गुरुवार, 27 अगस्त 2020

व‍िवाद करके कहीं के न रहे साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर के मारे ये बुद्ध‍िजीवी

कुछ साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर ऐसे होते हैं जो व्यक्ति, व‍िषय, देश और ''समाज के अह‍ित में ही अपना ह‍ित'' समझते हैं , इस तरह के ड‍िसऑर्डर्स में सुपरमेसी की लालसा इतनी हावी होती है...क‍ि दूसरे को ध्वस्त करना ही मकसद हो जाता है, चाहे इसमें खुद ही क्यों ना फना हो जायें।

आजकल इस ड‍िसऑर्डर से ही गुजर रहा है साह‍ित्य का वो धड़ा जो स्वयं को प्रगत‍िशील कहता न थकता था, साह‍ित्य के शीर्ष पर यही व‍िराजमान था ज‍िसने अपनी वामपंथी सोच के चलते देश में द्रोह-राजनीत‍ि से  ''न‍िकम्मेपन की प्रवृत्त‍ि'' यशोगान क‍िया, बुर्जुआ को गर‍ियाना और सर्वहारा को न‍िकम्मा बनाना इसका अभ‍ियान रहा परंतु अब यही धड़ा अपने साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर के कारण बदहवास स्थ‍ित‍ि में है, बात बात पर व‍िरोध करने की प्रवृत्त‍ि ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा।

द‍िल्ली दंगों पर ल‍िखी क‍िताब Delhi Riots 2020: untold story को प्रकाश‍ित ना होने देने का जो अभ‍ियान इस वाम पंथी धड़े ने चलाया था, वो उसी पर भारी पड़ गया। दरअसल Delhi Riots 2020: untold story की तीनों लेखिकाओं वकील मोनिका अरोड़ा, डीसयू की प्रोफेसर सोनाली चितलकर व प्रेरणा मल्होत्रा द्वारा फील्ड में घूम कर, कई लोगों से इंटरव्यू लेकर और पुलिस जाँच के आधार पर जो लिखा और संपादित किया गया है उसे  सितम्बर में ही रिलीज किया जाना था, वर्चुअल बैठकों में इसके रिलीज को लेकर बैठकें हो रहीं थीं। परंतु अभ‍िव्यक्त‍ि की आजादी पर पूरे देश को स‍िर पर उठा लेने वालों ने ब्लूमबेरी पब्ल‍िकेशन से क‍िताब के प्रकाशन पर रोक लगवा दी, क‍िताब की लेख‍िकाओं ने इस व‍िरोध को एक चैलेंज के तौर पर लेते हुए गरुड़ प्रकाशन से अपनी क‍िताब का प्रकाशन करवा ल‍िया और अब यह क‍िताब अभी तक लाखों के प्र‍िऑर्डर पर बुक हो चुकी है तथा आगे भी ब‍िक्री के सारे र‍िकॉर्ड टूटने वाले हैं। 

इस पूरे प्रकाशन व‍िरोध अभ‍ियान में पत्रकार तवलीन स‍िंह के बेटे पाक‍िस्तानी कट्टरवादी आत‍िश तासीर, मुगल कालीन इत‍िहास को मह‍िमामंड‍ित करने वाली पुस्तकें ल‍िखने वाले स्कॉटिश लेखक विलियम डेलरिम्पल, कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी के नेता, दक्षिण एशिया सॉलिडैरिटी इनिशिएटिव से जुड़े बुद्ध‍िजीवी, अभिनेत्री स्वरा भास्कर, कई पत्रकार शाम‍िल थे। ज‍िसमें खासकर वाम बुद्धिजीवियों ने क‍िताब के पब्ल‍िकेशन को रुकवाने के ल‍िए ब्लूमबेरी प्रकाशन पर स्ट्रेटज‍िक व फाइनेंश‍ियल हर तरह का दबाब बनाया और प्रकाशन रुकवाने में कामयाब भी रहे परंतु इस जद्दोजहद में वे यह भूल गए क‍ि वे स्वयं इस सब में बेनकाब हो गए हैं। स्वयं आतिश तासीर ने कहा कि स्कॉटिश इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल ही वो व्यक्ति हैं, जिसने इस पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगवाई। विलियम डेलरिम्पल ने भी इसी अगस्त 21 को कहा था कि वो दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक का प्रकाशन रोकने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

सवाल उठता है क‍ि पुस्तक का प्रकाशन रुकवाने के इस पूरे मामले में उनके हाथ क्या लगा...इतनी क्या इमरजेंसी क‍ि ये सब के सब इकठ्ठे होकर देश से लेकर व‍िदेशी लेखकों तक की मदद मांगने को व‍िवश हुए  ... क‍िताब में ऐसा क्या था क‍ि ये सब भयभीत हो रहे थे ...मात्र दंगे की र‍िपोर्ट‍िंग पर इनका भयभीत हो जाना '' दाल में काला '' की ओर इशारे नहीं करता क्या...। क‍िताब का प्रकाशन रुकवाकर हो सकता है ये खुश हो रहे हों परंतु अब जबक‍ि यही क‍िताब गरुड़ प्रकाशन से बाजार में आ रही है, तब इनका ये पूरा का पूरा अभ‍ियान चौपट हो गया। अभी तक ज‍िस क‍िताब को एक ल‍िम‍िटेड वर्ग पढ़ता अब उसी क‍िताब की गरुड़ प्रकाशन द्वारा छापने की घोषणा करने के चंद घंटों के भीतर ही 20 हजार प्रत‍ियों की  प्र‍िबुक‍िंग हो गई।

वामपंथ‍ियों की इस स्थ‍ित‍ि पर मुझे ''मोर के नाचने'' का सीन याद आ रहा है, ज‍िसमें पंखों की ओर से भले ही वो खूबसूरत द‍िखे परंतु असल में वो नंगा हो रहा होता है। मुझे आश्चर्य होता है अपने ''बौद्ध‍िक'' कहलाने पर भी क‍ि कैसे कैसे जाह‍िलों को अभी तक हमने ढोया, कैसे कैसे द्रोह‍ियों को हम अभी तक सरआंखों पर बैठाते आए... कैसे कैसे...  परंतु अब और नहीं, भांडा फूट चुका है... मैं जो क‍ि सदैव लेखन में न‍िरपेक्षता न‍िरपेक्षता रटती रही आज महसूस हुआ क‍ि समस्या की ओर से आंखें मूंद लेना न‍िरपेक्षता नहीं कायरता होती है परंतु अब और नहीं ।

- अलकनंदा स‍िंंह

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

ये सोशल मीड‍िया है… बुरी ज़हन‍ियत को नंगा भी कर देता है

हाल ही में घट‍ित हुए तीन उदाहरणों से मैं एक बात पर पहुंची हूं क‍ि दंगाई हों, सफेदपोश नेता हों, कव‍ि हों या शायर हों, इस सोशल मीड‍िया के समय में क‍िसी की कारस्तानी छुपी नहीं रह सकती। कल तक हम ज‍िन्हें स‍िर आंखों पर बैठाते थे और अचानक उनकी कोई ऐसी करतूत हमारे सामने आ जाए जो न केवल समाज व‍िरोधी हों बल्क‍ि देश व‍िरोधी भी हो तो इसके ल‍िए हम सोशल मीड‍िया को ही धन्यवाद देते हैं। फिर मुंह से न‍िकल ही जाता है क‍ि अच्छा हुआ पता चल गया वरना…
इस तर‍ह बेपर्दा होने के तीन उदाहरण हमारे सामने हैं। कल बैंगलुरु में हुई ह‍िंसा, फिर राहत इंदौरी का चले जाना और उससे एक द‍िन पहले मुनव्वर राणा साहब का ज़हर उगलना।
पहला उदाहरण- बैंगलुरू ह‍िंसा मामले की शुरुआत भगवान कृष्ण को रेप‍िस्ट बताकर राधा जी और गोप‍ियों के ख‍िलाफ ”कुछ तत्वों” द्वारा अनर्गल ल‍िखने से हुई परंतु प्रचार‍ित ये क‍िया जा रहा है क‍ि ”मुहम्मद साहब” के ख‍िलाफ अनर्गल ट्विटर पोस्ट पर बवाल हुआ और ”कुछ तत्वों” ने आगजनी कर लाखों की संपत्त‍ि फूंककर पुल‍िस पर हमला करते हुए दर्जनों पुल‍िसकर्मी घायल कर द‍िए… । इसके बाद हमारे तथाकथ‍ित धर्मन‍िरपेक्ष ठेकेदारों ने मंद‍िर के आगे मानव श्रृंखला बनाए खड़े कुछ मुस्ल‍िम युवकों की तारीफ में कसीदे पढ़े ही थे क‍ि सोशल मीड‍िया ने सारा सच उगल द‍िया… क‍ि पूर्व न‍ियोज‍ित था यह क‍ि ह‍िंसा व आगजनी के बाद ऐसा वीड‍ियो बनाकर ”खास तरह” से प्रचार‍ित क‍िया जाए। हिंसा में बड़ी बात निकलकर सामने आई है। पुलिस की मानें तो 5 दंगाइयों ने 300 लोगों का गैंग बनाया था। उनका प्लान सभी पुलिस वालों को जान से मारने का था। हमलावरों ने हिंसा के दौरान पुलिस को निशाना बनाने के लिए गुरिल्ला जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया। 


आलोक श्रीवास्तव द्ववारा राणा को ल‍िखा पत्र-

दूसरा उदाहरण हैं – जाने माने शायर मुनव्वर राणा, ज‍िन्होंने राम मंद‍िर पर सुप्रीमकोर्ट के न‍िर्णय को गलत बताते हुए एकसाथ देश की सुप्रीम कोर्ट व सरकार पर सवाल खड़े कर अपनी ”अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता” का बेजां इस्तेमाल क‍िया। ये वही मुनव्वर राणा हैं जो आजतक के पूर्व एंकर व शायर आलोक श्रीवास्तव की नज़्म चुराकर उन्हीं की मौजूदगी में मुशायरे में अपने नाम से सुना चुके हैं, मैं उस पत्र को भी यहां चस्‍पा कर रही हूं जो आलोक श्रीवास्तव ने मुनव्वर राणा को ल‍िखा था। ये पत्र भी सरेआम हो गया और मुनव्वर राणा की हक़ीकत हमें बता गया।
हालांक‍ि सोशल मीड‍िया दोधारी तलवार भी है तो बूमरैंग भी, दोधारी तलवार इसल‍िए क‍ि इस पर आने वाली सूचनाएं कहर बरपा सकती हैं और जागरूकता भी पैदा कर सकती हैं। बूमरैंग इसल‍िए क‍ि इस पर डाली गई साम‍ग्री लगातार घूमकर कब हमारे सामने क‍िसे नंगा कर दे, कहा नहीं जा सकता। सोशल मीड‍िया क‍ि पूरी प्रोसेस में परदे के पीछे से घात करने वाले बहुत द‍िनों तक छुप नहीं पाते, उनके कुकृत्य सबके सामने आ ही जाते हैं। मुनव्वर राणा इसका ताजा उदाहरण हैं।

