बुधवार, 20 अगस्त 2025

सुनिता विलियम्स का चौंकाने वाला खुलासा


 अंतरिक्ष यात्री सुनिता विलियम्स का नौ महीने अंतरिक्ष में बिताने के बाद पत्रकारों से दिया गया बयान अब पूरे विश्व में चर्चा का विषय बना हुआ है।

उन्होंने कहा—

"मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर की इच्छा से मैं अंतरिक्ष में फँसी रही। जब मैं अंतरिक्ष में 20 दिन की हुई, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं मृत्यु का सामना कर रही हूँ। जब मैंने सोचा कि अब भोजन और पानी की कमी के बीच मैं कैसे जीवित रहूँगी, तभी मुझे सनातन धर्म के चैत्र नवरात्रि के उपवास की याद आई। उस दिन से मैंने शाम को थोड़ा भोजन और पानी तथा सुबह थोड़ा पानी लेना शुरू किया। एक महीने बाद मैं स्वस्थ और प्रसन्न महसूस करने लगी। मुझे समझ आया कि मैं कुछ और समय तक टिक सकती हूँ।

"जब मैं मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही थी, तो मैंने कंप्यूटर खोला और सोचा कि एक दिन बाइबिल पढ़ूँगी। पहले भी कई बार पढ़ चुकी थी, पर एक पन्ना पढ़ते ही ऊब गई। फिर मन हुआ कि रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता दोबारा पढ़ूँ। (लगता है अब यह मुझे कोई शक्ति प्रदान कर रहा था।) मैंने (अंग्रेज़ी अनुवाद) डाउनलोड करके पढ़ना शुरू किया। 10-15 पन्ने पढ़ने के बाद मैं आश्चर्यचकित रह गई। उसमें गर्भ विज्ञान, समुद्र और आकाश का अद्भुत वर्णन था। मुझे लगा यह संसार को बताना चाहिए।

"अंतरिक्ष से देखने पर सूर्य ऐसा लगता है मानो कीचड़ के तालाब में बैठा हो। कभी-कभी ऊपर से कुछ आवाज़ें सुनाई देती थीं, जैसे मंत्रोच्चारण हो रहा हो। मुझे लगा कि यह संस्कृत-हिंदी के मंत्र हैं। मेरे साथी बैरी विलमोर ने कहा कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि मैं प्रतिदिन रामायण और गीता पढ़ती हूँ। इसके बाद मैंने गहराई से रामायण और गीता पढ़ने का निश्चय किया। यह अद्भुत अनुभव था। मैंने तुरंत एलन मस्क को फोन कर यह बात बताई।

"अब आप चौंक जाएँगे। कुछ दिन तो ऐसे रहे जब हम बड़े-बड़े उल्कापिंडों को अपनी अंतरिक्ष स्टेशन की ओर आते देख डर गए। जब कोई उपाय नहीं था, तो हमने ईश्वर से प्रार्थना की और चमत्कारिक ढंग से कुछ छोटे-छोटे गोलाकार प्रकाशपुंज (जो तारे जैसे दिखते थे) नीचे उतरकर उन सबको नष्ट कर गए। हमें ऐसा लगा जैसे तारे ही उन्हें मार रहे हों। यह हमें बहुत अचंभित कर गया। नासा ने वादा किया है कि इस विषय पर और गहन शोध किया जाएगा।

"आठ महीने में मैंने संपूर्ण रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ ली। मेरे भीतर लौटने का आत्मविश्वास जग गया। मुझे लगा कि अब मैं पृथ्वी पर वापस आ सकती हूँ।

"अप्रैल माह में जब सूर्य अस्त हो रहा था, तब पृथ्वी के ऊपर से शेर जैसी आकृति दिखाई दी, जिसके साथ माता जी और त्रिशूल भी था। जैसे ही वह पृथ्वी के वातावरण में पहुँची, वह अदृश्य हो गई। मैं समझ नहीं पाई कि यह कहाँ से आई थी। मेरे साथी बैरी विलमोर और मैंने देखा कि यह किसी विशेष परत से आ रही थी। तब मैंने समझा कि आकाश की भी कई परतें हैं। हमने बहुत सोचा कि ये उड़ते हुए घोड़े क्यों नहीं दिखे। फिर मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट देखी, जिसमें हडसन नदी के ऊपर चाँद के दिखने और 2 मार्च से सनातनी उपवास शुरू होने की खबर थी। तभी से नंगल में इस घटना का अवलोकन हो रहा था। बाद में हमने समझा कि यह धरती पर व्रत खोलने का समय था। मुझे लगता है कि वे ईश्वर के आशीर्वाद लेकर आने वाले देवदूत थे।

"अब मुझे लगता है कि सनातन धर्म की श्रीमद्भगवद्गीता सत्य है। अब मेरा शोध वेदों के विज्ञान पर होगा—गर्भ विज्ञान, समुद्र और अंतरिक्ष विज्ञान पर। मैं खगोल विज्ञान की हर बात जानना चाहती हूँ। नासा में वेदों की अद्भुत शक्तियों पर शोध करने के लिए एक नया विभाग शुरू करने का प्रस्ताव भी दिया गया है।"



सोमवार, 11 अगस्त 2025

सिविक सेंस जब तक नहीं आयेगा, तब तक इसी तरह दुत्कार जाते रहेंगे


 भारत के लोग हर जगह शोर मचाते हैं कि उनके लोग सभी बड़ी से बड़ी तकनीकी कंपनियों में छाये हुए हैं, वह सिलिकॉन वैली के रीढ़ हैं, वह अमेरिका से लेकर यूरोप तक सबसे अधिक कमाई वाले लोग हैं, उनके बच्चे सबसे अच्छी डिग्री लेने वाले लोग हैं, बावजूद उसके उनको जो सम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। 


भारत के लोगों को दुनिया में तब तक सम्मान नहीं मिलेगा जब तक उनको कुछ आधारभूत सउर नहीं होगा, बेशऊर आदमी को दुनिया में सम्मान मिलना भी नहीं चाहिए। भारत के लोगों के अंदर साफ़ सफ़ाई, व्यवस्थित रहने का ढंग, सिविक सेंस जब तक नहीं आयेगा, वह इसी तरह दुत्कार जाते रहेंगे। 

हर शहर के एक दो क्षेत्रों को छोड़ दिया जाय, गंदगी गोबर कूड़ा कीचड़ प्लास्टिक फैला हुआ मिलता है। हर चौराहा चाहे वह नया ही क्यो न बने, बिलकुल उस से सटकर दुकानें खोल दी जाती हैं, फिर वही गाड़ियाँ खड़ी हो जाती हैं, ई रिक्शा, टेम्पो से लगाए बस तक वाहन सवारी भरती हैं, पूरे शहर का ट्राफिक बर्बाद हो जाता है। कोई नेशनल हाइवे हो और शहर से गुजरता हो तो बिलकुल उसी के सामने दुकानें, प्रतिष्ठान खोल दिया जाता है, कोई सरकारी अथारटी भी यह नियम नहीं बना रही की सड़क जो की किसी भी राष्ट्र की धमनी होती हैं उसे ऐसे ब्लॉक नहीं किया जा सकता। देश में बहुत बड़ी मूक क्रांति हुई, हाथ से चलने वाले रिक्शे मात्र सात आठ साल में समाप्त हो गये और उनका स्थान ई रिक्शे ने ले लिया लेकिन किसी भी संस्था संगठन पार्टी, सिविल सोसाइटी से लगाए आम नागरिकों तक को यह नहीं लगा कि वह इन लोगों को यह शऊर सिखाए कि सड़क पर कैसा व्यवहार करना है? चौराहे पर यह सैकड़ों की संख्या में खड़े होकर जाम न लगाए इसका इंतज़ाम हो। 

