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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

काश ! हर दिल मुनव्वर हो जाए तो कोई बात बने …

साहित्य अकादमी पुरस्कार को ठुकराने वाले लेखकों के पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तरीके से लोग व्याख्या कर रहे हैं और पुरस्कार को ठुकराने के पीछे छुपी उनकी अपनी स्ट्रैटिजिक महात्वाकांक्षाओं- आकांक्षाओं का ब्यौरा दर ब्यौरा सामने रख रहे हैं।
इस सबके पीछे गत दिनों दादरी में घटी गौमांस खाने पर हत्या किये जाने की घटना को आधार बनाया गया है। राजनैतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक जगत के ये वरिष्ठ लोग आहत हैं या आहत होने का दिखावा कर रहे हैं, यह धीमे धीमे सबके सामने आता जा रहा है।
ऐसे में कोई यदि ये कहे कि ”जिस उत्तर प्रदेश में ये घटना घटी, उस प्रदेश में नेता नहीं दलाल रहते हैं, उस प्रदेश के धर्मगुरू गाय के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं, उत्तर प्रदेश में मसला गाय का नहीं 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव का है,” तो आप क्या कहेंगे?
यही ना कि ये फरिश्ता कहां से आ टपका जो इस सोचविहीन समाज में ऐसी बातें कर रहा है। हो सकता है कि आप ये भी कहें कि इस व्यक्ति को या तो कोई खौफ नहीं है या इसे लालच नहीं है उस जमात में बैठने का जो साहित्य जगत को भी राजनीति का अखाड़ा बनाने पर आमादा रहती है।
जी हां! ये हैं मशहूर शायर मुनव्वर राणा, जिन्होंने सहारनपुर के मुशायरे में भाग लेने से पहले मीडिया के सामने अपने जज़्बात साझा करते हुए यह सब कहा। मुनव्वर राणा व अनवर जलालपुरी सहारनपुर के मेला ”गुघाल” के अवसर पर आयोजित होने वाले मुशायरे में शामिल होने पहुंचे थे।
मुनव्वर राणा साहब की लाजवाब शख्स‍ियत के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं है। और कल तो उन्होंने सरेमीडिया उक्त बात कहकर न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति की ज़मींदोज़ हो चुकी साख को लानत मलानत भेजी बल्कि उस साहित्यिक जमात के विचारों को भी ललकारा जो आजकल देश की सेक्यूलर छवि को लेकर बड़े चिंतित हैं। ये वही साहित्यिक जमात है जो आयातित सेक्यूलरिज्म के नाम पर अनर्गल लिखने और बोलने को सच्ची साहित्यिक साधना कहती है, बिना ये सोचे कि हमारे देश का समाजवाद दुनिया के किसी और देश में नहीं, उन देशों में भी नहीं जहां के समाजवाद को ये के साहित्यिक वरिष्ठजन इसे ढो रहे हैं। ये वही जमात है जो कला या साहित्य साधना के नाम पर चरित्रों के कोने- कोने को भ्रष्ट करती है। ये वही जमात  है जिसके लिए शराब और बीफ  साहित्यिक गोष्ठियों का मेन मेन्यू होता है। ये कैसा समाजवाद है इनका, मुनव्वर साहब ने इन साहिबानों के समाजवाद पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि गाय को जो बेचे या मारे, वह सबसे बड़ा गुनहगार है। बीफ मुद्दे पर दो पक्षों द्वारा की जा रही राजनीति म‍हज 2017 के चुनावों तक है। जब दादरी का पीड़‍ित परिवार राज्य और केंद्र सरकारों के प्रयास व स्वयं अपने गांव वालों की दिलेरी से मुतमईन है तो फिर आजम खान जैसे नेता या कोई आदित्यनाथ जैसे धर्मगुरू द्वारा इस प्रकरण में बयानबाजी के आखिर क्या मायने हैं।
प्रदेश के मुख्यमंत्री अख‍िलेश यादव और नगर विकास मंत्री आजम खान द्वारा उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की ओर से प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को सम्मानित किए जाने के सवाल पर मुनव्वर राणा ने कहा कि जो उर्दू की आत्मा को नहीं जान सके वे ही पुरस्कार समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं। आख‍िर ये कैसा मजाक है उर्दू के साथ।
अनवर जलालपुरी के संग प्रेस वार्ता कर रहे मुनव्वर राणा साहब ने उर्दू अकादमी के चेयरमैन बनाने की प्रक्रिया और नीयत दोनों पर सवाल उठाए कि नाकाबिल लोग अगर राजनैतिक रसूख के बल पर चेयरमैन बनेंगे तो अकादमी और उर्दू जबान दोनों का गर्त में जाना निश्चित है। उनका ये कहना कि कोई शायर है और मुसलमान है सिर्फ इसी के बूते उर्दू अकादमी का चेयरमैन नहीं बनाया जा सकता। उसमें नेताओं की चौखट चूमने से ज्यादा भाषा के सम्मान का गुण होना चाहिए।
