शनिवार, 4 अप्रैल 2015

प्रकृति और जीवन के प्राणतत्व हनुमान

आम जन में एक व्यक्ति और एक भक्त के तौर पर देखे जाने वाले हनुमान को पराक्रम, उत्साह, मति, शील, माधुर्य और नीति के साथ साथ गाम्भीर्य चातुर्य और धैर्य के प्रतिमान स्थापित करते देखा गया है परंतु इसकी वैज्ञानिकता की ओर ध्यान न देने के कारण हनुमान की सार्थकता सिर्फ पुराणों और भक्ति साहित्य तक सिमट कर रह गई है।
हनुमान को पुराणों से लेकर आज तक अमर माना गया है। अनेक उपमाओं के साथ कहा गया कि इस विशाल ब्रह्मांड में हनुमान जैसा कोई नहीं है। इन्हीं उपमाओं में हनुमान के लिए 'वायुपुत्र' का भी प्रयोग होता है। वायुपुत्र कहे जाने के पीछे की दार्शनिक प्रतीकात्मक भूमिका जानना आवश्यक है। वायु, गति, पराक्रम, विद्या, भक्ति और प्राण शब्द का पर्याय है। वायु के बिना या वायु की वृद्धि से प्राणियों का जीवन संभव नहीं है। यहां तक कि योग की आधार भूमिका के रूप में किसी भी साधक और योगी के लिए तो प्राण वायु का नियमन  है। चूं कि पवन सभी का प्राणदाता जनक है और इसी प्राणतत्व के कारण हनुमान पवनपुत्र कहलाते जाते हैं तो प्राणवायु से जीवन का आधार जुड़ा है । सृष्टि में जब तक वायु है , पवन है तब तक प्राण हैं और जब तक प्राण हैं हनुमान भी हैं । हनुमान के अमरत्व का सीधा सीधा संबंध प्राणवायु से है अर्थात् हर प्राणी जो सांस ले रहा है व‍ह हनुमान को अपनी हर सांस में जी रहा है ।  
इसीलिए पौराणिक ग्रंथ हों या भक्ति साहित्य अथवा लोकाचार में उनकी अमरतापूर्ण उपस्थ‍िति की बात हो,  हनुमान को अनगढ़ श‍िव का रूप भी इसीलिए बताया गया है क्योंकि वह प्राण और उसकी शक्ति से जुड़े हैं।
पौराण‍िक क्रम में तेरहवां स्थान रखने वाले ' स्कंद पुराण' के महेश्वर खंड में स्वयं शिव ने हनुमान के रुद्र रूप का वर्णन किया है -

योवै चैकादशो रुद्रो हनुमान स महाकपि: ।
अवतीर्ण : सहायार्थ विष्णोरमित तेजस:।।

ऋग्वेद के भी 10.64.8 मंत्र की व्याख्या में नीलकंठ शि‍व ने हनुमान को रुद्रों में ग्यारहवाँ रुद्र बताया है जो सभी रुद्रों में अंतिम है। शिव पुराण की रुद्र संहिता में हनुमान के परब्रह्म स्वरूप की संपूर्णता और रुद्र से हनुमान की एकाकारता का वर्णन मिलता है। 'स्कंद पुराण' के अनुसार हनुमान से बढ़कर जगत में कोई नहीं है। एक और उद्धरण मिलता है कि याज्ञवल्क्य ने ऋषि भारद्वाज को बोध प्रदान करते हुए कहा है कि- "परमात्मा नारायण ही श्री हनुमान हैं।"
'वायु पुराण' के पूर्वार्द्ध में भगवान महादेव के हनुमान रूप में अवतार लेने का उल्लेख है।

साहित्यिक दृष्टि से हनुमान को  गोस्वामी तुलसीदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'हनुमान बाहुक' में तथा  'विनय पत्रिका' के अनेक पदों में शंकर रूप मानकर 'देवमणि' रुद्रावतार महादेव, वामदेव, कालाग्रि आदि नामों से संबोधित तो किया परंतु भक्ति रस में डूबे होने के कारण हनुमान के परब्रह्म होने का सत्य मात्र एक बलशाली वानर , रामभक्त व अमर देव होने तक ही सिमट गया।
यह सत्य है कि पवनपुत्र हनुमान की हमारी प्रत्येक श्वास में उपस्थ‍िति है जिसको परब्रह्म के अतिरिक्त और किस रूप में  देखा जा सकता है भला। प्राण-तत्व की उपस्थ‍िति के बिना  क्या हम जीवन की कल्पना कर सकते हैं । यह तो प्रकृति के किसी भी रूप व काल में  जीवन के लिए अनिवार्य रही है।
हनुमान जयंती पर एक बार फिर आज जब धार्मिक प्रतीकों देवी देवताओं के अस्तित्व को धार्मिक दृष्टिकोण के साथ साथ आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखा परखा जा रहा है, नये नये शोध हो रहे हैं , तब ऐसे में हनुमान की शक्तियों , वे परब्रह्म क्यों कहलाये हैं और उनके आचरण को हम आज अपने जीवन में किस तरह नियम व संयम से उतार सकते हैं , यह जानने की आवश्यकता है । 

- अलकनंदा सिंह

रविवार, 29 मार्च 2015

जश्न-ए-बहार मुशायरे में इस बार चीन और पाकिस्तान के शायर भी आयेंगे

नई दिल्‍ली। ‘जश्न-ए-बहार’ मुशायरे में इस बार पाकिस्तान और चीन समेत दुनियाभर के नामचीन उर्दू शायर शमा रौशन करेंगे.
तीन अप्रैल को आयोजित होने जा रहा यह मुशायरा देश का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक जश्न होता है और इस बार 17वें मुशायरे में जावेद अख्तर और वसीम बरेलवी जैसी हस्तियां शिरकत करेंगी.
इनमें बीजिंग से झांग शिचुआन, न्यूयार्क से अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह, टोरंटो से अशफाक हुसैन जैदी और जेद्दाह से उमर सलीम अल एदरूस प्रमुख हैं.
उर्दू शायरी के चाहने वालों को इस सालाना जश्न का बेसब्री से इंतजार रहता है जिसमें पाकिस्तान के शायरों को खासतौर से पसंद किया जाता है. इस बार इस्लामाबाद से किर नाहीद, लाहौर से अमजद इस्लाम अमजद और कराची से आम्बरीन हासिब मुशायरे की रौनक बढ़ाने के लिए आ रहे हैं.
मुशायरे का आयोजन दिल्ली पब्लिक स्कूल मथुरा रोड में किया जाएगा. अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय के वाइस चांसलर जमीनउद्दीन शाह मुशायरे के खास मेहमान होंगे और वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर इसकी अध्यक्षता करेंगे.
भारतीय शायरों में कोलकाता से मुनव्वर राना, मुरादाबाद से मंसूर उस्मानी और मेरठ से पोपुलर मेरठी भी अपनी शायरी पेश करेंगे.
जश्न-ए-बहार ट्रस्ट की संस्थापक और उर्दू कार्यकर्ता कामना प्रसाद कहती हैं कि भारत में मुशायरे को हमेशा से ही धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से देखा जाता रहा है जिसकी पहचान उर्दू और हिंदुस्तानी चरित्र को समेटे हुए है. हम इस संस्थान को जिंदा रखने तथा इसे और बेहतरीन बनाने की कोशिश में हैं.

