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शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

कुल्‍हाड़ी-कुदाल के संग तम्‍बूरा

सदियों पुरानी बहस है कि भाग्‍य और कर्म में कौन श्रेष्‍ठ है। भाग्‍यवादी कर्म को और कर्मवादी भाग्‍य को गौण समझते हैं परंतु भाग्‍य और कर्म दोनों का ही अस्‍तित्‍व जीवन के लिए बेहद महत्‍वपूर्ण है। अंतर बस इतना है कि भाग्‍य पर निर्भरता हमें कर्म करने से दूर कर देती है जबकि कर्म पर निर्भर रहकर भाग्‍य का निर्माण किया जा सकता है।
यह तभी संभव है जबकि कर्म को उत्‍सव मानकर चला जाये। कर्म को जिया जाये न कि 'कैसे भी निबटाओ' की सोच के साथ उसे खत्‍म किया जाये। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि उत्‍तम कर्म करके व्‍यक्‍ति उच्‍च स्‍थान तक पहुंचे हैं, मगर उन्‍होंने भी अपने कर्म को जिया, उसे उत्‍सव मानकर जीवन का ध्‍येय बनाया।उनके लिए उनका कर्म बोझ नहीं था इसीलिए वे उसे करने में आनंदित होते रहे और आगे बढ़ते रहे।
जीवन में सब कुछ पा लेने की ज़िद में मानवीय संवेदनायें दम तोड़ रही हैं, सारे भाव खो रहे हैं, ऐसे में बहुत जरूरत है इस सोच को अपनाने की कि कर्म की प्रकृति को उत्‍सव बना दिया जाये।और फिर से कहीं मीरा के हाथ का तम्‍बूरा , कृष्‍ण के हाथ की बांसुरी बन जाये वह तो कहीं ताजमहल तक का निर्माण कर दे।
मीरा के हाथ में जो तम्‍बूरा है, वह कर्म करने वालों की वजह से ही आया, उसे बनाने वाले यदि नहीं होते तो हम तम्‍बूरे से अनभिज्ञ ही रहते मगर लकड़ी, बांस और तार के मिश्रण की कल्‍पना जिसने भी की, वह पहला व्‍यक्‍ति निश्‍चित ही 'कर्म को उत्‍सव' बनाने की धुन पाले बैठा रहा होगा। बिना उत्‍सवी सोच के ये संभव ही नहीं था। तम्‍बूरा जैसा वाद्य यंत्र 'सिर्फ कर्म' करना है, की सोच वाले पैदा नहीं करते। वे तो कुल्‍हाड़ी बनाते हैं, कुदाल बनाते हैं, तलवार बनाते हैं। तम्‍बूरा को गढ़ा गया और इसे गढ़ने वाली उत्‍सवी सोच से केवल कर्म करते जाने वालों की सोच का क्‍या लेना देना। तम्‍बूरा तो गढ़ते ही वे लोग हैं जो जिंदगी को खेल की तरह से लेते हैं। जिंदगी में जो भी श्रेष्‍ठ आया चाहे वह तम्‍बूरा हो या ताजमहल, वह उन लोगों के मन से आया, उन के सपनों से आया जो जिंदगी को उत्‍सव बनाकर चलते रहे, गुनगुनाते रहे और नायाब कृतियां बना दीं।
ज़रा सोचिए! भोजन घर में भी बनता है और होटल में भी मगर तृप्‍ति घर का भोजन ही देता है, क्‍यों ? क्‍योंकि वह  उस गृहणी के लिए काम नहीं बल्‍कि अपनों को स्‍वाद का आनंद लेते देख स्‍वयं आनंदित होने का साधन है। और जहां आनंद है वहीं उत्‍सव है। सो आनंद के साथ कर्म को करने में जो तृप्‍ति मिलती है उससे जीवन उत्‍सव बन जाता है। हर कदम हल्‍का, कहीं कोई भार नहीं, कहीं कोई जबरदस्‍ती नहीं।
आज जो चारों तरफ आपाधापी समाज में हर क्षेत्र में सर्वोच्‍चता को पा लेने की है उससे संपन्‍नता तो बढ़ रही है मगर व्‍यक्‍ति उतना ही तेजी से मन से गरीब हुआ जा रहा है। भावनायें, संवेदनायें, दया, करुणा, क्षमा जैसे मन से उपजने वाले भाव से हीन होता जा रहा है। उत्‍सवविहीनों से बनते समाज का ही तो आइना है बढ़ता आपराधिक आंकड़ा। कितने आश्‍चर्य की बात है कि समाज की गरीबी मिटाने पर सबका ध्‍यान है और किसी हद तक संपन्‍नता गरीबी को मिटा भी रही है मगर जो समाज 'मन से गरीब' हुआ जा रहा है उस पर किसी का ध्‍यान नहीं है। मन अतृप्‍त है, गरीब है, वह करोड़ों कमा लेने के बाद भी जीवन को उत्‍सव नहीं बना पा रहा, ना ही उसे देख आनंदित हो पा रहा है और कुंठाओं से घिरा अपराधों को जन्‍म दे रहा है।
कुल मिलाकर इस स्‍थिति को हम भाग्‍य के भरोसे नहीं छोड़ सकते क्‍योंकि कर्म को महज 'काम है- जो निबटाना है' वाली सोच में बांध दिया गया है, आनंद से दूर कर दिया गया है। इस बंधन में विवशता है जो जब-तब बंधन तोड़ने को आतुर हो उठती है और यही आतुरता समाज में अपराध को बढ़ावा दे रही है।
समाज को फिर से उत्‍सव से जोड़ना होगा और उत्‍सव ऐसे हों जो सदियों से थोपे गये ना हों, वे स्‍वयं ही उपजें...ऐसे उत्‍सव जो स्‍वयं आग्रह करें... मन से नाच उठने का...कुछ नया जन्‍माने का...कुछ नया खोजने का जैसे कि तम्‍बूरा खोजा गया, बांसुरी खोजी गई...। ढर्रे पर चलते चलते सदियों पुराने उत्‍सवों की सड़ांध अब समाज के मन को झूमने नहीं देती बल्‍कि बोझ बन गई है, रस्‍म बन गई है। और जो रस्‍म बन गई हो, लीक पर ही चलती रही हो वह ना तो 'कर्म' में उत्‍सव की भावना को पैदा कर पायेगी ना ही 'मन' में।
निश्‍चित ही जब मन तमाम ढर्रे में बंधी सोचों से संचालित होगा तो वह कर्म को उत्‍सव कैसे बना पायेगा भला और ऐसे में कर्म के द्वारा भाग्‍य को बनाने- बदलने के प्रयास भी तो धराशायी ही हो जायेंगे ना। इसलिए कोशिश की जाये कि कर्म जरूरी है मगर वो महज 'काम निबटाने' तक सीमित ना रहे, वह मन से किया जाये ताकि हम कर्म को उत्‍सव मानकर आगे बढ़ें और अपने पने भाग्‍यों को स्‍वयं संचालित करें..उसे बनायें और बढ़ायें। समाज की नकारात्‍मकता को सकारात्‍मक दिशा में उत्सव के संग ही ले जाया जा सकता है।