उर्दू अकादमी का चेयरमैन बनाने के पीछे मुसलमान होना कोई वजह नहीं होनी चाहिए इसी तरह उर्दू की बेहतरी के लिए उर्दू अकादमी की जरूरत नहीं, अकादमी बना देने से उर्दू का भला होने वाला नहीं है क्योंकि अकादमी को लेकर प्रदेश सरकार की मंशा अच्छी नहीं है। सरकार और सरकार के मंत्रीगणों ने उर्दू अकादमी को अय्याशी का अड्डा बना रखा है।
मुनव्वर राणा का ये कहना कि जिस दिन प्रदेश के मुसलमान सपा सरकार में शामिल मुस्लिम नेताओं के पीछे चलना छोड़ देंगे तथा लाल बत्ती वालों का गिरेबां पकड़ लेंगे, उसी दिन प्रदेश के मुस्लिमों के हालत सुधर जाएंगे।
ये वो झकझोरते सवाल हैं जो मुनव्वर राणा साहब ने उर्दू के भविष्य, साहित्य की छीछीलेदर करती समाजवादी जमात और गाय को लेकर हो रही राजनीति पर दागे व स्वयं मुसलमानों की भटकी हुई दिशा व दशा पर उठाए।
निश्चित ही भूखों मरती गायों की ओर कभी मुड़कर न देखने वाले, गौशालाओं के नाम पर देश-विदेश से भारी दान इकठ्ठा करने वाले धर्मगुरूओं की आज अचानक गाय और बीफ मुद्दे पर उमड़ी करुणा और दया हो या आजम खान के उर्दू और मुसलमानों के लिए बहते आंसू, इनको आइना दिखाने वाले मुनव्वर राणा व अनवर जलालपुरी इंसानियत की जिस सूरत की बात करते हैं उसके लिए बार- बार तहेदिल से यही निकलता है कि काश ! हर दिल मुनव्वर हो जाए तो कोई बात बने …
मुनव्वर साहब के ही शब्दों में —-
यहाँ वीरानियों की एक मुद्दत से हुकूमत है
यहाँ से नफ़रतें गुज़री है बरबादी बताती है
लहू कैसे बहाया जाय यह लीडर बताते हैं
लहू का ज़ायक़ा कैसा है यह खादी बताती है
ग़ुलामी ने अभी तक मुल्‍क का पीछा नहीं छोड़ा
हमें फिर क़ैद होना है ये आज़ादी बताती है….
– अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 23 मई 2014

'सार्वभौम' है 'गीता': अनवर जलालपुरी

लखनऊ।  अनवर जलालपुरी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। देश-विदेश में सैकड़ों मुशायरों एवं कवि सम्मेलनों के सफलतापूर्वक संचालन का श्रेय उनको जाता है। वे एक श्रेष्ठ शायर भी हैं। अनवर जलालपुरी ने सिर्फ उर्दू में ही नहीं लिखा वरन्‌ उन्होंने 'गीता' का अनुवाद बड़े सुन्दर उर्दू शायरी में कर आजकल वे चर्चा में हैं।
जाने-माने शायर अनवर जलालपुरी की पुस्तक उर्दू शायरी में गीता का लोकार्पण संत मुरारी बापू आगामी 23 मई को गोमती नगर, लखनऊ स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के मरकारी ऑडिटोरियम में करेंगे।
संस्कृति विभाग उप्र एवं हेल्प यू एजुकेशनल एवं चैरिटेबल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में होने वाले इस कार्यक्रम का नाम रुहानी संगम दिया गया है। संत मुरारी बापू के अलावा कार्यक्रम की अध्यक्षता महापौर डॉ. दिनेश शर्मा करेंगे तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव।
अनवर जलालपुरी को पूरा विश्वास है कि हिन्दू और मुसलमानों के बीच पनपी दूरियां संवाद से ही घटेंगीं। उन्होंने कहा कि आज धार्मिक और राजनीतिक नेता साम्प्रदायिक एकता बनाने में असफल साबित हुए हैं। उनका विश्वास है कि अब बस अध्यात्म का ही रास्ता, सूफी का ही रास्ता बचा है जिस राह पर चलकर नफरत से दूर इंसानियत को एकता की राह पर चलाया जा सकता है।
अनवर जलालपुरी का मानना यह सर्वविदित है कि गीता हाथ में रखकर न्यायालय में सच बोलने की शपथ ली जाती है लेकिन गीता सिर्फ धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं है, इसमें समस्त वेदों का सार, जीवन जगत, जन्म-मरण, व्यक्ति और सृष्टि के सम्बन्ध में अनेक सूत्र हैं जो सर्वभौम हैं। यह एक दार्शनिक ग्रन्थ है। इसे कोई भी धर्म वाला पढ़ सकता है और समझ सकता है।
