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गुरुवार, 1 जनवरी 2026

इन आठ कव‍िताओं से करें नववर्ष का स्वागत.. देश और व‍िदेश के कव‍ियों की रचनाओं का कलेक्शन


 नए की पर‍िभाषा क्या है, मुझे नहीं मालूम क‍ि इसे कैसे परि‍भाष‍ित करूं। सोचती हूं क‍ि जो बीत गया उसके बासीपन की बात करूं या जो अभी अभी आया है उसकी ताजगी पर कुछ ल‍िखूं ..तो क्या इतनाभर करने से नए को पर‍िभाष‍ित कर पाऊंगी... संभवत: नहीं.. क्योंक‍ि यह एक अहसास है जो नवागत से जुड़ी अनेक संभावनाओं पर ट‍िका है... इन्हीं संभावनाओं पर हमारे देश और व‍िदेश के कव‍ियों ने जो कुछ ल‍िखा, उसका कलेक्शन यहां नए साल पर अपने-अपने मायने दर्ज कराता हुआ द‍िखता है। तो आइये उन्हीं की नज़र से करें स्वागत नवागत का... 


कुछ आठ कव‍िताओं को मैंने नववर्ष के स्वागत के ल‍िए चुना है। 

1. नववर्ष का सर्वप्रथम कव‍ि सोहनलाल द्व‍िवेदी की कव‍िता से  2026 का स्वागत करें - 

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, नूतन-निर्माण लिये, 
इस महा जागरण के युग में 
जाग्रत जीवन अभिमान लिये; 

दीनों दुखियों का त्राण लिये 
मानवता का कल्याण लिये, 
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष! 
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति 
संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति 
की ज्वालाओं के गान लिये, 
मेरे भारत के लिये नई 
प्रेरणा नया उत्थान लिये; 

मुर्दा शरीर में नये प्राण 
प्राणों में नव अरमान लिये, 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

युग-युग तक पिसते आये 
युग-युग तक पिसते आये 
कृषकों को जीवन-दान लिये, 
कंकाल-मात्र रह गये शेष 
मजदूरों का नव त्राण लिये; 

श्रमिकों का नव संगठन लिये, 
पददलितों का उत्थान लिये; 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के 
सत्ताधारी साम्राज्यवाद के 
मद का चिर-अवसान लिये, 
दुर्बल को अभयदान, 
भूखे को रोटी का सामान लिये; 

जीवन में नूतन क्रान्ति 
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये, 
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!

2. दूसरे नंबर पर प्रकृत‍ि का संपूर्ण च‍ित्र उकेरती कव‍ि जगदीश व्योम की 'नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन' को पढ़ें ... अच्छा लगेगा 

आमों पर खूब बौर आए
भंवरों की टोली बौराए
बगिया की अमराई में फिर
कोकिल पंचम स्वर में गाए
फिर उठें गंध के गुब्बारे
फिर महके अपना चन्दन वन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !

गौरैया बिना डरे आए
घर में घोंसला बना जाए
छत की मुंडेर पर बैठ काग
कह कांव-कांव फिर उड़ जाए
मन में मिसिरी घुलती जाए
सबके आंगन हों सुखद सगुन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!

बच्चों से छिने नहीं बचपन
बच्चों से छिने नहीं बचपन
वृद्धों का ऊबे कभी न मन
हो साथ जोश के होश सदा
मर्यादित बनी रहे फैशन
जिस्मों की यूं न नुमाइश हो
बदरंग हो जाए घर आंगन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!

घाटी में फिर से फूल खिलें
फिर स्त्री के शिकारे तैर चलें
बह उठे प्रेम की मन्दाकिनी
हिम-शिखर हिमालय से पिघलें
सोनी मचले, महिवाल चले
रांझे की हीर करे नर्तन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !


विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
पर चले शांति के ही पथ पर
हिन्दी भाषा के पंख लगा
कम्प्यूटर जी पहुंचें घर-घर
वह देश रहे खुशहाल `व्योम'
धरती पर जहां प्रवासी जन

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !

