हर साल 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस (World Book and Copyright Day) मनाया जाता है। यूनेस्को (UNESCO) द्वारा घोषित यह दिन पढ़ने, प्रकाशन और कॉपीराइट के महत्व को बढ़ावा देता है और साहित्यकारों को सम्मानित करता है। इसका उद्देश्य: साक्षरता को बढ़ावा देना और किताबों के माध्यम से ज्ञान को साझा करना है। ऐतिहासिक महत्व: 23 अप्रैल विलियम शेक्सपियर और मिगुएल सर्वेंट जैसे महान साहित्यकारों की पुण्यतिथि (और शेक्सपियर का जन्म दिवस भी) है। यह पहली बार 23 अप्रैल 1995 को मनाया गया था।
आज विश्व पुस्तक दिवस पर चौतरफा संदेश दिए जा रहे हैं कि किताबें खरीदें और पढ़ें परंतु रीलबाजों और एक्सपोजर की दुनिया में पढ़ने लिखने वालों को खोजना भूसे में सुई खोजने जैसा है। बहरहाल आज की इस स्थिति को ये कहानी बहुत अच्छी तरह से बयान कर रही है।
सिंघार-दान जैसा कि उर्दू में लिखा जाता है... हिन्दी में इसे श्रृंगारदान कहा जाता है। तो सिंघार दान #शमोएल अहमद की मशहूर कहानी है... जो आज की रीलबाजों की ज़िंदगी और उनके बौद्धिक उथलेपन तथा अराजक सोच को बखूबी जाहिर करती है।
इस अफ़साने में फ़सादात के बाद की इन्सानी सूरत-ए-हाल को मौज़ू बनाया है। सिंघार-दान जो नसीम जान (तवाइफ़ का मौरूसी सिंघार-दान था, के ज़रिए बृजमोहन के ख़ानदान की सोच और तर्ज़-ए-फ़िक्र को तिलिस्माती तौर पर तबदील होते दिखाया गया है।
तो #शमोएल_अहमद की मशहूर कहानी की पहली पंक्ति है और कहानी का लब्ब-ओ-लुबाब कुछ यूँ है कि जब दिल्ली में #नादिरशाह ने अपनी फ़ौज को खुली छूट दी थी, तब तीन दिन और तीन रात शहर पर क़यामत टूटी थी। लूट और बलवा में तब भी औरतें और दौलत ही लुट के माल की फेहरिस्त में शामिल थे। इतिहास की लूटों की फेहरिस्त लिखी जाए, तो लाल स्याही खत्म हो जाएगी लेकिन सूची नहीं और उस समय की लूट में उस जमाने की सबसे चमक दमक #कोठेवाली #नसीमजान का कोठा भी लुटा...
बलवाई जब #नसीमजान के कोठे की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, तो ब्रजमोहन सबसे आगे था। बलवा हो या युद्ध, सबसे ज़्यादा लूटी जाती हैं #औरतों की अस्मत और हारे हुए लोगों की दौलत लेकिन उस दिन बलवाइयों को नसीम जान की अस्मत में दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें तो कोठे की चमक दमक चाहिए थी। यहीं ब्रजमोहन के हाथ लगा, #हाथीदांत का एक खूबसूरत #सिंघारदान।
नसीम जान ने पैर पकड़कर गिड़गिड़ाया-“ये मेरा पुश्तैनी सिंगारदान है, इसे छोड़ दो”
लेकिन जब शैतान हावी हो, तो इंसान सुनता नहीं। ब्रजमोहन ने छातियाँ काट देने की धमकी दी और सिंगारदान उसका हो गया। सिंगारदान घर आया। घर में बीवी और तीन बेटियां थीं और फिर जो हुआ, वो असली कहानी है..