अब तीसरा उदाहरण राहत इंदौरी साहब का- हालांक‍ि मरने के बाद हमारे संस्कारों में नहीं है क‍िसी की मजामत करना, परंतु अटल ब‍िहारी वाजपेयी से लेकर अहमदाबाद के दंगों पर उनकी ज़ुबान का ज़हर तो हमने मुशायरों में बहुत सुना परंतु कभी वह गोधरा का सच ना बोल सके…आख‍िर क्यों.. ?? मुशायरों के मंच से युवाओं को अहमदाबाद दंगे याद रखने को कहते हैं और मुंबई दंगे भूल जाते हैं, उन्हें 370 तो याद रहता है…व‍िस्थाप‍ित पंड‍ितों को भूल जाते हैं। स‍िर्फ ह‍िंदू ही क्यों, उन्हें तो तीन तलाक़ का खत्म होना भी अखरता है पर हलाला भूल जाते हैं.. इन सबके सुबूत सोशल मीड‍िया हमें देता रहता है परंतु हम ही अगर एक आंख से देखेंगे तो कैसे इनकी असल‍ियत पहचानेंगे … अब यही मीड‍िया उनकी कलई खोल रहा है।
देख‍िए वीड‍ियो-


सत्य कड़वा होता है, सुना नहीं जाता परंतु सोशल मीड‍िया ही है जो अब इन जैसों को नंगा कर रहा है। बैंगलुरू ह‍िंसा के पीछे छुपे तत्व हों या मुनव्वर राणा व राहत इंदौरी जैसे बड़े शायर, सबकी ज़हन‍ियत के सच से हमें सावधान रहना होगा।
- अलकनंदा स‍िंंह 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

…आख‍िर ये भी तो कानून का मजाक उड़ाना ही है


भतृहर‍ि ने कहा था- क्षत‍ि क्या है= समय पर चूकना… और हम ये क्षत‍ि बहुत पहले से करते आ रहे हैं, खासकर न्याय व्यवस्था में। आवश्यक न्याय‍िक सुधारों को लेकर समय पर चूकना आज हमें ऐसे दलदल में फंसा चुका है ज‍िससे न‍िकलने के आसार कहीं द‍िखाई नहीं दे रहे। आजादी के बाद से न्याय प्रदान करने वाली जो संस्थाएं देश की रीढ़ बनीं, वे ही अपने कर्तव्यों से चूकती गईं। वे सुधार कर सकती थीं परंतु समय पर न‍िर्णय ना ले सकीं नतीजतन देश में न्याय व्यवस्था का आलम ये हो गया है क‍ि आजकल न‍िचली कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सभी ऐसा अंधा कुंआं बन कर रह गई हैं ज‍िनके पेट में ”वादी व प्रत‍िवादी” दोनों पक्षों का बेशुमार पैसा, समय, शक्त‍ि… सब समाता जा रहा है और इतना ” खाकर” भी इनकी दुर्दशा जस की तस है।
सरकारी स्तर पर क्या होना चाह‍िए, क्या नहीं हुआ … आज इस पर बात नहीं, बल्क‍ि बात इस पर है क‍ि कॉमन सेंस भी यद‍ि इस्तेमाल क‍िया जाए तो जो साढ़े तीन करोड़ मुकद्दमों का बोझ ”सुरसा” बनता जा रहा है, उसे न‍िपटाया जा सकता है। बहुत छोटे-छोटे मामलों का न‍िपटारा करके मुकद्दमों का बोझ कम क‍िया जा सकता है। न्‍यायिक जांचों के नाम पर मामले लटकाना न्यायालयों की कार्यशैली का ह‍िस्सा बन गया है, इससे बचा जा सकता है परंतु ऐसा करे कौन, ज‍िन्हें करना है वे न्याय‍िक-भ्रष्टाचार के मोहरे हैं।
अफरशाही की जकड़न इतनी है क‍ि पहले तो पुल‍िस अपराध‍ियों से जूझे, फ‍िर अदालतों के अंतहीन झमेले से। क‍िसी अपराधी के एनकाउंटर के बाद ”उसी एनकाउंटर की ही फ‍िर से जांच” के नाम पर बनाई गई जांच सम‍ित‍ियां आख‍िर क्या हैं। ये तो न्याय व्यवस्था पर अत‍िर‍िक्त बोझ के स‍िवाय कुछ और है ही नहीं। ये अत‍िर‍िक्त बोझ स‍िर्फ मामले को लटकाए रखने, जांच आयोगों के अध्यक्षों पर बेवजह धन जाया करने का माध्यम है, और कुछ नहीं। जांच आयोग के अध्यक्ष अध‍िकांशत: र‍िटायर्ड अध‍िकारी होते हैं, पेंशन पाते हैं फ‍िर भी ये कोई अवैतन‍िक काम नहीं करते, बल्क‍ि हर अध्यक्ष को प्रत‍ि सुनवाई 1.50 लाख और आयोग के अन्य सदस्यों को 1 – 1 लाख रुपये प्रत‍ि सुनवाई भुगतान क‍िया जाता है। इतना आर्थ‍िक बोझ…वो भी स‍िर्फ जांच के नाम पर ?
कानून एक सा, कानून की पढ़ाई एक सी, कानून के ओहदेदारों की समझ (जैसा क‍ि समझा जाता है) एक सी, तो फ‍िर एक ही कानून में क्यों न‍िचली अदालतों के न‍िर्णय हाईकोर्ट नहीं मानते, हाई कोर्ट के न‍िर्णय सुप्रीम कोर्ट में रद्द कर द‍िए जाते हैं… आख‍िर ये भी तो कानून का मजाक उड़ाना ही है।
व‍िकास दुबे एनकाउंटर मामला हो या हैदराबाद रेप‍िस्ट एनकाउंटर, दोनों ही मामलों में जांच आयोग बैठाना कहां तक उच‍ित है। न‍िश्च‍ित रूप से ये सही है क‍ि क‍िसी न‍िर्दोष के साथ अन्याय नहीं होना चाह‍िए परंतु जो सरेआम अपराध करते रहे, उनके ”अंजाम” पर संदेह कर जांच आयोग बैठाना कहां तक उचि‍त है। ये क्या कम था क‍ि अब हैदराबाद रेप‍िस्ट एनकाउंटर मामले की जांच सम‍ित‍ि का कार्यकाल 6 महीने बढ़ा द‍िया गया ”कोरोना के कारण जांचकार्य में देरी” के नाम पर। ये सीधा सीधा आर्थ‍िक दोहन और न्याय‍िक-भ्रष्टाचार का स्पष्ट उदाहरण है। तभी तो सोच कर देख‍िए क‍ि आख‍िर जांच आयोगों की जांच कभी समय पर पूरी क्यों नहीं होती, अदालती अफरसरशाही का कुचक्र है ही ऐसा क‍ि क‍िसी मामले की जांच को लटकाए रखने के ल‍िए जब प्रत‍ि सुनवाई लाख से डेढ़ लाख तक म‍िलते हों तो ये ”कानूनी अफसर” क्योंकर चाहेंगे क‍ि जांच कभी पूरी भी हो।
सुप्रीम कोर्ट चाहे तो इन बेवजह के दांवपेंचों से अदालतों का बोझ कम कर सकता है, मुकद्दमों में कमी तो आएगी ही, अदालतों पर जाया हो रहे धन की बरबादी भी रोकी जा सकेगी परंतु ये बात तो हम कह सकते हैं, वे ”जस्ट‍िस” करने वाले वे न्यायिक अध‍िकारी ऐसा नहीं करेंगे क्योंक‍ि आगे कोई जांच आयोग उनका भी तो इंतज़ार कर रहा होगा।
- अलकनंदा स‍िंह 

