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रविवार, 4 अगस्त 2019

जब मेंड़ ही खेत को खाने लगे तो खेत का अस्‍तित्‍व बचेगा कैसे?

जब कर्तव्‍य पर सिर्फ और सिर्फ पैसा हावी होने लगे और ”सरकारी नौकरी” इस बात की गारंटी हो कि बिना कुछ किए धरे भी तनख्‍वाह आपको मिल ही जाएगी तो वही होता है जो आजकल उत्‍तर प्रदेश के कमोवेश सभी सरकारी स्‍कूलों में हो रहा है। यहां मौजूद 90 प्रतिशत शिक्षक, शिक्षा व्‍यवस्‍था को इसी प्रकार पलीता लगा रहे हैं। यूं भी जब मेंड़ ही खेत को खाने लगे तो खेत का अस्‍तित्‍व ही कहां बचेगा। प्रदेश की शिक्षा व्‍यवस्‍था इसी तरह अपने अस्‍तित्‍व को मिटते देख रही है।
सृजनात्‍मकता, नवोन्‍मेष को धता बताते हुए शिक्षामित्र, बीटीसी, बीएड, डीएड, डीएलएड, टीईटी, सीटीईटी के माध्‍यम नौकरी प्राप्‍त लगभग दर्जनभर से ज्‍यादा तरह के पदों पर ”कार्य” करने वाले शिक्षकों की भरमार के बावजूद प्राइमरी शिक्षा को स्‍वयं शिक्षकों ने ही मजाक बनाकर रख दिया है।
बच्‍चे स्‍कूलों से नदारद हैं, शिक्षक स्‍कूल आ ही नहीं रहे और यदि आ भी रहे हैं तो कक्षाएं नहीं ले रहे। बच्‍चे पहाड़े, पीएम, सीएम , जिले का नाम, दिन व महीनों तक के नाम नहीं बता पा रहे। आखिर इसके लिए कौन जिम्‍मेदार है। सरकार इसके लिए जब तनख्‍वाह दे रही है तो यह जिम्‍मेदारी किसकी है।
पिछले लगभग दो हफ्तों से मथुरा जिला प्रशासन लगातार जिले के सभी सरकारी स्‍कूलों में चेकिंग कर रहा है, आख्‍या में अनुपस्‍थित शिक्षकों की तनख्‍वाह काटी जाने की संस्‍तुति भी एडीएम कर रहे हैं, एबीएसए, बीएसए द्वारा रेगुलर चेकिंग न करने की शिकायत लिखित में दे रहे हैं, परंतु कुछ भी काम नहीं आ रहा और स्‍कूलों में शिक्षकों की मनमानी अपने चरम पर है।
शिक्षकों की इस सीनाजोरी के लिए मीडिया भी उतना ही दोषी है क्‍योंकि जब-जब शिक्षकों के धरना प्रदर्शन होते हैं तो बड़ी सी हेडलाइन, इनकी दुर्दशा को लेकर छापते हैं या दिखाते हैं परंतु शिक्षा की इस तरह दुर्दशा करने पर उन्‍हीं शिक्षकों के खिलाफ मीडिया एक शब्‍द नहीं लिखता।
हर महीने बंधी-बंधाई तनख्‍वाह के बावजूद शिक्षामित्र, सहायक शिक्षक आदि पदों पर बैठे अकर्मण्‍य लोग, बच्‍चों को शिक्षित करना तो दूर स्‍वयं ही अनुशासन तोड़ने के बहाने ढूढ़ते रहते हैं। वेतन भत्‍तों के लिए मरने-मारने पर हर वक्‍त आमादा तथा बात-बात में हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट पहुंचने वाले इन ”कथित” ठेकेदार शिक्षकों के बूते प्रदेश की शिक्षा व्‍यवस्‍था अपनी दुर्दशा से नहीं निकल सकती।
एक कड़वा सच ये भी है कि शिक्षा व्‍यवस्‍था जिन कांधों पर चढ़कर दौड़नी चाहिए थी, वे सिर्फ इसे ढो रहे हैं। अपने ”हालातों” के चलते शिक्षा जैसे उच्‍च्‍तम मानदंड वाले क्षेत्र में ”नौकरी” कर रहे 90 प्रतिशत शिक्षकों में शिक्षा देने का जज्‍़बा पूरी तरह से गायब है। जो स्‍वयं ही शिक्षा के मायने नहीं जानते, उनसे भला बच्‍चों को शिक्षित करने की आशा कैसे रखी जाए।
बहरहाल, ये हालात चिंतनीय हैं क्‍योंकि करोड़ों के बजट के बाद भी रिजल्‍ट शून्‍य है। वक्‍त आ गया है कि अब सरकार को ड्रेस, बस्‍ते, जूते, मिड डे मील से आगे बढ़कर सोचना होगा ताकि सरकारी स्‍कूलों में पढ़ने आने वाले बच्‍चों के भविष्‍य के साथ खिलवाड़ न हो सके।
शिक्षकों से तो इतना ही कहा जा सकता है कि…
ख्वाहिशों का मोहल्ला बहुत बड़ा होता है..
बेहतर है हम ज़रूरतों की गली में मुड़ जाएं..और अपने कर्तव्‍य को निभायें।
-अलकनंदा स‍िंह