#सिंघारदान स्वयं में ही बला का खूबसूरत था और उसका आईना ही घर का आईना बन गया। वो सभी को अपनी ओर खींचने लगा। खुद को निहारना सबकी आदत बना, फिर सजना ज़रूरत बना, फिर दिखना मकसद बन गया। चेहरे पर पाउडर बढ़ा, अदाएं बदलीं, निगाहें बदल गईं। बालकनी में खड़ी बेटियां अब जानती थीं कि कौन कौन सी हरकत किस किस को लुभाती है। बेटियां बदलीं, बीवी भी बदल गई। चाल, अंदाज़, तिल, काजल श्रृंगार- सब कुछ। घर के बाहर शोहदों की नज़रें टिकने लगीं और घर के अंदर ब्रजमोहन का वजूद मिटने लगा। एक दिन, सिंगारदान के आईने में नसीम जान मुस्कुराई और बोली...“घर में अब मेरा ही वजूद है।”
इस कहानी के अंत में ब्रजमोहन आंखों में सुरमा लगाए, कलाई पर गजरा लपेटे, गले में लाल रुमाल बांधे खड़ा है और अब वो अपनी बीवी और तीनों बेटियों का दलाल है।
अब आते हैं मुद्दे पर कि, हम स्वयं में, सामाजिक रूप से व्यवहारिक रूप से आखिरकार हैं क्या ?? अरे ! हम हैं तो अपने विचारों के बंधक ही न। हमारे जैसे विचार होते हैं वैसी हमारी शख्सियत होती है और हमारे विचार न ऐसे ही बनते हैं, न ऐसे ही बदलते बल्कि उन्हें बदला जाता है...
#शनै: शनै:, चुपके चुपके, धीमे जहर की तरह एक “सिंघारदान” के ज़रिये और आज का #सिंघारदान क्या है? घटिया कंटेंट भरी रीलें और निर्लज्जता भरे नग्न नृत्य। फूहड़ और अभद्र कॉमेडी वाले शो। शोर भरे अश्लील गाने। सस्ती फिल्मों की आड़ में परोसे जाते पोर्न। टीआरपी के चक्कर राष्ट्रीय चैनलों पर सामाजिक सरसता को तहस नहस करती बहसें। पाठ्यक्रम की निचले स्तर की वो किताबें जिन्हें पढ़ आज का बच्चा सिर्फ बर्बाद हो रहा है। इन सब में भी सर्वोपरि है लोकतंत्र में सत्ता के लोभ में परोसे जा रहे झूठे और मनगढ़ंत वो किस्से जो भारतीय संस्कार, संस्कृति, दर्शन और इतिहास को नेस्तोनाबूत कर रहे हैं।
आज हम प्रतिपल ऐसे ही सिंघारदान को अपने हाथ में सजाये घूम रहे हैं और उसी को अपना साथी, सहयोगी और मार्गदर्शक समझ रहे है। उन्हीं से प्राप्त शब्द और परिणाम हमारे आदर्श होते जा रहे हैं उन्हीं के कंटेंट को अपने दिमाग में जगह देते जा रहे हैं फिर हैरान होते हैं कि हमारी सोच क्यों बदल रही है ??
जैसे खराब खाना शरीर बिगाड़ता है, वैसे ही खराब कंटेंट दिमाग को खोखला करता है। फिर भी हम सुनते हैं उसी को, जो बकवास करता है। देखते हैं उसी को, जो मनोरंजन के नाम पर हमारे नस नस में हर तरह का अफीम भर रहा है।
क्यों? जब दुनिया में बेहतरीन किताबों और विचारों की कमी नहीं, तो हम कचरे में क्यों झांकते हैं, “सिंघारदान” को अपने दिमाग में जगह क्यों देते जा रहे हैं ?
#सवाल सीधा है कि आप अपने घर में क्या ला रहे हैं और अपने दिमाग में किसे बसने दे रहे हैं ? संक्रमण का काल है। खाद्य सामग्री से लेकर हमारी सोच तक सभी संक्रमित हो चुके है। अब इस देश और संस्कृति का भगवान ही मालिक है। परंतु जब जागो तभी सवेरा तो क्यों ना अपने घर अपने परिवार से ही पुस्तकों को पढ़ने और पढ़ाने की शुरुआत की जाए...क्या ख्याल है आपका...।
- Alaknanda Singh



