ही चर‍ितार्थ कर रहे हैं जहां ना कौआ है ना ही कान गायब है ..है तो बस स‍िर्फ हंगामा ..वो भी बेवजह। 

वर्ष 1967 में बना कृषि बाजार उत्पाद समिति यानी एपएमसी एक्ट और वर्ष 1991 के बाद आर्थ‍िक सुधारों के बाद भी बिचौलियों के कारण कृषि उत्पाद बाजारों की उपेक्षा, किसानों का शोषण के ल‍िए सरकारी लाइसेंस ने स्थ‍ित‍ि औश्र ब‍िगाड़ी ही। हालांक‍ि 2001 में शंकरलाल गुरु समिति ने कृषि उत्पाद बाजार के संवर्द्धन एवं विकास के लिए 2,600 अरब रुपये के निवेश का सुझाव दिया, लेकिन उस पर चुप्पी साध ली गई। ऐसे में जाह‍िर है क‍ि  इस कृषि उत्पाद व्यापार व वाणिज्य विधेयक-2020 कानून से उस वर्ग को तो खीझ होगी ही जो अब तक कृषि उत्पाद बाजार से अरबपत‍ि बन गए। कृषि मंडियां ज‍िनके ल‍िए कमाई का अहम ज़रिया रहीं, कृषि मंडियों की खामियों व उनके परिसर में संचालित होने वाले उत्पादक संघों से कौन सा क‍िसान आज‍िज़ नहीं होगा।   

इस सारे कथ‍ित आंदोलन से एक बात तो साफ हो गई क‍ि जिन्होंने कायदे से गांव नहीं देखे, खेत से जिनका साबका नहीं पड़ा, फसल की निराई-गुड़ाई नहीं की, उपज की मड़ाई-कटाई नहीं की, घर पर खेतों से अनाज कैसे आता है, जो नहीं जानते, वे लोग किसानों के हमदर्द बनने का दावा कर रहे हैं। दरअसल ऐसे लोगों की कोशिश अपनी राजनीति चमकाना है, इसीलिए वे राज्यसभा में अध्यक्ष की पीठ के सामने मेज पर चढ़ जाते हैं...हंगामा करते हैं और इसके बावजूद खुद को संसदीय आचरण के संवाहक मानते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज की जनता सूचनाओं के बहुस्रोतों के उपयोग की आदी हो गई है। वह भी सच और झूठ समझने लगी है। उसकी समझ ही मौजूदा राजनीति को जवाब देगी। 

- अलकनंदा स‍िंंह