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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

सलाम सोलंकी जी, आप हो इस देश के हीरो


 "आसाराम को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने वाले वकील पी .सी. सोलंकी के इस आत्मकथन को पढ़कर मेरे रोयें खड़े हो गए, समझ आया कि ये देश किसके सहारे चल रहा है। 

सलाम सोलंकी जी, आप हो इस देश के हीरो! 

(और जो हीरो नहीं है उनके नाम जानने हों तो उन नामी गिरामी वकीलों की लिस्ट पढ़ लेना जिन्होंने आसाराम की पैरवी की) 

15 मिनट में जज ने अपना फैसला सुना दिया था. वो 15 मिनट मेरी जिंदगी के सबसे भारी 15 मिनट थे. एक-एक पल जैसे पहाड़ की तरह बीत रहा था. पूरे समय मेरी आंखों के सामने पीड़िता और उसके पिता का चेहरा घूमता रहा.जज जब फैसला सुनाकर उठे तो लोग मुझे बधाइयां देने लगे. मेरा गला रुंध गया था. मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. मैं वकील हूं, मुकदमे लड़ना, कोर्ट में पेश होना मेरा पेशा है. लेकिन जिंदगी में आखिर कितने ऐसे मौके आते हैं, जब आपको लगे कि आपके होने का कोई अर्थ है. उस क्षण मुझे लगा था कि मेरे होने का कुछ अर्थ है. मेरा जीवन सार्थक हो गया.मेरा जन्‍म राजस्‍थान के एक साधारण परिवार में हुआ था. घर में तीन बहनें थीं और आर्थिक तंगी. पिता रेलवे में मैकेनिक थे.मैंने भी बचपन से सिलाई का काम किया है. मां एक दिन में 30-40 शर्ट सिलती थीं. पिता बेहद साधारण थे और मां अनपढ़. लेकिन दोनों की एक ही जिद थी कि बच्‍चों को पढ़ाना है और सिर्फ लड़के को नहीं, लड़कियों को भी. मेरी तीनों बहनों ने आज से 30 साल पहले पोस्‍ट ग्रेजुएशन किया और नौकरी की. मेरी एक बहन नर्स और एक टीचर है.जब मैंने इस पेशे में आने का फैसला किया तो मेरे गुरु ने कहा था कि वकालत बहुत जिम्‍मेदारी का काम है. इस पेशे की छवि समाज में बहुत अच्‍छी नहीं, लेकिन अपनी छवि हम खुद बनाते हैं और अपनी राह खुद चुनते हैं. हमेशा ऐसे काम करना कि सिर उठाकर चल सको और किसी से डरना न पड़े.

जब मैंने आसाराम के खिलाफ पीडि़ता की तरफ से यह मुकदमा लड़ने का फैसला किया तो बहुत धमकियां मिलीं. पैसों का लालच दिया गया. तमाम कोशिशें हुईं कि किसी भी तरह मैं ये मुकदमा छोड़ दूं. लेकिन हर बार मुझे वह दिन याद आता, जब पीड़िता के पिता पहली बार मुझसे मिलने कोर्ट आए थे. साथ में वो लड़की थी. बेहद शांत, सौम्‍य और बुद्धिमान. उसकी आंखें गंभीर थीं और चेहरे पर बहुत दर्द. पिता बेहद निरीह थे, लेकिन इस दृढ़ निश्‍चय से भरे हुए कि उन्‍हें यह लड़ाई लड़नी ही है.मैं यह लड़ाई इसलिए लड़ पाया क्‍योंकि पीड़िता और उसका परिवार एक क्षण के लिए अपने फैसले से डिगा नहीं. लड़की ने बहुत बहादुरी से कोर्ट में खड़े होकर बयान दिया. 94 पन्‍नों में उसका बयान दर्ज है. तकलीफ बहुत थी, लेकिन वो पर्वत की तरह अटल रही. लड़की की मां 19 दिनों तक कोर्ट में खड़ी रही और 80 पन्‍नों में उनका बयान दर्ज हुआ. पिता रोते रहे और बोलते रहे. 56 पन्‍नों में उनका बयान दर्ज हुआ.जब एक बेहद साधारण सा परिवार इतने ताकतवर आदमी के खिलाफ इस तरह अटल खड़ा था तो मैं कैसे हार मान सकता था. 2014 में जिस दिन वकालतनामे पर साइन किया, उस दिन के बाद से यह मुकदमा ही मेरी जिंदगी हो गया.

