मंगलवार, 8 सितंबर 2015

अब आया हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’

भोपाल। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ एवं उनके साथियों ने आज यहां ‘ट्विटर’ की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला ‘मूषक’ सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश किया है।
हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी :सीईओ: अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां ट्विटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बदलती तकनीक के साथ हिन्दी को लोगों से परिचित कराना होगा, ताकि लोग रोमन लिपि से पिछड़कर अपनी पहचान ना खो दें।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन पर उनकी इस सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है तथा इसके अलावा कम्प्यूटर पर इसे गूगल सर्च में डब्लूडब्लूडब्लू डॉट मूषक डॉट इन के नाम से खोजा जा सकता है।
गौड़ ने कहा कि भाषा वैज्ञानियों का विचार है कि जो भाषा हम बोलना है और जानते हैं, उसे थोड़े प्रयत्नों से ही सरलता से लिखना सीख जाते हैं। उन्होंने कहा कि ‘मूषक’ का उद्देश्य हिन्दी और देवनागरी को आज की पीढी के लिए सामयिक और प्रचलित करना है। इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर हिन्दी भाषी रोमन में टाइप करने से वहीं तत्काल हिन्दी शब्द का विकल्प पा सकेंगे।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में ‘मूषक’ के सीईओ ने कहा कि ट्विटर, फेसबुक सरीखे सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जिसे हमारे नेताओं, अभिनेताओं और प्रतिष्ठित लोगों ने जोर-शोर से अपनाया है, वहां प्राथमिकता अंग्रेजी भाषा को दी जाती है और उसे ही देश की आवाज समझा जाता है। हिन्दी दोयम दर्जे की मानी जाती है। उन्होंने कहा कि मूषक द्वारा हम इस प्रक्रिया को सही मायनों में गणतांत्रिक बनाना चाहते हैं, जहां गण की आवाज गण की भाषा में ही उठे।

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

लियोनी की लीला पर अंजान का अतुल्य उवाच

अभी कुछ दिन ही हुए हैं जब केंद्र सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, कुछ पॉर्न वेबसाइट्स को निगरानी के बहाने प्रतिबंधित किया था। उसके बाद अचानक पूरे देश से कथ‍ित बुद्धिजीवी निकल-निकल कर बाहर आ गए और चीखने लगे कि यह तो व्यक्ति की आजादी को छीनना है। कोई अपने बेडरूम में अपना जीवन कैसे जीता है, सरकार इसे कंडक्ट कैसे कर सकती है। हो- हल्ला इतना हुआ कि सरकार को पॉर्न साइट्स पर से प्रतिबंध हटाना पड़ा। इन हो-हल्ला करने वालों को बढ़ते रेप, सेक्स की मंडियों में बच्चों को सेक्स टॉयज की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति, ज्यादातर रेप केसेज में अपराधियों द्वारा खुद ब्लूफिल्म देखना स्वीकारना जैसे उदाहरण नजर नहीं आते जबक‍ि रेप के लिए ब्लूफिल्म की सहज उपलब्धता एक एनहांसर के रूप में सामने आई है।
ऐसा ही एक एनहांसर है टीवी पर सनी लियोनी द्वारा दिया जा रहा कंडोम का एक विज्ञापन जिसमें वह बाकायदा यह समझाती है कि कंडोम को कैसे और कितनी बार यूज किया जा सकता है।
इस पर हम अन्य सेक्सी विज्ञापनों की तरह नज़र नहीं डालते, यदि वामपंथी नेता अतुल अंजान ने सनी लियोनी के कंडोम के विज्ञापन को लेकर सवाल न उठाए होते।
दरअसल उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक रैली के दौरान उन्होंने कहा कि कंडोम का एड करती सनी लियोनी के टीवी कमर्शियल्स से देश में रेप के मामले बढ़ेंगे।
अतुल अंजान ने अभिनेत्री सनी लियोनी पर हमला बोलते हुए कहा कि उसके जरिए संस्कृति को खराब किया जा रहा है। सनी लियोनी एक पोर्न स्टार है और मैं उसका सम्मान नहीं कर सकता।
अंजान ने कहा कि मैं सेंसर बोर्ड से सनी लियोनी की शिकायत करूंगा।
अंजान ने कहा कि टेलीविजन खोलते ही सनी लियोनी के विज्ञापन आते हैं और वो पूरे दिन चलते हैं। अंजान का कहना है कि कंडोम के इतने गंदे और अभद्र प्रचार रेडियो और टेलीविजन पर चलेंगे तो इससे देश में रेप की घटनाएं बढ़ेंगी, कम नहीं होंगी।
अतुल अंजान ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि मैं तो नारी का सम्मान करने वाला हूं। मैं कंडोम का विरोधी नही हूं, जिन लोगों को इस बात से नाराज़गी है क्या वो अपनी मां-बहन, बेटियों के साथ ये देख सकते हैं। ये कोई विज्ञापन है। सनी लियोनी का सम्मान मैं नहीं कर सकता। उसकी नंगी फिल्में देखिए, क्या असभ्यता है, जो लड़की आपके समाज को ये गंदा मेसैज दे, आप अपने मन से सेंसर बोर्ड को शिकायत दे दें मेरी तरफ से, मैं तो बंद कराउंगा ही। जिन लोगों को सनी लियोनी से प्रेम है, मैं उनसे कहूंगा कि अपने घर में कला के नाम पर ये एड अपनी बहन, मां, बेटियों को दिखाएं और अगर किसी को इस से आपत्ति है तो मैं माफी मांगता हूं।
निश्चित ही अतुल अंजान ने हर मिडिल क्लास घर की वो सच्चाई सामने रखी है जिसमें सनी लियोनी आज भी वल्गर मानी जाती है। आज भी कोई निर्लज्ज विज्ञापन आते ही पूरा परिवार एक दूसरे से नजरें चुराता है, आज भी बाप के सामने बेटी या बेटा कंडोम की बात तो दूर अंडरगारमेंट्स या परफ्यूम के अश्लील विज्ञापन आने पर बात का रुख बदल देता है या चैनल बदलना ज्यादा मुफीद समझता है ।
इलेक्ट्रानिक मीडिया पर आजादी की बहस तो बहुत चलती है मगर नैतिकता सिखाने वाले कदम क्या हों, इस बावत कोई बहस सुनाई नहीं देती। इन चैनलों की बाजारू प्रवृत्त‍ि समाज में किन-किन अपराधों को बढ़ावा दे रही है, अभी शायद कोई इन्हें समझ नहीं पा रहा। इन चैनलों के अनुसार तो आजादी का मतलब नंगा होना ही है, तभी तो इन्हें सनी लियोनी रोल मॉडल नजर आती है और उसके विज्ञापनों का हमारे ड्रॉइंग रूम्स में सरेआम देखना खुलेपन का उदाहरण।
इन चैनलों की ही देन है कि हम अपने सारे नीति वाक्यों को बेमानी बनते हुए देख रहे हैं, जिनमें कहा जाता था कि भोजन-भजन और रति एकांत में ही किए जाने चाहिए। कंडोम का विज्ञापन हमें आजादी के नाम पर कामुकता की जिस अंधी कैद में धकेलता जा रहा है, उसके ख‍िलाफ आवाज उठनी ही चाहिए। हम आज भी नंगे होने को असभ्यता ही मानते हैं और इसे अपराध की जद में रखते हैं। मैं तो अतुल अंजान जी को बधाई का पात्र मानती हूं कि उन्होंने वामपंथी होते हुए इस शाश्वत सत्य को खुले मंच से कहा और यह भी कहा कि नंगे विज्ञापनों को करने वाली पॉर्न स्टार को मैं सम्मान नहीं दे सकता। ज़ाहिर है कि हम आज भी इतने खुलेपन को नकारते हैं जो हमें अपने बच्चों के सामने नज़रें चुराने पर विवश कर देता हो।
गनीमत यह रही कि ये आवाज किसी हिंदूवादी संगठन ने नहीं उठाई वरना इसे कट्टरवादी सोच कह कर कब का दबा दिया जाता। अतुल अंजान के बहाने ही सही, यह बहस चलनी चाहिए ताकि मां, बहन और बेटियों को टीवी के सामने अपनी मौजूदगी शर्मिंदगी ना लगे।
– सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की तैयारियां जोर शोर से शुरू