3. तीसरे नंबर पर मैं सुप्रसिद्ध रूसी कवयित्री अन्ना अख्मातोवा की रचना देना चाहूंगी-  'नए साल का गीत' ज‍िसे बीसवीं सदी की वैश्विक कविता के प्रमुख स्वर के रूप में समादृत क‍िया गया। इसे कांता द्वारा ह‍िंदी में अनुवादि‍त कर 'पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव' के रूप में हमें सुलभ कराया गया। इसी संकलन से ली हुई नवर्ष पर ल‍िखी उनकी रचना  ये रही ...। 

बादल की छाया में थका चाँद,
धुँधली डालता है निगाह

पहाड़ी पर।
छह जनों के लिए लगी थी मेज़,

और ख़ाली थी सिर्फ़ एक जगह।
नए साल को आते देख रहे हैं

मेरे पति, मैं, और मेरे दोस्त।
रँगी हैं क्यों मेरी उँगलियाँ

जैसे ख़ून से?
ज़हर की तरह जलती क्यों शराब?

आकर्षक—जग—उठा मेज़बान
भरा हुआ ले कर गिलास।

पीता हूँ मैं धरती के लिए—
हमारे अपने वन क्षेत्रों से भरी—

स्थित हैं हम सब जहाँ।
एक दोस्त ने देखा मेरा चेहरा,

सहसा किया कुछ याद, प्रभु जाने, क्या,
और बोला ज़ोर से :

पीता हूँ मैं उसके गीतों के लिए,
जीवित हैं हम सब जिन में।

किंतु वह तीसरा, समझे बिना,
जैसे ही निकला बाहर अँधेरे में,

मेरे सोच का देते हुए जवाब, बोला :
पीना चाहिए हमें उसके लिए,

अभी तक नहीं है जो हमारे साथ।

4. चौथा नंबर आता है तेलुगू कव‍िता 'मन्मथावाहन' का... ज‍िसे रायप्रोलु वेंकट सुब्बाराव ने ल‍िखा और इसका ह‍िंदी में अनुवाद क‍िया है हनुमच्छास्त्री अयाचित ने ज‍िसे ' साहित्य अकादेमी' द्वारा पुस्तक : भारतीय कविता 1954-55 में प्रकाश‍ित गया।  

हनुमच्छास्त्री अयाचित (Hanumachchastri Ayachit) एक विद्वान और लेखक थे, जिन्होंने तेलुगु भाषा और साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया, खासकर हिंदी में 'तेलुगु और उसका साहित्य' नामक पुस्तक लिखी, जो तेलुगु साहित्य का एक परिचयात्मक अध्ययन है, जिसमें उन्होंने स्वयं को 'हनुमच्छास्त्री, अयाचित' के रूप में प्रस्तुत किया है।

तो लीज‍िए ये रही नववर्ष पर ल‍िखी 'मन्मथावाहन'-  

हे प्रभु!
हे नववर्ष मन्मथ!

इस नव वर्षारंभ के उत्सवों में
हमारे मनोरथ जब मधु मार्ग पर अग्रसर होते हैं,

तब प्रेम के साथ हम तुम्हारा आमंत्रण कर रहे हैं।
आओ न!

