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शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

Politics: महिलाओं के लिए बदजुबानी में कौन कम है भला

women के लिए बदजुबानी में कौन कम है भला, खासकर राजनीति में और वो भी राजनीति अगर यूपी की हो तो कहने ही क्या। यूपी बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह के बयान से देश की सियासत में उबाल है। उनकी मायावती पर की गई भद्दी टिप्पणी को राजनीतिक के गिरते स्तर का एक और नमूना कहा जा रहा है। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं जिसके तहत -दयाशंकर सिंह के अपशब्दों के विरोधस्वरूप बसपा के गालीबाजों को अपनी जुबान साफ करने का मौका मिल गया और उन्होंने अपने नेता नसीमुद्दीन सिद्दकी की अगुवाई में दयाशंकर की पत्नी स्वाति व उनकी 12 साल की बच्ची को ”पेश” करने की बात कहकर गंदी जुबान की पराकाष्ठा पार कर दी। मायावती इसे TiT for Tat यानि गाली का बदला गाली बता रही हैं । कम से कम यूपी में सब जानते हैं कि बदजुबानी में तो स्तरहीन वह भी हैं ।

हालांकि दयाशंकर को भाजपा से निष्काष‍ित कर उन्हें पदच्युत कर भाजपा ने अपना कर्तव्य निभाया, यूपी पुलिस दयाशंकर को खोजने में जुटकर अपना कर्तव्य निभा रही है और उनकी पत्नी स्वाति सिंह अपने व अपनी बेटी के प्रति बसपाइयों द्वारा बोले गए ”अपमानजनक अपशब्दों ” को लेकर मायावती के ख‍िलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में मामला दर्ज करवा चुकी हैं। उनका कहना सही भी है कि पूरे देश ने देखा कि कल बसपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किस भाषा का इस्तेमाल किया। क्या यह महिलाओं की गरिमा के खिलाफ नहीं है।
बहरहाल, इस बदलते घटनाक्रमों के बावजूद बात तो ये है कि महिलाओं को लेकर इतनी बदजुबानी क्यों। इसी वजह से सियासत में महिलाओं का आना सभ्रांत स्तर का नहीं माना जाता।

ज़रा एक नजर समय समय पर दिए गए ”बड़े नेताओं” के इन गरियाऊ बयानों पर –

1. दिसंबर 2012 में जब गुजरात विधानसभा के चुनाव नतीजे आए थे, तब कांग्रेस के पूर्व सांसद संजय निरुपम ने स्मृति ईरानी को ठुमके वाली कह डाला था। निरुपम ने कहा था- आप तो टीवी पर ठुमके लगाती थीं और आज चुनावी विश्लेषक बन गई हैं।
2. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह अपनी ही पार्टी की तत्कालीन सांसद मीनाक्षी नटराजन (मंदसौर) को सौ टंच माल करार दिया था।
3. वर्तमान में केंद्रीय मंत्री और पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह ने मीडिया को presstitutes कह कब संबोधित किया था।
4. दिल्ली से भाजपा विधायक ओपी शर्मा ने सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की विधायक अल्का लांबा को रात में घूमने वाली करार दिया था।
5. 2015 में जदयू नेता शरद यादव ने राज्यसभा में दक्षिण भारतीय महिलाओं पर अजीब टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, दक्षिण भारत की महिलाएं दिखने में काली होती हैं, लेकिन उनका शरीर सुंदर होता है। ऐसा यहां नजर नहीं आता।
6. 2014 में मुंबई के शक्तिमील में दो महिलाओं से गैंगरेप में कोर्ट के फैसले पर मुलायम सिंह यादव यह कह बैठे थे कि लड़के तो लड़के हैं। गलतियां करेंगे ही। जब भी दोस्ती खत्म होती है, लड़की के लिए लड़का रेपिस्ट बन जाता है।
7. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी का यह बयान भी खासा विवादों में रहा, जिसमें उन्होंने निर्भया गेंगरेप कांड के दौरान कहा था कि जो लड़कियां यहां हाथों में मोमबत्तियां लेकर प्रदर्शन कर रही हैं, वो रात में डिस्को जाती हैं।

