शुक्रवार, 6 मार्च 2026
बेटी के सामने सरेआम फांसी पर लटके और मुस्कुराते पिता ने ही लिख दी थी ईरान की बर्बादी की कहानी
मंगलवार, 20 जनवरी 2026
इसे वो पढ़ें जो हर वक्त कहते हैं कि ''क्या करें...फुरसत ही नहीं मिल रही''....
पहले ऊपर का चित्र देखिए फिर पढ़िए आज की ये पोस्ट...ये उनके लिए है जो हर वक्त काम और काम से घिरे रहते हैं..गोया ये कोई सफल होने की या यूं कहें कि सफल होते दिखने की शर्त हो...तो इसे वो पढ़ें जो हर वक्त कहते हैं कि ''क्या करें...फुरसत ही नहीं मिल रही''....
जब से आपने काम करना शुरू किया है, आपका दिमाग सालों से ओवरटाइम कर रहा है, तब भी जब आप छुट्टी पर होते हैं।
ज़्यादातर लोगों के लिए काम के बाद एक नॉर्मल शाम कुछ ऐसी होती है:
1- आपके बच्चे बातें कर रहे होते हैं।
2- आपका पार्टनर अपने दिन के बारे में बता रहा होता है।
3- आप सिर हिला रहे होते हैं, लेकिन आपका दिमाग अभी भी उस मीटिंग रूम में होता है।
और यह पैटर्न हर जगह आपका पीछा करता है जैसे कि-
- किचेन में सब्ज़ियाँ काट रहे हैं मगर छूटी हुई डेडलाइन के बारे में सोच रहे हैं
- परिवार के साथ डिनर कर रहे हैं मगर मन ही मन अपने मैनेजर की कही बात दोहरा रहे हैं।
- छुट्टी पर गए हैं परंतु WhatsApp और ईमेल चेक करने से बाज नहीं आते, स्वयं से ही बहाना बनाते हैं कि "बस ज़रा सा ही तो देखा है"
- सोने की कोशिश करते हैं परंतु मन ही मन कल की स्लाइड डेक को एडिट कर रहे होते हैं
- नहाते समय भी मन ही मन किसी कलीग से बहस कर रहे होते हैं।
बाहर से, आप ठीक दिखते हैं।
आपके पास नौकरी है, घर है, फ़ोन है, ज़िंदगी "ठीक-ठाक" दिखती है।
मगर अंदर, आपका नर्वस सिस्टम अपना स्विच ऑफ़ करना भूल गया है।
एक ऐसी कीमत है जो आपकी पेस्लिप पर कभी नहीं दिखती।
- आपका ध्यान। आपकी नींद।
- जिन लोगों से आप प्यार करते हैं उनके साथ आपका सब्र।
- बिना कमाए खुशी महसूस करने की आपकी काबिलियत।
आपको लगने लगता है कि यह बस बड़ा होने जैसा है।
इसलिए आप शांत इशारों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
- जिस तरह आप छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाते हैं।
- जिस तरह छुट्टियां वैसी ही चिंता के साथ एक अलग जगह जैसी लगती हैं।
- जिस तरह आपका शरीर कभी हल्का महसूस नहीं करता, रविवार दोपहर को भी नहीं।
एक समय पर, यह काम के बारे में होना बंद हो जाता है। यह एक नर्वस सिस्टम बन जाता है जिसे अब याद नहीं रहता कि जब कुछ भी गलत न हो तो सुरक्षित कैसे महसूस किया जाए।
यह प्रोडक्टिविटी नहीं है। यह क्रोनिक सर्वाइवल है।
2025 में, पूरे भारत में 500 से ज़्यादा लोग जो अलग-अलग लेवल पर इसी तरह के रूटीन से गुज़र रहे थे, ऐसे लोगों को लेकर एक किताब आई है #RelaxPlayThrive , जिसके ज़रिए एक पैटर्न देखा गया कि अलग-अलग सैलरी, अलग-अलग शहर, अलग-अलग कहानियाँ हैं सबकी परंतु बदलाव के लिए सभी लालायित हैं ।
दिमाग 24x7 काम कर रहा है, शरीर जिन्हें घर आना नहीं आता था। अच्छी खबर यह है कि आपका सिस्टम इसे फिर से सीख सकता है।
आपको दिन में सिर्फ़ पाँच से दस मिनट, छोटी-छोटी रेगुलर आदतें चाहिए, और ज़िंदगी अंदर से बाहर तक अलग लगने लगती है।
सबसे अच्छी बात यह है कि यह सब तब हो सकता है जब आप Relax Play Thrive खेलते हैं।
शनिवार, 3 जनवरी 2026
इंसानी क्रूरता की गवाह यह तस्वीर #Epic है... वाह LepaRadić
यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति 7 मई, 1945 को हुई जब जर्मन सशस्त्र बलों ने मित्र राष्ट्रों के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण अगले दिन, 8 मई को प्रभावी हुआ मगर इस बीच प्रभावित लोगों ने इंसान की क्रूरता का हर वो पहलू देख लिया था जिसके दिए जख्मों को आज जमाना बीत जाने के बाद भी नहीं भरा जा सका। इसीबीच एक तस्वीर सामने आई तो सोचा कि इसे सभीे के साथ शेयर करूं।
हिटलरशाही के खिलाफ खड़े रहकर फांसी का फंदा गले में डलवाने वाली #LepaRadić की है ये तस्वीर, वो एक #Bosnian टीनेजर थी जिसे #WorldWarII के दौरान #Nazis को गोली मारने के लिए फांसी दे दी गई थी।
उसके आखिरी पलों में... हिटलर की फौज ने उसके साथियों के नाम बताने के बदले उसकी जान बख्शने की पेशकश की। उसने मना कर दिया, और कहा: "मैं अपने लोगों की गद्दार नहीं हूं। जिनके बारे में तुम पूछ रहे हो, वे तब सामने आएंगे जब वे सभी बुरे लोगों को, आखिरी वाले तक, खत्म करने में कामयाब हो जाएंगे।"
यह लड़की, सिर्फ़ 17 साल की थी जब इसे मौत की सज़ा सुनाई गई।
वो बोली- मैं चाहती हूं कि यह पता चले, और यह कि मैं याद किए जाने की हकदार बनी रहूं, यह भी सच है कि वह मौत से डरती थी, हां, लेकिन वह इतनी बहादुर थी कि उसने अपने देश के लोगों को धोखा देने के बजाय फांसी पर चढ़ना पसंद किया।
गुरुवार, 1 जनवरी 2026
इन आठ कविताओं से करें नववर्ष का स्वागत.. देश और विदेश के कवियों की रचनाओं का कलेक्शन
नए की परिभाषा क्या है, मुझे नहीं मालूम कि इसे कैसे परिभाषित करूं। सोचती हूं कि जो बीत गया उसके बासीपन की बात करूं या जो अभी अभी आया है उसकी ताजगी पर कुछ लिखूं ..तो क्या इतनाभर करने से नए को परिभाषित कर पाऊंगी... संभवत: नहीं.. क्योंकि यह एक अहसास है जो नवागत से जुड़ी अनेक संभावनाओं पर टिका है... इन्हीं संभावनाओं पर हमारे देश और विदेश के कवियों ने जो कुछ लिखा, उसका कलेक्शन यहां नए साल पर अपने-अपने मायने दर्ज कराता हुआ दिखता है। तो आइये उन्हीं की नज़र से करें स्वागत नवागत का...
कुछ आठ कविताओं को मैंने नववर्ष के स्वागत के लिए चुना है।
1. नववर्ष का सर्वप्रथम कवि सोहनलाल द्विवेदी की कविता से 2026 का स्वागत करें -
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;
दीनों दुखियों का त्राण लिये
मानवता का कल्याण लिये,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।
संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिये,
मेरे भारत के लिये नई
प्रेरणा नया उत्थान लिये;
मुर्दा शरीर में नये प्राण
प्राणों में नव अरमान लिये,
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!
युग-युग तक पिसते आये
युग-युग तक पिसते आये
कृषकों को जीवन-दान लिये,
कंकाल-मात्र रह गये शेष
मजदूरों का नव त्राण लिये;
श्रमिकों का नव संगठन लिये,
पददलितों का उत्थान लिये;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!
सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिये,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिये;
जीवन में नूतन क्रान्ति
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!
2. दूसरे नंबर पर प्रकृति का संपूर्ण चित्र उकेरती कवि जगदीश व्योम की 'नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन' को पढ़ें ... अच्छा लगेगा
आमों पर खूब बौर आए
भंवरों की टोली बौराए
बगिया की अमराई में फिर
कोकिल पंचम स्वर में गाए
फिर उठें गंध के गुब्बारे
फिर महके अपना चन्दन वन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !
गौरैया बिना डरे आए
घर में घोंसला बना जाए
छत की मुंडेर पर बैठ काग
कह कांव-कांव फिर उड़ जाए
मन में मिसिरी घुलती जाए
सबके आंगन हों सुखद सगुन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!