मंगलवार, 14 मई 2019

यूपी बोर्ड की शिक्षा कुव्‍यवस्‍था, बानगी बने 165 स्‍कूल

हमारे देश में शिक्षा का अधिकार कहता है कि शिक्षा सबके लिए हो, शिक्षा सर्वसुलभ हो, शिक्षा समाज के निचले पायदान पर बैठे व्‍यक्‍ति तक पहुंचे…मगर इस प्रक्रिया को पूरी करने वाली सबसे अहम कड़ी शिक्षक ही जब अपने कर्तव्‍य निर्वहन में भ्रष्‍ट और नाकारा उदाहरण पेश करते दिखाई दें तो इस अभियान का गर्त में जाना निश्‍चित है।
शिक्षा को व्‍यवसायिक और नौकरी का माध्‍यम मानकर चलने वाली सोच का ही नतीज़ा है कि यूपी बोर्ड के इंटरमीडिएट व हाईस्‍कूल रिजल्‍ट में प्रदेश के कुल 165 स्‍कूल का परिणाम शून्‍य रहा। प्रदेश के ये स्‍कूल कोशांबी, प्रयागराज, मिर्ज़ापुर, इटावा, बलिया, गाजीपुर, चित्रकूट और आजमगढ़ के हैं।
कोई सामान्‍य बुद्धि वाला व्‍यक्‍ति भी बता देगा कि रिजल्‍ट उन स्‍कूल का ही खराब रहा, जहां इस बार नकल के ठेके नहीं उठाये जा सके। इन ठेकों में शिक्षक व प्रधानाचार्यों से लेकर कॉपी चेकर्स और शिक्षा बोर्ड के आला अधिकारी भी हिस्‍सेदार हुआ करते थे। इस पूरी ठेकेदारी प्रथा के इतर शिक्षा किस हाल में हैं, ये तब पता लगा जब 165 स्‍कूल ने इस तरह ”नाम कमाया”।
सरकारी खानापूरी की तर्ज़ पर अब माध्‍यमिक शिक्षा परिषद इसका निरीक्षण-परीक्षण करेगा कि ऐसा क्‍यों हुआ, इन स्‍कूलों के प्रधानाचार्यों से जवाब तलब किया गया है, इसके बाद जांच कमेटी के विशेषज्ञ कारण तलाशेंगे, फिर निवारण सुझायेंगे, दोषी व्‍यक्‍ति व प्रतिकूल स्‍थितियों को लेकर ”फाइल ”बनेगी, कुछ नपेंगे कुछ को ”विशेष चेतावनी” देकर ”बख्‍श” दिया जाएगा।
इस पूरी कवायद में शिक्षा और बच्‍चों के भविष्‍य पर कोई कुछ नहीं बोलेगा। उक्‍त स्‍कूलों के शिक्षक तो खैर सोचेंगे भी क्‍यों। उन्‍हें बमुश्‍किल सड़कों पर आए दिन विरोध प्रदर्शन करके ये ”रोजगार” मिला है। लाठियां खाकर शिक्षक की ”नौकरी” हासिल हुई है। उन्‍हें शिक्षा के स्‍तर या बच्‍चों के भविष्‍य से कोई लेना देना नहीं होता जबकि पूरे साल इन स्‍कूलों में क्‍या पढ़ाया गया और किस तरह ये शर्मनाक स्‍थिति आई, इस पर सबसे पहले शिक्षकों को ही ध्‍यान देना चाहिए।
आए दिन ये दिवस…वो दिवस.. मनाने वाले हम लोग इंस्‍टेंट की अभिलाषा में गुरू से मास्‍टर और मास्‍टर से नकल माफिया तक आ चुके हैं। ऐसे में क्‍या हम अपने बच्‍चों से ये आशा कर सकते हैं कि वो सभ्‍य सुसंस्‍कृत बनेंगे, उन शिक्षकों को ”गुरू” मानते हुए परीक्षा में अव्‍वल आऐंगे जो स्‍वयं अच्‍छे शिक्षक भी नहीं बन पाए। जो ये शर्म महसूस नहीं कर पा रहे कि उनके स्‍कूल ”शून्‍य” कैसे रह गए। ये तो उन शिक्षकों व प्रधानाचार्यों को स्‍वयं सोचना चाहिए क्‍योंकि हर बच्‍चे का प्रदर्शन स्‍वयं उनकी काबिलियत का प्रदर्शन होता है। ऐसे में 165 स्‍कूल बानगी हैं कि शिक्षण कार्य में लगे कर्मचारी (सिर्फ गुरु ही नहीं) किस तरह हमारी प्रतिभाओं का नाश करने पर आमादा है।
शिक्षा कभी ज्ञान का पर्याय हुआ करती थी और गुरू को गोविंद (ईश्‍वर) से भी श्रेष्‍ठ पद प्राप्‍त था, लेकिन आज की शिक्षा व्‍यवसाय बन चुकी है और गुरू उस व्‍यवसाय का एक मोहरा। निजी स्‍कूलों में जहां इस व्‍यवसाय का रूप खालिस धंधेबाजी बन चुका है वहीं सरकारी स्‍कूलों में इसी के लिए नकल के ठेके लिए और दिए जाते हैं।
इन हालातों में सर्वशिक्षा का उद्देश्‍य पूरा भी कैसे किया जा सकता है। सरकारी मशीनरी और उसके टूल्स इतने निरर्थक हो चुके हैं कि उनकी उपयोगिता पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लग गया है।
शिक्षा को सबसे निचले पायदान तक पहुंचाना है तो इस क्षेत्र में लगी मशीनरी और उसके टूल्‍स का मुकम्‍मल इंतजाम करना होगा अन्‍यथा आज जो कहानी 165 schools की सामने आई है, वो कल 1650 की भी हो सकती है।
-अलकनंदा सिंंह