मंगलवार, 2 जनवरी 2018

मशहूर शायर अनवर जलालपुरी के निधन से गमगीन हुआ माहौल

ख्वाहिश मुझे जीने की ज़ियादा भी नहीं है
वैसे अभी मरने का इरादा भी नहीं है

हर चेहरा किसी नक्श के मानिन्द उभर जाए
ये दिल का वरक़ इतना तो सादा भी नहीं है

वह शख़्स मेरा साथ न दे पाऐगा जिसका
दिल साफ नहीं ज़ेहन कुशादा भी नहीं है....


जी हां ये नज्‍़म कहने वाले मशहूर शायर अनवर जलालपुरी नहीं रहे। 

गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले मशहूर शायर अनवर जलालपुरी का निधन मंगलवार सुबह किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ में हो गया। उन्हें चार दिन पहले ब्रेन हैमरेज होने के कारण उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। उन्होंने आज सुबह 10 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। जलालपुरी को कल दोपहर में जोहर की नमाज के बाद अम्बेडकर नगर स्थित उनके पैतृक स्थल जलालपुर में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा.

अनवर जलालपुरी देश की आज़ादी के साथ पले-बढ़े और खुली हवा में सांस लेते हुए, मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक के रूप में उभरे। 6 जुलाई, 1947 को उत्तर प्रदेश में अंबेडकर नगर जिले के जलालपुर में जन्मे अनवर जलालपुरी ने अंग्रेज़ी और उर्दू में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की फिर अंग्रेज़ी के प्राध्यापक बने।

अपने घर पर सजी महफिलों में बुजुर्गों को पानी पिलाने और पान खिलाने के दौरान अनवर जलालपुरी को कब शायरी का शौक हुआ, पता ही नहीं चला। वे आठवीं-नौवीं कक्षा के दौरान शेर कहने लगे थे। दरअसल घर में माहौल ही कुछ ऐसा था। पिता मौलाना रूम की मसनवी सुनाया करते थे। जब अनवर जलालपुरी इंटर मीडियट के छात्र के रूप में मुशायरे पढ़ने लगे तो कई बार लोग शक करते थे कि यह शेर इस नौजवान का ही है या पिता की मदद से उन्होंने लिखा लिया! देखते ही देखते एक शायर के अलावा अच्छे मंच-संचालक के रूप में उन्होंने कई बड़े मुशायरों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी और प्यार-मुहब्बत के संदेश को हमेशा प्राथमिकता दी। 

मुशायरों की जान माने जाने वाले जलालपुरी ने 'राहरौ से रहनुमा तक', 'उर्दू शायरी में गीतांजलि' तथा भगवद्गीता के उर्दू संस्करण 'उर्दू शायरी में गीता' पुस्तकें लिखीं जिन्हें बेहद सराहा गया था. उन्होंने 'अकबर द ग्रेट' धारावाहिक के संवाद भी लिखे थे.

कला की विभिन्न विधाओं में मंच का संचालन भी शामिल है। विशेषकर कवि-सम्मेलनों और मुशायरों का संचालन करने के लिए एक विशेष कलात्मक प्रतिभा की आवश्यकता होती है। उर्दू मुशायरों के संचालन के इतिहास में सक़लैन हैदर के बाद एक बड़ा नाम उभरता है- अनवर जलालपुरी का। आज अनवर जलालपुरी न केवल मुशायरों के संचालक बल्कि एक अच्छे शायर, विद्वान तथा गीता और गीतांजलि जैसी पुस्तकों को उर्दू शायरी से जोड़ने वाले रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं, उर्दू में शायरी करते हैं और संस्कृत, फारसी तथा अरबी पर भी अपना अधिकार रखते हैं। 

मंच संचालन की कला पर उनका कहना था कि यह सचमुच में बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। उन्होंने 1968 से अब तक देश के छोटे-मोटे शहरों से लेकर लाल किले के मुशायरे तक का संचालन किया। उनका कहना था कि शायर अपने समय के अनुसार, पढ़वाने की मांग रखते हैं और श्रोताओं की अपनी मांग होती है। वे अच्छे चेहरे अच्छी आवाज़ों की इच्छा रखते हैं। दोनों में सामंजस्य बनाए रखते हुए मुशायरों का सम्मान बढ़ाना अनिवार्य रहता है। 

श्रीमदभागवत गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले नामचीन उर्दू शायर को प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाजा था। 

ज्ञात हुआ है कि 71 वर्षीय जलालपुरी को ब्रेन स्ट्रोक के बाद गंभीर हालत में बृहस्पतिवार देर रात केजीएमयू में भर्ती कराया गया है। वे शाम को अपने बाथरूम में गिरने के बाद से गंभीर रूप से घायल हो गये थे। बाथरुम का दरवाजा तोड़ कर उन्हें बाहर निकालने के बाद परिजनों ने उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया था।

वहां चिकित्सकों ने उनके दिमाग में खून के थक्के, रक्तस्त्राव पाए जाने के बाद उन्हें केजीएमयू रेफर कर दिया था। लखनऊ के हुसैनगंज निवासी उर्दू शायर अनवर जलालपुरी के निधन से साहित्य जगत में शोक है। 

उनके घर पर देखने वालों का तांता लगा हुआ है। जो भी उनकी मौत की खबर सुन रहा है वह गमगीन हो जा रहा है। सभी की आंखे नम हो रही हैं। 

उन्‍हीं की रचना- 

जो भी नफ़रत की है दीवार गिराकर देखो
दोस्ती की भी ज़रा रस्म निभाकर देखो
कितना सुख मिलता है मालूम नहीं है तुमको
अपने दुश्मन को कलेजे से लगाकर देखो

विख्यात शायर मलकज़िादा मंजूर के शागिर्द रहे अनवर जलालपुरी का व्यक्तित्व अपने आप में कला, साहित्य एवं संस्कृति की उम्दा मिसाल रहा है। वे कहते हैं-

गुलों के बीच में मानिन्द ख़ार मैं भी था
फ़क़ीर ही था मगर शानदार मैं भी था
मैं दिल की बात कभी मानता नहीं फिर भी 
इसी के तीर का बरसों शिकार मैं भी था।


-अलकनंदा सिंह