गुरुवार, 8 मार्च 2018

हमें अष्‍टभुजी रहने दो, औज़ार ना बनाओ

Painting by arun samadder aparajita- on womens day 
देवि दुर्गा की अष्‍टभुजाएं देखी हैं आपने? सभी भुजाओं में कोई ना कोई अस्‍त्र-शस्‍त्र मौजूद होता है जबकि शक्‍ति दुर्गा की भुजाओं में होती है, ना कि उन अस्‍त्र-शस्‍त्रों में। ऐसे में सवाल यह उठता है कि फिर अस्‍त्र-शस्‍त्रों को उनके हाथों में क्‍यों दर्शाया गया है? राक्षसों का नाश तो देवि अपनी भुजाओं से ही कर सकती थीं।
दरअसल, यह सब शस्‍त्र प्रतीक हैं उस शक्‍ति के जो वे भुजाएं वहन करती हैं।
सीधा सीधा अर्थ यह है कि करुणा, दया और प्रेम के साथ-साथ हर महिला अपने भीतर एक ऐसी शक्‍ति समाहित रखती है जो समय-समय पर उसे ना सिर्फ राक्षसों से बचाती है, बल्‍कि स्‍वयं अपने उत्‍थान के लिए आवश्‍यक ऊर्जा भी प्रदान करती रहती है।
राक्षसों की मौजूदगी सिर्फ प्रत्‍यक्षत: शारीरिक रूप से प्रताड़ित करती दिखे ऐसा नहीं है, वो मानसिक रूप से तोड़ने में भी कोई कसर नहीं छोड़ती। तब ऐसे में महिलाएं अपनी भुजाओं में समाहित शक्‍ति का प्रयोग करती हैं, ये शक्‍ति स्‍वत:स्‍फूर्त संचालित होती है। कब चुप रहना है, कब बोलना है, कब अपनी शक्‍ति का इस्‍तेमाल करना है, कब उसे शांत रखकर घर-बाहर शांति बनाए रखनी है। सामंजस्‍य बनाए रखना हम महिलाओं का स्‍वाभाविक गुण होता है परंतु अब ये समीकरण बदलने लगे हैं।
महिलाओं पर शारीरिक हिंसा से संबंधित समाज-कल्‍याण विभाग के आंकड़े और देश की विभिन्‍न न्‍यायालयों में दायर मामलों को देखें तो 80% मामलों में आरोपपत्र झूठे लगाए जाते हैं, जिन्‍हें बाद में वापस ले लिया जाता है। वापस लिए गए मामलों में सभी वादी महिलाएं स्‍वयं को निर्दोष साबित करते हुए पारिवारिक दबाव अथवा टारगेट किए गए ”दोषी पुरुष” को अज्ञात बताकर पहचानने से के इंकार करके ”सशर्त-समझौते” को अंजाम देती हैं। ये ”सशर्त-समझौते” कैश अथवा काइंड के तौर पर ”काम आ” जाते हैं। महिलाएं यदि दलित वर्ग से हुईं तो दोषी बताए गए पुरुष को न्‍यायिक ही नहीं सामाजिक प्रतिष्‍ठा के स्‍तर पर चुनौतियों का सामना करना होता है। जितनी बड़ी उसकी प्रतिष्‍ठा, उतना ही बड़ी समझौता राशि। ऐसे में वास्‍तविक पीड़ित महिला के प्रति भी सहानुभूति संशयों में घिर जाती है और इसका सीधा-सीधा लाभ अत्‍याचारियों का मिलता है।
इसी तरह वैवाहिक अदालतों में कुछ ऐसे मामलों को मैंने रुबरू देखा है, जिनमें शादी के बाद किसी भी स्‍तर पर अनबन हो जाने अथवा सोची गई सुविधाओं मिलने में किसी भी प्रकार की कमी होने पर वह दहेज प्रताड़ना का केस तो बनाती ही हैं, साथ ही मर्यादाओं की सीमा लांघकर भी आरोप लगाने के काम करती हैं। जैसे आजकल अनबन होने पर पति को नपुंसक बता देना और उसके साथ-साथ ससुराल के अन्‍य पुरुषों पर यौन शोषण का आरोप लगाना आम बात हो गई है। किसी भी परिवार के लिए इस तरह के आरोपों को झेलना बहुत मुश्‍किल होता है। सच्‍चाई तो तब सामने आती है जब कथित तौर पर नपुंसक घोषित किए गए पुरुष की दूसरी शादी के बाद उसके बच्‍चे भी हो जाते हैं।
कुल मिलाकर आज महिला दिवस पर तमाम कसीदों के इतर यह भी जानना जरूरी है कि अब जबकि महिलाएं हर क्षेत्र में अपना डंका बजा रही हैं तब उनकी स्‍वतंत्रता के साथ आ चुकीं बुराइयों से भी रुबरू हुआ जाए क्‍योंकि झूठे आरोपों से महिलाओं की अपनी प्रतिष्‍ठा भी दांव पर लगती है।
इस प्रगतिवादी और महिलाओं के लिए अच्‍छे समय के साथ ही हमें अपराध की ओर धकेलती उच्‍छृंखलता और अपनी वास्‍तविक स्‍वतंत्रता में अंतर करना होगा, पीड़ित और पीड़क में अंतर करना होगा।
देवि दुर्गा जिन अष्‍टभुजाओं के बल पर हमें नतमस्‍तक होने को बाध्‍य करती हैं, इसका अर्थ ही यह है कि हम महिलायें एक बार में अष्‍टचक्र कार्य कर सकने में सक्षम होती हैं। बस हमें अपनी अष्‍टभुजाओं में निहित बल को ”तिर्यक” होने से बचाना होगा वरना हमें मात्र औज़ार की भांति प्रयोग किये जाने से कोई नहीं रोक सकता। ध्‍यान रखना होगा कि औज़ार अथवा शस्‍त्र की अपनी कोई शक्‍ति नहीं होती।
आज इस महिला दिवस पर महिलाओं की शक्‍ति को निश्‍चितत: सम्‍मान मिलना चाहिए मगर इस शक्‍ति के बहाने आ रहे दोषों से भी तो आंखें नहीं फेरी जा सकतीं। समग्रता ही हमारे अपने बल, बुद्धि और संपूर्ण अस्‍तित्‍व को निखारेगी। हम अपने अष्‍टभुजी रूप को सार्थकता दे पायें और किसी और का औज़ार न बने इसके लिए स्‍वयंसिद्धा तो बनना ही पड़ेगा।
- अलकनंदा सिंह