आज़ तक आम नागरिकों ने भी मुद्दा नहीं उठाया कि हर बड़े चौराहे के सौ मीटर दूरी पर सरकार ज़मीन अधिग्रहण करे और सवारी उठाने की अनुमति केवल वहीं रहें। पुराने से पुराने रेस्टोरेंट, मिठाई के दुकान, जूस के दुकान खुले हैं, चाय नाश्ते की दुकान हैं, लेकिन न ग्राहकों की यह माँग है कि वह साफ़ सुथरा हो, कालिख से मुक्त हो, मक्खी वहाँ न भीनके। फिर लोग कहते हैं कि विदेश के लोग भारत के खाने पीने की दुकानों का गंदा गंदा वीडियो बनाकर बदनाम करते हैं। वह बदनाम नहीं करते, केवल आईना दिखाते हैं। तमाम इंस्टाग्राम और रील के माध्यम से पुराने पुराने प्रतिष्ठानों के वीडियो आते हैं, वह सब रोज के लाख लाख रुपया कमाते हैं लेकिन कोई यह नहीं कहने वाला है की इतनी गंदगी क्यों फैलाए रहते हो? 

लोग घर बनवाते हैं लेकिन एक इंच ज़मीन नहीं छोड़ते फिर सड़क पर स्लोप बनवाते हैं कि गाड़ी चढ़ाने की व्यवस्था हो, पूरी बेशर्मी से इस क़ब्ज़ेबाज़ी को अपना अधिकार समझते हैं। अच्छे से अच्छे कालोनी में करोड़ों का घर बनता हैं लेकिन सामने नाला खुला रहता है और इन्हें उससे दिक्कत भी महसूस नहीं होती। यह जीवन की सामान्यता बनी हुई है। कुत्ता पाल लेंगे लेकिन उसे सुबह सुबह हगाने जायेंगे दूसरे के घर के सामने। भला हो मोदी जी का जिन्होंने कम से यहाँ के लोगों को हगना सीखा दिया वरना कई जगहों पर तो निकलना मुश्किल था। लोग गरीब हैं, मैं उनकी ग़रीबी से संवेदनशीलता रखता हूँ लेकिन इतना भी क्या बेसउर होना कि दो दो दिन बच्चों की नाक भी पानी से साफ़ नहीं करना? उनके कपड़े पाँच पाँच दिन एक ही पहना कर रखना? 

सड़क पर चलेंगे तो नियम नहीं मानना, नशा भी ऐसा सीखा की देखने मे भी गंदे दिखते हैं, फिर गुटखा खा खाकर सड़क, ऑफिस, घर से लगाये लिफ्ट तक गंदा करते है। उसके बाद बीमारी भी गंदी होती है। खाना खायेंगे तो बहुत जगह मक्खी भिनकते रहना सामान्यता बनी हुई है। घर बनवायेंगे तो बाथरूम और टॉयलेट इतने कम जगह में बनवायेंगे की मानो वह कोई बहुत महत्वपूर्ण चीज नहीं है। कुल मिलाकर साफ़ सफ़ाई सबसे पीछे छूटा हुआ है। अच्छे कमाई करने वाले लोग भी अपने घर में एक एक बेडशीट, तकिये का कवर इतने इतने दिन तक इस्तेमाल करते हैं कि उसमें तेल की इतनी मोटी परत बन जाती है कि पूछिए ही नहीं। कूड़ा निकालेंगे तो घर के बाहर फेक देंगे। कार से चलते हुए प्लास्टिक, चिप्स की पन्नी कहीं भी फेंक देंगे। सुंदर से सुंदर तालाब हो, झील हो, झरना हो सब प्लास्टिक, बोतल आदि से भरे मिलते हैं। कोई सौंदर्य बोध नहीं, कोई रचनात्मकता नहीं। 

बिना सौंदर्य बोध, रचनात्मकता, व्यवस्थित रहने की चाह, सुंदरता के भारत के लोगों को कभी दुनिया में सम्मान नहीं मिल सकता, चाहे आपके पास कितना पैसा हो या कितनी बड़ी डिग्री हो। सिविक सेंस विहीन समाज कभी सम्मान नहीं पा सकता, इसलिए यह मुद्दा भी हमारे दृष्टि में होना चाहिए। इस विषय में हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम ने इसे कभी समस्या माना ही नहीं और हम गंदगी में रहना एक सामान्यता मान चुके हैं।


बुधवार, 6 अगस्त 2025

उत्तरकाशी का धराली.. सब कुछ अपनी गोद में समेट कर ले गई मां गंगा


  उत्तरकाशी का धराली.. सब कुछ अपनी गोद में समेट कर ले गई मां गंगा

उत्तरकाशी का धराली बता रहा है क‍ि चट्टानों पर बने जल प्रवाह के निशान चेतावनी देते हैं, '...बस यहीं तक, इसके आगे नहीं!" सदियों से हिन्दू समाज, प्रकृति पूजक समाज प्रकृति मां की चेतावनी को समझता आया। मर्यादा में रहा।

लेकिन जिन्होंने प्रकृति की चेतावनी नहीं सुनी। जल प्रवाह की गोद में घुस गए। बिल्डिंग, बाजार खड़े कर दिए। पर्यटन के बढ़ते असर ने आंख पर लालच की पट्टी बांध दी है। 

अब यह दलील नहीं चलेगी...आखिर #विकास तो होगा ही..:कहां जाएं लोग? रोजगार के लिए क्या करें?

मेरा निजी विश्वास है, #धर्म और #प्रकृति बहुत ही निर्मोही है..इन दोनों की शब्दवली में #दया_क्षमा नहीं है...धतकरम (पाप) किया है तो #दण्ड मिलेगा ही...हमें नहीं तो हमारी #भावी_संतति को। धर्म और प्रकृति को मानव की खड़ी की गई कोई बनावटी दलील स्वीकार नहीं।

#हिन्दू_धर्म अपनी व्यापकता में प्रकृति, ब्रह्मांड में #जीव_सहजीविता का ही अनुशासन है। यह व्यवस्था, यह दर्शन ही धर्म है। 

बुद्धि कपाट खोल कर देखों तो धर्म अत्यंत सहज...बुद्धि कपाट बंद तो धर्म अत्यंत दुरूह। अत्यंत जटिल।

#Uttarkashi

#धराली

शनिवार, 2 अगस्त 2025

आहुति देते समय बोला जाने वाला स‍िर्फ एक शब्द नहीं है स्वाहा, जान‍िए क्यों इसके बिना अधूरा होता है हवन