बुधवार, 22 जुलाई 2020

श‍िद्दत से सक्र‍िय हैं जड़ों से द्रोह करने वाले


आज दो मुद्दे मेरे सामने हैं … एक तो राम और दूसरी ह‍िंदी । दोनों ही अपनी व्यापकता के पश्चात भी नकारे गए और समय समय पर व‍िरोधी अभ‍ियानों से घ‍िरे रहे। इसे मैं सनातन संस्कृत‍ि और भाषा के प्रत‍ि उन लोगों का ”भय” ही कहूंगी जो बेहद नकारात्मकता के साथ अपनी ही जड़ों से द्रोह करते रहे और जो अपनी जड़ों से द्रोह करता है उसे समाज बहुत द‍िनों तक नहीं ढोता।
यही दशा आजकल उन राजनैत‍िक, सामाज‍िक व बौद्ध‍िक संस्थाओं की हो रही है जो देश में कथ‍ितरूप से लोकतंत्र , आजादी, अभ‍िव्यक्त‍ि की बात कर रही हैं। जो यहीं पनपीं और यहीं के संस्कारों को गर‍ियाती रहीं, उन्हें पराई पत्तर का भात ज्यादा स्वाद‍िष्ट लगता रहा है इसील‍िए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम काल्पन‍िक लगते ही हैं, उन्हें ह‍िंदी भी व‍िमर्श की भाषा तो लगती है परंतु उसे सर्वग्राह्य बनने नहीं देते। वे ह‍िंदी की रोजी पर पल रहे हैं परंतु तलवे ह‍िंदी व‍िरोध‍ियों के चाटते हैं।
राम से द्रोह कर उन्हें काल्पन‍िक बताने वाले न कभी जानेंगे और ना ही जानने का प्रयास भी करेंगे क‍ि आख‍िर राम को जन जन का बनाने वाली वाल्म‍िकी रामायण का आरंभ कैसे हुआ, वे कौन से प्रश्न थे ज‍िनसे वाल्म‍िकी प्रेर‍ित हुए राम कथा ल‍िखने को। वाल्म‍िकी रामायण के बालकांड के प्रथम सर्ग इसका प्रमाण है क‍ि वाल्म‍िकी ने जब नारद मुन‍ि से पूछा क‍ि संसार में ऐसा कौन है जो इस समय इस लोक में गुणवान, शक्ति‍शाली, धर्मज्ञाता, कृतज्ञ, सत्यभाषी, चर‍ित्रवान, सब प्राण‍ियों की भलाई चाहने वाला, क्रोधहीन व ओजस्वी है। तब नारद मुन‍ि ने कहा क‍ि वे इच्छवाकु वंश में पैदा हुए हैं, उनका नाम राम है, ज‍िस प्रकार नद‍ियां सागर के पास जाती हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुष राम के पास जाते हैं।
इस उत्तर के बाद ही राम की कथा का प्रारंभ हुआ और ये कल्पना नहीं बल्क‍ि वाल्म‍िकी ने एक नायक के सर्वोत्कृष्ट गुणों को आमजन के समक्ष इसील‍िए रखा क‍ि वो अपने आचरण में इन्हें सम्मि‍लि‍त कर सके और रामराज्य जैसी व्यवस्था का सुख ले सके। वो रामराज्य… ज‍िसमें व‍िपरीत सोच वाले को भी बराबरी का अध‍िकार म‍िला। तो क्या ये रामद्रोही वाल्म‍िकी रामायण के बालकांड के प्रथम सर्ग को पढ़ेंगे, नहीं… ब‍िल्कुल भी नहीं। पढ़ लेंगे तो फ‍िर राम से द्रोह कैसे कर पाएंगे।
वाल्म‍िकी के राम की पूजा तो इनके वश की नहीं परंतु ये द्रोहकारी लोग तो जानबूझकर भारतीय धर्म और दर्शन की भी उपेक्षा करते हैं। तभी तो उन्हें अपने कथ‍ित ”बौद्ध‍िक व‍िमर्श” में समुद्र मंथन पर दाराश‍िकोह के ल‍िखे मज्मउल बहरैन द‍िखाई नहीं देता, वे अलबरूनी,अब्दुर्रहीम खानखाना, मल‍िक मोहम्मद जायसी, नजीर अकबराबादी की रचनाओं और व‍िचारों को भी बड़ी चालाकी से छुपा जाते हैं। ये वे लोग हैं जो कुरान और बाइब‍ि‍ल सुनकर उसकी तारीफ में झुक ही नहीं जाते बल्क‍ि इन पर कभी बहस करने की ह‍िम्मत भी नहीं करते परंतु हां, वेद-पुराण का कोई जिक्र करे तो फौरन उसे सांप्रदायवादी, पोंगापंथी कहकर कुतर्क करने से भी बाज नहीं आते। उन्हें तो तीन युगों को पार कर आने वाला आज का समृद्ध ”सनातन धर्म” में भी आद‍िकालीन मनु द‍िखते हैं। इसी तरह उन्हें वैद‍िक शोधों से एलर्जी है।
ये द्रोहकारी प्रवृत्त‍ि क‍िसी एक जाति, धर्म, संप्रदाय में नहीं बल्क‍ि ये तो एक खास वर्ग है जो कलुष‍ित मानस‍िकता वाला है ज‍िसे न‍िज भाषा, न‍िज धर्म, न‍िज देश और न‍िज माटी को लेकर हीनताबोध है, यह प्रवृत्त‍ि उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी।
– अलकनंदा स‍िंह

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

ह‍िंदू धर्म को लेकर ही क्यों बेहूदा ट‍िप्पण‍ियां कर रहे हैं स्टैंडअप कॉमेड‍ियंस


क‍िसी व्यक्त‍ि को पंगु बनाना हो तो उसकी रीढ़ पर हमला करो, क‍िसी देश को पंगु बनाना हो तो उसकी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करो और क‍िसी समाज को पंगु बनाना हो तो उसके पर‍िवारों को मूल्यव‍िहीन कर दो। यह क‍िसी भी दुश्मनी को उसके अंजाम तक पहुंचाने की पहली और आख‍िरी शर्त होती है। पर‍िवारों को मूल्यव‍िहीन बनाने के ल‍िए मह‍िलाओं और बच्चों से ज्यादा सॉफ्ट टारगेट और कौन हो सकता है, और ऐसा ही क‍िया जा रहा है उन कथ‍ित कॉमेड‍ियंस द्वारा जो सोशल मीड‍िया के माध्यम से ह‍िंदू धर्म का उपहास उड़ा रहे हैं। हमारे संस्कारों और देवी देवताओं को लेकर बेहूदा ट‍िप्पण‍ियां कर रहे हैं।
कहते हैं बच्चा अपने घर से ही प्रथम संस्कार सीखता है और जैसे संस्कार होते हैं, बच्चा क‍ितना ही बड़ा क्यों ना हो जाए अपने जीवन के हर कदम पर उसके संस्कार उसके व्यवहार में द‍िखाई देते हैं परंतु इन कॉमेड‍ियंस में ऐसा कुछ भी द‍िखाई नहीं देता। सौरव घोष, अतुल खत्री, कुणाल कामरा, हसन म‍िन्हाज, अग्र‍िमा जोशुआ, ऐलन ड‍िजेनेर‍िस जैसे ना जाने क‍ितने नाम हैं जो ख्यात‍ि के लालच में इतना ग‍िरते जा रहे हैं क‍ि अब इनके ख‍िलाफ कानूनी तौर पर कार्यवाही की जा सकती है।
बेशक जितना निंदनीय है किसी धर्म का उपहास उड़ाया जाना, उससे कम निंदनीय नहीं है अपने धर्म का उपहास उड़ाने वालों को लेकर चुप्‍पी साध लेना। आजकल अभ‍िव्यक्त‍ि की आजादी के बहाने स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर यही सब हो रहा है। इनके ल‍िए मैं एक शब्द इस्तेमाल करना चाहूंगी ”पुंगी”, सब जानते हैं क‍ि पुंगी की अपनी कोई आवाज़ नहीं होती, जो इन्हें बजाता है ये उसी के सुर से बजती हैं। तो स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर जो ऐसा कर रहे हैं, ये तो बस पुंगी हैं, इनके पीछे की आवाजें कोई और हैं ज‍िनकी मानस‍िकता ही ह‍िंदू व‍िरोधी है। पुंगी बने ये कथ‍ित कॉमेड‍ियंस आख‍िर ह‍िंदू व‍िरोध का ही सुर क्यों न‍िकाल रहे हैं, कहां से म‍िल रही है इन्हें ये ताकत, ये सोचना होगा। ये कॉमेड‍ियंस ख्यात व कुख्यात होने व रातों रात हजारों लाखों व्यूअर्स हास‍िल करने के ल‍िए हमारे न केवल धर्म के साथ उपहास कर रहे हैं बल्क‍ि ये हमारे सामाज‍िक मूल्यों व संस्कारों पर भी घात कर रहे हैं।
इन कॉमेड‍ियन पुंगियों ने किस तरह से हिंदू धर्म, हिंदू परंपरा, हिंदू भगवान, हिंदू अनुष्ठान, हिंदू रीति-रिवाज और हिंदू धार्मिक संस्कारों का उपहास उड़ाया है, उसकी एक बानगी द‍ेख‍िए क‍ि हमारे प्रथम पूज्य गणपत‍ि का मजाक उड़ाते हुए एक स्टैंडअप कॉमेडियन ने तो यहां तक कह द‍िया क‍ि वो नास्तिक ही इसल‍िए बना क्योंक‍ि उसको ब्राह्मण कहलाना पसंद नहीं, और इस तरह ”हास्यास्पद मुद्राओं” से इशारे करके वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आईएसआईएस को एक ही श्रेणी में देता है। ऐसे ही एक अन्य कॉमेडियन भगवान शिव के बारे में ऐसी आपत्तिजनक ट‍िप्पणी करता है कि उसे लिखा नहीं जा सकता। छत्रपत‍ि श‍िवाजी पर हाल ही में एक मह‍िला कॉमेड‍ियन ने ऐसी ही व‍िवाद‍ित ट‍िप्पणी कर दी और श‍िवसेना (राजनैत‍िक कारणों से ही सही ) अगर व‍िरोध ना करती तो वह माफी भी ना मांगती।
ओटीटी पर र‍िलीज होती अनसेंसर्ड फ‍िल्में हों या स्टैंडअप कॉमेडी सभी ने अपने अपने सॉफ्ट टारगेट तलाश कर रखे हैं, हमें अपने और अपने पर‍िवारों को इस सांस्कृत‍िक आतंकवाद से बचाकर रखना होगा वरना देवी देवताओं व महापुरुषों के अपमान से चली ये साज‍िश हमारे संस्कारों, पर‍िवारों से होती हुई पीढ़‍ियों को बरबाद कर देगी, स्टैंडअप कॉमेड‍ी की इन पुंग‍ियों का ये कुत्स‍ित व्यवहार ”अभ‍िव्यक्त‍ि की स्वतंत्रता” की आड़ में नहीं छुप सकता, ये व‍िशुद्ध रूप से सांस्कृत‍िक आतंकवाद है जो घरों में घुस रहा है। अभी तक सह‍िष्णुता ने ही ह‍िंदू धर्म को बचा रखा है और इसी सह‍िष्णुता ने धर्म को व‍िधर्म‍ियों के हवाले कर द‍िया तो… इसलिए अब चुप्पी का नहीं, बोलने का समय है ताक‍ि धर्म पर प्रहार का प्रत‍िउत्तर द‍िया जा सके।
- अलकनंदा स‍िंह 

बुधवार, 15 जुलाई 2020

सावन के महीने का राग है, राग Malhar: कैसे हुआ इस्‍तेमाल?

