शनिवार, 1 जुलाई 2023

हैल्थ पैकेज और ऑफर्स के संग... आज नेशनल डॉक्टर्स डे कितना प्रासंगिक ?

कहते हैं कि किसी बीमारी को ठीक करने के किसी नेक दिल की दुआ और अच्छे डॉक्टर की दवा दोनों की जरूरत होती है । चूंकि ईश्वर प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होता इसलिए डॉक्टर को ही ईश्वर तुल्य माना जाता रहा, अभी कुछ वर्ष पूर्व तक ये होता भी था कि डॉक्टर ने हाथ पकड़ा नहीं कि मरीज आधा तो उसी वक्त ठीक महसूस करने लगता था। डॉक्टर नब्ज़ थामता हुआ पूछता जाता घर के हालचाल , मौसम की बातें करता हुआ वह न केवल रोग की तह तक जा पहुंचता बल्कि रोगी की मनोदशा का आंकलन करके दवाऐं देता था। इस पूरी प्रक्रि‍या में चंद मिनट ही तो लगते थे। मगर यह मरीज को आश्वस्त कर देती थी कि अब उसे कुछ नहीं होगा, वह सुरक्ष‍ित हाथों में है । बीमार तन को ठीक करने का ये मन से होता हुआ रास्ता बिना खर्च किये, बिना समय बरबाद किये बखूबी चल रहा था जो फैमिली डॉक्टर जैसे रिश्तों को जन्म दे गया ।
समय बदला , उदारीकरण आया, ग्लोबलाइजेशन ने श‍िक्षा को धंधा बना दिया , च‍िकित्सा जगत भी इसकी चपेट में आया। मेडीकल कॉलेज में काबिलों के साथ साथ नाकाबिल भी डोनेशन के बूते  एडमीशन- इंटर्नश‍िप से लेकर बड़े बड़े आलीशान नर्सिंग होम बनाकर आई एम ए जैसी एसोसिएशन्स के जरिये मरीजों को कमोडिटी की तरह ट्रीट करने लगे। सब बदल गया मगर ये बदलाव डॉक्टर और मरीज के बीच ईश्वरतुल्य वाली छवि को ध्वस्त कर गया। जो सेवा थी वो पेशा बन गई। जहां स्पर्शमात्र से आधा दर्द चला जाता था, वहां मिनीमम एक दर्ज़न टेस्ट कराके भी परिणामों की श्योरिटी नहीं होती। लापरवाहियों के उदाहरण आम हो गये हैं। प्रत्यक्षत: लिंग परीक्षण पर रोक लगी है मगर कौन नहीं जानता कि भ्रूण हत्याओं का ऊंचा ग्राफ सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर्स की इस प्रोफेशनलिज्म की प्रवृत्त‍ि की वजह से आगे चढ़ा और खुद आईएमए ने कभी कोई कार्यवाही नहीं की,वरना सरकार को क्यों तरह तरह से भ्रूण हत्या रोकने को उपाय करने पड़ते। इसके बावजूद जब आज नेशनल डॉक्टर्स डे पर कुछ डॉक्टर्स से बात की तो उन्होंने मरीज और डॉक्टर्स के बीच पनप रहे अविश्वास को लेकरअनगिनत मजबूरियां तो गिना दीं मगर प्रोफेशनलिज्म को सेवा मानने को वे हरगिज़ तैयार न थे ।
बदलते समय की ये नई परिभाषायें अपने साथ बहुत से बदलाव लाई जिसने डॉक्टर्स को भी सेवा की जगह प्रोफेशनल और प्रैक्टीकल बना दिया और अब आलम ये है कि एक बड़े डॉक्टर कहते हैं कि आज बिना प्रेाफेशनल बने खर्चे निकालना मुश्किल है, तो वहीं दूसरे डॉक्टर ने कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट को ही इस सबका दोष दे दिया । वे बोले, सीपीए यानि  कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट की वजह से डॉक्टरों में कोर्ट में घसीटे जाने का डर लगा रहता है। किसी एक बीमारी के लिए भी तमाम  टेस्ट कराने पर वो अपनी सफाई देते हैं कि कोई डॉक्टर रिस्क सीपीए की वजह से नहीं लेना चाहता इसलिए वह एक सिर दर्द होने पर भी सभी टेस्ट कराके आश्वस्त हो जाने के बाद ही इलाज करना शुरू करता है ताकि कोई कोताही न होने पाए।
एक डॉक्टर तो कहते हैं कि आजकल प्रोफेशनल होना  हमारी मजबूरी है , वरना इतने महंगे इक्विपमेंट्स , स्टाफ की सैलरी , बिजली से लेकर मैडीकल वेस्ट तक का खर्चा कहां से निकले।इस सफाई में वो असल सवाल टाल ही गए कि मरीज और डॉक्टर से बीच आए अविश्वास को कैसे कम किया जाए।
तमाम बहानों के साथ ही ये तो निश्चत हो गया कि विश्वास का संकट तो स्वयं डॉक्टर्स ने ही उपजाया है । जहां तक मरीजों द्वारा कानून की शरण लेने की बात है तो जो रोग से जूझ रहा हो , क्या वो शौकियातौर पर जाना चाहेगा कोर्ट । हमारे देश में कोर्ट जाना या न्याय पाना क्या इतना आसान है।
इनकी तरह कई और डॉक्टर्स ने भी बहानों का पहाड़ खड़ा किया मगर सभी के सभी टोटल इललॉजिकल। समस्या को फिलहाल वो सतही तौर पर देख रहे हैं जो पूरी के पूरी स्वास्थ्य सेवाओं के खतरनाक है।
अब बताइये कि एक पर्ची पर केवल एक हफ्ते ही दिखाया जा सकता है, अगले हफ्ते के लिए फिर से दूसरी पर्ची पूरी फीस चुकाकर बनवानी पड़ेगी, चाहे कितना भी रेग्यूलर चेकअप क्यों न करवा रहे हों । इसी तरह नर्सिंग होम के अंदर ही मेडीकल स्टोर, पैथेलॉजी लैब, कैंटीन और ऐसी ही सुविधाओं के साथ पूरा बिजनेस सेटअप ... दवा कंपनियों के ऑब्लीगेंटरी गिफ्ट्स पर विदेशों की सैर का लालच के चलते जेनेरिक दवाओं को डॉक्टर्स प्रेस्क्राइब ही नहीं करते ....आलीशान 5 और 7 स्टार्स हॉस्पीटल्स के '' ऑफर्स '' के साथ पैम्फलेट बांटा जाना, एक बीमारी के इलाज के साथ दूसरे टेस्ट्स फ्री... बताने वाले आदि ऐसे सच हैं जिनसे आप  सभी कभी ना कभी तो दोचार हुए ही होंगे। इसके अलावा गांवों में जाना तो स्वयं सरकारी डॉक्टर्स पसंद नहीं करते , वो भी शहरों के नर्सिंग होम्स के साथ कांट्रेक्ट्स करके रखते हैं ताकि प्रोफेशनल हो सकें... । ये कुछ सच्चाइयां हैं जो मरीज को मरीज नहीं बल्कि कमोडिटी बनाकर उसके विश्वास के साथ  खेल रही हैं... इस स्थ‍िति से बाज आना होगा और विश्वास बहाली का पहला कदम तो डॉक्टर्स को ही उठाना होगा ।
और अंत में आज नेशनल डॉक्टर्स डे है जो डॉ बी सी रॉय की याद में प्रति वर्ष १ जुलाई को मनाया जाता है , यही उनका जन्मदिन भी है और पुण्य तिथि भी। 1961 में भारत रत्न से सम्मानित डा. रॉय के नाम पर १९७६ में सरकारें उनके सम्मान में चिकित्सा , विज्ञानं , आर्ट , और राजनीति के क्षेत्र में विशिष्ठ कार्य के लिए डॉ बी सी रॉय नेशनल अवार्ड देती आई हैं।
इस दिन हर वर्ष सभी चिकित्सक संस्थाएं अपने उन डॉक्टर्स को सम्मानित करती हैं , जो अपने क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रहे हैं । तो डॉक्टर्स डे के इस हीरों के नाम पर ही सही आज के इस सेवाकार्य के बदलते प्रोफेशनल रूप को लेकर हम सभी को सोचना होगा। दोषारोपण से नहीं बल्कि सार्थक बदलाव लाकर हम मानवीय आधार पर सर्वश्रेष्ठ कर पाऐं , ऐसा उपाय करना होगा।

- अलकनंदा सिंह 

शनिवार, 17 जून 2023

समान नागरिक संहिता अर्थात् UCC से जुड़े हर बड़े सवाल का जवाब है यहां


 समान नागरिक संहिता (UCC) भारत के लिए एक कानून बनाने की मांग करती है, जो विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने जैसे मामलों में सभी धार्मिक समुदायों पर लागू होगा. इसको लेकर देश में विवाद छिड़ा हुआ है. विधि आयोग एक रिपोर्ट भी तैयार कर रहा है.

इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क दिये जा रहे हैं. पक्षधर इसके फायदे गिना रहे हैं जबकि विरोेध करने वालों की नजर में इससे देश के अंदर धार्मिक आजादी को खतरा होगा. संवैधानिक प्रावधानों में धर्म निरपेक्षता प्रभावित होगी. क्योंकि इससे यानी हिंदू विवाह अधिनियम (1955), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून आवेदन अधिनियम (1937) जैसे धर्म पर आधारित मौजूदा निजी कानून खत्म हो जाएंगे.

दरअसल विधि आयोग इस संबंध में एक रिपोर्ट तैयार कर रहा है. यूनिफॉर्म सिविल कोड मतलब एक समान नागरिक संहिता से है, इसके तहत पूरे देश में सभी के लिए एक कानून तय करना है. इसके मुताबिक सभी धार्मिक और आदिवासी समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों मसलन संपत्ति, विवाह, विरासत, गोद लेने आदि में भी समान कानून लागू होगा. आइए 5 अहम सवाल और उसके जवाब जानने की कोशिश करते हैं.

UCC के बारे में संविधान क्या कहता है?
संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है, भारतीय राज्य नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास कर सकता है. मतलब संविधान सरकार को सभी समुदायों को उन मामलों को लेकर एक कानून बनाने का निर्देश दे सकता है जो मौजूदा समय में उनके व्यक्तिगत कानून के दायरे में हैं. और यही वजह है कि विपक्ष दल इसका विरोध कर रहे हैं. उनके मुताबिक देश की विविधता इससे खतरे में पड़ जाएगी. जबकि केंद्र सरकार के मुताबिक समानता जरूरी है और समय की मांग है.

राज्य आधारित यूसीसी व्यावहारिक तौर पर कितना संभव?
वास्तव में यह राज्य का नीति निर्देशक सिद्धांत से जुड़ा मामला है. यानी यह सभी राज्यों में एक जैसा लागू करने लायक नहीं है. उदाहरण के लिए अनुच्छेद 47 के तहत कोई राज्य नशीले पेय और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दवाओं के सेवन पर रोक लगाता है. लेकिन दूसरे कई राज्यों में शराब धड़ल्ले से बेची जाती है.