ये तो वो उदारण हैं जो मुझे याद रहे अन्यथा हम अपने घर, मोहल्ले से लेकर हाई प्रोफाइल सोसाइटीज तक महिलाओं को गरियाने वालों को या तो तिरछी नजर से देखकर छोड़ देते हैं या फिर दो चार बात सुनाकर। राजनीति में आने वाली महिलाओं के लिए सम्मान पाना बड़ी टेढ़ी खीर है। खासकर तब जबकि हमारी नीति नियंता जमात चारित्रिक अपशब्दों का जखीरा अपनी कांख में हमेशा दबाए घूमती फिरती हो। किसी महिला से ज़रा सा मात खाए नहीं कि बिलबिलाकर गालियों को थूकने में देर नहीं करते, साथ ही जस्टीफाई भी करते हैं कि ”वो” तो है ही इसी लायक, ये सब तो राजनीति में चलता ही है, नहीं सुन सकती तो राजनीति में आई ही क्यों… आदि आदि।

मायावती के बहाने से ही सही, ये बात एकबार फिर उठी है और संसद से इसकी जोरदार भर्त्सना भी हुई, यह सूचक है कि समाज के सांस्कृतिक पतन को अब चुप होकर नहीं सुना जा सकेगा… आवाज उठेगी ही…।

– अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

UP Election में BJP की ”चीता चाल” तो नहीं स्मृति को हटाना ?

कहीं UP Election 2017 के लिए ये एक चीता चाल तो नहीं, कहीं स्मृति ईरानी को बड़ी जिम्मेदारी देने के लिए ही तो कम महत्व का मंत्रालय नहीं दिया गया, कहीं अमेठी में राहुल गांधी को कड़ी टक्कर देने वाली स्मृति को यूपी की कमान तो नहीं दी जा रही…?
ऐसे तमाम प्रश्न चुनावी पंडितों के जहन में तैर रहे हैं, लाजिमी भी है ऐसा होना क्योंकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाकर अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण कपड़ा मंत्रालय यदि प्रखर वक्ता और मीडिया में मोदी जी के बहुत करीबी मानी जाने वाली मंत्री को दे दिया जाए तो ये चर्चा तो होगी ही। लोग तो सोचेंगे ही कि आख‍िर उनके पर क्यों कतरे गए।
चुनावी विश्लेषक तो ये भी कह रहे हैं कि चीता सी चाल यानि ‘दो कदम आगे फिर एक कदम पीछे’ रहकर अटैक करने में विश्वास करने वाले प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, स्मृति ईरानी के लिए यूपी में किसी रोल की पटकथा तैयार कर चुके हों तो कोई हैरानी नहीं होगी।
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद आए इस बड़े बदलाव पर भले ही स्मृति का कद छोटा करने की चर्चा आम हो गई पर राजनीतिक पंडित मानते हैं कि ये स्मृति ईरानी के पर कतरने नहीं, बल्कि पर फैलाने का इंतजाम किया गया है। इसकी वजह भी है कि कपड़ा मंत्रालय के जरिए रोजगार के सर्वाध‍िक अवसर और उत्तर प्रदेश में चुनावों तक इसे जमीन पर उतारना व इसके जरिए युवा वोटरों को भाजपा तक लेकर आना। इस पूरी कवायद में एक तो स्मृति का चेहरा, उनकी आक्रामकता और रोजगार… ये तीनों ही कारण निम्न वर्ग व मध्यम वर्ग के युवाओं को भाजपा के वोट में तब्दील कर सकते हैं।