-अलकनंदा सिंह

शनिवार, 21 जून 2014

शर्तों के बंधन यानि दूरी को आमंत्रण

एक कहानी है - भगवान और धर्म, पीड़ा और दुख के संबंध  में जो हाल ही में  कहीं पढ़ी है। आम्रपाली अपने समय की बहुत प्रसिद्ध नर्तकी थी। उसने एक बार महात्मा बुद्ध से भेंट की। थोड़ी देर बातचीत के बाद उनसे पूछा -'भंते! आप मेरे पास कभी क्यों नहीं आते।' महात्मा बुद्ध बोले-'अभी जरूरत नहीं है, जिस दिन जरूरत होगी, मैं अवश्य आऊंगा।' समय बीतता गया और धीरे धीरे वह नर्तकी बूढ़ी हो गई। देखते देखते उसकी खूबसूरती कम होती चली गई। रोज पहुंचने वाले लोग भी अब उससे बचने लगे। हालत यह हो गई कि अब उसके पास कोई मिलने ही नहीं आता था। तब एक दिन महात्मा बुद्ध वहां पहुंचे और बोले-'प्रिय! मैं आ गया।' आम्रपाली ने कहा-'भंते! अब तो समय बीत गया। अब मुझमें बचा ही क्या है? वह शारीरिक सौंदर्य तो अब रहा नहीं। आप इतने दिनों बाद आज क्यों आए?' महात्मा बुद्ध ने कहा-'प्रिये! यही तो समय है आने का। पहले तुझे मेरी आवश्यकता भी नहीं थी। धर्म की आवश्यकता तो तुझे अब महसूस हो रही है। समझ ले, मैं उसकी पूर्ति करने आया हूं।' पीड़ा और दुख के समय ही भगवान और धर्म को याद किया जाता है।
आम्रपाली की कहानी पढ़कर अब एक प्रश्‍न यहीं से उपजता है कि जब पीड़ा होगी दुख होगा क्‍या  ईश्‍वर तभी  याद आयेंगे, ईश्‍वर हमारे ही पास है, इसका अहसास भी तभी होना चाहिए क्‍या जब पीड़ा हो, ये तो शर्त हो गई ईश्‍वर को याद करने की। ये तो अनिवार्यता हो गई कि ईश्‍वर को हमेशा जहन में रखने के लिए पीड़ा का और दुख का होना जरूरी है। अनिवार्यता है यानि निश्‍चित ही ये बाध्‍यता भी है  और बाध्‍यता है यानि ये तो नियम बन गया है। तात्‍पर्य यही हुआ कि ईश्‍वर के लिए दुख की अनिवार्यता को नियम बना दिया गया। नियमों में बंधकर सामाजिक संरचना को तो चलाया जा सकता है , सृष्‍टि की सारी आवश्‍यकताओं पर खरा भी उतरा जा सकता है मगर ईश्‍वर को नहीं पाया जा सकता ।  ईश्‍वर तो सिर्फ और सिर्फ मन की, आत्‍मा की निश्‍छलता से ही पाया जा  सकता है। हां, इस निश्‍छलता के लिए अवश्‍य अपने भीतर झांकना  होगा और तभी उपजेगा प्रेम। एक निश्‍छल प्रेम...। प्रेम का उमड़ना और उमड़ कर  ईश्‍वर को  पाने की यात्रा निश्‍चित ही दुख या पीड़ा वाली बैसाखी की मोहताज नहीं तो फिर इस बैसाखी को हम क्‍यों ढोयें। क्‍यों ना हम प्रसन्‍न रहते हुये, प्रसन्‍न करते हुये, प्रसन्‍न देखते व दूसरों को दिखते हुये ईश्‍वर का हर वस्‍तु-व्‍यक्‍ति में अनुभव करें और उसकी निकटता का आनंद लें।
अकसर लोग पूछ बैठते हैं कि ईश्‍वर के प्रति प्रेम उपजने की क्‍या गारंटी है। इनके लिए एक ही जवाब होता है कि एक बार दूसरों से अपनी अपेक्षाओं की शर्त हटाकर तो देखिए सभी प्रेममय  लगेंगे क्‍योंकि अपेक्षायें प्रेम को ठहरने ही नहीं देतीं,वे प्रतिदान मांगती हैं और जो मांग रहा है वह तो भिखारी हो जाता है ना...वह प्रेमी नहीं रह पाता...और जब प्रेम  नहीं रहता तो ईश्‍वर कैसे रहेगा, ऐसी स्‍थिति में प्रेमविहीनता या यूं कहें कि आत्‍मा के संग वैक्‍यूम जन्‍मता है जो  पीड़ा को जन्‍म  देता है , जो दुख को अनिवार्य बताता है ।
आम्रपाली के संदर्भ में हो सकता है बुद्ध ने त्‍याग और पीड़ा को ऊपर रखा क्‍योंकि वे त्‍याग और उससे उपजी पीड़ा को ही ईश्‍वर को पाने का एकमात्र रास्‍ता बता पाये या जान पाये। इस संदर्भ में कृष्‍ण का रास्‍ता ज्‍यादा आसान और सर्वग्राह्य व सुलभ है, बस एक बार निश्‍छल हो जाया जाये। आत्‍मा तक पहुंचने के लिए कृष्‍ण का प्रेममयी हो जाने का और प्रेममयी कर देने का रास्‍ता आनंद का रास्‍ता है जो अपेक्षाओं से उपजे दुख को भी दूर कर देता है और प्रेममयी बनाकर आत्‍मा व  ईश्‍वर दोनों का ही पग पग पर स्‍वागत करता है। इसे यूं भी जाना जा सकता है कि शर्तों और अपेक्षाओं से तो कारोबार होता है और ईश्‍वर कोई कारोबार नहीं...कि जिसका लेनदेन हो सके , उसमें तो रमा जा सकता है बस।
-अलकनंदा सिंह


