बुधवार, 23 सितंबर 2026

साहिल वाकोडे मामला.... आज न्याय से पहले मुआवजे की भूख हावी हो चुकी है

 


आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे के पिता रविंद्र वाकोडे का यह बयान पूरे तंत्र की आंखें खोलने के लिए काफी है, जो साफ दिखाता है कि आज न्याय से पहले मुआवजे की भूख हावी हो चुकी है। 

जब उनसे यह सीधा सवाल पूछा गया कि आईआईटी बॉम्बे और सरकार से उनकी क्या मांग है, तो उनका पहला और हैरान करने वाला जवाब था कि पहले प्रोफेसर पर एससी/एसटी एक्ट के तहत केस लगाया जाए और सबसे पहले सात-आठ लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए, उसके बाद बच्चों को न्याय मिलना चाहिए। 

उनका यह भी तर्क था कि बेटा एससी वर्ग से था, इसलिए प्रोफेसर ने उसकी परीक्षा में नकल पकड़ी, जबकि अगर वह दूसरी जाति का होता तो कोई कुछ नहीं कहता। गजब जा तर्क है भाई.. इतना ज्ञान बाबा साहब के आशीर्वाद से ही आ सकता है,

पिता का यह बयान साफ गवाही देता है कि किस तरह एक गंभीर और दर्दनाक मामले में भी पहली प्राथमिकता पैसे ऐंठना बन गई है, जहां न्याय जैसी बुनियादी मांग को मुआवजे के पीछे धकेल दिया गया है।

यह स्थिति देश की शिक्षा व्यवस्था और गुरु-शिष्य की परंपरा पर एक बहुत बड़ा और तीखा सवाल खड़ी करती है कि क्या परीक्षा में सरेआम फोन निकालकर चैटजीपीटी चलाना एक साधारण नकल है या फिर इसे भी जातिगत साजिश का नाम दे दिया जाएगा। 

एक शिक्षक का कर्तव्य परीक्षा की शुचिता बनाए रखना और नकल रोकना होता है, लेकिन आज इस विकृत व्यवस्था में शिक्षक अगर अपना फर्ज निभाए तो उसे सीधे जेल भेजने की धमकी दी जाती है। छात्र की मौत का मामला बेहद दर्दनाक है और परिवार का दुख भी पूरी तरह असली है, परंतु सरेआम पकड़ी गई नकल को जबरन जाति से जोड़कर सबसे पहले सरकारी खजाने से मोटी रकम मांगना पूरे मामले की दिशा को भटका देता है। 

आज देश में यही एक नया और खतरनाक फॉर्मूला बन चुका है कि किसी भी गलती को सीधे जातिगत उत्पीड़न का रंग दो, निर्दोषों को ब्लैकमेल करो और न्याय के नाम पर सबसे पहले मुआवजे की मोटी रकम अपनी जेब में डाल लो, जिसके खिलाफ अब लोकतंत्र के चारों स्तंभों को अपनी गहरी नींद से जागना ही होगा।

एक बच्चे की खुदकुशी बेहद दुखद और गंभीर मुद्दा है..और इस पर गहन चर्चा और काम होना चाहिए...

कुछ एकदम बेसिक से सवाल हैं- 1. क्या पूरे बैच में साहिल एकमात्र SC/ST category का बच्चा था कि प्रोफेसर दुल्ला सिर्फ उसी को निशाना बना रहे थे? अगर प्रोफेसर इतने जातिवादी हैं तो दूसरे बच्चों को भी तो परेशान करते होंगे! वैसे तो कहा जा रहा है कि वो खुद भी obc हैं gc नहीं। 2. जब साहिल को परेशान किया जा रहा था और उसने अपने माता पिता को बताया भी था तो उन्होंने उसी समय SC/ST cell में प्रोफेसर की शिकायत क्यों नहीं की? तभी कर देनी चाहिए थी। क्यों सहने छोड़ दिया बच्चे को? पर उनकी बातों से कहीं ये पछतावा दिख नहीं रहा। 3. लोग कह रहे हैं नकल का सबूत दो.. बिलकुल मिलना चाहिए.. लेकिन सबूत तो प्रताड़ना का भी मिलना चाहिए ! फोन पर कोई तो मैसेज होगा जो कभी साहिल ने परेशान होकर अपने माता पिता को भेजा होगा। कोई तो लिखित सबूत होगा । किसी दोस्त को मैसेज भेजा होगा। सिर्फ उनकी कही बात कैसे मान ली जाए? वसूली के लिए किए गए झूठे मामलों की फ़ेहरिस्त पहले ही काफी लंबी है। 4. क्या अब से नकल की खुली आज़ादी दी जानी चाहिए परीक्षाओ में? या बच्चे को पकड़ने से पहले उसकी जाति पूछनी होगी? GC बच्चा है तो suspend करो.. SC/ST है तो अपनी नौकरी बचाओ और उसको नकल करने दो।


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