भोपाल। दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियां जोर शोर से जारी हैं जिसका आयोजन यहां 10 से 12 सितंबर के बीच किया जाएगा और जिसमें हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन आकषर्ण का मुख्य केंद्र होंगे ।
दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन में समकालीन मुद्दों और विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रशासन और विदेश नीति, विधि, मीडिया आदि के क्षेत्रों में हिंदी के सामान्य प्रयोग और विस्तार से संबंधित तौर तरीकों पर चर्चा होगी। सम्मेलन का मुख्य विषय ‘हिंदी जगत: विस्तार एवं संभावनाएं’ है।
ताल-तालाबों की नगरी भोपाल में होने वाले इस सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे तो समापन समारोह में गृह मंत्री राजनाथ सिंह पधारंेगे। समापन समारोह में बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन भी आकषर्ण का मुख्य केन्द्र होंगे।
सम्मेलन के आयोजन से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श करने के लिए परामर्श, प्रबंधन और कार्यक्रम से संबंधित तीन समितियां गठित की गई हैं। परामर्श एवं कार्यक्रम समितियों की अध्यक्ष विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हैं जबकि प्रबंधन समिति के अध्यक्ष विदेश राज्य मंत्री जनरल (सेवानिवृ}ा) डॉ. वी.के. सिंह हैं।
मध्य प्रदेश राज्य सरकार सम्मेलन की स्थानीय आयोजक है और मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री, शिवराज सिंह चौहान मुख्य संरक्षक हैं। सम्मेलन के लिए माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल भागीदार संस्था है।
विश्व हिंदी सम्मेलन की संकल्पना राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा 1973 में की गई थी। संकल्पना के फलस्वरूप, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के तत्वावधान में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन 10 से 12 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित किया गया था। इसके बाद विश्व हिंदी सम्मेलन दो बार पोर्ट लुई (मॉरीशस) में, दो बार भारत में, पोर्ट ऑफ स्पेन (ट्रिनिडाड एण्ड टोबेगो), लंदन, पारामारिबो (सूरीनाम), न्यूयार्क (अमेरिका) और जोहांसबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में आयोजित किया जा चुका है ।

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

सच कहा रिजू , हर शाख पर उल्लू बैठा है

आइने नस्ब (लगे हुए) हैं दीवारों पर 
चमकती हुई शोहरतों के
जिन के पीछे छुपा कर रखे हैं खंजरों से भरे हाथ
खून ज़मीरो-अदब का करने को 


सोशल मीडिया आज फिर एक महिला के दर्द का वायस बना। एक ट्रेनी महिला आईएएस रिजू बाफना के इस खुलासे ने कि औरत को लेकर पुरुषों के एक वर्ग की मानसिकता किस हद तक बीमार हो चुकी है, उन अदीबों का चरित्र सरेआम कर दिया जो ऊंचे ओहदों पर बैठे जरूर हैं लेकिन उनकी सोच उतनी ही गिरी हुई है, जितनी किसी बलात्कारी की हो सकती है। 
हालांकि रिजू के इस खुलासे में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जिसे आम औरत लगभग हर दिन भुगतती ना हो मगर ट्रेनी आईएएस होने के नाते उनका खुलासा खलबली तो मचा ही गया।
देश में यौन प्रताड़ना के मामले हर रोज और कभी कभी तो दिन में कई बार निकलकर सामने आते हैं किंतु इसी कड़ी में एक युवा महिला आईएएस ऑफिसर के जुड़ जाने से खबर कुछ ''यूं ही'' वाली कैटेगरी से अलग होकर सुर्ख‍ियां बन गई। 
मध्यप्रदेश के सिवनी में तैनात महिला ट्रेनी आईएएस रिजू बाफना का कहना है कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे क्‍योंकि यहां हर शाख पर उल्लू बैठा है। युवा महिला आईएएस अधिकारी रिजू बाफना ने पिछले हफ्ते राज्य मानवाधिकार आयोग के एक अधिकारी के खिलाफ अश्लील संदेश भेजने की शिकायत दर्ज कराई थी।
इस पूरे वाकए के संबंध में रिजू बाफना ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला है। जिसमें उन्होंने कानून और व्यवस्था को तार- तार करने वाली बातों से लोगों को अवगत कराया है। रिजू बाफना इस वाकए को लेकर बहुत दुखी हैं और वे कहती हैं, ‘मैं बस यही दुआ कर सकती हूं कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे।’
यौन उत्पीड़न से लड़ने के दौरान मिले अनुभव के आधार पर बाफना ने कहा, ‘यहां हर शाख पर उल्लू बैठा है।’
वह अपनी पोस्ट में लिखती हैं कि जब अपना बयान दर्ज कराने वह अदालत पहुंचीं, तो कक्ष में वकील के साथ कई लोग मौजूद थे। बाफना ने लिखा है कि मैंने कहा कि मैं इतने लोगों के सामने बयान देने को लेकर असहज महसूस कर रही हूं इसलिए मैंने उस वकील और दूसरे लोगों से  एकांत की गुजारिश की।’
वह बताती हैं कि इसके बाद उस वकील ने चिल्लाते हुए कहा, ‘आप अपने दफ्तर में अधिकारी होंगी, अदालत में नहीं।’
बाफना कहती हैं कि उन्होंने अपनी चिंता से जज को भी अवगत कराया।
वह कहती हैं, ‘जब मैंने न्यायिक मजिस्ट्रेट से कहा कि उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि यौन उत्पीड़न के मामले में जब कोई महिला अपना बयान दे रही हो तो वहां दूसरे लोग मौजूद ना हों।
इस पर जज ने कहा कि आप युवा हैं और इसी वजह से ऐसी मांग कर रही हैं।’
इससे आहत बाफना कहती हैं कि यह देश महिलाओं की दुर्दशा को लेकर ‘असंवेदनशील′ बना रहेगा। ‘मैं बस यही दुआ कर सकती हूं कि इस देश में कोई महिला ना जन्मे। यहां हर कदम पर उल्लू बैठे हैं…’।
बाफना द्वारा डाले गए इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर खूब सहयोग मिल रहा है। लोग बाफना की ओर से लगातार प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
इस पोस्ट के बाद बाफना ने दूसरी पोस्ट भी डाली है। उन्होंने लिखा है कि पहली पोस्ट में मैंने एक लाइन लिखी थी कि इस देश में नारी जन्म ना ले। मैंने वह लाइन आवेश में आकर लिख दी थी, ये सही है कि किसी एक व्यक्ति के दोष के लिए पूरे देश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता इसीलिए मैंने बाद में अपनी पोस्ट को एडिट भी किया। हालांकि पूरे अनुभव ने मुझे एहसास दिलाया कि हमारे देश में आपराधिक न्याय प्रणाली यौन अपराधों जैसे संवेदनशील मामलों को लेकर कितनी असंवेदनशील है।
मेरा मेरे देश के कानून पर पूरा भरोसा है और इसलिए मैंने इस संबंध में तुरंत अधिकारियों को अवगत कराया। मैं आपको मेरे साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बताने जा रही हूं जो मेरे साथ जुडीशियल मजिस्ट्रेट, सिवनी मध्यप्रदेश के कोर्ट में 1 अगस्त 2015 को हुआ।
मैं अपना बयान दर्ज कराने के लिए कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुई थी। इस मामले के संबंध में मैंने 26 जुलाई 2015 को एफआईआर दर्ज करवाई थी। यह एफआईआर मैंने संतोष चौबे के खिलाफ दर्ज करवाई थी जो सिवनी जिले में ह्यूमन राइट कमीशन के एक अधिकारी के रूप में नियुक्त हैं।
संतोष चौबे मुझे अभद्र मैसेज भेजकर प्रताड़ित कर रहे थे। मैंने इस संबंध में अपने वरिष्ठ अधिकारी भरत यादव कलेक्टर एवं डीएम सिवनी को बताया।
उन्होंने तुरंत इस संबंध में एमपीएचआरसी को लिखा और संतोष चौबे को तुरंत बर्खास्त कर दिया गया।
मैं एक युवा महिला हूं और मैं पहली बार कोर्ट में यौन उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मामले के बारे में सुनवाई के लिए गई थी। मैंने सोचा कि आखिर इस तरह के मामलों में ज्यादातर महिलाएं निकलकर सामने क्यों नहीं आतीं। लेकिन जब मैं कोर्ट के अंदर पहुंची तो जो मैंने वहां अनुभव किया, वह बहुत ही भयानक व दर्दनाक था।
मैंने कोर्ट में पहुंचते ही जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट से गुजारिश की कि वह मुझे कैमरे पर बयान रिकॉर्ड करने की इजाजत दें। जब कोर्ट मेरी इस मांग को स्वीकार करने वाला ही था कि इतने में एक वकील जो उस समय वहां खड़ा था, वह मुझ पर बुरी तरह से चिल्लाने लगा और कहने लगा कि तुम्हारी इस तरह की रिक्वेस्ट करने की हिम्मत कैसे हुई। वह क्रुद्ध शब्दों में मुझ पर चिल्लाता रहा और उसने कहा कि तुम अपने ऑफिस में आईएएस ऑफिसर होगी, यह उसका कोर्ट है और वह यहां से नहीं जाएगा।
मैंने उनसे थोड़ा प्राइवेसी देने की बात की थी, वो मैंने एक महिला होने की हैसियत से की थी ना कि एक आईएएस अधिकारी होने की हैसियत से क्योंकि मैं यहां पर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले के संबंध में बयान देने जा रही थी।
लेकिन शायद वह वकील मुझे न्याय दिलाने की बजाय मुझे नीचा दिखाने में ज्यादा रुचि ले रहा था। कुछ देर इसी तरह बहस चलने के बाद वह वहां से चला गया। इस पूरे वाकए के दौरान जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट ने एक भी लफ्ज़ नहीं बोला।
उन्होंने इस दौरान मेरे बयान को कैमरे में रिकॉर्ड करने के संबंध में कोई निर्णय भी नहीं लिया। जिस समय वह वकील भद्दे तरीके से मुझसे बातें कर रहा था, तब वे एक मूक दर्शक की तरह वहां बैठे हुए थे। इससे भी बुरा तब हुआ जब मैंने अंततः अपना बयान रिकॉर्ड करवा दिया।
जुडि‍शियल मजिस्ट्रेट ने मुझसे कहा कि मैं युवा हूं और नई भर्ती हुई हूं इसीलिए मुझे प्राइवेसी को लेकर ये अपेक्षाएं हैं। आप समय के साथ कोर्ट व सिस्टम को समझ जाएंगी और तब आप इस तरह की मांग नहीं रखेंगी।
वे आगे लिखती हैं कि अगर हमारे देश में कानून इसी तरह से चलता है कि एक आईएएस अधिकारी को भी कोर्ट में जलील किया जा सकता है तो एक आम महिला के साथ कैसा व्यवहार किया जाता होगा, यह जगजाहिर है। यही कारण है कि हमारे देश में हर रोज यौन उत्पीड़न को लेकर मामले सामने आते रहते हैं।
इसीलिए महिलाएं सब कुछ सह कर बैठ जाती हैं। मैं उन महिलाओं के प्रति अपनी सहानूभूति व्यक्ति करती हूं जो अपराध सह कर चुप चाप बैठ गईं क्योंकि हमारे देश में क्रिमनल जस्टिस सिस्टम हमसे उम्मीद करता है कि हम सबके सामने अपना बयान देकर एक बार फिर वही कड़वा अनुभव करें।
सच कहती हैं रिजू कि एक बार यौन उत्पीड़न की बात सामने आने पर महिला को बार-बार उसी उत्पीड़न से गुजरना पड़ता है, कभी शब्दों से तो कभी नजरों से ... । 
- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 1 अगस्त 2015

