sita लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
sita लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 13 अगस्त 2014

नाटक: 'म्यूज़ियम ऑफ़ स्पीशीज़ इन डेंजर'

"कुंती ने हमारा सेक्स टाइमटेबल बनाया ताकि किसी भाई को कम या ज़्यादा दिन न मिलें."- द्रौपदी

असली प्रेमी कौन था? वो रावण जिसने उसकी हां का इंतज़ार किया या वो राम जिसने उस पर अविश्वास किया?-सीता


"पाँच पांडवों के लिए पाँच तरह से बिस्तर सजाना पड़ता है लेकिन किसी ने मेरे इस दर्द को समझा ही नहीं क्योंकि महाभारत मेरे नज़रिए से नहीं लिखा गया था!" बीईंग एसोसिएशन के नाटक 'म्यूज़ियम ऑफ़ स्पीशीज़ इन डेंजर' की मुख्य किरदार प्रधान्या शाहत्री मंच से ऐसे कई पैने संवाद बोलती हैं.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सहयोग से मंचित इस नाटक में सीता और द्रौपदी जैसे चरित्रों के माध्यम से महिलाओं की हालत की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है लेखिका और निर्देशक रसिका अगाशे ने.
रसिका कहती हैं, "सीता को देवी होने के बाद भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी और इसे सही भी माना जाता है लेकिन मेरा मानना है कि 'अग्नि परीक्षा' जैसी चीज़ें ही रेप को बढ़ावा देती हैं."
नाटक में शूर्पणखा पूछती है, "मेरी गलती बस इतनी थी कि मैंने राम से अपने प्यार का इज़हार कर दिया था? इसके लिए मुझे कुरूप बना देना इंसाफ़ है?"
शूर्पणखा सवाल उठाती है, "अगर शादीशुदा आदमी से प्यार करना ग़लत है तो राम के पिता की तीन पत्नियां क्यों थीं?"
रसिका कहती हैं, "16 दिसंबर को दिल्ली गैंगरेप के बाद इंडिया गेट पर मोमबती जलाने और मोर्चा निकालने से बेहतर यही लगा कि लोगों तक अपनी बात को पहुंचाई जाए और इसके लिए इससे अच्छा माध्यम मुझे कोई नहीं लगा."
नाटक में सीता का किरदार निभाने वाली प्रधान्या शाहत्री हैं, "सच से डरना कैसा? ये हमारा विरोध करने का तरीका है और हम जानते हैं, हम ग़लत नहीं हैं."
जब आस्था का मामला आता है तो घर परिवार से भी विरोध होता है. द्रौपदी की भूमिका निभाने वाली किरण ने बताया कैसे घर वाले उनसे नाराज़ हो गए थे.
रसिका का कहना था, "ये पहली बार नहीं है कि किसी ने द्रौपदी और सीता के दर्द को लिखने की कोशिश की है और उस वक़्त धर्म कहाँ जाता है जब किसी लड़की का रेप हो जाता है."
"कुंती ने हमारा सेक्स टाइमटेबल बनाया ताकि किसी भाई को कम या ज़्यादा दिन न मिलें." द्रौपदी जब मंच से ये संवाद बोलती हैं तो तालियां गूंज उठती हैं.
नाटक की सीता पूछती हैं, "लोग पूछेंगे कि सीता का असली प्रेमी कौन था? वो रावण जिसने उसकी हां का इंतज़ार किया या वो राम जिसने उस पर अविश्वास किया?"
सिर्फ़ हिंदू मान्यताओं पर ही छींटाकशी क्यों, इसके जवाब में वह कहती हैं, "हमने ये कहानियां बचपन से सुनी हैं. हमें ये याद हैं और इसलिए हम इसके हर पहलू पर गौर कर सकते हैं."
साभार -सुशांत एस मोहन

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे.....