सावन के दूसरे सोमवार को भी बरसने का इंतज़ार है , अभी तक आधा-अधूरा मानसून तो आया परंतु सावन अभी भी दूर है, न तन भीगा, न मन नहाया। धरती की कोख से सौंधी ख़ुशबू भी नहीं फूटी, न मोर नाचे न कोयल कूकी परंतु इस सावन ने उस राग का ध्यान करा द‍िया ज‍िसे राग मल्हार कहते हैं ।
इस मौसम में हम शिव की पूजा करते हैं। क्योंकि शिव काम का शत्रु है। इसीलिए सावन प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों को समझने और उसके निकट जाने का मौका भी देता है।
बहरहाल आज बात राग की करते हैं तो Malhar के बारे में उत्सुकता जागती है। तो आइये जानते हैं क‍ि क्या है राग Malhar और इसी राग का लोकगायकी में कैसे इसका इस्तेमाल क‍िया गया है।
भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम’ भी मल्हार राग में गाया गया 
मल्हार का मतलब बारिश या वर्षा है और माना जाता है कि मल्हार राग के गानों को गाने से वर्षा होता है। मल्हार राग को कर्नाटिक शैली में मधायामावती बुलाया जाता है। तानसेन और मीरा मल्हार राग में गाने गाने के लिए मशहूर थे। माना जाता है के तानसेन के ‘मियाँ के मल्हार’ गाने से सुखा ग्रस्त प्रदेश में भी बारिश होती थी।
मल्हार राग/ मेघ मल्हार, हिंदुस्तानी व कर्नाटक संगीत में पाया जाता है।
मल्हार राग के प्रसिद्द रचनायें हैं- कारे कारे बदरा, घटा घनघोर , मियाँ की मल्हार
दीपक राग से बुझे हुए दिये जलाने और मेघ मल्हार राग से बारिश करवाने की दंत कथाएँ तो हर पीढ़ी ने अपने बुजुर्गों से सुनी हैं। लेकिन क्या सचमुच ऐसा होता था? आइये समय के गलियारों से गुजरते हुए थोड़ा इतिहास के झरोखों से झांक कर देखें और पता करें की क्या तानसेन राग मल्हार का आलाप कर सच में वर्षा करवा देते थे।
मेघ-मल्हार और वर्षा
भारतीय संगीत की सबसे बड़ी खूबी यह है की इसका हर सुर, राग और हर पल, घड़ी, दिन और मौसम के हिसाब से रचे गए हैं। किस समय किस राग को गाया जाना चाहिए, इसकी जानकारी संगीतज्ञों को होती है। जैसे दीपक राग में दिये जलाने की शक्ति है, यह वैज्ञानिक रूप से सत्य है। इसका कारण, इस राग में सुरों की संरचना इस प्रकार की है की गायक के शरीर में गर्मी उत्पन्न हो जाती है। यही गर्मी वातावरण में भी आ जाती है और ऐसा प्रतीत होता है मानों अनेक दिये जल गए। यही नियम राग मेघ-मल्हार के संबंध में भी है। दरअसल मेघ-मल्हार राग की रचना, दीपक राग की गरम तासीर को कम करने के लिए करी गयी थी। इसलिए जब मेघ-मल्हार राग गाया जाता था तो वातावरण ऐसा हो जाता था, मानों कहीं बरसात हुई है।
तानसेन द्वारा मेघ-मल्हार को गाना और बरसात का होना, मात्र संयोग हो सकता है, जो बार-बार नहीं होता।
यहां सुन‍िए श्री प्रकाश विश्वनाथ रिंगे की राग मेघ मल्हार में  रचना 

शनिवार, 11 जुलाई 2020

अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रमी संवत यहाँ...जान‍िए भारत के प्राचीन गणितज्ञ बौधायन के बारे में


अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रमी संवत यहाँ, है किन्तु औरों का उदय इतना पुराना भी कहाँ ?
ईसा,मुहम्मद आदि का जग में न था तब भी पता, कब की हमारी सभ्यता है, कौन सकता है बता? 

-मैथिलिशरण गुप्त

राष्ट्रकव‍ि मैथिलिशरण गुप्त की ये कव‍िता की पंक्त‍ियां हमें अपने गौरवशाली अतीत की याद द‍िलाती हैं और प्रर‍ित करती हैं क‍ि हम जो आज बात बात में अन्य देशों की ओर देखते रहने के आदी हो गए हैं दरअसल और कुछ नहीं अपने अतीत को व‍िस्मृत कर बैठे हैं । इसी अतीत की एक महत्वपूर्ण स्तेंभ थे ऋष‍ि बौधायन।

जी हां, बौधायन भारत के प्राचीन गणितज्ञ और शुल्ब सूत्र तथा श्रौतसूत्र के रचयिता थे । ज्यामिति के विषय में प्रमाणिक मानते हुए सारे विश्व में यूक्लिड की ही ज्यामिति पढ़ाई जाती है। मगर यह स्मरण रखना चाहिए कि महान यूनानी ज्यामितिशास्त्री यूक्लिड से पूर्व ही भारत में कई रेखागणितज्ञ ज्यामिति के महत्वपूर्ण नियमों की खोज कर चुके थे, उन रेखागणितज्ञों में बौधायन का नाम सर्वोपरि है , भारत में रेखागणित या ज्यामिति को शुल्व शास्त्र कहा जाता था ।

बौधायन के सूत्र ग्रन्थ
बौधायन के सूत्र वैदिक संस्कृत में हैं तथा धर्म, दैनिक कर्मकाण्ड, गणित आदि से सम्बन्धित हैं। वे कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय शाखा से सम्बन्धित हैं। सूत्र ग्रन्थों में सम्भवतः ये प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। इनकी रचना सम्भवतः ८वीं-७वीं शताब्दी ईसापूर्व हुई थी।

बौधायन सूत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित ६ ग्रन्थ आते हैं-

    1. बौधायन श्रौतसूत्र - यह सम्भवतः १९ प्रश्नों के रूप में है।
    2. बौधायन कर्मान्तसूत्र - २१ अध्यायों में
    3. बौधायन द्वैधसूत्र - ४ प्रश्न
    4. बौधायन गृह्यसूत्र - ४ प्रश्न
    5. बौधायन धर्मसूत्र - ४ प्रश्नों में
    6. बौधायन शुल्बसूत्र - ३ अध्यायों में

सबसे बड़ी बात यह है कि बौधायन के शुल्बसूत्रों में आरम्भिक गणित और ज्यामिति के बहुत से परिणाम और प्रमेय हैं, जिनमें २ का वर्गमूल का सन्निकट मान, तथा पाइथागोरस प्रमेय का एक कथन शामिल है।

बौधायन प्रमेय
2 का वर्गमूल
बौधायन श्लोक संख्या i.61-2 (जो आपस्तम्ब i.6 में विस्तारित किया गया है) किसी वर्ग की भुजाओं की लम्बाई दिए होने पर विकर्ण की लम्बाई निकालने की विधि बताता है। दूसरे शब्दों में यह 2 का वर्गमूल निकालने की विधि बताता है।
   
समस्य द्विकर्णि प्रमाणं तृतीयेन वर्धयेत।
 तच् चतुर्थेनात्मचतुस्त्रिंशोनेन सविशेषः ।।

   अर्थ: किसी वर्ग का विकर्ण का मान प्राप्त करने के लिए भुजा में एक-तिहाई जोड़कर, फिर इसका एक-चौथाई जोड़कर, फिर इसका चौतीसवाँ भाग घटाकर जो मिलता है वही लगभग विकर्ण का मान है।

वर्ग के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल के वृत्त का निर्माण

   चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत् ।
    यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत् ।। (I-58)[1]

    Draw half its diagonal about the centre towards the East-West line; then describe a circle together with a third part of that which lies outside the square.
   
अर्थात् यदि वर्ग की भुजा 2a हो तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a


वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल के वर्ग का निर्माण
   मण्डलं चतुरस्रं चिकीर्षन्विष्कम्भमष्टौ भागान्कृत्वा भागमेकोनत्रिंशधा
    विभाज्याष्टाविंशतिभागानुद्धरेत् भागस्य च षष्ठमष्टमभागोनम् ॥ (I-59))[2]
   
If you wish to turn a circle into a square, divide the diameter into eight parts and one of these parts into twenty-nine parts: of these twenty-nine parts remove twenty-eight and moreover the sixth part (of the one part left) less the eighth part (of the sixth part).

बौधायन के अन्य प्रमेय

बौधायन द्वारा प्रतिपादित कुछ प्रमुख प्रमेय ये हैं-

  -  किसी आयत के विकर्ण एक दूसरे को समद्विभाजित करते हैं।
  -  समचतुर्भुज (रोम्बस) के विकर्ण एक-दूसरे को समकोण पर समद्विभाजित करते हैं
  -  किसी वर्ग की भुजाओं के मध्य बिन्दुओं को मिलाने से बने वर्ग का क्षेत्रफल मूल वर्ग के क्षेत्रफल का आधा होता है।
  -  किसी आयत की भुजाओं के मध्य बिन्दुओं को मिलाने से समचतुर्भुज बनता है जिसका क्षेत्रफल मूल आयत के क्षेत्रफल का आधा होता है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि बौधायन ने आयत, वर्ग, समकोण त्रिभुज समचतुर्भुज के गुणों तथा क्षेत्रफलों का विधिवत अध्ययन किया था। यज शायद उस समय यज्ञ के लिए बनायी जाने वाली 'यज्ञ भूमिका' के महत्व के कारण था।

साभार: वैदिक गण‍ितीय संरचना व ज्याम‍ितीय का क‍िताबी स्रोत 

रविवार, 5 जुलाई 2020

गुरू पूर्णिमा- गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं, सपनेहुँ सुख सुलभ न तेहिं

गुरु के महात्मय को समझने के लिए ही प्रतिवर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व  मनाया जाता है। गुरू पूर्णिमा कब से शुरू हुई यह कहना मुश्किल है, लेकिन गुरू पूजन की यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है क्‍योंकि उपनिषदों में भी ऐसा माना गया है कि आत्मस्वरुप का ज्ञान पाने के अपने कर्त्तव्य की याद दिलाने वाला, मन को दैवी गुणों से विभूषित करनेवाला, गुरु के प्रेम और उससे प्राप्‍त ज्ञान की गंगा में बार बार डुबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देनेवाला जो पर्व है – वही है ‘गुरु पूर्णिमा’ ।

इसी पूर्णिमा के दिन ही भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, १८ पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। इसीलिए ये लोक मान्‍यता बनी है कि इस दिन जो शिष्य ब्रह्मवेत्ता गुरु के चरणों में संयम-श्रद्धा-भक्ति से उनका पूजन करता है उसे वर्षभर के पर्व मनाने का फल मिलता है।

ईश्‍वर के लिए गुरू का मार्गदर्शन अत्‍यंत आवश्‍यक माना गया है। गीता में भी श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन  से कहा -
मय्ये व मन आघत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि भय्येव, अत ऊर्ध्व न संशयः ॥8/12

अर्थात् “हे अर्जुन ! तू मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ संशय नहीं है।”