किसी राज्य के पास समान नागरिक संहिता लाने की शक्ति को लेकर कानूनी विशेषज्ञ बंटे हुए हैं. कुछ का कहना है कि चूंकि विवाह, तलाक, विरासत और संपत्ति के अधिकार जैसे मुद्दे संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आते हैं. यह 52 विषयों की सूची है, केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं. राज्य सरकारों के पास भी इसे लागू करने की शक्ति है.

क्या यूसीसी केवल इस्लाम के खिलाफ है?
इसका जवाब है – नहीं. क्योंकि जब यूसीसी लागू होता है तो सभी धर्म, जाति के लिए लागू होता है. इसके तहत मुस्लिम व्यक्तिगत कानून आवेदन अधिनियम ही नहीं बल्कि हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम भी खत्म हो जाएंगे. यहां तक कि विरासत और गोद लेने की प्रथा भी समुदाय विशेष पर आधारित नहीं रहेगी.

आदिवासी समुदायों पर भी लागू होगा यूसीसी?
प्रावधान के मुताबिक ऐसा ही माना गया है. राष्ट्रीय स्तर यूसीसी के लागू होने पर सभी इसकी जद में आएंगे. उनके भी विवाह, विवाह-विच्छेद या संपत्ति को लेकर निजी कानून निरस्त हो जाएंगे. हालांकि जनजातीय समुदाय में इसको लेकर रोेष भी देखा गया है.

समुदाय ने कोर्ट में कहा था उनके समाज के लोकाचार, रीति-रिवाज और धार्मिक प्रथाएं प्रभावित होंगी. आदिवासी हितों की रक्षा करने वाली राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद ने कोर्ट से उनके रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं की सुरक्षा की मांग की है. गौरतलब है कि आदिवासी समाज में भी बहुविवाह और बहुपतित्व का रिवाज है.

क्या कहीं लागू है यूसीसी ?
देश में फिलहाल एकमात्र राज्य गोवा में यूसीसी लागू है. चूंकि गोवा को विशेष राज्य का दर्जा हासिल है. संसद ने बकायदा कानून गोवा में पुर्तगाली यूसीसी लागू किया था. इसे गोवा सिविल कोड के नाम से जाना जाता है. हिंदू, मुस्लिम और ईसाई सबके लिए एक समान कानून लागू है. जिसमें शादी, उत्तराधिकार से लेकर गोद लेने की प्रथा तक शामिल है.

रविवार, 11 जून 2023

बोली-भाषा: खानाबदोश और च‍िरकुट, इन दो शब्दों का आख‍िर क्या अर्थ होता है


  ख़ानाबदोश एक फ़ारसी शब्द है जो भारत में काफी प्रचलित है। इस शब्द का विश्लेषण बड़ा रोचक है।

यह शब्द तीन अक्षरों से मिल कर बना है- ख़ाना ब दोश। यहाँ ख़ (ख़ाना) के नीचे नुक़्ता न भूलें क्योंकि बिना बिन्दु के ‘खाना’ का अर्थ भोजन हो जायेगा।

फ़ारसी शब्द ख़ाना अथवा ख़ाने का अर्थ होता है ‘घर या स्थान - जैसे पागलख़ाना, दवाख़ाना, गुसलखाना इत्यादि।

और दोश का मतलब है -‘कंधा’ ‘ब या बा’ सँग साथ के लिए लगता है।

इस तरह खानाबदोश वह लोग हुए जो अपना घर कंधे पर उठा कर चलते हैं।

वह कैसे?

ख़ानाबदोश कहीं पर भी स्थाई रूप से निवास नहीं करते। उनके पास बड़े बड़े तम्बू होते हैं और जो जगह उनके मनोकूल लगे वहीं तम्बू गाड़ कर रहने लगते हैं।

यह बंजारे पशु पालन, दस्तकारी इत्यादि का सुन्दर काम करते हैं। यह ऊँट, खच्चर, घोड़े, गाय इत्यादि जानवर भी पालते हैं और फिर इनके लिए चारागाह की तलाश में समान अपने जानवरों पर लाद और अपने तम्बू उखाड़ कर अपने कंधों पर रख आगे निकल जाते हैं।

जब सामान अपने जानवरों पर लादते हैं तो तम्बू भी उन पर लादने को कौन मना करता है? पर कहा यूँ जाता है कि ‘ख़ाना (घर) अपने कंधों पर लाद कर चलते हैं। कुछ भी हो बंजारे अपना घर अपने सँग लेकर चलते हैं।

हिन्दी में इनके लिए बंजारे शब्द का प्रयोग होता है एवं अंग्रेज़ी में जिप्सी कहते हैं।

अंग्रेजी में आमतौर पर जिप्सी शब्द भारत आदि देशों में ही घुमंतू जातियों के लिए प्रयोग होता है, परंतु वास्तव में जिप्सी एक अलग ही यूरोपीय जनजाति है जैसे हमारे देश में बकरवाल या भूटिया। ये लोग स्वयं को रोमानी या रोमा कहते हैं, जिप्सी कुछ अर्थों में अपमानजनक शब्द है। रोमानी और रोमा शब्द संयुक्त राष्ट्र आदि संगठन भी प्रयोग करते हैं। माना जाता है कि जिप्सी शब्द इजिप्शियन से आया, क्योंकि यूरोप पहुंचने पर इन्हें इजिप्ट का समझा गया। रोमा लोगों का मूल स्थान भारतीय उपमहाद्वीप का उत्तरी भाग माना जाता है।

बंजारा शब्द भी हिंदी में घुमंतू जातियों के लिए सर्वनाम बन गया है, परंतु यह शब्द भी एक खास जनजाति का नाम है, जो मुख्यतः राजस्थान से है।

खानाबदोश के लिए उपयुक्त अंग्रेजी शब्द nomad या itinerant group होगा। हिंदी में घुमंतू कहना उपयुक्त है।


मुंबइया भाषा तक स‍िमटा 'चिरकुट' शब्द, आख‍िर क्या होता है इसका अर्थ

चिरकुट शब्द की रचना संस्कृत भाषा के दो शब्दों, चिर (कहीं-कहीं इसे चीर भी माना गया है) तथा कूट के मेल से हुई है। इसका अर्थ फटा-पुराना कपडा, चिथड़ा अथवा गुदड़ है।


जायसी ने इस शब्द का प्रयोग इस प्रकार किया है :


काढ़हु कंथा चिरकुट लावा ।


पहिरहु राते दगल सुहावा ।


— जायसी


चिर — (चि + बाहुलकात् रक् ।) लम्बा समय, पुराना, स्थाई। यह विष्णु तथा शिव के नामों में भी है। लम्बे समय जीने वाले हनुमान, अश्वत्थामा आदि भी चिर कहलाते हैं।


अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥


चीर — (चिनोति आवृणोति वृक्षं कटिदेशा- दिकं वा । चि + “शुसिचिमीनां दीर्घश्च ।” उणां । २ । २५ । इति क्रन् दीर्घश्च ।) वस्त्र, कपड़ा, फटा हुआ वस्त्र, छाल, एक प्रकार का लेखन आदि। यथा:

क्षौमं दुकूलमजिनं चीरं वल्कलमेव वा ।

वसेऽन्यदपि सम्प्राप्तं दिष्टभुक्तुष्टधीरहम् ॥

— शतपथ ब्राह्मण ७.१३.३९ ॥


भावार्थ :—

अपने शरीर को ढंकने के लिए, मैं जो कुछ भी उपलब्ध है, उसका उपयोग करता हूं, चाहे वह मेरे भाग्य के अनुसार सन, रेशम, कपास, कौपीन या मृगछाला हो, और मैं पूरी तरह से संतुष्ट और अविकल हूँ।)

कुट — (कुट इ वैकल्ये । इति कविकल्पद्रुमः ॥ ) इसका अर्थ है कटना, फटना, तुड़-मुड़ा, गतिहीन होना, छल करना, धूर्तता करना, बेईमानी करना आदि। (इस अर्थ में कभी-कभी दीर्घ मात्रा भी प्रयुक्त है)।

स्त्रीबालवृद्धकितव मत्तोन्मत्ताभिशस्तकाः ।

रङ्गावतारिपाखण्डि कूटकृद्विकलेन्द्रियाः ॥

— याज्ञवल्क्यस्मृतिः व्यवहाराध्यायः साक्षिप्रकरणम् २.७० ॥

इससे बना चिरकुट, जो है फटा-पुराना। किसी व्यक्ति को यह उपमा दी जाए तो अर्थ यही कि उसका व्यक्तिगत चिथड़ों की तरह बिखरा हुआ है। इसी चिरकुट को गुलजार ने चिरंजीव कर दिया, अंगूर में संजीव कुमार के मुख से कहला कर "अगर मेरा नाम चिरकुट कुमार होता तब भी? "

बुधवार, 7 जून 2023

द्रुमकुल्य क्षेत्र अर्थात् कज़ाखस्तान: जहां श्रीराम ने समुद्र को सुखाने वाला ब्रह्मास्त्र छोड़ा था


 रामायण में एक प्रसंग आता है जब भगवान राम लंका जाने के लिए समुद्र देवता से रास्ता मांगते हैं और उन्हें रास्ता नहीं मिलता. उस समय श्री राम क्रोधित हो जाते हैं. क्रोध में आकर वह अपना धनुष उठाते हैं और समुद्र को सुखाने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाने का मन बना लेते हैं. तभी समुद्र देवता प्रकट होकर उन्हें अपनी गलती के लिए क्षमा मांगते हैं और श्री राम को बताते हैं कि वह वानरो की सहायता से समुद्र में पुल बनाकर लंका जा सकते हैं.


भगवान राम समुद्र देवता की बात सुनकर उन्हें क्षमा कर देते हैं. लेकिन क्रोध में निकाले गए ब्रह्मास्त्र को वापस नहीं रख सकते थे. तब उन्होंने समुद्र देवता से पूछा कि अब तो य बाण कहीं न कहीं छोड़ना ही पड़ेगा. इस पर समुद्र देवता उन्हें द्रुमकुल्य नाम के देश में बाण छोड़ने का सुझाव देते हैं. समुद्र देवता का कहना था कि द्रुमकुल्य पर भयंकर दस्तु (डाकू) रहते हैं जो उनके जल को भी दूषित करते रहे हैं. इस पर राम ने ब्रह्मास्त्र चाल दिया.

वाल्मीकि रामायण मे दिए गए वर्णन के अनुसार ब्रह्मास्त्र की गर्मी से द्रुमकुल्य के डाकू मारे गए. लेकिन इसकी गर्मी इतनी ज्यादा थी कि सारे पेड़-पौधे सूख गए और धरती जल गई. इसके कारण पूरी जगह रेगिस्तान में बदल गई और वहां के पास मौजूद सागर भी सूख गया. यह वर्णन बेहद आश्चर्यजनक है और जिस तरह से लंका तक बनाए गए रामसेतु को भगवान राम की एतिहासिकता के सबूत के तौर पर माना जाता है उसी तरह इस घटना को भी सही माना जाता है.