शनिवार, 28 मार्च 2015

कन्या पूजन का प्रोफेशनलिज़्म

सामने के घर से कन्या पूजन के बाद बाहर आती बच्चियों की उम्र  बमुश्किल 5 से 8 वर्ष के बीच रही होगी। एक हाथ में  हलवा, पूरी और दूसरे हाथ में ऑब्लिगेशन गिफ्ट्स। कई घरों से बुलावे सुबह ही आ चुके थे। कुछ के अभी भी आ रहे थे। इतने बिजी कि घरों में पूजन करते हुए जो पूरियां खाने को दी जा रही थीं, उन्हें गेट से निकलते ही सही जगह पर फेंकने तक की फुरसत ना थी, वे यूं ही डस्टबिन के बाहर की ही ओर फेंकी जा रही थीं। तभी एक बच्ची जो उनमें सबसे छोटी थी, ने पूछा, ''अब कहां जाना है '' । कन्या ग्रुप की लीडर ने कहा, देखो अब नंबर तो सक्सेना आंटी के यहां जाने का है... मगर ... ! सब बच्चियां उसका मुंह देख रही थीं ।
वे सब बड़ी लड़की के ''मगर'' के बाद कुछ कहने का इंतज़ार कर रही थीं। लड़की आगे बोली, ''देखो ऐसा करते हैं कि सक्सेना आंटी के यहां चलते हैं मगर वहां खाना नहीं खायेंगे, उनसे कह देंगे कि पैक कर दो।'' छोटी बच्ची ने फिर पूछा, क्यों... खाना क्यों नहीं खायेंगे, उन्होंने तो मेरे मन पसंद की सब्जी और बूंदी का रायता भी बनाया है, मुझे तो वही खाना है ... ।
बड़ी लड़की ने कहा, मैंने खाने से थोड़े ही मना किया है पागल, खाना हम उनसे पैक करा लेंगे, फिर तू घर जाकर खा लेना।'' वो आगे बोली, हम खाना तो अग्रवाल आंटी के यहां का खायेंगे, वो साथ में महंगे गिफ्ट भी देती हैं और उनके ए. सी. भी तो है ना... डाइनिंग रूम में। सक्सेना आंटी तो बस कुरकुरे का पैकेट, एक पेंसिल बॉक्स और थोड़ी सी एक्लेयर्स दे देतीं हैं बस, जैसे कि ये कोई खजाना पकड़ा रही हों। वो 3 सेक्टर वाला चिंटू बता रहा था कि अग्रवाल आंटी ने तो इस बार स्मार्टफोन्स मंगाए हैं, कन्याओं को देने के लिए ... अब तुम्हीं बताओ, मैं सही कह रही हूं ना। ''सबने एक सुर से अपनी लीडर की हां में हां मिलाई।
सक्सेना आंटी के घर के सामने पहुंचते ही उन्होंने अपने जोरदार अभ‍िनय से बता दिया, ''आंटी, अभी भूख नहीं है, आप तो खाना पैक कर दो, हम घर जाकर खा लेंगे।''
परंपरा और देवी भक्ति की मारी बेचारी सक्सेना आंटी मन मसोस कर रह गईं कि कन्याओं के वे सिर्फ पैर ही पूज पायेंगीं और अपने सामने भोजन खिलाने के पुण्य से वंचित रह जायेंगी। क्या करतीं, उन्होंने खाना पैक किया, गिफ्ट भी पैक किया और पैर पूज कर हर कन्या को विदा किया।
अगले पांच मिनट में वे कन्याएं अग्रवाल आंटी के घर ए. सी. डाइनिंग रूम में विराजमान थीं। देवी जो ठहरीं, स्मार्ट फोन्स के पैकेट देखकर अचानक उनके भरे हुए पेट खाली हो गये थे। सक्सेना आंटी के तुच्छ पैकेट वो बाहर ही छोड़ कर आई थीं।
मेरी सामने घटे इस पूरे वाकये ने ना जाने कितने ही प्रश्नों को जन्म दे दिया... मसलन जिन्हें हम कन्या समझते हैं ...क्या वास्तव में  वे उस परिभाषा को पूरा करती हैं... , या कि भरे पेट पर किसी को भोजन कराने से क्या सचमुच पुण्य मिल सकेगा... क्या भोजन के साथ गिफ्ट्स का चलन छोटे छोटे बच्चों में लालच को जन्म नहीं दे रहा ... यदि इसी लालच के चलते बच्चे अपने फायदे, कम फायदे या ज्यादा फायदे के बारे में नहीं सोचेंगे क्या...  क्या करें जो कुछ 'हासिल' हो सके जैसी सोच के कारण क्या वो कन्याएं हम ढूढ़ पायेंगे जो निष्कपट, निश्छल हों, जिनके लिए सब बराबर हों चाहे वो सक्सेना आंटी हों या अग्रवाल आंटी ...  आदि।
प्रश्न बहुत हैं मगर उत्तर हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम उसे किस दायरे में रखकर देखना चाहते हैं।
खैर, ये वो सच है जो हमें अपना अंतस खंगालने पर विवश करता है कि इस हाइटेक युग में हम अपनी परंपराओं के साथ कहां खड़े हैं। और कहीं हम उन्हें ढोने के चक्कर में पुण्य की जगह कुछ और तो नहीं कमा रहे।

- अलकनंदा सिंह  

रविवार, 15 मार्च 2015

ये भी तो असंसदीय ही है ना ...

कहते हैं कि शब्द ब्रह्म होता है और शब्द अच्छा है या बुरा, उसके उपयोग पर निर्भर करता है। आज तक देखा गया है कि सामाजिक व्यवहार में कोई भी शब्द अपनी उपयोगिता व अनुपयोगिता उसके प्रयोग पर निर्भर करती है  । ऐसे ही कुछ शब्द हैं जिन्हें अच्छा या बुरा कहा जाता है और उन्हें संभ्रांत व निकृष्ट की श्रेणी में रखा जाता है । इस पूरी जद्दोजहद में उन शब्दों का अपना क्या दोष जो बुरे, अछूत या असंसदीय कहे जाते हैं अथवा उन शब्दों का क्या योगदान माना जाए जो व्यक्त‍ि या परिस्थ‍िति को महान बनाती है ।

फिर शब्द असंसदीय कैसे हो सकता भला , उसे प्रयोग करने वाले व्यक्ति या उस मानसिकता को तो असंसदीय कहा जा सकता है जो देश , काल या समाज के लिए घातक हो परंतु शब्द किसी भी कोण से असंसदीय नहीं कहा जा सकता।

जब से पढ़ा है कि शिवसेना के सांसद हेमंत ' गोडसे ' ने लोकसभा और राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन को पत्र लिखकर कहा है कि उनकी जाति को असंसदीय शब्दों की सूची से हटाया जाए। लोकसभा सचिवालय ने सांसद के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा कि महात्‍मा गांधी के हत्यारे नाथूराम ' गोडसे ' के नाम से जुड़ी जाति गोडसे को लेकर कुछ गलती हुई है पर इस विषय में अंतिम निर्णय लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्ष ही लेंगे। संसद के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि किस 'गोडसे' को असंसदीय शब्द के तौर पर प्रतिबंधित किया गया है मगर इसका भुगतान पूरी जाति को असंसदीय कहलाने के रूप में भुगतना पड़ रहा है ।

रिकॉर्ड्स के अनुसार इस बारे में अप्रैल 1956 में लोकसभा के डिप्टी स्पीकर हुकुम सिंह ने इस बाबत जब आदेश दिए थे तो उस समय स्टेट रिऑर्गनाइजेशन बिल पर चर्चा हो रही थी। तभी दो सांसदों ने नाथूराम गोडसे के नाम को उछाला था। इसके बाद हुकुम सिंह ने ऐसे आदेश दिए थे। इसके बाद वर्ष 2014 में संसद के शीत सत्र के दौरान सीपीएम सांसद पी राजीव ने हिंदू महासभा की तरफ से देश भर में नाथूराम गोडसे के बुत लगाने के खिलाफ आवाज उठाई थी। तब पी जे कुरियन ने एक बार फिर से पूर्व में लिए गए निर्णय की तरफ लोगों का ध्यान खींचा था।

यह राजनीतिज्ञों की अजब सी मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह तो लगाती ही है। यूं भी गुनाह किसी एक ने किया और सजा पूरी की पूरी जाति को मिले , क्या ये न्याय कहा जाएगा। संसद के रिकॉर्ड के मुताबिक 'गोडसे' शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। यह एक असंसदीय शब्द है। हेमंत गोडसे ने पत्र ‌में लिखा है कि यह कैसे किया जा सकता है कि एक पूरी की पूरी जाति को ही असंसदीय शब्द की सूची में रख दिया जाए। यह मेरी गलती नहीं है कि मेरी जाति गोडसे है। इसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता हूं और न ही अपनी जाति को बदलने जा रहा हूं। सांसद हेमंत गोडसे ने कहा कि गोडसे शब्द को असंसदीय शब्द की श्रेणी में शामिल करना एक समुदाय विशेष और मेरे लिए बहुत ही पीड़ा की बात है। इस जाति के साथ महाराष्ट्र में बहुत से लोग रहते हैं।

