रविवार, 26 अप्रैल 2026

अलविदा रघु राय! भोपाल त्रासदी, सिख दंगे... कैमरे में कैद भारत का इतिहास


 उनकी हर तस्वीर में धड़कती थी जिंदगी… कैमरा से इतिहास रचने वाले रघु राय की कमी खलती रहेगी... 

महान फोटो जर्नलिस्ट रघु राय का निधन एक युग का अंत है. उन्होंने भारतीय फोटोग्राफी को नया आयाम दिया, तस्वीरों में कहानियां गढ़ना सिखाया. पद्मश्री से सम्मानित राय ने अपनी कला, कौशल और तकनीकी ज्ञान से स्टिल फोटो में जान फूंक दी. भोपाल गैस त्रासदी और वन्यजीवन पर उनकी तस्वीरें अविस्मरणीय हैं.


भारत के जाने-माने फोटोग्राफरों में शुमार रघु राय का रविवार तड़के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. वे 83 वर्ष के थे। रघु राय ने अपनी कैमरे की नजर से भारत के विविध रंगों और जीवन के अनेक पहलुओं को दुनिया के सामने पेश किया. उनके बेटे और फोटोग्राफर नितिन राय ने बताया, 'पिता को दो साल पहले प्रोस्टेट कैंसर हुआ था, जिसका इलाज हो गया था, इसके बाद कैंसर पेट तक फैला, वह भी ठीक हो गया, हाल ही में कैंसर उनके मस्तिष्क तक पहुंच गया था और उम्र से जुड़ी अन्य समस्याएं भी थीं'. उनके पीछे पत्नी गुरमीत, बेटा नितिन और बेटियां लगन, अवनी और पूर्वाई हैं. उनके निधन से मीडिया और कला जगत में शोक की लहर है. 


इस एक फ्रेम ने भोपाल गैस हादसे की भयावहता को दुनिया के सामने रख दिया. आज जब रघु राय हमारे बीच नहीं हैं, तो लोग उनकी इसी यादगार तस्वीर यादगार तस्वीर को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं. रघु राय का जन्म 1942 में झंग (अब पाकिस्तान) में हुआ था. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1960 के दशक में की. शुरुआत में वह सिविल इंजीनियरिंग से जुड़े थे, लेकिन बाद में फोटोग्राफी की ओर मुड़े. उनके भाई एस. पॉल ने उन्हें इस क्षेत्र में प्रेरित किया. एक साधारण शुरुआत ने आगे चलकर उन्हें दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फोटोग्राफरों में शामिल कर दिया. 


1966 में रघु राय ने ‘द स्टेट्समैन’ अखबार में चीफ फोटोग्राफर के रूप में काम शुरू किया. यहीं से उन्हें पहचान मिलने लगी. उनकी तस्वीरों में आम लोगों की जिंदगी और समाज की सच्चाई झलकती थी. इसके बाद उन्होंने ‘संडे’ मैगजीन और फिर ‘इंडिया टुडे’ में काम किया, जहां उन्होंने फोटो जर्नलिज्म को नई दिशा दी. 


रघु राय का ‘इंडिया टुडे’ के साथ जुड़ाव बेहद खास रहा. 1980 के दशक में उन्होंने यहां कई यादगार फोटो स्टोरीज कीं. उनकी तस्वीरों ने भारतीय पत्रकारिता की विजुअल पहचान को मजबूत किया. उनके काम को उस दौर की सबसे प्रभावशाली फोटो जर्नलिज्म में गिना जाता है. 1977 में रघु राय को मशहूर फ्रेंच फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसों (Henri Cartier-Bresson) ने Magnum Photos से जुड़ने के लिए नामित किया. यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय बने. इससे उन्हें वैश्विक पहचान मिली. उनकी तस्वीरें TIME, LIFE, न्यूयॉर्क टाइम्स और नेशनल जियोग्राफिक जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं. रघु राय ने भारत के कई बड़े ऐतिहासिक घटनाओं को कैमरे में कैद किया. 1984 की भोपाल गैस त्रासदी की उनकी तस्वीरें आज भी उस दर्द को बयां करती हैं. इसके अलावा उन्होंने 1971 के बांग्लादेश युद्ध, इमरजेंसी और सामाजिक बदलावों को भी अपने कैमरे में दर्ज किया. उनकी तस्वीरें सिर्फ फोटो नहीं, बल्कि इतिहास का दस्तावेज हैं. 


उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मदर टेरेसा, बाला साहेब ठाकरे और सत्यजीत रे जैसे बड़े व्यक्तित्वों की तस्वीरें खींचीं. उनकी खासियत थी कि वह इन हस्तियों के मानवीय पहलुओं को सामने लाते थे. उनकी फोटो में सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की कहानी भी नजर आती थी.