किसी को गुरु से कितना मिला, किसी को अधिक किसी को कम क्यों मिला, इसके मूल में यही कारण है कि जिसने गुरु के बताये आदर्शों में मन व बुद्धि को लगा दिया, संशय मन से निकाल दिया, श्रेष्ठता के प्रति समर्पण कर दिया, उसका सारा जीवन ही बदल गया।

गुरू और शिष्‍य के सुप्रामेंटल रिलेशन्‍स के बारे में दार्शनिक श्री अरविन्द कहते थे “डू नथिंग ट्राइ टू थिंक नथिंग विह्च इज अनवर्थी टू डिवाइन” अर्थात् जो देवत्वधारी सत्ता के योग्य न हो, ऐसा कोई भी कार्य न करो, यहां तक कि ऐसा करने की सोचो भी मत ।

श्री रामकृष्ण परमहंस ने तो और एक कदम आगे बढ़कर यही कहा कि कामिनी काँचन से दूर परमात्म सत्ता में मन-बुद्धि को लगाने पर स्वयं ईश्वर गुरु के रूप में आकर मार्गदर्शन करते हैं। देखा जाये आदर्श शिष्‍य के लिए समर्पण एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति का रूपांतरण कर देती है और जब श्रेष्ठ गुरु के प्रति यही समर्पण होता है तो व्यक्ति तत्सम हो जाता है। उपनिषदों में कहा गया है कि व्‍यक्‍ति को तप करने से सिद्धि तो मिल सकती है, किन्तु भगवान नहीं मिल सकता जबकि समर्पण से गुरु व भगवान दोनों एक साथ मिल जाते हैं।

श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे-”सामान्य गुरु कान फूँकते हैं, अवतारी महापुरुष-सदगुरु प्राण फूँकते हैं।” ऐसे सदगुरु का स्पर्श व कृपा दृष्टि ही पर्याप्त है । परमहंस जी  एक ऐसी ही सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए। अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पास बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का उन्हें अवसर मिला।

गुरू-शिष्‍य के बीच संबंध और गुरू की महत्‍ता को रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी कुछ यूं कहा है-
गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं , सपनेहुँ सुख सुलभ न तेहिं ।

उदाहरण बताते हैं कि इस एक आध्‍यात्‍मिक संबंध की वास्तविकता,  कि समर्पण भाव से गुरु के निर्देशों का परिपालन करने वालों को जी भर कर गुरु के अनुदान भी मिले हैं।

श्रद्धा की परिपक्वता, समर्पण की पूर्णता, शिष्य में अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देती है। उसके सामने देहधारी गुरु की अंत:चेतना की जितनी भी रहस्यमयी परतें होती हैं सब की सब एक एक करके खुलने लगती हैं। शिष्‍य के सामने इनका ठीक-ठीक खुलना शास्त्रीय भाषा में गुरु के परमतत्‍व का प्राकट्य ही तो होता है। गुरु का यह रूप जान लेने पर मौन व्याख्या शुरू हो जाती है। बिल्‍कुल ऐसे जैसे कि हृदय में निःशब्द शक्ति का जन्‍म हो रहा हो । जन्म लेने से पूर्व ही प्रश्‍नों का उत्‍तर मिलने लग जाता है ।

स्वामी विवेकानन्द की दो शिष्याएँ थीं एक नोबुल (निवेदिता), दूसरी क्रिस्टीन (कृष्ण प्रिया)। स्वामी जी से निवेदिता तो तरह तरह के सवाल पूछतीं परन्तु कृष्ण प्रिया चुप रहतीं। स्वामी जी ने उनसे पूछा-”तेरे मन में जिज्ञासाएँ नहीं उठतीं?” उसने कहा-”उठती हैं पर आपके जाज्वल्य समान रूप के समक्ष वे विगलित हो जाती हैं, मेरी जिज्ञासाओं का मुझे अंतःकरण में समाधान मिल जाता है।” लगभग यही स्थिति हम सबकी हो, यदि हम अपनी गुरुसत्ता के शाश्वत रूप व गुरुसत्ता के संस्कृति सत्य को ध्यान में रखें कि “जब तक एक भी शिष्य पूर्णता प्राप्ति से वंचित है, गुरु की चेतना का विसर्जन परमात्मा में नहीं हो सकता।” सूक्ष्म शरीरधारी वह सत्ता अपने शिष्यों, आदर्शोन्मुख संस्कृति साधकों की मुक्ति हेतु सतत् प्रयत्नशील है व रहेगी जब तक कि अंतिम व्यक्ति भी इस पृथ्‍वी पर मुक्त नहीं हो जाता ।

गुरू और शिष्‍य के बीच संबंधों की पवित्रता को लेकर आज की स्थिति बड़ी विषम हो चुकी है। विगत वर्षों में कई गुरुओं के कारनामों ने इस संबंध को तार तार करके रख दिया है।ऐसा लगता है कि चारों ओर नकली ही नकली गुरु भरे हैं।

ये बिल्‍कुल ऐसे ही हैं जैसे कि पानी में रहने वाला सांप, जिसके  मुंह का आकार छोटा मगर चेष्‍टायें बड़ी होती हैं। इन्‍हीं 'चेष्‍टाओं' के कारण वह मेंढक को निगलने की कोशिश में मुँह में तो उसे जकड़ लेता है पर दोनों के लिए मुश्‍किल हो जाती है । पनेले सांप के गले से मेंढक बाहर निकलने को ताकत लगाता है , और वह मेंढक को गले में उतारने के लिए । आज गुरु व शिष्य दोनों की स्थिति ऐसी है। फिर भी सत्‍य और संकल्‍प के साथ सदगुरू की खोज और उसका सानिध्‍य पाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता और इस गुरू पूर्णिमा पर  हमारा ध्‍येय यही होना चाहिए ।

-अलकनंदा स‍िंंह 

गुरुवार, 25 जून 2020

आपातकाल: 25 और 26 जून की वो दरम्यानी रात और मेरे बचपन की स्मृत‍ियां

मेरे बचपन  की स्मृत‍ियों में आज भी छपी है 25 और 26 जून की वो दरम्यानी रात
25.‍06.1975 के दिन लोकतंत्र पर लगे दाग को ढोते हुए हमें 45 साल हो गये मगर मेरे बचपन की वो स्‍मृतियां आज भी ज़हन में बराबर कौंध रही हैं कि किस तरह से प्रभावशाली लोग भी घरों में छुपने को विवश हुए जा रहे थे। चारों तरफ अफरातफरी मची थी।

तब छोटी सी उम्र में मैं अपने आसपास होने वाली हलचलों को सिर्फ देख सकती थी मगर तब मैं इतनी छोटी थी कि उसे महसूस कर पाना मेरे दिमाग के पार था। बस घर की बालकनी में बैठी गली में पुलिस को देखकर भागती भीड़, दौड़ते लोगों में से कुछेक को पकड़ कर ले जाते पुलिसवाले अंकल...मां की किसी को कुछ ना बताने की पक्‍की हिदायत के संग ऊपर से झांकती मैं भी पुलिस को देखकर नीचे को झुक जाती, छुप जाती...।

कभी ये छुपनछुपाई वाला खेल लगता तो कभी बड़ा अजीब सा ...कि हम घर में...कैद से ये कौन सा खेल खेल रहे हैं।

रात को जो एकाध बल्‍व रोशनी के लिए जलाकर छोड़ दिया जाता था, उसे भी मां नहीं जलाती थीं।

'क्‍यों नहीं जलाती हो वो आंगन के बाहर वाला बल्‍व, पूछने पर वो हरबार एक ही बात कहतीं कि तेरे 'ताऊ जी' को कुछ डाकू ढूढ़ रहे हैं, जिन्‍होंने पुलिस की वर्दी पहनी हुई है, वो घर घर जाकर पूछ रहे हैं कि ताऊ जी कहां हैं, अगर वो रोशनी देखेंगे तो ताऊ जी को पकड़ ले जायेंगे ना, इसीलिए बल्‍व अभी नहीं जलायेंगे।'

जब बड़ी हुई तो जाना कि जिस घर में हम रहते थे वो जनसंघियों का घर था जिसके मालिक बड़े ताऊ जी थे, जिन्‍होंने मेरे पिता के व्‍यवहार से खुश होकर रहने को दिया था। आरएसएस से जुड़े लोगों को अधिक परेशान किए जाने के स्पष्ट निर्देश सरकार की ओर से दिए गए थे।

पापा सरकारी डॉक्‍टर थे बरेली के पचपेड़ा हॉस्‍पीटल में, अब इससे ज्‍यादा तो याद नहीं आ रहा और कुछ। कुछ भूली सी स्‍मृतियां हैं , उनमें एक है क‍ि एक नदी बहती थी घर के पास में जिसको पहले नाव से पार करते थे, फिर हॅस्‍पीटल आता था, बड़ी खूबसूरत सी जगह थी, फिल्‍मी सेट की तरह लगने वाली...बड़ा सा कंपाउंड जिसमें घुसते ही बाईं ओर बहुत ही सुंदर नन्‍हीं सी चारदीवारी से सजा हुआ सा एक कुंआ था जिसमें हल्‍की गिरारी वाली बाल्‍टी झूलती रहती थी।

कंपाउंड के दाईं ओर हॉस्‍पीटल के लिए तीन कमरे दिए गये थे। कंपाउंड के ठीक बीच में बेहद खूबसूरत मंदिर था, मंदिर में कौन से भगवान विराजे थे... अब ये भी ठीक ठीक याद नहीं मगर उसकी घंटियों से मुझे लटकना अच्‍छा लगता था। हम वहां कुल डेढ़ साल ही रह पाये और इसी दौरान वो घटनायें घटीं जिन्‍हें अब हम इमरजेंसी या आपातकाल के नाम से जानते हैं, उनकी भयावहता की बात करते हैं क्‍योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसी घटनायें एक दाग होती हैं ...बस।

उन दिनों की स्‍मृतियों में तैर जाते हैं वो दिन कि कैसे पुलिस से बचने के लिए मां के द्वारा वो अटपटी सी हरकतें किया जाना बिल्‍कुल भी अच्‍छा नहीं लगता था मुझे। ये भी अच्‍छा नहीं लगता था कि मेरे डॉक्‍टर पिता रात रात भर हॉस्‍पीटल में रहें। मां बताती थीं कि पापा को सीएमओ से आदेश मिला था कि कम से कम डेढ़ सौ केस तो हर रोज करने ही हैं। ''केस'' का मतलब लोगों की नसबंदी कर देना था जो तब हम बच्‍चों की समझ से परे था कि बिना बीमारी के ऑपरेशन क्‍यों किये जा रहे हैं सबके।