निश्चति ही गोडसे लिखा जाना क्या पूरी की पूरी जाति को महात्मा गांधी का हत्यारा बना देना नहीं है ? 'गोडसे' को बैन या असंसदीय घोषि‍त किए जाने से आहत सांसद की बात हमें उस पीड़ा का अहसास कुछ कुछ इसी तरह कराती है कि जैसे किसी पिछड़े इलाके के लोगों ने किसी एक जाति को समाज से निकाल बाहर किया हो वह भी किसी एक व्यक्ति की गलती के कारण।

ये शब्दों पर हमारी तानाशाही ही है कि जिस जाति में आप पैदा हुए उस को सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित कर दिया जाए कि वह किसी एक शख्स से किसी खास वजह से जुड़ी हुई रही है ....  तो क्या हम पीढि़यों को भी उसी गुनाह का भागीदार बना रहे हैं , यह तो ज्यादती हुई ना ?  असंसदीय क्या है ... वह सोच जो पूरी जाति को देश की मुख्यधारा से अलग कर दे या वह शब्द 'गोडसे' ।

- अलकनंदा सिंह

रविवार, 8 मार्च 2015

महिला दिवस: इंडियाज डॉटर और ग्रे शेड्स से आगे भी हैं जहां...

आज महिला दिवस है, 8 मार्च... यानि लफ़्जों के हुनरमंदों की एक और शालीन दिखने वाली आजमाइश होगी....जिस पर समाज के हर तबके से लंबे चौड़े व्याख्यानों की झड़ी भी लगेगी।
पूरे दिन मीडिया में सभी स्तर से तर्कों-वितर्क करके औरत पर रहमोकरम का अंबार खड़ा किया जायेगा। साहित्यिक भद्रजन (स्त्री व पुरुष दोनों) स्त्री-विमर्श का पोथी-पत्रा खोलकर '' बेचारी स्त्री'' के लिए, उसके उत्थान के लिए कसीदों का पुलिंदा मुंह पर मारने को तत्पर दिखाई देंगे। ये सारी कवायद सिर्फ इसलिए होगी ताकि इस घोर कलियुगी संसार में एक निरीह प्राणी स्त्री ही तो है जो बड़ी शिद्दत से इस दिन का इंतज़ार करती है कि आओ... और मेरे होने पर एक दिन का रहम खाओ। फिर .... ? ओह.... !

सब अपने- अपने हिस्से का रहम आज उड़ेल देंगे और ये सब राष्ट्रीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हो रहा है। जिस तरह कि इसी एक दिन को कैश करने की मुसलसल कोशि‍श की है बीबीसी 4 के लिए बनाई डॉक्यूमेंटरी ''इंडियाज डॉटर'' के माध्यम से। ब्रिटिश फिल्म मेकर लेज्ली उडविन चर्चा में हैं अपनी इस फिल्म को लेकर। जिसमें एक सच बड़े ही वीभत्स ढंग से सामने आया है। बलात्कारी की सोच क्या हो सकती है, उसे बयान करने के बहाने बहसों का लंबा चौड़ा काफिला तैयार हो चुका है। संभवत: लेज्ली को बलात्कारी के दुष्कृत्य से, उसकी हैवानियत से, निर्भया के हश्र से, उसके माता पिता का फटता हृदय देखने भर से शायद संतुष्ट‍ि नहीं मिली थी और इसलिए उन्होंने उसकी मानसिकता को शब्दों में पिरोकर पूरा प्रचार करवाया।

इसी तरह महिला दिवस के बहाने खास चर्चा में हैं ब्रिटि‍श लेखिका ईएल जेम्स की किताब  ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’।  ये किताब दुनियाभर में अपनी ख्याति बटोरने के बाद अब भारत में उन लोगों के बीच पैठ बनाने की कोश‍िश कर रही है जो स्त्री की स्वतंत्रता को उसकी यौन-उन्मुक्तता के चश्मे से देखते हैं।
ईएल जेम्स की किताब एक कारोबारी और एक कॉलेज स्टुडेंट के ‘अजीबो-गरीब’ कामुक रिश्ते पर आधारित है जो 2012 में आते ही लोकप्रिय हो गई थी।
आश्चर्य होता है यह जानकर कि शुचिता की बात करने वाले भारतीय समाज में  तीन भागों वाले इस उपन्यास की अब तक तीन लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं।
सचमुच प्रगति के नए आख्यान बन चुके हैं और समय काफी आगे बढ़ चुका है, तभी तो अमेरिका और ब्र‍िटेन की तरह इस उपन्यास पर बनी फिल्म अब हमारे देश में सेंसर बोर्ड की अनुमति का इंतज़ार कर रही है....हद है...।
हद ये भी है...कि इस बीच महिला दिवस पर बाजार अपनी ही  टेक्नोलॉजी से काम कर रहा है। अब देखि‍ए ना कि... बाजार ने चाहा तभी तो उसने 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' को टोटल ब्राइट बनाकर बेच डाला और बाजार ने चाहा तभी उसने निर्भया की डॉक्यूमेंटरी को विवादित बनाकर अपनी टीआरपी बढ़वा ली।  इससे फायदा तो सिर्फ बाजार नियामकों को ही हुआ, उनमें किताब के प्रकाशक हैं,  सेक्स ट्वॉयज बेचने वाली वेबसाइट्स हैं, बीबीसी और उनकी डॉक्यूमेंटरी पर पैनल्स बैठाकर बहस करने वाले टीआरपी-क्रेजी भारतीय चैनल भी हैं।
गौरतलब है कि 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' में उस सैडिस्ट जीवनशैली का उल्लेख है जिसमें लोग सेक्स के दौरान एक-दूसरे को दर्द देते हैं, क्योंकि दर्द के लेन-देन और ताकत की अभिव्यक्ति उनकी कामुकता को एक नए मुकाम तक ले जाती है। इस जीवन शैली को बीडीएसएम के नाम से भी जाना जाता है।
इस जीवनशैली में एक शख्स ‘डॉमिनेन्ट’ यानी प्रधान है और दूसरा ‘सबमिसिव’ यानी अधीन है। पहले का हक है अपना जोर आजमाना और दूसरे की जिम्मेदारी है उस शक्ति के प्रदर्शन को बर्दाश्त करना।
क्या यह किसी भी दुष्कर्म से अलग है... क्या इस किताब की बिक्री हमें सावधान नहीं करती कि समाज में डॉमिनेंट और सबमिसिव को बराबरी पर लाने की बातें सिर्फ मंचीय ड्रामे हैं... उनमें आज बेडरूम के अंदर थ्र‍िल पैदा करने के लिए किताब का सहारा लिया जा रहा है... तो क्या गारंटी है कि कल यही किताब पढ़ने वाले अपने थ्र‍िल के लिए उसे सड़कों पर या नन्हीं बच्चि‍यों  पर नहीं आजमाऐंगे, फिर इसमें चाहे डॉमिनेंट औरत हो या मर्द, इससे क्या फ़र्क पड़ता है ? 
निश्चति ही ये ग्रे शेड्स का भुगतान हमारे देश में औरतों-लड़कियों-बच्चि‍यों को ही ज्यादा करना होगा क्योंकि थ्र‍िल के लिए दर्द देना तो बलात्कार ही हुआ ना, फिर ग्रे शेड्स की नायिका में और निर्भया या अन्य वीभत्स बलात्कारियों में फ़र्क ही कहां है?
डॉमिनेंट और सबमिसिव की थ्योरी उसी देश से आ सकती है जो भरे पेट पर जुगाली करते- करते सोचते हैं कि पेट तो भर गया... अब इसे पचाने के लिए और क्या खाया जाए... मगर यही पचाने के लिए कुछ थ्रिल खोजने वाली थ्योरी,  उस देश में सिर्फ और  सिर्फ बलात्कार ही परोस सकती है जहां तन भर कपड़ा- मन भर चैन के लिए सारी जिंदगी खटते-खटते निकल जाती है । हमारे देश में  'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' की बेतहाशा बिक्री हो या इंडियाज डॉटर  पर बहस,  एक ऐसे बदबूदार कचरे को जन्म दे रही है जो समस्या की जड़ों तक नहीं पहुंचने देगा।
आज जब औरत शरीर से लेकर मन तक की स्वतंत्रता को पाने के लिए  घर से लेकर बाहर तक नित नए युद्ध लड़ रही है तब, 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे'  और 'इंडियाज डॉटर'  से आगे जाकर हमें सोचना होगा क्योंक‍ि यही सोच बलात्कारि‍यों की सोच को जानने जैसे वाहियाती सवालों और कामुकता को डॉमिनेंट व सबमिसिव के बीच लटका कर पूरी की पूरी स्त्री अस्मिता पर ही प्रश्नच‍िन्ह ही नहीं लगाती बल्कि उन जाहिलाना करतूतों को भी ग्लैमराइज करती है जो  हमेशा स्त्री-देह पर अटकी रहती हैं।
 