इन पॉलिटिकल पंडितों की मानें तो स्मृति ईरानी की छवि जिस तरह से युवाओं में लगातार बढ़ रही है और जिस तरह से लोकसभा चुनाव से ही वह गांधी परिवार से उनके ही गढ़ में लोहा लेती रही हैं, उसे देखते हुए उन्हें यूपी महासमर का प्रणेता बनाया जा सकता है।
भाजपा लगातार यूपी के चुनावी महासंग्राम की न सिर्फ तैयारी में लगी है बल्कि विरोधी पार्टियों की चाल को भी पढ़ने में जुटी है। मंत्रिमंडल में फेरबदल इसी का नतीजा है व इसके बाद संगठन और संघ में भी फेरबदल इसी चाल को पढ़ कर किया जाने वाला है।
कांग्रेस द्वारा जिस तरह से यूपी के लिए प्रियंका वाड्रा के रूप में ब्रह्मास्त्र छोड़ने का लगभग ऐलान किया जाना तय माना जा रहा है, उसी तरह से भाजपा भी स्मृति को मुख्यमंत्री के तौर पर यूपी चुनाव में उतार सकती है, हालांकि अभी दोनों पार्टियां इनके लिए किसी भी तरह की घोषणा से बच रही हैं।
कुछ दिन पहले हुए भाजपा के एक आंतरिक सर्वे में भले ही वरुण गांधी और राजनाथ सिंह को यूपी की कमान संभालने पर बराबर का वोट मिला हो लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि स्मृति ईरानी ने भी वहां जबरदस्त प्रदर्शन किया था। एक असम को छोड़कर कई अन्य राज्यों की भांति भाजपा मुख्यमंत्री के लिए कोई एक नाम लेकर चलने की बजाय इन तीनों को ही लेकर चले तो भी अप्रत्याश‍ित नहीं कहा जाएगा। ये उनकी पॉलिटकल स्ट्रेटजी भी रही है, इससे मुख्यमंत्री पद को लेकर आंतरिक कलह से बचा जा सकता है और हर प्रत्याश‍ित व्यक्ति की क्षमताओं का भरपूर उपयोग भी किया जा सकता है ।
जहां तक बात स्मृति ईरानी की है तो लोकसभा चुनाव के दौरान अमेठी में वह भले ही राहुल गांधी से हार गईं थी लेकिन उस चुनाव में राहुल को अगर 4 लाख वोट मिले थे तो स्मृति भी 3 लाख वोट पाकर दूसरे स्थान पर रही थीं और चुनावों के बाद भी जितनी बार स्मृति अमेठी गई हैं उतनी बार राहुल गांधी नहीं गये।
अमेठी में लोकसभा चुनाव जैसा करिश्मा करने वाली वह पहली भाजपा नेता हैं। स्मृति के इस बढ़ते कद से कांग्रेस भी एक बार सकते में आ गई थी इसलिए भाजपा आलाकमान स्मृति ईरानी के इस करिश्मे को भुलाए बिना और कैश कराना चाहती है, इसके पूरे पूरे आसार है।
बहरहाल, अभी स्मृति के कद को छोटा करने की रणनीति को किसी पनिशमेंट के बतौर सोचना जल्दबाजी होगी, वह भी उत्तर प्रदेश जैसे राजनैतिक रूप से अतिमहत्वपूर्ण राज्य के आसन्न चुनावों को देखते हुए। यही वजह रही कि कल स्मृति से उनके मंत्रालय को लेकर टिप्पणी जब की गई तो उन्होंने लगभग ठहाका लगाते हुए कहा था कि कुछ तो लोग कहेंगे और मेरा व आपका (मीडिया) साथ तो और आगे बढ़ेगा ही।
  • Alaknanda singh