रघु राय को 1972 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया. 1992 में उन्हें ‘फोटोग्राफर ऑफ द ईयर’ का खिताब मिला. इसके अलावा उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड सहित कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले. उनके काम को दुनिया भर में सराहा गया और उन्हें फोटोग्राफी के क्षेत्र में एक आइकन माना गया.


- Alaknanda Singh 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

विश्व पुस्तक द‍िवस: शमोएल अहमद की कहानी 'सिंघार-दान' के पात्र बनते जा रहे हैं हम


 हर साल 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस (World Book and Copyright Day) मनाया जाता है। यूनेस्को (UNESCO) द्वारा घोषित यह दिन पढ़ने, प्रकाशन और कॉपीराइट के महत्व को बढ़ावा देता है और साहित्यकारों को सम्मानित करता है। इसका उद्देश्य: साक्षरता को बढ़ावा देना और किताबों के माध्यम से ज्ञान को साझा करना है। ऐतिहासिक महत्व: 23 अप्रैल विलियम शेक्सपियर और मिगुएल सर्वेंट जैसे महान साहित्यकारों की पुण्यतिथि (और शेक्सपियर का जन्म दिवस भी) है। यह पहली बार 23 अप्रैल 1995 को मनाया गया था।

आज विश्व पुस्तक द‍िवस पर चौतरफा संदेश द‍िए जा रहे हैं क‍ि क‍िताबें खरीदें और पढ़ें परंतु रीलबाजों और एक्सपोजर की दुन‍िया में पढ़ने ल‍िखने वालों को खोजना भूसे में सुई खोजने जैसा है। बहरहाल आज की इस  स्थ‍ित‍ि को ये कहानी बहुत अच्छी तरह से बयान कर रही है। 
 
सिंघार-दान जैसा क‍ि उर्दू में ल‍िखा जाता है... ह‍िन्दी में इसे श्रृंगारदान कहा जाता है। तो स‍िंघार दान #शमोएल अहमद की मशहूर कहानी है... जो आज की रीलबाजों की ज़‍िंदगी और उनके बौद्ध‍िक उथलेपन तथा अराजक सोच को बखूबी जाह‍िर करती है।

इस अफ़साने में फ़सादात के बाद की इन्सानी सूरत-ए-हाल को मौज़ू बनाया है। सिंघार-दान जो नसीम जान (तवाइफ़ का मौरूसी सिंघार-दान था, के ज़रि‍ए बृजमोहन के ख़ानदान की सोच और तर्ज़-ए-फ़िक्र को तिलिस्माती तौर पर तबदील होते दिखाया गया है। 

तो #शमोएल_अहमद की मशहूर कहानी की पहली पंक्ति है और कहानी का लब्ब-ओ-लुबाब कुछ यूँ है कि जब दिल्ली में #नादिरशाह ने अपनी फ़ौज को खुली छूट दी थी, तब तीन दिन और तीन रात शहर पर क़यामत टूटी थी। लूट और बलवा में तब भी औरतें और दौलत ही लुट के माल की फेहर‍िस्त में शामिल थे। इतिहास की लूटों की फेहरिस्त लिखी जाए, तो लाल स्याही खत्म हो जाएगी लेकिन सूची नहीं और उस समय की लूट में उस जमाने की सबसे चमक दमक #कोठेवाली #नसीमजान का कोठा भी लुटा...

बलवाई जब #नसीमजान के कोठे की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, तो ब्रजमोहन सबसे आगे था। बलवा हो या युद्ध, सबसे ज़्यादा लूटी जाती हैं #औरतों की अस्मत और हारे हुए लोगों की दौलत लेकिन उस दिन बलवाइयों को नसीम जान की अस्मत में दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें तो कोठे की चमक दमक चाहिए थी। यहीं ब्रजमोहन के हाथ लगा, #हाथीदांत का एक खूबसूरत #सिंघारदान।

नसीम जान ने पैर पकड़कर गिड़गिड़ाया-“ये मेरा पुश्तैनी सिंगारदान है, इसे छोड़ दो”
लेकिन जब शैतान हावी हो, तो इंसान सुनता नहीं। ब्रजमोहन ने छातियाँ काट देने की धमकी दी और सिंगारदान उसका हो गया। सिंगारदान घर आया। घर में बीवी और तीन बेटियां थीं और फिर जो हुआ, वो असली कहानी है..

