मंगलवार, 14 जनवरी 2014

नहीं रहे मराठी कवि नामदेव ढसाल

मुंबई। 
मशहूर मराठी कवि नामदेव लक्ष्मण ढसाल का आज मुंबई में निधन हो गया है. वे लंबे समय से आंत के कैंसर से पीड़ित थे. सितंबर, 2013 में इलाज के लिए उन्हें मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था जहां आज सुबह करीब 4 बजे उनका निधन हो गया। बताया गया है कि नामदेव लक्ष्मण ढसाल के शव को कल अंतिम दर्शन के लिए बाबा साहब हॉस्टल ग्राउंड में रखा जाएगा और दोपहर बाद एक बजे उनकी अंतिम यात्रा मुंबई के वडाला के डॉक्टर अंबेडकर कॉलेज से शुरू होगी. नामदेव ढसाल का जन्म 15 फरवरी 1949 को पुणे के एक दलित परिवार में हुआ था. ग़रीबी के बीच ढसाल का बचपन मुंबई के गोलपिठा में बीता. युवा होते होते नामदेव ढसाल आजीविका चलाने के लिए टैक्सी ड्राइवर बन गए थे हालांकि अपने और अपने समाज के दर्द को उकरेने के लिए साहित्य और राजनीति उनका स्थायी मुकाम बन गया.
वरिष्ठ हिन्दी लेखक उदय प्रकाश ने नामदेव ढसाल के योगदान को याद करते हुए बताया कि ढसाल सही मायने में विद्रोही कवि थे. उन्हें आप प्रगतिशील नहीं कह सकते. उनकी कविताओं में बहुत ही तीव्र और बहुत तीखी प्रतिक्रिया थी. सड़कों और गटरों में पैदा होने वाली भाषा को उन्होंने कविता में आयात किया और कविता की परंपरा को बदल दिया.
ढसाल का पहला काव्य संग्रह 'गोलपिठा' मराठी साहित्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशियाई साहित्य में अहम जगह बनाने में कामयाब रहा.
इसके बाद उनके कई काव्य संग्रह 'मुर्ख महात्राणे', 'तुझी इयाता कांची', 'खेल' और 'प्रियदर्शिनी' चर्चित रहे. उन्होंने दो उपन्यास भी लिखे. 'आंधले शतक' और 'आंबेडकरी चालवाल' नाम से लिखे राजनीतिक पत्र भी चर्चित हुए. ढसाल बीते कुछ दिनों तक मराठी दैनिक 'सामना' में स्तंभ लिखते रहे. इससे पहले 'साप्ताहिक सत्यता' का संपादन भी उन्होंने किया.
नामदेव ढसाल को पद्मश्री, सोवियत लैंड पुरस्कार, महाराष्ट्र राज्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका था. साहित्य अकादमी ने उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया था. जीवन के आखिरी सालों में लगातार बीमारी के वजह से उनकी सक्रियता कम हुई थी. इसी पड़ाव पर वे राजनीतिक तौर पर शिवसेना से जुड़ गए, जिसके चलते उनकी आलोचना भी हुई.
उनके जीवन में पहला अहम पड़ाव साल 1972 में तब आया जब अपने मित्रों के साथ उन्होंने दलित पैंथर आंदोलन की शुरुआत की. ढसाल इस आंदोलन का मुख्य चेहरा बनकर उभरे. इस संगठन ने दलित उत्पीड़न का जवाब बेहद रैडिकल तरीके से दिया और 1972-75 तक इसका प्रभाव देश भर में देखने को मिला. दलित पैंथर्स आंदोलन मुंबई के अभिजात्य तबके के ख़िलाफ़ कविता के क्षेत्र में बड़ा हस्तक्षेप था.- एजेंसी