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

ये तो होना ही था ... शाह जी !

1946 में लिखी बाबा नागार्जुन की ये कविता ईश्वर के प्रति आस्था की मांग के बजाय अनास्था मांगती है जो वैचारिक साहस था उनका। उस समय इस कविता को दो तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा, एक तो आश्चर्य का भाव देतीं और दूसरी निंदा का। आपातकाल के पश्चात् प्रकाशित हुए अपने कविता संग्रह 'हजार हजार बाहों वाली' में कल्पनाजनित ईश्वर से कुछ यूं बतियाते हैं बाबा ...



कल्पना के पुत्र हे भगवान।
चाहिए मुझको नहीं वरदान।।
दे सको तो दो मुझे अभिशाप।
प्रिय मुझे है जलन प्रिय संताप।।
चाहिए मुझको नहीं यह शान्ति।
चाहिए संदेह उलझन भ्रांति...।।


ईश्वर से अपने लिए अभि‍शाप, जलन, संताप, संदेह, उलझन भ्रांति मांगती यह कविता उस आमजन की कविता है जो आज के संदर्भ में एकदम फिट बैठती है कि जब इतना सब नकारने के साधन होंगे तो व्यक्त‍ि ना आलस्य करेगा और ना ही अहंकार की भावना उसमें आएगी। समस्याओं को नज़रंदाज कर देने से वे टलती नहीं,  बल्क‍ि और विशालतम रूप में सामने आती हैं। जब ईश्वर वरदान की जगह इतने  सारे कारण दे देगा चिंताओं के, तो निगाहें चौकस रहेंगी ही।
बाबा की कविता भाजपा के हार के कारणों पर सटीक बैठती है । दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जबर्दस्त जीत भारत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक 'निर्णायक मोड़' और भारतीय जनता पार्टी जैसी बड़ी पार्टी के लिए भारी पराजय का सबब है। वो  अपनी पराजय के कारण तक नहीं ढूढ़ पा रहे।

दिल्ली की जनता ने लोकतंत्र की महानता को एक बार फिर साबित कर दिखाया। कुछ ऐसा ही  लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत से जिताकर जनता ने दिखाया था।
हालांकि आम आदमी पार्टी से लेकर ममता बनर्जी तक इस जीत का क्रेडिट ले रही हैं मगर ये इनकी विजय कम, उन मुद्दों की हार ज्यादा है जो जनता को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दिला पाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी प्रयासों को छोड़कर विदेश नीति पर अच्छे परिणाम आने का मतलब ये तो नहीं हो जाता कि पूरी सरकार अच्छा ही काम कर रही है।

दिल्ली के नगर निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार, जनता की बजाय बिजली कंपनियों के हित में लिए गये केंद्र सरकार के निर्णयों ने इस हार की नींव को और पक्का ही किया ।

दिल्ली में सुरक्षा की जिम्मेदारी तो केंद्र की ही थी, तो फिर आए दिन लड़कियों के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा।

डीजल, पेट्रोल के दाम उत्तरोत्तर कम होते गये मगर खाद्य वस्तुओं के दाम जस के तस हैं। प्रधानमंत्री का स्वच्छता मिशन उनके मंत्रियों और भाजपा के पार्टीजनों द्वारा ही सिर्फ ट्विटर तक समेट दि‍या गया।
नदियों के लिए कई कई मंत्रालय काम कर रहे हैं पर केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में ही यमुना का हाल किससे छुपा है। अकेला चना आख‍िर कब तलक भाड़ फोड़ेगा, कभी तो पार्टी को अपने बलबूते भी कुछ दिखाना होगा।
इसके अलावा भाजपा जिन युवाओं को अपना वोटबैंक बताती है ,उन्हीं के सामने लव जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे जब आते हैं तो,  शाह जी ....! बच्चे अपना सच स्वयं खोजने लगते हैं कि आखिर कैसा विकास ... किसका विकास ... किस तरह होगा विकास ... ।

आए दिन मंचों पर से जो आपकी पार्टी के होनहार नेता संप्रदायवादिता के ज़हरीले वाण चलाते हैं, क्या उसे आज की ये हाइटेक पीढ़ी देखती नहीं होगी। हिंदू वादिता के लिए पूरे देश में कटुवचन बोलने वालों का दुस्साहसी होना,  क्या ये युवा देख नहीं रहे ।

निश्चित ही दिल्ली विधानसभा में पहले कांग्रेस और अब की बार भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो जाना, इन्हीं युवाओं और समस्याओं के मकड़जाल में घि‍रे मध्यम वर्ग के प्रति इग्नोरेंस ही तो है। वही मध्यम वर्ग जिसे सांझ होते ही डर सताने लगता है कि उसकी बेटी सुरक्षति घर पहुंच तो जाएगी या उसकी सारी कमाई घर के राशन, बिजली और पानी के बाद उसे ठेंगा दिखा देगी। अरविंद केजरीवाल ने जनता की यही दुखती नस तो पकड़ी थी। 
बहरहाल,  बतौर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह हार जरूरी भी थी जो नरेंद्र मोदी का ही चेहरा आगे करके सारी समस्याओं पर पर्दा डालने की रणनीति पर काम कर रहे थे। अभी तो बिहार,  फिर उत्तर प्रदेश जैसे मील के पत्थर बाकी हैं  जहां पार्टी आंखें मूंदकर अब भी मोदी के भरोसे राज्य जीतने के ख्वाब देख रही है। संगठन से लेकर जनसमस्याओं तक को इस तरह देखा जा रहा है कि मानो इनसे कोई वास्ता ही ना हो।

जो भी हो दिल्ली ने ''आप''  को बहुमत देकर और आप को (अमित शाह) को आइना दिखाकर  यह  बता दिया है क‍ि शाह जी ये लोक का तंत्र है और अब तो खालिस उन युवाओं का तंत्र है जो राजनीति से परहेज नहीं करते बल्क‍ि उसे सुधारने के लिए जज़्बे के साथ जुट जाने का माद्दा रखते हैं .... सो खबरदार रहें सभी परंपरावादी राजनेता और उनकी पार्टियां .... दिल्ली के परिणाम आइना हैं उनके लिए ....
और अंत में ....