 हवन और यज्ञ पौराणिक काल से हिंदू संस्कृति का हिस्सा रहे हैं जिनका वर्णन हिंदू धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। हवन में स्वाहा बोलने का भी विधान है। ऐसा कहा जाता है कि जब तक आहुत देते समय स्वाहा न बोला जाए तब तक देवी-देवता उस हवन सामग्री को स्वीकार नहीं करते। इसके पीछे कुछ धार्मिक कारण भी मिलते हैं।

हिंदू धर्म में हवन को विशेष महत्व दिया गया है। गृह प्रवेश, धार्मिक कार्य या फिर किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले हवन जरूरी रूप से किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि हवन करवाने से उस कार्य में व्यक्ति को देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्व रखता है, बल्कि इससे वातावरण भी शुद्ध होता है। हवन के दौरान आहुति देते समय स्वाहा जरूर बोला जाता है, जिसका एक बहुत ही खास महत्व है। चलिए जानते हैं इस शब्द का अर्थ और महत्व।

स्वाहा का अर्थ
जब हवन किया जाता है, तो यज्ञ के दौरान हवन कुंड में हवन की सामग्री अर्पित करते समय स्वाहा शब्द का उच्चारण किया जाता है, जिसका अर्थ है सही रीति से पहुंचाना। वहीं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अग्निदेव की पत्नी का नाम स्वाहा था, जो दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं। इसलिए हवन कुंड में आहुति देते समय हर मंत्र के उच्चारण के बाद स्वाहा कहा जाता है और यह माना जाता है कि इससे अग्नि देव प्रसन्न होते हैं।

स्वाहा शब्द का क्या महत्व है
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हवन सामग्री का भोग अग्नि के जरिए देवताओं तक पहुंचाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब तक देवी-देवता हविष्य यानी हवन सामग्री को ग्रहण न कर लें, हवन या यज्ञ तब तक सफल नहीं माना जाता। जब हविष्य को अग्नि के द्वारा स्वाहा के माध्यम से अर्पित किया जाता है, तभी देवी-देवता इसे ग्रहण करते हैं।

यह भी है मान्यता
पुराणों में वर्णन मिलता है कि ऋग्वेद काल में अग्नि को देवता और मनुष्य के बीच के माध्यम के रूप में चुना गया था। इसलिए यह माना जाता है कि हवन के दौरान जो भी सामग्री स्वाहा के उच्चारण के साथ अग्नि देव को अर्पित की जाती है वह सीधे देवताओं तक पहुंचती है और जिस भी मंशा से वह हवन किया जा रहा है, वह पूर्ण होती है।

दंतकथाएं
स्वाहा को एक देवी और अग्नि की पत्नी के रूप में चित्रित किया गया है। ब्रह्मविद्या उपनिषद के अनुसार स्वाहा उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसे अग्नि जला नहीं सकती। उपनिषदों में स्वाहा अग्नि पर मोहित होने और उनके साथ रहने की इच्छा व्यक्त करती हैं। इसलिए, देवताओं ने कहा है कि स्तुति के दौरान उनका नाम लेते हुए अग्नि को आहुति दी जानी चाहिए, जिससे स्वाहा सदैव अग्नि के साथ रह सकें।

कुछ संस्करणों में, वह कार्तिकेय (स्कंद) की अनेक दिव्य माताओं में से एक हैं । वह अग्नि की पुत्री, आग्नेय (आग्नेय) की भी माता हैं। उन्हें दक्ष और उनकी पत्नी प्रसूति की पुत्री माना जाता है । उन्हें होमबलि की अधिष्ठात्री माना जाता है। कहा जाता है कि उनके शरीर में चार वेद समाहित हैं और उनके छह अंगों को वेदों के छह अंग माना जाता है।

कहानी
महाभारत वन पर्व में मार्कण्डेय पांडवों को अपनी कहानी सुनाते हैं । स्वाहा दक्ष की पुत्री थीं । वह अग्निदेव से प्रेम करने लगीं और उनका पीछा करने लगीं। अग्निदेव ने उन पर ध्यान नहीं दिया। अग्निदेव सप्तऋषियों के यज्ञ अनुष्ठानों के अध्यक्ष थे । देवता सप्तऋषियों की पत्नियों पर अत्यधिक मोहित हो गए, जो इतनी आकर्षक थीं कि वह उन्हें देखते ही रह गए।

अंततः अग्नि पराई स्त्री की लालसा का अपराध बोध सहन नहीं कर सके और तपस्या करने वन में चले गए। स्वाहा उनके पीछे-पीछे गईं और उनकी इच्छा समझ गईं। उन्होंने सप्तर्षियों की पत्नियों का रूप धारण किया (हालाँकि वे वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति का रूप धारण नहीं कर सकीं) और अग्नि के पास छह बार गईं, उन्हें मोहित किया और प्रत्येक मिलन का बीज एक स्वर्ण कलश में डाला, जिससे स्कंद का जन्म हुआ।

ब्रह्माण्ड पुराण में स्वाहा के बच्चों के नामों का उल्लेख है: पवमान, पावक और शुचि।

देवी भागवत पुराण में नारायण नारद को स्वाहा का ध्यान करने की विधि प्रदान करते हैं :

स्वाहा देवी का ध्यान इस प्रकार है:-- हे देवी स्वाहा! आप मंत्रों से परिपूर्ण हैं; आप मंत्रों की सिद्धि हैं; आप स्वयं सिद्धा हैं; आप मनुष्यों को सिद्धि और कर्मफल प्रदान करती हैं; आप सबका कल्याण करती हैं। इस प्रकार ध्यान करते हुए, मूल मंत्र का उच्चारण करते हुए पाद्य (पैर धोने का जल) आदि अर्पित करना चाहिए; तब उसे सिद्धि प्राप्त होती है। अब मूल बीज मंत्र के बारे में सुनो। उक्त मंत्र (मूल मंत्र) यह है:-- "ॐ ह्रीं श्रीं वह्निजयायै देव्यै स्वाहा।" यदि इस मंत्र से देवी की पूजा की जाए, तो सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

-  देवी भागवत पुराण , पुस्तक 9, अध्याय 43

शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

रत्ती: आश्चर्य में डालता है मापतौल की इकाई का सामाज‍िक ताने बाने में बुन जाना

"रत्ती "यह शब्द लगभग हर जगह सुनने को मिलता है। जैसे - रत्ती भर भी परवाह नहीं, रत्ती भर भी शर्म नहीं, रत्ती भर भी अक्ल नहीं...!!

आपने भी इस शब्द को बोला होगा, बहुत लोगों से सुना भी होगा। आज जानते हैं 'रत्ती' की वास्तविकता, यह आम बोलचाल में आया कैसे?