आज रामनवमी है, भगवान श्रीराम का जन्‍म दिन। पौराणिक कथाओं के अनुसार आज ही के दिन भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह भी हुआ था।  श्रीराम के चरित्र को जानने के लिए समय-समय पर रचे गए महाकाव्‍यों की लंबी श्रृंखला है जिनमें वाल्‍मिकी रामायण और गोस्‍वामी तुलसीदास कृत श्री रामचरित मानस सर्वाधिक प्रचलित हैं। अन्‍य महाकाव्‍यों की तरह इन दोनों में भी भगवान श्री राम में रम जाने की सीख दी गई है ताकि उनके मर्यादा पुरुषोत्‍तम रूप का यथासंभव अनुकरण किया जा सके।
हम सोचते हैं कि आज श्रीराम जैसा विनम्र, दयावान और साहसी व्‍यक्‍तित्‍व धारण कर पाना कठिन है या उनके जैसा आचरण अपनाना किसी स्‍वप्‍न सरीखा है क्‍योंकि वो भगवान थे...अवतार थे...या मर्यादा पुरुषोत्‍त्‍म थे...इसलिए तमाम गुण उनमें स्‍वत: ही आ गये होंगे ...आदि आदि। मगर क्‍या कभी हमने सोचा है कि हमारे लिए श्रीराम जैसे आचरण कर पाना बिल्‍कुल असंभव भी तो नहीं। आखिर श्रीराम ने भी वह सब-कुछ मनुष्‍य रूप में किया और जिसका सीधा संदेश यही जाता है कि मनुष्‍य रूप में भी वह सब कर पाना संभव है। वह सब,जो मन की दृढ़ता और उसकी सहजता पर निर्भर है।
जो रम जाये वो राम, जो रम कर निर्मल हो जाये वो राम, जो निर्मल हो कर शिला को पानी की तरह कर दे... वो राम, जो पानी की तरह हर स्‍थिति में राह बना ले ... वह राम और जो स्‍वयं पानी-पानी हो सकने का हुनर पा ले... वो ही राम। राम तो हमारे मन में हैं, सोच में हैं, जीवन जीने के तरीके में है। राम स्‍वयं के भीतर रमने में है...राम स्‍व को पहचानने में है...चिंतन में है...मनन में है। इससे ज्‍यादा सहजता और निर्मलता क्‍या हो सकती है कि केवट, शबरी, अहिल्‍या में ही नहीं... राम तो ताड़का, मारीच, सूपर्णनखा से लेकर रावण के भी चिंतन में है।
विडंबना तो ये रही कि भारतीय कथाकारों की तरफ से ऐसे कोई प्रयास नहीं किये गये कि श्रीराम का चरित्र अतिशयोक्‍ति भरी धार्मिक कथाओं से ऊपर उठकर यथार्थ के धरातल पर उतर पाता और फिर घर-घर में राम का चरित्र बसता...हर घर में होता मार्यादाओं का पालन ...।देश, समाज और मन के अंदर तक आज जो विध्‍वंसक प्रवृत्‍ति तैर रही है उससे निजात पाने का यह सर्वाधिक सशक्‍त तरीका होता परंतु ऐसा हो ना सका । रचनाकारों ने श्रीराम को एक चरित्र की जगह भगवान के रूप में स्‍थापित किया लिहाजा रामनवमी के दिन हम श्रीराम को नैवेद्य चढ़ाकर त्‍यौहार तो मना लेते हैं मगर श्रीराम के चरित्र का अनुकरण करने से डरते हैं जैसे कि उनका अनुकरण करके भगवान से तुलना करने का पाप कर रहे हों। क्‍या ये श्रीराम के प्रति अनास्‍था का ही एक विकृत रूप नहीं कि हम उन्‍हें तो पूजें पर उनके चरित्र को अपनाने से दूर भागें...क्‍यों...?
श्रीराम को हम भगवान विष्‍णु का अवतार मानते हैं इसलिए मनुष्‍य रूप में किये गए उनके क्रिया-कलापों से लेकर चक्रवर्ती सम्राट बनने तक की यात्रा को चमत्‍कार मानते आये हैं परंतु ऐसा है नहीं। नियमों का पालन, सीखने की ललक, अपनाने की प्रवृत्‍ति और वचनबद्धता कुछ ऐसे गुण हैं जो स्‍वयं में किसी चमत्‍कार से कम नहीं । इसे यूं भी समझा जा सकता है कि श्रीराम जैसा अनुशासित व मर्यादित जीवन किसी को भी चमत्‍कारिक रूप प्रदान करने में सक्षम है। प्रकृत्‍ति के रक्षण, उससे तारतम्‍य बैठाकर चलने तथा रहने एवं सामाजिक समरसता के लिए वंचितों को गले लगाने का जो काम श्रीराम ने किया, उसे यदि आज भी अमल में लाया जाए तो रामराज्‍य स्‍थापित करना तथा रामचरित्र अपनाना बहुत कठिन नहीं होगा। यदि ऐसा कर पाये तो निश्‍चित ही श्रीराम को लेकर रची गई धर्मांधता से हम बाहर निकलेंगे और समस्‍याओं का निराकरण आसानी से कर पायेंगे।
निश्‍चित जानिए कि कोई अवतार ऊपर से नहीं टपकने वाला, हमें स्‍वयं ही रामचरित्र में इतना रमना होगा कि वह आत्‍मसात हो जाएं, हम बह जायें राम की उन सहजताओं में जो हर यु्ग एवं हर परिस्‍थिति में धरती को स्‍वर्ग बनाने की क्षमता रखती है।