सरोवर की लहरों रूपी शीतल शय्याओं पर
झूमने वाले कमलों को भ्रमर-कन्याएँ

इस उष:काल में मंगलकारी काकली ध्वनियों से जगा रही है।
रसालों के अरुण पल्लव समूह

चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं
और इस समय मदमाते कोकिल

अपने मधुर कंठों से कलनाद की वर्षा
करते हुए झूम रहे हैं।

वन नटी के चरणों में जूही के फूल
ऐसी शोभा दे रहे हैं, मानो नवनीत के घुँघरू हों।

अशोक-पुष्पों से शोभित पृथ्वी पर
चैत्र पर्व के रसमय भोजन से आलसी बने हुए शुकों की

श्रुतिमधुर ध्वनियाँ
सरल कोमलता के साथ सुनाई दे रही है।

5. अब आते हैं पांचवें नंबर पर शानदार रचनाकार हरिवंशराय बच्चन पर... हालांक‍ि आज की ये उद्धृत रचना फ़ारसी कवि उमर ख़य्याम की रुबाइयों (चार पंक्तियों वाली कविताओं) से प्रेरित होकर लिखी थी, जहाँ 'मधुशाला' जीवन की अस्थिरता और क्षणभंगुरता के बीच प्रेम, ज्ञान और आनंद खोजने का प्रतीक बन जाती है, जिसमें मदिरा, साकी (परोसने वाला), प्याला और मधुशाला (शराबखाना) जीवन के दर्शन के रूपक हैं। पुस्तक का नाम : ख़य्याम की मधुशाला भाग 4 में उन्होंने नववर्ष पर कुछ यूं ल‍िखा- 

नई तरु-आभा, नवल समीर

जनाते, आया नूतन वर्ष,
जर्जरित इच्छाएँ भी आज

पा रहीं यौवन का उत्कर्ष।
मनीषी भोग रहे एकांत,

एक मधुऋतु उनके भी पास—
ज्वलित कर मूसा का तरु-ज्योति,

समीरण ईसा का उच्छवास।

6. छठवें नंबर पर मैंने बाबा नागार्जुन को रखा है- 'चंदू, मैंने सपना देखा ' शीर्षक से ल‍िखी गई ये कव‍िता नव वर्ष पर न पढ़ी जाये , ऐसा हो नहीं सकता। नामवर सिंह के संपादन में प्रतिनिधि कविताएँ के (पृष्ठ 46) पर बाबा ने चंदू के माध्यम से गागर में सागर भर द‍िया। 

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेक़ाबू

चंदू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, ख़ूब पतंगें लूट रहे हो

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर

चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो

चंदू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो

चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

7. सातवें नंबर पर राजस्थानी साहित्य में आधुनिक कहानी के प्रमुख हस्ताक्षर माने जाने वाले पेशे से शिक्षक रहे श्री साँवर दइया ने नव वर्ष पर पूरे 365 द‍िनों में हर रोज का बखान क‍ितने साधारण शब्दों में कहा है। आधुनिक भारतीय कविता संचयन राजस्थानी (1950-2010) (पृष्ठ 88) से ली गई ये रचना देख‍िए ज़रा---


पलस्तर उतरती दीवार पर

लटकाया जब नया कैलेंडर
छाती के सामने आकर खड़े हो गए

तीन सौ पैंसठ दिन।
मेरी / रोज़ छुलती साँस जानती है

कैसे कटता है एक-एक दिन
पिछले साल / न होली-दीवली लापसी

न सावन में सातू / ऋतुएँ बदलीं
और हमने भोगे परिणाम

मुट्ठी भर लोगों की / झूठी बातों में आया
वह हरामी का हाड़—हर्ष

कभी नहीं आकर खड़ा हुआ मेरे आँगन में
आज से फिर / मैं हूँ

और सामने हैं / ये तीन सौ पैंसठ दिन! 

8. आठवें नंबर पर रफ़ीक़ शादानी की पुस्तक 'जियौ बहादुर खद्दरधारी' के (पृष्ठ 39) से ली गई  ये रचना ''नवा साल आवा'' आपको गुदगुदाने के अलावा गहरा तंज़ करते हुए नए साल का नया पर‍िचय देती है। 

आँधी चली केतना भूचाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा

मनुस अपने अस्थान से हटि गवा जब
मुसाफिर कय गठरी गला कटि गवा जब

डकैती कय सामान सब बँटि गवा जब
पता नाहीं केहिकै टरंकाल आवा

तब जाइके ई नवा साल आवा।
सगरी बुराइन कय हद होइ गई जब

गरीबी कय फरियाद रद होइ गई जब
इन्सानियत केर भद होइ गई जब

स्वागत करै का जौ चंडाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।

असली भगत जौ करै तोर पूजा
ओका मिलै खाय का आलू भूजा

पंडित औ मुल्ला कय हय काम दूजा
वनहीं के हिस्से मा तर माल आवा

तब जाइके ई नवा साल आवा।
जाड़े कय मौसम दुहाई-दुहाई

बिलोकी मियाँ खाँय मुर्गा मलाई
नेता के कमरे मा गद्दा रजाई

सायर के हिस्से मा तिरपाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।

नववर्ष की शुभकामनाओं संग आज बस इतना ही... रील और मीम के इस ड‍िज‍िटल युग में इन्हीं शानदार रचनाओं के साथ व‍िचारों को बनाए रख‍िए... ।