मंगलवार, 3 जून 2014

कष्‍ट की याचना क्‍यों ?

एक बार कृष्‍ण को द्वारिका के लिए विदा करते समय कुंती कहती हैं-
''विपद: सन्तु ता: शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो । भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥८॥''
कुंती  कृष्‍ण से कष्‍ट की याचना करती है ताकि कष्‍ट कृष्‍ण के दर्शन करा सकें मगर आनंदकारी कृष्‍ण कहते हैं और समझाते भी हैं कि कष्‍ट की याचना ठीक नहीं। इसी के साथ वह कहते हैं कि मैं जिस पर कृपा करना चाहता हूं, उसे कष्‍ट ही देता हूं। इसके बड़े  मनोवैज्ञानिक कारण हैं । सुख की लंबाई अहुत कम होती है उसकी गहराई भी बहुत कम होती है इसीलिए सुख में कोई भी उच्‍छृंखल हो सकता है, वह सबको दिखाना चाहता है कि वह सुखी है, सुख में कुछ भी गहरा नहीं रह जाता, सब उथला उथला... जबकि दुख...दुख तो इसके ठीक उलट होता है, वह 'शैलो' नहीं होता, वह गहरा होता है, उसकी लंबाई भी ज्‍यादा होती है । दुख सिर्फ दुख ही नहीं देता, वह मांजता भी है , निखारता भी है इसीलिए कृष्‍ण कुंती की इस कष्‍ट मांगने की चतुराई वाली  इच्‍छा पर मुस्‍कुरा देते हैं कि आत्‍मा और स्‍वयं अपने को तलाशने, निखारने के लिए उन्‍होंने कितनी आसानी और चालाकी से ईश्‍वर को पाने का माध्‍यम खोज लिया ।
आजकल हममें से अधिकांश व्‍यक्‍ति थोड़ा सा दुख होने पर भी परेशान होने लगते हैं। घबराकर सोचते हैं कि अब जीवन का सफर या तो यहीं तक है बस या फिर जीवन में सिर्फ सुख ही होना चाहिये।  सच तो ये है कि किसी भी संकट की घड़ी में धैर्य न खोकर उस दुख के साथ बहने का प्रयास करना चाहिये क्‍योंकि स्‍व्‍यं को,स्‍वजनों को और स्‍वमित्रों को इसी एक माध्‍यम से जाना जा सकता है।
दुख मनाते रहना समस्‍याओं के समाधान में आड़े आता है। विपरीत परिस्‍थितियों को अपनी ओर मोड़ने  के लिए कुछ दूर तक उनके बहाव में बहकर देखना चाहिए, ताकि उनसे निकलने का रास्‍ता ढूढ़ना आसान हो जाये। परिस्‍थितियां विपरीत नहीं होतीं वरन् हमारी इच्‍छायें उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पातीं और हम दोष उन्‍हें देने लगते हैं, जो किसी  भी कारण से उन परिस्‍थितियों के कारक होते  हैं।
जीवन का हर क्षण जो कष्‍टदायी लगता है (जबकि होता नहीं है) उसमें से भी सकारात्‍मक बदलाव के संकेत ढूढ़ना और समय को अपनी गति से चलने देना, हर दुख से उबरने का पुरुषार्थी तरीका है। कृष्‍ण ने गीता में अर्जुन को जीवन के प्रवाह की सभी वास्‍तविकताओं से परिचित कराते हुये दुख ना मानने का ही उपदेश दिया। संपूर्ण गीता का आधार ही दुख से जीवन के मूल्‍यों को परिष्‍कृत करना बताया गया है। दुख के गहनतम क्षण ही हमें ऊर्जा की ओर झांकने को प्रेरित करते हैं और हमें स्‍वयं को जानने और दुख के कारण व निवारण को भी तलाशने का रास्‍ता सुझाते हैं । इसलिए निज ऊर्जा के भीतर जाने का रास्‍ता आखिर हम रोकें  क्‍यों? उसे प्रवाहित क्‍यों ना होने दें, क्‍यों ना उसके साथ ही हम भी बहें, अपने अंतस की ओर...।
अत: दुख के साथ बहकर तो देखें, स्‍वयं ईश्‍वर का साथ हर समय अपने होने का आभास देता रहेगा, स्‍व को पहचानने का और स्‍व से मिलने वाले सुख की ओर जाने का ये बेहद सरल उपाय है ।