 साढ़े चार साल ट्रायल चला. इन साढ़े चार सालों में मैं रोज कोर्ट गया. 8 बार सुप्रीम कोर्ट में पेशी हुई. 1000 बार से ज्‍यादा ट्रायल कोर्ट में पेश हुआ.जितना मामूली पीड़िता का परिवार था, उतना ही मामूली वकील था मैं. इस तरफ मैं था और दूसरी तरफ थे देश की राजधानी में बैठे कद्दावर वकील. सबसे पहले आसाराम को जमानत दिलवाने के लिए आए राम जेठमलानी. जमानत याचिका रद्द हो गई. फिर आए केटीएस तुलसी, लेकिन आसाराम को कोई राहत नहीं मिली. फिर आए सुब्रमण्‍यम स्‍वामी. न्‍यायालय में 40 मिनट तक इंतजार किया, लेकिन फैसला हमारे पक्ष में आया. फिर आए राजू रामचंद्रन लेकिन जमानत याचिका फिर खारिज हो गई. सिद्धार्थ लूथरा ने अभियुक्‍त की तरफ से कोर्ट में पैरवी की. इस केस में आसाराम की तरफ से देश का तकरीबन हर बड़ा वकील पेश हुआ. पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने आसाराम की पैरवी की. सुप्रीम कोर्ट के जज यूयू ललित आए. सलमान खुर्शीद, सोली सोराबजी, विकास सिंह, एसके जैन, सबने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. तीन बार सुप्रीम कोर्ट से आसाराम की जमानत याचिका खारिज हुई. कुल छह बार अभियुक्‍त ने जमानत की कोशिश की और हर बार फैसला हमारे पक्ष में आया.

लोग कहते हैं, तुम्‍हें डर नहीं लगता. मैं कहता हूं, मेरी 80 साल की मां और 85 साल के पिता को भी डर नहीं लगता. जब आप सच के साथ होते हैं तो मन, शरीर सब एक रहस्‍यमय ऊर्जा से भर जाता है. सत्‍य में बड़ा बल है. आत्‍मा की शक्ति से बड़ी कोई शक्ति नहीं. उनके पास धन, वैभव, सियासत का बल था, मैं अपनी आत्‍मा के बल पर खड़ा रहा. मेरा परिवार मेरे साथ था. मेरी मां पढ़ी-लिखी नहीं हैं. वे बस इतना समझती हैं कि एक आदमी ने गलत किया. बच्‍ची को न्‍याय मिले. मुझे सच की लड़ाई लड़ता देख मेरे पिता की बूढ़ी आंखों में गर्व की चमक दिखाई देती है. वे मुझसे भी ज्‍यादा निडर हैं. 85 साल की उम्र में भी बिलकुल स्‍वस्‍थ. तीन मंजिला मकान की अकेले सफाई करते हैं. पत्‍नी खुश है कि मैं एक लड़की के हक के लिए लड़ा.

(यह लेख पी.सी. सोलंकी के साथ बातचीत पर आधारित है.)


25 हजार करोड़ की संपत्ति के मालिक आसाराम जितना खरीद सकते थे खरीद रहे थे। 

उन दिनों सारा हिंदुत्व इसे अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत सनातन संस्कृति पर हमला बता रहा था। पीड़िता और पीड़िता के पिता के पहले मददगार बने, एसीपी लांबा और दूसरे वकील पीसी सोलंकी।

आसाराम के गुर्गो बनाम भक्तों द्वारा अनेक गवाहों पर जानलेवा हमले करते हुए उन्हें मौत के घाट उतार देने के बावजूद पीसी सोलंकी हिमालय की तरह अटल रहे।

इन्हें हृदय से नमन

साभार: 

#kahaniwala #कहानीवाला #महाकुंभ2025 #प्रयागराज

शनिवार, 22 जनवरी 2022

पुरुषों के लिए भी कानून बनाने का समय


 कानून के बारे में एक कहावत है कि “Any law loses its teeth and bites on repeated misuse.” अर्थात् “कोई भी कानून बार-बार दुरुपयोग करने पर अपने दांत खो देता है और काटने लगता है।” यूं तो किसी कानून का दुरुपयोग हमारे यहां कोई नई बात नहीं है परंतु अब यह अविश्‍वास से उपजे रिश्‍तों के लिए एक ऐसी आड़ बन गया है जिसका दुष्‍प्रभाव पूरे समाज को झेलना होगा।