माना जाता है कि यह जगह आज का कजाकिस्तान है. कजाकिस्तान में ऐसी ढेरों विचित्रताएं हैं जो इशारा करती है. कि उसका संबंध रामायण काल से हो सकता है. वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने उत्तर दिशा में द्रुमकुल्य के लिए बाण चलाया था. वो जानते थे कि इसके असर से वहां डाकू तो मर जाएंगे लेकिन निद्रोष जीवजंतु भी मारे जाएंगे और पूरी धरती रेगिस्तान बन जाएगी.

इसलिए उन्होंने यह आशीर्वाद भी दिया कि कुथ दिन बाद वहां सुगंधित औषधियां उगेंगी, वह जगह पशुओं के लिए उत्तम, फल मूल मधु से भरी होगी. कजाकिस्तान में जिस जगह पर राम का बाण गिरा वो जगह किजिलकुम मरुभूमि के नाम से जानी जाती है. यह दुनिया का 15वां सबसे बड़ा रेगिस्तान है. स्थानीय भाषा में किजिलकुम का मतलब लाल रेत होता है. माना जाता है कि कि ब्रह्मास्त्र की ऊर्जा के असर से यहां की रेत लाल हो गई.

किजिलकुम में कई दुर्लभ पेड़-पैधे पाए जाते हैं. पास में अराल सागर है. जो दुनिया का इकलौता समुद्र है जो समय के साथ-साथ सूख रहा है. आज यह अपने मूल आकार का मात्र 10 फीसदी बचा है. किजिलकुम का कुछ हिस्सा तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान में भी है. रामेश्वरम तट से इस जगह की दूरी करीब साढ़े चार हजार किलोमीटर है.

- Alaknanda Singh 

शनिवार, 3 जून 2023

हिंदुओं को मृत्यु उपरांत RIP शब्द को इस्तेमाल नहीं करना चाहिए

 


 R.I.P यानी रेस्ट इन पीस कहना लोगों का फैशन बन गया है| लोग बिना कुछ सोचे समझे ही किसी के भी मरने पर RIP RIP की रट लगा देते हैं खासकर फेसबुक ट्विटर या व्हाट्सएप ग्रुप में। दोस्तों शब्दों में धार्मिक भेदभाव तो नहीं किया जा सकता लेकिन R.I.P शब्द का मतलब सिर्फ मुस्लिम और ईसाइयों के लिए ही सिद्ध होता है ना कि हिंदुओं के लिए|

हम इस शब्द के मतलब से अनजान अपनी तरफ से तो हम RIP शब्द का उपयोग कर मृत व्यक्ति की शांति के लिए मांग रहे होते हैं | आज मैं आपको बता देता हूं कि इस बात का अर्थ यह नहीं होता है|

आइये जानते हैं की हिंदुओं के लिए R.I.P शब्द का इस्तेमाल क्यों नहीं करना चाहिए और इसकी जगह क्या शब्द इस्तेमाल करें|

R.I.P (Rest in Peace) का अर्थ हिंदी में कहूं तो शांति से आराम करो या फिर शांति में आराम करो| शांति से आराम करो और ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे इन दोनों पंक्तियों में जमीन आसमान का अंतर है हमें इस में फर्क करना आना चाहिए|

शांति से आराम करो उन लोगों के लिए अपनाया जाता है जिन्हें कब्र में दफनाया गया है क्योंकि ईसाइयों और मुस्लिमों की मान्यताओं के अनुसार जब जजमेंट डे यानी कयामत का दिन आएगा तब सारे मृत जी उठेंगे| इस लिए मुस्लिम और ईसाई कहते हैं कयामत के दिन तक शांति से इंतज़ार करो।

ईसाई और मुस्लिम शरीर में यकीन रखते हैं मानना है कि कयामत के दिन फिर से जी उठेंगे लेकिन हिंदू इसके विपरीत पुनर्जन्म मे यकीन रखते हैं और आत्मा को अमर मानते हैं हिंदू धर्म के अनुसार शरीर नश्वर है यानी एक ना एक दिन इसे नष्ट होना ही है इसी वजह से हिंदू शरीर को जला दिया जाता है हिंदुओं का मानना है कि मरने के बाद शरीर से आत्मा ही निकल गई तो शरीर किस काम का।

भगवद् गीता (मूल श्लोकः।।2.22।) में कहा गया है क‍ि- 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही

भावार्थ: मनुष्य जैसे पुराने कपड़ों को छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है ऐसे ही आत्मा पुराने शरीरों को छोड़कर दूसरे नये शरीर में चला जाता है।
गीता में यह भी कहा गया है कि

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ 2/23

भावार्थ: इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता॥23॥

संसार के किसी भी वस्तु से हम आत्मा को छू भी नहीं सकते और ध्यान देने योग्य बात यह है कि जल वायु अग्नि तीनों ही हिंदू धर्म में देवता माने गए हैं| हिंदू धर्म के अनुसार मनुष्य अपने कर्मो के फल स्वरूप या तो मोक्ष प्राप्ति कर लेता है या फिर आत्मा नया शरीर को धारण कर लेती है |इसलिए हमारे यहां कहां जाता है,

ओम शांति सदगति
अर्थात: ईश्वर आत्मा को शांति दे मोक्ष की प्राप्ति हो|

बुधवार, 24 मई 2023

राजदंड सेंगोल: इत‍िहास के आइने से लेकर सेंट्रल व‍िस्टा तक


 

सेंगोल का आशय राजदंड से लगाया जाता है, 14 अगस्त 1947 को मध्य रात्रि पं. जवाहर लाल नेहरू को जो सेंगोल सौंपा गया था उस पर ऊपर भगवान शिव के सेवक नंदी की आकृति है. जो एक गोले पर विराजमान हैं. सेंगोल में इस गोले का अर्थ संसार से लगाया गया है. इसके ऊपर विराजमान शिव के वाहन नंदी की सुंदर नक्काशी है, जिन्हें सर्वव्यापी, धर्म व न्याय के रक्षक के वाहन के रूप में माना गया है. इसमें तिरंगे की नक्काशी भी है. 


सेंगोल को चोल वंश के राजा प्रयोग करते थे, उस समय एक राजा दूसरे चोल राजा को सत्ता हस्तांतरण इसी सेंगोल के माध्यम से करता था. जो बेहद ठोस, सुंदर नक्काशी वाला सुनहरा राजदंड था. इस पर भी भगवान शिव के वाहन नंदी की नक्काशी होती थी, इतिहासकारों के मुताबिक चोल भगवान शिव के परम भक्त थे, इसीलिए राजदंड में उनके परम भक्त नंदी की आकृति होती थी. सेंगोल के अति सुंदर कृति है, इसकी लंबाई पांच फीट है जो शिल्प कौशल से संपन्न है.


सेंगोल को उस समय तमिलनाडु के प्रसिद्ध स्वर्णकार वुम्मिडी एथिराजुलु और वुम्मिडी सुधाकर ने 10 शिल्पकारों के दल के साथ बनाया था. इसे चांदी से तैयार किया गया था और उसके ऊपर सोने की परत चढ़ाई गई थी. इस काम में 10 से 15 दिन लगे थे. सेंगोल बनाने वाले वुम्मिडी भाइयों के मुताबिक यह बहुत गर्व की बात थी.

 

श्री ला श्री तंबीरन सेंगोल को लेकर तमिलनाडु से दिल्ली तक गए थे, उन्होंने पहले इसे माउंटबेटन को सौंपा था और उसके बाद इसे वापस लेकर पवित्र जल से शुद्ध किया था. इसके बाद पं. जवाहर लाल नेहरू के आवास पर जाकर सेरेमनी में श्री ला श्री तंबीरन ने तत्कालीन राष्ट्रपतित पं. राजेंद्र प्रसाद और अन्य गणमान्य लोगों की उपस्थिति में इसे नेहरू जी को सौंपा था. 

बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

आज फेसबुक पर ''सभी मर्द एक जैसे होते हैं'' को लेकर कुछ यूं पढ़ा...आप भी देखें


 सभी मर्द एक जैसे होते हैं।

कौन मर्द ?

जो बाप बनकर ताउम्र तुम्हारी हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख्वाहिशों को पूरी करता है,जिसे अपने फटे हुए जूते सिलवाने याद रहे ना रहे लेकिन अपनी बिटिया के लिए स्कूल ड्रेस खरीदना कभी नहीं भूलता है जो महज तुम्हारी छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक गुड़िया और एक तुम्हारी पहली स्कूटी और साइकिल के लिए रोज 4 घंटे ओवरटाइम के नाम पर घर लेट आया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना?

सभी मर्द एक जैसे होते हैं।

कौन मर्द ?

वही मर्द ना ,जो भाई बनकर ताउम्र अपनी ख्वाहिशों को मार कर अपने सारे खिलौने तुम्हे दे दिया करता है, तुम्हें डांट ना पड़े इसलिए अपने बाप से मार भी खा लिया करता है, लाख लापरवाह रहे हो वो, लेकिन तुम्हारे एक तरफ उठने वाली हर एक नजर को वह फोड़ दिया करता है वही मर्द ना जो जिंदगी भर पागलों की तरह हंसता रहता है लेकिन तुम्हारी विदाई में फूट फूट कर रोया करता है वही मर्द ना जो जिंदगी के भाग दौड़ में सबसे दूर भाग कर तुम्हारे एक फोन कॉल का इंतजार करता है तुम उसे मर्द की बात कर रही हो ना?

सभी मर्द एक जैसे होते हैं।

कौन मर्द ?

वही मर्द ना जो पति बनकर अपने लड़कपन को एक ही झटके में खत्म कर देता है 80 की रफ्तार से चलाने वाला बाइक अचानक से 40 की रफ्तार में अपने जिम्मेदारियों को थाम लेता है मंगलसूत्र का पहचान वह मर मर्द ता उमर तुम्हारी छोटी छोटी ख्वाहिशों के लिए अपने हर बड़े बड़े अरमानों को मार दिया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना जो पति बनकर हर उम्र में एक दोस्त की तरह तुम्हारा साथ दिया करता है बोलो ना तुम उसी की बात कर रही हो ना?

सभी मर्द एक जैसे होते हैं

कौन मर्द ?

वही मर्द ना जो प्रेमी बनकर पूरी दुनिया को भूलाकर बस तुमसे मोहब्बत करता है तुम्हारे हर झूठे तुम्हारे हर कहानी की बातों को सच मानकर तुमसे बेइंतेहा इश्क करता है वह तुम्हारी झूठ में भी खुद के लिए सच खोज लिया करता है तुम्हारी एक मुस्कान के लिए अपना सब कुछ निछावर कर दिया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना जो प्रेमी बनकर अपनी प्रेमिका के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाया करता है अरे बोलो ना, अरे चुप क्यों हो, बताओ ना की बात कर रही हो ना?

सभी मर्द एक जैसे होते हैं । 

कौन मर्द ??