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रत्ती एक प्रकार का पौधा होता है, जो प्रायः पहाड़ों पर पाया जाता है। इसके मटर जैसी फली में लाल-काले रंग के दाने (बीज) होते हैं, जिन्हें रत्ती कहा जाता है। रत्ती या गुंजा या घुंघुची या करजनी एक बेल है , जो प्राकृतिक रूप से उगती है। इसका वैज्ञानिक नाम Abrus precatoriusहै। यह छोटे पौधों के तनों से लिपटी रहती है ।


 इस लता के पत्ते इमली के पत्तों की भांति होती हैं | शरद काल के कुछ पहले ही यह लता सूख जाती है | इसकी सूखी फलियों से छोटे छोटे मोतियों की भांति आधे लाल और आधे काले रंग के बीज मिलते हैं। कभी - कभी सफ़ेद रंग की रत्ती या सिर्फ काले रंग की भी रत्ती मिलती है | 


हमारे ब्रज में रत्ती के पौधे को आम भाषा में 'गूंजा'  भी कहा जाता है, ब्रज चौरासी कोस की यात्रा में अरावली पर्वत के भाग कामवन के जंगलों में इसे देखा जाता है, रास के दौरान भगवान कृष्ण अकसर गुंजा की माला अपनी सख‍ियों के ल‍िए बनाया करते थे। 

प्राचीन काल में जब मापने का कोई सही पैमाना नहीं था तब सोना, जेवरात का वजन मापने के लिए इसी रत्ती के दाने का इस्तेमाल किया जाता था।


 सबसे हैरानी की बात तो यह है कि इस फली की आयु कितनी भी क्यों न हो, लेकिन इसके अंदर स्थापित बीजों का वजन एक समान ही 121.5 मिलीग्राम (एक ग्राम का लगभग 8वां भाग) होता है।

तात्पर्य यह कि वजन में जरा सा एवं एक समान होने के विशिष्ट गुण की वजह से, कुछ मापने के लिए जैसे रत्ती प्रयोग में लाते हैं। उसी तरह किसी के जरा सा गुण, स्वभाव, कर्म मापने का एक स्थापित पैमाना बन गया यह "रत्ती" शब्द।

रत्ती भर मतलब जरा सा । 

अक्सर लोग दाल या सब्जी में ऊपर से नमक डालते रहते हैं । पुराने समय में माँग हुआ करती थी - - रत्ती भर नमक देना । रत्ती भर का मतलब जरा सा होता है । अब रत्ती भर कोई नहीं बोलता । सभी जरा सा हीं बोलते हैं , लेकिन रत्ती भर पर आज भी मुहावरे प्रचलित हैं । "रत्ती भर" का वाक्यों में प्रयोग के कुछ नमूने देखिए -- 

1)तुम्हें तो रत्ती भर भी शर्म नहीं है । 

2)रत्ती भर किया गया सत्कर्म एक मन पुण्य के बराबर होता है.

3) इस घर में हमारी रत्ती भर भी मूल्य नहीं है ।

कुछ लोग" रत्ती भर " भी झूठ नहीं बोलते । 

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिस रत्ती की बात यहाँ हो रही है , वह माप की एक ईकाई है । यह माप सुनार इस्तेमाल करते हैं । पुराने जमाने जो माप तौल पढ़े हैं , उनमें रत्ती का भी नाम शामिल है । विस्तृत वर्णन इस प्रकार है -

8 खसखस = 1 चावल,

8 चावल = 1 रत्ती 

8 रत्ती = 1 माशा

4 माशा =1 टंक 

12 माशा = 1 तोला

5 तोला= 1 छटाँक 

16 छटाँक= 1 सेर 

5 सेर= 1 पंसेरी 

8 पंसेरी= एक मन 

हाँलाकि उपरोक्त माप अब कालातीत हो गये हैं , पर आज भी रत्ती और तोला स्वर्णकारों के पास चल रहे हैं । 1 रत्ती का मतलब 0.125 ग्राम होता है । 11.66 ग्राम 1 तोले के बराबर होता है । आजकल एक तोला 10 ग्राम होता है ।

इन सभी माप में रत्ती अधिक प्रसिद्ध हुई, क्योंकि यह प्राकृतिक रुप से पायी जाती है। रत्ती को कृष्णला, और रक्तकाकचिंची के नाम से भी जानी जाता है। रत्ती का पौधा पहाड़ों में पाया जाता है । इसे स्थानीय भाषा में गुंजा कहते है ।

मुंह के छालों को भी करता है ठीक

ऐसा माना जाता है कि अगर आप रत्ती के पत्ते को चबाना शुरू करें तो मुंह में होने वाले सारे छाले ठीक हो जाते हैं। साथ ही साथ इस के जड़ को भी सेहत के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है। आपने कई लोगों को’ रत्ती’, ‘ गूंजा’ पहनते हुए भी देखा होगा। कुछ लोग अंगूठी बनवा देते हैं तो कुछ लोग माला बनाकर इसे पहनते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह एक सकारात्मक ऊर्जा को उत्पन्न करता है जो क‍ि बहुत ही अच्छी बात है।

रत्ती के बीज लाल होते हैं , जिसका ऊपरी सिरा काला होता है । सफेद रंग के भी बीज होते हैं , जिनके ऊपरी सिरे भी काले होते हैं । यह बीज छोटा बड़ा नहीं होता , बल्कि एक माप व एक आकार का होता है । प्रत्येक बीज का वजन एकसमान होता है । इसे आप कुदरत का करिश्मा भी कह सकते हैं । 

रत्ती के इस प्राकृतिक गुण के कारण स्वर्णकार इसे माप के रुप में पहले इस्तेमाल करते थे , शायद आजकल भी करते होंगे ।

रत्ती का उपयोग पशुओं के घावों में उत्पन्न कीड़ों मारने के लिए किया जाता है । यह खुराक के रूप में प्रयोग किया जाता है। एक खुराक में अधिकतम दो बीज हीं दिए जाते हैं।दो खुराक दिए जाने पर घाव ठीक हो जाता है।

रत्ती के बीज जहरीले होते हैं । इसलिए ये खाए नहीं जाते । इनकी माला बनाकर माएँ अपने बच्चों को पहनाती हैं । ऐसी मान्यता है कि इसकी माला बच्चों को बुरी नज़रों से बचाती है।

शुक्रवार, 16 मई 2025

इस युद्धक माहौल में एक कहानी ये भी---


आप भी पढ़ें यह संवाद जो क‍ि किताब- 1971: charge of Gorkhas and other stories में दर्ज है। उस युद्ध के बारे में भारतीय सैनिकों के शौर्य की अद्भुत कहानियां हैं इस किताब में।


 1971 के युद्ध में गोरखा राइफल्स के एक कर्नल ने अपने दो युवा साथियों से कहा-अटैक करना है, सुसाइडल है, फ्रंट पर तुम दोनों में से कोई एक ही रहेगा। तुम दोनों में से कौन तैयार है? एक ने कहा- जान की बाजी लगानी है तो मैं फ्रंट टीम में रहूंगा सर। 

बहुत समझाने पर पहला वाला तैयार हुआ कि फ्रंट अटैक में वो नहीं रहेगा। पीछे वाली टीम में रहेगा। दूसरे वाले ने पाकिस्तानी चौकी पर हमले से पहले सिर मुंडा लिया। क्यों मुंडाया, ये किसी को आजतक नहीं पता चल पाया। क्योंकि उस हमले में उनकी शहादत हुई। मौत से पहले कई पाकिस्तानी सैनिकों की गर्दन काटी थी उस महावीर ने। उस हमले में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी दौड़ा-दौड़ा कर मारा था।

जब जंग खत्म हुई तो पहला वाला, दूसरे वाले के घर गया। बरेली में। मां ने कहा-मेरा बेटा हमेशा तुम्हारा नाम लेता था। कहता था कि वो मेरे लिए जान की बाजी लगा सकता है। अब मेरा बेटा नहीं है तो तुम ही मेरे बेटे हो।