#सिंघारदान स्वयं में ही बला का खूबसूरत था और उसका आईना ही घर का आईना बन गया। वो सभी को अपनी ओर खींचने लगा। खुद को निहारना सबकी आदत बना, फिर सजना ज़रूरत बना, फिर दिखना मकसद बन गया। चेहरे पर पाउडर बढ़ा, अदाएं बदलीं, निगाहें बदल गईं। बालकनी में खड़ी बेटियां अब जानती थीं कि कौन कौन सी हरकत किस किस को लुभाती है। बेटियां बदलीं, बीवी भी बदल गई। चाल, अंदाज़, तिल, काजल श्रृंगार- सब कुछ। घर के बाहर शोहदों की नज़रें टिकने लगीं और घर के अंदर ब्रजमोहन का वजूद मिटने लगा। एक दिन, सिंगारदान के आईने में नसीम जान मुस्कुराई और बोली...“घर में अब मेरा ही वजूद है।”

इस कहानी के अंत में ब्रजमोहन आंखों में सुरमा लगाए, कलाई पर गजरा लपेटे, गले में लाल रुमाल बांधे खड़ा है और अब वो अपनी बीवी और तीनों बेटियों का दलाल है।

अब आते हैं मुद्दे पर क‍ि, हम स्वयं में, सामाजिक रूप से व्यवहारिक रूप से आखिरकार हैं क्या ?? अरे ! हम हैं तो अपने विचारों के बंधक ही न। हमारे जैसे विचार होते हैं वैसी हमारी शख्सियत होती है और हमारे विचार न ऐसे ही बनते हैं, न ऐसे ही बदलते बल्कि उन्हें बदला जाता है... 

#शनै: शनै:, चुपके चुपके, धीमे जहर की तरह एक “सिंघारदान” के ज़रिये और आज का #सिंघारदान क्या है? घटिया कंटेंट भरी रीलें और निर्लज्जता भरे नग्न नृत्य। फूहड़ और अभद्र कॉमेडी वाले शो। शोर भरे अश्लील गाने। सस्ती फिल्मों की आड़ में परोसे जाते पोर्न। टीआरपी के चक्कर राष्ट्रीय चैनलों पर सामाजिक सरसता को तहस नहस करती बहसें। पाठ्यक्रम की निचले स्तर की वो किताबें जिन्हें पढ़ आज का बच्चा सिर्फ बर्बाद हो रहा है। इन सब में भी सर्वोपरि है लोकतंत्र में सत्ता के लोभ में परोसे जा रहे झूठे और मनगढ़ंत वो किस्से जो भारतीय संस्कार, संस्कृति, दर्शन और इतिहास को नेस्तोनाबूत कर रहे हैं।

आज हम प्रतिपल ऐसे ही सिंघारदान को अपने हाथ में सजाये घूम रहे हैं और उसी को अपना साथी, सहयोगी और मार्गदर्शक समझ रहे है। उन्हीं से प्राप्त शब्द और परिणाम हमारे आदर्श होते जा रहे हैं उन्हीं के कंटेंट को अपने दिमाग में जगह देते जा रहे हैं फिर हैरान होते हैं कि हमारी सोच क्यों बदल रही है ??

जैसे खराब खाना शरीर बिगाड़ता है, वैसे ही खराब कंटेंट दिमाग को खोखला करता है। फिर भी हम सुनते हैं उसी को, जो बकवास करता है। देखते हैं उसी को, जो मनोरंजन के नाम पर हमारे नस नस में हर तरह का अफीम भर रहा है।
क्यों? जब दुनिया में बेहतरीन किताबों और विचारों की कमी नहीं, तो हम कचरे में क्यों झांकते हैं, “सिंघारदान” को अपने दिमाग में जगह क्यों देते जा रहे हैं ?                      
#सवाल सीधा है कि आप अपने घर में क्या ला रहे हैं और अपने दिमाग में किसे बसने दे रहे हैं ? संक्रमण का काल है। खाद्य सामग्री से लेकर हमारी सोच तक सभी संक्रमित हो चुके है। अब इस देश और संस्कृति का भगवान ही मालिक है। परंतु जब जागो तभी सवेरा तो क्यों ना अपने घर अपने पर‍िवार से ही पुस्तकों को पढ़ने और पढ़ाने की शुरुआत की जाए...क्या ख्याल है आपका...। 

- Alaknanda Singh


शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही क्यों... क्यों शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता


 शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

शिवपुराण के अनुसार- 

अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत, इति वाचनान्तरात।

  • सोमसूत्र क्या है: शिवलिंग का वह हिस्सा, जहाँ से अभिषेक का जल नीचे प्रवाहित (गौमुख) होता है, उसे सोमसूत्र या निर्मली कहते हैं।

▪️सोमसूत्र : शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।

▪️ क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :- सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

▪️तब लांघ सकते हैं :- शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,लेकिन शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

▪️किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा :- भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें...

