शनिवार, 1 जून 2019

शीशम के एक बड़े टुकड़े से बनी श्रीराम की प्रतिमा स्‍थापित होगी अयोध्‍या में

अयोध्या में कोदंड श्रीराम की सात फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी। तमिलनाडु में बनी यह प्रतिमा अयोध्या शोध संस्थान में प्रतिष्ठित की जाएगी, जिसे बनाने में 3 साल का समय लगा है।


संस्थान ने इस आदम कद प्रतिमा को कर्नाटक सरकार के उपक्रम ‘कावेरी’ से 35 लाख रुपए में खरीदा है।
खास बात यह है कि इस प्रतिमा को शीशम की लकड़ी के एक बड़े टुकड़े से ही बनाया गया है।


संस्थान के अधिकारियों ने बताया कि जून के पहले हफ्ते में प्रतिमा की स्थापना के समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में मौजूद रहेंगे। बताया जा रहा है कि इस प्रतिमा को तैयार करने वाले कलाकार को हस्त शिल्प के लिए राष्ट्रपति सम्मान मिल चुका है। अयोध्या में आने वाले श्रद्धालुओं को इस प्रतिमा की उपस्थिति एक नया अनुभव होगी। साथ ही यह भगवान राम की विराट छवि और अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी अलग-अलग रूपों में स्वीकार्यता को दर्शाएगी।


भगवान राम के धनुष को कोदंड के नाम से जाना जाना जाता है

भगवान राम के धनुष को कोदंड के नाम से जाना जाना जाता है। जब वह माता सीता की खोज के लिए दक्षिण भारत पहुंचे तो वनवासी रूप में उनके हाथ में उनका धनुष कोदंड था। उन्होंने अपनी पत्नी सीता की रक्षा के लिए धनुष उठाया था लिहाजा दक्षिण भारत में उनका परिचय एक ऐसे पुरुष के तौर पर होता है जो ‘स्त्री रक्षक’ हैं इसलिए तमिलनाडु में भगवान राम के कोदंड स्वरूप को पूजा जाता है। स्त्रियों में श्रीराम के इस स्वरूप को आदर और सम्मान दिया जाता है।
देशभर में भगवान राम की जिन रूपों में पूजा की जाती है, उसका विशेष कारण है। कहते हैं- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी तैसी। यानी जिसकी जैसी भावना होती है, उसे भगवान की वैसी मूर्ति दिखती है। यह बात श्रीराम के जीवन काल की घटनाओं पर भी लागू होती है। अयोध्या और इसके आस-पास के क्षेत्र के लोगों ने उन्हें बाल्य रूप में देखा था तो वहां उनकी पूजा ‘बाल राम’ रूप में की जाती है।


मिथिला क्षेत्र में उन्होंने सीता से स्वयंवर किया था, तो वहां उन्हें ‘दूल्हा राम’ के रूप में पूजा जाता है। 14 वर्ष के वनवास के दौरान वह काफी समय मध्य प्रदेश और चित्रकूट में रहे तो वहां उनकी छवि ‘बनवासी राम’ की है। इसी तरह जब वह रावण द्वारा सीता मां का अपहरण कर लिए जाने के बाद उनकी तलाश करते हुए हाथ में अपने धनुष कोदंड के साथ दक्षिण भारत पहुंचते हैं, तो वहां उनके कोदंड स्वरूप को पूजा जाता है, जो स्त्री के सम्मान के लिए रावण जैसे आतताई से भिड़ने के लिए तत्पर हैं।

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