पहले वाले का नाम था- कैप्टन हिमकार वल्लभ पांडेय (25 साल)

दूसरे वाले का नाम था- कैप्टन प्रवीण कुमार जौहरी (सेना मेडल, मरणोपरांत)-23 साल

कर्नल थे श्याम केलकर।

...हम खुशकिस्मत हैं कि ऐसी सेना है हमारे पास। जय हिंद की सेना।

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

अक्षय तृतीया पर कांची कामकोटि पीठम में एक नए युग की शुरुआत

 




अक्षय तृतीया पर कांची में एक नए युग की शुरुआत, इसके वेद, विद्या और वैद्य सेवाओं ने पिछली शताब्दी में भारत के विकास के विभिन्न आयामों को बदल दिया है। आदि शंकर द्वारा स्थापित 2,500 से अधिक वर्ष पुराने मठ, कांची कामकोटि पीठम में उत्सवों का माहौल है। पीठम के 71वें शंकराचार्य का अभिषेक मठ की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण है। 


70वें शंकराचार्य श्री शंकर विजयेंद्र सरस्वती स्वामीगल के शिष्य, इस अखंड वंश में मठ के 71वें शंकराचार्य होंगे। 


आज सुबह कामाक्षी मंदिर में कांची मठ के शिष्य स्वेकार समारोह में वर्तमान आचार्य शंकर विजयेंद्र सरस्वती स्वामी ने पीठम के लिए 71वें आचार्य का अभिषेक किया और नए आचार्य का नाम #सत्य_चंद्रशेखरेंद्र_सरस्वती रखा।


नए आचार्य को उनके गुरु विजयेंद्र सरस्वती ने दंड दिया।

#Kanchi #KanchiKamakotiPeetam #SatyaChandrasekharendraSaraswathi

आखिर इस देश में चल क्या रहा है?

 

सोचिए इस देश में तंत्र कितना सड़ा हुआ है। पाकिस्तानी महिलाएं यहां आकर शादी करके बस जा रही हैं। एक पाकिस्तानी महिला CRPF के जवान से शादी करती है। एक पाकिस्तानी है जिसके पास यहां का वोटर ID, आधार कार्ड, राशन कार्ड सब है। कुछ पाकिस्तानी यहां आए थे क्रिकेट देखने यहीं रह गए।


ये सब लिस्ट उनकी है जो डॉक्यूमेंटेड रूप से आएं हैं जिनका सरकार के पास रिकॉर्ड है! उनका क्या जो अवैध रूप से घुसे हैं और जिनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं है इधर। इतने पाकिस्तानी है, बांग्लादेशी भी होंगे, रोहिंग्या भी। जिन 80 करोड़ लोगों को राशन दिया जा रहा था उनमें से ये कितने है वो भी पता लगाना पड़ेगा।


आखिर इस देश में चल क्या रहा है? कोई नियम है या नहीं? ये देश धर्मशाला बन गया है क्या? सरकार इतने दिनों तक क्या कर रही थी? आने जाने वालों को ट्रैक क्यों नहीं किया गया? इन्हें ढूंढ कर वापस क्यों नहीं भेजा गया? लोग 20-20 साल से यहां रह रहे हैं। कोई खबर नहीं किसी को। अगर ये दुर्घटना न होती तो शायद हमें इसका पता भी नहीं चलता।


सोचिए जो 2011 से पहले इस देश में आए होंगे उनको तो जनसंख्या में भी गिना गया होगा। कई ऐसे होंगे जो नौकरी कर रहे होंगे। जिनके पास जमीनें होंगी। सरकार को इन सबको तुरंत वापस भेजना चाहिए, इनके नाम पर जो संपति है उसे जब्त करना चाहिए और इसी तर्ज पर बांग्लादेशियों के लिए भी अभियान चलाइए। ये बहुत घातक हैं, ये सब कैंसर सेल हैं।

रविवार, 27 अप्रैल 2025

जब पार्वती ने पूछा — मैं कौन हूँ?


आज एक धार्म‍िक चर्चा के दौरान ये सार न‍िकला... आप भी लाभान्व‍ित हों इस संवाद से । 

जब पार्वती ने पूछा — मैं कौन हूँ? यह सुनकर इसके उत्तर में शिव ने … माया को नग्न कर दिया 

इस दृश्य का कुछ इस तरह  प्रारंभ हुआ :

रात्रि थी। मौन थी।

चंद्रमा धुंधला था — जैसे कोई प्रश्न हवा में अटका हो।

पार्वती ने पूछा:

"नाथ… मैं कौन हूँ?"

आप मुझे शक्ति कहते हैं, ब्रह्म कहते हैं…...

पर कभी-कभी मैं स्वयं को केवल एक देह, एक पात्र, एक भूमिका जैसा महसूस करती हूँ।

क्या यह मेरा सत्य है या कोई भ्रम?


शिव ने कोई उत्तर नहीं दिया।

कुछ क्षण तक चुप रहे…

फिर बोले:

जिस दिन तुम अपने ‘मैं’ पर प्रश्न करोगी —

उसी दिन तुम उससे मुक्त होने लगोगी।

शिव ने हाथ बढ़ाया:

चलो — आज मैं तुम्हें वह दिखाता हूँ,

जिसे देखकर माया स्वयं अपनी आंखें फेर लेती है।

दृश्य 1: शव साधना

एक श्मशान — राख उड़ रही थी।

चिता बुझ चुकी थी।

एक स्त्री का शव पड़ा था — चेहरा वैसा ही… जैसा पार्वती का।

पार्वती भीतर तक कांप गईं।

क्या यह… वही थी?

शिव बोले:

यह तुम्हारा पहला भ्रम है — देह।

इसे तुम संवारती हो, रचती हो…

और फिर इसे ही ‘स्व’ मान बैठती हो।

"माया की पहली चाल — देह को आत्मा बना देना है।"

दृश्य 2: श्मशान की साक्षी

वहीं एक बूढ़ी माँ रो रही थी — बेटे की चिता जल रही थी।

दूसरी ओर कुछ लोग हँसते हुए गप्पें मार रहे थे।

एक ने कहा:

आज तीसरी चिता है… अब बारी उसकी होगी।

पार्वती की आँखें भर आईं।

शिव ने पूछा:

कौन सच्चा है — वो जो विलाप कर रहा है या वो जो हँस रहा है?

या फिर माया वही है — जो हर रिश्ते को समय का किरायेदार बना देती है?