देवता की व‍िभ‍िन्न प्रदक्षिणाएं:

 इस संदर्भ में ‘कर्म लोचन’ नामक ग्रंथ में लिखा गया है कि- ‘एका चण्ड्या रवे: सप्त तिस्र: कार्या विनायके। हरेश्चतस्र: कर्तव्या: शिवस्यार्धप्रदक्षिणा।’ अर्थात दुर्गाजी की एक, सूर्य की सात, गणेशजी की तीन, विष्णु भगवान की चार एवं शिवजी की आधी प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

बेटी के सामने सरेआम फांसी पर लटके और मुस्कुराते प‍िता ने ही ल‍िख दी थी ईरान की बर्बादी की कहानी

ईरान की बर्बादी तो विधाता ने उसी दिन निर्धारित कर दी थी जब एक सोशल मीडिया पोस्ट के लिए एक पिता को उसकी बेटी के सामने सरेआम फांसी पर लटका दिया गया।

जहां पिता अपने अंतिम समय में अपनी बेटी की आंखों में आँखें डाल कर इसलिए मुस्कुराता रहा कि बेटी का हौंसला ना टूटे..!! किसे याद नहीं ये दृश्य और ऐसे कई सौ दृश्य जिन्होंने दुनियां के हर इंसान ( मुसलमानों को छोड़ कर) के कलेजे को कंपकपा दिए। जहां बुरका ना पहनने पर महिलाओं के बाल काट देना, नंगा घुमाने से लेकर पीट पीट कर इतना मारना कि महिलाओं का तड़प तड़प कर हॉस्पिटल में दम तोड़ देना..! जिस संस्कृति और संस्कारों में महिलाओं और बच्चों का इतना अपमान और शोषण हो उसका तबाह होना लाज़मी है अब बेंजामिन नेतन्याहू तो इनकी बर्बादी का माध्यम मात्र हैं..!!

ऐसे खुली बात मौत की सजा के इस खौफनाक मंजर की ईरान की इसी 9 साल की बच्ची ने एक डरावना स्केच बनाया और चर्चा में आ गई, स्केच में उसके पिता फांसी पर लटकते दिखाई दे रहे हैं. बच्ची के पिता को ईरान की अदालत ने मौत की सजा सुनाई गई थी. मानवाधिकार संगठनों ने चिंता व्यक्त की है क्योंकि इस साल ईरान में बड़ी संख्या में लोगों को मौत की सजा दी गई है. दर्दनाक स्केच-जब पिता को अंतिम बार देखा यह बेहद दुखद चित्र ईरान की महना अहमदी ने बनाया है, जिसमें उसके पिता हामिद को फांसी पर लटकाया जा रहा है, जबकि वह और उसकी मां यह सब देख रही हैं. इस दृश्य में, महना और उसकी मां एक फांसी के तख्ते के बगल में हाथ पकड़े खड़ी हैं, जिसके नीचे उसके पिता एक ब्लॉक पर खड़े हैंउसने यह चित्र अपने पिता को अंतिम बार देखने के इंतजार में बनाया है 2024 में 1,000 से ज़्यादा कैदियों को फांसी दी गई आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि 2024 में 1,000 से ज़्यादा कैदियों को फांसी दी गई. इनमें से 34 महिलाएं थीं और सात अपराध के समय 18 वर्ष से कम उम्र के थे साथ ही ईरान के राष्ट्रीय प्रतिरोध परिषद (NCRI) ने चेतावनी दी है कि असली आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा होने की संभावना है क्योंकि कई मौतों को गुप्त रखा जाता है NCRI के अनुसार, आधे से अधिक फांसी नशीली दवाओं से संबंधित दोषों के लिए थी कैसे सामने आई तस्वीर ईरान के राष्ट्रीय प्रतिरोध परिषद (एनसीआरआई) ने द सन को इस बच्ची की कहानी और उसका स्केच साझा किया हैसईद मसूरी नामक एक राजनीतिक कैदी के दिल दहला देने वाले पत्र में इस स्केच का जिक्र किया गया है, जिन्होंने ईरान की जेल में 25 साल बिताए हैं रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के नेता अली खमामेनेई के शासन में इस साल बड़ी संख्या में लोगों को फांसी दी गई है. सईद ने बताया कि अकेले इस क्रिसमस की अवधि के दौरान, लगभग 25 निर्दोष लोगों को फांसी दी गई, जो लगभग हर 2.5 घंटे में एक फांसी के बराबर है

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

इसे वो पढ़ें जो हर वक्त कहते हैं क‍ि ''क्या करें...फुरसत ही नहीं म‍िल रही''....