ज़हरीली और बीमार सोच का कोई इलाज नहीं


आतंकवादियों की पैरवी करने वाली ज़हरीली और बीमार सोच का कोई इलाज नहीं हो सकता । किसी भी संविधान या कानून में सोच की नकारात्मकता को खत्म करने का प्राविधान अभी तक नहीं आया है।

1. प्रिप्लांड मास मर्डर को दंगों से कंपेयर करना
2. प्रो मुस्लिम और एंटी हिंदू को लाइन ऑफ सेक्यूलरिज्म बनाना
3. कश्मीर में अलगाववादियों के लश्कर व आईएस की झंडों को फहराने को देशद्रोह बताने की बजाय सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताना

4. बहुसंख्यकों की पूरी कौम को अपराधी और अल्पसंख्यकों की पूरी कौम को निर्दोष साबित करने में जुटे रहना
5. बहसों के माध्यम से आतंकवाद की मुखालफत की बजाय आतंकवादियों के मानवाध‍िकारों की बात को तवज्जो देना

ये कुछ बातें ऐसी हैं जिन्होंने पिछले दिनों से याकूब मेमन की फांसी को लेकर पूरे सिस्टम को ही दोषी बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मुस्लिम होने की वजह से याकूब की फांसी को अन्याय साबित करने पर तुले हुए लोग तो ऐसा लगता है कि उसे आतंकवादी ही नहीं मान पा रहे हैं ।
 गरीबी, अन्याय की घटनाओं , बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं , किसानों की वाजिब मुश्किलों, से अलग सिर्फ ये ' हिंदू-मुस्लिम ' जैसे हॉट टॉपिक्स की तलाश में रहते हैं। हरसंभव प्रयास यही किया जाता है कि हिंदू को खलनायक और मुस्लिम को नायक साबित किया जा सके। बिल्कुल ऐसे ही जैसे कि सड़क पर एक्सीडेंट भले ही साइकिल वाले की गलती से हुआ हो मगर दोष कार वाले का ही माना जाना निश्चित होता है।
याकूब की फांसी से दंगों की विभीष‍िका  की तुलना अक्लमंदों की ऐसी भीड़ कर रही है जो हर हाल में साबित करना चाहती है कि - 22 साल तक कोर्ट ने झक मारी है,  राष्ट्रपति बौराए हुए हैं। याकूब को शहीद बताने वाले यह भी भूल जाते हैं कि एक मुसलमान कलाम भी थे, जिनकी जयजयकार में डेढ़ किलोमीटर तक हिंदू और मुसलमानों ने लाइन लगा रखी थी। 
सच में कमाल हैं ये लोग .... इन्हें तो खैर मनानी चाहिए कि ये पाकिस्तान में पैदा नहीं हुए जहां गैर धर्म की बात भी करना गुनाह हो जाता है, पलभर में ईशनिंदा हो जाती है, इन्हें तो ईश्वर का शुक्रिया करना चाहिए कि ये भारत में हैं... आजाद भारतीय... जिसे पूरी आजादी होती है अपना धर्म अपना कर्म और अपना अस्तित्व बनाए रखने की ।
मगर
इस ज़हरीली और बीमार सोच का कोई इलाज नहीं हो सकता । किसी भी संविधान या कानून में सोच की नकारात्मकता को खत्म करने का प्राविधान अभी तक नहीं आया है।
याकूब के लिए दहाड़ मार कर रोने वालों की इस मौजूदा सोच पर सिवाय हैरानी और दुख जताने के और किया क्या जा सकता है ।
इस संबंध में कमाल हैं एनडीटीवी समेत कई चैनल्स पर बहसियाने वाले महानुभाव और उनके एंकर। ये कथित तौर पर बड़े एंकर , इन्हें प्रो मुस्लिम या प्रो पुअर समझने की गलती कभी न करियेगा, ये सिर्फ प्रो क्रिमिनल हैं बस्स.....।
टीवी पर प्राइम टाइम का एक घंटा बरबाद करने वाले , ढेर सारे मेकअप और टचअप्स के साथ एसी रूम्स में बैठने वाले , जो कि पहले से लिखी स्क्रिप्ट के बिना बोल भी नहीं सकते , इस हकीकत को नजरअंदाज करके कि एक अपराधी जो कि प्रिप्लांड मास मर्डर का एक्टिव एजेंट भी था , आख‍िर साबित क्या करना चाहते हैं कि मानवाध‍िकार सिर्फ क्रिमिनल्स के होते हैं , उन मरने वालों के क्या कोई मानवाध‍िकार नहीं जो इनकी हत्यारी करतूत के विक्टिम बने । उनमें औरतें भी थीं, बच्चे भी, हिंदू भी थे , मुस्लिम भी।
अत्यंत दुख और क्षोभ का विषय है कि प्राइम टाइम का मोस्टवांटेड टॉपिक बनाने में कामयाब रहे इलेक्ट्रानिक चैनल्स ने सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के निर्णय पर उंगली ही नहीं उठाई बल्कि उसे कठघरे में भी खड़ा करने की कोश‍िश की है।
यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही रहा है कि इसपर दूसरों के आक्रमण से ज्यादा तो अपनों ने ही छलनी किया।
विरोध करना ही है तो देश के टैक्स का जितना हिस्सा याकूब जैसे अपराध‍ियों की परवरिश पर खर्च हो जाता है, उस पर किया जाना चाहिए विरोध, जिससे ना जाने कितने अनाथों व असहायों की जिंदगी संवर सकती है।
क्या प्राइम टाइम वालों ने उन विधवाओं , अनाथ बच्चों , अपंगों को जाकर देखा जो याकूब की दहशतगर्दी की भेंट चढ़ गए।
बहस ही करनी है तो इस पर कीजिए कि आखिर न्याय में देरी को कम करने के लिए क्या क्या उपाय किए जा सकते हैं। बहस इस पर भी होनी चाहिए कि सरकारें इस न्याय व्यवस्था को दुरुस्त करने में ढीली क्यों पड़ रही हैं।
हर हाल में किसी भी अपराधी को हमारे टैक्स पर पालने का रिवाज खत्म होना चाहिए। आतंकवाद से जुड़े फैसलों की समयसीमा निर्धारित की जानी चाहिए।
कम से कम जनता को इस बेवकूफियानी बहस से निजात तो मिलेगी ।
- अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

गुरू पूर्ण‍िमा पर विशेष - हमारी तो आध्यात्मिक परंपरा में ही हैं गुरू का स्थान

'तत्व मसि श्वेतकेतोः' अर्थात्  'तू ही वह चिदानंद ब्रह्म है' कहकर आरुणी ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को जो ब्रह्म विद्या संबंधी आख्यान सुनाया वह और कुछ नहीं अपने शि‍ष्य पर पड़े अज्ञान का आवरण हटाने का एक गुरुमंत्र था।
इसी तरह कठोपनिषद् की वल्लियों में गुरू के रूप में यम एवं शिष्य के रूप में बैठे नचिकेता का आपसी संवाद पंचाग्नि विद्या के रूप में हमारे सामने आया , तब से अब तक उपनिषदों के माध्यम से चली आ रही  यह ज्ञान देने और गृहण करने की परंपरा ने गुरू के पद को शाश्वत घोष‍ित कर दिया।
ये मात्र दो उदाहरणभर हैं जो यह बताते हैं कि किसी जिज्ञासु श‍िष्य की जिज्ञासा शांत करके न केवल श‍िष्य की बल्कि स्वयं गुरू की श्रेष्ठता भी सिद्ध होती है।