वही मर्द ना जो दोस्ती के रिश्ते में एक दोस्त बनकर तुम्हें परिवार का हिस्सा मान लेता है जो तुम्हें पिज़्ज़ा खिलाने के लिए खुद के लिए बल्ला खरीदने का पैसा निकाल कर तुम्हें पिज्जा खिला देता है, वही मर्द ना जो मात्र दोस्ती का रिश्ता होने के बावजूद भी पूरी दुनिया से तुम्हारे लिए लड़ जाया करता है तुम्हें सब से बचाता है तुमसे हमेशा गाली खाता है लेकिन तुम्हारी आंखों में कभी आंसू नहीं आने देता वही मर्द ना जो तुमसे लड़ता है झगड़ते है तुम्हें रुलाता है और फिर तुम्हें हंसाने के लिए खुद जोकर बन जाया करता है बताओ ना तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना?

सभी मर्द एक जैसे ही होते है 

कौन मर्द ??

वही मर्द जो एक बेटा बन कर हमेशा अपनी मां का ढाल बन कर खड़ा रहता है वही मर्द जिसकी हर तम्माना को पूरी करने के लिए मां रात भर जागती है और मां के बुढ़ापे में वही लड़का एक ढाल बन कर मां की सेवा करता है मां के लिए उसका बेटा ही सबसे बेहतर होता है मां के लिए उसका बेटा ही हीरो है , हां ये बात सही है कि शादी होने के बाद वही कुछ बेटे अपनी मां को घर से निकाल कर वृद्ध आश्रम में भेज देते है लेकिन उनके इस कुकर्म के लिए क्या सिर्फ मर्द ही जिमेद्दार होते है लेकिन इन सब से दूर हिंदुस्तान के आज भी हर घर में श्रवण कुमार जैसे बेटे रहते है जिनके लिए उनकी मां ही उनकी दुनिया है ,

बताओ ना क्या तुम उसी मर्द की बात कर रहीं हो जो अपनी मां के लिए जान भी देते है 

courtsey: Facebook

गुरुवार, 26 जनवरी 2023

ब्रज में बसंत : कुछ इस तरह स्‍वागत करते हैं बसंत का सभी ब्रजवासी

 


 

सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग यमुना तट।।

जटित क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट।

ब्रज में यूं तो ऋतुओं की भरमार है किंतु एक ऋतु ऐसी है जो ब्रज में अपने उन्माद को लिए हुए नित्य विराजमान है और वह है वसंत ऋतु। वृंदावन के रसिक आचार्य ने तो यहां तक कहा है की ब्रज से वसंत कभी भी एक क्षण के लिए बाहर नही जाता अपितु वह तो सदा सर्वदा यही श्री राधा कृष्ण की सेवा में रत रहता है। बसंत पंचमी का उत्सव इसी के अंतर्गत मनाया जाता है।

ज्योतिष एवं आयुर्वेद के अनुसार चैत्र तथा वैशाख मास को वसंत ऋतु माना गया है। शल्य चिकित्सा के प्रवर्तक सुश्रुत ने तो वसंत के लिए कहा है कि “मधुमाधवौ वसन्तः” अर्थात मधु(चैत्र) और माधव(वैशाख) ही वसंत है। तैत्तिरीय संहिता में भी कहा गया है कि “मधुश्व माधवश्व वासन्तिकावृत” अर्थात् मधु और माधव मास ही वसन्त ऋतु। तैत्तिरीय ब्राह्मण में ऋतुओं का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि “तस्य ते वसन्तः शिरः” अर्थात् वर्ष का सिर (शीर्ष) ही वसन्त ऋतु है। कालिदास ने वसंत ऋतु के वर्णन में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ऋतुसंहार में कहा है “सर्वप्रिये चारूतरं वसन्ते” अर्थात वसंत ऋतु में सब कुछ मनोहर ही मालूम पड़ता है। इसके साथ ही गीत गोविंद में श्री जयदेव गोस्वामी लिखते है “विहरति हरिरिह सरस वसंते” अर्थात वसंत के वियोग से सभी दिशाएं प्रसन्न हो रही है। किंतु वर्तमान लोकांचल यानी उत्तर एवं पूर्वी भारत में मुख्यतः वसंत का आगमन माघ शुक्ल पंचमी अर्थात वसंत पंचमी के दिन ही माना जाता है।

वसंत ऋतु के आगमन की बात करें तो माघ मास में भगवान भास्कर के मकर राशि में प्रवेश के उपरांत शीत ऋतु का प्रकोप कम होने लगता है। माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋतुराज वसंत का आगमन पृथ्वी पर एक उत्सव के रूप में होता है। बसंत के स्वागत में वसुधा अपने रूप को सँवार कर बसंत का स्वागत करती है। बसंत के आगमन पर संपूर्ण सृष्टि में मादकता सी छा जाती है साथ ही पेड़ों के नवीन पात, वन उपवन में फूलों से लदी डाली, आम के बौर, कोयल की कूक एवं सरसों के रूप में पीली चुनर ओढ़े धरती यह सब सूचना देती हैं कि बसंत अब आ चुका है।

ब्रज में यह उत्सव अत्यंत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जहां प्राय भारत में अन्य जगह इस उत्सव पर लोग पीले वस्त्र धारण कर वाग्देवी श्री सरस्वती मां का पूजन अर्चन करते है वही दूसरी और ब्रज में यह उत्सव कुछ अलग ही ढंग से मनाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन से ब्रज के सुप्रसिद्ध ४५ दिवसीय होलीकोत्सव का प्रारंभ हो जाता है। वसंत पंचमी को ब्रज में होली का प्रथम दिन माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ऋतुओं में स्वयं को वसंत ऋतु बताया है :-

बृहत्साम तथा साम्नांगायत्री छन्दसामहम।

मासानां मार्गशीर्षोहमृतूनां कुसमाकरः।।

गायी जानेवाली श्रुतियों में बृहत्साम हूँ, वैदिक छन्दों में गायत्री छन्द हूँ, बारह महीनों में मार्गशीर्ष हूँ तथा छः ऋतुओं में, मैं ही वसन्त हूँ।

ब्रज के गांवों, नगरों एवं मंदिरों में वसंत उत्सव मनाने की परंपरा अनवरत रूप से आज भी जारी है। बसंत पंचमी से ब्रज में बसंत उत्सव का श्रीगणेश हो जाता है। इस दिन ठाकुरजी नवीन पीले वस्त्र धारण करते है। मंदिरों की सजावट भी पीले साज, वस्त्रों एवं फूलों से की जाती है। यहां तक कि पुजारी भी पीले वस्त्र पहन कर ही मंदिरों में सेवा करने हेतु पधारते है। नए सरसों के फूल ठाकुरजी को वसंत आगमन के उपलक्ष्य में निवेदित किए जाते है। साथ ही साथ कई जगह तो विशेष पीले रंग के भोग निवेदित किए जाते है। अपने इष्ट के मनमोहक स्वरूप को देखकर बृजवासी प्रेम के वशीभूत होकर सहज ही गा उठते हैं-
“श्यामा श्याम बसंती सलोनी सूरत को श्रंगार बसंती है”

श्री राधा कृष्ण की जो छटा है वह भी वसंती है (नित्य नवीन) तथा उनका श्रृंगार भी वसंती है।

बसंत पंचमी के दिन होली का डांढ़ा (खूंटा) गढ़ जाता है। होली का डांढ़ा वास्तव में वह खम्बा होता है जिसके ऊपर होलिका दहन हेतु लकड़ियाँ लगाई जाती है। आज से ही वृंदावन में होली का प्रारंभ भी हो जाता है। सभी देवालयों में होलिकाष्टक( होली से आठ दिन पहले) तक राजभोग पर यानि दोपहर समय अबीर गुलाल उड़ाया जाता है। विश्वविख्यात ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में प्रसाद स्वरूप अबीर -गुलाल भक्तों और दर्शनार्थियों के ऊपर बहुत ही अधिक मात्रा में उड़ाया जाता है।

इसी के साथ वृंदावन में स्थित शाह बिहारी मंदिर में बसंत पंचमी के दिन बसंती कमरा 3 दिनों के लिए खुलता है। रंग- बिरंगी रोशनी से सराबोर बसंती कमरे में विराजमान ठाकुर राधा रमण लाल की अलौकिक छटा होती है। यह कमरा वर्ष में बहुत ही कम दिनों के लिए खुलता है। इस कमरे में बेल्जियन कांच के बने झाड़ फ़ानूस लगे हुए है जिससे इसकी शोभा और बढ़ जाती है। होली का छेता निकलने के साथ ही वृंदावन के प्रमुख मंदिर श्री राधावल्लभ मंदिर, श्री राधारमण मंदिर, श्री राजबिहारी कुंज बिहारी मंदिर, श्री राधा दमोदर मंदिर आदि अन्य मंदिरों में भी बसंत उत्सव का प्रारंभ हो जाता है।

कुहू कुहू कोकिला सुनाई। सुनि सुनि नारि परम हरषाई।।
बार बार सो हरिहि सुनावति। ऋतु बसंत आयौ समुझावति।।
फाग-चरित-रस साध हमारै। खेलहिं सब मिलि संग तुम्हारै।।
सुनि सुनि ‘सूर’ स्याम मुसुकाने। ऋतु बसंत आयौ हरषाने।।

कोयल की कुहू कुहू सुनकर सभी सखियाँ हर्ष से फूली नहीं समा रही है और वह श्री कृष्ण को नित्य विहार हेतु यह कह कर मना रही है कि सुनो प्रिय वसंत ऋतु का आगमन हो चूका है। अतः अंत में सखियों के मनाने से श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्काने लग जाते है और सखियों के संग वसंत उत्सव मानने चले जाते है।

 वृंदावन के मंदिरों में बसंत की समाज भी अद्भुत होती है। वाणी साहित्य में श्यामा- श्याम के बसंत खेल का वर्णन प्रचुर मात्रा में किया गया है। इन पदों का गायन ठाकुर जी के समक्ष पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ किया जाता है। ब्रज में बसंत गायन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। रसिक उपासना का केंद्र रहे वृंदावन में बसंत लीला को निकुंज लीला से जोड़कर भी देखा जाता है। हरित्रयी के नाम से विख्यात रसिक संत स्वामी श्री हरिदास जी, श्री हरिराम व्यास जी एवं श्री हित हरिवंश जी ने अपने रचित पदों में बसंत का भरपूर गान किया है। वृंदावन की मंदिर परंपरा में आज भी बसंत के इन पदों का गान किया जाता है। ब्रज में बसन्त पूजन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।