बच्चों से छिने नहीं बचपन
बच्चों से छिने नहीं बचपन
वृद्धों का ऊबे कभी न मन
हो साथ जोश के होश सदा
मर्यादित बनी रहे फैशन
जिस्मों की यूं न नुमाइश हो
बदरंग हो जाए घर आंगन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!
घाटी में फिर से फूल खिलें
फिर स्त्री के शिकारे तैर चलें
बह उठे प्रेम की मन्दाकिनी
हिम-शिखर हिमालय से पिघलें
सोनी मचले, महिवाल चले
रांझे की हीर करे नर्तन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !
विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
पर चले शांति के ही पथ पर
हिन्दी भाषा के पंख लगा
कम्प्यूटर जी पहुंचें घर-घर
वह देश रहे खुशहाल `व्योम'
धरती पर जहां प्रवासी जन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !
3. तीसरे नंबर पर मैं सुप्रसिद्ध रूसी कवयित्री अन्ना अख्मातोवा की रचना देना चाहूंगी- 'नए साल का गीत' जिसे बीसवीं सदी की वैश्विक कविता के प्रमुख स्वर के रूप में समादृत किया गया। इसे कांता द्वारा हिंदी में अनुवादित कर 'पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव' के रूप में हमें सुलभ कराया गया। इसी संकलन से ली हुई नवर्ष पर लिखी उनकी रचना ये रही ...।
बादल की छाया में थका चाँद,
धुँधली डालता है निगाह
पहाड़ी पर।
छह जनों के लिए लगी थी मेज़,
और ख़ाली थी सिर्फ़ एक जगह।
नए साल को आते देख रहे हैं
मेरे पति, मैं, और मेरे दोस्त।
रँगी हैं क्यों मेरी उँगलियाँ
जैसे ख़ून से?
ज़हर की तरह जलती क्यों शराब?
आकर्षक—जग—उठा मेज़बान
भरा हुआ ले कर गिलास।
पीता हूँ मैं धरती के लिए—
हमारे अपने वन क्षेत्रों से भरी—
स्थित हैं हम सब जहाँ।
एक दोस्त ने देखा मेरा चेहरा,
सहसा किया कुछ याद, प्रभु जाने, क्या,
और बोला ज़ोर से :
पीता हूँ मैं उसके गीतों के लिए,
जीवित हैं हम सब जिन में।
किंतु वह तीसरा, समझे बिना,
जैसे ही निकला बाहर अँधेरे में,
मेरे सोच का देते हुए जवाब, बोला :
पीना चाहिए हमें उसके लिए,
अभी तक नहीं है जो हमारे साथ।
4. चौथा नंबर आता है तेलुगू कविता 'मन्मथावाहन' का... जिसे रायप्रोलु वेंकट सुब्बाराव ने लिखा और इसका हिंदी में अनुवाद किया है हनुमच्छास्त्री अयाचित ने जिसे ' साहित्य अकादेमी' द्वारा पुस्तक : भारतीय कविता 1954-55 में प्रकाशित गया।
हनुमच्छास्त्री अयाचित (Hanumachchastri Ayachit) एक विद्वान और लेखक थे, जिन्होंने तेलुगु भाषा और साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया, खासकर हिंदी में 'तेलुगु और उसका साहित्य' नामक पुस्तक लिखी, जो तेलुगु साहित्य का एक परिचयात्मक अध्ययन है, जिसमें उन्होंने स्वयं को 'हनुमच्छास्त्री, अयाचित' के रूप में प्रस्तुत किया है।
तो लीजिए ये रही नववर्ष पर लिखी 'मन्मथावाहन'-
हे प्रभु!
हे नववर्ष मन्मथ!
इस नव वर्षारंभ के उत्सवों में
हमारे मनोरथ जब मधु मार्ग पर अग्रसर होते हैं,
तब प्रेम के साथ हम तुम्हारा आमंत्रण कर रहे हैं।
आओ न!