 

पहले ऊपर का च‍ित्र देख‍िए फ‍िर पढ़‍िए आज की ये पोस्ट...ये उनके ल‍िए है जो हर वक्त काम और काम से घ‍िरे रहते हैं..गोया ये कोई सफल होने की या यूं कहें क‍ि सफल होते द‍िखने की शर्त हो...तो इसे वो पढ़ें जो हर वक्त कहते हैं क‍ि ''क्या करें...फुरसत ही नहीं म‍िल रही''.... 

जब से आपने काम करना शुरू किया है, आपका दिमाग सालों से ओवरटाइम कर रहा है, तब भी जब आप छुट्टी पर होते हैं।

ज़्यादातर लोगों के लिए काम के बाद एक नॉर्मल शाम कुछ ऐसी होती है:

1- आपके बच्चे बातें कर रहे होते हैं।

2- आपका पार्टनर अपने दिन के बारे में बता रहा होता है।

3- आप सिर हिला रहे होते हैं, लेकिन आपका दिमाग अभी भी उस मीटिंग रूम में होता है।

और यह पैटर्न हर जगह आपका पीछा करता है जैसे क‍ि-  


- क‍िचेन में सब्ज़ियाँ काट रहे हैं मगर छूटी हुई डेडलाइन के बारे में सोच रहे हैं

- परिवार के साथ डिनर कर रहे हैं मगर मन ही मन अपने मैनेजर की कही बात दोहरा रहे हैं। 

- छुट्टी पर गए हैं परंतु  WhatsApp और ईमेल चेक करने से बाज नहीं आते, स्वयं से ही बहाना बनाते हैं क‍ि "बस ज़रा सा ही तो देखा है"  

- सोने की कोशिश करते हैं परंतु मन ही मन कल की स्लाइड डेक को एडिट कर रहे होते हैं 

- नहाते समय भी मन ही मन किसी कलीग से बहस कर रहे होते हैं।

बाहर से, आप ठीक दिखते हैं।

आपके पास नौकरी है, घर है, फ़ोन है, ज़िंदगी "ठीक-ठाक" दिखती है।

मगर अंदर, आपका नर्वस सिस्टम अपना स्विच ऑफ़ करना भूल गया है।

एक ऐसी कीमत है जो आपकी पेस्लिप पर कभी नहीं दिखती।

- आपका ध्यान।  आपकी नींद।

- जिन लोगों से आप प्यार करते हैं उनके साथ आपका सब्र।

- बिना कमाए खुशी महसूस करने की आपकी काबिलियत।

आपको लगने लगता है कि यह बस बड़ा होने जैसा है।

इसलिए आप शांत इशारों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

- जिस तरह आप छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाते हैं।

- जिस तरह छुट्टियां वैसी ही चिंता के साथ एक अलग जगह जैसी लगती हैं।

- जिस तरह आपका शरीर कभी हल्का महसूस नहीं करता, रविवार दोपहर को भी नहीं।

एक समय पर, यह काम के बारे में होना बंद हो जाता है। यह एक नर्वस सिस्टम बन जाता है जिसे अब याद नहीं रहता कि जब कुछ भी गलत न हो तो सुरक्षित कैसे महसूस किया जाए।

यह प्रोडक्टिविटी नहीं है। यह क्रोनिक सर्वाइवल है।

2025 में, पूरे भारत में 500 से ज़्यादा लोग जो अलग-अलग लेवल पर इसी तरह के रूटीन से गुज़र रहे थे, ऐसे लोगों को लेकर एक किताब आई है #RelaxPlayThrive , ज‍िसके ज़रिए एक पैटर्न देखा गया क‍ि अलग-अलग सैलरी, अलग-अलग शहर, अलग-अलग कहानियाँ हैं सबकी परंतु बदलाव के ल‍िए सभी लालाय‍ित हैं ।

दिमाग 24x7 काम कर रहा है, शरीर जिन्हें घर आना नहीं आता था। अच्छी खबर यह है कि आपका सिस्टम इसे फिर से सीख सकता है।

आपको दिन में सिर्फ़ पाँच से दस मिनट, छोटी-छोटी रेगुलर आदतें चाहिए, और ज़िंदगी अंदर से बाहर तक अलग लगने लगती है।

सबसे अच्छी बात यह है कि यह सब तब हो सकता है जब आप Relax Play Thrive खेलते हैं।


शनिवार, 3 जनवरी 2026

इंसान‍ी क्रूरता की गवाह यह तस्वीर #Epic है... वाह LepaRadić


 यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्त‍ि 7 मई, 1945 को हुई जब जर्मन सशस्त्र बलों ने मित्र राष्ट्रों के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण अगले दिन, 8 मई को प्रभावी हुआ मगर इस बीच प्रभाव‍ित लोगों ने इंसान‍ की क्रूरता का हर वो पहलू देख ल‍िया था ज‍िसके द‍िए जख्मों को आज जमाना बीत जाने के बाद भी नहीं भरा जा सका। इसीबीच एक तस्वीर सामने आई तो सोचा क‍ि इसे सभीे के साथ शेयर करूं।      