- अलकनंदा स‍िंंह 

मंगलवार, 6 जुलाई 2021

इस षडयंत्र का भी इलाज़ होगा मगर धीरे धीरे


 मैक्सिकन कवि जोस इमिलिओ पाचेको की एक कव‍िता है “दीमकें” ज‍िसमें पाचेको ने दीमक का एक “हथ‍ियार” की तरह प्रयोग बखूबी बताया है। कव‍िता इस प्रकार है-

और दीमकों से
उनके स्वामी ने कहा —
नीचे गिरा दो उस घर को।

और वे
लगातार जुटी हुई हैं
इस काम में
जाने कितनी ही पीढ़ियों से,
सूराख़ बनातीं,
अन्तहीन खुदाई में तल्लीन।

किसी दुष्टात्मा की तरह
निर्दोषिता का स्वांग किए,
पीले मुँह वाली चीटियाँ,
विवेकहीन, गुमनाम दास,
किए जा रही हैं
अपना काम
दायित्व समझ कर,
फ़र्श के नीचे
किसी वाहवाही
या शाबासी की
अपेक्षा किये बिना ही।

उनमें से हर एक
सन्तुष्ट भी है,
अपना बेहद मामूली
पारिश्रमिक लेकर।

पूरी की पूरी कव‍िता आज हमारे देश के उन चौतरफा दुश्‍मनों पर एकदम सटीक बैठती है ज‍िन्‍हें देश में हर हाल में अशांत‍ि, अस्‍थ‍िरता, लाचारी और वैमनस्‍यता, आतंकवाद को फैलाने का लक्ष्‍य द‍िया जा रहा है। मैंने लक्ष्‍य की बात इसल‍िए की क्‍योंक‍ि कश्‍मीर में धारा 370 हटने के बाद सीएए का व‍िरोध, द‍िल्‍ली में दंगे से लेकर मतांतरण तक हर मिलती कड़ी बता रही है क‍ि ये एक सोची समझी वो साज‍िश थी जो सामने आती गई परंतु इस साज‍िश की दीमकें अपने लक्ष्‍य में अब भी लगी हैं। जहां उनके सुबूत मि‍ल रहे हैं, वहां सफाई हो रही है परंतु जहां वे नज़र नहीं आ रहीं वहां खतरा बरकरार है। सरकारें व सुरक्षा एजेंस‍ियां तो लगी ही हैं अपने प्रयास में, परंतु नागर‍िक के तौर पर सावधान तो हमें भी रहना होगा। फि‍लहाल दो खबरें ऐसी हैं जो इन दीमकों के मूल षड्यंत्र को सामने ला रही हैं, इत्‍तेफाकन दोनों ही खबरों का मास्‍टरमाइंड “इंटरनेशनल मीड‍िया” है और बतौर भारतीय पत्रकार ये हमारे ल‍िए शर्म की बात है क‍ि हमारे देश के कुछ मीड‍िया संस्‍थान भी इनके सहयोगी की भूम‍िका में है। हां, खुशी की बात ये है क‍ि इस षड्यंत्र का खुलासा भी हो रहा है।
बीबीसी, न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स, हफ़िंगटन पोस्ट, वाशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल ने तो बाकायदा भारत की मौजूदा सरकार के ख‍िलाफ अभ‍ियान चला रखा है। ये मीड‍िया द्वारा पर‍िभाष‍ित कथ‍ित उदारवाद का वो घोर कट्टरवादी चेहरा है जि‍स पर आम नागर‍िक आंख मूंदकर व‍िश्‍वास करते रहे हैं।