इसकी नज़ीर के तौर पर गुरुग्राम का आयुषी भाटिया केस हो या मद्रास हाईकोर्ट और पुणे की सेशन कोर्ट के ‘दो फैसले’ जो हमें अपनी सामाजिक व्‍यवस्‍थाओं और घरों में दिए जाने वाले संस्कारों को फिर से खंगालने को बाध्‍य कर रहे हैं कि आखिर सभ्‍यता के ये कौन से मानदंड हैं जिन्‍हें हम सशक्‍तीकरण और स्‍वतंत्रता के खांचों में फिट करके स्‍वयं को आधुनिक साबित करने में जुटे हुए हैं।

सिर्फ एक महीने के अंदर जो मामले सामने आए उनमें –

पहला मामला
पुणे स्‍थित एमएनसी में लाखों के पैकेज पर कार्यरत एक नवविवाहिता ने कोर्ट में तलाक की अर्जी देते हुए, स्‍वयं से आधा वेतन पाने वाले सीआरपीएफ में कार्यरत पति से भारी भरकम ‘भरण-पोषण’ की मांग की, वह भी सिर्फ इसलिए कि उसे वह हनीमून (कोरोना काल में) पर नहीं ले गया।

दूसरा मामला
चेन्‍नई की एक महिला द्वारा अपने पति को परेशान करने के लिए फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक की मंजूरी के बावजूद घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई गई ताकि उसको नौकरी से निलंबित किया जा सके। इसपर फैसला देने वाले मद्रास हाई कोर्ट के जस्‍टिस एस. वैद्यनाथन ने खेद जताते हुए कहा कि दुर्भाग्‍यवश पति के पास पत्नी के खिलाफ केस दर्ज कराने के लिए #घरेलूहिंसाअधिनियम 2005 जैसा कोई कानून नहीं है और हम विवश हैं निष्‍पक्ष न्‍याय ”न” दे पाने के लिए।

तीसरा मामला
हरियाणा के गुरुग्राम पुलिस ने 4-5 जनवरी को 20 वर्षीय युवती आयुषी भाटिया को रेप का आरोप लगाकर जबरन वसूली करने के आरोप में गिरफ्तार किया, जिस मामले में आयुषी भाटिया को पकड़ा गया, वह उसका आठवां शिकार था।

विगत 15 महीनों के दौरान आरोपी महिला ने गुड़गांव के 7 पुलिस स्टेशनों (राजेंद्र पार्क, सदर, साइबर, सेक्टर 5, न्यू कॉलोनी, सेक्टर 10 और सिटी) पर 8 अलग-अलग लड़कों के खिलाफ रेप के मामले दर्ज कराए, वह ये काम बेहिचक करती थी और अब तक वह 7 लड़कों की जिंदगी बर्बाद कर चुकी है। हालांकि आठवें लड़के के ‘शिकार’ होने से पूर्व ही आयुषी का भंडाफोड़ हो गया और अब वह जेल में है। आठ में से तीन की क्लोजर रिपोर्ट में पाया गया है कि महिला की मां और उसका एक चाचा भी इस कथित जबरन वसूली सिंडिकेट का हिस्सा थे, फिलहाल वे फरार हैं।

इसी दिसंबर-जनवरी के दौरान घटित घटनाओं पर एक नज़र-

1. भोपाल फैमिली कोर्ट की काउंसलर सरिता रजनी ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि भोपाल की एक कामकाजी महिला ने कैंसर पीड़ित पति से की भरण-पोषण की मांग करते हुए निर्दयता पूर्वक कहा कि ‘भले ही अपनी किडनी बेचो लेकिन मुझे पैसे दो’, इस घटना के बाद से वह व्‍यक्‍ति खुद पत्नी के इस व्यवहार से सदमे में हैं।
2. गुरुग्राम कोर्ट ने ऐसे ही एक झूठे केस में नाबालिग लड़के को फंसाने वाली बालिग महिला के खिलाफ निर्णय सुनाया कि ‘इच्छा’ पूरी नहीं होने पर महिला ने लिया रेप कानूनों का फायदा लिया।
3. अलवर के मांढण थाना इलाके के स्कूल गैंगरेप केस में हाल ही में एक खुलासा हुआ है कि पूर्व कर्मचारी के कहने पर नाबालिग छात्राओं ने शिक्षकों पर जो आरोप लगाया वह इन शिक्षकों की गिरफ्तारी के बाद झूठा निकला।