ह‍िटलरशाही के ख‍िलाफ खड़े रहकर फांसी का फंदा गले में डलवाने वाली #LepaRadić की है ये तस्वीर, वो  एक #Bosnian टीनेजर थी जिसे #WorldWarII के दौरान #Nazis को गोली मारने के लिए फांसी दे दी गई थी।

उसके आखिरी पलों में... ह‍िटलर की फौज ने उसके साथियों के नाम बताने के बदले उसकी जान बख्शने की पेशकश की। उसने मना कर दिया, और कहा: "मैं अपने लोगों की गद्दार नहीं हूं। जिनके बारे में तुम पूछ रहे हो, वे तब सामने आएंगे जब वे सभी बुरे लोगों को, आखिरी वाले तक, खत्म करने में कामयाब हो जाएंगे।"

यह लड़की, सिर्फ़ 17 साल की थी जब इसे मौत की सज़ा सुनाई गई। 

वो बोली- मैं चाहती हूं कि यह पता चले, और यह क‍ि मैं याद किए जाने की हकदार बनी रहूं, यह भी सच है क‍ि वह मौत से डरती थी, हां, लेकिन वह इतनी बहादुर थी कि उसने अपने देश के लोगों को धोखा देने के बजाय फांसी पर चढ़ना पसंद किया।

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

इन आठ कव‍िताओं से करें नववर्ष का स्वागत.. देश और व‍िदेश के कव‍ियों की रचनाओं का कलेक्शन


 नए की पर‍िभाषा क्या है, मुझे नहीं मालूम क‍ि इसे कैसे परि‍भाष‍ित करूं। सोचती हूं क‍ि जो बीत गया उसके बासीपन की बात करूं या जो अभी अभी आया है उसकी ताजगी पर कुछ ल‍िखूं ..तो क्या इतनाभर करने से नए को पर‍िभाष‍ित कर पाऊंगी... संभवत: नहीं.. क्योंक‍ि यह एक अहसास है जो नवागत से जुड़ी अनेक संभावनाओं पर ट‍िका है... इन्हीं संभावनाओं पर हमारे देश और व‍िदेश के कव‍ियों ने जो कुछ ल‍िखा, उसका कलेक्शन यहां नए साल पर अपने-अपने मायने दर्ज कराता हुआ द‍िखता है। तो आइये उन्हीं की नज़र से करें स्वागत नवागत का... 


कुछ आठ कव‍िताओं को मैंने नववर्ष के स्वागत के ल‍िए चुना है। 

1. नववर्ष का सर्वप्रथम कव‍ि सोहनलाल द्व‍िवेदी की कव‍िता से  2026 का स्वागत करें - 

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, नूतन-निर्माण लिये, 
इस महा जागरण के युग में 
जाग्रत जीवन अभिमान लिये; 

दीनों दुखियों का त्राण लिये 
मानवता का कल्याण लिये, 
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष! 
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति 
संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति 
की ज्वालाओं के गान लिये, 
मेरे भारत के लिये नई 
प्रेरणा नया उत्थान लिये; 

मुर्दा शरीर में नये प्राण 
प्राणों में नव अरमान लिये, 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

युग-युग तक पिसते आये 
युग-युग तक पिसते आये 
कृषकों को जीवन-दान लिये, 
कंकाल-मात्र रह गये शेष 
मजदूरों का नव त्राण लिये; 

श्रमिकों का नव संगठन लिये, 
पददलितों का उत्थान लिये; 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के 
सत्ताधारी साम्राज्यवाद के 
मद का चिर-अवसान लिये, 
दुर्बल को अभयदान, 
भूखे को रोटी का सामान लिये; 

जीवन में नूतन क्रान्ति 
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये, 
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!

2. दूसरे नंबर पर प्रकृत‍ि का संपूर्ण च‍ित्र उकेरती कव‍ि जगदीश व्योम की 'नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन' को पढ़ें ... अच्छा लगेगा 

आमों पर खूब बौर आए
भंवरों की टोली बौराए
बगिया की अमराई में फिर
कोकिल पंचम स्वर में गाए
फिर उठें गंध के गुब्बारे
फिर महके अपना चन्दन वन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !

गौरैया बिना डरे आए
घर में घोंसला बना जाए
छत की मुंडेर पर बैठ काग
कह कांव-कांव फिर उड़ जाए
मन में मिसिरी घुलती जाए
सबके आंगन हों सुखद सगुन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!