दृश्य 3: भ्रम का बिंब

अब शिव उन्हें एक काले जल वाले सरोवर के पास ले गए।

पार्वती ने पानी में देखा —

वहाँ उनका प्रतिबिंब था…

लेकिन हर पल बदलता हुआ।

कभी वह वृद्धा, कभी वेश्या, कभी ऋषि, कभी राक्षसी।

"ये क्या है?" — पार्वती की आवाज़ कांप रही थी।

शिव ने उत्तर दिया:

यही तुम हो — जब तुम अपने स्वरूप को भूल जाती हो।

जब तुम अपनी शक्ति को पहचानने के बजाय समाज से पहचान माँगती हो।

माया का दूसरा स्वरूप — 'मैं कौन हूँ' का उत्तर बाहर ढूँढना।

दृश्य 4: शव-स्मृति और आत्म-परछाई

एक तपस्विनी बैठी थी —

निःशब्द, निर्वस्त्र, निर्विकार।

उसकी आँखें बंद थीं, और ललाट पर अग्नि रेखा थी।

पार्वती चौंकीं — यह उन्हीं का प्रतिबिंब था… पर मुक्त।

शिव बोले:

यह तुम हो — जब तुम स्वयं को छोड़ देती हो।

जब तुम 'शक्ति' नहीं, 'शून्य' बन जाती हो —

तब तुम शिव बन जाती हो।

पार्वती ने काँपती आवाज़ में कहा:

मैं शक्ति थी, माया बन गई…

और अब जान गई हूँ —

जो मिटता है, वह मैं नहीं।

जो रोता है, वो माया है।

और जो मौन हो गया है — वही 'मैं' हूँ।

शिव ने उत्तर दिया:

जब तुमने प्रश्न किया —

तभी तुम माया बनी।

और जब तुम मौन हो गई —

तभी तुम ब्रह्म हो गईं।

शास्त्र-प्रमाण ये है क‍ि- 

“शिवः शक्त्या युक्तः…”

— शिवमहापुराण

(शक्ति शिव से भिन्न नहीं — लेकिन भ्रम से उत्पन्न होती है)

“मायैव सर्वमखिलं ह्यनात्मा…”

— शिवगीता

(जो ‘मैं’ नहीं है, वही सबसे बड़ी माया है)

“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या…”

— अद्वैत वेदांत

जब पार्वती ने खुद से पूछा — मैं कौन हूँ…

तो माया चुप हो गई।

“माया वही है —

जो तुम हो ही नहीं…...

फिर भी हर दिन ‘वही’ बनने की कोशिश करते हो।”

साभार - 𝗠𝗮𝗻𝗶𝘀𝗵 𝗗𝗮𝘁𝘁 𝗧𝗶𝘄𝗮𝗿𝗶

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने आज स‍िंधु के दूसरे चैनल को भी पूरी तरह से बंद कर दिया

 कुल चार चैनलों के द्वारा सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान में जाता है




वीड‍ियो: साभार एएनआई
भारत में दूसरे चैनल को भी पूरी तरह से बंद कर दिया और उसका वीडियो रिलीज कर दिया पाकिस्तान के विशेषज्ञ बता रहे हैं कि अभी पाकिस्तान को सिंधु नदी में जितना पानी मिल रहा है यदि भारत सिर्फ 10% बंद कर दे तो पाकिस्तान की 30% जमीन बंजर हो जाएगी और अगर भारत 20% बंद कर दे तो पाकिस्तान के मुल्तान लाहौर जैसे कई शहर पीने के पानी के कमी से जूझने लगेंगे और अगर आधा बंद कर दे तो पाकिस्तान में कोई खेती नहीं होगी पाकिस्तान में हाहाकार मच जाएगा और बिना एक मिसाइल गिराये भारत लाखों लोगों का कत्लेआम कर देगा सिंधु नदी समझौते की प्रस्तावना में लिखा था कि यह समझौता एक सौहार्दपूर्ण वातावरण के लिए किया जा रहा है भारत और पाकिस्तान के बीच में सौहार्दपूर्ण वातावरण बना रहे इसके लिए नदी जल बटवारा समझौता जरूरी है अब विश्व बैंक को भारत ने बता दिया फिर जब वातावरण सौहार्द पूर्ण नहीं रहा तो हम समझौता सस्पेंड करने और रद्द करने का अधिकार रखते हैं कल तक जो पाकिस्तानी चिल्ला रहे थे कि भारत समझौते को रद्द नहीं कर सकता उन्होंने शायद यह सौहार्दपूर्ण वातावरण रखने की कंडीशन नहीं पढ़ी थी क्योंकि अभी गर्मी है भारत के क्षेत्र के सिंधु नदी बेसिन के सारे रिजर्वायर सूखे हुए हैं तो भारत उन रिजर्वायर को भर रहा है उम्मीद है भविष्य में सिंधु नदी को सतलज से जोड़ दिया जाएगा और सतलज को अगर श्रीगंगानगर होते हुए महीसागर नदी से जोड़ दिया जाए तो पंजाब राजस्थान मध्यप्रदेश गुजरात जैसे काफी एरिया को खूब पानी मिल सकता है

शनिवार, 5 अप्रैल 2025

क्या सुप्रीम कोर्ट वक्फ बिल को निरस्त कर सकता है, समझें संवैधानिक प्रावधान


 क्या वक्फ संशोधन बिल असंवैधानिक है? असंवैधानिक कहने का अर्थ है कि यह देश के संविधान के अनुसार नहीं है, यानी इसमें जो बातें कही गई हैं, वह देश के कानून के विपरीत हैं. इसी बात को आधार बनाकर सांसद मोहम्मद जावेद और असदुद्दीन ओवैसी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं. अब सवाल यह है कि जिस विधेयक को संसद ने पूरी संवैधानिक व्यवस्था के साथ संसद से पास किया है, क्या सुप्रीम कोर्ट उस पर स्टे करेगा? 

वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को संसद ने पास कर दिया है. इस बिल को लोकसभा ने 2 अप्रैल और राज्यसभा ने 3 अप्रैल को पारित किया. यह विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करके कानून का रूप ले लेगा. विधेयक के कानून बनने की जो प्रक्रिया होती है, उसपर यह विधेयक पूरी तरह से सटीक बैठता है, बावजूद इसके इसे असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है. इस परिस्थिति में देशवासियों के मन में यह सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस बिल को निरस्त कर सकता है? इस सवाल  का जवाब हमारा संविधान देता है. 
कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के अधिकारों पर क्या कहता है संविधान 
भारतीय लोकतंत्र जिन स्तंभों पर खड़ा है वे हैं-कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका. भारत का संविधान लिखित है और उसमें इन तीनों स्तंभों की भूमिका और अधिकार स्पष्ट तौर पर बताए गए हैं. संविधान ने तीनों स्तंभों के कार्यों का बंटवारा किया है और यह भी सुनिश्चित किया है कि तीनों स्तंभों में कभी टकराव ना हो और ऐसा भी ना हो कि किसी की शक्ति अत्यधिक और किसी की कम हो जाए. संविधान ने तीनों स्तंभों को जो कार्य दिए हैं वे इस प्रकार हैं-
विधायिका यानी वह संस्था जो कानून बनाती है
कार्यपालिका यानी वह संस्था जो कानून को देश में लागू करती है
न्यायपालिका इस बात की निगरानी करती है कि जो कानून बने हैं, उनका सही से पालन हो रहा है या नहीं

