मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

इंटरनेट पर भाषाओं का भविष्य

क्या इंटरनेट कभी भी अँगरेज़ी के अलावा किसी दूसरी भाषा के लिए उतना ही सहज हो पाएगा?
गूगल के लिए सर्च का मतलब हर भाषा में सर्च है मगर इसमें भारतीय भाषाएँ ख़ास तौर पर चुनौती पेश करती हैं क्योंकि उन भाषाओं में अभी कुल सामग्री बहुत कम है. इसलिए सबसे पहले ज़रूरी है कि उस भाषा में इंटरनेट पर सामग्री उपलब्ध कराई जाए.
मगर हाँ, हमने अनुवाद के मामले में काफ़ी प्रगति की है और जैसे-जैसे हम उसमें बेहतर होते जाएँगे वैसे-वैसे ये अन्य भाषाओं के लिए भी बेहतर होगा. किसी भी भाषा में भारत में ही सबसे कम सामग्री लिखित में उपलब्ध है जबकि अगर आप ये देखेंगे कि वो भाषा बोलने वाले कितने हैं तो पाएँगे कि वह संख्या काफ़ी बड़ी है.

वैसे हमारा काम सिर्फ़ अनुवाद ही नहीं है. हमारे पास हिंदी सर्च की सुविधा उपलब्ध है और आप जो खोजना चाहते हैं उसे हिंदी में कैसे खोजें उसके भी कई विकल्प हैं. मगर हिंदी में या दूसरी भाषाओं में इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री काफ़ी कम है. इसलिए ज़्यादा सूचनाएँ मिलती नहीं हैं.
ये कहना है मरियम एम मैथ्यू, मुख्य ऑपरेटिंग अधिकारी, मनोरमा ऑनलाइन का ।
मनोरमा ग्रुप में हमने अपनी भाषा में 1997 में काम शुरू किया और उस समय हमारे पास एक फ़ॉन्ट भी नहीं था जो वेब पर ठीक ढंग से काम कर पाता.
हमारे पास तो यूनिकोड वाला फ़ॉन्ट अब आया है और वो भी इतना अच्छा नहीं है. उसके अक्षर ठीक ढंग से नहीं दिखते और सर्च भी अच्छा नहीं है. कुल मिलाकर समस्याएँ काफ़ी हैं.
इसलिए भाषा को लेकर एक बड़ी चुनौती है और इस पर बड़ी-बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियाँ अभी तक काम नहीं कर रही हैं. फिर वो चाहे सर्च का मसला हो, या एक अच्छा यूनिकोड वाला फ़ॉन्ट हो या फिर मोबाइल और टैबलेट पर सामग्री कैसी दिखेगी, ये मसला हो. हर चीज़ एक मुश्किल खड़ी करती है.
ये कहना है संजीव बिखचंदानी, नौकरी डॉटकॉम के संस्थापक का।
रिकिन गाँधी कहते हैं कि उनके प्रोजेक्ट में कई भाषाओं में वीडियो बने हैं
हमने लगभग 10 साल पहले शादी से जुड़ी अपनी वेबसाइट जीवनसाथी शुरू की. हमने दो साल तक वो वेबसाइट चलाने के बाद महसूस किया कि वहाँ ज़्यादा लोग आ ही नहीं रहे थे.
फिर हमने सोचा कि शायद भारत में होने के लिए ज़रूरी है कि अँगरेज़ी में साइट बनाई जाए. तब हमने वो कोशिश दो साल बाद बंद कर दी.
शायद अब समय आ गया है कि एक बार फिर कोशिश की जाए, शायद वो काफ़ी शुरुआती समय था. इसलिए हम एक बार फिर कोशिश करेंगे भारतीय भाषाओं को लेकर और देखेंगे कि क्या होता है मगर जब तक समुचित सामग्री नहीं मिलती है और स्थानीय भाषाओं में ऐप नहीं बनते हैं, आपको नेट पर ऐसे लोग नहीं मिलेंगे जो सिर्फ़ भारतीय भाषाओं में ही काम कर रहे हों. फ़िलहाल तो उनमें से अधिकतर अँगरेज़ी भाषी ही होंगे.
मुझे लगता है कि भारत में भाषाओं के क्षेत्र में बढ़त के काफ़ी अवसर हैं. भले ही आम तौर पर ये माना जाता हो कि भारत में अख़बारों का बाज़ार बढ़ रहा है मगर असली बढ़त दरअसल भाषाई क्षेत्रों में होगी.
मुझे नहीं लगता कि असल समस्या पिछली सामग्री को इंटरनेट पर डालने की है ताकि ऐप बनाने वालों को उस भाषा में काफ़ी सामग्री मिल जाए.
दरअसल भाषा के क्षेत्र में आगे कितना काम होगा, ये उस पर निर्भर होगा. भारत में ऐसे किसी भी मीडिया बिज़नेस के बारे में सोचना मुश्किल होगा जो हिंदी, गुजराती या किसी दक्षिण भारतीय भाषा में काम न कर रहा हो.
ये कहना है रिकिन गाँधी, डिजिटल ग्रीन के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी का।
हमने तो 20 भाषाओं में वीडियो बनाए हैं जिनमें से कई तो स्थानीय आदिवासियों की भाषाओं में हैं. ख़ास बात ये है कि भले ही हमारे वीडियो की संख्या अभी कम हो, उन्हीं 2600 वीडियो को लगभग 10 लाख बार देखा जा चुका है. वे काफ़ी अलग हैं, स्थानीय भाषा में वीडियो हैं जिनमें खेती के कई तरीक़ों के बारे में बताया गया है....साभार.बीबीसी