ये स्त्री को लेकर उथली-छिछली समीक्षाएं बंद होनी चाहिए। ना तो स्त्री सिर्फ बाजार का मोहरा है और ना ही रसोई-बेडरूम में चस्पा की गई कोई तस्वीर जिसे जब चाहो तब अपने मन के रंग भर दो ...जब चाहो तब बेरंग कर दो ... पश्चिम ही नहीं तथाकथित  आधुनिक भारतीयों को भी ये सच जान लेना चाहिए ... 
ज़ाहिर है कि पश्चिम अब भी स्त्री को एक शरीर के दायरे से बाहर देख ही नहीं पा रहा जबकि भारतीय संदर्भ में इसकी व्याख्या काफी आगे बढ़ चुकी है। देखते हैं अभी इस यात्रा को लक्ष्य तक पहुंचने में अभी और कितने पड़ावों से जूझना होगा।
गौर से देखि‍ए तो पानी, हवा तथा चींटी का भाग्य और जज़्बा एक सा होता है ....वह अपना रास्ता खुद ही खोजती है, बनाती है .. उसे अपने शेड्स दिखाने के लिए अपने ही समाज, अपनी  ही संस्कृति में से रास्ते निकालने पड़ते हैं और वही वह कर भी रही है वरना आज इतनी कंपनियों के उच्चासन पर वो पहुंची ही ना होती । हां, कुछ कहावतें हैं जो बदलनी चाहिए ताकि औरत अपने लिए भी जी सके ...जैसे कि किसी पुरुष की कामयाबी के पीछे स्त्री का हाथ होता है,  तो ये कहावत उल्टी क्यों नहीं हो सकती ... अब समय है कि ये कहावत उल्टी बहनी चाहिए ... ।


- अलकनंदा सिंह 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

नीरज-शहरयार पुरस्कार हेतु आवेदन आमंत्रित

Gopal_Das_Neeraj-and-shaharyar-aligarh
अलीगढ़। अपर जिलाधिकारी नगर एवं प्रभारी अधिकारी प्रदर्शनी अलीगढ़ ने अवगत कराया है कि राजकीय औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी द्वारा अच्छे और स्तरीय काव्य लेखकों को प्रोत्साहित करने हेतु हिन्दी-उर्दू सेवा के काव्य विधाओं पर पुरुस्कार दिये जायेंगे। पुरस्कार हिन्दी कवि एवं उर्दू काव्य लेखक को दिया जायेगा।
गौरतलब है कि रख्यात शायर व ज्ञानपीठ विजेता प्रो. कुंवर अखलाक मुहम्मद खान उर्फ शहरयार ने कई फिल्मों के लिए गाने लिखे। ‘उमरावजान’ के गाने तो आज भी हर किसी की जुबान पर हैं। दर्जनों नामचीन पुरस्कार पा चुके शहरयार को वर्ष 2008 में साहित्य का सर्वोच्च ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। पुरस्कार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के हाथों नवाजा गया। वे उर्दू के चौथे शायर थे, जिन्हें ज्ञानपीठ से नवाजा गया। उन्होंने वर्ष 1978 में गमन, वर्ष 1981 उमरावजान और वर्ष 1986 अंजुमन के लिए गाने लिखे।इसी तरह गोपालदास नीरज ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह पुरुस्कार 1,01000(एक लाख एक हजार) रूपये का होगा जिसमें 18 वर्ष से 50वर्ष तक के कवि भाग लें सकेंगे। जो कवि इस प्रतियोगिता में भाग लेना चाहता है वह अपनी रचनाओं की 07 प्रतियों का सैट बनाकर,एवं जीवन-वृत्त के साथ जन्मतिथि प्रमाण पत्र भी  03 मार्च तक 2015 तक अपर जिलाधिकारी अलीगढ़ के कार्यालय में भेज सकता है । उन्होंने आगे बताया कि कवि आवेदन के रूप में अपनी कृति का नाम, अपना नाम, उम्र, जन्म स्थान, मोबाइल नं0 उत्तर प्रदेश में रहने का 10 साल का प्रमाण पत्र, काव्य की विधा/विषय, प्रकाशन का वर्ष, प्रकाशक का नाम और पता के साथ प्रमाणित करते हुए कि मेरे द्वारा रचित काव्य नाम कृति स्वेप्ररणा से स्वरचित है ।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

पुस्तक मेला : आवाज़ों के बाजारों में खामोशी पहचाने कौन....

कुछ इसी अंदाज़ में विश्व पुस्तक मेला अपनी आखि‍री रस्म को निभाता अगली साल के लिए अपना साजोसामान जुटा ले गया और साथ ही यह भी बता गया कि अब साहित्य को पाठक से ज्यादा बाजार की आवश्यकता है जो समय समय पर अपने कलेवरों के नये रुख से बाजार को अवगत कराता रहे और बुद्धि से ज्यादा वो खनकते सिक्कों में नज़र आए।
बाजार की इन आवश्यकताओं की फेसबुक पर साहित्यकारों द्वारा पोस्ट की जाने वाली ' पुस्तक विमोचन की तस्वीरों'  की भरमार ये चुगली कर गई कि तमाम सफलताओं के दावों के बाद भी पुस्तक मेले में आम साहित्य प्रेमियों की अपेक्षा प्रोफेशनल साहित्यकारों की भीड़ ज्यादा रही।

साहित्‍य भी बाजार की भाषा गढ़ने लगा है ,  बोलने लगा है । ऐसे में कालजयी कृतियां भला कैसे जन्‍म ले सकती हैं। प्रेमचंद की गंवई कहानियां आज भी प्रासंगिक हैं, दिलों पर राज करती हैं, निपट निरक्षर कबीरदास,सूरदास, रहीम रसखान पर शोधकार्य चल रहे हैं कि उनकी सोच ऐसी उनका विचार वैसा टाइप...आदि आदि।
कभी सोचें तो मिलेगा कि चाहे आधुनिक काल के प्रेमचंद हों या भक्‍तिकाल के वो कवि सभी बाजार के शस्‍त्र और बाजार के नियमों से अनभिज्ञ ही थे।उन्‍हें चिंता नहीं थी कि किसी संपादक या किसी प्रकाशक या किसी पीआर को इंप्रेस करना है तभी जाकर वो फेमस हो पायेगा , ऐसा ना करने की सूरत में उसे कोई देखना भी गवारा नहीं करेगा।
बाजार दिलों की भाषा नहीं जानता, अलबत्‍ता जरूरतें जानता है और इन्‍हीं जरूरतों का सौदा करने में आनंद महसूस करता है। बाजार ऐसी शै है कि जिसके कदम जहां भी पड़े, ज़हनी रूमानियत गायब होती गई। मानवीय दृष्‍टिकोण से सोचने का तरीका ही बदलता गया। क्‍वालिटी पर क्वांटिटी पर भारी पड़ती गई मगर उसका खुद का वजन भी तो हवा होता गया ,सोचने के दृष्ट‍िकोण हल्‍के  होते गये। पुस्तक मेलों का नजारा बताने को काफी है कि आज भी क्‍वालिटी पर क्‍वांटिटी भारी पड़ रही है। क्‍वांटिटी का  अपना गणित होता है कि कैसे भी छा जाओ, हावी हो जाओ। बाजार किसी भी वस्‍तु की आत्‍मा को मानवीय जैसे शब्‍दों पर नचाता जरूर है मगर वह रूह तक बस जाने की क्षमता नहीं रखता ..... तभी तो कालजयी कृतियों से हम दूर से दूर हो गए  हैं । बाकी जो कसर बाकी थी वो हिंग्लिश ने पूरी कर ही दी है। बहरहाल पुस्तक मेले से है लौटकर आने वालों को मालूम है जन्न्त की हकीकत लेकिन ....