सरोवर की लहरों रूपी शीतल शय्याओं पर
झूमने वाले कमलों को भ्रमर-कन्याएँ
इस उष:काल में मंगलकारी काकली ध्वनियों से जगा रही है।
रसालों के अरुण पल्लव समूह
चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं
और इस समय मदमाते कोकिल
अपने मधुर कंठों से कलनाद की वर्षा
करते हुए झूम रहे हैं।
वन नटी के चरणों में जूही के फूल
ऐसी शोभा दे रहे हैं, मानो नवनीत के घुँघरू हों।
अशोक-पुष्पों से शोभित पृथ्वी पर
चैत्र पर्व के रसमय भोजन से आलसी बने हुए शुकों की
श्रुतिमधुर ध्वनियाँ
सरल कोमलता के साथ सुनाई दे रही है।
5. अब आते हैं पांचवें नंबर पर शानदार रचनाकार हरिवंशराय बच्चन पर... हालांकि आज की ये उद्धृत रचना फ़ारसी कवि उमर ख़य्याम की रुबाइयों (चार पंक्तियों वाली कविताओं) से प्रेरित होकर लिखी थी, जहाँ 'मधुशाला' जीवन की अस्थिरता और क्षणभंगुरता के बीच प्रेम, ज्ञान और आनंद खोजने का प्रतीक बन जाती है, जिसमें मदिरा, साकी (परोसने वाला), प्याला और मधुशाला (शराबखाना) जीवन के दर्शन के रूपक हैं। पुस्तक का नाम : ख़य्याम की मधुशाला भाग 4 में उन्होंने नववर्ष पर कुछ यूं लिखा-
नई तरु-आभा, नवल समीर
जनाते, आया नूतन वर्ष,
जर्जरित इच्छाएँ भी आज
पा रहीं यौवन का उत्कर्ष।
मनीषी भोग रहे एकांत,
एक मधुऋतु उनके भी पास—
ज्वलित कर मूसा का तरु-ज्योति,
समीरण ईसा का उच्छवास।
6. छठवें नंबर पर मैंने बाबा नागार्जुन को रखा है- 'चंदू, मैंने सपना देखा ' शीर्षक से लिखी गई ये कविता नव वर्ष पर न पढ़ी जाये , ऐसा हो नहीं सकता। नामवर सिंह के संपादन में प्रतिनिधि कविताएँ के (पृष्ठ 46) पर बाबा ने चंदू के माध्यम से गागर में सागर भर दिया।
चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेक़ाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, ख़ूब पतंगें लूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर
7. सातवें नंबर पर राजस्थानी साहित्य में आधुनिक कहानी के प्रमुख हस्ताक्षर माने जाने वाले पेशे से शिक्षक रहे श्री साँवर दइया ने नव वर्ष पर पूरे 365 दिनों में हर रोज का बखान कितने साधारण शब्दों में कहा है। आधुनिक भारतीय कविता संचयन राजस्थानी (1950-2010) (पृष्ठ 88) से ली गई ये रचना देखिए ज़रा---
पलस्तर उतरती दीवार पर
लटकाया जब नया कैलेंडर
छाती के सामने आकर खड़े हो गए
तीन सौ पैंसठ दिन।
मेरी / रोज़ छुलती साँस जानती है
कैसे कटता है एक-एक दिन
पिछले साल / न होली-दीवली लापसी
न सावन में सातू / ऋतुएँ बदलीं
और हमने भोगे परिणाम
मुट्ठी भर लोगों की / झूठी बातों में आया
वह हरामी का हाड़—हर्ष
कभी नहीं आकर खड़ा हुआ मेरे आँगन में
आज से फिर / मैं हूँ
और सामने हैं / ये तीन सौ पैंसठ दिन!
8. आठवें नंबर पर रफ़ीक़ शादानी की पुस्तक 'जियौ बहादुर खद्दरधारी' के (पृष्ठ 39) से ली गई ये रचना ''नवा साल आवा'' आपको गुदगुदाने के अलावा गहरा तंज़ करते हुए नए साल का नया परिचय देती है।
आँधी चली केतना भूचाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा
मनुस अपने अस्थान से हटि गवा जब
मुसाफिर कय गठरी गला कटि गवा जब
डकैती कय सामान सब बँटि गवा जब
पता नाहीं केहिकै टरंकाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।
सगरी बुराइन कय हद होइ गई जब
गरीबी कय फरियाद रद होइ गई जब
इन्सानियत केर भद होइ गई जब
स्वागत करै का जौ चंडाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।
असली भगत जौ करै तोर पूजा
ओका मिलै खाय का आलू भूजा
पंडित औ मुल्ला कय हय काम दूजा
वनहीं के हिस्से मा तर माल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।
जाड़े कय मौसम दुहाई-दुहाई
बिलोकी मियाँ खाँय मुर्गा मलाई
नेता के कमरे मा गद्दा रजाई
सायर के हिस्से मा तिरपाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।
नववर्ष की शुभकामनाओं संग आज बस इतना ही... रील और मीम के इस डिजिटल युग में इन्हीं शानदार रचनाओं के साथ विचारों को बनाए रखिए... ।
- अलकनंदा सिंंह

