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गुरुवार, 5 जून 2014

वन्‍स अपऑन ए उत्‍तरप्रदेश

कभी जिसे उत्तर प्रदेश नहीं बल्‍कि उत्‍तम प्रदेश कह कर राजनीतिक पार्टियां वोट बटोर बटोर कर शासन चलाया करती थीं, अलग अलग वर्गों,जातियों और संप्रदायों के बल पर अपनी-अपनी पीठ थपथपाया करती थीं। वे बरबाद होती कानून व्‍यवस्‍था के बावजूद अपने मुंह मियां मिठ्ठू  बनने  के लिए  कोई ना कोई वजह ढूंढ़ लिया करती थीं, आज उसी उत्‍तरप्रदेश (कहीं से भी उत्‍तम नहीं)  की औरतें अपने इन्‍हीं राजनैतिक रहनुमाओं की करतूतों के आफ्टर इफेक्‍ट्स झेलने को विवश हैं।
हाल ही में समाजवादी पार्टी के मुखिया से लेकर उनके तमाम अन्‍य पदाधिकारी बदायूं में हुई बलात्‍कार व हत्‍या के मामले में कानून व्‍यवस्‍था की धज्‍जियों के उड़ने से इतने परेशां नहीं हैं जितने कि लोगों और मीडिया के सवालों से। वे अपना मुंह को छिपाने को ऐसी बचकाना और बेवकूफी भरी हरकतें कर रहे हैं, ऐसे हास्‍यास्‍पद बयान दे रहे हैं कि हर उत्‍तरप्रदेशवासी हतप्रभ  हैं, ऐसों को चुनकर सत्‍ता सौंपने के लिए । आमजन अब तो इन्‍हें गरिया भी नहीं पा रहे, बल्‍कि इनके संभावित हश्र पर, इनकी बयानबाजियों पर तरस खा रहे हैं, उन्‍हें घिन आ रही है इनकी सोच पर।
ज़रा विचार कीजिए...कि किस तरह ये ऐसे हास्‍यास्‍पद बयान देकर घर में अपने ही घर की औरतों-बच्‍चियों से आंखें मिला पाते होंगे ये तथाकथित माननीय। लोकसभा चुनावों के दौरान समाजवादी मुखिया द्वारा चुनाव के अति उत्‍साह में बोले गये वो बोल ''लड़के हैं, लड़कों से तो गलती हो जाती है। ऐसी गलती पर फांसी चढ़ाना उचित नहीं है'', आज भी जनता के जहन से जा नहीं पा रहे।  यही बोल तो सपा की न केवल लोकसभा में हार का एक कारण बने बल्‍कि मौजूदा कानून व्‍यवस्‍थागत छीछालेदर के लिए भी जिम्‍मेदार माने जा रहे हैं। सपाइयों की सोच यहीं तक रहती तो गनीमत थी, अब तो मुलायम सिंह व अखिलेश और रामगोपाल यादव तो ऐलानिया तौर पर कह रहे हैं कि इन हालातों से हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला..., मीडिया को  सिर्फ उत्‍तरप्रदेश में ही रेप दिखते हैं... और हमें मालूम है क्‍या करना है...आप हमें मत सिखाइये...। आप अपना काम कीजिए।
बयानों की इन्‍हीं बेहूदा बानगियों के बीच एक हफ्ता होने जा रहा है, फिर भी प्रदेश में वीभत्‍सता और क्रूरता का आलम थम नहीं रहा है। बदायूं -बरेली-मुज़फ्फरनगर-सीतापुर-देवरिया-मथुरा-फिरोजाबाद...की श्रृंखला कहां जाकर थमेगी, कहा नहीं जा सकता। मगर इतना अवश्‍य है कि सपा ने जो ताबूत अपने लिए तैयार कर लिया है, अब उसमें खुद वही कील ठोक रहे हैं, गिनती चल रही है कीलों की। देखते जाइये... अगर अब भी यह नहीं सुधरे तो आखिरी कील भी ये खुद अपने हाथों ठोकेंगे।
बदायूं  घटना की तो अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भी निंदा की  जा रही है।  देश व प्रदेश के लिए इससे ज्‍यादा अपमानजनक और क्‍या होगा कि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ तक चिंता जता रहा है, हालांकि संघ के सचिव बॉन की मून ने पूरे विश्‍व की महिलाओं की सुरक्षा पर हमलों की बावत उत्‍तरप्रदेश की इस घटना का भी उल्‍लेख किया मगर किया तो सही, यही हमारे लिए  क्‍या डूब मरने वाली बात नहीं ?
बहरहाल, जिम्‍मेदार नेता कानून व्‍यवस्‍थागत कोई सबक सीखे हैं या आगे सीखेंगे, ऐसा फिलहाल के बयानों से तो नहीं लगता, अलबत्‍ता ये जरूर है कि अब आने वाले विधानसभा चुनावों तक ये अपनी सरकार बनाये रख पायें, यही इनके लिए उपलब्‍धि होगी। उत्‍तरप्रदेश जो कभी उत्‍तमप्रदेश नहीं बन पाया, अब इस गिरावट के बाद अपने उत्‍थान की ओर ही चलेगा,ये निश्‍चित है क्‍योंकि गिरने की भी अपनी एक सीमा होती है।
-अलकनंदा सिंह