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 26 अप्रैल 2014

सर्वत्र शक्ति है ॐ की


ओ ओंकार आदि मैं जाना । लिखि औ मेटें ताहि ना माना ।।
ओ ओंकार लिखे जो कोई । सोई लिखि मेटणा न होई ।।

ये चार पंक्‍तियां अपनी कही गई साखियों में र्निगुण सन्त - कवि  महात्मा कबीर ने बोलीं, गाईं और बताया कि उन्‍होंने जिस ईश्‍वरीय सत्‍ता को माना , ध्‍यान किया तथा  उसे  अपने शब्‍दों  के जादू में भी बांधा,वह एकमात्र अक्षर था 'ॐ'  । उन्होंने एकमात्र ॐ को स्वीकारा,उसे ईश्‍वर माना और इस पर "साखियाँ" भी लिखीं ।  सनातन धर्म ही क्‍यों या फिर कबीर ही क्‍यों बल्‍कि भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी ॐ को उतना ही महत्व प्राप्त है । जैसे कि बौद्ध-दर्शन में "मणिपद्मेहुम" का प्रयोग, जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता रहा है जिसके अनुसार ॐ को "मणिपुर" चक्र में अवस्थित माना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है जो कि दसों इंद्रियों को कंट्रोल करता है । जैन दर्शन में भी ॐ के महत्व को दर्शाया गया है ।
गुरु नानक ने भी ॐ के महत्व को बताते हुए अपने अनुयायियों को बताया कि "ओम सतनाम कर्ता पुरुष निभौं निर्वेर अकालमूर्त" अर्थात् ॐ सत्यनाम जपनेवाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं "अकाल-पुरुष के" सदृश हो जाता है ।
"ॐ" ब्रह्माण्ड का नाद है एवं मनुष्य के अन्तर में स्थित ईश्वर का प्रतीक । जो ईश्‍वर है जो अक्षर होते हुये भी अनाक्षर है, जो प्राणवान प्रकृति के हर कण, सांस में मौजूद है इसीलिए  जिसे प्रणव भी कहा गया है , वह एकमात्र  ॐ है ।
अक्षर का अर्थ जिसका कभी क्षरण न हो । ऐसे तीन अक्षरों— अ उ और म से मिलकर बना है ॐ । यह प्रायोगिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि ब्रह्माण्ड में हर समय ॐ की ध्वनि प्रवाहित होती रहती है । हमारी हर सांस से ॐ की ही ध्वनि निकलती है और यही सांस की गति को नियंत्रित करती है ।
सनातन धर्म में तो सृष्‍टि के इस सबसे शक्‍तिशाली आदिअक्षर ॐ के बिना आराधना ही संभव नहीं, प्रकृति के साथ चलने और उसकी ध्‍वनि तक के लिए श्रद्धा प्रगट करने का इससे बड़ा उदाहरण और कहीं नहीं मिलेगा। उपनिषदों में बताया गया है कि किसी भी मंत्र से पहले यदि ॐ जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति-सम्पन्न हो जाता है । किसी देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों के पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है।  ॐ से रहित कोई मंत्र फलदायी नहीं होता , चाहे उसका कितना भी जाप हो । मंत्र के रूप में मात्र ॐ भी पर्याप्त है । माना जाता है कि एक बार ॐ का जाप हज़ार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है ।
अपनी इसी महत्‍ता के कारण ॐ का दूसरा नाम प्रणव ( परमेश्वर ) है । "तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा ॐ एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ॐ अक्षर है इसका क्षरण अथवा विनाश नहीं होता । छान्दोग्य उपनिषद में ऋषियों ने गाया है - "ॐ इत्येतत् अक्षरः" अर्थात् "ॐ अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।"
ॐ के महत्व को श्रीभगवदगीता गीता जी के आठवें अध्याय में बताया है कि जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है । चूंकि ॐ  तीन अक्षरों से बना है अ उ म्  जिसमें "अ" का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना , "उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना अर्थात् किसी जीवन की यात्रा में आदि से अंत तक ॐ की उपस्‍थिति होना । ॐ में प्रयुक्त "अ" तो सृष्टि के जन्म की ओर इंगित करता है, वहीं "उ" उड़ने का अर्थ देता है, जिसका मतलब है "ऊर्जा" सम्पन्न होना । यही कारण है कि जब हम किसी ऊर्जावान मंदिर या तीर्थस्थल जाते हैं तो वहाँ मौजूद अगाध ऊर्जा को ग्रहण करके स्वयं को हर आकांक्षा से मुक्‍त होता हुआ महसूस करते हैं, एकदम किसी परिंदे की भांति ।
उपनिषदों से लेकर कबीर या कबीर से लेकर उपनिषद तक अपनी उपस्‍थिति बताता या इसे यूं  भी कहें कि ॐ मात्र एक अक्षर नहीं बल्‍कि अ,उ,म से बनी जीवन को संचालित करती वह वायु है जो अपनी यात्रा को अनादिकाल से आज तक और आगे भी अनादिकाल तक चलाती रहेगी ।