राजनीति की इसी तस्वीर के लिए बाबा नागार्जुन की 'हजार हजार बाहों वाली' इसी कविता संग्रह से कुछ पंक्तियां और ...
'सुख-सुविधा और ऐश-आराम के साधन।
डाल देते हैं दरार प्रखर नास्तिकता की भीत में।।
बड़ा ही मादक होता है, 'यथास्थिति' का शहद।
बड़ी ही मीठी होती है 'गतानुगतिकता' की संजीवनी'....।।  


- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

डॉक्‍टर तोगड़िया... प्‍लीज! ..आप तो समझ ही सकते हैं

 
कभी आपने यदि गीता पढ़ी हो तो ये भी अवश्‍य पढ़ा होगा कि
''कर्मण्‍येवाधिकारस्‍ते मा फलेषु कदाचन्'' से कर्म करने की प्रेरणा देने वाले श्रीकृष्‍ण ने गीता के  18वें अध्‍याय में
''सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।'
अहंत्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।
कहकर अपना उपदेश समाप्‍त किया। गीता के उपदेश हर काल में जन-जीवन के लिए  प्रायोगिक तौर पर खरे उतरते रहे हैं, आज की दिशाहीन-गतिहीन राजनैतिक स्‍थितियों में यदि  कोई लीक-लीक चलने की बजाय कुछ नया करने का साहस दिखाता है तो उसे पोंगापंथियों  की चिल्‍लपों से दोचार होना ही पड़ता है।
उक्‍त श्‍लोकों की यात्रा हर क्षण यह बताती है कि हमें बस कर्म करना है, बाकी फल मिलने  के रास्‍ते तो समय अपने आप बनाता जाता है।
कल जब से नरेंद्र मोदी ने युवाओं के सामने अपनी बात रखी, तभी से हंगामा बरपा है। सब  अपने-अपने तरीके से समीक्षा कर रहे हैं।
मोदी ने कहा, 'मैं एक हिंदुत्ववादी नेता के रूप में जाना जाता हूं। मेरी छवि मुझे ऐसा कहने  की इज़ाज़त नहीं देती, लेकिन मैं ऐसा कहने का 'साहस' कर रहा हूं। मेरा वास्तविक विचार है  यह है कि पहले शौचालय, फिर देवालय। हमारे देश में बहुत देवालय हैं अगर इतने ही  शौचालय हों तो लोगों को बाहर शौच करने की जरुरत नहीं होगी।'
अब इस पर कट्टर हिंदूवादियों का खून खौल रहा है कि मोदी, देवालय से पहले शौचालय क्‍यों  ले आए। ये लोग 'हिंदू' शब्‍दभ्रम के जाल में इस कदर फंसे हुए हैं कि हमारी सनातनी सोच  को भी भुला बैठे हैं । इन्‍हें ज़मीन पर रहने वाले वो लोग दिखाई नहीं देते जिन्‍हें नित्‍यकर्म के  लिए अपनी ही नज़रों से दिन भर में कम से कम एक बार तो गिरना ही पड़ता है। सरेआम  उनको यानि गरीबों की बच्‍चियों व महिलाओं को इस शर्मिंदगी से दो-चार होते शायद ये  तथाकथित हिंदूवादी अपने अपमान से जोड़कर नहीं देखते।