हाल ही में चाइना डेली को लेकर एक स्वतंत्र विश्लेषक की रि‍पोर्ट जारी हुई है, ज‍िसमें बताया गया है कि‍ चाइना डेली ने पिछले छह महीनों में अमेर‍िका के प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को लाखों डॉलर का भुगतान किया। ज‍िन संस्‍थानों को भुगतान क‍िया गया उनमें टाइम पत्रिका, विदेश नीति पत्रिका, द फाइनेंशियल टाइम्स, लॉस एंजिल्स टाइम्स, द सिएटल टाइम्स, द अटलांटा जर्नल-संविधान, द शिकागो ट्रिब्यून, द ह्यूस्टन क्रॉनिकल और द बोस्टन, वाशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल हैं, ज‍िन्‍हें पेड न्‍यूज़ की भांत‍ि खबरें देनी थीं और उन्‍होंने दीं भी। इन सभी खबरों की थीम ही मोदी व‍िरोध था और इन सभी समाचार पत्रों में छपने व भारी मात्रा में धन म‍िलने के कारण तमाम भारतीय पत्रकार भी अपनी भड़ास न‍िकालने लगे, वो भी ब‍िना ये सोचे समझे क‍ि वे दरअसल पीएम मोदी का नहीं देश का व‍िरोध कर रहे हैं।


न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने तो हद ही कर दी, उसने तो सीधा एक व‍िज्ञापन पत्रकारों की भर्ती के ल‍िए ऐसा न‍िकाला ज‍िसमें व‍िशेषज्ञता के तौर पर पीएम मोदी को लेकर “अलोचनात्‍मक लेख” ल‍िखना ही योग्‍यता का आधार रखा गया। बहरहाल, व‍िदेशी अखबारों में पैसा चाहे चाइना डेली दे या कोई और, वे मोदी व‍िरोधी लेख ल‍िखकर देश के व‍िश्‍वास पर आघात करें या धर्मांतरण करवाकर सामाज‍िक ढांचे को ब‍िगाड़ने में लगें, मगर अब इतना तय है क‍ि हमारी व्‍यवस्‍था में लगी दीमकों का अब चुनचुनकर सफाया क‍िया जाएगा, चाहे वो खुद को क‍ितना भी तुर्रम खां क्‍यों ना समझ रही हों क्‍योंकि हर छद्मयुद्ध के ल‍िए अलग पेस्‍टीसाइड होता है।

इसीलिए कवि जोस इमिलिओ पाचेको की रचना आज भी उतनी ही प्रासंग‍िक है जो सिर्फ अपना अलग पेस्‍टीसाइड खोज रही है, बस।

- अलकनंदा स‍िंंह


सोमवार, 10 मई 2021

‘पाखंड की प्रत‍िष्ठा’ से वैक्सीन पर प्रोपेगंडा जीवि‍यों के मंसूबे…


कव‍ि जयशंकर प्रसाद की एक कव‍िता है ‘पाखंड की प्रत‍िष्ठा’, इस कविता के माध्‍यम से उन्होंने भलीभांत‍ि बताया है क‍ि क‍िस तरह कोई पाखंडी अपने देश, अपनी संस्कृत‍ि तथा आमजन का जीवन दांव पर लगा कर उन्हें त्राह‍ि-त्राह‍ि करते देख आनंद‍ित होता है। कव‍िता में कहा गया है क‍ि –

स्मृतियों के शोर में अब से मौन मचाया जायेगा,
धुर वैचारिक अट्टहास में सुस्मित गाया जायेगा,
कुंठा के आगार में किंचित मुक्ति बांधी जाएगी,
भय आच्छादित मेड़ लगाकर प्रेम उगाया जायेगा.

स्वतंत्रता से पहले हो या उसके बाद हमारे देश में सदैव से ऐसे तत्व मौजूद रहे हैं ज‍िन्हें स‍िर्फ और स‍िर्फ अपने प्रोपेगंडा से वास्ता रहा, फ‍िर चाहे इसकी कीमत आमजन को भले ही क्यों ना चुकानी पड़ी हो। ऐसी ही पूरी की पूरी एक जमात अब वैक्सीन पर हायतौबा कर रही है। इस जमात ने पहले वैक्सीन न‍िर्माण पर और अब इसके न‍िर्यात पर बावेला मचा रखा है क‍ि… वैक्सीन का न‍िर्यात रोको।