सोमवार, 26 मई 2014

शायर मुनव्वर राना ने दिया पद से इस्तीफा

लखनऊ। 
मशहूर शायर मुनव्वर राना ने आज उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने संस्थान के चेयरमैन पर गम्भीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा है. राना ने बताया, ‘मैंने मुख्यमंत्री को इस्तीफा दे दिया है. यह ओहदा सम्भालते वक्त हमने कहा था कि अगर हम उर्दू की खिदमत नहीं कर सके तो कुर्सी छोड़ देंगे. हमें हमारे ही साथियों ने काम नहीं करने दिया. हम जो बनाना चाहते थे उसे बिगाड़ दिया जाता था. हमें अकादमी के फैसलों में शरीक करना तो दूर, हमें जानकारी तक नहीं दी जाती थी. ऐसे में मेरे पास इस्तीफे के अलावा कोई चारा नहीं था.’
इस साल फरवरी में उर्दू अकादमी के अध्यक्ष का पद सम्भालने वाले राना ने अकादमी के चेयरमैन नवाज देवबंदी पर आरोप लगाया कि देवबंदी को अकादमी के कामों के लिये फुरसत ही नहीं है.
राना ने कहा कि उनके कहने के बावजूद साहित्यकारों के बीमे की योजना और जिलों में उर्दू कोचिंग केन्द्रों की स्थापना पर कोई काम नहीं हुआ. इसके अलावा अकादमी द्वारा अदीबों को दिये जाने वाले इनाम भी चार साल से नहीं बंटे. बंटना तो दूर, उसकी कोई तैयारी ही नहीं है.
इस सिलसिले में जब देवबंदी से संपर्क करने की कोशिश की गयी तो उनसे संपर्क नहीं हो सका.
-एजेंसी