हमारी सांस्कृतिक परम्परा रही है जिसमें जिज्ञासु शिष्य की जिज्ञासा का समाधान एक ऐसी गुरूसत्ता करती है जिसने स्वयं उसका अपने जीवन में साक्षात्कार कर लिया हो।

गुरु-शिष्य परम्परा के कारण ही उपनिषद काल की ज्ञानसंपदा का संरक्षण श्रुति के रूप में क्रमबद्ध हो पाया। इस परंपरा के अंतर्गत समर्पण भाव , अहंकार को गला कर ज्ञान प्राप्ति के अनेक उदाहरण शास्त्रों में दिए गए हैं। सुकरात व उनके शिष्य प्लेटो तथा प्लेटो के शिष्य एलेक्जेंडर एवं गुरजिएफ व आस्पेन्स्की की परम्पराएँ तो बाद में आईं जबकि हमारे देश में आदिकाल से ही यह परम्परा चली आयी है कि गुरु अपने ज्ञान द्वारा उचित पात्र समझे गए शिष्य पर पड़े अविद्या-अज्ञान के पर्दे को हटाएँ व उसका उँगली पकड़ कर मार्ग दर्शन करें।

गुरु कौन हो व कैसा हो-  
'विशारदं ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं गुरुकाश्रयेत्'-  'श्रोत्रिय' अर्थात् जो श्रुतियों से शब्द ब्रह्म को जान सके , उनका तत्व समझ सके, 'ब्रह्मनिष्ठ' अर्थात् आचरण से श्रेष्ठ व ब्राह्मण जैसा ब्रह्म में निवास कर परोक्ष साक्षात्कार कर चुका हो तथा 'विशारद' अर्थात् जो अपने आश्रय में शिष्य को लेकर उस पर शक्तिपात करने की सामर्थ्य रखता हो। 
गुरू के लिए संत ज्ञानेश्वर ने भी गीता की भावार्थ दीपिका में लिखा है कि “यह दृष्टि (गुरु की दृष्टि) जिस पर चमकती है अथवा यह करार विन्दु जिसे स्पर्श करता है वह होने को तो चाहे जीव हो, पर बराबरी करता है महेश्वर-श्रीशंकर की”।

गुरु मानवी चेतना का मर्मज्ञ माना गया है। वह शिष्य की चेतना में उलट फेर करने में समर्थ होता है। गुरु का हर आघात शिष्य के अहंकार पर होता है तथा वह यह प्रयास करता है कि किसी भी प्रकार से डाँट से, पुचकार से, विभिन्न शिक्षणों द्वारा वह अपने समर्पित शिष्य के अहंकार को धोकर साफ कर उसे निर्मल बना दे। प्रयास दोनों ओर से होता है तो यह कार्य जल्दी हो जाता है नहीं तो कई बार अधीरतावश शिष्य गुरु को समझ पाने में असमर्थ हो भाग खड़े होते हैं।
हमारी आध्यात्मिक परम्परा गुरु प्रधान ही रही है। इसी परम्परा के कारण साधना पद्धतियाँ भी सफल सिद्ध हुईं। सदैव गुरुजनों ने अपने जीवन के सफल प्रयोगों का सुपात्र साधकों के ऊपर रिसर्च लैबोरेटरी की तरह परीक्षण किया है। उन्हें श्रेष्ठ देवमानव बनाने का प्रयास किया है। गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

गुरू की श्रेष्ठता के साथ शिष्य में गुरु के प्रति श्रद्धा भी उतनी ही आवश्यक है। सामान्यतया व्यक्ति का मन बिखराव लिए होता है। चित्त वृत्तियाँ लोकद्वेषों में रुचि लेने के कारण बिखरी होती हैं। इसी बिखराव को समेट कर मन को समग्र बना लेना-महानता की ओर मोड़ लेना ही श्रद्धा है। इस मन को 'इन्टीग्रेटेड माइण्ड' कहा गया है। समग्रता के संग श्रद्धायुक्त मन से जब संशय मिट जाए तब  गुरू के प्रति पूर्ण समर्पण-विसर्जन-विलय-तादात्म्य हो जाता है। निश्चय ही गुरु-शिष्य संबंध इसी स्तर के आध्यात्मिक होते हैं जिनमें उच्चस्तरीय आदान-प्रदान होता है।जहां एक ओर शिष्य अपनी सत्ता को, अहं को गुरु के चरणों में समर्पित करता है वहीं दूसरी ओर गुरु आध्यात्मिक शक्ति द्वारा उसे ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी बनाकर जीवन मुक्त कर देता है।

- अलकनंदा सिंह

रविवार, 26 जुलाई 2015

कुंठित मंशा वालों के लिए सबक

जिस तरह अति कट्टरवादिता किसी भी समाज के लिए ज़हर बन जाती है उसी तरह अति उदारवादिता भी ज़हर का ही काम करती है। मानवाध‍िकारवादी इसी अति का श‍िकार होते रहे हैं। कोई आतंकी को फांसी दिए जाने का विरोध करता है तो कोई आतंकवाद को धर्म और मजहब से जोड़ कर दहशत फैलाने वाले को ‘बेचारा’ घोषि‍त करने पर आमादा रहता है। कोई नक्सलवाद को सरकार, पूंजीवाद और भेदभाव जनित समस्या बताकर नक्सलवाद की भेंट चढ़े जवानों की शहादत से मुंह फेर लेने की बात कहता है तो कोई बलात्कारी के भी मानवाध‍िकार की बात करता है।
कानून के लचीलेपन का फायदा वो गैर सरकारी संगठन भी उठाते रहे हैं जो मानवाधिकारवादी होने का तमगा स्वयं लटकाए घूमते हैं। बिना ये सोचे कि देश और समाज के दुश्मन सिर्फ सजा के हकदार होते हैं और इनके अध‍िकारों की बात करना कानून-व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करना है। इसके अलावा भी दोषी की तरफदारी करना अपराधी के साथ शामिल होने जैसा ही है।
हकीकत में ऐसा करने वालों की मानसिकता सिर्फ खबरों में रहने और सेंसेशन फैलाकर अपने लिए सुर्खियां बटोरने तक ही होती है, वे न अपराधी का भला चाहते हैं ना देश का, और न कानून को सही मानते हैं।
बहरहाल, अब केंद्र सरकार ने कुछ नए फैसले लेकर इन कथ‍ित मानवाध‍िकारवादियों की मानसिकता पर लगाम लगाने का प्रयास किया है। अपराधि‍यों  को जानने के बहाने व अभ‍िव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपनी सेंसेशनल खबरें, डॉक्यूमेंटरी और आर्टिकल को प्रकाश‍ित या प्रदर्श‍ित करना अब उनके लिए आसान नहीं रहेगा।
अब नए सरकारी फैसले के मुताबिक जेल में बंद कैदियों पर आर्टिकल लिखने या इंटरव्यू लेने के इरादे से कोई जर्नलिस्ट, एनजीओ ऐक्टिविस्ट्स या फिल्ममेकर्स को जेल में एंट्री नहीं दी जाएगी। हां, इस पाबंदी से कुछ स्पेशल मामलों में छूट होगी।
खबर के मुताबिक यह फैसला इसलिए लिया गया है क्‍योंकि जेल में बंद कैदियों के कई इंटरव्यूज़ लगातार सामने आए। इंटरव्यू लेने वालों में ब्रिटिश फिल्ममेकर लेसली उडविन का नाम भी शामिल है, जिन्होंने 16 दिसंबर को हुए रेप ममाले में कैद, आरोपी से इंटरव्यू लेकर इस घटना पर एक डाक्युमेंट्री बनाई थी। उनकी इस इंडियाज डॉटर नाम की डॉक्युमेंट्री ने दोषियों की मानसिकता को सबके सामने लाकर रखा, जिसे देखकर लोगों की भावनाएं भड़क उठी थीं।
गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव कुमार आलोक ने सभी प्रांतों और केंद्र शासित राज्यों को भेजे एडवाइज़री में कहा है कि किसी भी व्यक्ति, प्रेस, एनजीओ, कंपनी को जेल के भीतर शोध करने, डाक्युमेंट्री बनाने, आर्टिकल या इंटरव्यू के मकसद से प्रवेश की इजाजत सामान्य रूप से नहीं दी जानी चाहिए।
हालांकि, वैसे विज़िटर्स, प्रेस या डॉक्युमेंट्री मेकर्स को कंसिडर करने की भी बात की गई है, जिनके आर्टिकल, डॉक्यूमेट्री या रिसर्च से अथॉरिटी को किसी पॉज़िटिव सोशल मेसेज का एहसास होगा।
खबर है कि यदि जेल के अधिकारियों से इस तरह की अनुमति मिल भी जाती है तो विज़िटर्स को सिक्यॉरिटी अमाउंट के रूप में एक लाख रुपए जमा करना पड़ेगा।
इतना ही नहीं, इंटरव्यू या डॉक्युमेंट्री बनाने वालों को केवल हैंडीकैम, कैमरा, टेप रिकॉर्डर ले जाने की इजाजत मिलेगी जबकि मोबाइल, पेपर्स, किताब या कलम वे अंदर नहीं ले जा सकेंगे।
यदि जेल के सुपरिन्टेंडेंट को लगेगा कि कोई खास रिकॉर्डिंग गलत है या वह गैर-जरूरी है तो उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप करने का भी अधिकार होगा।
कुल मिलाकर इससे एक लाभ यह जरूर होगा क‍ि जो मीडियाकर्मी, मीडिया हाउसेस, सामाजकि संगठन आद‍ि अपने पेशे या सामाजिक जिम्मेदारी की आड़ में अपनी कुंठित मंशा पूरी करते हैं, उन्हें वो मौका नहीं मिल पायेगा। और हां, नेक नीयत वालों के लिए सरकार ने अब भी रास्ता छोड़ दिया है।
 अतिवाद के इन मानवाध‍िकारवादियों को एक सबक हदें पहचानने के लिए एक शेर मुजफ्फर हनफी का कुछ यूं है कि-
हक़-दारों की छुट्टी कर दो ,  इस्तिग़्ना के एक सबक में..... 
- अलकनंदा सिंह 

बुधवार, 22 जुलाई 2015

ब्रिटेन में 1370 साल पुराने कुरान के अंश !

ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय में कम से कम 1370 साल पुराने कुरान की पांडुलिपि के अंश मिले हैं.
पन्नों की रेडियो कार्बन डेटिंग तकनीक से जांच से पता चला कि कुरान के ये पन्ने कम से कम 1370 साल पुराने हैं.
शोधकर्ताओं ने साथ ही इस बात की संभावना जताई है कि जिस शख्स ने कुरान की ये पांडुलिपि लिखी होगी वह पैगंबर मोहम्मद से मिला हो.
कुरान के ये पन्ने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में मध्य पूर्व की अन्य किताबों और दस्तावेज़ों के संग्रह के साथ करीब एक सदी तक पहचाने बग़ैर रखे रहे.
एक पीएचडी शोधार्थी अल्बा फ़देली ने इन पन्नों को ध्यान से देखा तो तो फिर इनका रेडियोकार्बन डेटिंग टेस्ट करवाने का फ़ैसला किया गया और उसके परिणाम ‘आश्चर्यजनक’ आए.
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की रेडियोकार्बन एक्सेलेरेटर यूनिट में किए गए परीक्षणों से पता चला कि भेड़ या बकरी की खाल पर लिखे गए कुरान के यह अंश संभवतः इस पवित्र पुस्तक के सबसे पुराने बचे हुए अंश हैं.

विश्वविद्यालय में ईसाइयत और इस्लाम के प्रोफ़ेसर डेविड थॉमस कहते हैं, “यह दस्तावेज़ हमें इस्लाम की स्थापना के कुछ सालों के अंतराल में पहुंचा सकते हैं.”
वो कहते हैं, “मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार पैगंबर मोहम्मद को अल्लाह का पैगाम 610 से 632, उनकी मृत्यु का साल, के बीच ही मिला था जो कुरान का आधार बना.”
प्रोफ़सर थॉमस कहते हैं कि इससे यह भी अर्थ निकलता है कि जिस व्यक्ति ने उसे लिखा है वह पैगंबर मोहम्मद के समय ज़िंदा रहा हो.
वह कहते हैं, “वह व्यक्ति जिसने इसे वास्तव में लिखा होगा संभवतः पैगंबर मोहम्मद को जानता होगा. शायद उसने उन्हें देखा होगा, हो सकता है उसने उन्हें उपदेश देते देखा हो. ऐसा भी हो सकता है कि वह व्यक्तिगत रूप से उन्हें जानते हों और यह वास्तव में मंत्रमुग्ध करने वाला ख़याल है”.
यह पांडुलिपि ‘हिजाज़ी लिपि’ में लिखी गई है जो अरबी का एक पुराना रूप है.
हालांकि इन परीक्षणों से कई तरह की तारीखें मिलती हैं, इसलिए 95% संभावना इस बात की है कि यह अंश 568 ईस्वी से 645 ईस्वी के बीच के हैं.
- एजेंसी

रविवार, 19 जुलाई 2015

सुन्नी बरेलवी मरकज़ का फतवा: ये ईदी तो देश हमेशा याद रखेगा… मौलवी साहब

”हमें जा जा के कहना पड़ता था हम हैं यहीं हैं,
कि जब मौजूदगी मौजूदगी होती नहीं थी।”
देश , समाज या परिवार में बदलाव कहीं भी लाना हो , पहले खुद को बदलना होता है… परेशानी कुछ भी हो पहले खुद को संभलना पड़ता है …दूसरों में खामियां ढूंढ़ने से पहले खुद को पाक करना होता है… कल ऐसा ही कुछ ऐतिहासिक घटा उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की आला हज़रत दरगाह पर जब एक फतवा बरेली के प्रभावशाली आला हजरत दरगाह के मौलवियों ने जारी किया। प्रगतिशील फतवे जारी करने के लिए मशहूर तहरीक-ए-तहफ्फुज सुन्नियत ने यह ऐतिहासिक फतवा जारी करके इंसानियत को बचाए रखने वाला निर्णय किया है जो न जाने कितने भटके हुए नौजवानों पर मनोवैज्ञानिक असर करेगा।
फतवे में कहा गया किअगर कोई व्‍यक्‍ति आतंकी कनैक्‍शन के कारण मारा जाता है तो उसे दफन करते समय ‘नमाज-ए-जनाजा’ नहीं पढ़ा जाएगा। सुन्नी बरेलवी मरकज़ का ये मनोवैज्ञानिक सुधार वाले कदम  की जितनी तारीफ  की जाए , वह कम ही है।
कल ईद-उल-फितर के मौके पर गुमराह नौजवानों और कट्टरपंथ‍ियों को एक कड़ा संदेश देते हुए मौलवियों के इस फतवे को जहां आम मुसलमानों की आतंकवाद से जुड़े होने की इमेज को बदलने का कदम माना जएगा। वहीं सियासतदानों को आतंकवाद के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने से भी रोकेगा।
बस, ये ही हिंदुस्तान है… और यहां सुधारों का कदम उठाने के लिए हर संस्था आजाद भी है और काबिल भी, बस जरूरत थी उस श‍िद्दत को समझने की कि इसकी शुरुआत कहां से हो।
बरेली के प्रभावशाली अला हजरत दरगाह के मौलवियों ने आतंकवाद से जुड़े किसी भी शख्स और उसके हिमायतियों को दफन करने से पहले पढ़ी जाने वाली आखिरी नमाज पर रोक लगा दी है। इससे बड़ी उस व्यक्ति के लिए ज़‍िल्लत की बात और क्या हो सकती है कि उसे आख‍िरी नमाज भी हासिल ना हो सके।
ज़ाहिर है कि मौलवियों का ये एक कदम भ्रमित होकर आतंकवाद की ओर जाने वालों व उसके घरवालों पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाएगा।   कल मस्जि़द में ईद की इबादत के बाद दरगाह के मौलवियों ने अपने समर्थकों से आतंकवाद से जुड़े लोगों का बहिष्कार करने की अपील की। दरगाह अला हजरत की एक शाखा तहरीक-ए-तहफ्फुज सुन्नियत के जनरल सेक्रटरी मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी ने कहा कि ईद के इस मौके पर सुन्नी बरेलवी मरकज़ ने एक कड़ा संदेश भेजा है कि कोई भी मौलाना, मुफ्ती या कोई अन्य धार्मिक नेता आतंकवाद से जुड़े किसी भी शख्स को दफन करने से पहले ‘नमाज-ए-जनाजा’ नहीं पढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि ‘हम आतंकवाद के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहते हैं।’
गौरतलब है कि ‘नमाज-ए-जनाजा’ एक विशेष प्रार्थना होती है जो किसी की मौत पर मौलवियों द्वारा पढ़ी जाती है। यह किसी को दफन करने से पहले पढ़ी जाती है।
अभी तक फतवों को लेकर फैली हुई भ्रांतियों को भी सुन्नी बरेलवी मरकज़ ने बता दिया है कि समाज व देश का भला सोच कर ही कौम को तरक्की हासिल हो सकती है, आतंकवाद और आतंकवादी न किसी के हुए हैं ना ही हो सकते हैं। उनके एक कदम का भुगतान पूरा परिवार करता है।
गौरतलब है कि तहरीक-ए-तहफ्फुज सुन्नियत को प्रगतिशील फतवे जारी करने के लिए जाना जाता है। यह संस्था पहले भी ऐसे फतवे जारी करती रही है।
इससे पहले 18 जुलाई को मौलवियों ने फतवा जारी किया था कि इस्लाम में अनिवार्य ‘ज़कात’ आधुनिक शिक्षा और हाई-टेक गैजेट्स के लिए दान किया जाना चाहिए। इसके अलावा जून में जारी किए गए एक अन्य फतवे में मौलवियों ने फैसला सुनाया था कि महिलाएं अपना व्यापार खुद चला सकती हैं।
अफसोस होता है उस मीडिया पर जो विवादित फतवों पर तो चार चार दिन तक बहस कर सकती है मगर इस तरह के देशहितकारी और समाजहितकारी फतवों पर चुप्पी साध जाती है।
- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 15 जुलाई 2015

ज़रा इधर भी गौर फरमाइये... मेनका जी

अंगवर्द्धक यंत्रों, तेलों और वैक्यूम थेरेपियों के साथ साथ , अब तो जापानी तेलों की मैन एंड वुमैन रेंज भी पूरे विवरण के साथ जब अखबारों के पेजों की शोभा बढ़ा रही हों तब उम्र के दो साल इधर उधर करने से क्या सच में कोई फर्क पड़ेगा ....?