ये तो चंद उदाहरण हैं वरना खोजने बैठें तो कई पन्‍ने भर जाऐंगे, इन सभी मामलों में महिलाओं द्वारा पुरुषों के खिलाफ ”कानून का बेजां इस्‍तेमाल” किया गया। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि पुरुष भी तो सदियों से ऐसा करते रहे हैं, उन्‍होंने तो बांझ, डायन व चरित्रहीन कहकर महिलाओं पर लगातार अत्‍याचार किए और तमाम मामलों में आज भी कर ही रहे हैं। संभवत: इसीलिए आज यह स्‍थिति आई कि उनके लिए आज कोई खड़े होने को तैयार नहीं और ना ही कोई कानून बन सका है।

मगर हमें ये समझना होगा कि अत्‍याचार का बदला अत्‍याचार से नहीं लिया जा सकता। महिला के ऐसा करने पर इतनी हाय-तौबा इसीलिए है क्‍योंकि एक ”मां” के किसी भी तरह डगमगाने पर पूरा परिवार, सारे रिश्‍ते नाते तहसनहस हो जाते हैं और ऐसा होते ही सामाजिक तानाबाना चरमराने लगता है इसलिए महिलाओं द्वारा पैदा किया जा रहा ये अविश्‍वास स्‍वयं उन्‍हीं के लिए अहितकर है क्‍योंकि इस ‘अविश्‍वास’ के लिए न्‍यायालय भी कैसे न्‍याय देंगे और कितने कानून बनेंगे।

हमें यह समझना चाहिए कि विवाह कोई अनुबंध नहीं बल्कि एक संस्कार है। बेशक लिव-इन-रिलेशनशिप को मंजूरी देने वाले घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के प्रभाव में आने के बाद ‘संस्कार’ शब्द का कोई अर्थ नहीं रह गया है परंतु फिर भी हम वर्तमान ही नहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कम से कम बदतर उदाहरण तो ना ही बनें। तलाक के मामलों के अलावा झूठे रेप केस में पुरुषों को फंसाने वाली महिलाएं, उन वास्‍तविक रेप पीड़िताओं की राह में कांटे बो रही हैं जो वास्‍तव में इस अपराध को झेलती हैं।

बहरहाल हमें अपनी आंखें खुली रखनी होंगी ताकि न्‍याय-अन्‍याय में सही अंतर कर सकें और वास्‍तविक अपराधी को सजा तक पहुंचा सकें फिर चाहे वह कोई भी हो।

- अलकनंदा सिंंह

रविवार, 9 दिसंबर 2018

कुटिल व्‍यक्‍ति का धर्मोपदेश ही हैं विचाराधीन कैदियों पर कोर्ट की चिंता

दो दिन पहले जागरण फोरम में देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था से जुडी ''महान-विभूतियों'' ने न्‍याय व्‍यवस्‍था की पेचीदगियों और देरी से न्‍याय होने पर बात तो की परंतु ये बिल्‍कुल ऐसा ही लगा जैसे कोई साहूकार कह रहा हो कि वह ब्‍याज नहीं लेगा। इन विभूतियों में पूर्व मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्‍टिस दीपक मिश्रा थे तो रिटायर्ड जस्‍टिस ज्ञानसुधा मिश्रा व पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी भी थे।

सच तो यह है कि कोलेजियम की बात पर सरकार को नाकों चने चबवाने वाले और मात्र रोस्‍टर पर अपनी साख को सरेआम उछालने वाले इन ''माननीयों'' के मुंह से अब ये बातें शोभा नहीं देतीं। उनके मुंह से न्‍याय व्‍यवस्था में सुधार, अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता या तीन तलाक व सबरीमाला पर निर्णयों को लेकर कही गई बातें ऐसी लगती हैं जैसे कोई कुटिल व्‍यक्‍ति धर्मोपदेश दे रहा हो।

हम सब भ्रष्‍टाचार और असमानता आदि के लिए यूं ही राजनेताओं को गरियाते रहते हैं जबकि  कौन नहीं जानता कि लाखों में तनख्वाह पाने और आलीशान सुविधाभोगी न्‍यायाधीशों को न तो करोडों मुकद्दमों के बोझ से लदी अदालतों की फिक्र है और ना ही उन बेचारों की जो इनकी कुटिलताओं का खामियाज़ा विचाराधीन कैदियों के रूप में भुगत रहे हैं। 

इसी हफ्ते खुद सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों की भारी-भरकम संख्या को लेकर चिंता जताई। इनके मामलों का जल्द निपटारा करने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा। जेलों की अमानवीय स्थितियों के लिए क्षमता से अधिक विचाराधीन कैदियों का होना बताया किंतु यह नहीं बताया कि ऐसा होगा किस तरह। किसी ठोस योजना के बिना क्‍या सुप्रीम कोर्ट अपनी मंशा को पूरा करा पाएगा। 