बसंत पंचमी पूजन विधि
महावाणी’ नामक ग्रंथ में बसंत पूजन विधि का विशद वर्णन किया गया है जिसे गोलोक वृन्दावन (नित्य वृन्दावन जहां केवल राधा कृष्ण एवं सखियाँ होती है) में सखियाँ मिल कर सम्पादित करती है। इसमें मुख्य रूप से सखियों द्वारा पुष्प समर्पण और संगीत द्वारा सेवा निवेदित कर श्री राधा कृष्ण की वसंत सेवा को बड़ी ही सुंदरता के साथ बताया गया है। चूंकि भौम वृंदावन उस गोलोक वृंदावन का ही प्रतिबिंब है इसलिए ठीक उसी प्रकार वृंदावन एवं ब्रज में वसंत पंचमी पर उत्सव आदि किए जाते है। हरिभक्तिविलास के अनुसार वसंत पंचमी पर मंदिरों में नव पत्र, पुष्प एवं अनुलेपन द्वारा मंदिरों में पूजा संपादित की जाती है। श्री राधा कृष्ण की वसंत के नए पीले सरसों के फूल चढ़ाए जाते है। इसके साथ ही संगीत सेवा जो कि वृंदावन की सेवा परिपाटी का अभिन्न अंग है वो भी वसंत पंचमी पर विशेष महत्व रखती है। वसंत राग का प्रारंभ इसी दिन से शुरू हो जाता है व समाज गायन ने वसंत राग से भरे पदावलियों का गायन किया जाता है।

और राग सब बने बराती दुल्हो राग बसंत,

मदन महोत्सव आज सखी री विदा भयो हेमंत।

रसिक शिरोमणि स्वामी हरिदास वृंदावन की रस निकुंज में जहाँ कुंजबिहारी अपना वसंतोत्सव मना रहे हैं, इस दिव्य रस उत्सव का दर्शन कराते हुए गान करते हैं-

कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि, चलहु न देखन जाँहि।

नव-बन नव निकुंज नव पल्लव नव जुबतिन मिलि माँहि।

बंसी सरस मधुर धुनि सुनियत फूली अंग न माँहि।

सुनि हरिदास” प्रेम सों प्रेमहि छिरकत छैल छुवाँहि।।

सखी कह रही है की चलो नव पल्लवों से युक्त वसंत से ओत प्रोत उस कुञ्ज की ओर चले जहां श्याम वंसी बजा रहे है। उस कुञ्ज में सभी आनंद से फुले हुए है और प्रेम रूपी अबीर ही सब पर डाला जा रहा है।

भारतेंदु बाबू द्वारा रचित ‘मधु मुकुल’ की पंक्तियां वृंदावन के बसंत का वर्णन कुछ इस प्रकार करती हैं-

एहि विधि खेल होत नित ही नित, वृन्दावन छवि छायो।

सदा बसन्त रहत जँह हाजिर,कुसुमित फलित सुहायो।।

वृन्दावन की दिव्य लीलास्थली पर नित प्रति वसंत का खेल होता ही रहता है। यहां वसंत सदा सर्वदा पुष्पित पल्लवित होकर विराजमान है।

वृंदावन और बसंत का संबंध अभिन्न है। इस संबंध के विषय में जितना कहा जाए उतना ही कम प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण का पूरा जीवन हर्ष का प्रतीक है ,उल्लास का प्रतीक है, नवीनता का प्रतीक है और ऐसे में वसंत से सुन्दर और कौन सी ऋतु होगी जिसमे स्वयं भगवान प्रफुल्लित न हो। इस ऋतु के आगमन से चहुँ और वनस्पति की छटा पुनः हरी भरी होनी शुरू हो जाती है। सर्दी के आलस्य को त्याग प्रकर्ति दोबारा पुष्पित पल्लवित नव कलेवर में जाने को तत्पर रहती है। वातावरण में एक विचित्र ऊर्जा विद्यमान रहती है तथा सरसो से लहलहाते हुए खेत मानव ह्रदय को एक अलग ही भाव से भर देते है। वास्तव में वसंत और कुछ नहीं भगवान कृष्ण द्वारा दिया हुआ समस्त मानव जाति को एक छुपा हुआ सन्देश है जिसमे वह आवाहन कर रहे है कि हम सब अपने जीवन के उल्लास को सभी व्याधि और कष्टों से हटकर पुनः जीवित करे ताकि आनंद सदा सर्वदा बना रहे। क्योंकि जब तक आनंद है तब तक रस है और जब तक रस है केवल तब तक ही नवीनता है क्योंकि रस का आनंद तभी तक है जब तक वो नवीन रहता है अर्थात ताज़ा रहता है जैसे ही वह बासी हुआ वैसे ही अधोगति प्रारम्भ। अपने जीवन को सदा वृन्दावन बनाये ताकि नवीनता सदा बनी रहे और स्वयं रसमूर्ति श्रीकृष्ण आपके ह्रदय रूपी रसशाला में विहार करते रहे।

नवल वसंत, नवल वृंदावन, नवल ही फूले फूल,
नवल ही कान्हा, नवल सब गोपी, नृत्यत एक ही तूल।
नवल ही साख, जवाह, कुमकुमा, नवल ही वसन अमूल,
नवल ही छींट बनी केसर की, भेंटत मनमथ शूल।
नवल गुलाल उड़े रंग बांका, नवल पवन के झूल,
नवल ही बाजे बाजैं, “श्री भट” कालिंदी के कूल।
नव किशोर, नव नगरी, नव सब सोंज अरू साज,
नव वृंदावन, नव कुसुम, नव वसंत ऋतुराज ।

शनिवार, 21 जनवरी 2023

ध्रुव तारा के बारे में वो सबकुछ, जो आप जानना चाहते हैं

 ध्रुव तारा उत्तर ध्रुव से सीधे आकाश की ओर प्रक्षेपित काल्पनिक सीधी रेखा पर या उसके आसपास स्थित सबसे चमकीले तारे को कहते हैं।

ध्रुव तारा की विशेषता यह है कि पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध पर स्थित किसी भी एक जगह से यह रात्रि आकाश में हमेशा एक ही जगह दिखाई देता है अर्थात स्थिर रहता है - जिससे उत्तर दिशा जानने में उत्तरी गोलार्ध में मदद मिलती है और हजारों सालों से नाविक और यात्री इस बात का फायदा उठाते रहे हैं।

प्रेक्षक का latitude (अक्षांश) पता चलता है


 जो सबसे अहम बात है वह यह है कि ध्रुव तारे का स्थान रात्रि आकाश में कमोबेश एक ही रहता है लेकिन ध्रुव तारे समय के साथ बदल जाते हैं। ऐसा 2-4 हजार सालों के उपरांत होता है।

वर्तमान में, लघु सप्त ऋषि (Ursa Minor) तारा समूह के polaris (पोलैरिस) तारा को ध्रुव तारा के नाम से जाना जाता है लेकिन यह हमेशा से ध्रुव तारा नहीं रहा है

जैसे, कॉमन्स एरा 1 AD (2200 वर्ष पूर्व) की शुरुआत में kochab (कोकब) ध्रुव तारा था। उससे भी 3000 वर्ष पूर्व यानी कलियुग की शुरुआत में Thuban (थुबन) ध्रुव तारा था। 1800 वर्षों के उपरांत वर्तमान ध्रुव तारा Polaris की जगह Errai ध्रुव तारा हो जाएगा।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी का अक्ष 23.5° झुका हुआ है और सूर्य व चंद्रमा के सम्मिलित गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से (equator पर उभरे व ध्रुवों पर पिचके होने के कारण) पृथ्वी ध्रुवीय अक्ष पर नाचती (wobble करती) है। इसीलिए जब पृथ्वी घूमती है तो दोनों ध्रुवों को मिलाने वाली सीधी रेखा भी इसी कोण से घूमती है और हकीकत में पृथ्वी का घूर्णन एक लट्टू के जैसा होता है अर्थात पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव भी लट्टू के जैसा घूमता रहता है।

 चित्र में Polaris वर्तमान ध्रुव तारा है

पृथ्वी के precession (लट्टुनुमा घूर्णन) के कारण आकाश में ध्रुव तारों का बदलाव पथ। 

इस precessional path पर एक संपूर्ण चक्कर की अवधि 25,772 वर्ष (लगभग 25,800 या 26,000 वर्ष ) है। ध्रुवीय पथ के तारे आसमान में लगभग स्थिर रहते हैं, लेकिन पृथ्वी के उत्तर ध्रुव से निकल कर आकाश से मिलने वाली रेखा बदलती रहती है और बदलते रहते हैं ध्रुव तारे भी।

चित्र में मात्र 4 ध्रुव तारे दिखाए गए हैं लेकिन हकीकत में यह 8 हैं जिनका क्रमवार विवरण निम्न है। 
Forbes के अनुसार- 

Polaris ( 300 AD - 4000 AD)
Errai ( 4 - 8 हज़ार AD)
Aldermin (8000 -10000 AD)
Deneb (10000 - 14000 AD)
Vega ( 14000 -18,000 AD)
Hercules ( 4000 - 8000 BC) अंतिम ग्लेशियल (glacial) काल की समाप्ति और समस्त विश्व में तापमान वृद्धि के कारण पाषाणकालीन युग का आरम्भ
Thuban (1700 BC - 4000 BC) पिरामिड काल , सिंधु घाटी सभ्यता, मेसोपोटामिया की सभ्यता सहित विश्व की समस्त प्राचीनतम सभ्यताओं का काल, द्वापर के अंतिम हज़ार वर्ष और कलियुग की शुरुआत
Kochab (1700 BC - 300 AD) वैदिक काल की समाप्ति से लेकर पौराणिक काल के आरंभ तक।

ध्रुव तारा के बारे में दो खास बातें

ध्रुव तारा उत्तरी गोलार्ध में ना केवल उत्तर दिशा दिखाता है बल्कि
अक्षांश भी बताता है आप जहां से भी ध्रुव तारा को देखें ध्रुव तारा आसमान में उतनी डिग्री ही ऊँचा दिखेगा जितनी डिग्री आपका अक्षांश है।
अर्थात, उत्तरी ध्रुव पर यह सीधा ऊँचा दिखेगा और इक्वेटर पर एकदम जमीन/सागर/क्षितिज को छूता हुआ।

ध्रुव तारे के बारे में प्रचलित कुछ आम किंवदंतियाँ जो गलत हैं।

1. आसमान का सबसे चमकीला तारा ध्रुव तारा है।

   गलत।

  तथ्य: डॉग स्टार या Sirius आसमान का सबसे चमकीला तारा है ।
  ध्रुव तारा आसमान का 48 वां चमकीला तारा है।

2. ध्रुव तारा बिल्कुल सही (accurately) उत्तर दिशा बताता है।

गलत ।

तथ्य:

ध्रुव तारा लगभग उत्तर दिशा को बताता है पर बिल्कुल accurately नहीं।

अभी भी ध्रुव तारा बिल्कुल (खगोलीय) उत्तरी ध्रुव पर नहीं है, बल्कि 45' हट कर है ।
। आज से 2000 वर्ष पूर्व polaris जब ध्रुव तारा नहीं था तब यह उत्तरी ध्रुव से 12° दूर था । सन 1000 में ध्रुव तारा के रूप में स्थापित होने के बावजूद यह (खगोलीय) उत्तरी ध्रुव से लगभग 6° दूर था (स्रोत stellarium app ) । यह उत्तरी ध्रुव के ठीक ऊपर कभी भी नहीं होगा और जब यह उत्तरी ध्रुव के नजदीक तम होगा तब भी यह न्यूनतम 27' 09" से अलग रहेगा।