- अलकनंदा सिंह 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

अनुत्‍तरित प्रश्‍नों में बिंधी 'जानकी'

सीताष्‍टमी पर विशेष- 


सभी परित्‍यक्‍ता स्‍त्रियों ने उन्‍हें आदर्श माना और वह सर्वथा पहली ऐसी स्‍त्री थीं जो वंचितों की मां बनीं...इसीलिए आज भी बुंदेलखंडी बेड़नियां उनकी कसम खाकर अपना धर्म निभाती रही हैं...आदिवासियों की वो देवी हैं । समाज के तिरस्‍कृत वर्ग में देवी और समाज के पूजित वर्ग में आदर्श स्‍त्री, एक साथ दोनों में सम्‍मान पाने वाली स्‍वयं में कितनी विशाल व्‍यक्‍तित्‍व रही होंगी, इसका अनुमान लगाना अत्‍यंत ही कठिन है।
जी हां, आज सीताष्‍टमी है। जनक की बेटी सीता, राम की पत्‍नी सीता, दशरथ की पुत्रवधू सीता और अग्‍निपरीक्षा देकर अपनी शुद्धता को सिद्ध करती सीता.. और अंत में अपने ही अंतस के संग अकेली रह गईं सीता का आज जन्‍मदिन है। वो सीता जो स्‍त्री-आदर्श की सोच है,आज ही जन्‍मी थी।
धरती की कोख में जन्‍मी और धरती में ही समाने वाली सीता को हम माता जानकी कहकर जहां भगवान श्रीराम की वामांगी के रूप में अपनी श्रद्धा उनके प्रति प्रगट करते हैं और देवी के रूप में आज भी हम उन्‍हें मर्यादाओं पर न्‍यौछावर होने वाली बता कर उनकी आराधना करते हैं। उन्‍हीं सीता के इस पूज्‍य दैवीय रूप के बावजूद हम आजतक अपनी बेटियों का नाम सीता रखने से कतराते रहे हैं।
आदिकवि वाल्‍मिकी द्वारा संस्‍कृत में रचे गए महाकाव्‍य 'रामायण' में रामकथा के माध्‍यम से पहली बार आमजन को सीता के उस रूप के भी दर्शन हुए जो श्रीराम से पहले और उनके बाद भी सीता के नितांत 'निजी व्‍यक्‍तित्‍व' की महानता दर्शाते हैं। संभवत: इसीलिए आमजन के बीच से उठने वाले प्रश्‍नों ने साहित्‍यकारों, कवियों को भी सीता के व्‍यक्‍तित्‍व की ओर आकृष्‍ट किया।
वाल्‍मिकी की 'रामायण' के कुल 24000 श्‍लोकों में राम की गाथा का जितना भी वर्णन है उन सब पर भारी पड़ता है अकेला 'सीता को राम के द्वारा दिया गया वनवास' । इसका सीध अर्थ यही निकलता है कि रामायण जैसे महाकाव्‍य का आधार स्‍तंभ रहे भगवान श्रीराम की पूरी की पूरी कथा सीता के बिना तो आगे बढ़ ही नहीं सकती, इसीलिए वाल्‍मिकी की रामकथा का अंत भी लव-कुश के जन्‍म, उनके पालन पोषण, शिक्षा और धर्म व मर्यादाओं का ज्ञान देने की सीता द्वारा एकल अभिभावक बनकर निभाई गई भूमिका पर जाकर अपनी कथा को समेट लेता है।
वाल्‍मिकी की रामायण से चली इस काव्‍य यात्रा में तुलसीदास की रामचरितमास, सीता समाधि, जानकी जीवन, अरुण रामायण, भूमिजा जैसे काव्‍यसंग्रह लिखे गये वहीं काव्‍य-नाटक अग्‍निलीक और प्रवाद पर्व, खंडखंड अग्‍नि आदि लिखे गये। इन सभी काव्य-नाटकों में सीता के अत्यंत उदात्त रूप को चित्रित करते हुए आधुनिक नारी के संघर्षमयी जीवन को उजागर किया है।
