मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

पराजितों के मनोविज्ञान की गाथा है..... 'असुर'

मुंबई । 21वीं सदी का वर्तमान युग, पौराणिक गाथाओं को वैचारिक कसौटी पर कसे जाने का युग है और इस युग में ऐसे कहानीकारों और उपन्‍यासकारों का सामने आना कम से कम नई पीढ़ी और नई सोच वालों के लिए बेहद अहम है जो गाथाओं को वैज्ञानिक तथ्‍यों के साथ सामाजिक सरोकारों से भी जोड़कर देखते हैं या देखने को आतुर रहते हैं।
भारतीय संस्‍कृति के अनुसार अपने लेखन को माता-पिता को समर्पित करने वाले तथा उन्‍हें अपना पौराणिक ज्ञान का प्रेरणास्रोत बताने वाले लेखक आनंद नीलकांतन की कृति ASURA : TALE OF THE VANQUISHED अर्थात् ''असुर : पराजितों की कहानी'' है। ये न केवल अपने ध्‍येय को साधती है बल्‍कि हमें सावधान भी करती है, कि समाज के द्वारा प्रतिपादित जन ही नायक हों या हमारे आराध्‍य हों, ऐसा आवश्‍यक तो नहीं। समाज में वे भी हमारे लिए सोचने का विषय हो सकते हैं जो वंचित हैं, शोषित हैं या जिन्‍हें जीतकर कोई अभिजात्‍य वर्गीय 'नायक' बना।

संभवत: पहली बार असुरों को घृणा की दृष्‍टि से देखने वाले समाज को लेखक आनंद ने यह सोचने पर विवश किया है कि प्रत्‍येक सच का एक दूसरा पहलू भी होता है जिसे पूर्णरूपेण न जानकर हम उसके साथ अन्‍याय ही करते हैं।

लीडस्‍टार्ट पब्‍लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक 'असुर' में निश्‍चितत: ही पुस्‍तक का नायक रावण है और शुरू से अंत तक पूरी कहानी को वह अपने दृष्‍टिकोण से व्‍याख्‍यायित करता जाता है। हालांकि लेखक आनंद ने मानवजनित गलतियों का ठीकरा, किस तरह जनता को भोगना होता है, इसे भी बखूबी बयान किया है। पुस्‍तक में सोच का धरातल सामान्‍य रखा गया है जहां दो सभ्‍यताओं के वाहक हैं, उनके बीच द्वंद हैं, महात्‍वाकांक्षाओं के टकराव हैं, सुर यानि संभ्रांतजन और असुर यानि वंचित-शोषित-असभ्‍य, एक ओर अपनी दस विशेष शक्‍तियों के साथ अतिमहात्‍वाकांक्षी रावण है तो दूसरी ओर संभ्रांत समाज को हांकने वाले समाज के प्रतिपादित नायक देवगण हैं।

पुस्‍तक में लेखक आनंद रावण के माध्‍यम से यह बताने में सफल हुये हैं कि एक सामान्‍यजन अपनी महात्‍वाकांक्षाओं से आत्‍मबल विकसित कर ले तो वह अद्भुत-अभूतपूर्व बन सकता है, वह समाज में व्‍याप्‍त सामंती सोच और श्रेष्‍ठता के पक्षपाती मानदंडों को आमजन के लिए सुलभ बना सकता है।

वर्तमान में जो स्‍थितियां हमारे समाज में अवनमन का कारण बनी हुई हैं, देखा जाये तो आनंद का ये 'असुर' समाज के स्‍थापित दकियानूसी कायदे कानूनों से जूझने का व सामंती सोचों को बदलने का एक उपक्रम दिखाई देता है। पुस्‍तक में कहानी को रावण के माध्‍यम से कहा जाना, हो सकता है कि प्रथमदृष्‍टया अतिशीघ्र प्रचार पाने का माध्‍यम लगे परंतु पौराणिक गाथाओं को लेकर कुछ अलग सोचने वालों के लिए लेखक की यह कोशिश शोध का विषय तो होगी। यूं भी लकीर के फकीर न बनना और समाज को गाथाओं के दबे पक्ष से परिचित कराये रखना आज के साहित्‍यवर्ग में भारी चुनौती है जिसे आनंद ने बखूबी पार किया है।नि:संदेह आज के प्रयोगवादी व वैचारिक प्रगतिवादी युग में सभी के लिए 'असुर' एकउत्‍कृष्‍ट कृति है।       

Book :  ASURA- Tale of the  vanquished

Author : Anand neelkantan

Publication : Platinum Press, An Imprint of --
 LEADSTART PUBLICATION Pvt.Ltd

 -अलकनंदा सिंह,   Legend News

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