उसकी प्यास खून की नहीं थी। वो हर रात जलती लाशों के पास बैठ कर लोगों की गर्मी चूस लेता था। कोई रोता हुआ बेटा, कोई विधवा — वो पास आता, उसकी छाती पर बैठता, और फुसफुसाता, "दे दे... थोड़ी जिंदगी दे दे..." सुबह तक वो इंसान आधा मरा मिलता।
तांत्रिक आए, कील ठोकी, सरसों फेंकी। पिशाच हँसता रहा। क्योंकि उसे बांधा नहीं जा सकता था, उसे सिर्फ तृप्त किया जा सकता था।
फिर आया शिवा। उम्र 24, चित्रकूट का लड़का। उसकी छोटी बहन डूब कर मरी थी, अस्थि कलश लेकर आया था। शिवा की माँ देवी की परम भक्त थी। बचपन में उसने शिवा को एक ही चीज़ रटाई थी —
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
माँ कहती थी, "बेटा, ये मारण मंत्र नहीं है। ऐं सरस्वती है, ह्रीं महालक्ष्मी, क्लीं महाकाली। चामुण्डा वो है जो अंधेरे को भी माँ की तरह गोद में ले लेती है। जब डर लगे तो लड़ना मत, माँ को बुलाना।"
रात के दो बजे शिवा अकेला घाट पर बैठा था। पंडित ने कहा था सुबह विसर्जन होगा। वो माला नहीं लाया था, बस बहन की फ्रॉक हाथ में थी। मन भारी था तो होंठ अपने आप चल पड़े — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे... ॐ ऐं ह्रीं क्लीं...
तभी राख में से ठंडी हवा उठी। चिताओं की लपटें नीली पड़ गईं। सामने वो खड़ा था — कालू। आठ फुट लंबा, पेट पीठ से चिपका, आँखें अंगारे जैसी, नाखूनों में चिता की राख।
वो शिवा पर झपटा। शिवा गिरा, पर मंत्र रुका नहीं। डर में भी उसके होंठ हिल रहे थे।
पिशाच ने उसकी गर्दन पकड़ी। बर्फ जैसी पकड़। शिवा की सांस रुकने लगी। तभी कुछ अजीब हुआ। मंत्र की आवाज़ शिवा के गले से नहीं, उसकी छाती से निकल रही थी। हर 'क्लीं' पर पिशाच का हाथ काँपा।
पिशाच चिल्लाया, "बंद कर! ये आग है!"
शिवा ने आँखें खोलीं। उसने देखा पिशाच की आँखों में भूख नहीं, दर्द था। उसने मंत्र बंद नहीं किया, पर एक हाथ आगे बढ़ा कर पिशाच के जलते हुए माथे को छू लिया।
सत्तर साल में पहली बार किसी ने उसे मारा नहीं, छुआ था।
जैसे ही शिवा की गर्म उंगलियाँ उसके माथे पर लगीं, मंत्र बदल गया। अब वो सिर्फ ध्वनि नहीं थी, वो करुणा बन गई। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे — हर बीज एक देवी बन कर उतरा। ऐं ने उसे ज्ञान दिया कि वो कौन था, ह्रीं ने उसे लज्जा दी कि वो क्या बन गया, क्लीं ने उसके अंदर की भूख को प्रेम में बदला।
पिशाच घुटनों पर आ गया। उसकी देह से काला धुआँ निकलने लगा। वो रोया, "मुझे मत जलाओ... मुझे सिर्फ एक बार किसी ने 'बेटा' कहा होता... मैं भूखा नहीं, अकेला मरा था।"
शिवा ने उसे गले लगा लिया। जलती चिता के पास एक जिंदा लड़का एक मरे हुए पिशाच को पकड़ कर रो रहा था, और लगातार जप रहा था — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
धीरे धीरे पिशाच का रूप बदला। लंबी जीभ सिमट गई, नाखून गिर गए। वो एक दुबला पतला बूढ़ा बन गया, आँखों में आँसू।
उसने कहा, "माँ आ गई।"
उसी पल घाट की सबसे पुरानी चिता अपने आप बुझ गई, और उस राख से एक नीली लौ उठी जो सीधा आकाश में चली गई। बूढ़ा वहीं बैठे बैठे मुस्कुराया और राख बन कर गंगा में मिल गया।
सुबह डोम ने शिवा से पूछा, "रात में चीखें सुनीं, तू जिंदा कैसे?"
शिवा ने सिर्फ इतना कहा, "मैंने मंत्र से उसे मारा नहीं, मैंने मंत्र से उसे माँ सुनाई। चामुण्डा मारती नहीं, वो अपने बच्चों को — चाहे वो देव हों या पिशाच — गोद में लेती है।"
उस दिन के बाद मणिकर्णिका पर 'कालू' कभी नहीं दिखा। पर लोग कहते हैं अमावस की रात जब कोई अकेला घाट पर रोता है, तो हवा में हल्की सी आवाज़ आती है —
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे...
और रोने वाले को लगता है जैसे किसी ठंडे हाथ ने नहीं, किसी माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया हो।
कहानी का सार: मंत्र में बिजली नहीं, ममता होती है। पिशाच की सबसे बड़ी प्यास खून नहीं, स्पर्श थी। और जब इंसान डर कर भागने की जगह गले लगा ले, तभी निर्वाण होता है।
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