ध्रुव तारा के बारे में कुछ कम ज्ञात तथ्य

दक्षिणी गोलार्ध में ध्रुव तारा दिखाई नहीं देता है; अर्थात ऑस्ट्रेलिया, न्यूजलैंड, अर्जेंटीना चिले और उरुग्वे आदि से कोई भी व्यक्ति ध्रुव तारा नहीं देख सकता है।
ध्रुव तारा की चमक स्थिर नहीं रहती है, बल्कि हर चौथे दिन यह चमक का एक चक्र पूरा करता है यानी सबसे कम चमक (2.13) से लेकर सबसे ज्यादा चमक (1.86) जो कि पहले 10% का अंतर था और अब 4%। वैज्ञानिक इसका सही-सही कारण अभी भी नहीं जानते हैं।[15]
वर्तमान ध्रुव तारा एकल तारा (Single Star) नहीं है बल्कि 3 तारों का समूह है।

 
विभिन्न संस्कृति और ध्रुव तारा
स्वयंभू मनु के पुत्र उत्तानपाद की प्रथम पत्नी सुनीति से उत्पन्न पुत्र ध्रुव से राजा उत्तानपाद का इतना लगाव नहीं था और उनकी गोद में बैठने पर उसे दूसरी पत्नी सुरुचि के तानों का सामना करना पड़ा। उसके पश्चात सप्त ऋषियों से परामर्श कर ध्रुव ने मथुरा स्थित मधुबन में घनघोर तपस्या की जिसके उपरांत विष्णु भगवान ने प्रकट होकर समस्त देवताओं और तारों से भी ऊपर ध्रुव को आसमान में सबसे ऊंचा स्थान प्रदान किया जिसे आज हम ध्रुव तारा के नाम से जानते हैं और समस्त रात्रि आकाश इसी के इर्द-गिर्द घूमता हुआ नजर आता है (संदर्भ विष्णु पुराण अध्याय 11 - 12)

( उपरोक्त अनुसार विष्णु पुराण की रचना विधि 300 AD के बाद संभवत पांचवीं- छठी शताब्दी होगी।)

साथ ही सप्त ऋषि तारामंडल 23 घंटे 56 मिनट में ध्रुव तारा का एक चक्कर पूरा कर लेता है, जो कि पृथ्वी की अपने धुरी पर एक चक्कर लगाने की सटीक (Exact)अवधि है।

अरबी दंत कथाओं में इसे एक बुरा तारा माना गया है जिसने आसमान के महान योद्धा को मारकर सप्त ऋषि तारामंडल में दफन कर दिया।

नार्थ चंद कथाओं में इसे देवताओं द्वारा फेंका गया एक पाइप माना गया है जिसके चारों ओर विश्व घूमता है।

मंगोल दंत कथाओं में इसे वह कील माना गया है जो समूचे विश्व को जोड़ता है।

पृथ्वी के precessional circle पर 8 ध्रुव तारों का चित्र- 26,000 वर्षों का चक्र




ध्रुव तारा माने जाने के कुछ सर्व सम्मत आधार

यह पृथ्वी के precessional circle पर तत्कालीन celestial उत्तरी ध्रुव के निकट हो - लगभग 7° तक
यह नंगी आँखों से (बिना टेलिस्कोप) के आसानी से दिखाई दे अर्थात चमक 4 से ज्यादा। हालांकि नंगी आँखों से + 6.5 चमक वाले तारे को देखा जा सकता है। लेकिन आसानी से दिखने हेतु और चमकदार यथा + 4 चमक जरूरी माना जाता है। सूर्य की चमक - 27 , पूर्णिमा के चाँद की चमक -12.7 और vega की चमक 0 मानी जाती है। अर्थात मान बढ़ने से चमक घटती है।

- Alaknanda Singh

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

क्‍या है छावला रेप एंड मर्डर केस, जिसके सभी आरोपी सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए ?


 10 साल पुराने 19 साल की एक युवती से बलात्कार और उसकी हत्या वाला छावला रेप एंड मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर 2022 को फैसला सुनाते हुए  तीनों आरोपियों को रेप और मर्डर के आरोप से बरी कर दिया। ज़ाहिर है कि लोग तो गुस्‍से में आने ही थे। आखिर इतने जघन्य अपराध के मामले में कोई दोषी क्‍यों नहीं पाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है, उससे पता चलता है कि इस केस की पूरी जांच में ही गलतियां हुईं और फिर सुनवाई में भी यही हाल रहा।


आइए देखते हैं कि छावला रेप एंड मर्डर केस क्या है?

9 फरवरी साल 2012, युवती अपने ऑफिस से लौट रही थी। कुतुब विहार इलाके से तीन लोगों ने उसे किडनैप कर लिया। शिकायत होने पर पश्चिम दिल्ली के छावला पुलिस स्टेशन में अपहरण का मामला दर्ज किया गया। 13 फरवरी को पुलिस ने तीन आरोपियों को अरेस्ट किया। उनकी कार जब्त की। युवती का क्षत-विक्षत शव हरियाणा में रेवाड़ी जिले के रोढाई गांव के एक खेत में मिला, ऐसा पुलिस ने बताया था।

छावला रेप मामले में ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में क्या हुआ? 

26 मई 2012 को निचली अदालत ने तीनों आरोपियों के खिलाफ किडनैपिंग, रेप, मर्डर और दूसरे अपराधों में आरोप तय किए। करीब दो साल बाद 13 फरवरी को कोर्ट ने तीनों आरोपियों को रेप और मर्डर का दोषी करार दिया। उसी साल 19 फरवरी को सुनाए गए फैसले में अदालत ने कहा था कि दोषियों पर कोई रहम नहीं की जा सकती, लिहाजा फांसी की सजा सुनाई जा रही है।

इस फैसले के खिलाफ दोषियों ने अपील की, लेकिन हाई कोर्ट ने उसी साल अगस्त में अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत से सुनाई गई फांसी की सजा सही है। उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में आया। पूरी सुनवाई के बाद 7 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यू यू ललित, जस्टिस रवींद्र भट और जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच ने आरोपियों को बरी कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए जो सवाल

कोर्ट ने कहा कि किसी भी जांच अधिकारी ने आरोपियों की टेस्ट-आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई। लिहाजा आरोपियों की शिनाख्त ठीक तरीके से तय नहीं हो सकी।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने इंडिका कार 13 फरवरी 2012 को जब्त की और कहा कि इसी कार में पीड़िता को किडनैप किया गया था, लेकिन किसी भी गवाह ने इस कार का रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं देखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीट कॉन्सटेबल्स से पूछताछ और जिरह नहीं की गई, जिससे ‘आरोपियों की गिरफ्तारी की पूरी कहानी शक के दायरे में आ गई।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन हालात में आरोपियों को अरेस्ट किया गया और कार को जब्त किया गया, उससे ‘अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गई स्टोरी पर गहरे शक पैदा होते हैं।’ कोर्ट ने कहा कि इस बात का सबूत भी साफ नहीं है कि जिस जगह पर पीड़िता का शव मिलने की बात बताई गई, वहां सबसे पहले कौन पहुंचा था।

पुलिस ने कहा था कि पीड़िता का शव रेवाड़ी जिले के गांव के एक खेत में तीन दिनों तक पड़ा रहा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शव के सड़ने के कोई संकेत नहीं मिले थे और इस बात की गुंजाइश बेहद कम है कि तीन दिनों तक खेत में खुले पड़े रहने पर भी शव को कोई न देखे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का पूरा केस ‘परिस्थितियों से जुड़े सबूत’ पर टिका था। जो सबूत पेश किए गए, उनको ‘परिस्थितियों से मिलाकर’ देखने पर साबित होता है कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का दोष साबित करने में नाकाम रहा। ‘दोष सिद्ध करने के लिए जिन परिस्थितियों का हवाला दिया जाता है, उनसे एक कंप्लीट चेन बननी चाहिए। ऐसी चेन जिससे इस नतीजे पर पहुंचने में कोई शंका न रह जाए कि अपराध आरोपियों ने ही किया था, किसी और ने नहीं। परिस्थितियों से जुड़े सबूत इस तरह कंप्लीट होने चाहिए कि आरोपियों के दोषी होने के सिवा और किसी हाइपोथेसिस की बात ही न हो पाए।’

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों और पीड़िता की डीएनए प्रोफाइलिंग और मैचिग के लिए सैंपल कलेक्शन, स्टोरेज और उसकी जांच के बारे में भी सवाल उठाए। आरोपियों और पीड़िता के सभी सैंपल जांच एजेंसी ने 14 फरवरी और 16 फरवरी 2012 को लिए थे। ये सैंपल जांच के लिए 27 फरवरी 2012 को लैबोरेटरी भेजे गए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कलेक्शन से लेकर लैबोरेटरी में भेजे जाने के बीच सैंपल ‘पुलिस स्टेशन के मालखाना में पड़े रहे। ऐसे हालात में नमूनों से छेड़छाड़ की आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता। न तो ट्रायल कोर्ट और न ही हाई कोर्ट ने इस बात की जांच की थी कि डीएनए रिपोर्ट्स के नतीजों का आधार क्या था। न ही उन्होंने यह देखा कि जांच करने वाले एक्सपर्ट ने सही तरीका अपनाया या नहीं। ऐसा कोई सबूत सामने नहीं था, लिहाजा डीएनए प्रोफाइलिंग से जुड़ी सारी रिपोर्ट संदेह के दायरे में आ गईं, खासतौर से यह देखते हुए कि जांच के लिए भेजे गए नमूनों का कलेक्शन और उनको सील करने की प्रक्रिया भी शक के दायरे में है।’

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की मदद के लिए नियुक्त की गईं वकील सोनिया माथुर ने डीएनए रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। माथुर का कहना था कि नमूनों की कलेक्शन प्रक्रिया शक के घेरे में है। उनका कहना था कि फोरेंसिक एविडेंस न तो वैज्ञानिक और न ही कानूनी रूप से साबित होता है, लिहाजा इसे आरोपियों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी सोनिया माथुर की इस राय से इत्तिफाक जताया।

पुलिस ने जो इंडिका कार जब्त की थी, उसकी सीट कवर पर मिले खून के धब्बों और सीमेन को जांच के लिए CFSL भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ब्लडस्टेन और सीमेन को जांच के लिए भेजे जाने के ब्योरे को भरोसे लायक नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि इस बात का कोई साफ सबूत नहीं है कि जब्त किए जाने के बाद से जांच के लिए CFSL भेजे जाने तक कार किसके पास थी। यह भी साफ नहीं था कि इस दौरान कार को सील किया गया था या नहीं।

