बुधवार, 24 अगस्त 2016

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर: मातृत्व के बाजार को बचाने का प्रयास है सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016

कर्मण्यवाध‍िकारस्ते मा फलेषु कदाचन्
श्रीमद्भगवत गीता का यह उपदेश हम ना जाने कितनी बार दोहराते आए हैं परंतु जब इसे सार्थक सोच के साथ क्रियान्वित होते देखते हैं तो निश्च‍ित ही भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाना भी सार्थक हो जाता है।

आज और कल भगवान श्री कृष्ण के जन्म की धूम मची है। हमारे यहां ब्रज में तो जन्माष्टमी मनाने  का अपना एक अलग आनंद , एक अलग अंदाज़ होता है, इस बार भी है , चारों ओर भक्ति का अंबार उड़ेला जा रहा है। मां यमुना अपने  उसी रूप में दर्शन दे रही हैं जैसे कि श्री कृष्ण जन्म के समय उफन रही थीं और आज से लेकर अगले एक हफ्ते तक ब्रज में उत्सव का यही हाल रहना है मगर आज ऐन जन्माष्टमी से पहले  भारत सरकार की ओर से एक समाचार ऐसा आया है जिसे श्री कृष्ण जन्म पर ''मातृत्व और नवजातों'' के अस्तित्व को बाजार की वस्तु बनाने पर रोक लगाने के क्रम में देखा जाना चाहिए।

मोदी कैबिनेट ने आज उस बिल को मंजूरी दे दी जिसमें Surrogacy (किराये की कोख) पर लगाम लगाने का प्रावधान है। साथ ही Surrogacy वाली मां के अधिकारों की रक्षा के उपाय भी किये गये हैं। इसके साथ ही सरोगेसी से जन्मे बच्चों के अभिभावकों को कानूनी मान्यता देने का प्रावधान है।

सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 कैबिनेट से पास

कैबिनेट से पास सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 मुताबिक अविवाहित पुरुष या महिला, सिंगल, लिव इन में रह रहा जोड़ा और समलैंगिक जोड़े अब सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते. इसके साथ ही अब सिर्फ रिश्तेदार महिला महिला ही सरोगेसी के जरिए मां बन सकती है.
केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सरोगेसी बिल पर कहा, “आज कल प्रसव पीड़ा से बचने के लिए सरोगेसी फैशन बन गई है. भारत लोगों के सरोगेसी हब बन गया था इसलिए बिल की जरूरत महसूस हुई.”

फिल्मी हस्तियों पर भी निशाना साधा

सुषमा स्वराज ने इशारों-इशारों में फिल्मी हस्तियों पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा, ”बड़े सितारे जिनके न सिर्फ दो बच्चे हैं, बल्कि एक बेटा और बेटी भी है, वे भी सरोगेसी का सहारा लेते हैं.”
स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रस्ताव के अनुसार किराये की कोख मसौदा विधेयक 2016 का लक्ष्य देश में किराये की कोख संबंधी प्रक्रिया के नियमन को समुचित ढंग से अंजाम देना है.

क्या है कैबिनेट से पास हुए सरोगेसी बिल में
कैबिनेट से पास हुए बिल में व्यावसायिक सरोगेसी पर पूरी तरह बैन लगाने का प्रस्ताव है. इसके साथ ही अब सिर्फ रिश्तेदार ही सेरोगेट मां बन सकती है.
जिन माता-पिता के पहले से एक संतान है या उन्होंने एक संतान को गोद लिया है तो वे दूसरी संतान के लिए सरोगेसी का सहारा नहीं ले सकते.
देश भर में सरोगेसी के लिए 2000 क्लीनिक हैं. अब सिर्फ भारतीय भारतीय नागरिक ही सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे सकते हैं.
पांच साल से शादीशुदा जोड़े, जिनकी कोई संतान नहीं है वो ही सरोगेसी के लिए आवेदन कर सकते हैं. अविवाहित, सिंगल, लिव इन में रह रहा जोड़ा और समलैंगिक जोड़े सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते.
सरोगेसी के लिए सरोगेसी में उम्र की सीमा भी तय कर दी गई है. इसके मुताबिक पुरुष की उम्र 26-55 साल और महिला की उम्र 25-50 साल होगी तभी वे सरोगेसी के लिए आवेदन कर सकते हैं.
अगर सरोगेसी के लिए आवेदन करने वाला जोड़ा किसी बीमारी से ग्रसित है तो वो आवेदन नहीं कर सकता.
इसके साथ ही एक महिला सिर्फ एक बार ही सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे सकती है.
सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म दे जा रही महिला का शादीशुदा होना जरूरी है. इसके साथ ही वह पहले भी एक बच्चे को जन्म दे चुकी हो.
सभी सरोगेसी क्लीनिक का रजिस्टर होना जरूरी है. अगर सरोगेसी के बाद जन्मे बच्चे को अपनाने से इनकार किया जाता है तो उसके लिए बिल में 10 साल की जेल और 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है.
सरोगेसी के जरिए पैदा हुए बच्चे के पास वो सभी कानूनी अधिकार होंगे सामान्य रूप से पैदा हुए बच्चे के पास होते हैं. सरोगेसी क्लीनिक को पच्चीस सालों का रिकॉर्ड मौजूद रखना होगा.
स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री की अध्‍यक्षता में केंद्र पर नेशनल सरोगेसी बोर्ड, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्तर तक स्टेट सरोगेसी बोर्ड का गठन किया जाएगा.

क्यों पड़ी सरोगेसी बिल की जरूरत
सरकार ने हाल में स्वीकार किया था कि वर्तमान में किराये की कोख संबंधी मामलों को नियन्त्रित करने के लिए कोई वैधानिक तंत्र नहीं होने के चलते ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों सहित विभिन्न क्षेत्रों में किराये की कोख के जरिये गर्भधारण के मामले हुए जिसमें शरारती तत्वों द्वारा महिलाओं के संभावित शोषण की आशंका रहती है।

हालांकि ये भी सच है कि कथ‍ित महिला अध‍िकारवादियों द्वारा इस बिल के ख‍िलाफ कल से ही आलोचनाओं का अंबार लगने वाला है  मगर श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर सरकार की ओर से मातृत्व को बाजार की वस्तु बनाने और उपभोक्तावाद से बचाने के लिए किया गया प्रयास काबिलेतारीफ है।
कुल मिला कर बात इतनी है कि मां की गरिमा को आज तक कोई ना खरद सका है ना ही कोई बेच पाया है मगर बेहद मुफलिसी और बेहद अमीरी के इस खाईनुमा वातावरण में सरोगेसी एक व्यापार बन चुकी थी, इसे समय रहते रोका जाना जरूरी था ताकि कोख खरीदना फैशन ना बन पाए ।

- अलकनंदा सिंह 

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