- अलकनंदा सिंह



मंगलवार, 25 मार्च 2014

प्रत्‍युत्‍तर में बस 'तुम' कहना है

तज़ाकिस्‍तान से तुर्की तक प्रसिद्ध सूफी संत जलालुद्दीन रूमी की एक कहानी बड़ी प्रसिद्ध है -

एक दिन प्रेमी अपनी प्रेयसी के द्वार पहुंच कर द्वार जोर जोर से खटखटाने लगा,बोला- ''दरवाजा खोलो''. बड़ी देर बाद भीतर से आवाज़ आई – "कौन है?" उसने कहा – "यह मैं हूँ!"
द्वार के भीतर से आवाज़ आई – "इस घर में मैं और तुम एक साथ नहीं रह सकते".
द्वार नहीं खुला. प्रेमी बियाबान में ठोकर खाता रहा. वह अपनी सुध-बुध खोकर हर घड़ी इसी प्रार्थना में डूबा रहता कि द्वार किसी तरह खुल जाए. कुछ साल बाद वह लौटा और उसने द्वार को फिर से खटखटाया.
द्वार के पीछे से किसी ने फिर से पूछा – "कौन है?"
प्रेमी ने कहा – "तुम". और बस द्वार खुल गया.

सूफी संतों की एक लंबी कतार में खड़े रूमी ऐसे उपासकों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं जो भारत में भी अपनी छाप अभी तक बनाये रखे हैं । इसका एकमात्र कारण हैं कृष्‍ण और कृष्‍ण का बहुआयामी व्‍यक्‍तित्‍व । संभवत: इसीलिए भारत के सभी सूफी संतों को कृष्‍ण की भक्‍ति रास आई । एकमात्र पूर्ण पुरुष कहलाये गये कृष्‍ण स्‍वयं को भी उपासक ही कहते रहे क्‍योंकि ईश्‍वर को पाने और स्‍वयं ईश्‍वर होने, दोनों ही अवस्‍था में स्‍व को स्‍व से ही दूर करने का नहीं बल्‍कि स्‍व को स्‍व में विलीन करने प्रयोग हुआ । इसीलिए कृष्‍ण हमारे जीवन में रमते हुये दिखाई देते हैं ।

सहजता से जो स्‍वयं को पिघला दे , वह ही संत हो जाता है । सूफी संत कभी साधक नहीं बन पाये ,वे उपासक ही रहे । कृष्‍ण के व्‍यक्‍तित्‍व में भी साधना जैसा कुछ नहीं है क्‍योंकि साधना में जो मौलिक तत्‍व है, वह प्रयास है, effort है, बिना प्रयास के साधना नहीं हो सकती । दूसरा जरूरी तत्‍व है- वह है अहंकार, बिना 'मैं ' के साधना नहीं हो सकती। करेगा कौन? बिना कर्ता के साधना नहीं हो सकती... कैसे होगी...कोई तो करेगा...तभी तो साधना होगी ना...। साधना में 'मैं ' की उपस्‍थिति अनिवार्य हो जाती है। साधना शब्‍द ही बहुत गहरे में अनीश्‍वरवादियों का है जिनके लिए कोई परमात्‍मा नहीं ,बस आत्‍मा ही है जिसे पाने की जद्दोजहद में वे लगे रहते हैं।

इसके ठीक उलट उपासना शब्‍द उनका है जो कहते हैं आत्‍मा नहीं, बस परमात्‍मा है...परमात्‍मा ही है...उसके पास जाना है । उपासना का अर्थ है- पास जाना, बैठ जाना, उप-आसन, निकट होते जाना ...लगातार। इतने निकट कि खुद मिटते जायें जबतक...कोई अर्थ नहीं जब रह जाये...तब तक...। क्‍योंकि हमारा डिस्‍टेंस ही हमारे 'होने' को बताता है और जब तक 'होने' की स्‍थिति मौजूद है , तब तक ईगो है।