साहित्य में प्रोफेशनलिज्म का ये नया आयाम दिखा। इसी प्रोफेशनलिज्म को दिखाया उन साहित्यकारों ने जो जीवन भर साहित्य की एबीसी तलाशते रहे और उम्र के अपने आखिरी दौर में एक किताब लिखकर  किसी न किसी बड़े नामचीन साहित्यकार को कैप्चर कर उससे अपनी पुस्तक का विमोचन करा मारा। कई अवसरों पर तो पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान भीड़ के रूप में साहित्यप्रेमी नहीं, बल्कि लेखक के आत्मीय व्यक्ति अधि‍क देखे गये ।ये बात कड़वी है मगर खरी खरी है।
अधिकांशत: देखा गया है कि पुस्तक मेलों में  दर्जनों पुस्तकों का लोकार्पण नामी-गिरामी साहित्यकार करते हैं। कई बार तो ये विमोचन करने वाले साहित्यकार, विमोचित हो रही पुस्तक के बारे में पढ़ना तो दूर की बात, अपना लिखा भी कभी दूसरी बार नहीं पढ़ पाते लेकिन लेखक मंच पर शान से पुस्तकों को हाथ में लेकर फोटो खिंचवाने की प्रक्रिया बदस्तूर जारी रहती है।
बेहद उबाऊ रहता है ... एक पुस्तक के बाद दूसरी पुस्तक का विमोचन और उस पर लंबी-लंबी निरर्थक चर्चाएं। जिनका वाकई कोई मतलब नहीं निकलता। ये चर्चाएं न तो आम साहित्यप्रेमियों तक पहुंचती हैं, और न ही उन्हें याद रहती हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले ही उस किताब के बारे में ‘बहुत अच्छी-अच्छी’ बातें की होती हैं।
पता तो ये भी चला है कि पुस्तक विमोचन के इस कार्यक्रम को करने कराने में न तो बड़े प्रकाशक पीछे हैं और न ही छोटे प्रकाशक। पुस्तकों पर परिचर्चा आयोजित तो होती है, लेकिन महज मंचीय हसी-मजाक से आगे कोई बात बढ़ ही नहीं पाती। परिणति होती है चाय-पान से। और फिर परिचितों के हाथ में पुस्तकें थमाकर विदा कर दिया जाता है। इन लोकार्पण कार्यक्रमों बाढ़ से सोशल मीडिया साहित्यकारों व विमोचकों की  तस्वीरों के लगाने का जो सिलसिला 15 फरवरी से शुरू हुआ है लेकिन चलेगा महीनों । तैयार रहिए्गा .... यानि कुछ कुछ खट्टी...  कुछ कुछ मीठी ।
  यहां विमर्श और साहित्य से जो दूर चला गया उसी पुस्तक मेले के बारे में तो बस इतना ही कह सकती हूं  कि  ....

ये वही आलमे दौर है , ये वही निशां हैं लफ़्जों के
जहां गुफ्तगू होती नहीं बस शोशेबाजी चस्पा है ....

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

सैफई का समाजवाद : अंडर द कार्पेट

देश की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ऐसे कई नेता हुए जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख बदल दिया जिनमें से एक थे राममनोहर लोहिया। राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डॉ. लोहिया ऐसी समाजवादी व्यवस्था चाहते थे जिसमें सभी की बराबर हिस्सेदारी रहे।
लोहिया कहते थे कि सार्वजनिक धन समेत किसी भी प्रकार की संपत्ति प्रत्येक नागरिक के लिए होनी चाहिए। वे  रिक्शे की सवारी नहीं करते थे, कहते थे एक आदमी एक आदमी को खींचे यह अमानवीय है।
कल से सोचने पर विवश कर रही हैं ये खबरें कि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव सैफई में उनके पोते और सांसद तेज प्रताप सिंह के तिलक के लिए व्यापक इंतज़ाम किए गए हैं ।
जब से देखा कि सैफई की शाही शादी में समाजवाद की धज्ज‍ियां उड़ाई जा रही हैं तब रहा नहीं गया लोहिया के इन कथित फॉलोअर्स के '' समाजवाद''  की आखि‍र ये कौन सी परिभाषा है।  जो कल तक प्रधानमंत्री  के सूट की कीमत पर भर भर आंसू बहा रहे थे , वे ही आज निजी समारोह पर पानी की तरह सरकारी और निजी कोष लुटा रहे हैं ।
ये राजनीति का कौन सा रूप है ? निश्च‍ित ही समाजवाद की इस परिभाषा को फिर से परिभाषित करने की जरूरत आ गई है कि जिस विरासत पर ये नेता अपना साम्राज्य स्थापित करते गये और कुनबे दर कुनबे ने पूरे के पूरे प्रदेश में अराजक राज के सारे पैमानों को तोड़ दिया,  आखिर ये समाजवाद का कौन सा रूप है ।
आज के इन समाजवादियों का शाही अंदाज़ राम मनोहर लोहिया के आख‍िर कौन से मूल्यों को महिमा मंडित किया जा रहा है ।
जी हां, मुलायम सिंह के बड़े भाई के पोते तेज प्रताप की शादी आरजेडी प्रमुख लालू यादव की सबसे छोटी लड़की राजलक्ष्मी से हो रही है जिसमें ....

अतिविशिष्ट लोगों के लिए  400 अत्याधुनिक टेंट लगाए गए हैं जो स्वि‍ट्जरलैंड से आयात किये गये हैं।
बिहार के मेहमानों के लिए ख़ासतौर पर स्विस कॉटेज वाला एक हिस्सा अलग कर दिया गया है।
1,500 लोगों के लिए सामान्य कॉटेज तैयार किए गए हैं।
1.25 लाख लोगों के लिए भोजन तैयार किया गया है और पानी के 100 टैंकर लगे हुए हैं।
इस मौके पर क़रीब 100 किस्म के व्यंजन पेश किए जा रहे हैं।
अतिविशिष्ट लोगों के लिए दिल्ली और मुंबई के पांच सितारा होटलों के खानसामा खाना तैयार कर रहे हैं।
इस तिलक समारोह के सुरक्षा इंतज़ाम में 3,000 पुलिस बल लगे हुए हैं जिनमें 12 आईपीएस रैंक के अधिकारी भी शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश के 30 ज़िलों के पुलिसकर्मियों को सैफ़ई बुलाया गया है।
यहां पांच सुपर एंबुलेंस और 500 सरकारी वाहन भी सेवा देने के लिए उपलब्ध हैं।
इटावा ज़िले के कई होटलों ने भी इस समारोह की वजह से बाहरी बुकिंग बंद कर दी है।

ये तो वो जानकारी है जो मीडिया के ज़रिए बाहर आ पाई है , बहुत कुछ ऐसा भी होगा जो '' अंडर द कारपेट''  होगा ।
जो भी हो राजनेताओं के मुंह लगा राजकाज का ये खून समाजवाद की नई परिभाषा गढ़ने लगा है ।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

ये तो होना ही था ... शाह जी !

1946 में लिखी बाबा नागार्जुन की ये कविता ईश्वर के प्रति आस्था की मांग के बजाय अनास्था मांगती है जो वैचारिक साहस था उनका। उस समय इस कविता को दो तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा, एक तो आश्चर्य का भाव देतीं और दूसरी निंदा का। आपातकाल के पश्चात् प्रकाशित हुए अपने कविता संग्रह 'हजार हजार बाहों वाली' में कल्पनाजनित ईश्वर से कुछ यूं बतियाते हैं बाबा ...



