गुरुवार, 30 जुलाई 2015

गुरू पूर्ण‍िमा पर विशेष - हमारी तो आध्यात्मिक परंपरा में ही हैं गुरू का स्थान

'तत्व मसि श्वेतकेतोः' अर्थात्  'तू ही वह चिदानंद ब्रह्म है' कहकर आरुणी ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को जो ब्रह्म विद्या संबंधी आख्यान सुनाया वह और कुछ नहीं अपने शि‍ष्य पर पड़े अज्ञान का आवरण हटाने का एक गुरुमंत्र था।
इसी तरह कठोपनिषद् की वल्लियों में गुरू के रूप में यम एवं शिष्य के रूप में बैठे नचिकेता का आपसी संवाद पंचाग्नि विद्या के रूप में हमारे सामने आया , तब से अब तक उपनिषदों के माध्यम से चली आ रही  यह ज्ञान देने और गृहण करने की परंपरा ने गुरू के पद को शाश्वत घोष‍ित कर दिया।
ये मात्र दो उदाहरणभर हैं जो यह बताते हैं कि किसी जिज्ञासु श‍िष्य की जिज्ञासा शांत करके न केवल श‍िष्य की बल्कि स्वयं गुरू की श्रेष्ठता भी सिद्ध होती है।

हमारी सांस्कृतिक परम्परा रही है जिसमें जिज्ञासु शिष्य की जिज्ञासा का समाधान एक ऐसी गुरूसत्ता करती है जिसने स्वयं उसका अपने जीवन में साक्षात्कार कर लिया हो।

गुरु-शिष्य परम्परा के कारण ही उपनिषद काल की ज्ञानसंपदा का संरक्षण श्रुति के रूप में क्रमबद्ध हो पाया। इस परंपरा के अंतर्गत समर्पण भाव , अहंकार को गला कर ज्ञान प्राप्ति के अनेक उदाहरण शास्त्रों में दिए गए हैं। सुकरात व उनके शिष्य प्लेटो तथा प्लेटो के शिष्य एलेक्जेंडर एवं गुरजिएफ व आस्पेन्स्की की परम्पराएँ तो बाद में आईं जबकि हमारे देश में आदिकाल से ही यह परम्परा चली आयी है कि गुरु अपने ज्ञान द्वारा उचित पात्र समझे गए शिष्य पर पड़े अविद्या-अज्ञान के पर्दे को हटाएँ व उसका उँगली पकड़ कर मार्ग दर्शन करें।

गुरु कौन हो व कैसा हो-  
'विशारदं ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं गुरुकाश्रयेत्'-  'श्रोत्रिय' अर्थात् जो श्रुतियों से शब्द ब्रह्म को जान सके , उनका तत्व समझ सके, 'ब्रह्मनिष्ठ' अर्थात् आचरण से श्रेष्ठ व ब्राह्मण जैसा ब्रह्म में निवास कर परोक्ष साक्षात्कार कर चुका हो तथा 'विशारद' अर्थात् जो अपने आश्रय में शिष्य को लेकर उस पर शक्तिपात करने की सामर्थ्य रखता हो। 
गुरू के लिए संत ज्ञानेश्वर ने भी गीता की भावार्थ दीपिका में लिखा है कि “यह दृष्टि (गुरु की दृष्टि) जिस पर चमकती है अथवा यह करार विन्दु जिसे स्पर्श करता है वह होने को तो चाहे जीव हो, पर बराबरी करता है महेश्वर-श्रीशंकर की”।

गुरु मानवी चेतना का मर्मज्ञ माना गया है। वह शिष्य की चेतना में उलट फेर करने में समर्थ होता है। गुरु का हर आघात शिष्य के अहंकार पर होता है तथा वह यह प्रयास करता है कि किसी भी प्रकार से डाँट से, पुचकार से, विभिन्न शिक्षणों द्वारा वह अपने समर्पित शिष्य के अहंकार को धोकर साफ कर उसे निर्मल बना दे। प्रयास दोनों ओर से होता है तो यह कार्य जल्दी हो जाता है नहीं तो कई बार अधीरतावश शिष्य गुरु को समझ पाने में असमर्थ हो भाग खड़े होते हैं।
हमारी आध्यात्मिक परम्परा गुरु प्रधान ही रही है। इसी परम्परा के कारण साधना पद्धतियाँ भी सफल सिद्ध हुईं। सदैव गुरुजनों ने अपने जीवन के सफल प्रयोगों का सुपात्र साधकों के ऊपर रिसर्च लैबोरेटरी की तरह परीक्षण किया है। उन्हें श्रेष्ठ देवमानव बनाने का प्रयास किया है। गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

गुरू की श्रेष्ठता के साथ शिष्य में गुरु के प्रति श्रद्धा भी उतनी ही आवश्यक है। सामान्यतया व्यक्ति का मन बिखराव लिए होता है। चित्त वृत्तियाँ लोकद्वेषों में रुचि लेने के कारण बिखरी होती हैं। इसी बिखराव को समेट कर मन को समग्र बना लेना-महानता की ओर मोड़ लेना ही श्रद्धा है। इस मन को 'इन्टीग्रेटेड माइण्ड' कहा गया है। समग्रता के संग श्रद्धायुक्त मन से जब संशय मिट जाए तब  गुरू के प्रति पूर्ण समर्पण-विसर्जन-विलय-तादात्म्य हो जाता है। निश्चय ही गुरु-शिष्य संबंध इसी स्तर के आध्यात्मिक होते हैं जिनमें उच्चस्तरीय आदान-प्रदान होता है।जहां एक ओर शिष्य अपनी सत्ता को, अहं को गुरु के चरणों में समर्पित करता है वहीं दूसरी ओर गुरु आध्यात्मिक शक्ति द्वारा उसे ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी बनाकर जीवन मुक्त कर देता है।

- अलकनंदा सिंह