मंगलवार, 2 जुलाई 2013

'हम हैं ना' और 'देख लेना' के बीच....

मुआवजे दर मुआवजे और लैपटॉप बांटने में लगी उत्‍तर प्रदेश सरकार अव्‍यवस्‍थाओं एवं अनियमितताओं के बीच बदहवासी के उस आलम में अपना सफर तय कर रही है जिसमें अक्‍सर लोग ये समझ ही नहीं पाते कि आखिर उनकी नाव जा किस ओर रही है।
उत्‍तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जो जितनी अहमियत
राजनैतिक कारणों से रखता है उतनी ही सामाजिक विषमताओं के लिए भी।
इसके अलावा एक और कड़वा सच ये है कि राजनीतिक उठापटकों ने प्रदेश के आम आदमी में 'स्‍वयं कुछ करने' का जज्‍़बा लगभग खत्‍म ही कर दिया है। ऐसे में किसी शहीद के घर सांत्‍वना देते हुए जब मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि    ''हम हैं कोई बात हो तो बताना....''उसी क्षण डीएम की ओर मुड़कर कहते हैं ''देख लेना''... तो दोनों ही वाक्‍य कथनी और करनी की सच्‍चाई को बखूबी उजागर कर देते हैं।
अखिलेश की कथनी जिन आश्‍वासनों को आमजन के सामने परोसती है, उनके नौकरशाहों की फौज उन्‍हीं आश्‍वासनों का गला साथ के साथ ही घोंटती चलती है, तभी तो एक मुख्‍यमंत्री आदेश देने के स्‍थान पर ये कहता दिखाई देता है कि ''देख लेना''।
प्रदेश में तकरीबन हर मोर्चे पर असफलता और अराजकता कायम है। चाहे सांगठनिक मामला हो या प्रशासनिक। यही कारण है कि अधिकारियों के रवैये ने अब तक तो कम से कम जनता में सरकार के प्रति उदासीनता, क्षोभ और निराशा ही भरी है ।
इस 'हम हैं ना' और 'देख लेना' के बीच से ही प्रदेश के उत्‍थान की राह निकालने में नाकाम रहे हैं अखिलेश यादव। फिलहाल तो जनता को रोजबरोज लैपटॉप वितरण के अलावा किसी जनकल्‍याणकारी कार्य की आशा नहीं पालनी चाहिए। हां, विकास की बात के रूप में ऑस्‍ट्रेलियाई, चीनी और जापानी निवेश की सूचनायें अवश्‍य सुनाई देतीं रहती हैं । ये कहां होगा कब होगा और किसके लिए होगा... जैसे आशावादी जुमले से फिलहाल जनता अपना पेट भर ले और अगले साढ़े तीन साल तक बाट जोहती रहे।
-अलकनंदा सिंह