मां-पापा की बातें बताती हैं जीप जब गांव में चक्कर लगाती थी और नसबंदी के ल‍िए पकड़ कर ले जाती थी। रात को लोग अपने घर में सोने की बजाय फसलों के बीच में सो जाया करते थे। रिश्तेदारियों में लोगों का आना-जाना तक बिल्कुल छूट गया था। इस कारण उस दौरान गली-मौहल्लों में आपातकाल के सिर्फ एक ही फैसले की चर्चा सबसे ज्यादा थी और वह भी नसबंदी। सिर्फ टारगेट पूरा करने के लिए गांव में आने वाले टीम जबरदस्ती करती थी, उस दौरान ना तो युवाओं को छोड़ा गया और ना ही बुजुर्गों को।

खैर... धरपकड़ के इसी माहौल में मंदिर के पुजारी बाबा को भी पकड़ लिया गया। बाद में घर में सब कानाफूसी कर रहे थे कि बाबा की भी नसबंदी करा दी गई। पापा मां को बता रहे थे कि हम क्‍या करें पुलिस का पहरा रहता है, वो ही पकड़ कर लाते हैं और हमें तो हर हाल में ऑपरेशन करना होता है। छोटी सी बच्‍ची मैं नहीं जानती थी कि क्‍यों पूरा लगभग डेढ़ साल से ज्‍यादा का वक्‍त पापा का ऐसे बीता, ये तब ही जाना जब बड़ी हुई कि पापा जैसे और भी लोग थे जो सरकारी आदेशों को मानने के आगे विवश थे।

बहरहाल अब कह सकती हूं कि पता नहीं वो कैसे कैसे दिन थे और कैसी कैसी जागती सी रातें कि आज भी हम उन काली स्‍मृतियों को भुला नहीं पा रहे हैं।
आज इतने साल बाद भी मुझे वो सारे सीन याद हैं जस की तस।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 16 जून 2020

कुआँ खोदने वाले को.... एक रोज़ प्यास निगल जाती है...

कुछ दुःख बहुत भारी होते हैं, इतने भारी क‍ि सीने में उतर आएँ तो जीवन की नदी के बीचों बीच जाकर नैया सहित डुबो देते हैं….और दुख का ”कारण” अगर स्वयं की अपेक्षाएं बन जायें तो उनका इलाज कर पाना आसान नहीं होता। पहले सफलता पाने का दबाव, फिर सफल बने रहने का दबाव, स्वार्थ से लबालब न‍िजी संबंध, अपनों से दूरी जैसी आमफ़हम बातों के अलावा स्वयं से पाली गई बेतहाशा उम्मीदें, ज‍िंदगी न‍िगलने के ल‍िए काफी होती हैं।
यही संदेश दे रहा है सुशांत स‍िंह राजपूत द्वारा आत्महत्या करना क‍ि अपेक्षाएं जब खुद से बड़ी हो जाएं और उन्हें पूरा करने की जद्दोजहद में आत्मघात सबसे आसान तरीका लगने लगे तो सोचना जरूरी है क‍ि आख‍िर बॉलीवुड की चकाचौंध भरी ज‍िंदगी नवागतों या कलाकारों के ल‍िए अब मौत का कुआं क्यों बन गई है, ये अभी और क‍ितने सुशांतों को न‍िगलेगी, कहा नहीं जा सकता।
हममें से हर एक...  अपने भीतर... चुपचाप...  सुख के नीर की खोज में कुआँ खोदता एक मजदूर हैं... कभी कभी लाख कोशिशों के बाद भी भीतर की ज़मीन पानी  नहीं उलीचती... कुआँ खोदने वाले को.... एक रोज़ प्यास निगल जाती है... 
बॉलीवुड में लगातार हो रही आत्महत्याओं को देखें तो इस चकाचौंध का स्याह पक्ष ये है क‍ि इतनी बड़ी कीमत देकर हास‍िल की गई सफलता आख‍िर क‍िसे खुशी देगी क्योंक‍ि आज जो बॉलीवुड है उसमें कला का स्थान ”सेट‍िंग-गेट‍िंग” के बाद में आता है। प्रोफेशनल‍िज्म के नाम पर वो सब-कुछ होता है वहां जो आज की प्रैक्ट‍िकल लाइफ के ह‍िसाब से भी नाजायज है। ये जो आम से कलाकार रातों-रात स‍ितारा ”बना द‍िए” जाते हैं, वे क्या क्या दांव पर लगाकर ये मुकाम हास‍िल करते हैं, स्वयं बॉलीवुड की पेजथ्री, डर्टी प‍िक्चर जैसी कई फ‍िल्में इसे बखूबी द‍िखा चुकी हैं।
सुशांत के जाने के बाद प‍िछले दो द‍िनों से मीड‍िया से लेकर व‍िश्लेषक तक सुशांत की आत्महत्या के बाद वहां स्थाप‍ित ”नेपोट‍िज्म” को दोषी बता रहे हैं परंतु ये तो अपने न‍िर्णयों का दोष क‍िसी दूसरे पर थोपने जैसा है क्योंक‍ि बॉलीवुड व‍िशुद्ध व्यवसाय है, जहां कलाकारों के ”चेहरे” पर ही करोड़ों का सौदा होता है, ऐसा ना होता तो कलाकार ”स‍ितारा” ना कहलाते, और हीरो या हीरोइन की बजाय हम प्रोड्यूसर को जानते, परंतु ऐसा नहीं है। फिर यद‍ि कोई स्थाप‍ित प्रोडक्शन हाउस क‍िसी अपने को आगे बढ़ाता भी है तो इसे खाल‍िस व्यवयाय‍िक दृष्ट‍ि से देखा जाना चाह‍िए।
एक बात और क‍ि नेपोट‍िज्म ही अगर कामयाब कलाकार का पैमाना होती तो ना तो न‍ित‍िन मुकेश, कुमार गौरव, अभ‍िषेक बच्चन, उदय चोपड़ा जैसों की लंबी ल‍िस्ट न बनती और ना ही मनोज वाजपेयी, राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना बॉलीवुड में कहीं ठहर पाते। बॉलीवुड तो भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से। यहां आने वाला कोई भी कलाकार इन सब बातों से अंजान नहीं होता बल्क‍ि वो अपने स्वयं के जमीर और ज‍िंदगी दोनों का दांव खेलता ही इसल‍िए है क‍ि उसे भी ”स‍ितारा” बनना है। वो स‍ितारा बनने की हर कीमत चुकाने को तैयार होता है, इसल‍िए इस कीमत को तय का ज‍िम्मेदार भी वो स्वयं ही होता है। इनकी खुद से खुद की ही अपेक्षाएं इतनी अध‍िक होती हैं क‍ि इनका दबाव जो नहीं झेल पाते वो सुशांत जैसे कदम उठा जाते हैं।
कुल म‍िलाकर बात इतनी सी है क‍ि छोटे शहर से बड़े शहर में जाना, पैसे और पहुंच के बीच अपना स्थान बनाना, संघर्ष में संतोष को ढूंढ़ना, अपनी पहचान स्वयं गढ़ना पर चैन-खुशी-सुकून से मुलाक़ात ना हो पाना… बॉलीवुड में नवागतों के ल‍िए ये एक आम सी पटकथा है ज‍िसमें संवेदना का अभाव है, बस। बॉलीवुड में ऐसी आत्महत्याओं को रोक पाना फ‍िलहाल तो संभव नहीं क्यों क‍ि जो अपेक्षाएं इसकी ज‍िम्मेदार हैं, वे कहीं से भी कम होती नजर नहीं आ रहीं बल्क‍ि र‍िएल‍िटी शो, वेब शो के जर‍िए मां-बाप सह‍ित नन्हे-नन्हे बच्चे भी खपाये जा रहे हैं। इस काले बाजार की यही हकीकत है।
- अलकनंदा स‍िंंह
http://legendnews.in/a-simple-script-filled-with-expectations/

बुधवार, 10 जून 2020

पश्तो भाषा की पहली फिल्‍म कहां बनी थी, क्‍या आप जानते हैं?