..तो प्रवीण तोगड़िया जी, राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से लेकर पूरे देश के हर शहर व गांव से  गुजरने वाली वो रेलवे पटरियां तो आपने भी देखीं होंगी, जिनके किनारे तमाम औरत-मर्दों को  बैठना पड़ता है। कृपया आप ये बतायेंगे कि इन्‍हें लेकर कभी आपको किसी प्रकार की शर्मिंदगी  का अहसास हुआ है या नहीं..।
और ये भी बतायें कि जीवन की मूलभूत आवश्‍यकता को पूरा करना ज्‍यादा जरूरी है या घंटे  घड़ियाल बजा कर गरीबों की समस्‍याओं को हल करने का कोरा ढोल पीटना। समय बदल  चुका है.....जिन युवाओं की बात नरेंद्र मोदी कर रहे हैं वो कोई युवाओं पर कृपा नहीं बरसा रहे,  ना ही उन्‍हें सर आंखों पर बैठा रहे हैं.....वो तो बस समय की मांग के अनुसार युवाओं की  आधुनिक सोच व क्रिएटिव कैपेबिलिटी का राजनैतिक संदर्भ में प्रयोग करने की राह बना रहे  हैं। मोदी की पूरी स्पीच में शौचालय और देवालय के सन्दर्भ में जो कहा गया है, उसमें ऐसा  कुछ नहीं है कि हिन्दू या हिंदुत्व को इतना धक्का लगे। सो इस पर इतनी हायतौबा मचाना  जरूरी नहीं है। यूं भी जो समय के अनुसार नहीं चलते, उन्‍हें इतिहास बनते देर भी नहीं  लगती। विरोधी पार्टियों की तो छोड़ें तोगड़िया जी, अपनी सोच को थोड़ा विस्‍तार दें और  श्रीकृष्‍ण के गीतासार को पढ़ें ताकि समझ सकें कि समय और जरूरत के अनुसार बनाई गई  रणनीति ही देश का भला कर सकती है। बेहतर होगा कि देवालयों से बाहर आकर भगवान को  भी ज़मीनी हकीकतों से रूबरू होने दें।
मोदी युवाओं की आवाज़ बनने की इस प्रक्रिया में कितने सफल होंगे, यह तो नहीं कहा जा  सकता मगर इतना अवश्‍य है कि देश का युवा भी ''कर्मण्‍यवाधिकारस्‍ते मा फलेषु कदाचन्'' की  व्‍याख्‍या करते हुए उन नेताओं का हश्र भी बखूबी देख रहा है, जिन्‍होंने अपनी कलाबाजियों से  जनता का मनोरंजन करके उसे ढंग से धोया-पोंछा और कंगाल होने को छोड़ दिया। बात  इतनी सी है कि श्रीकृष्‍ण के ''मामेकं शरणं व्रज'' की जरूरत आज हर उस राजनीतिज्ञ को है  जो 2014 की चुनौतियों को देख पा रहा है। आप भी मोदी से अपने मतभेदों को शौचालय की  आड़ लेकर सार्वजनिक न करें तो बेहतर है क्‍योंकि उनसे भी सड़क पर पड़े शौच जैसी ही  दुर्गंध आ रही है। हिंदू हित भी इसकी इजाजत नहीं देता कि इस नाजुक दौर में आप मोदी से  अपने मतभेदों को सार्वजनिक करके दूषित वातावरण पैदा करें।
-अलकनंदा सिंह 