देश के इन तीनों स्तंभों के बीच शक्ति का संतुलन भी बनाया गया है. विधायिका कार्यपालिका को प्रश्न पूछकर नियंत्रित करती है और उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकती है. जबकि कार्यपालिका विधायिका को भंग करने की क्षमता रखती है. वहीं न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा करता है, ताकि संविधान के अनुसार काम हो.
वक्फ बिल के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?
वक्फ बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो याचिकाएं दाखिल की गई हैं, उसमें संविधान यानी देश के कानून के अनुसार कोई गलती नहीं हुई है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का काम ही है संविधान की व्याख्या करना. अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट उस बिल के साथ क्या करेगा, जिसे संसद पास कर चुकी है? इस संबंध में विधायी मामलों के जानकार अधोध्या नाथ मिश्रा ने बताया कि संविधान में यह व्यवस्था है कि ना तो सुप्रीम कोर्ट और ना ही संसद यानी ना तो न्यायपालिका और ना ही विधायिका एक दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप करते हैं. इस लिहाज से जब किसी विधेयक को संसद पास कर चुकी है, तो सुप्रीम कोर्ट उसे निरस्त कर देगा, यह संभव नहीं है. हां, यह हो सकता है कि बिल के किसी खास क्लॉज यानी कंडिका पर आपत्ति हो, तो सुप्रीम कोर्ट उसे देख सकता है और अगर उसे उचित लगे तो वह उसपर कुछ सुझाव विधायिका को दे सकता है. लेकिन यह सुझाव होगा, जजमेंट नहीं. यह संभव नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट वक्फ बिल पर स्टे लगा दे, क्योंकि वक्फ बिल को पूरी तरह संविधान सम्मत प्रक्रियाओं के तहत लाया गया है. अगस्त 2024 में यह बिल संसद में पेश किया गया, उसके बाद इसे विस्तृत चर्चा के लिए जेपीसी के पास भेजा गया. जेपीसी ने इस बिल पर कई तरह के सुझावों पर गौर किया और फिर उसमें बदलाव भी किया. जेपीसी की सिफारिशों के साथ बिल संसद में फिर आया और संसद द्वारा पास किया गया. बिल पर बहस हुई है, सभी पार्टियों को बोलने का मौका भी मिला है, इसलिए इसे पेश करने की जो व्यवस्था है वह पूरी तरह न्याय सम्मत है. 
-Legend News

मंगलवार, 25 मार्च 2025

जूडिशियरी में बहुत पुराना है अंकल जज सिंड्रोम, जस्टिस वर्मा विवाद के बाद फ‍िर छिड़ी बहस


 दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से 14 मार्च 2025 को करोड़ों रुपए के अधजले नोट बरामद होने के बाद अंकज जज सिंड्रोम एक बार फिर बहस का केंद्र बन गया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोस‍िएशन ने “अंकज जज सिंड्रोम” पर तीखा प्रहार किया है. 

जस्टिस यशवंत वर्मा के सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट फिर से वापस भेजे जाने के फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू हो गई है. इस हड़ताल के साथ ही पूरे देश के न्यायालयों में एक बार फिर से “अंकल जज सिंड्रोम” और न्यायिक सुधारों पर तीखी बहस शुरू हो गई है.

न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता नहीं होने और इनमें परिवारवाद को वरीयता दिए जाने को “अंकल जज सिंड्रोम” कहते हैं. जब जज बनाने के लिए अधिवक्ताओं के नाम प्रस्तावित किए जाते हैं तो किसी भी स्तर पर किसी से कोई राय नहीं ली जाती.

ऐसे में जिन लोगों का नाम प्रस्तावित किया जाता है. उनमें से कई पूर्व न्यायाधीशों के परिवार से होते हैं या उनके संबंधी होते हैं. विशेष पहुंच के कारण इनके नामों को प्रस्तावित किया जाता है, जो शुचिता और स्वतंत्रता के हित में नहीं होता.

पारदर्शिता के अभाव में न्यायपालिका में नियुक्तियां जब निजी संबंधों और प्रभाव के आधार पर की जाती हैं तो न्यायपालिका में इस परंपरा को 'अंकल जज सिंड्रोम' कहा जाता है. “अंकल जज सिंड्रोम” न्यायपालिका में फैले कथित भाई-भतीजावाद और पक्षपात को दर्शाता है. इससे उस सिद्धांत को ठेस पहुंचती है कि न्याय अंधा होना चाहिए.

भारतीय विधि आयोग ने अपनी 230वीं रिपोर्ट में उच्च न्यायालयों में ‘अंकल जजों’ की नियुक्ति के मामले का उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया है कि जिन जजों के परिजन किसी उच्च न्यायालय में वकालत कर रहे हैं, उन्हें उसी उच्च न्यायालय में नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल तिवारी के अनुसार  अंकल जज सिंड्रोम का झगड़ा बहुत पुराना है. देश में डेमोक्रेसी के लिए जरूरी है कि न्यायपालिका ट्रांसपैरेंट हो. अंकल जज सिंड्रोम की बात सुप्रीम कोर्ट ने कही है. हमने तो कही नहीं.

न्यायपालिका में साफ सुथरी पारदर्शी व्यवस्था हो जहां जनता को शक बिल्कुल न हो. उसे न्याय मिले. सामान्य घरों से आने वाले अधिवक्ताओं के साथ कोई भेदभाव न हो. जजों की नियुक्तियों में पारदर्शिता हो. यही इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन चाहता है. अंकल जज सिंड्रोम जूडिशियरी में बहुत पुरानी है. सीनियर अधिवक्ता और जज अपने बच्चों और रिश्तेदारों को सेट करने के चक्कर में दूसरे योग्य और विद्वान अधिवक्ताओं का हक मारते हैं. जज जो कोलेजियम में हैं वो अपने बच्चों और रिश्तेदारों के नाम को प्रस्तावित करते हैं.

कोलेजियम सिस्टम शुरू में तो ठीक रहा पर फिर गड़बड़ हो गया. जजों की नियुक्ति सरकार के हाथ में भी नहीं देनी चाहिए. यह लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है. पिछले दिनों उच्च न्यायालयों के जो निर्णय आए वो जूडिशियरी के लिए और लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा हैं. 

ऐसे में अगर देश की न्यायपालिका भी बिक गई तो देश में गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा. भाई–भतीजावाद से न्यायपालिका और आम आदमी को बहुत नुकसान हो रहा है. लोगों को समय से न्याय नहीं मिल रहा. ज्यूडिशरी में तीन-चार पीढ़ियों से जज का बेटा जज बन रहा है और अधिवक्ता का बेटा अधिवक्ता बन रहा है. नए लोगों को मौके नहीं मिल पा रहे हैं. इसमें भाई भतीजा वाद चल रहा है. इससे लोकतंत्र को नुकसान हो रहा है.

इससे तमाम ज्ञानवान और विद्वान अधिवक्ताओं को मौके नहीं मिल रहे हैं. किसी भी आम अधिवक्ता को जज बनने का मौका ही नहीं मिलता. अंकल जज सिंड्रोम को लेकर के कई बार आंदोलन भी किया गया है, लेकिन ज्यूडिशरी में कोई फर्क नहीं पड़ा.

इसको तभी खत्म किया जा सकता है जब कोलेजियम सिस्टम को बिल्कुल खत्म कर दिया जाए. कोलेजियम सिस्टम से ना होकर, नियुक्ति का दूसरा रास्ता निकाला जाना चाहिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोस‍िएशन के अनुसार जिनका फैमिली बैकग्राउंड होता है. जिनके घर में कोई जज होता है उनके बच्चों को एक दो साल में सैकड़ों बड़े-बड़े केसे दे दिया जाता है. आम एडवोकेट के खाते में कई बार एक केस भी नहीं होता है.

