शनिवार, 22 मार्च 2014

बाजीगरी या जीतने का डर...

जीतने की आपा-धापी है...एक लंबी दौड़ है...पांव ही नहीं मन को थका देने वाली... और दौड़ में हम अपने को खोने की ओर बड़ी तेजी से भाग रहे हैं। जीतने की इच्‍छा से उपजा असंतुष्‍टि का भाव है। जो मौजूद है उसकी खुशी नहीं हो पा रही और जो नहीं मिला उसे लेकर मन को विकृत किये ले रहे हैं।
एक बार लाओत्‍से ने अपने मित्रों से कहा कि आज तक कोई मुझे हरा नहीं सका...इतना सुनते ही जितने भी मित्र वहां मौजूद थे, उन सभी मित्रों ने झड़ी लगा दी प्रश्‍नों की कि बताओ... बताओ वो कौन सी विधि है जिससे तुम्‍हें कोई हरा नहीं सका, हमें भी बताओ तो..ताकि हमें भी जीत हासिल हो सके। लाओत्‍से ने कहा कि तुम सभी ने मेरा पूरा वाक्‍य ही नहीं सुना और जीत का मंत्र हासिल करने को अधीर हो उठे।
लाओत्‍से बोला, ''मैंने कहा, मुझे ज़िंदगी में कोई हरा न सका था क्‍योंकि मैं पहले से ही हारा हुआ था... मुझे जीतना मुश्‍किल था, क्‍योंकि मैं जीतना ही नहीं चाहता था... तुम मेरे राज को नहीं समझ सकते क्‍योंकि तुम जीतने की आकांक्षा करते हो और वही तुम्‍हारी हार बन जायेगी। सफलता पाने की आकांक्षा ही अंत में असफलता का कारण बनती है। बिल्‍कुल ऐसे ही जैसे कि जीवन की अति आकांक्षा ही अंत में मृत्‍यु बनती है, स्‍वस्‍थ होने का पागलपन ही बीमारी बनता है। ज़िंदगी बहुत अद्भुत है, जिस चीज को हम जोर से मांगते हैं उसी को खो देते हैं। ठीक मुठ्ठी में बंधी रेत की भांति। जीतने की इच्‍छा रखना ही हार की ओर पहला कदम है। प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है उसका उसी रूप में अर्थात् प्राकृतिक रूप में ही आनंद लेने की बात होनी चाहिए। ये जीतने की होड़-दौड़ कहीं नहीं रुकती ।
जीत लेने और जीत जाने की बात वही करता है जो कहीं से स्‍वयं को कमतर आंकता है और बार-बार जीत लेने का दावा करता है। जो अपने पास है उसे जीतना क्‍या और जो पास नहीं है उसे कैसे जीता जा सकता है।
मार्शल आर्ट की सभी विधियों में यही सिखाया जाता है कि वार मत करो..वार करने में शक्‍ति जाया होती है। जो पहला वार करेगा वह निश्‍चित ही अपनी आंतरिक व बाह्य शक्‍ति को वार करने में गंवा देगा, जीतने में उसका एक कदम पीछे हो जायेगा। शक्‍ति प्रदर्शन की एक प्रचलित विधि काफी विख्‍यात है- जूडो यानि जुजुत्‍सु, जिसमें शारीरिक शक्‍ति के प्रयोग से पहले मन की दृढ़ता पर काम किया जाता है, प्रतिद्वंदी पर विजय की आकांक्षा नहीं बल्‍कि स्‍वयं को स्‍थिर रहने की शिक्षा दी जाती है, परिणामत: अंत में वही विजयी होता है जो स्‍थिर रह पाता है। निश्‍चित ही शक्‍ति भी उसी के हाथ होगी जो जीतने की इच्‍छा का दमन कर सकेगा और प्राकृतिक व्‍यवहार करेगा ।

गीता में कृष्‍ण अर्जुन से कहते भी हैं कि-

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्रानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ।।38।।

अर्थात्

मैं दमन करने वालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छा वालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्व ज्ञान मैं ही हूँ ।।38।।

कृष्‍ण और लाओत्‍से, दोनों की बात पर गौर करें तो पता लगता है कि जीतता वही है, जो हारने को भी तैयार रहता है। यहां समस्‍या यह है कि कोई हारने को तैयार ही नहीं। शायद इसीलिए कोई जीत नहीं पाता और हर बार जब जीत की आकांक्षा के साथ उतरता है तो मन के किसी कोने में हार पहले से घर कर चुकी होती है। वह न खुद से संतुष्‍ट रहता है, न किसी को संतुष्‍ट कर पाता है।

- अलकनंदा सिंह