एक आंकड़े के अनुसार जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्‍या कुल कैदियों का करीब 67 प्रतिशत है। तो अब कौन यह बताएगा कि हुजूर आप ही तो हैं इस कुव्‍यवस्‍था को जन्‍म देने और इसे आगे बढ़ाने वाले। कौन बताए सुप्रीम कोर्ट को कि विचाराधीन कैदियों का ये अपार प्रतिशत आपकी इस ''न्याय प्रक्रिया'' से ही उपजा है।

निश्‍चित ही अब ऐसे विचाराधीन कैदियों को रिहा करने के बारे में कोई ठोस फैसला लिया जाना चाहिए जो छोटे-छोटे अपराधों के लिए सालों से सलाखों के पीछे हैं। जो जमानत राशि नहीं  चुका पाने अथवा जमानती का इंतजाम न कर पाने के कारण संभावित सजा की अवधि से भी अधिक समय अंदर गुजार चुके हैं। एक गणना के अनुसार उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ एवं उत्तराखंड में विचाराधीन कैदियों की संख्या सर्वाधिक है। तो सवाल किस पर उठना चाहिए ?

किसी आतंकी की फांसी पर रोक के लिए एक रात में केस निपटाने वाले इन्‍हीं माननीय न्‍यायाधीशों ने इस बारे में समीक्षा समितियों को अगले छह महीने तक सिर्फ मासिक बैठक कर राहत के उपाय खोजने को कहा है।

क्‍या अब समय नहीं आ गया कि अब उच्‍चतम न्‍यायालय, उच्‍च न्‍यायालयों या जिला अदालतों से भी सवाल किये जाएं और मुकद्दमों के निपटारे की समयसीमा तय की जाये। चूंकि अब सोशल मीडिया पर हर घटना-अपराध का क्षीर-नीर देर सबेर सामने आ ही जाता है और दोषी कौन, सुबूत किसके पक्ष में हैं या किसके खिलाफ साजिश हुई, यह तक चर्चा का विषय बनता है लिहाजा न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगना स्‍वाभाविक है।

रही बात अवमानना के डंडे की तो उसका भी डर अब लोगों के मन से निकलता जा रहा है। इसके ज्‍वलंत उदाहरण हैं सबरीमाला मंदिर पर दिया गया निर्णय और अयोध्‍या के मंदिर-मस्‍जिद मामले पर की गई गैरजरूरी टिप्‍पणी।

न्‍यायपालिका को अब समझना होगा कि धन और रसूख के बल पर तारीखों में अटकाने वाली कुव्‍यवस्‍था को दूर करने के लिए स्‍वयं उसे अपने लिए मानदंड स्‍थापित करने होंगे क्‍योंकि समय की कसौटी पर अब तो स्‍वयं न्‍यायाधीश और पूरी की पूरी न्‍यायप्रक्रिया भी है। न्‍यायप्रक्रिया को साबित करना है कि वह किस तरह निष्‍पक्ष रहकर समय रहते उचित फैसला सुना सकती है।

राजा और रंक के लिए कानून की अलग-अलग परिभाषाएं अब ज्‍यादा दिनों तक नहीं चल पाएंगी। विचाराधीन कैदियों पर ठोस उपाय के लिए समीक्षा समितियों को 6 महीने का समय देना बताता है कि न्‍यायव्‍यवस्था कितनी संवेदनशील है। यदि यही संवेदनशीलता है तो विधायिका और न्‍यायपालिका में फर्क कहां रह जाता है।

कुल मिलकर देखा जाए तो न्‍यायपालिका पर अब दोहरी जिम्‍मेदारी है। एक ओर उसे जहां विधायिका के दिन-प्रतिदिन गिरते स्‍तर को संभालना है वहीं दूसरी ओर आम आदमी में न्‍यायिक प्रक्रिया का भरोसा कायम रखना है, क्‍योंकि यदि देश के आम इंसान को यह आखिरी उम्‍मीद भी टूटती नजर आई तो तय जानिए कि लोकतंत्र के खतरे में पड़ने का जुमला सार्थक सिद्ध होने में ज्‍यादा समय नहीं लगेगा।

इस व्‍यवस्‍था पर न्‍यायाधीशों के चिंतन को कवि संजय पटवा जी के शब्‍दों में कुछ यूं कहा जा सकता है...

बंद कर दिया सांपों को सपेरे ने यह कहकर,
अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आ रहा है।

-सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी