बुधवार, 6 सितंबर 2017

कोई पूछे तो सही, अशोक अब तक वाजपेयी क्‍यों हैं

रामकुमार वर्मा ने अपने महाकाव्‍य ''एकलव्‍य'' में लिखा है, ''तुम नहीं वत्‍स, यह समय  ही शूद्र है''। हमेशा से ही ''शूद्र'' शब्‍द को दलितों का प्रतीक माना जाता रहा जबकि ''शूद्र''  कोई जाति नहीं एक उपमा है जो निम्‍नतर होते विचारों, मूल्‍यों, भावनाओं, विवेक और  संकल्‍पों को हमारे सामने ठीक उसी तरह लाती है जिस तरह आजकल कुछ खबरें ला  रही हैं। यह खबरें जनसामान्‍य की सोच पर अपने विकृत रूप में छा जाने को बेताब हैं।  हद तो ये है कि इन शूद्र खबरों का स्‍त्रोत धन-बुद्धि से संपन्‍न वह लोग हैं जो कुछ करने  में नहीं, सिर्फ बोलने में विश्‍वास रखते हैं। उन्‍हें अपनी सोच के विपरीत ''किया जाने  वाला'' हर काम खुद पर कुठाराघात सा लगता है और वे तिलमिला उठते हैं।

यही इस ''शूद्र समय'' का उदाहरण है कि धन-बुद्धि से संपन्‍न ऐसे लोगों को- गरीबी के  कारण बच्‍चों समेत आत्‍महत्‍या करती मां दिखाई देती है, आत्‍महत्‍या करते किसान दिखते  हैं, चीन से विवाद दिखाई पड़ता है, रोहिंग्‍या मुसलमान दिखाई देते हैं, गिरती हुई जीडीपी  और अर्थव्‍यवस्‍था दिखती है, गोरखपुर में मरते बच्‍चे भी दिखते हैं, एंटीरोमिओ स्‍क्‍वायड  दिखता है, कश्‍मीर में मानवाधिकारों का कथित हनन तो इन्‍हें सोते जागते दिखाई देता  है...सब-कुछ दिखता है, मगर मोटे लेंस और काली पड़ चुकी भद्दी कमानी वाले चश्‍मे से  कुछ भी वो दिखाई नहीं देता जो आशा उत्‍पन्‍न करता हो। जिससे महसूस हो रहा हो कि  किसी भी स्‍तर पर ऐसे तत्‍वों की सोच कुछ अच्‍छा भी देख लेती है।  AC दफ्तरों के  भीतर पड़ी चिक से झांकते हुए...ये स्‍वयंभू बुद्धिजीवी चुनचुन कर उन खबरों की कटिंग  इकठ्ठी करते हैं जो इनकी ''शूद्र'' सोच को खाद पानी दे सके। ये अखबारी खबरों से आगे  वहां कभी नहीं देखते जहां उनकी सोच का दायरा खत्‍म होता हो।

यह समय ही शूद्र है, तभी तो जो बुद्धि के बूते खाते-कमाते हैं, वे बुद्धिजीवी अब अपने  असहिष्‍णुता के नारे के लिए अलग चाशनी ढूढ़ रहे हैं।
इसी प्रयास में अवार्ड वापसी के नायक अशोक वाजपेयी ''सत्‍याग्रह'' ब्‍लॉग में लिखते हैं-  ''इस समय असहमति को दबाने, उसे हाशिए पर धकेलने या दंडित करने का जो  अघोषित व व्‍यापक अभियान चल रहा है, उसमें राजनीति, धर्म, राज्‍य, मीडिया और  विशेषत: सवर्ण जातियां शामिल हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि इन महाशय ने  आजतक अपने नाम के साथ ''वाजपेयी'' क्‍यों जोड़ा हुआ है। क्‍या इन्‍हें किसी ने बताया  नहीं कि नाम के साथ चिपकी हुई उनकी यह जाति न केवल उनके बल्‍कि उनके मां-बाप  के भी किसी सुनियोजित षड्यंत्र का पर्दाफाश करती है।
किसी ने शायद कभी पूछा भी नहीं कि दलितों के खिलाफ हमेशा से क्रूर रहे सवर्णों की  संतान अशोक ''वाजपेयी'' नामक शख्‍स को अपने सवर्ण होने पर शर्म महसूस होती है  या नहीं।
जबकि उनके द्वारा इतने मंचों से झूठ फैलाया और बोला जा रहा है कि लोग उसे ही  सच मानने लगे हैं।''

निश्‍चित ही वाजपेयी जी ने अपनी बुद्धि के हिसाब से जो लिखा, वह बताता है कि वे  अपने ही कौशल ही नहीं ''अस्‍तित्व'' को लेकर भी कितने भ्रमित हैं।
खैर...ऐसा ही होता है जब 'ज़मीन पर' आपको अपने आप से करने के लिए कुछ ना  मिले और सरकारी पैसे से बहुत कुछ मिल रहा हो। वो सबकुछ जिसकी कल्‍पना तक  कोई आम आदमी नहीं कर सकता। ज़ाहिर है कि घर बैठे-बैठे हराम की कमाई से किया  जाने वाला निठल्‍ला चिंतन नकारात्‍मकता को पनपने के लिए अच्‍छा स्‍पेस दे देता है।