पत्रकार तवलीन स‍िंह ने तो पीएम नरेंद्र मोदी को ‘नीरो’ ही बना द‍िया, जो ”स‍िर्फ अपनी छव‍ि व‍िदेशी नेताओं के समक्ष” चमकाने में लगे हैं और इसील‍िए वैक्सीन न‍िर्यात की जा रही है। वकील प्रशांत भूषण ने कहा क‍ि प्राकृतिक रूप से ही खत्म हो रहा है कोरोना संक्रमण, तो फ‍िर निजी वैक्सीन कंपनियों को सरकारी मदद क्यों।

इन प्रोपेगंडा जीवि‍यों को सोशल मीडि‍या पर लाखों लोग फॉलो करते हैं। वैक्सीन न‍िर्यात पर हायतौबा मचाने से पहले इन्होंने वैक्सीन लगाने को लेकर भी डर फैलाया, लोगों को गुमराह किया, वैक्सीन की दक्षता पर प्रश्न खड़े किए ज‍िससे लोगों के मन में शंका पैदा हुई। जब टीकाकरण शुरू हुआ तो इन लोगों ने सबसे पहले जाकर वैक्सीन का डोज लिया और फ्री में वैक्सीन उपलब्ध कराने की माँग करने लगे। चुपके से अपना वैक्सीनेशन कराने वाले पत्रकार संदीप चौधरी हों या कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य और पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी, इन्‍होंने भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के ख‍िलाफ अभ‍ियान चला रखा है।

अब बात करते हैं वैक्सीन न‍िर्यात की, क‍ि अपनी जरूरतें पूरी करने के साथ-साथ हमारे लिए इसका न‍िर्यात क्यों जरूरी है। भारत ने अपने ‘वैक्सीन मैत्री’ कार्यक्रम के जरिए करीब 83 देशों को स्‍वदेशी कोरोना वैक्सीन भेजकर मदद की। दूसरे देशों को टीकों की आपूर्ति करना अपने देश में पर्याप्त उपलब्धता होने पर ही संभव है। इसकी लगातार निगरानी एक सशक्त समिति कर रही है। इसके अलावा भारत को वैक्सीन निर्माण के लिए कच्चा माल आयात करना पड़ता है, दुनिया भर से कच्चा माल लेकर हम वैक्सीन निर्यात पर रोक नहीं लगा सकते।

ये प्रोपेगंडाजीवी जानबूझकर इस तथ्य को छ‍िपा रहे है क‍ि वैश्व‍िक साझा सहयोग की नीत‍ि के तहत अन्तर्राष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने के नतीजे क्या हो सकते हैं? इसील‍िए कोरोना की दूसरी लहर के न‍िपटने को दूसरे देशों से लगातार मदद ऑफर की जा रही है। सार्वभौम है क‍ि शक्त‍ि हो तो सब साथी होते हैं… वैक्सीन प्रकरण पर भारत यही नीत‍ि अपना रहा है और आज जो ऑक्सीजन व दवाइयों की खेप की खेप भारत आ रही है, वह भी इसी का पर‍िणाम है। यूं भी कॉमर्शियल ऑब्लिगेशन को तोड़ना आसान नहीं होता।

वैक्सीन निर्यात से नुक्सान पर रोने वालों के ल‍िए तो मैं पुन: कव‍ि जयशंकर प्रसाद की उसी कव‍िता को उद्धृत करना चाहूंगी क‍ि –

स्मृतियों के शोर में अब से मौन मचाया जायेगा

कलम थमा दी जाएगी अब विक्षिप्तों के हाथों में,
मन का मैल… कलम से बहकर… सूखे श्रेष्ठ क़िताबों में,
चिंतन के विषयों में विष का घोल मिलाया जायेगा,
ले लेकर चटकार कलेजा मां का खाया जायेगा।

तो शपथ लें क‍ि हम भारत मां का कलेजा चीरने वाले ऐसे बुद्ध‍िजीव‍ियों की असली सूरत सामने लाते रहेंगे।
– अलकनंदा स‍िंंह