अभियोजन पक्ष ने कहा था कि पीड़िता के शव से आरोपी का बाल मिला था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह दावा विश्वास करने लायक नहीं दिखता। कोर्ट ने कहा कि दावा किया जा रहा है कि बाल पीड़िता के शव से मिला, लेकिन वह शव खेत में करीब तीन दिन और तीन रात तक खुले में पड़ा था।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में हुई सुनवाई के बारे में भी काफी कुछ कहा। आइए देखते हुए कोर्ट ने क्या कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने सचाई तक पहुंचने के प्रयास नहीं किए। बेंच ने कहा कि ट्रायल के दौरान ‘कई बड़ी गलतियां’ हुई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट का सेक्शन 165 जज के सवाल पूछने के अधिकार से जुड़ा है और यह सेक्शन ट्रायल कोर्ट को इस बात का ‘असीमित अधिकार’ देता है कि वह सच तक पहुंचने के लिए सुनवाई के किसी भी चरण में गवाहों से कोई भी सवाल पूछ सकता है। बेंच ने कहा, ‘कई फैसलों में यह बात कही जा चुकी है कि जज से चुपचाप अंपायरिंग करने की अपेक्षा नहीं की जाती है। इसके बजाय यह उम्मीद की जाती है कि जज ट्रायल में सक्रियता दिखाएंगे और सही नतीजे पर पहुंचने के लिए गवाहों से सवाल करेंगे।’

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की गिरफ्तारी से लेकर सैंपल कलेक्शन सहित पूरी जांच प्रक्रिया में गलतियां पाईं। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में हुए ट्रायल पर भी सवाल उठाए। आखिर में इस साल 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों से ठीक से जिरह नहीं की गई थी और आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई के उनके अधिकार से वंचित रखा गया।

कुलमिलाकर देश में कानून का राज स्‍थापित करने का सपना हमें बहुत दूर दिखाई देता है क्‍योंकि न्‍याय की आस को धूमिल करने की उतनी ही दोषी हैं जितनी कि पुलिस कार्यवाही।  है ना कमाल की बात आरोपियों को बचने का हरसंभव प्रयास करती दिखती ये संस्‍थाऐं पूरे सिस्‍टम का मखौल उड़ा रही हैं और हम अब भी चुप हैं।

Compiled: Legend News 

रविवार, 30 अक्टूबर 2022

स्टांप पेपर पर लड़कियों की नीलामी: राजस्‍थान में बच्चियों की 'नीलामी' के सच का पूरा काला चिट्ठा


 अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत समेटे राजस्थान कई सदियों से अपनी वीरता, शौर्य, पराक्रम, भक्ति और सौदर्य के लिए दुनियाभर में विख्यात रहा है। रियासतकालीन शहरों और यहां की विरासत को निहारने आज भी देसी-विदेशी सैलानियों का तांता लगा रहता है। लेकिन सप्ताह भर से मरुधरा की अलग ही तस्वीर मीडिया रिपोर्ट्स में पेश की जा रही है। इन रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कई इलाकों में आज भी यहां लड़कियों की नीलामी होती हैं। बच्चियों का सौदा किया जाता है। दबाव बनाने के लिए महिलाओं से दुष्कर्म और स्टाम्प पेपर पर खरीद-फरोख्त होती है। देर से ही सही एक दिन पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी चुप्पी तोड़ी और मामले की जांच पड़ताल की बात कर सच तक पहुंचने और कारगुजारी करने वालों को नहीं बख्शने की बात कही। राष्ट्रीय महिला आयोग, विपक्षी दल, सामाजिक संगठनों ने भी पूरजोर आवाज उठाई। सच क्या है? जानने के लिए राजस्थान राज्य महिला आयोग ने जिला कलेक्टर और एसपी से रिपोर्ट भी तलब की। हुआ भी कुछ ऐसा ही। शनिवार को पुलिस के मुखिया डीजीपी एमएल लाठर और जिला कलेक्टर आशीष मोदी ने इस पूरे मामले की जानकारी देते हुए कई खुलासे किए।

पुलिस ने माना ऐसा हुआ, तीन साल पहले 25 लोगों के खिलाफ जुर्म साबित
राजस्थान के पुलिस महानिदेशक पुलिस महानिदेशक एमएल लाठर ने शनिवार को कहा कि 'पहले कुछ समाज विशेष में घर की महिलाओं से वेश्यावृत्ति कराए जाने जैसी सामाजिक कुरीति व्याप्त थी। वर्तमान में राजस्थान पुलिस की ओर से ऐसी अनैतिक गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखकर इन घटनाओं पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा चुका है। इन अवांछित गतिविधियों के संबंध में सूचना प्राप्त होते ही पुलिस ने तुरंत विधिक कार्रवाई अमल में लाई जा रही है।' मीडियो रिपोर्ट्स वाला मामला 3 साल पुराना है। कथित मामले में दो पीड़ित लड़कियों को अजमेर के नारी निकेतन में रखा गया है। 2019 में इस मामले में 25 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर अदालत में जुर्म साबित किया जा चुका है। 
बच्चियों की खरीद-फरोख्त की सूचना पर पुलिस ने शुरू की निगरानी
पुलिस महकमे के मुखिया ने बताया महिलाओं राज्य के विरुद्ध घटित अपराधों पर राजस्थान पुलिस अत्यंत संवेदनशील है। महिला अत्याचार से संबंधित प्रकरणों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। इन अपराधों की रोकथाम एवं अनुसंधान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। महिलाओं एवं नाबालिगों की खरीद-फरोख्त संबंधी समाचार सामने आने के बाद लाठर ने बताया कि महिलाओं एवं नाबालिगों की खरीद-फरोख्त एवं अनैतिक कार्य कराए जाने के संबंध में संवेदनशील स्थानों पर लगातार पुलिस निगरानी रख आसूचना एकत्रित कर रही है। 
लड़कियों की नीलामी या खरीद-फरोक्त आम थी, फिर चलाया ऑपरेशन गुड़िया
पुलिस के बयान अनुसार इलाके में कुछ समाज विशेष के परिवारों में महिलायों से गलत काम कराया जाता था। ऐसी परम्परा कई वर्षों से चली आ रही थी। इस तबके में इस तरह के अपराधों के खिलाफ पुलिस ने साल 2019 में अभियान भी चलाया। लड़कियों की खरीद-फरोख्त के संबंध में यह अभिया भीलवाड़ा जिले में ऑपरेशन गुड़िया के नाम से चलाया गया था।
बच्चियों को किडनैप कर अड्‌डों पर पहुंचा जाता, जवान होने की दवा खिलाई जाती
पुलिस के बयानों में कई खुलासे हुए हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि बच्चियों को किडनैप कर उन्हें अड्‌डों पर लाया जाता था। इन्हीं अड्‌डों पर बच्चियों को जवान बनाने के लिए दवाइयां दी जाती। फिर जिस्मफरोशी के धंधे में धकेल दिया जाता। पुलिस के बयान में यह भी बताया गया है कि पुलिस टीम ने अपह्रत बच्चियों को अपहरणकर्ताओं से खरीद वेश्यावृत्ति करवाने वाले आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया है।
भीलवाड़ा और अजमेर के 5 अड्‌डों पर धकेला जाता
बच्चियों और महिलाओं को आरोपी भीलवाड़ा और अजमेर के अड्‌डों पर पहुंचाते। इन अड्‌डों में भीलवाड़ा का इटुन्दा, पंढेर और हनुमान नगर शामिल है। वहीं अजमेर के सांवर थाना क्षेत्र का नापाखेडा और जसवंत नगर में भी वेश्यावृत्ति के अड्डा संचालित हो रहा था। इन्हीं अड्डों पर किडनैप कर लाई गई बच्चियों को दवाओं के जरिए से जवान बनाया जाता और फिर वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेला जाता।
मुंबई, एमपी और यूपी तक जुड़े हैं तार, 7 बच्चियों को छुड़ाया गया
बच्चियों और महिलाओं के जिस्मफरोशी के दलदल में धकेलने वाले गिरोह के बारे में पुलिस ने कई ओर खुलासे किए हैं। पुलिस जांच के हवाले से बताया गया है कि गिरोह के तार राजस्थान के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश एवं मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र से जुड़े थे। तीन साल पहले हुई कार्रवाई के दौरान इन राज्यों के कई स्थानों पर दबिश दी गई थी। नाबालिग समेत सात पीड़ित बच्चियों को दस्तयाब कर लड़कियां खरीदने एवं बेचने वाले कई आरोपियों को गिरफ्तार कर जांच के बाद 25 आरोपियों के खिलाफ अदालत में चालान पेश किया गया।
पुलिस की पड़ताल में अब और हो सकते हैं खुलासे
पुलिस ने अब तक 2019 के ऑपरेशन गुड़िया और 7 बच्चियों के रेस्क्यू का जिक्र किया है। यह भी बताया है कि 25 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन ताजा मीडिया रिपोर्ट्स की पड़ताल अभी बाकी है। स्थानीय सूत्रों की मानें तो 2019 जैसे हालात अब भी कई पिछड़े इलाकों में हो सकते हैं। एक रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया है कि स्टांप पेपर पर लड़कियों की नीलामी की जा रही है और जाति पंचायतों के फरमान पर महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि राजस्थान राज्य महिला आयोग ने इस बारे में प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट पर भीलवाड़ा जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से लड़कियों की नीलामी को लेकर तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है।

-Compiled

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

करवा चौथ: दर्पण के उस पार का सच कुछ और भी है

देश, समाज और रिश्‍ते..सबकी मजबूती और गहराई उसकी जड़ों से मापी जाती है...जड़ों की मजबूती जिस रूप में इन्‍हें थामती हैं, वे उसी तर्ज पर आगे बढ़ते हैं। यह सतत प्रक्रिया है कि परिवार से समाज और इससे फिर देश तक की समृद्धि का आंकलन उसकी जड़ों के आधार पर ही किया जाता है।

इसमें आश्‍चर्य नहीं कि जड़ों को क्‍यों 'स्‍त्रीलिंग' माना गया, कारण साफ है कि स्‍त्री परिवार की जड़ होती है क्‍योंकि परिवार में हर संबंध का आधार स्‍त्री से प्रारंभ होकर उसके व्यवहार से तय होता है। इसीलिए सारे तीज-त्‍यौहार स्‍त्रियों को केंद्र मानकर बने, और इनका पालन भी स्‍त्रियों के ही जिम्‍मे रहा क्‍योंकि वह जड़ ही होती है जो तने को संबल देकर वटवृक्ष तक बनाती है, करवा चौथ भी ऐसे त्‍यौहारों में से एक है। 

वर्तमान में करवा चौथ से रूप को देखकर कई विचार मन में आ रहे हैं, कुछ धार्मिक तो कुछ सामाजिक, कभी सोचती हूं कि लीक पर चलकर सब कुछ जस का तस मानती चलूं, मगर मन विद्रोह करता है क्‍योंकि जिस उद्देश्‍य के साथ ये त्‍यौहार पवित्रता और प्रेम को साथ लेकर चला आज वह अपने अत्‍यंत विध्‍वंसक रूप में हमारे सामने है।

परिवार में आपसी प्रेम और मन की स्‍थिरता के लिए भगवान शिव, माता गौरी व भगवान गणेश की आराधना का ये पर्व आज एकमात्र पति-पत्‍नी के उस प्रेम में समेट दिया गया है जो बाजार के हाथों की कठपुतली बना हमारे सामने है। पढ़ी लिखी स्‍त्रियों द्वारा भी परंपरा के नाम पर इसे ''बस यूं ही'' मनाया जाता रहा। इसके व्रत का वास्‍तविक उद्देश्‍य तो गायब ही हो गया है। 