वाजपेयी जी हताश होकर जिनकी ओर इशारा कर रहे हैं उन्‍होंने अगर असहमति को  दबाया होता तो लंदन के मौरिस स्कूल ऑफ हेयर ड्रेसिंग और लंदन स्कूल ऑफ फैशन  से आर्ट एंड साइंस ऑफ हेयर स्टाइलिंग एंड ग्रूमिंग में डिप्लोमा प्राप्‍त करने के बाद  देशभर में अपने सलून की 200 शाखाएं चला रहे जावेद हबीब अपने सलून में हिन्‍दू देवी  देवताओं को मैनीक्‍योर-पैडीक्‍योर, हेयर कटिंग कराते एवं लिपस्‍टिक लगाते दिखाने का  दुस्‍साहस नहीं करते।

हालांकि प्रिंट मीडिया में दिए गए इस विज्ञापन के माइक्रोब्‍लॉगिंग साइट ''ट्विटर'' पर  पोस्‍ट होते ही यूजर्स ने #boycottJavedHabib हैशटैग चलाकर अपनी प्रतिक्रिया दी और  कहा कि फेमस हेयर ड्रेसर जावेद हबीब! इससे क्या होगा, हम तो अब तभी मानेंगे जब  प्रोफेट को बाल कटवाते हुए दिखाओ। हिंदू धर्म का मजाक बना कर रक्खा है। कोई  अश्लील पेंटिग बनाता है कोई कुछ, कोई उन्‍हें जूतों में तो कोई शैम्‍पेन पर बैठा देता है।  कुछ ट्वीट्स देखिए-
Hey Javed Habib - Quite Unfair!! You should have ALSO put that Prophet  Muhammad pic when he visited your salon for a manicure! #JavedHabib

Will Javed Habib come with advertisement depicting Prophet Mohammad  getting his Beard trimmed at his salon?? Why are Hindus on target???

जब सारा बवाल बढ़ने लगा तो ''व्‍यावसायिक-बुद्धि'' वाले जावेद हबीब ने माफी मांगते हुए  एक ट्वीट कर अपने ग्राहकों को पटाने की कोशिश की-
Our Ad was not published to hurt anyone's sentiments...we sincerely  apologise.

मगर बात तो निकल चुकी थी। अच्‍छी बात ये है कि जावेद हबीब के इस विज्ञापन का  विरोध उस हाईटेक पीढ़ी ने किया जिसे हम अमूमन भगवान और धर्म को ''ना मानने  वाला'' कहते रहते हैं और गाहे-बगाहे उन्‍हें अवज्ञा का दोषी मानने से भी परहेज नहीं  करते। ये वही पीढ़ी है जो सफाई से लेकर गरीब बच्‍चों, बूढ़े मां-बाप तथा सामाजिक  कार्यों के लिए भी एप बना रही है और अपनी सुविधाओं को छोड़कर इनके लिए ज़मीन  पर काम कर रही है। ये पीढ़ी सिर्फ बैठकर गाल नहीं बजाती, ये राजनीति में भी उतनी  ही सक्रिय दिखती है जितनी कि मॉल में, पिज्‍जा हट और एमएनसी दफ्तरों में। ये वही पीढ़ी है जो धर्म के असली मायने भी जानती है और उन्‍हें निबाहना भी, राष्‍ट्र के लिए वह क्या कर सकती है, ये भी जानती है, और गाल भी नहीं बजाती।

जहां तक बात जिन ''गरीबों'' की आड़ लेकर सोकॉल्‍ड बुद्धिजीवियों द्वारा तिलमिलाने की  है या अभिव्‍यक्‍ति की आजादी पर रूदाली बनने की है, तो इनसे पूछा जाना चाहिए कि  स्‍वयं इन्‍होंने इस सबके लिए क्‍या प्रयास किए, क्‍या ये बतायेंगे। नहीं बता सकते क्‍योंकि  किसी यूनीवर्सिटी के किसी कॉलेज की फैकल्‍टी-बतौर गाल बजाना आसान है और ज़मीन  पर काम करना उतना ही मुश्‍किल। 

सो अशोक वाजपेयी जी यह समय ही शूद्र है, तभी तो आप जैसों की खेप न स्‍वतंत्रता के  मायने समझी और न प्रगति की व्‍याख्‍या कर पाई। और जब लोग जागे हैं तो बजाय इस  जागरूकता को व्‍यवस्‍थित करने में योगदान देने के, आप इसे असहिष्‍णुता और  असहमति का कुचक्र बता रहे हैं। ज़रा अपनी किताबों के पन्‍नों से बाहर निकल कर  आइये और देखिए कि बाहर की आबोहवा कितना सुकून देती है। वह दौर बीत गया जब  एक लेख या कविता से सत्‍ता पलटने का सपना बुना जाता था, यह समय और है।  इसकी नब्‍ज़ पहचानिए वरना आने वाली पीढ़ी आपको हिकारत की नजर से देखेगी और  सम्‍मान का पात्र वही होगा, जिसने धरातल पर ''कुछ करके दिखाया'' हो।

- अलकनंदा सिंह