उसे अपनी जमीन तैयार करने में 8 से 10 साल लग जाते हैं. मेरा कहना है कि जिस हाईकोर्ट में यदि किसी का पिता या बेटा जज हो उसको उसी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस से रोका जाना चाहिए. कोलेजियम व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए. जजों की नियुक्ति एकदम पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एडवोकेट्स का कहना है कि न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता न होने से न्याय की आस लेकर बैठे लोगों को निराशा हाथ लगती है. जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ एक आम आदमी की तरह ही कार्रवाई करनी चाहिए.

कोलेजियम की व्यवस्था का ही खोट है कि जस्टिस यशवंत वर्मा जैसे लोग जज बन जाते हैं और उनके घर करोड़ों रुपए बरामद होते हैं. ऐसे में समाज का देश का भरोसा न्यायपालिका से उठ जाएगा. जनता हमारे पास आती है. उसे न्याय नहीं मिल पाएगा तो लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगेगा.

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

#MahaShivratri : शिव का नटराज चित्रण एक कॉस्मिक नर्तक का रूप है

 #Mahashivratri #MahaShivratriSpecial


शिव का नटराज चित्रण एक कॉस्मिक नर्तक का रूप है जो लास्य व तांडव के अपने दोहरे नृत्यों के माध्यम से दुनिया को नष्ट करके फिर से बनाने की शक्ति रखते हैं।
क्वांटम यांत्रिकी अनुसार शिव का नृत्य उप-परमाणु पदार्थ का नृत्य जैसा है, यह नृत्य सृजन और विनाश का प्रतीक है, जो ब्रह्मांड के हर स्तर पर होता रहता है.
क्वांटम यांत्रिकी के मुताबिक, इलेक्ट्रॉन एक स्थिर इकाई नहीं है, बल्कि एक संभाव्यता तरंग है. इसी तरह, निर्वात खाली नहीं है, बल्कि आभासी कणों का एक उबलता हुआ समुद्र है.
शिव का तांडव, ब्रह्मांड को चलाने वाली मूलभूत शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है. शिव का तांडव, सृजन, संरक्षण, और विनाश की एक ब्रह्मांडीय प्रक्रिया है. शिव का तांडव, क्वांटम यांत्रिकी की विरोधाभासी दुनिया को भी प्रतिध्वनित करता है.
स्विट्ज़रलैंड के जेनेवा में स्थित दुनिया के सबसे बड़े भौतिकी प्रयोगशाला 'सर्न' के बाहर एक विशाल नटराज की मूर्ति है. यह मूर्ति भारत सरकार ने ही तोहफ़े में दी थी.

हिंदू संस्कृति में शिव के नटराज रूप को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव के नृत्य ने ब्रह्मांड के अस्तित्व का निर्माण किया। यह मूर्ति पूरी तरह से भारत में एक विशेष खोई हुई मोम तकनीक से बनाई गई है जिसमें गर्म धातु को मोम के मॉडल में डाला जाता है जो फिर इस प्रक्रिया में खो जाती है। नटराज की मूर्ति को अक्सर नकारात्मक ऊर्जा और आक्रामकता का वाहक माना जाता है, जिसके कारण लोग इसे अपने घर में रखने के बारे में सोचते हैं। नटराज के प्रतीकवाद के दो पहलू हैं, उन्हें उनके दिव्य नृत्य के लिए पूजा जाता है जो विनाश की शक्तियों को शांत करता है जबकि साथ ही वे अपने आक्रामक और भयंकर ब्रह्मांडीय तांडव के लिए भी जाने जाते हैं। भगवान प्रसन्नता और क्रोध दोनों ही समय में तांडव करते हैं, इसलिए नटराज की मूर्ति को अपने घर के अलावा घर में रखना भी सही रहता है। घर में नटराजमूर्ति रखने के लिए सबसे सही स्थान उत्तर-पूर्व दिशा है जिसे ईशान्य कहते हैं। यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि नटराज की मूर्ति को अलग तरीके से रखा जाए और अन्य देवताओं के साथ नहीं। नटराज का प्रतीकवाद नटराज का एक विशिष्ट प्रतीकात्मक स्वरूप है, जो एक ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में सभी तत्वों को गहन महत्व के साथ दर्शाता है: डमरू (ढोल):
शिव अपने ऊपरी दाहिने हाथ में डमरू धारण करते हैं जो समय के साथ सृष्टि की ध्वनि का प्रतीक है। डमरू द्वारा उत्पन्न कंपन सृष्टि की उपस्थिति को दर्शाता है, जिसे ब्रह्मांड की ध्वनि कहा जाता है। ज्वाला (अग्नि):
अपने ऊपरी बाएं हाथ में, देवता एक ज्वाला धारण करते हैं जो ब्रह्मांड के विनाश और परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। उनके हाथ में अग्नि ब्रह्मांड के विघटन को दर्शाती है। अभय मुद्रा:
शिव के निचले हाथ योगिक अभय मुद्रा में उठे हुए हैं जो सुरक्षा और आराम का संकेत है। ऐसा कहा जाता है कि यह अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हुए भय को दूर करता है। उठा हुआ पैर:
नटराज का उठा हुआ पैर अपने भक्तों की रक्षा का मार्ग दर्शाता है तथा उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए मार्गदर्शन करता है। राक्षस अपस्मार:
शिव के दाहिने पैर के नीचे राक्षस राजा अपस्मार है जो अज्ञानता और अहंकार के परिणाम को दर्शाता है। शिव द्वारा राक्षस को अपने पैर के नीचे कुचलना अज्ञान पर ज्ञान की जीत को दर्शाता है। अग्नि वलय:
नटराज के चारों ओर अग्नि वलय है जिसे प्रभामंडल कहते हैं। प्रभामंडल जन्म, पुनर्जन्म और फिर मृत्यु के अंतहीन चक्र को दर्शाता है। यह देवता की दिव्य चमक को दर्शाता है। नटराज प्रतिमा की उत्पत्ति शिव के नटराज अवतार की उत्पत्ति 5वीं शताब्दी में हुई थी। नटराज की सबसे पुरानी पत्थर की मूर्तियाँ अजंता एलोरा की गुफाओं और बादामी की गुफाओं में देखी जाती हैं। चोल राजवंश की कांस्य प्रतिमाएँ कुछ अलग मुद्राओं और प्रतीकात्मकता में हैं। नटराज के आनंद तांडव का कांस्य चित्रण 7वीं से 9वीं शताब्दी के पल्लव राजवंश में भी पाया जा सकता है। 9वीं शताब्दी की प्राचीन पुरातत्व खोजों में मध्य प्रदेश के उज्जैन में लाल पत्थर की नटराज की प्रतिमा प्रदर्शित की गई है, साथ ही कश्मीर से भी कुछ ऐसी प्रतिमाएँ मिली हैं, जिनमें अनूठी प्रतिमाएँ हैं। नटराज की प्राचीन प्रतिमाएँ धार्मिक प्रथाओं का मुख्य आकर्षण थीं, जो आज भी जारी हैं।

- अलकनंदा स‍िंंह