बच्चों से छिने नहीं बचपन
बच्चों से छिने नहीं बचपन
वृद्धों का ऊबे कभी न मन
हो साथ जोश के होश सदा
मर्यादित बनी रहे फैशन
जिस्मों की यूं न नुमाइश हो
बदरंग हो जाए घर आंगन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!

घाटी में फिर से फूल खिलें
फिर स्त्री के शिकारे तैर चलें
बह उठे प्रेम की मन्दाकिनी
हिम-शिखर हिमालय से पिघलें
सोनी मचले, महिवाल चले
रांझे की हीर करे नर्तन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !


विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
पर चले शांति के ही पथ पर
हिन्दी भाषा के पंख लगा
कम्प्यूटर जी पहुंचें घर-घर
वह देश रहे खुशहाल `व्योम'
धरती पर जहां प्रवासी जन

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !

3. तीसरे नंबर पर मैं सुप्रसिद्ध रूसी कवयित्री अन्ना अख्मातोवा की रचना देना चाहूंगी-  'नए साल का गीत' ज‍िसे बीसवीं सदी की वैश्विक कविता के प्रमुख स्वर के रूप में समादृत क‍िया गया। इसे कांता द्वारा ह‍िंदी में अनुवादि‍त कर 'पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव' के रूप में हमें सुलभ कराया गया। इसी संकलन से ली हुई नवर्ष पर ल‍िखी उनकी रचना  ये रही ...। 

बादल की छाया में थका चाँद,
धुँधली डालता है निगाह

पहाड़ी पर।
छह जनों के लिए लगी थी मेज़,

और ख़ाली थी सिर्फ़ एक जगह।
नए साल को आते देख रहे हैं

मेरे पति, मैं, और मेरे दोस्त।
रँगी हैं क्यों मेरी उँगलियाँ

जैसे ख़ून से?
ज़हर की तरह जलती क्यों शराब?

आकर्षक—जग—उठा मेज़बान
भरा हुआ ले कर गिलास।

पीता हूँ मैं धरती के लिए—
हमारे अपने वन क्षेत्रों से भरी—

स्थित हैं हम सब जहाँ।
एक दोस्त ने देखा मेरा चेहरा,

सहसा किया कुछ याद, प्रभु जाने, क्या,
और बोला ज़ोर से :

पीता हूँ मैं उसके गीतों के लिए,
जीवित हैं हम सब जिन में।

किंतु वह तीसरा, समझे बिना,
जैसे ही निकला बाहर अँधेरे में,

मेरे सोच का देते हुए जवाब, बोला :
पीना चाहिए हमें उसके लिए,

अभी तक नहीं है जो हमारे साथ।

4. चौथा नंबर आता है तेलुगू कव‍िता 'मन्मथावाहन' का... ज‍िसे रायप्रोलु वेंकट सुब्बाराव ने ल‍िखा और इसका ह‍िंदी में अनुवाद क‍िया है हनुमच्छास्त्री अयाचित ने ज‍िसे ' साहित्य अकादेमी' द्वारा पुस्तक : भारतीय कविता 1954-55 में प्रकाश‍ित गया।  

हनुमच्छास्त्री अयाचित (Hanumachchastri Ayachit) एक विद्वान और लेखक थे, जिन्होंने तेलुगु भाषा और साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया, खासकर हिंदी में 'तेलुगु और उसका साहित्य' नामक पुस्तक लिखी, जो तेलुगु साहित्य का एक परिचयात्मक अध्ययन है, जिसमें उन्होंने स्वयं को 'हनुमच्छास्त्री, अयाचित' के रूप में प्रस्तुत किया है।

तो लीज‍िए ये रही नववर्ष पर ल‍िखी 'मन्मथावाहन'-  

हे प्रभु!
हे नववर्ष मन्मथ!

इस नव वर्षारंभ के उत्सवों में
हमारे मनोरथ जब मधु मार्ग पर अग्रसर होते हैं,

तब प्रेम के साथ हम तुम्हारा आमंत्रण कर रहे हैं।
आओ न!