कल्पना के पुत्र हे भगवान।
चाहिए मुझको नहीं वरदान।।
दे सको तो दो मुझे अभिशाप।
प्रिय मुझे है जलन प्रिय संताप।।
चाहिए मुझको नहीं यह शान्ति।
चाहिए संदेह उलझन भ्रांति...।।


ईश्वर से अपने लिए अभि‍शाप, जलन, संताप, संदेह, उलझन भ्रांति मांगती यह कविता उस आमजन की कविता है जो आज के संदर्भ में एकदम फिट बैठती है कि जब इतना सब नकारने के साधन होंगे तो व्यक्त‍ि ना आलस्य करेगा और ना ही अहंकार की भावना उसमें आएगी। समस्याओं को नज़रंदाज कर देने से वे टलती नहीं,  बल्क‍ि और विशालतम रूप में सामने आती हैं। जब ईश्वर वरदान की जगह इतने  सारे कारण दे देगा चिंताओं के, तो निगाहें चौकस रहेंगी ही।
बाबा की कविता भाजपा के हार के कारणों पर सटीक बैठती है । दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जबर्दस्त जीत भारत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक 'निर्णायक मोड़' और भारतीय जनता पार्टी जैसी बड़ी पार्टी के लिए भारी पराजय का सबब है। वो  अपनी पराजय के कारण तक नहीं ढूढ़ पा रहे।

दिल्ली की जनता ने लोकतंत्र की महानता को एक बार फिर साबित कर दिखाया। कुछ ऐसा ही  लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत से जिताकर जनता ने दिखाया था।
हालांकि आम आदमी पार्टी से लेकर ममता बनर्जी तक इस जीत का क्रेडिट ले रही हैं मगर ये इनकी विजय कम, उन मुद्दों की हार ज्यादा है जो जनता को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दिला पाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी प्रयासों को छोड़कर विदेश नीति पर अच्छे परिणाम आने का मतलब ये तो नहीं हो जाता कि पूरी सरकार अच्छा ही काम कर रही है।

दिल्ली के नगर निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार, जनता की बजाय बिजली कंपनियों के हित में लिए गये केंद्र सरकार के निर्णयों ने इस हार की नींव को और पक्का ही किया ।

दिल्ली में सुरक्षा की जिम्मेदारी तो केंद्र की ही थी, तो फिर आए दिन लड़कियों के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा।

डीजल, पेट्रोल के दाम उत्तरोत्तर कम होते गये मगर खाद्य वस्तुओं के दाम जस के तस हैं। प्रधानमंत्री का स्वच्छता मिशन उनके मंत्रियों और भाजपा के पार्टीजनों द्वारा ही सिर्फ ट्विटर तक समेट दि‍या गया।
नदियों के लिए कई कई मंत्रालय काम कर रहे हैं पर केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में ही यमुना का हाल किससे छुपा है। अकेला चना आख‍िर कब तलक भाड़ फोड़ेगा, कभी तो पार्टी को अपने बलबूते भी कुछ दिखाना होगा।
इसके अलावा भाजपा जिन युवाओं को अपना वोटबैंक बताती है ,उन्हीं के सामने लव जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जब आते हैं तो,  शाह जी ....! बच्चे अपना सच स्वयं खोजने लगते हैं कि आखिर कैसा विकास ... किसका विकास ... किस तरह होगा विकास ... ।

आए दिन मंचों पर से जो आपकी पार्टी के होनहार नेता संप्रदायवादिता के ज़हरीले वाण चलाते हैं, क्या उसे आज की ये हाइटेक पीढ़ी देखती नहीं होगी। हिंदू वादिता के लिए पूरे देश में कटुवचन बोलने वालों का दुस्साहसी होना,  क्या ये युवा देख नहीं रहे ।

निश्चित ही दिल्ली विधानसभा में पहले कांग्रेस और अब की बार भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो जाना, इन्हीं युवाओं और समस्याओं के मकड़जाल में घि‍रे मध्यम वर्ग के प्रति इग्नोरेंस ही तो है। वही मध्यम वर्ग जिसे सांझ होते ही डर सताने लगता है कि उसकी बेटी सुरक्षति घर पहुंच तो जाएगी या उसकी सारी कमाई घर के राशन, बिजली और पानी के बाद उसे ठेंगा दिखा देगी। अरविंद केजरीवाल ने जनता की यही दुखती नस तो पकड़ी थी। 
बहरहाल,  बतौर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह हार जरूरी भी थी जो नरेंद्र मोदी का ही चेहरा आगे करके सारी समस्याओं पर पर्दा डालने की रणनीति पर काम कर रहे थे। अभी तो बिहार,  फिर उत्तर प्रदेश जैसे मील के पत्थर बाकी हैं  जहां पार्टी आंखें मूंदकर अब भी मोदी के भरोसे राज्य जीतने के ख्वाब देख रही है। संगठन से लेकर जनसमस्याओं तक को इस तरह देखा जा रहा है कि मानो इनसे कोई वास्ता ही ना हो।

जो भी हो दिल्ली ने ''आप''  को बहुमत देकर और आप को (अमित शाह) को आइना दिखाकर  यह  बता दिया है क‍ि शाह जी ये लोक का तंत्र है और अब तो खालिस उन युवाओं का तंत्र है जो राजनीति से परहेज नहीं करते बल्क‍ि उसे सुधारने के लिए जज़्बे के साथ जुट जाने का माद्दा रखते हैं .... सो खबरदार रहें सभी परंपरावादी राजनेता और उनकी पार्टियां .... दिल्ली के परिणाम आइना हैं उनके लिए ....
और अंत में ....

राजनीति की इसी तस्वीर के लिए बाबा नागार्जुन की 'हजार हजार बाहों वाली' इसी कविता संग्रह से कुछ पंक्तियां और ...
'सुख-सुविधा और ऐश-आराम के साधन।
डाल देते हैं दरार प्रखर नास्तिकता की भीत में।।
बड़ा ही मादक होता है, 'यथास्थिति' का शहद।
बड़ी ही मीठी होती है 'गतानुगतिकता' की संजीवनी'....।।  


- अलकनंदा सिंह

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

सलमान रुश्दी ने ज्ञानपीठ पुस्कार विजेता भालचंद्र नेमाड़े को कहा 'ओल्‍ड बास्‍टर्ड'

भारतीय मूल के लेखक सलमान रुश्दी एक बार फिर विवादों में हैं। इस बार रुश्दी ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को गाली देने की वजह से वे सुर्खियों में हैं।
सलमान रुश्दी ने शनिवार को अपने एक ट्वीट में ज्ञानपीठ पुस्कार विजेता मराठी साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को गाली दी है। नेमाड़े ने सलमान रुश्दी के साहित्यिक रचना के महत्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि रुश्दी की किताबों में साहित्य जैसा कुछ भी नहीं है। दो दिन पहले ही मराठी के मशहूर साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को 50वां ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान हुआ है।
सलमान रुश्दी ने इसी के जवाब में ट्वीट किया और गाली दी। उन्होंने ट्वीट पर पोस्ट किया, 'तुनुकमिज़ाज b*****d बूढ़े। अपना पुरस्कार लो और अच्छे से धन्यवाद बोलते हुए आगे बढ़ो। मुझे संदेह है कि तुमने मेरे जिस काम की आलोचना कि है कभी उन्हें पढ़ा भी है।' सलमान ने नेमाड़े के विवादास्पद बयान का लिंक भी अपने ट्वीट पर डाला। नेमाड़े ने कहा था कि बुक प्राइज-विनर रुश्दी ने मिडनाइट चिल्ड्रेन के अलावा कोई भी अच्छा काम नहीं किया जिसका साहित्यिक रूप में मूल्यांकन किया जा सके।
सलमान के गाली वाले ट्वीट सोशल साइट पर 198 बार री-ट्वीट हो चुके हैं। 171 लोगों ने इसे फेवरिट किया गया। सलमान को रिप्लाई में कई लोगों ने गाली देने के कारण उनकी जमकर आलोचना भी की है।
ट्वीट पर तीखी प्रतिक्रिया
एक ट्वीट में @AgentSaffron ने कहा, ' क्या रुश्दी आपने कभी नेमड़े की कोई किताब पढ़ी है? '
@dreamershivam ने एक ट्वीट में कहा कि सलमान रुश्दी आपका यह ट्वीट पढ़ने के बाद मुझे लग रहा है कि वह (नेमड़े) सही कह रहे हैं।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