कभी आपने दीमक लगे पेड़ को देखा है ? दीमक लग जाने पर भी उसकी पत्तियां हरी बनी रहती हैं बहुत दिनों तक जब तक कि पेड़ पूरी तरह खोखला ना हो जाए...क्योंकि दीमक हमेशा जड़ को पकड़ती है। ऐसे में हम चाहे जितने भी पेस्टीसाइड्स और ग्रोथ हारमोन्स उसके पत्तों पर छिड़कें, उस पेड़ को पूर्वावस्था में लाना लगभग नामुमकिन ही होता है। जब तक जड़ में लगी दीमक को खत्म न किया जाए, तब तक कोई प्रयास उस पेड़ को नहीं बचा सकते। 
ठीक यही बात समाज, उसकी शुभचिंतक इकाइयों और उसकी चुनी गई संस्थाओं पर भी लागू होती है, जो कि भारी परिवर्तन के दौर में स्थापित समाजिक मूल्यों से उपजी दीमक की आहट को नहीं पहचान रही हैं। और बस असमंजस में नित नये कानून थोपे चली जा रही हैं।

पिछले दिनों केंद्रीय महिला एवं बालविकास मंत्री मेनका गांधी की अध्यक्षता वाले एक पैनल ने सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र 18 से घटाकर 16 साल करने की सिफारिश की है। इस पैनल ने यह भी सुझाव दिया कि 16 साल की उम्र के बाद दोनों में यौन समझ रहती है।
फिलहाल प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेंस्ट सैक्सुअल ऑफेंसस (पोक्सो) और क्रिमिनल लॉ अमेन्डमेन्ट ऐक्ट (ऐन्टी रेप लॉ) दोनों में सहमति की उम्र 18 साल है। 18 साल से कम उम्र वालों को नाबालिग माना गया है।
रिपोर्ट की इस विवादास्पद संस्तुतियों समेत अन्य मुद्दों पर विचार के लिए 20 जुलाई को कानून, गृह, स्वास्थ्य समेत अन्य लोगों की बैठक बुलाई गई है। इस प्रस्ताव को महिला एवं बाल अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा समर्थन दिए जाने की सम्भावना है क्योंकि सहमति से यौन सम्बंध बनाने पर उम्र के आड़े आने से युवाओं में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ रही है ( ऐसा इस पैनल का मानना है ) ।
प्रस्ताव से सहमत होने वालों का यह भी मानना है कि थानों और अदालतों में भी ऐसे झूठे मामलों की संख्या बढ़ रही है जहां लड़की के अभिभावक उम्र का हवाला देते हुए लड़कों पर शिकंजा कस देते हैं।
उल्लेखनीय है कि निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद सहमति से सम्बंध बनाने की उम्र 16 से 18 वर्ष कर दी गई थी। उम्र बढ़ाने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे श्रम और यौन व्यापार के लिए लड़कियों के अवैध व्यापार पर रोक लग सकेगी।
तर्क वितर्कों के बीच जो एक अहम बात है, वह यह कि उम्र घटाने या बढ़ाने की इस कवायद से पहले उन प्रचार माध्यमों पर रोक लगाई जाए जो अश्लीलता फैलाने  के कारखाने बने हुए हैं। जिनकी लालसा ने किशोरों, युवाओं को न केवल सेक्स सामग्री का प्रथम उपभोक्ता मान लिया है बल्कि उसे अपराध की ओर जाने का मार्ग भी बता दिया है । 
मीडिया के लगभग सभी माध्यम अश्लील विज्ञापनों को बेरोकटोक दिखा रहे हैं । वो समाज के लिए अपने उत्तरदायित्व से भी मुंह मोड़े हुए हैं। आम आदमी वो चाहे किसी भी आयुवर्ग का हो, जब उसे खुलेआम दिखाया जा रहा है कि फलां तेल और कैप्सूल से 'जवानी के मजे' लिए जा सकते हैं तो क्या हम किशोरों- किशोरियों से उम्मीद करें कि वो इन विज्ञापनों की ओर ध्यान नहीं देंगे। वह भी तब जबकि यह उम्र भावनाओं के विचलन का सबसे कमजोर समय होता है।
कुछ समाचार वेबसाइट्स तो बाकायदा डेटिंग साइट्स चलाती हैं, कुछ अपना एक निश्चित कॉलम या पूरा वेबजेज ही सेक्स समस्याओं के लिए समर्पित रखती हैं ताकि हिट्स ज्यादा मिल सकें, इसी तरह हिंदी के राष्ट्रीय अखबारों में पेज नं. 10 से लेकर पेज नं.15 तक तरह-तरह के अंगवर्द्धक यंत्रों, तेलों और वैक्यूम थेरेपियों को समर्पित होते हैं, अब तो जापानी तेलों की मैन एंड वुमैन रेंज भी पूरे विवरण के साथ अखबारों के पेजों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
हर रोज इन जैसे तमाम विज्ञापनों की भरमार न जाने कितने किशोरों, युवाओं, अधेड़ों और तो और वृद्धों की नजर से रूबरू होती होगी और उनकी नैतिकता का इम्तिहान लेती होगी। इनमें से हर उम्र को ये अपने अपने तरह से प्रभावित अवश्य करती होगी। किसी को उत्सुकता होती होगी तो किसी की अतृप्त इच्छायें ''कुछ भी'' करने को उकसाती होंगी, उनमें से कितने नैतिकता के इम्तिहान में खरे उतरते होंगे, कहना मुश्किल है। ज़ाहिर है कि  यौन अपराधों की नींव तो ये मीडिया के विज्ञापन ही रख रहे हैं । इस ग्लोबल युग में जब कि कमोवेश हर तीसरे चौथे व्यक्ति के पास स्मार्टफोन और नेट की सुविधा है, अखबार भी पढ़े ही जा रहे हैं, तब इन विज्ञापनों की ओर से आंखें नहीं मूंदी जानी चाहिए।
मेनका गांधी हों या निर्भया कांड के बाद चेती मनमोहन सरकार, दोनों अपने-अपने तरीके से उम्र को कम या ज्यादा करने के पीछे पड़ी हैं, जबकि वो जिस वजह से सहमति से सेक्स की उम्र पर इतनी रस्साकशी करती रहीं या कर रही हैं, तब तक निष्फल ही रहेगी जब तक अखबारों और चैनलों और वेबमीडिया के जरिये फैलाई जा रही इस अश्लीलता को पाबंद नहीं किया जाता।
यूं भी किसी अपराध के लिए उकसाना जब कानूनन जुर्म है तो क्या इन विज्ञापनों की भाषा-शैली-और अश्लीलता हदें पार देने वाले चित्रों के लिए सरकार कोई कदम क्यों नहीं उठाती । अश्लील साहित्य रखना और बेचना जब अपराध है तो समाचार माध्यमों को ऐसा ही अपराध करने पर सरकारें चुप क्यों लगाए हैं। 
सहमति से सेक्स की उम्र दो साल इधर हो या उधर, इस पर बहस से पहले अश्लीलता के इस खुलेआम व्यापार पर रोक लगाई चाहिए । किशोर वय हो या अधेड़, पुरुष हो या स्त्री, नैतिकता के दायरे तो सभी के लिए हैं, कोई यदि इन्हें पार करता है तो निश्चित ही वह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
जहां तक बात है सेक्स पर सहमति और असहमति की, तो 16 वर्ष की उम्र में सेक्स की समझ भले ही आ जाती हो मगर रासायनिक, मनोवैज्ञानिक शरीरिक परिवर्तनों को सिर्फ सेक्स तक ही सीमित करके नहीं देखा जा सकता , इसके आफ्टर इफेक्ट्स का सामना क्या 16 साल की उम्र में किया जा सकता है।
सो मेनका गांधी जी ! सेक्स हार्मोन बनने की प्रक्र‍िया  तो सरकारी पैनल डिसाइड नहीं कर सकते ना ... मगर जो अनैतिक हो रहा है और सम्मानीय समाचार माध्यमों द्वारा किया जा रहा है, उसे रोक कर आप समाज में महामारी की तरह फैलती जा रही बलात्कार की घटनाओं से नई पीढ़ी को बचा अवश्य सकती हैं। उसे जबरन पढ़वाये जा रहे अश्लील विज्ञापनों से निजात दिला सकती हैं।
वेबहिट्स, सर्कुलेशन, विज्ञापन रेवेन्यू के लिए समाज और खासकर नई पीढ़ी को दीमक की तरह चाटने वालों का इलाज, सहमति से सेक्स की उम्र पर बतियाने से आगे जाकर करना होगा। आख‍िर तो आप महिला व बाल विकास दोनों के कल्याण वाला मंत्रालय संभाल रही हैं... और दोनों ही समाज में अश्लीलता फैलाने वालों के पहले श‍िकार बनते हैं। दीमक का ये रूप लाइलाज नहीं है, बस कुछ हिम्मतभरी गाइडलाइन्स की आवश्यकता है और जो माध्यम ऐसा कर रहे हैं, उन्हें समाज के प्रति जिम्मेदारी का अहसास करवाने की भी...।
प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेंस्ट सैक्सुअल ऑफेंसस (पोक्सो) और क्रिमिनल लॉ अमेन्डमेन्ट ऐक्ट (ऐन्टी रेप लॉ) भी तभी असरदार हो सकेंगे। ये युवाओं का जीवन है, कोई जापानी तेल के शोध का कारखाना नहीं।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