सरोवर की लहरों रूपी शीतल शय्याओं पर
झूमने वाले कमलों को भ्रमर-कन्याएँ

इस उष:काल में मंगलकारी काकली ध्वनियों से जगा रही है।
रसालों के अरुण पल्लव समूह

चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं
और इस समय मदमाते कोकिल

अपने मधुर कंठों से कलनाद की वर्षा
करते हुए झूम रहे हैं।

वन नटी के चरणों में जूही के फूल
ऐसी शोभा दे रहे हैं, मानो नवनीत के घुँघरू हों।

अशोक-पुष्पों से शोभित पृथ्वी पर
चैत्र पर्व के रसमय भोजन से आलसी बने हुए शुकों की

श्रुतिमधुर ध्वनियाँ
सरल कोमलता के साथ सुनाई दे रही है।

5. अब आते हैं पांचवें नंबर पर शानदार रचनाकार हरिवंशराय बच्चन पर... हालांक‍ि आज की ये उद्धृत रचना फ़ारसी कवि उमर ख़य्याम की रुबाइयों (चार पंक्तियों वाली कविताओं) से प्रेरित होकर लिखी थी, जहाँ 'मधुशाला' जीवन की अस्थिरता और क्षणभंगुरता के बीच प्रेम, ज्ञान और आनंद खोजने का प्रतीक बन जाती है, जिसमें मदिरा, साकी (परोसने वाला), प्याला और मधुशाला (शराबखाना) जीवन के दर्शन के रूपक हैं। पुस्तक का नाम : ख़य्याम की मधुशाला भाग 4 में उन्होंने नववर्ष पर कुछ यूं ल‍िखा- 

नई तरु-आभा, नवल समीर

जनाते, आया नूतन वर्ष,
जर्जरित इच्छाएँ भी आज

पा रहीं यौवन का उत्कर्ष।
मनीषी भोग रहे एकांत,

एक मधुऋतु उनके भी पास—
ज्वलित कर मूसा का तरु-ज्योति,

समीरण ईसा का उच्छवास।

6. छठवें नंबर पर मैंने बाबा नागार्जुन को रखा है- 'चंदू, मैंने सपना देखा ' शीर्षक से ल‍िखी गई ये कव‍िता नव वर्ष पर न पढ़ी जाये , ऐसा हो नहीं सकता। नामवर सिंह के संपादन में प्रतिनिधि कविताएँ के (पृष्ठ 46) पर बाबा ने चंदू के माध्यम से गागर में सागर भर द‍िया। 

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेक़ाबू

चंदू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, ख़ूब पतंगें लूट रहे हो

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर

चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो

चंदू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो

चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

7. सातवें नंबर पर राजस्थानी साहित्य में आधुनिक कहानी के प्रमुख हस्ताक्षर माने जाने वाले पेशे से शिक्षक रहे श्री साँवर दइया ने नव वर्ष पर पूरे 365 द‍िनों में हर रोज का बखान क‍ितने साधारण शब्दों में कहा है। आधुनिक भारतीय कविता संचयन राजस्थानी (1950-2010) (पृष्ठ 88) से ली गई ये रचना देख‍िए ज़रा---


पलस्तर उतरती दीवार पर

लटकाया जब नया कैलेंडर
छाती के सामने आकर खड़े हो गए

तीन सौ पैंसठ दिन।
मेरी / रोज़ छुलती साँस जानती है

कैसे कटता है एक-एक दिन
पिछले साल / न होली-दीवली लापसी

न सावन में सातू / ऋतुएँ बदलीं
और हमने भोगे परिणाम

मुट्ठी भर लोगों की / झूठी बातों में आया
वह हरामी का हाड़—हर्ष

कभी नहीं आकर खड़ा हुआ मेरे आँगन में
आज से फिर / मैं हूँ

और सामने हैं / ये तीन सौ पैंसठ दिन! 

8. आठवें नंबर पर रफ़ीक़ शादानी की पुस्तक 'जियौ बहादुर खद्दरधारी' के (पृष्ठ 39) से ली गई  ये रचना ''नवा साल आवा'' आपको गुदगुदाने के अलावा गहरा तंज़ करते हुए नए साल का नया पर‍िचय देती है। 

आँधी चली केतना भूचाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा

मनुस अपने अस्थान से हटि गवा जब
मुसाफिर कय गठरी गला कटि गवा जब

डकैती कय सामान सब बँटि गवा जब
पता नाहीं केहिकै टरंकाल आवा

तब जाइके ई नवा साल आवा।
सगरी बुराइन कय हद होइ गई जब

गरीबी कय फरियाद रद होइ गई जब
इन्सानियत केर भद होइ गई जब

स्वागत करै का जौ चंडाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।

असली भगत जौ करै तोर पूजा
ओका मिलै खाय का आलू भूजा

पंडित औ मुल्ला कय हय काम दूजा
वनहीं के हिस्से मा तर माल आवा

तब जाइके ई नवा साल आवा।
जाड़े कय मौसम दुहाई-दुहाई

बिलोकी मियाँ खाँय मुर्गा मलाई
नेता के कमरे मा गद्दा रजाई

सायर के हिस्से मा तिरपाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।

नववर्ष की शुभकामनाओं संग आज बस इतना ही... रील और मीम के इस ड‍िज‍िटल युग में इन्हीं शानदार रचनाओं के साथ व‍िचारों को बनाए रख‍िए... ।

- अलकनंदा स‍िंंह