सीता के त्‍याग ने एक और बात साबित की कि किसी भी स्‍त्री के पूरे के पूरे अस्‍तित्‍व को आंकने के लिए उसके चरित्र को संदेहों से पाट देना हर युग में सबसे कमजोर कड़ी रहा है, और इस कसौटी पर स्‍वयं को निरंतर साबित करते रहना उसकी नियति । सीता के माध्‍यम से ही सही, यही चरित्र संबंधी कमजोर कड़ी त्रेता यु्ग में भी मौजूद रही जो वर्चस्‍ववादी मानसिकता को उजागर करती है। यूं भी जिन समाजिक व चारित्रिक आधारों ने दशरथपुत्र राम को पहले मर्यादा पुरुषोत्‍तम राम और फिर 'भगवान श्रीराम' तक के उच्‍चासन पर पहुंचाया जबकि एक राजपुत्र के लिए ये कोई कठिन कार्य भी नहीं था मगर एक भूमिपुत्री के लिए किसी सूर्यवंशी राजघराने की बहू बनना फिर त्‍याग व आदर्शों की स्‍थापना करना निश्‍चित ही चुनौतीपूर्ण रहा होगा और इसीलिए सीता स्‍वयमेव देवी बन गईं।
एक भूमिपुत्री के लिए आदर्श के नये नये सोपानों को गढ़ते हुये चलना , लांछनों को काटते हुये देवी के रूप में स्‍थापित होना 'भगवान' से कहीं ज्‍यादा चुनौतीपूर्ण, कहीं ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण रहा तभी तो 'सीता का वनवास' आज भी आमजन को श्रीराम पर उंगली उठाने से नहीं रोक पाता। स्‍त्रियों के लिए पति-पत्‍नी के आदर्श संबंधों की स्‍थापना वाली इस सदैव संघर्षमयी यात्रा का, सीता एक ऐसा स्‍तंभ बन गईं जिसे त्रेता की रामायण से लेकर आज तक अपनी यात्रा तय करनी पड़ रही है। सच में किसी देवी के स्‍त्री बनने और किसी स्‍त्री के देवी बनने की इस पूरी आदर्श प्रक्रिया में स्‍त्री स्‍वयं कहां खड़ी है, यह सीता के लिए भी अनुत्‍तरित था और आज भी।
बहरहाल, इन्‍हीं अनुत्‍तरित संदर्भों में से निकलकर हमारे लिए आज भी सीता वन्‍दनीय हैं, पूज्‍यनीय हैं क्‍योंकि वे हमारी प्रेरणा हैं, हम आज भी उन्‍हीं के स्‍थापित आदर्शों पर चलकर ये सिद्ध कर पा रहे हैं कि कम से कम भारतीय परिवारों की धुरी स्‍त्रियां ही बनी हुई हैं। कहना गलत न होगा कि यु्ग बदले.. दौर बदले..सूरतें बदलीं मगर स्‍त्रियों के अपने अस्‍तित्‍व को तोलने वाली सीरतें आज भी जहां की तहां खड़ी हैं, ऐसे में सीता हमारी मार्गदर्शक भी बनकर आती हैं।
कुछ प्रश्‍न शेष रहते हैं फिर भी...
कि क्‍या किसी स्‍त्री को धैर्यवान दिखाने के लिये वनवास जरूरी है, कि क्‍या अग्‍निपरीक्षा ही स्‍त्री की शरीरिक शुद्धता की कसौटी है,
क्‍या पति के साथ स्‍वयं को विलीन कर देना ही सतीत्‍व है,
क्‍या मन, वचन, कर्म की शुद्धता पर अग्‍निपरीक्षा अब भी देनी होगी.... आदि प्रश्‍न समाज से उठकर आज की सीताओं को मथ रहे हैं। देखें कि सोचों का ये वनवास कब अपना रूप बदलेगा।
कवि रघुवीर शरण मिश्र की 'भूमिजा' में सीता कहती हैं-
“मुझे अबला न समझो
क्रोध पीकर शांत रहती हूँ
अहिंसा हूँ स्वयं सह कर
किसी से कुछ न कहती हूँ!
भूमि की लाड़ली हूँ मैं
कलंकित मर नहीं सकती
कलंकित मर धरा का मुख
स्याह में भर नहीं सकती।''..

- अलकनंदा सिंह