हालत अब ये हो गई है कि व्रत से एक दिन पहले किसी रेस्‍टोरेंट में जाकर भरपूर खाना, फिर रोज़ा की भांति 'सरगी' के नाम पर सुबह उठकर खा लेना, महंगे गिफ्ट की लालसा, सारे दिन टीवी या मनोरंजन के अन्‍य साधन पर समय व्‍यतीत करना आदि ...सब कुछ होता है, जो नहीं होता वह है भगवान की आराधना...। 

कहा जाता है कि करवा चौथ व्रत के दिन महिलाएं निर्जला रहकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। कुंवारी लड़कियां भी मनवांछित वर या होने वाले पति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन पूरे विधि-विधान से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने के बाद करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। फिर रात के समय चंद्रमा को अर्घ्‍य देने के बाद ही यह व्रत संपन्‍न होता है। 

परंतु जो कुछ दिख रहा है उसे भी झुठलाया नहीं जा सकता। कैसे आंखें फेर लें हम, क्‍या बस इसलिए चुप रहें कि कोई हमें नास्‍तिक कहकर आलोचना ना कर दे। इस कटु सत्‍य को नकारने का ही नतीज़ा है कि परिवार की जड़ें कमजोर हो चुकी हैं, हर तीसरा घर छिन्‍नभिन्‍न हो रहा है। तलाक के मामले बेतहाशा बढ़ रहे हैं। संपत्‍तियों के लिए पति-पत्‍नी के बीच 'सौदेबाजी' और ब्‍लैकमेलिंग आज का एक 'कड़वा और घिनौना' सच है जो उत्‍तरोत्‍तर बढ़ ही रहा है। जब धन का बोलबाला होता है तो आध्‍यात्‍मिकता यूं भी तिरोहित हो जाती है।  

स्‍त्रियों की आर्थिक सबलता हमें एक बढ़ते वृक्ष की तरह दिख तो रही है परंतु उसकी जड़ें लगातार खोदी जा रही हैं। वे जड़ें जो मजबूत रिश्ते, प्यार और विश्वास का प्रतीक हैं, जिनकी कि स्‍त्रियां स्‍वयं संवाहक हैं। 

बेहतर हो कि प्रेम और आस्था के इस पर्व करवाचौथ पर बाहरी सुंदरता चमकाने की बजाय भीतरी सुंदरता अर्थात् आध्‍यात्‍मिकता की ओर ले जाया जाये ताकि हम परिवार की जड़ों को मजबूत कर सकें। स्‍त्रियों के लिए करवाचौथ तो एक माध्‍यम है कर्तव्‍यों वाली अपनी जड़ों की ओर देखने का कि बाहरी सजावट से नहीं आध्‍यात्‍मिक चिंतन और आराधना से ही परिवार और पति-पत्‍नी सुखी रह सकते हैं। परिस्‍थितियों को बिगाड़ने में समय नहीं लगता सुधारने में लगता है, फिर भी मैं आशावान हूं कि ये यदि ऐसा हो पाता है तो बेहतर समाज और देश के लिए यह निश्‍चित ही एक उपलब्‍धि होगी।

- अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022

भेदभाव का खुला दस्तावेज है वक्फ अधिनियम 1995

 

1954 में वक्फ की संपत्ति और उसके रखरखाव के लिए वक्फ एक्ट-1954 बनाया गया था। कोई भी ऐसी चल या अचल संपत्ति वक्फ की हो सकती है, जिसे इस्लाम को मानने वाला कोई भी व्यक्ति धार्मिक कार्यों के लिए दान कर दे। देशभर में वक्फ की संपत्तियों को संभालने के लिए एक केंद्रीय और 32 स्टेट वक्फ बोर्ड हैं। 1995 में वक्फ कानून में संशोधन करते हुए वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियां दे दी गईं। कानून कहता है कि यदि वक्फ बोर्ड किसी संपत्ति पर अपना दावा कर दे, तो उसे उसकी संपत्ति माना जाएगा।

यदि दावा गलत है तो संपत्ति के मालिक को इसे सिद्ध करना होगा। 2013 में फिर इसमें संशोधन किए गए। अब वक्फ बोर्ड और वक्फ की संपत्तियां फिर चर्चा में हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने वक्फ की संपत्तियों का सर्वे कराने का निर्णय लिया है। देश में सेना और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा संपत्ति वक्फ के पास है। इसकी संपत्तियां आठ लाख एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैली हैं। पिछले 13 साल में वक्फ की संपत्ति करीब दोगुनी हो गई है। ऐसे कई तथ्य हैं, जो इस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करते हैं। जब यह कानून बना था, तब इसे लेकर भले ही कुछ तार्किक कारण रहे हों, लेकिन आज यह पूरी तरह से कब्जे और वसूली का माध्यम बनता दिख रहा है। ऐसे में वर्तमान देश-काल और परिस्थिति में वक्फ कानून और उसके अधिकारों की सामयिकता और संवैधानिकता की पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

वक्फ अधिनियम 1995 की संवैधानिकता को चुनौती
वक्फ अधिनियम, 1995 की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दी थी। अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के लिए स्थानांतरण याचिका दी है। याचिका में उन्होंने इस अधिनियम को संविधान के विभिन्न प्रविधानों की कसौटी पर परखा है। यह अधिनियम धार्मिक आधार पर भेदभाव करता है। वक्फ संपत्तियों के रखरखाव के लिए जिस तरह की कानूनी व्यवस्था की गई, वैसी व्यवस्था हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई या अन्य किसी पंथ के अनुयायियों के लिए नहीं है। यह पंथनिरपेक्षता, एकता एवं अखंडता की भावना के विपरीत है।

यदि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अनुरूप धार्मिक स्वतंत्रता के संरक्षण की बात करता है, तो इसमें अनुच्छेद 14 और 15 के अनुरूप सभी धर्मों एवं संप्रदायों के लोगों के लिए समानता होनी चाहिए, किंतु यह केवल मुस्लिम समुदाय के लिए है।

यदि यह अधिनियम अनुच्छेद 29 व 30 के तहत अल्पसंख्यकों के हित की रक्षा की बात करता है, तो इसमें जैन, बौद्ध, ईसाई व अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए था, किंतु ऐसा नहीं है।

इंडियन ट्रस्टीज एक्ट 1866, इंडियन ट्रस्ट एक्ट 1882, चैरिटेबल एंडामेंट एक्ट 1890, आफिशियल ट्रस्टीज एक्ट 1913 और चैरिटेबल एंड रिलीजियस एक्ट 1990 जैसे अधिनियमों के तहत सभी समुदायों से जुड़े ट्रस्ट व दान आदि का प्रबंधन किया जाता है। इन सभी को साथ लाने के बजाय एक धर्म पर केंद्रित वक्फ कानून बना दिया गया।

न्याय की व्यवस्था के विरुद्ध
संविधान ने तीन तरह के न्यायालयों की व्यवस्था की है। अनुच्छेद 124-146 के तहत संघीय न्यायपालिका, अनुच्छेद 214-231 के तहत हाई कोर्ट और अनुच्छेद 233-237 के तहत अधीनस्थ न्यायालय। संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि सभी तरह के नागरिक विवाद संविधान के तहत बनी न्यायपालिकाओं में ही सुलझाए जाएं। ऐसे में वक्फ ट्रिब्यूनल को लेकर इस अधिनियम में की गई व्यवस्था संविधान द्वारा प्रदत्त न्याय व्यवस्था के विरुद्ध है।

अनुच्छेद 27 का स्पष्ट उल्लंघन
वक्फ बोर्ड में मुस्लिम विधायक, मुस्लिम सांसद, मुस्लिम आइएएस अधिकारी, मुस्लिम टाउन प्लानर, मुस्लिम अधिवक्ता, मुस्लिम बुद्धिजीवी और मुतावल्ली होते हैं। इन सभी को सरकारी कोष से भुगतान किया जाता है, जबकि केंद्र या राज्य सरकारें किसी मस्जिद, मजार या दरगाह की आय से एक भी रुपया नहीं लेती हैं। दूसरी ओर, केंद्र व राज्य सरकारें देश के चार लाख मंदिरों से करीब एक लाख करोड़ रुपये लेती हैं, लेकिन उनके लिए ऐसा कोई अधिनियम नहीं है। यह अनुच्छेद 27 का स्पष्ट रूप से उल्लंघन है, जिसमें व्यवस्था दी गई है कि किसी व्यक्ति को ऐसा कोई कर चुकाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है, जिसका प्रयोग किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि के लिए हो।

वक्फ बोर्ड के असीमित अधिकार
वक्फ अधिनियम, 1955 की धाराओं 4, 5, 6, 7, 8, 9 और 14 में वक्फ संपत्तियों को विशेष दर्जा दिया गया है, जो किसी ट्रस्ट आदि से ऊपर है। हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई व अन्य समुदायों के पास सुरक्षा का कोई विकल्प नहीं है, जिससे वे अपनी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड की संपत्ति में शामिल होने से बचा सकें, जो एक बार फिर समानत को लेकर संविधान के अनुच्छेद 14, 15 का उल्लंघन है।

संपत्ति के अधिकार भी सुरक्षित नहीं
अधिनियम की धारा 40 में वक्फ बोर्ड को अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी संपत्ति के बारे में यह जांच कर सकता है कि वह वक्फ की संपत्ति है या नहीं। यदि बोर्ड को लगता है कि किसी ट्रस्ट, मुत्त, अखरा या सोसायटी की कोई संपत्ति वक्फ संपत्ति है, तो वह संबंधित ट्रस्ट या सोसायटी को नोटिस जारी कर पूछ सकता है कि क्यों न उस संपत्ति को वक्फ संपत्ति में शामिल कर लिया जाए। यानी संपत्ति का भाग्य वक्फ बोर्ड या उसके अधीनस्थों पर निर्भर करता है। यह अनुच्छेद 14, 15, 26, 27, 300-ए का उल्लंघन है।

लिमिटेशन एक्ट से भी छूट
वक्फ के रूप में दर्ज संपत्ति को रिकवर करने के लिए लिमिटेशन एक्ट के तहत भी कार्रवाई नहीं की जा सकती है। धारा 107 में वक्फ की संपत्तियों को इससे छूट दी गई है। इस तरह की छूट हिंदू या अन्य किसी भी संप्रदाय से जुड़े ट्रस्ट की संपत्तियों के मामले में नहीं है।

दीवानी अदालतों की सीमा से भी बाहर
धारा 83 के तहत ट्रिब्यूनल का गठन करते हुए विवादों की सुनवाई के मामले में दीवानी अदालतों का अधिकार छीन लिया गया है। संसद के पास ऐसा अधिकार नहीं है जिसके तहत वह ऐसा ट्रिब्यूनल गठित कर दे, जिससे न्याय व्यवस्था को लेकर संविधान के अनुच्छेद 323-ए का उल्लंघन होता हो। वक्फ बोर्ड को कई ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जो इसी तरह के अन्य ट्रस्ट या सोसायटी के पास नहीं हैं।