पूरी दुनिया में जितनी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें पश्तो का स्थान बोली जाने वाली आबादी के हिसाब से 31वां आता है. पाकिस्तान में क़रीब 15 फ़ीसदी आबादी पश्तो बोलती है.
पश्तो फ़िल्म इंडस्ट्री पाकिस्तान की तीसरी सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्री है.
पाकिस्तान में कम से कम आठ सौ फ़िल्में पश्तो भाषा में अब तक बन चुकी हैं लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि पश्तो की पहली फ़िल्म पेशावर, लाहौर, कराची या फिर काबुल में नहीं बनी, बल्कि बॉम्बे में बनी थी जिसे अब बॉलीवुड कहते हैं.
पहली पश्तो फ़िल्म, इसके बनने की कहानी और इस फ़िल्म में काम करने वालों के बारे में जानने के लिए हमें क़रीब अस्सी साल पीछे जाना होगा. फ़िल्म बनाने का ख्याल सबसे पहले पश्तो के मशहूर शायर अमीर हमज़ा शिनवारी को आया था.
बात साल 1938 की है. वो पश्तो में एक फ़िल्म बनाने की सोच रहे थे. उन्होंने फै़सला किया कि फ़िल्म का नाम लैला-मजनूं रखेंगे.
एक नौजवान शायर के लिए वाक़ई में यह एक महत्वकांक्षी योजना थी. किसे पता था यह नौजवान आगे चलकर पश्तो के सबसे मशहूर शायर के तौर पर जाना जाएगा.
उन्होंने फ़िल्म में पैसा लगाया. उसकी कहानी लिखी. उसके संवाद और गाने लिखे. कुछ दोस्तों की मदद से फ़िल्म के संगीत का भी निर्माण किया. उनके ये दोस्त थे अब्दुल करीम अंदलीब और रफ़ीक़ ग़ज़नवी.
गज़नवी नए ज़माने के दर्शको की दिलचस्पी के हिसाब से संगीत देने में यक़ीन रखते थे. वो पाकिस्तान की मशहूर गायिका और अदाकारा सलमा आग़ा के नाना थे.
लेकिन अब आप यह सोच रहे होंगे कि फ़िल्म का निर्देशन किसने किया था?
शिरवानी ने किस पर भरोसा किया होगा अपने इस सपने को पूरा करने के लिए?
जो उपलब्ध स्रोत हैं, वो यह बताते हैं कि रफ़ीक़ गज़नवी पर उन्होंने भरोसा जताया था लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो यह बताते हैं कि उन्होंने किसी पर भी इस फ़िल्म के निर्देशन को लेकर भरोसा नहीं जताया था और ख़ुद ही इसका निर्देशन किया था.
वास्‍तविकता कुछ भी हो लेकिन फ़िल्म की कास्टिंग से तो यही पता चलता है कि शिनवारी ने अपने दोस्त रफ़ीक़ ग़ज़नवी पर ही भरोसा जताया था. रफ़ीक़ ने फ़िल्म में हीरो की भूमिका भी निभाई थी जबकि फ़िल्म में उनकी हीरोइन बनी थीं हबीब जान काबुली. इसके अलावा सितारा, वज़ीर मोहम्मद और डब्लू एम ख़ान ने अभिनय किया था.
लेकिन ऐसा भी नहीं था कि अमीर हमज़ा शिनवारी ने सिर्फ़ पर्दे के पीछे ही रहकर सिर्फ़ फ़िल्म की बागडोर संभाली थी. फ़िल्म में उन्होंने एक छोटी सी भूमिका भी निभाई थी.
फ़िल्म की एक जो और ख़ास बात थी, वो थे इसके गाने. इसमें शिनवारी के शुरुआत के दिनों में जो काम रहे हैं उसके बारे में पता चलता है.
फ़िल्म में किसी भी मशहूर गायक या गायिका की आवाज़ की बजाए फ़िल्म में काम करने वाले कलाकारों की आवाज़ में ही गाने थे. शिनवारी ने ख़ुद इसमें गाया था. उनके अलावा ग़ज़नवी, हबीब काबुली और डब्लू एम ख़ान ने भी अपनी आवाज़ दी है.
1941 में पूरी हुई यह फ़िल्म पेशावर और क्वेटा में अगले साल रिलीज़ हुई थी. उस समय के मौजूदा साक्ष्यों के मुताबिक़ बॉम्बे में पश्तो बोलने वालों ने इस फ़िल्म को सराहा था. फ़िल्म के गाने और संवाद पश्तो बोलने वालों की ज़ुबान पर चढ़ गए थे. अब आइए आपको तफ़सील से बताते हैं इस फ़िल्म से जुड़ी अहम शख़्सियतों के बारे में.
अमीर हमज़ा शिनवारी
अमीर हमज़ा को आज इसलिए नहीं याद किया जाता कि उन्होंने पश्तो की पहली फ़िल्म बनाई थी. हमज़ा बाबा के नाम से जाने जाने वाले अमीर हमज़ा शिनवारी को बाबा-ए-ग़ज़ल कहा जाता है. उन्हें पश्तो में लिखी जाने वाली ग़ज़लों का मसीहा कहा जाता है.
उनका जन्म लंदी कोटाल के खुगा केहल इलाक़े में हुआ था. यह इलाक़ा आज के पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर पड़ता है. शिनवारी का काम पश्तो भाषा की लगभग हर साहित्यिक शैली में दिखता है. उन्होंने अपनी ज़िंदगी में ग़ज़ल, शायरी और कहानियों की कई किताबें लिखीं.
उन्हें मोहम्मद इक़बाल और नहज़ुल बलाग़ा के काम को पश्तो में अनुवाद करने के लिए भी जाना जाता है. उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए पाकिस्तान के सबसे बड़े नागरिक सम्मान सितारा-ए-इम्तियाज़ से भी नवाज़ा जा चुका है.
शिनवारी का अपने पुश्तैनी घर में 18 फ़रवरी, 1994 को इंतक़ाल हो गया था. इसके साथ ही पश्तो शायरी के एक ज़माने का अंत हो गया था. जो उन्हें अपने ज़माने के महान सूफ़ी शायर मानते हैं, उनके लिए उनकी क़ब्र किसी पवित्र स्थल की तरह है जहाँ वो उनके प्रति अपना सम्मान जताने जाते हैं.
रफ़ीक़ ग़ज़नवी
शिनवारी के क़रीब दोस्त रफ़ीक़ ग़ज़नवी जिनको उन्होंने लैला मजनू के निर्देशन की ज़िम्मेदारी दी थी, उनका जन्म 1907 में हुआ था. उन्होंने रावलपिंडी के इस्लामिया कॉलेज से मैट्रिक किया था. इसके बाद वो लाहौर के इस्लामिया कॉलेज में पढ़ने गए फिर यहाँ से पंजाब यूनिवर्सिटी.
उन्होंने हमेशा क्लासिक म्यूज़िक में दिलचस्पी दिखाई. उन्होंने बाक़ायदा उस्ताद अब्दुल अज़ीज़ ख़ान, उस्ताद मियां क़ादिर बख़्श लाहौरी और उस्ताद आशिक़ अली ख़ान से संगीत सीखा था.
सिनेमा के साथ उनका जुड़ाव 1930 में शुरु हुआ था. उन्होंने एक मूक फ़िल्म में काम किया था. इसके बाद उन्होंने लाहौर में बनी पहली बोलती फ़िल्म हीर रांझा में अभिनय किया. वो इस फ़िल्म के संगीतकार भी थे. फ़िल्म की शूटिंग के दौरान रफ़ीक ग़ज़नवी को अपने साथ काम करने वाली अभिनेत्री अनवरी से मोहब्बत हो गई और दोनों ने फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले ही शादी कर ली थी.
उनकी एक बेटी हुई ज़रीना जो नसरीन नाम से फ़िल्मों में काम करती थीं. ज़रीना की बेटी सलमा आग़ा आगे चलकर भारत और पाकिस्तान की मशहूर गायिका और अभिनेत्री हुई.
हीर रांझा के बाद ग़ज़नवी बॉम्बे चले गए जहाँ उन्होंने कई फ़िल्मों में काम किया. उन्होंने वहाँ के कई फ़िल्मों में संगीत भी दिया. इनमें से कुछ मशहूर फ़िल्में हैं- जवानी-दिवानी, प्रेम-पुजारी धर्म की देवी, प्रेम यात्रा, अपनी नगरिया, तक़दीर, बहू रानी, नौकर और सिकंदर के नाम.
बंटवारे के बाद ग़ज़नवी कराची लौट गए और वहाँ रेडियो पाकिस्तान के साथ जुड़ गए. वो इस दल का भी हिस्सा थे जिन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रगान को अंतिम रूप देने की ज़िम्मेदाी दी गई थी.
पाकिस्तान आने के बाद भी उन्होंने फ़िल्मों में संगीत देना जारी रखा और परवाज़, अनोखी बात और मंडी के नाम जैसे फ़िल्मों में संगीत दिया.
अपनी शादियों को लेकर भी रफ़ीक़ चर्चा में रहे. उन्होंने अनवरी के अलावा ज़ाहरा, अनुराधा और क़ैसर बेगम से शादी की थी. उनकी बेटियों में से एक शाहिना ने कुछ पाकिस्तानी फ़िल्मों में काम किया है. उनकी एक और बेटी ने मशहूर फ़िल्म निर्देशक ज़िया सरहदी से शादी की है. उनके दो बेटे ख़य्याम और बिलाल सरहदी शोबीज़ की दुनिया से जुड़े हुए हैं.
रफ़ीक़ ग़ज़नवी की मौत 2 मार्च 1974 को कराची में हुई थी.
वज़ीर मोहम्मद ख़ान
वज़ीर मोहम्मद ख़ान पेशावर के रहने वाले थे लेकिन 1926 में बॉम्बे चले गए थे. यहां उन्होंने कश्मीरा, मनु विजय, दिल फ़रोश और हैमलेट जैसे कुछ मूक फ़िल्मों में काम किया था. हालांकि उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप की पहली बोलती फ़िल्म आलम आरा में काम से पहचान मिली.
फ़िल्म का गाना ‘दे दे ख़ुदा के नाम पर प्यारे’ उन्हीं पर फ़िल्माया गया था. यह गाना बोलती फ़िल्म के पहले गाने के तौर पर मशहूर हुआ. इसकी रिकॉर्डिंग की एक असली कॉपी इब्राहिम ज़िया के पास भी है जो पेशावर के एक फ़िल्म का शौक़ रखने वाले अज़ीम शख़्सियत हैं.
आलम आरा की कामयाबी के बाद वज़ीर ने कुछ और फ़िल्मों में भी काम किया. मसलन मैजिक फ्लोट, धनवान, दुल्हन, मेरे लाल, उसने क्या सोचा, रंगीला राजपूत, शेर दिल औरत, दर्द-ए-दिल और दुख़तर-ए-हिंद जैसी फ़िल्मों में.
उनकी मौत बॉम्बे में ही 14 अक्टूबर 1974 को हुई थी.