अनवर जलालपुरी का कहना है कि फल की चिन्ता न करते हुए निरंतर कर्मशील रहना यही गीता का मूल उद्देश्य है। उन्होंने बताया कि गीता के अनुवाद में उन्हें एक-एक श्लोक का अनुवाद करने के लिए छः-छः पंक्तियां लिखनी पड़ी हैं। उनका दावा है कि अनुवाद इतना बोधगम्य, सहज और सरल है कि जो होंठों पर तुरंत बैठ जाता है।
प्रसिद्ध गीतकार डॉ. गोपाल दास नीरज का कहना है कि मैंने गीता के हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं के भी कई अनुवाद पढ़े हैं लेकिन जैसा अनुवाद अनवर जलालपुरी ने किया है वैसा मुझे अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिला। नीरज कहते हैं कि सबसे बड़ी सार्थकता गीता की यही होगी कि वो किताब में ही न होकर लोगों की जुबान पर भी हो, जिसे वो गाएंगे भी, गुनगुनाएंगे भी।
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह का मानना है कि अनवर जलालपुरी को उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी पर समान अधिकार है, उन्हें श्रेष्ठ वक्ताओं की प्रथम पंक्ति में रखा जा सकता है। अनवर जलालपुरी द्वारा गीता का भावानुवाद उर्दू शेरों में करने पर उदय प्रताप सिंह ने आश्चर्य जताया और कहा कि आश्चर्य इसलिए कि गीता सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का बेहतरीन दस्तावेज है। भारत की भावनात्मक एकता, विश्व बंधुत्व और एक ईश्वरवाद की प्रेरणा गीता से मिलती है।
गीता को समझना और उसका भावानुवाद आसान जबान में शेरो-शायरी के माध्यम से करना बहुत मुश्किल काम है। उर्दू के सरल प्रचलित शब्दों में चयन और फिर गीता की गहराई तक पहुंचने में उनका प्रयोग जिस प्रकार अनवर साहब ने किया वह उनकी प्रतिभा का प्रतीक है। गीता का दार्शनिक पक्ष जन सुलभ शैली में जनसाधारण को उपलब्ध कराना काम कठिन जरूर है, पवित्र भी है और आवश्यक भी।
लखनऊ विश्वविद्यालय राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर रमेश दीक्षित का कहना है कि उर्दू को मुसलमानों की जुबान बताकर साजिशन उसकी अहमियत को कमतर ठहराने की तमाम कोशिशों के बावजूद इस देश की गंगा-जमुनी सांझी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम लगातार जारी है। उन्होंने कहा कि अनवर साहब का यह तजुर्मा उर्दू जुबान को देवनागरी लिपि में पढ़ने वालों को हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण दार्शनिक दृष्टिकोण से रुबरु होने का मौका उपलब्ध कराता है।
अनवर जलालपुरी ने उर्दू शायरी में गीता नामक पुस्तक में गीता के 701 श्लोक, 18 अध्याय कुल अशआर 1761 का अनुवाद उर्दू में शायरी के माध्यम से किया है। अनवर जलालपुरी ने बताया कि उन्हें बचपन से ही भगवद् गीता की बातों से गहरा लगाव था। 5 वर्ष पहले मुझे गीता के अनुवाद की धुन सवार हो गई और जो अब उर्दू शायरी में गीता के रूप में आपके हाथों में है।
अनवर जलालपुरी ने कहा कि उनका उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा और संदेश को उन उर्दू वालों तक और उन मुसलमानों तक पहुचाऊं जो गीता को एक धार्मिक ग्रन्थ तो मानते हैं किन्तु उसमें क्या कुछ लिखा है, उससे बिल्‍कुल अंजान हैं। गीता के पैगाम दुनिया को खूबसूरत और नेक बनाते हुए आत्मा से परमात्‍मा में मिल जाने की बात करते हैं। यह किताब फल की इच्छा के बिना कर्म पर अमल करने की शिक्षा देती है। उन्होंने बताया कि गीता को शायराना शक्ल देने के लिए जिन किताबों की रोशनी हासिल की है, उसका भी जिक्र जरूरी है।
श्री रजनीश यानि ओशो की गीता दर्शन, पंडित सुंदरलाल की गीता और कुरआन, अजमल खां की श्रीमद् भगवद् गीता, महात्मा गांधी की गीता बोध, मनमोहन लाल छाबड़ा की मन की गीता, डॉ. अजय मालवीय की गीता, स्वामी रामसुखदास की गीता प्रबोधनी, प्रकाश नगाइच की श्रीमद् गीता, हसनुद्दीन अहमद की गीता, ख्वाजा दिल मोहम्मद लाहौरी की दिल की गीता प्रमुख है।
अनवर जलालपुरी ने बताया कि उन्होंने कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित गीतांजलि एवं उमर खैय्याम की रुबाइयों-रुबाइयात-ए-खैय्याम उर्दू शायरी में अनुवाद कर लिया है जो कि शीघ्र ही पाठकों के हाथों में होगा।
-साभार: अरविन्द शुक्ला