.... ताकि बची रहे जीवन में ऊर्जा

अधि‍कांश लोग जीवन में सब कुछ अपने मन के अनुसार करने के लिए अपनी बहुमूल्य ऊर्जा को नष्ट करते रहते हैं। जब ऐसा नहीं हो पाता तो मन व शरीर पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है, हावभाव बदल जाते हैं, ऐसे में तनाव होना निश्चित है। विपरीत असर को झेलने में मन व शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा व्यय करनी पड़ती है और यही ऊर्जा का ह्रास हमें शक्तिहीन बनाता है।
इस शक्तिहीनता की स्थ‍िति से बचने का एक ही उपाय है कि ऊर्जा का संचयन किया जाये। इसके लिए उन ऊर्जा स्रोतों को पहचानना होगा जो हमारे दैनंदिन उपयोगों में आते हैं ताकि संचयन के स्रोत हमें अपने आस-पास ही मिल सकें।
इस संचित ऊर्जा से न केवल शरीर शक्तिवान बनेगा बल्कि मन अपने आध्यात्मिक चरम को छू सकेगा , तनाव से जूझने का ये सबसे बेहतर उपाय है। 
इस सबंध में श्री श्री रविशंकर कहते हैं कि हमारे शरीर को ऊर्जा चार स्रोतों से प्राप्त होती है। पहला स्रोत भोजन होता है। भोजन का सेवन पर्याप्त मात्रा में होने से आपके शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है।
ऊर्जा का दूसरा स्रोत पर्याप्त मात्रा में नींद लेना है। पर्याप्त नींद से शरीर के अवयवों को प्राकृतिक विश्राम मिल जाता है ।
ऊर्जा का तीसरा स्रोत है ज्ञान। ज्ञान के  कारण ही हम किसी वस्तु, परिस्थिति, घटना और भावना से खुश या परेशान एवं दुखी नहीं होते। ज्ञान के अभाव में दुखी और अधिक ज्ञान होने से अहंकार के बढ़ने की पूरी पूरी संभावना रहती है।
ऊर्जा का चौथा व प्रमुख स्रोत श्वास है जो प्राण शक्ति या आत्मा व शरीर को ऊर्जा देती है।
श्वास के प्रति समय के साथ सजग हो जाना ही जीवन की कलात्मकता है और यही सकारात्मक जीवन जीने की पद्धति बन सकती है।
श्वास के आवागमन की स्थ‍िति को लेकर स्वामी विवेकानंद ने कहा भी है कि श्वास के संयमित रहने से मन की शक्ति सुदृढ़ होती है, जो कि शारीरिक ऊर्जा को संरक्षित करने व इसे मानसिक व आध्यात्मिक ऊर्जा में बदलने के काम आती है ।
वास्तव में हमारे शरीर का शक्तिगृह होता है मन, जो नसों के माध्यम से संकेत भेजता है और शरीर उसी के अनुसार कार्य करता है या प्रतिक्रिया करता है। हालांकि इसमें शरीर के बलों का भी योगदान रहता है। 'शरीर के बल' वे पदार्थ हैं जो हमारे अस्तित्व को भरते हैं और जो भोजन, पानी और हवा के माध्यम से चयापचय द्वारा रिचार्जिंग जारी रखते हैं।
अत: यदि हम शरीर की ऊर्जा को बचाना और जीवन को सुखी व समृद्ध बनाना चाहते हैं तो अपनी श्वास से उपजी ऊर्जा को बचाने की ओर ध्यान दें, जिससे न सिर्फ शरीर ऊर्जावान बने वरन मन भी आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाये। तनावमुक्त जीवन को जीने के लिए ऊर्जावान मन के साथ शरीर का ऊर्जावान होना अत्यंत आवश्यक है।

- अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 11 जून 2015

तो क्या इन हैवानों के लिए कोई कुछ नहीं बोलेगा

दुनिया से गुलामी प्रथा का खात्मा हुए 19वीं शताब्दी से अबतक न जाने कितने बदलाव आए और दुनिया को तरक्की के नए नए आयाम दे गए मगर आईएस के रोजाना के कारनामे हमें बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देते हैं कि क्या सचमुच यज़ीदी औरतों पर वे जो अपनी हैवानियत के प्रयोग कर रहे हैं,  उसका अंत क्या उनका सफाया कर देने भर से हो जाएगा । क्या उनके सफाए से वो ''मानसिकता'' भी खत्म हो जाएगी जो औरतों, लड़कियों और बच्चों के शरीरों पर अपना युद्ध लड़ती है। उनकी आत्मा रौंद कर अपने परचम फहराती है । 

विश्व के अन्य देशों की बात छोड़ दें , वो तो इस हैवानियत को सिर्फ देख रहे हैं , यूएन भी उन यज़ीदी औरतों की खबरों पर अपने उपदेश झाड़ रहा है मगर कोई कुछ नहीं कर रहा। और मीडिया की तो बात क्या कही जाए...?  औरतों के रोते हुए चेहरों से वे सब के सब भारी पैसा बना रहे हैं। उन औरतों के नुचे हुए शरीर के पीछे छुपी उनकी नुची हुई आत्मा को कोई न देख पा रहा है और न ही दिखा पा रहा है।

आज बस एक खबर भर है कि यौन हिंसा से जुड़े एक यूएन प्रतिनिध‍ि की रपट के अनुसार इराक और सीरिया से अपहृत किशोरियों को आईएस आतंकी गुलामों के बाजार में सिगरेट के एक पैकेट की कीमत पर बेच रहे हैं। इस रपट को तैयार करने वाले क्या बिल्कुल वैसा ही व्यवहार नहीं कर रहे जैसे कि कोई फोटो जर्नलिस्ट जलते हुए या डूबते हुए व्यक्ति से इंटरव्यू ले रहा हो... और उस फोटो से वो नाम कमाने की जुगत लगा रहा हो...। 

ये हकीकत अप्रैल में जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है जब यूएन के विशेष दूत जैनब बांगुरा इराक और सीरिया का दौरा कर लौटे । उन्होंने आईएस के चंगुल से जसतस छूटी किशोरियों और औरतों के मुंह से हृदयविदारक दास्तां सुनीं । लड़कियों ने बताया कि किसी भी क्षेत्र पर कब्जा करने के बाद आतंकी वहां की औरतों , लड़कियों को अपहृत कर लेते हैं फिर सरेआम उन्हें नहलाकर निर्वस्त्र या करके उनकी बोली लगाई जाती है , कभी कभी तो एक सिगरेट के पैकेट की कीमत या एक शर्त या फ‍िर कुछ डॉलर में उन्हें बेच दिया जाता है । तुर्की लेबनान जॉर्डन के श‍िविरों में इनकी दुदर्शा की कहानियां अटी पड़ी हैं। फिलहाल बांगुरा इन पर रपट तैयार कर रहे हैं, मगर रपट से उन औरतों और लड़कियों के दर्द को सुना तो जा सकता है मगर तब तक कितना दर्द उनमें बह चुका होगा , इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता ।

क्या आईएस के जुल्म के मारी औरतों की ये खबरें हमारे देश के इस्लामी हुनरमंदों तक नहीं पहुंच रहीं ?
भारत के उलेमा इस बावत बोलने में तंगदिली क्यों दिखा रहे हैं ?
कहीं ऐसा तो नहीं कि आईएस की मानसिकता से भारतीय इस्लामिक विद्वान भी इत्त‍िफाक रखते हों ?
भारतीय उलेमा आईएस की हैवानियत पर चुप्पी साध कर आख‍िर ज़ाहिर क्या कराना चाहते हैं ?
उनकी सोच क्या सिर्फ देश में सियासती फैसलों पर अपनी नाराजगी जताने तक स‍िमटकर रह गई है ?
शिया हों , सुन्नी हों, कुर्द हों, यज़ीदी हों ... कोई भी हों औरत तो औरत होती है , यौन अपराध किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता । इन अपराधों के नतीजतन जो बच्चे पैदा होंगे, आख‍िर उनकी मानसिकता कितनी घातक हो सकती है। जेनेटिक्स पर साइकोलॉजिकल इफेक्ट नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यहीं पर बात आ जाती है नैतिकता की, इंसानियत के पतन की,  इंतिहाई जहालत की ... मगर भारतीय इस्लामिक विद्वानों की इस बावत चुप्पी ठीक नहीं है।

बात बात पर अपना विरोध जताने जो लोग इलेक्ट्रानिक मीडिया का मुंह ताकते हैं , क्या वे दो शब्द भी आईएस के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं रखते ?

ये मजहब की कौन सी परिभाषा है जो शरीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बनाने से तो मना करती है मगर जुल्म के खि‍लाफ मुंह भी नहीं खोलती ?

भारत में तो योग पर भी बवेला कर देते हैं यही विद्वान... गोया कि उनके बच्चे कहीं नैतिक हो गए तो उनके चंगुल से निकल जाऐंगे ... मगर  इराक में जो हो रहा है उस पर चुप्पी इसके इस्लामिक ज्ञान पर प्रश्नचिन्ह लगाती है । यूं तो आईएस की सताई औरतों की आह स्वयं आईएस को तो देर सबेर खत्म कर ही देगी , मगर इस पर चुप्पी साधने वालों को भी  कठघरे में खड़ा करेगी जो मजहब की रोटी खाते हैं।
भारत अपने हाल ही के निर्णयों से विश्व के केंद्र में आया हुआ है । इस समय भारतीय इस्लामिक विद्वानों और अकीदतमंदों को इसका फायदा उठाते हुए आईएस के औरतों पर जुल्मों के खिलाफ एकजुट हो आगे आना चाहिए।  

निश्चति ही भारतीय इस्लामिक विद्वानों को इस बावत अपनी ओर से अंतर्राष्ट्रीय प्रयास करने चाहिए ताकि जुल्म करने वालों की अगली पीढ़ी हैवान बनने से बचाई जा सके। ये ज़हालत और जुल्म की इंतिहा है , इसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

जहालत और जुल्म के इस दौर पर अज़हर इनायती का एक शेर है बिल्कुल सही बैठता है -

जहाँ से इल्म का हम को ग़ुरूर होता है
वहीं से होती है बस इब्तिदा जहालत की

- अलकनंदा सिंह  

सोमवार, 8 जून 2015

बहती गंगा है हाथ धोने से भी बाज आयें क्या...?

कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में में स्वस्थ दिमाग बसता है और स्वस्थ दिमाग से स्वस्थ चरित्र की स्थापना की होती है जिससे स्वस्थ समाज का निर्माण होता है और स्वस्थ रहने के लिए किसी भी धर्म व संप्रदाय में कोई बंदिशें नहीं लगाई गईं। फ‍िर क्यों योग दिवस मनाने को लेकर इतनी खींचातानी हो रही है। 21 जून को यदि देश अपनी इस थाती को दुनिया के सामने प्रदर्श‍ित करके जीवन के लिए अमूल्य निध‍ि 'स्वास्थ्य' के प्रति अपनी गंभीरता को प्रगट करता है या इसके जरिये राष्ट्रवाद का संदेश देता है तो उसमें गलत क्या है।
खुद को हेय दृष्ट‍ि से देखकर महान नहीं  बना जा सकता। तथाकथ‍ित समाजवाद के नाम पर भारतीय जनमानस में जो अभी तक यह धारणा बैठा दी गई कि यदि हम अपने प्राचीन महात्म्य की बात कर रहे हैं तो वह हिंदूवादी है या फ‍िर पुरातन पंथी, इस ग्रंथ‍ि से निकलना होगा। इस ग्रंथ‍ि से निकलने की कोश‍िश ही तो है कि अाज योग सिर्फ भारत का ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजि‍त होने जा रहा है।  
जनसांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार इस समय देश में युवाओं का प्रतिशत ज्यादा है और युवाओं के कंधे पर चढ़कर हम अगली सदी में देश को सर्वोच्च स्थान तक ले जाने की कामना करते हैं। ऐसे में उनके कंधों को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी किसकी है। क्या शारीरिक, मानसिक व चारित्रिक रूप से अस्वस्थ और न‍िर्बल पीढ़ी के सहारे हम देश को आगे ले जाने का स्वप्न पाल रहे हैं।
भारत जैसे युवा देश को अच्छे स्वास्थ्य के ओर ले जाना पूरे के पूरे समाज को स्वस्थ बनाना है। कुछ वर्षों पहले तक योग को लगभग भुला दिया गया था। सुबह की सैर व प्राणायाम  से लेकर व्यायाम और अखाड़ों की ओर जाने वाले युवाओं को पिछड़ा समझा जाने लगा। बाबा रामदेव के प्रात: कालीन टीवी ने  सामूहिक रूप से यदि योग को इतनी व्यापकता में लोगों तक न पहुंचाया होता तो आज भी हम योग के सामान्य से लाभों से भी अपरिचित ही होते। यह अलग बात है कि बाबा रामदेव की बात करते ही लोग उनकी व्यापारिक गत‍िविधि‍यों पर बात करने लगते हैं और उनके मूल प्रयासों को भूल जाते हैं। ऐसा नहीं था कि बाबा रामदेव से पहले योग देश में किया नहीं जा रहा था मगर उसे आमजन तक लाने का श्रेय तो बाबा को ही जाता है।
योग सिर्फ शरीर का ही नहीं मन का भी व्यायाम है और मन चाहे हिंदू का हो या मुसलमान का, स्वस्थ रहने का अधिकार तो हर व्यक्ति का है। कुछ लोगों द्वारा बवाल मचाया जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सूर्यासन करने की इजाज़त उनका धर्म नहीं देता। न जाने कहां कहां से अज़ान, वजू और आयतों के उदाहरण दिये जा रहे हैं कि अल्लाह के अलावा हम किसी के आगे सर नहीं  झुकाते जबकि सूर्य नमस्कार में पहला आसन ही सूर्य के सामने सज़दा करना है।
अगर धार्मिक दृष्टि से कहा जाये तो कोई ज़रा इन लकीर के फकीरों से पूछे कि जब सारी कायनात के ज़र्रे ज़र्रे में अल्लाह है तो सूर्य क्या उस कायनात का हिस्सा नहीं है । और यदि सामाजिक दृष्टि से देखें तो जो आज सूर्य नमस्कार को धर्म पर हमले के रूप में देख रहे हैं, वे यह भी तो बतायें कि स्वयं उन्होंने कुरान के नाम पर पूरे समाज की अस्वस्थता और मानसिक पिछड़ेपन के लिए क्या क्या कर दिया ... । क्या उन्होंने इस्लाम को इतना कमजोर और लाचार समझ रखा है जो एक स्वस्थ राष्ट्र की परिकल्पना में वह सबके साथ नहीं आ सकता। ये लोग सज़दे की बात कहकर बस विरोध करने के लिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि ये अच्छी तरह जानते हैं कि इसी तरह वे लाइमलाइट में आ सकते हैं, मीडिया में छा सकते हैं, इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को बाइट दे सकते हैं, सारी जिंदगी निकल गई जिनकी गली मोहल्लों में, वे भला क्योंकर ये मौका चूकें, बहती गंगा है हाथ धोने से भी बाज आयें ...?
पूरे विश्व में इस्लाम के नाम पर अपनी घ‍िनौनी हरकतों से जिस आईएस ने पूरे धर्म को संदेह के घेरे में ला दिया है, उस पर यही ठेकेदार कुछ कभी नहीं बोलते जबकि अपने बच्चों से स्वस्थ रहने का एक आसान सा तरीका भी इनसे बर्दाश्त नहीं हो रहा। इस्लाम की आख‍िर इतनी अलग-अलग सी परिभाषाएं क्यों हैं। निश्चित ही धर्म के नाम पर और विरोध के हथकंडों से ये उस पूरी युवा पीढ़ी के सामने ऐसे उदाहरण रख रहे हैं जो उन्हें राष्ट्र के साथ खड़ा होने से वंचित करेगा।
यह  सब भी तब हो रहा है जब ईरान और अफगानिस्तान व इंडोनेशिया जैसे खालिस मुस्लिम देशों में योग को राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जा रहा है। इस्लाम के भारतीय अलम्बरदार क्या अब ये बताने की जहमत उठायेंगे कि आख‍िर उक्त तीनों देश इस्लाम और इबादत की जो नाफरमानी कर रहे हैं, उनके लिए इनके पास क्या उपदेश हैं?
चूंकि ये सरकार बीजेपी की है तो सरकार के हर कदम पर उन्हें विरोध का अवसर मिल रहा है और अपनी तवज्जो को कैश करने का मौका भी वरना पिछली सरकारों में कोई मुद्दा ही कहां था मीडिया में छाने का... ।
बहरहाल,  योग के ज़रिये पूरे विश्व के स्वास्थ की कामना एक वृहद सोच वाला देश ही कर सकता है और जो लोग इसमें अपने अपने अड़ंगे लगा रहे हैं, वो देश के साथ साथ देशवासियों और खासकर अपनी युवा पीढ़ी को संस्कारों व उनके अच्छे स्वास्थ से वंचित रखना चाहते हैं, इसके अलावा और कुछ नहीं ।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है क‍ि ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे कि वे राष्ट्र के लिए सोच सकें क्योकि इन्हें ही सबसे ज्यादा जरूरत है प्रणायाम की और सकारात्मक सोच की भी। 
- अलकनंदा सिंह