courtsey -BBC

शनिवार, 6 जून 2020

गोल्ड माइन बना सरकारी श‍िक्षक बनने का लालच

अकसर हम पुल‍िस को या प्रशासन को क‍िसी भी नाइंसाफी के ल‍िए दोष दे देते हैं या क‍िसी नीत‍ि के बेमानी होने पर शासन को कठघरे में ले आते हैं, इससे भी आगे एक झटके में सारे नेताओं को भ्रष्ट, नाकारा और चोर बताने से नहीं ह‍िचकते परंतु जब बात हमारे अपने स्वार्थों पर आती है तो इसी ”नाकारा और चोर तंत्र” से येन केन प्रकारेण कथ‍ित तौर पर ”मदद” लेने से भी नहीं चूकते।
नौकरी लगवाने के ल‍िए हम कौन सी कमी हम छोड़ देते हैं, फर्जी दस्तावेजों से लेकर घूस देने तक का सारा बंदोबस्त हाथोंहाथ हो जाता है, नौकरी पा भी जाते हैं तो फ‍िर वही स‍िस्टम को गर‍ियाने का स‍िलस‍िला बदस्तूर चलता रहता है।
उत्तरप्रदेश के प्राइमरी स्कूलों में श‍िक्षकों का मामला ऐसा ही एक गोल्ड माइन व‍िषय है ज‍िसमें कथ‍ित बेरोजगारों ने स‍िस्टम की कम‍ियों का भरपूर लाभ उठाया है। श‍िक्षक भर्ती से लेकर फर्जी बीएड और ऐसे ही अन्य फर्जी दस्तावेजों से न‍ियुक्त‍ि ”धंधेबाजों” के ल‍िए गोल्ड माइन बन गया।
उत्तरप्रदेश सरकार के गले की हड्डी बना 69000 श‍िक्षक भर्ती मामले में हाई कोर्ट द्वारा फैसला द‍िए जाने के बाद भी बार बार अलग अलग याच‍िकाओं का लगाया जाना और हर बार न‍िर्णय आने के बाद फ‍िर से नई याच‍िका लगाया जाना, कोई साधारण सी बात नहीं है। अंदाजा लगाइये क‍ि यद‍ि ये याच‍िका कर्ता नौकरी के ल‍िए जरूरतमंद हैं, बेरोजगार हैं, बेरोजगारी के कारण आत्महत्या कर रहे हैं तो बार बार याच‍िका के ल‍िए पैसा कहां से लाते हैं। हाईकोर्ट जाने की फीस ही 30-35 हजार से शुरू होती है, इन बेरोजगारों को कौन फंड‍िंग कर रहा है, तमाम ऐसे प्रश्न हैं जो इनकी मंशा पर प्रश्न उठाते हैं। आरक्षण, कटऑफ, गलत प्रश्न, श‍िक्षाम‍त्र-बीएड-बीटीसी का समायोजन … बहाने तो बहुत हैं मगर मंज‍िल एक ही क‍ि कैसे भी हो श‍िक्षक बन जाया जाये।
ये श‍िक्षक बनने का ही तो लालच था क‍ि एक लाख रुपये देकर अनाम‍िका शुक्ला के नाम पर पहले फर्जी दस्तावेज हास‍िल क‍िये, फ‍िर एक साथ 25 कस्तूरबा गांधी व‍िद्यालयों में श‍िक्ष‍िका बन संव‍िदा पर नौकरी करने वाली प्र‍िया कल कासगंज पुल‍िस द्वारा पकड़ी गई। उसने कई राज उगले क‍ि कैसे श‍िक्ष‍िका की नौकरी हास‍िल की। बहरहाल क्राइम कैसे हुआ, इस कॉकस में कौन कौन शाम‍िल हैं , ये सब तो पुल‍िस व व‍िभागीय जांच में सामने आ ही जाएगा परंतु हमारे ल‍िए च‍िंता व शर्म की बात है क‍ि ज‍िनके हाथों में बच्चों का भव‍िष्य दे रहे हैं यद‍ि वे ही र‍िश्वतखोरी, धोखाधड़ी, मक्कार‍ियों करते म‍िलें तो क्या ये बच्चों के भव‍िष्य से ख‍िलवाड़ ना होगा।
दरअसल श‍िक्षा व‍िभाग एक ऐसा अंधा कुंआ बन गया है जहां एक बार न‍ियुक्त‍ि म‍िली नहीं क‍ि फ‍िर कौन देख रहा है क‍ि वहां क्या हो रहा है, सभी ने अपनी अपनी सेट‍िंग कर रखी है, स्कूल के चौकीदार से लेकर अध‍िकार‍ियों तक सबका अपना ” टैक्स” न‍िर्धार‍ित है।
प्रदेश में श‍िक्षा की ये बेहाली श‍िक्षकों की कमी के कारण नहीं बल्क‍ि नाकाब‍िल श‍िक्षकों के कारण है, जो स्वयं 40 प्रत‍िशत कटऑफ पर चुने जायेंगे, उनसे अच्छी श‍िक्षा की उम्मीद बेमानी होगी। श‍िक्षक की अध‍िक भर्ती की नहीं, योग्य श‍िक्षकों की जरूरत है जो श‍िक्षा के साथ साथ संस्कार भी दे सकें ताक‍ि हमारी अगली पीढ़ी स‍िस्टम को गर‍ियाने की बजाय उसके प्रत‍ि जवाबदेह बने।
- अलकनंदा स‍िंंह

गुरुवार, 4 जून 2020

कोरोना काल में विशेषज्ञ डॉक्‍टर्स पर कॉमन सेंस पड़ा भारी

हमारे यहां ब्रज चौरासी कोस यात्रा में राजस्थान सीमा पर एक गांव है, यह गांव एक ऐसे हड्डी रोग व‍िशेषज्ञ के ल‍िए प्रस‍िद्ध है जो हड्ड‍ियों से संबंध‍ित क‍िसी भी रोग को अपने व‍िशुद्ध देसी अंदाज़ में ठीक करते हैं। कुछ साल पूर्व वे काफी वृद्ध थे, अब वो जीव‍ित हैं क‍ि नहीं, ये तो मुझे नहीं पता परंतु फ‍िलहाल उनका ये काम उनके बच्चों ने बखूबी संभाल रखा है और इनके देसी इलाज के सामने द‍िल्ली एनसीआर के हड्डी रोग व‍िशेषज्ञ भी फीके हैं।
इलाज का भी इनका अपना ही तरीका है। अपने कॉमन सेंस को इस्तेमाल कर वे पहले रोगी की मनोदशा जानने का प्रयास करते हैं फ‍िर उसके घर-पर‍िवार व समाज-गांव की बात करते हुए ही रोगी की हड्डी को वे कब अपने सधे हाथों से नसों को टटोलते हुए ”सेट” कर देते हैं, पता ही नहीं चलता। एक्यूप्रेशर के संग लंबी कॉटन की धोत‍ियों से बनी पट्ट‍ियां बांधकर वे शहद-चूना के साथ जड़ी-बूटी म‍िलाकर लेप लगा कर 15-15 द‍िन की स‍िट‍िंग के बाद रोगी को भला चंगा कर देते हैं परंतु फ‍िर भी वे ”झोलाछाप” की श्रेणी में आते हैं। दरअसल हम ये अंतर ही नहीं कर पाए क‍ि झोलाछाप कौन है और पारंपर‍िक औषध‍ियों व इलाजों का जानकार कौन। सभी को एक ही पैमाने से नाप ल‍िया।
ये कॉमन सेंस ही है क‍ि रोगी अपने बारे में बात करते हुए ज्यादा दर्द महसूस नहीं करता और उनकी खास बात ये क‍ि इलाज लगभग न‍ि: शुल्क क‍िया जाता है, बस वे स‍िर्फ शहद-चूना और धाेती की पट्ट‍ियों का पैसा ही लेते हैं जो बहुत मामूली होता है। ऐसे में रोगी की खुशी दोगुनी हो जाती है और मानस‍िक तौर आश्वस्त व खुश व्यक्त‍ि जल्दी र‍िकवर करता है।
ये मात्र एक ऐसा उदाहरण है जो मेरी नज़र में आया। इन जैसे क‍ितने ही देसी स्वास्थ्य व‍िशेषज्ञ पूरे देश में ब‍िखरे पड़े हैं। आप आद‍िवासी क्षेत्रों में चले जाइये, ऐसे ही असीम‍ित ज्ञान वाले पूरी की पूरी आबादी की देख-रेख बड़े ही सधे हाथों से कर देते हैं। कोरोना ने हमें ये स‍िखा द‍िया है क‍ि गांव, घर में मौजूद इलाज मामूली नहीं होते। सोचना होगा क‍ि हम आज भी हाइड्रोक्लारोक्वीन से ज्यादा नीम, तुलसी, ग‍िलोय, दालचीनी, कालीम‍िर्च के आयुष काढ़े को प्राथम‍िकता क्यों दे रहे हैं। इसल‍िए नहीं क‍ि ये आधुन‍िक च‍िक‍ित्सकों द्वारा प्रमाण‍ित हैं बल्क‍ि इसल‍िए क‍ि सद‍ियों से हम इन्हीं जैसे वात-प‍ित्त और कफ नाशकों के सहारे बहुत ही अच्छा जीवन जीते आए हैं।
हालांक‍ि सरकारी तौर पर ”इन व‍िशेषज्ञों” को मान्यता देने का प्राव‍धान नहीं है क्योंक‍ि वे सरकारी परीक्षा में पास नहीं हुए, सो ये गैरकानूनी ठहरे और इनका पीढ़ीगत ज्ञान अपराध की श्रेणी में आ गया। मैं यहां स‍िर्फ ”झोलाछाप” होने के कारण ना तो उनकी व‍िशेषज्ञता को क‍िसी भी एंग‍िल से कमतर आंक सकती हूं और ना ही ” झोलाछाप ” के गैर कानूनी दर्जे को गलत ठहरा रही हूं।
झोलाछाप गैर कानूनी इसल‍िए हैं क्योंक‍ि तमाम झोलाछापों ने अपनी बुद्ध‍ि हीनता से रोग‍ियों की जान तक ले ली है परंतु अब जब क‍ि सेहत को चुनौती देती व‍िपत्त‍ियां हमारे सामने नए-नए रूप में सामने आ रही हैं तो हमें सोचना होगा क‍ि हम व‍िशेषज्ञता की नई पर‍िभाषा गढ़ें और गांव-खेड़े तक मौजूद पारंपर‍िक व‍िरासतों को फ‍िर से सम्मान दें, साथ ही ठग झोलाछापोंं से सावधान रहें।
जहां तक बात है व‍िशेषज्ञ च‍िक‍ित्सकों की तो वो अपने ही इलाज को लेकर क‍िस हद तक भ्रम‍ित हैं, ये भी कोरोना काल ने बता द‍िया। अरबों रुपये का नया ”शोध कारोबार” शुरू हो ही चुका है, उनमें यही व‍िशेषज्ञ ”अपने अपने दावे” करेंगे और आमजन …??
बहरहाल, ऐसे भ्रम‍ित व‍िशेषज्ञों पर यद‍ि एक अनपढ़ मगर ”मास्टर” व्यक्त‍ि अपनी व‍िशेषज्ञता दर्ज कराता है तो इसमें हर्ज ही क्या है। क्यों ना इसे कानूनी बनाने की ओर कदम उठाया जाए ताक‍ि जो व्यवहार‍िक ज्ञान गुदड़‍ियों में छ‍िपा है वो जगजाह‍िर हो सके और ज्ञानी होने के बाद भी उन्हें सरकारी प्रताड़ना से दो चार ना होना पड़े, साथ ही ”झोलाछापि‍यों” की ऐसी व‍िशेषज्ञता का लाभ सरकार अपनी जन-जन तक जाने वाली योजनाओं में उठा सके क्योंक‍ि आज भी ग्रामीण इनसे आसानी से बेतकल्लुफ हो पाता है बजाय बड़े बड़े व‍िशेषज्ञ डॉक्टरों के।
- अलकनंदा स‍िंंह
http://legendnews.in/eclipse-of-expertise-on-common-sense/