मंगलवार, 7 जनवरी 2014

साहित्य महारथी देवपुरा जी का निधन

मथुरा। 
राजस्थान की अग्रणी साहित्यिक संस्था के संस्थापक-प्रधान मंत्री और हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के अध्यक्ष वयोवृद्ध विद्वान भगवती प्रसाद देवपुरा के निधन का समाचार आते ही ब्रज के साहित्यकार, कवि एवं कलाकारों में शोक व्याप्त हो गया। देवपुरा जी के निधन का एक दूसरे से समाचार सुनते ही बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक सहज रूप में गोवर्धन रोड स्थित ज्ञानदीप विद्यालय पहुंचने लगे और कई दशकों के सम्बन्ध से जुड़े संस्मरणों को साझा करते हुए वे भाव विभोर हो उठे। पाँच माह पूर्व 4 अगस्त को ज्ञानदीप में देवपुरा जी मोहन स्वरूप भाटिया अभिनन्दन ग्रंथ विमोचन समारोह में अपने पुत्र श्याम देवपुरा के साथ आये थे और तब उन्होंने मंच पर साहित्य मंडल द्वारा दो वृहद खण्डों में प्रकाशित ‘सूर सागर’ स्वामी गुरुशरणानन्द जी महाराज को भेंट किया था।
साहित्य मंडल नाथद्वारा द्वारा कई दशकों से प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस तथा माह फरवरी में श्रीनाथ जी के पाटोत्सव के अवसर पर राष्ट्रीय स्तर के जो आयोजन किये जाते रहे हैं उनमें बहुत बड़ी भागीदारी ब्रज की रहती थी। इन दोनों ही अवसरों पर ब्रजभाषा साहित्य एवं संस्कृति से सम्बन्धित पत्र-वाचन तथा ब्रजभाषा कवि सम्मेलन के अतिरिक्त विशिष्ट विभूतियों को सम्मानित किया जाता रहा है।
ज्ञानदीप में सम्पन्न श्रद्धांजलि सभा में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष मोहन स्वरूप भाटिया ने कहा कि नाथद्वारा वल्लभ कुल सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थ होने के साथ वर्तमान समय में देवपुरा जी के अथक प्रयासो से ब्रजभाषा का सबसे बड़ा तीर्थ बन गया था।
उन्होंने कहा कि साहित्य मंडल द्वारा 2700 पृष्ठों के सूर सागर तथा अष्टछाप के सभी कवियों के ग्रन्थों सहित लगभग चालीस ग्रन्थों के सम्पादन-प्रकाशन का बड़ा कार्य किया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि देवपुरा जी की साहित्य-साधना के कारण नाथद्वारा में ब्रज और ब्रज में नाथ्द्वारा के दर्शन होते थे। वह ब्रज और नाथद्वारा के मध्य सेतु बने हुए थे और ऋषितुल्य साहित्य महारथी थे ।
मासिक पत्रिका ‘हरिनाम’ के सम्पादक डा0 भागवत कृष्ण नांगिया ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि प्रचार-प्रसार से दूर रहे देवपुरा जी सरस्वती के उपासक और साहित्य के सच्चे साधक थे।
लोक संगीत विदुषी श्रीमती वन्दना सिंह ने कहा कि देवपुरा जी कलाकारों के लिए पितामह थे। साहित्य मंडल के मंच पर ‘महारास’ की प्रस्तुति के पश्चात् उन्होंने राधा-कृष्ण के स्वरूपों के चरण स्पर्श कर तथा अन्य सभी कलाकारों को स्नेह-आशीष प्रदान कर सम्मान से अभिभूत कर दिया था।
ब्रजभाषा कवि राधागोविन्द पाठक ने इन पंक्तियों के द्वारा देवपुरा जी को श्रद्धांजलि अर्पित की-
जबु ते सुन्यौ करुन कर्कस स्वर, आरत भर्यौ रुदन।
झरत अश्रु धार बहुत, भारी-भारी है मन।।
देवपुरा जी देह त्याग कैं, देवलोक पहुँचे।
सत्संकल्पी, कर्म पथिक कूँ, श्रद्धा भरे सुमन।।
राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गोपाल प्रसाद मुद्गल ने श्रद्धांजलि व्यक्त की-
देवपुरा जी ने किया, देवलोक प्रस्थान।
बेहद व्याकुल हो रहा, पूरा हिन्दुस्तान।।
हिन्दी हित सेवा करी, सदा लुटाया प्यार।
स्वीकारो श्रद्धांजलि, मन से बारम्बार।।
ब्रजभाषा कवि श्याम सुन्दर शर्मा ‘अंकिचन’ ने भावांजलि प्रस्तुत की-
शिक्षाविद्, साहित्य पुरोधा, सदा सृजन हित रहे समर्पित।
संस्कृति रक्षक, समय समीक्षक, हिन्दी प्रहरी, ट्टढ़ संकल्पित।।
आशातीत अतीत हो गया, काल चक्र से लड़ते-लड़ते।
दुःखी हृदय और बोझिल बनते, श्रद्धा सुमन आपको अर्पित।।
 श्रद्धांजलि सभा में राधा विहारी गोस्वामी ने कहा कि कई संस्थाएँ जो कार्य नहीं कर सकतीं वह अकेले देवपुरा जी ने किया। वह मन-प्राण से ब्रजभाषा और ब्रजभाषा साहित्यकारों के उन्नयन के लिए सदैव समर्पित रहे थे।
डा0 राजेन्द्र कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि देवपुरा जी के अवसान के साथ ब्रजभाषा साहित्य के प्रकाशन और साहित्यकारों को प्रोत्साहन प्रदान करने वाले प्रयासों के युग का भी अवसान हो गया है।
संगीतज्ञ विजय केलकर ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि देवपुरा जी ने बड़ी संख्या में कवि-कलाकारों को मंच प्रदान कर सराहनीय सेवा कार्य किया है।श्रद्धांजलि सभा में विवेक सक्सैना आशीष अग्रवाल, रामगोपाल चैधरी, डा0 गिरिराज नाँगिया आदि ने देवपुरा जी के निधन को अपूरणीय क्षति बताते हुए वेदना व्यक्त की।