यह तो निश्‍चित है कि जितने हम खोते हैं, पिघलते हैं , विगलित होते हैं , बहते हैं, उतने ही हम पास होते हैं । जिसदिन हम बिल्‍कुल नहीं रह जाते ...उस दिन उपासना पूरी हो जाती है। जैसे कि बर्फ से पानी बनता जा रहा हो...। जबकि साधना स्‍वयं बर्फ है जो बढ़ती बढ़ती क्रिस्‍टलाइज्‍़ड तो होती है मगर वह बह नहीं पाती। साधना का अर्थ अंतत: आत्‍मा बन जाना है और उपासना का अर्थ है परमात्‍मा बन जाना। जाहिर जो लोग साधना से जायेंगे ,उनकी मंजि़ल आत्‍मा पर रुक जायेगी। वे आगे की बात नहीं करेंगे, वे कहेंगे कि हमने अपने को पा लिया जबकि उपासक अंतत: अपने को खोने के लिए चला है। कृष्‍ण के लिए साधना का इसीलिए कोई अर्थ नहीं रहा , कोई तत्‍व नहीं ...। साधना से तो कठोर होता जायेगा और कृष्‍ण के जीवन व दर्शन दोनों में कठोरता का क्‍या काम...?अर्थ है तो बस उपासना का...जहां कोई 'रूमी' मौजूद तो रहता है मगर उसका 'मैं ' नहीं रह पाता । ' To be' is the only bondage...होना ही एकमात्र बंधन है और ना होना ही एकमात्र मुक्‍ति ।

रूमी,निजामुद्दीन, मोइनुद्दीन की ये सूफी श्रृंखला के संग कबीर , मीरा, रैदास की भक्‍ति किसी का भी उदाहरण लें, सभी में उपासना ही वो साधन था जिसके लिए बस खुद को मिटाकर सबकुछ मिल जाने की स्‍थिति बनी। संभवत: इसीलिए आज भी सूफियों और भक्‍त कवियों की आमजन से निकटता अधिक रही और इसीलिए कृष्‍ण भी आमजन को ईश्‍वर की बजाय सखा अधिक लगे । उनका ये सखाभाव ही सरलता से ईश्‍वर के करीब होने का मार्ग दिखा भी देता है और 'मैं ' को मिटा भी देता है...कब और कैसे... कृष्‍ण से हम एकात्‍म हो जाते हैं...पता ही नहीं चलता । दरवाजा खोलने के लिए हमें आवाज के प्रत्‍युत्‍तर में बस 'तुम' कहने तक ले जाना है ।

- अलकनंदा सिंह

शनिवार, 22 मार्च 2014

बाजीगरी या जीतने का डर...

जीतने की आपा-धापी है...एक लंबी दौड़ है...पांव ही नहीं मन को थका देने वाली... और दौड़ में हम अपने को खोने की ओर बड़ी तेजी से भाग रहे हैं। जीतने की इच्‍छा से उपजा असंतुष्‍टि का भाव है। जो मौजूद है उसकी खुशी नहीं हो पा रही और जो नहीं मिला उसे लेकर मन को विकृत किये ले रहे हैं।
एक बार लाओत्‍से ने अपने मित्रों से कहा कि आज तक कोई मुझे हरा नहीं सका...इतना सुनते ही जितने भी मित्र वहां मौजूद थे, उन सभी मित्रों ने झड़ी लगा दी प्रश्‍नों की कि बताओ... बताओ वो कौन सी विधि है जिससे तुम्‍हें कोई हरा नहीं सका, हमें भी बताओ तो..ताकि हमें भी जीत हासिल हो सके। लाओत्‍से ने कहा कि तुम सभी ने मेरा पूरा वाक्‍य ही नहीं सुना और जीत का मंत्र हासिल करने को अधीर हो उठे।
लाओत्‍से बोला, ''मैंने कहा, मुझे ज़िंदगी में कोई हरा न सका था क्‍योंकि मैं पहले से ही हारा हुआ था... मुझे जीतना मुश्‍किल था, क्‍योंकि मैं जीतना ही नहीं चाहता था... तुम मेरे राज को नहीं समझ सकते क्‍योंकि तुम जीतने की आकांक्षा करते हो और वही तुम्‍हारी हार बन जायेगी। सफलता पाने की आकांक्षा ही अंत में असफलता का कारण बनती है। बिल्‍कुल ऐसे ही जैसे कि जीवन की अति आकांक्षा ही अंत में मृत्‍यु बनती है, स्‍वस्‍थ होने का पागलपन ही बीमारी बनता है। ज़िंदगी बहुत अद्भुत है, जिस चीज को हम जोर से मांगते हैं उसी को खो देते हैं। ठीक मुठ्ठी में बंधी रेत की भांति। जीतने की इच्‍छा रखना ही हार की ओर पहला कदम है। प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है उसका उसी रूप में अर्थात् प्राकृतिक रूप में ही आनंद लेने की बात होनी चाहिए। ये जीतने की होड़-दौड़ कहीं नहीं रुकती ।
जीत लेने और जीत जाने की बात वही करता है जो कहीं से स्‍वयं को कमतर आंकता है और बार-बार जीत लेने का दावा करता है। जो अपने पास है उसे जीतना क्‍या और जो पास नहीं है उसे कैसे जीता जा सकता है।
मार्शल आर्ट की सभी विधियों में यही सिखाया जाता है कि वार मत करो..वार करने में शक्‍ति जाया होती है। जो पहला वार करेगा वह निश्‍चित ही अपनी आंतरिक व बाह्य शक्‍ति को वार करने में गंवा देगा, जीतने में उसका एक कदम पीछे हो जायेगा। शक्‍ति प्रदर्शन की एक प्रचलित विधि काफी विख्‍यात है- जूडो यानि जुजुत्‍सु, जिसमें शारीरिक शक्‍ति के प्रयोग से पहले मन की दृढ़ता पर काम किया जाता है, प्रतिद्वंदी पर विजय की आकांक्षा नहीं बल्‍कि स्‍वयं को स्‍थिर रहने की शिक्षा दी जाती है, परिणामत: अंत में वही विजयी होता है जो स्‍थिर रह पाता है। निश्‍चित ही शक्‍ति भी उसी के हाथ होगी जो जीतने की इच्‍छा का दमन कर सकेगा और प्राकृतिक व्‍यवहार करेगा ।