हिन्दुओं की आबादी बढ़ाने के नाम पर कभी अति उत्साह में तो कभी व्यक्तिगत कुंठा का शिकार होकर सीमाएं लांघने का जो काम कुछ अतिवादी संत और साध्वी कर रहे हैं, वह दरअसल देश की फिजा में ज़हर घोल रहे हैं ।
सच तो  यह है क‍ि ऐसी सोच उनकी अपनी- अपनी राजनैतिक, सामाजिक व शारीरिक कुठाओं  से उपजी है जिन्हें वे पिछले काफी समय से हिंदुओं पर थोपने का प्रयास कर रहे हैं। थोक में बच्चे पैदा करने की नसीहत वाला ये आंकड़ा दोनों ही धर्म के लोगों के लिए खासी परेशानी खड़ी कर सकता है ।
ये नसीहतें कुछ यूं परोसी जा रही हैं जैसे हिन्दू धर्मावलंबी इनके जड़ खरीद गुलाम हों और इन्हें  उनके निजी जीवन में भी दखल देने का अधि‍कार प्राप्त हो। आश्चर्य की बात तो यह है क‍ि बच्चे पैदा करने की संख्या ऐसे कथ‍ित संत व साध्वी बता रहे हैं जो घर-परिवार को त्यागने के बावजूद न तो गृहस्थाश्रम में दखल देने से बाज आते हैं और न पद व कुर्सी का लोभ छोड़ पाते हैं लिहाजा गेरुआ वस्त्रों के साथ राजनीत‍ि करते पाये जाते हैं।
कुंठाएं किस-किस रूप में आदमी के बाहर निकलती हैं, यह कोई इन साधु संतों के आचार-व्यवहार से जान सकता है। पहले धर्म की आड़ में और फिर हिन्दुत्व को एक करने के नाम पर जो ये सीन इनके द्वारा रचा जा रहा है, उससे किसी प्रकार हिंदुओं का हित होने वाला नहीं है। यदि शास्त्रों की भी बात करें तो सभी जगह योग्य संतान पैदा करने की मंशा पर जोर दिया गया है, न कि संख्याबल पर। राजनीति में आकर धर्म का पाठ पढ़ाने वाले इन पोंगापंथियों को  समझना होगा क‍ि जिस युवा पीढ़ी ने केंद्र में सरकार बनाने का रिकॉर्ड कायम कराया है और उन्हें भी संसद में बैठने योग्य बनाया है, वही युवा पीढ़ी इनको दर-बदर करने में देर नहीं लगायेगी।  
जिनकी शक्लो-सूरत में कहीं से भी संतत्व नज़र नहीं आता, वो सनातन धर्म का झंडा हाथ में लेकर उसकी धज्ज‍ियां उड़ा रहे हैं।
...साध्वी का तमगा लगाकर राजनीति करने वाली सांसद प्राची को ही देखि‍ए जो कुछ दिन पहले हर हिंदू महिला को चार बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाले विवादास्पद बयान की सफाई में  कहती हैं कि 'मैंने चार बच्‍चे पैदा करने के लिए कहा था, 40 पिल्‍ले नहीं।
गौरतलब है कि प्राची ने विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन में ये बात कही। प्राची ने किसी समुदाय विशेष का नाम लिए बिना कहा, 'ये लोग जो 35-40 पिल्ले पैदा करते हैं, फिर लव जेहाद फैलाते हैं। उस पर कोई बात नहीं करता है लेकिन मेरे बयान के बाद इतना बवाल मच गया।
लोगों ने मुझसे कहा कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से विकास रुक जाएगा पर मैं अपने बयान पर कायम रही।' प्राची ने मंच से ऐलान करते हुए कहा कि अगर किसी के पास 5 से 10 बच्चे हैं तो वो मेरे पास आएं,  मैं उन्हें सम्मानित करुंगी।
इतना ही नहीं शनिवार को बदायूं के हिंदू कार्यकर्ता सम्‍मेलन में साध्‍वी प्राची ने कहा, '1400 साल पहले सभी हिंदू थे तो आजम खान, परवेज मुशर्रफ, गिलानी और शाही इमाम बुखारी को घर वापसी करनी चाहिए। उनके लिए घर वापसी के दरवाजे खुले हुए हैं।'...

ये एक सतत प्रक्रिया हो गई है कि पहले ऐसे ऐसे बयान दे डालो कि फिर कहते फिरो कि बयान को पूरी तरह समझा नहीं गया। या जो हिन्दू नहीं है क्या उनके बच्चे...  बच्चे नहीं कहलाऐंगे....वे पिल्ले हो जाऐंगे...  हद होती है बदजुबानी की भी। बोलने से पहले इतना तो सोच लिया होता कि जिस धर्म का हवाला देकर वह दूसरे धर्म के बच्चों को पिल्ले बता रही हैं, वह धर्म तो हर बच्चे में भगवान का रूप देखने की सीख देता है। 
हिंदुत्व को बलशाली बनाने का ये कौन सा पैंतरा है जो सिवाय कटुता फैलाने के और कुछ नहीं कर सकता। हिंदू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि उसे एसे जाहिलों से मदद की दरकार हो ।
कौन नहीं जानता कि हिन्दू धर्म की अच्छाइयों को सामने लाने, उसकी कुरीतियों का उन्मूलन करने तथा गरीबों के लिए कुछ कल्याणकारी कार्य करने की बजाय ये कथि‍त संत व साध्वियां सिर्फ अपनी ओर ध्यान आकर्षण हेतु ऐसे विध्वंसकारी बयान देते हैं। रही बात ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को सम्मानित करने की तो सम्मान से किसी का पेट नहीं भरने वाला। आज भी रेलवे स्टेशनों सहित दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर फटेहाल घूमने वाले बच्चों की तादाद कम नहीं है। करना है तो पहले उनका इंजताम करके उस भारत का सम्मान विश्व में करवाएं जिसे हर राष्ट्रवादी मां का दर्जा देता आया है।   
कोरे गाल बजाने के लिए पाकिस्तान, कश्मीर, लव जिहाद और 40 पिल्ले की बात करने वाला मंच पर नहीं, किसी पागलखाने में होना चाहिए। चोला बदलने भर से कोई साध्वी या संत नहीं हो जाता, ये वो लोग हैं जो जिम्मेदारियों से भागकर गेरुए वस्त्रों में अपनी कुंठाओं को छुपा बैठे हैं और '' फायर ब्रांड'' की खाल ओढ़कर देश को गर्त में ले जाना चाहते हैं।
किन्हीं मायनों में इन्हें देशद्रोही भी माना जा सकता है क्योंक‍ि निजी राजनीति अथवा व्यक्तिगत कुंठाओं को थोपने वाला शख्स किसी देशद्रोही से कम नहीं होता, फिर चाहे वह कोई साधु-संत हो या मुल्ला-मौलवी।

- अलकनंदा सिंह     



शनिवार, 31 जनवरी 2015

मशहूर कथाकार मिथिलेश्वर को इफको साहित्य सम्मान

नई दिल्ली। हिंदी के मशहूर कथाकार मिथिलेश्वर को आज यहां प्रतिष्ठित श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान से नवाजा गया। केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने श्री मिथिलेश्वर को पुरस्कार के तहत 11 लाख रुपए नकद. प्रशस्ति पत्र. प्रतीक चिह्न तथा शाल भेंट कर सम्मानित किया। हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के नाम पर शुरू किया गया यह चौथा सम्मान है। इससे पहले हिंदी के प्रमुख साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल. शेखर जोशी तथा संजीव को यह सम्मान दिया जा चुका है।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

प्रि-नेटल सेक्स डिटरमिनेशन: थैक्यू सुप्रीम कोर्ट

अगर आप वेब मीडिया से जुड़े हैं तो अब आपको प्रि-नेटल सेक्स डिटरमिनेशन से जुड़े विज्ञापन या इससे संबंधि‍त सामग्री  देखने को नहीं मिलेगी। 

कल सुप्रीम कोर्ट ने कन्या भ्रूण हत्या से संबंधि‍त वेब सर्चिंग पर अपना अहम निर्णय देते हुए भारत में प्रचलित  गूगल, याहू , माइक्रोसॉफ्ट, बिंग जैसे वेब सर्च इंजिन्स पर भ्रूण से संबंधि‍त किसी भी तरह की जानकारी देने वाले विज्ञापनों को पाबंद करने का आदेश दिया है ताकि भ्रूण से संबंधि‍त जानकारी की आड़ में प्रि-नेटल सेक्स डिटरमिनेशन संबंधी विज्ञापनों के जरएि इस कुप्रथा को बढ़ावा देने पर रोक लगाई जा सके।
 

