शनिवार, 26 जुलाई 2014

खुलेआम बिक भी रही हैं यें 'निर्भया'

अजीब तमाशा बनकर रह गया है निर्भया का नाम और इस नाम का पर्याय बन गया है शब्‍द ''दुष्‍कर्म''। कहीं ये एक शब्‍द औरत के वजूद को ही मिटाने पर तुला है तो कहीं ये पुरानी रंजिशों को चुकता करने के लिए अच्‍छा और अकाट्य बहाना बन गया है। नैतिकता की गिरावट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब ये मसला औरत पर ज्‍यादती तक सीमित नहीं रहा। शहरों की बात तो छोड़ दीजिए, जिन गांवों को हम बहन-बेटियों के लिए सबसे अधिक सुरक्षित और नैतिक व संस्‍कारों का भंडार मानते थे आज उन्‍हीं गांवों में नैतिकता के परखच्‍चे उड़ाये जा रहे हैं। लड़कियां औजार की तरह भी इस्‍तेमाल हो रही हैं और हथियार की तरह भी।
दिल्‍ली में हुए निर्भया कांड ने कई कोणों से समाज की स्‍थापित नैतिकता को उधेड़ दिया है। हाल में हुई ताबड़तोड़ दुष्‍कर्म की घटनाओं में कुछ बातें कॉमन देखने में आईं। जैसे कि जिनकी विकृत मानसिकता थी, उन्‍होंने लड़कियों और औरतों को हवस का शिकार बनाकर उनका कत्‍ल  करना शुरू कर दिया ताकि सुबूतों के अभाव में वे अपने अगले शिकार के लिए स्‍वतंत्र रह सकें। दूसरी ओर दुष्‍कर्म की घटना के बाद जनता, महिला व सामाजिक संगठनों के प्रदर्शन को ठंडा करने के लिए ''मुआवजे'' का जो लालच सरकारों ने दिया, उसने खुद परिजनों को घर की औरतों, लड़कियों  तक को खतरे में डाल दिया, वरना क्‍या ऐसा संभव है कि किसी विवाहिता के साथ रात में बलात्‍कार  हो और उसकी रिपोर्ट दो दिन बाद पति के साथ जाकर दर्ज़ कराई जाये या फिर ऑनर किलिंग में लड़की को मार कर बमुश्‍किल 3 फुट लंबे पौधे (पेड़ नहीं) पर लटकाया दिखाया जाये और बाकायदा उसके प्रेमी व उसके परिजनों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई जाये कि फलां...फलां  ने  दुष्‍कर्म किया और इसके बाद लड़की को माराऔर पेड़ पर लटका दिया। कहानी को बिल्‍कुल एक डिटर्जेंट के उस विज्ञापन की तर्ज़ पर कि ''भिगोया...धोया...और हो गया'' तैयार किया जाता है। एक दुष्‍कर्म का आरोप और दुश्‍मन चारों खाने चित्‍त। बिजनौर का हालिया केस इसकी बानगी है। बदायूं मामले में भी शंकायें सच को दबा रही हैं कि आखिर कौन है उन बच्‍चियों का कातिल । लखनऊ के मोहनलाल गंज में महिला के साथ दरिंदगी किसी भी हाल में निर्भया से कम नहीं मगर सुबूतों को ढूढ़ेगा कौन। आज खबर आई है कि सात साल की बच्‍ची से पड़ोसी युवक ने दुष्‍कर्म किया । दूसरी खबर है कि ईंटभट्टा पर काम करने वाली महिला मजदूर के साथ भी दुष्‍कर्म हुआ, वो रिपोर्ट लिखाने पहुंची तो उसे दुत्‍कार कर भगा दिया गया। यहां तो दुष्‍कर्मी भी साथी मजदूर ही बताया गया, तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने पुलिस को प्रभाव में ले लिया होगा ।
कुल मिलाकर स्‍थितियां अब गले में अटकी हड्डियों की भांति दुखदायी हैं और फिलहाल तो और बदतर ही होती जा रही हैं। इसके लिए सिर्फ लचर कानून को दोषी नहीं माना जा सकता क्‍योंकि कानून के ओहदेदारों में भी तो समाज ही स्‍थापित करता है नैतिकता। और जब नैतिकता को परिजन ही ताक पर रखने लगे हों तो...? दुष्‍कर्म और मुआवजे के बीच झूलती औरतें-लड़कियां  'अपनों' के इस घात को नहीं समझ पा रही हैं। वे यह भी नहीं समझ पा रही हैं  कि आखिर उनके शरीर को अभी और कितने घातों के लिए तैयार रहना है । इज्‍जत के चले जाने और बनाये रखने में उनकी ही जान क्‍यों इतनी सस्‍ती हो गई । सौदेबाजी की भी हद होती है और गिरावट की भी...।
-अलकनंदा सिंह

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