गीता में कृष्‍ण अर्जुन से कहते भी हैं कि-

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्रानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ।।38।।

अर्थात्

मैं दमन करने वालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छा वालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्व ज्ञान मैं ही हूँ ।।38।।

कृष्‍ण और लाओत्‍से, दोनों की बात पर गौर करें तो पता लगता है कि जीतता वही है, जो हारने को भी तैयार रहता है। यहां समस्‍या यह है कि कोई हारने को तैयार ही नहीं। शायद इसीलिए कोई जीत नहीं पाता और हर बार जब जीत की आकांक्षा के साथ उतरता है तो मन के किसी कोने में हार पहले से घर कर चुकी होती है। वह न खुद से संतुष्‍ट रहता है, न किसी को संतुष्‍ट कर पाता है।

- अलकनंदा सिंह





बुधवार, 19 मार्च 2014

समय के साथ...समय की ..प्रतीक्षा



जीवन में सब कुछ जैसा हम चाहें या कल्‍पना करें वैसा ही नहीं होता। सभी कुछ हमारे सोचे  हुये समय पर घटित नहीं होता। घटित होने वाले निश्‍चित क्षण होते हैं जिसके लिए प्रतीक्षा  करनी होती है। समय है जिसकी राह देखनी होती है। अवसर है जिसके लिए रुकना पड़ता  है। इसे किन्‍हीं भी आयामों में देखा जाये, नतीजा एक ही आता है कि तमाम स्‍वतंत्रताओं  के बाद आज भी हम समय के आधीन  हैं। हमारे ग्रंथों से लेकर आज तक 'समय' के इस एकमेव आधिपत्‍य से कोई नहीं बच सका,  स्‍वयं राम और कृष्‍ण जैसे हमारे ग्रंथों के महानायक भी नहीं। वे अपने समय से जूझे अवश्‍य परंतु उसकी अवहेलना करके नहीं वरन उसकी प्रतीक्षा को कसौटी बनाकर। प्रतीक्षा करके ही समय के उस निश्‍चित क्षण को पाया भी जा सकता है, उसका आनंद लिया जा सकता है।
समय की प्रतीक्षा का सबसे  सटीक उदाहरण है अहिल्‍या का, जो नाम था शुद्धता का।  ऋषि गौतम जैसे मन के तम को भी शुद्ध कर देने वाले ज्ञानी पति  के हुये भी समय के प्रतिकूलन का शिकार बनी । पति के अविश्‍वास का दंश झेलने और सही समय की प्रतीक्षा में पत्‍थर हो गई । उसका पत्‍थर हो जाना , सारी चेष्‍टाओं का निष्‍क्रिय हो जाना, राम की प्रतीक्षा करना अर्थात् एक निश्‍चित 'समय' की प्रफुल्‍लता के लिए  प्रतीक्षा करते करते पत्‍थर की तरह जड़ हो गई स्‍त्री, सबकुछ गंवाने का भय के साथ मन-तन से अचेतन... जड़ता के प्रभाव से वो पड़ी हुई स्‍त्री पत्‍थर ही तो हो गई होगी।
यूं तो पत्‍थर हो जाना कवि की कल्‍पना है जो चेतनावस्‍था की निष्‍क्रियता दर्शाती है। ऐसा व्‍यक्‍ति जो क्रियाशील नहीं है, वह जड़ हो जाता है वह पत्‍थर हो जाता है मगर वह स्‍त्री है अहिल्‍या...जो राम से  खिल पायेगी,राम के स्‍पर्श से ही खिल पायेगी... वह तो जब तक राम ना मिलें तब तक पत्‍थर  ही रहती है। ऐसा नहीं है कि अहिल्‍या कोई शिला बनकर ही पड़ी थी । वह तो कवि का 'मेटाफर' है बस..समय की प्रतीक्षा और उसका एक्‍ज़िस्‍टेंस दिखाने के लिए ।
अहिल्‍या की कहानी  और कवि की कल्‍पना का निचोड़ सिर्फ इतना है कि जो स्‍त्री राम के स्‍पर्श से जीवित हो सकती  है, चेतना बन सकती है, किसी और का स्‍पर्श तो उसे जड़ ही बना छोड़ेगा ना...फिर चाहे वह पुन: मिले ऋषि गौतम ही क्‍यों ना हों । हरेक की अपनी प्रतीक्षा है ... हरेक की अपनी अवेटिेंग है...। निश्‍चित क्षण आये बिना वह घटित नहीं होती, ना कभी हुई है। प्रतीक्षा में एक उत्‍सुकता का जन्‍म स्‍वाभाविक ही है और यदि उत्‍सुकता है तो प्रतीक्षा समाप्‍ति पर मिलने वाला आनंद भी उच्‍चभाव का ही होगा ना। एक अहिल्‍या ही क्‍यों समय की प्रतीक्षा के उदाहरण तो चारों ओर बिखरे पड़े हैं। कारण कोई भी रहे हों परंतु अपने हिस्‍से के समय की प्रतीक्षा तो सभी को करनी पड़ी।  आज भी सही समय की प्रतीक्षा करना ही हमारे भीतर बैठे धैर्य का परिचय हमसे करवाता है, यही निश्‍चित है ।

- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

गीता जयंती पर विशेष: धर्म संस्‍थापनार्थाय...

कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सग्ङोस्त्वकर्मणि।।
अर्थात्
"तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए  तू कर्मों के फल की इच्‍छा मत कर तथा तेरी कर्म 'न' करने में भी  आसक्ति न हो।।"
इस सहित करीब 700 श्‍लोकों को बोलने में लगभग 4 घंटे का समय  लगता है मगर कृष्‍ण ने अर्जुन को 'साइकिकली कम्‍युनिकेट' करके इसे  महाभारत का अध्‍यात्‍मिक रणवाक्‍य बना दिया जो आज भी अक्षरश:  हमारे जीवन में लागू होता रहता है और जब हम ऐसा नहीं कर पाते तो  अतिक्रमणवादी हो जाते हैं, ये निश्‍चित है। फिर चाहे वह अतिक्रमण  किसी भी स्‍तर पर हो। अतिक्रमण से क्‍लेश और युद्ध का जन्‍म लेना  स्‍वाभाविक है। सो इन विकट होती स्‍थितियों को जनकल्‍याणकारी बनाने  का एक सुनिश्‍चित मार्ग है श्रीमद्भगवद्गीता।
आज के दिन यानि मार्गशीर्ष महीना, शुक्‍लपक्ष की एकादशी (मोक्षदा) को  ऐतिहासिक व पौराणिक दृष्‍टि से महत्‍वपूर्ण श्रीमद्भगवद्‌गीता शब्‍दरूप में  जनकल्‍याण के लिए श्रीकृष्‍ण द्वारा कही गईं। महाभारत की महागाथा में  श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया यह  कर्म-संदेश एक उपनिषद् है जिसमें अलग अलग 11 उपनिषदों का  ज्ञान-मर्म समाया है।
श्रीकृष्‍ण ने जानबूझकर इसकी पृष्ठभूमि युद्धक्षेत्र रखी ताकि सिर्फ अर्जुन  ही नहीं बल्‍कि आज (वर्तमान) तक और आने वाले (भविष्‍य) समय में  भी ये संदेश दिया जा सके कि जीवन की समस्याओं में उलझकर उन  से पलायन करना कायरता है, पुरुषार्थ नहीं। महाभारत के महानायक  अर्जुन की तरह ही हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में हताश  हो जाते हैं और यही हताशा यही अनिश्‍चयकारी व विनाशकारी हो जाती  है। श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को माध्‍यम बनाकर दरअसल पूरी मानवजाति के  लिए संदेश दिया कि स्‍वकर्म करो, सफलता निश्‍चित है।
श्रीकृष्‍ण कहते हैं, ''पार्थ! अपने कर्म को अपने स्वभाव के अनुसार सरल  रूप से करते रहो, अपनी आत्‍मा के लिए करो। निजस्‍वभाव से किया  गया कर्म प्राकृतिक होगा, और जो प्राकृतिक होगा वह अनिष्‍टकारी हो ही  नहीं सकता। अनिष्‍ट वही करेगा जो अप्राकृतिक हो, जो अप्राकृतिक है  उसके अनैतिक होने की संभावना है और अनैतिकता कभी भी  धर्मस्‍थापना या धर्मपालन नहीं करेगी, ये निश्‍चित है। सो हे योद्धा! तू  निजकर्म कर, युद्ध कर, धर्मस्‍थापन के लिए। स्वाभाविक कर्म करते हुए  बुद्धि का अनासक्त होना सरल है अतः इसे ही निश्चयात्मक मार्ग मान।''
समस्‍या से भयभीत होने और पलायन करने का अपुरुषार्थकारी काम
जीवन की श्रेष्‍ठता को अनुपयोगी बना देता है और जो अनुपयोगी है उसी  को कर्मशील बनाने के लिए श्रीकृष्‍ण ने गीता के कर्मप्रधान होने का  प्रेरणादायी संकलन हमें उपलब्‍ध कराया यानि हम जैसे हैं वैसे ही अपनी  मूलप्रकृति के अनुरूप आचरण करें, धर्म का मोलभाव नहीं किया जा  सकता इसलिये उचित कर्तव्‍य करें।
गीता जयंती पर इतना ही कहना है कि अब फिर से समय हमें इस  महाग्रंथ के एक एक श्‍लोक की ओर ले जा रहा है कि अब तो मानवता  व धर्मस्‍थापन के लिए एकजुट हो जाना चाहिए।
- अलकनंदा सिंह