अभी तक किसी शब्द को खोजते ही ये सर्च इंजिन उस शब्द से संबंधित वेब सामग्री तो दिखाते ही थे साथ ही इससे संबंधित सामग्री के ठीक ऊपर दो या तीन मुख्य विज्ञापन और सर्च पेज के साइड में फिर उन्हीं विज्ञापनों की लंबी फेहरिस्त हुआ करती है। यदि एक ही तरह के या इससे मिलते जुलते शब्द सर्च किये जाते हैं तो उससे संबंधि‍त डाटा सर्च इंजिन्स में दर्ज़ हो जाता है। ऐसे में जब भी आप सर्च करेंगे तो उससे संबंधित विज्ञापनों पर नजर पड़ना स्वाभाविक है।
 

ज़ाहिर है क‍ि इन विज्ञापनों के कारण प्रि-नेटल सेक्स डिटरमिनेशन यानि जन्म से पहले भ्रूण की स्थ‍िति का पता लगाने संबंधी वेबसाइटों के लिंक्स आसानी से उपलब्ध होते हैं और यही लिंक्स भ्रूण के लिंग का पता लगाने वाली वेबसाइट्स का भी पता देती हैं। यानि सब- कुछ कानून के दायरे में आए बिना आसानी से मिलता रहा है। आईटी एक्ट में भी ऐसा कोई प्राविधान अभी तक नहीं है कि जन्म से पहले भ्रूण की स्थ‍िति जानना वर्जित माना जाता हो और इसी का फायदा सर्च इंजिन्स ने उठाया है।
 

इसके अलावा भ्रूण परीक्षण कानून (पीसी पीएनडीटी एक्ट) की धारा 22 में भी वेब सर्च इंजिन्स या इंटरनेट से जुड़ी किसी भी माध्यम की भागीदारी से संबंधित कोई दिशा- निर्देश नहीं दिये गये हैं। ये शायद इसलिए संभव था क्योंकि यह कानून 1994 में बना था और तब इंटरनेट के आम या इतने वृहद उपयोग के बारे में सोचा भी नहीं गया किंतु आज सर्च इंजिन्स पर सारी सूचनाएं लगभग मुफ्त में ही मिल जाती हैं। 
 

गौरतलब है कि पीसी एंड पीएनडीटी अधिनियम के अंर्तगत एफ-फॉर्म भरा जाता है। इसमें गर्भवती महिला का पूरा नाम, पता, सोनोग्राफी का प्रकार, तारीख, गर्भस्थ शिशु की स्थिति , बीमारी, सोनोग्राफी करने वाली संस्था और डॉक्टर सहित विस्तृत जानकारी कुल 19 कॉलम में भरकर देनी होती है। उस समय बनाए गए इस कानून के अंतर्गत चोरी छिपे भ्रूण लिंग परीक्षण करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कार्यवाही करने का प्रावि‍धान है।
 

नई चुनौती के रूप में अब इंटरनेट इसमें नया कारक बन के उभरा है।
 

हालांकि सुप्रीम कोर्ट में कल दिए गये  सरकारी हलफनामे के तहत ऐसी साइट्स को बिना यूआरएल व आईपी एड्रेस के ब्लॉक करने में असमर्थता जताई गई क्योंकि जब तक आईपी एड्रेस और संबंधि‍त साइट्स के यूआरएल सरकार को मुहैया नहीं कराए जाते तब तक वह इन्हें प्रतिबंधि‍त नहीं कर सकती। इसका हालिया समाधान जस्टिस दीपक मिश्रा व पी सी पंत ने यही दिया कि जब तक आई टी एक्ट में नये प्राविधान क्लैरीफाई नहीं होते तब तक सर्च इंजिन पर आने वाले विज्ञापनों को हटा लिया जाए या फिर कंपनियां उन पर स्वयं ही अंकुश लगायें।
इस पर समाज के लिए अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए गूगल, याहू व अन्य  कंपनियों की ओर से बेहद लापरवाह दलील दी गई कि भ्रूण परीक्षण की पूरी जानकारी देने वाली इन वेबसाइट्स के बारे में देखना होगा कि कानून में ऐसा कोई प्रावि‍धान है कि नहीं। कंपनियों की ओर से एक बात और बेहद म‍हत्वपूर्ण कही गई कि '' विज्ञापन देना अलग बात है और कोई चर्चा या लेख दूसरी बात है ''। इसका सीधा- सीधा मतलब तो यही निकलता है कि वे भारत में अपना बाजार पाने के लिए सामाजिक जिम्मेदारी की परवाह नहीं करेंगी।
 

गौरतलब है कि जन्म से पहले भ्रूण के लिंग का पता लगाने की कुप्रवृत्त‍ि के कारण  इस समय तक न जाने कितनी बच्च्यिों को जन्म से पहले ही मारा जा चुका है। देश के अधि‍कांश प्रदेशों में इस कुप्रवृत्त‍ि ने अपनी जड़ें जमा रखी हैं। अभी तक तो यही समझा जाता था कि कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ व ग्रामीण लोगों में लड़कियों की पैदाइश को बुरा मानते हैं मगर शहरी क्षेत्रों से आने वाले आंकड़ों ने सरकार और गैरसरकारी संगठनों के कान खड़े कर दिए हैं कि यह प्रवृत्त‍ि कमोवेश पूरे देश में व्याप्त हो चुकी है और इसके खात्मे के लिए हर स्तर पर जागरूकता प्रोग्राम चलाए जाने चाहिए,  साथ ही कड़े दंड का प्रावि‍धान भी होना चाहिए ।
 

आमिर खान के शो '' सत्यमेव जयते''  में भी तो शहरी क्षेत्रों से आए लोगों ने इस सच को और शिक्षितों में भी बढ़ रही इसकी क्रूरता को बखूबी बयान किया था,  अब साबू मैथ्यू जॉर्ज की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इंटरनेट के बढ़ते दायरे, इसके सदुपयोग और दुरुपयोग पर फिर से बहस की जरूरत को रेखांकित करता है कि आखिर संचार का जो जाल विशाल से विशालतर होता जा रहा है वह जिस जनता के दम पर अपना बाजार स्थापित कर रहा है उसके हित में वह कितना योगदान दे रहा है।
कन्या भ्रूण हत्या को लेकर वेब मीडिया और सर्च इंजिन्स को भी कठघरे में लाकर साबू मैथ्यू जॉर्ज की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जो नेक काम किया है, वह निश्चित ही इस कुप्रथा को कम से कम एक नये एंगल से सोचने पर विवश अवश्य करेगा ।
 

दूरदराज के इलाकों वाले अश‍िक्षित समाज में कन्या भ्रूण हत्या को अंजाम देने वालों से ज्यादा शहरी और शिक्षित परिवारों में बेटा और बेटी के बीच फ़र्क किये जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट का ये नया तमाचा है जो उनके श‍िक्षित होने पर भी सवाल खड़े करता है क्योंकि अब भी इंटरनेट  का सर्वाधिक उपयोग श‍िक्षित समाज ही करता है और सर्च इंजिन्स का यही सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
 

बहरहाल, सर्च इंजिन कंपनियों द्वारा इस मुद्दे पर चर्चा की बात छेड़े जाने के बाद यह तो कहा ही जा सकता है कि क्या कोई चर्चा ऐसी भी कराई जानी चाहिए जिसमें कहा जाए कि हमें लड़कियां चाहिए ही नहीं...  या लोगों से कहा जाए कि वो स्वतंत्र हैं आबादी से लड़कियों को पूरी तरह हटाने को... । ज़ाहिर है कि कानून पर चर्चा तो होती रहनी चाहिए और समय व जरूरतों के मुताबिक इन्हें तब्दील भी किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यही करने का व कहने का प्रयास किया है। हमें समय की इन नई चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा, साथ ही यह भी कि बाजार द्वारा समाज को प्रभावित करने के मामले में, ये चलेगा मगर ये नहीं चलेगा जैसी भ्रामक मानसिकता त्यागनी होगी। ए‍क स्पष्ट सोच के साथ ही इस सामाजिक बुराई का अंत संभव है क्योंकि कोर्ट हमें रास्ता तो दिखा सकते हैं पर घर-घर जाकर सोच पर ताला नहीं जड़ सकते।
 

- अलकनंदा सिंह