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

2 अक्‍तूबर: कंपलीट नॉनसेंस

आज का दिन...यानि 2 अक्‍तूबर... यानि शांति के मसीहा-महात्‍मा गांधी का जन्‍मदिन... आज  के दिन सियासी गलियारों से लेकर सामाजिक चौखटों तक शांति का दिखावटी राग अलापा  जायेगा लेकिन लालबहादुर शास्‍त्री को शायद ही याद किया जाए जबकि आज शास्‍त्रीजी का भी  जन्‍मदिन है। दोनों की उन प्रतिमाओं को धोया संवारा भी जायेगा, जहां वर्षभर कबूतरों का  सुलभ शौचालय आबाद रहता है। राजघाट से लेकर पब्‍लिक स्‍कूलों-मांटसरियों में भी गांधी के  स्‍वदेशीपन को तरह-तरह से कैश किया जायेगा। कहीं उन्‍हें कांग्रेसी चश्‍मे से तो कहीं भाजपाई  चश्‍मे से नापा-तोला जायेगा, फिर कल से शुरू होगी इन पार्टियों द्वारा दिये गये बयानों की  उधेड़-बुनाई कि फलां ने ये कहा और फलां ने वो....बयानों के इतर इस बीच न गांधी बचेंगे न  उनके सिद्धांत।
खैर, ये तो रहे गांधी जयंती समारोह के आफ्टर इफेक्‍ट्स.. मगर कुछ सवाल जो 1947 में  अनुत्‍तरित रह गये थे, वो आज भी वहीं खड़े हैं। जैसेकि हिंदू-मुसलमानों को स्‍वयं महात्‍मा  गांधी अपनी दो आंखें कहा करते थे.. और कहते थे कि इनमें से किसी एक के बिछुड़ने से  भारत अपूर्ण रहेगा। आज उन्‍हीं के इस 'पूर्ण देश' में हिंदुओं की बात करने भर से माहौल  सांप्रदायिक हो जाता है और मुसलमानों को तो 'मुसलमान' कह कर संबोधित करने तक में  आपत्‍ति है। मुसलमानों के लिए एक शब्‍द ईज़ाद किया गया ''संप्रदाय विशेष''। देश में कहीं भी  यदि हिंदू-मुसलमान के बीच है कोई फसाद हो जाए तो मीडिया रिपोर्टिंग में कहा जाता है.. दो  संप्रदायों के बीच ये हुआ... दो संप्रदायों के बीच वो हुआ..आदि-आदि ।
हिंदू का नाम लिया जा सकता मगर मुसलमान का नहीं..क्‍यों ? क्‍या मुसलमान इस देश के  वाशिंदे नहीं हैं या उन्‍हें ऐसा 'संप्रदाय विशेष' कहकर ''छेक देने'' की प्रवृत्‍ति जान-बूझकर  पनपाई जा रही है ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्‍तेमाल राजनीति के मोहरों बतौर किया जा  सके। कहीं भी दंगे हों तो सबसे पहले आवाज उठती है कि संप्रदाय विशेष को पाकिस्‍तान चले  जाना चाहिए। क्‍यों भाई..जिन देशों में अकेले मुस्‍लिम आबादी है तो क्‍या वहां मारकाट नहीं हो  रही। सच तो यह है कि सामाजिक हिंसा के सर्वाधिक मामले विश्‍व के उन देशों में दिखाई दे  रहे हैं जिन्‍हें इस्‍लामिक मुल्‍क कहा जाता है। वहां तो न कांग्रेस है ना बीजेपी.. ना दो  ''संप्रदाय'' और ''संप्रदाय विशेष'' जैसे शब्‍द।
आज गांधी को याद करने की और उनके शब्‍दों को दोहराने की रस्‍म अदायगी बखूबी निभाई  जायेगी मगर उनकी दोनों आंखों की सेहत और उनका मोल ये तथाकथित गांधीभक्‍त समझेंगे,  ऐसा फिलहाल तो नहीं लगता।
ये देश की कौन सी तस्‍वीर है हमारे सामने जिसमें राजनीति ने अपने पांसे कुछ इस कदर  फेंके हैं कि ना हिंदू, हिंदुस्‍तानी रह पा रहे हैं ना मुसलमान, भारतीय। भाषाएं तो कब की  विभाजित की जा चुकी हैं, अब लिबास भी सियासत के लिए विभाजित किया जा रहा है। तभी  तो जरूरतमंदों को साड़ी बांटते-बांटते अखिलेश सरकार सलवार सूट बांटने की बात करने लगी  है क्‍योंकि मुस्‍लिमों में साड़ी पहनने का रिवाज नहीं है।
सच तो यह है कि सांप्रदायिकता को लेकर सियासत के हमाम में सब नंगे हैं। कोई किसी से  कम नहीं।
रहा सवाल गांधी बाबा का.. तो उनका भी स्‍मरण सिर्फ और सिर्फ इसलिए किया जाता है  ताकि सांप्रदायिकता को लेकर की जा रही सियासत से उनके नाम को कैश किया जा सके।
चूंकि लालबहादुर शास्‍त्री इस फ्रेम में फिट नहीं बैठते और उनके नाम को सांप्रदायिकता के  लिए भुनाया नहीं जा सकता इसलिए वह आउटडेटेड मान लिए गए हैं। संभवत: इसलिए 2  अक्‍टूबर गांधी जी के नाम आरक्षित है।
 - अलकनंदा सिंह