शुक्रवार, 23 मई 2014

'सार्वभौम' है 'गीता': अनवर जलालपुरी

लखनऊ।  अनवर जलालपुरी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। देश-विदेश में सैकड़ों मुशायरों एवं कवि सम्मेलनों के सफलतापूर्वक संचालन का श्रेय उनको जाता है। वे एक श्रेष्ठ शायर भी हैं। अनवर जलालपुरी ने सिर्फ उर्दू में ही नहीं लिखा वरन्‌ उन्होंने 'गीता' का अनुवाद बड़े सुन्दर उर्दू शायरी में कर आजकल वे चर्चा में हैं।
जाने-माने शायर अनवर जलालपुरी की पुस्तक उर्दू शायरी में गीता का लोकार्पण संत मुरारी बापू आगामी 23 मई को गोमती नगर, लखनऊ स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के मरकारी ऑडिटोरियम में करेंगे।
संस्कृति विभाग उप्र एवं हेल्प यू एजुकेशनल एवं चैरिटेबल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में होने वाले इस कार्यक्रम का नाम रुहानी संगम दिया गया है। संत मुरारी बापू के अलावा कार्यक्रम की अध्यक्षता महापौर डॉ. दिनेश शर्मा करेंगे तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव।
अनवर जलालपुरी को पूरा विश्वास है कि हिन्दू और मुसलमानों के बीच पनपी दूरियां संवाद से ही घटेंगीं। उन्होंने कहा कि आज धार्मिक और राजनीतिक नेता साम्प्रदायिक एकता बनाने में असफल साबित हुए हैं। उनका विश्वास है कि अब बस अध्यात्म का ही रास्ता, सूफी का ही रास्ता बचा है जिस राह पर चलकर नफरत से दूर इंसानियत को एकता की राह पर चलाया जा सकता है।
अनवर जलालपुरी का मानना यह सर्वविदित है कि गीता हाथ में रखकर न्यायालय में सच बोलने की शपथ ली जाती है लेकिन गीता सिर्फ धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं है, इसमें समस्त वेदों का सार, जीवन जगत, जन्म-मरण, व्यक्ति और सृष्टि के सम्बन्ध में अनेक सूत्र हैं जो सर्वभौम हैं। यह एक दार्शनिक ग्रन्थ है। इसे कोई भी धर्म वाला पढ़ सकता है और समझ सकता है।
अनवर जलालपुरी का कहना है कि फल की चिन्ता न करते हुए निरंतर कर्मशील रहना यही गीता का मूल उद्देश्य है। उन्होंने बताया कि गीता के अनुवाद में उन्हें एक-एक श्लोक का अनुवाद करने के लिए छः-छः पंक्तियां लिखनी पड़ी हैं। उनका दावा है कि अनुवाद इतना बोधगम्य, सहज और सरल है कि जो होंठों पर तुरंत बैठ जाता है।
प्रसिद्ध गीतकार डॉ. गोपाल दास नीरज का कहना है कि मैंने गीता के हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं के भी कई अनुवाद पढ़े हैं लेकिन जैसा अनुवाद अनवर जलालपुरी ने किया है वैसा मुझे अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिला। नीरज कहते हैं कि सबसे बड़ी सार्थकता गीता की यही होगी कि वो किताब में ही न होकर लोगों की जुबान पर भी हो, जिसे वो गाएंगे भी, गुनगुनाएंगे भी।
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह का मानना है कि अनवर जलालपुरी को उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी पर समान अधिकार है, उन्हें श्रेष्ठ वक्ताओं की प्रथम पंक्ति में रखा जा सकता है। अनवर जलालपुरी द्वारा गीता का भावानुवाद उर्दू शेरों में करने पर उदय प्रताप सिंह ने आश्चर्य जताया और कहा कि आश्चर्य इसलिए कि गीता सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का बेहतरीन दस्तावेज है। भारत की भावनात्मक एकता, विश्व बंधुत्व और एक ईश्वरवाद की प्रेरणा गीता से मिलती है।
गीता को समझना और उसका भावानुवाद आसान जबान में शेरो-शायरी के माध्यम से करना बहुत मुश्किल काम है। उर्दू के सरल प्रचलित शब्दों में चयन और फिर गीता की गहराई तक पहुंचने में उनका प्रयोग जिस प्रकार अनवर साहब ने किया वह उनकी प्रतिभा का प्रतीक है। गीता का दार्शनिक पक्ष जन सुलभ शैली में जनसाधारण को उपलब्ध कराना काम कठिन जरूर है, पवित्र भी है और आवश्यक भी।
लखनऊ विश्वविद्यालय राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर रमेश दीक्षित का कहना है कि उर्दू को मुसलमानों की जुबान बताकर साजिशन उसकी अहमियत को कमतर ठहराने की तमाम कोशिशों के बावजूद इस देश की गंगा-जमुनी सांझी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम लगातार जारी है। उन्होंने कहा कि अनवर साहब का यह तजुर्मा उर्दू जुबान को देवनागरी लिपि में पढ़ने वालों को हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण दार्शनिक दृष्टिकोण से रुबरु होने का मौका उपलब्ध कराता है।
अनवर जलालपुरी ने उर्दू शायरी में गीता नामक पुस्तक में गीता के 701 श्लोक, 18 अध्याय कुल अशआर 1761 का अनुवाद उर्दू में शायरी के माध्यम से किया है। अनवर जलालपुरी ने बताया कि उन्हें बचपन से ही भगवद् गीता की बातों से गहरा लगाव था। 5 वर्ष पहले मुझे गीता के अनुवाद की धुन सवार हो गई और जो अब उर्दू शायरी में गीता के रूप में आपके हाथों में है।
अनवर जलालपुरी ने कहा कि उनका उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा और संदेश को उन उर्दू वालों तक और उन मुसलमानों तक पहुचाऊं जो गीता को एक धार्मिक ग्रन्थ तो मानते हैं किन्तु उसमें क्या कुछ लिखा है, उससे बिल्‍कुल अंजान हैं। गीता के पैगाम दुनिया को खूबसूरत और नेक बनाते हुए आत्मा से परमात्‍मा में मिल जाने की बात करते हैं। यह किताब फल की इच्छा के बिना कर्म पर अमल करने की शिक्षा देती है। उन्होंने बताया कि गीता को शायराना शक्ल देने के लिए जिन किताबों की रोशनी हासिल की है, उसका भी जिक्र जरूरी है।
श्री रजनीश यानि ओशो की गीता दर्शन, पंडित सुंदरलाल की गीता और कुरआन, अजमल खां की श्रीमद् भगवद् गीता, महात्मा गांधी की गीता बोध, मनमोहन लाल छाबड़ा की मन की गीता, डॉ. अजय मालवीय की गीता, स्वामी रामसुखदास की गीता प्रबोधनी, प्रकाश नगाइच की श्रीमद् गीता, हसनुद्दीन अहमद की गीता, ख्वाजा दिल मोहम्मद लाहौरी की दिल की गीता प्रमुख है।
अनवर जलालपुरी ने बताया कि उन्होंने कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित गीतांजलि एवं उमर खैय्याम की रुबाइयों-रुबाइयात-ए-खैय्याम उर्दू शायरी में अनुवाद कर लिया है जो कि शीघ्र ही पाठकों के हाथों में होगा।
-साभार: अरविन्द शुक्ला