रविवार, 9 दिसंबर 2018

कुटिल व्‍यक्‍ति का धर्मोपदेश ही हैं विचाराधीन कैदियों पर कोर्ट की चिंता

दो दिन पहले जागरण फोरम में देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था से जुडी ''महान-विभूतियों'' ने न्‍याय व्‍यवस्‍था की पेचीदगियों और देरी से न्‍याय होने पर बात तो की परंतु ये बिल्‍कुल ऐसा ही लगा जैसे कोई साहूकार कह रहा हो कि वह ब्‍याज नहीं लेगा। इन विभूतियों में पूर्व मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्‍टिस दीपक मिश्रा थे तो रिटायर्ड जस्‍टिस ज्ञानसुधा मिश्रा व पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी भी थे।

सच तो यह है कि कोलेजियम की बात पर सरकार को नाकों चने चबवाने वाले और मात्र रोस्‍टर पर अपनी साख को सरेआम उछालने वाले इन ''माननीयों'' के मुंह से अब ये बातें शोभा नहीं देतीं। उनके मुंह से न्‍याय व्‍यवस्था में सुधार, अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता या तीन तलाक व सबरीमाला पर निर्णयों को लेकर कही गई बातें ऐसी लगती हैं जैसे कोई कुटिल व्‍यक्‍ति धर्मोपदेश दे रहा हो।

हम सब भ्रष्‍टाचार और असमानता आदि के लिए यूं ही राजनेताओं को गरियाते रहते हैं जबकि  कौन नहीं जानता कि लाखों में तनख्वाह पाने और आलीशान सुविधाभोगी न्‍यायाधीशों को न तो करोडों मुकद्दमों के बोझ से लदी अदालतों की फिक्र है और ना ही उन बेचारों की जो इनकी कुटिलताओं का खामियाज़ा विचाराधीन कैदियों के रूप में भुगत रहे हैं। 

इसी हफ्ते खुद सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों की भारी-भरकम संख्या को लेकर चिंता जताई। इनके मामलों का जल्द निपटारा करने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा। जेलों की अमानवीय स्थितियों के लिए क्षमता से अधिक विचाराधीन कैदियों का होना बताया किंतु यह नहीं बताया कि ऐसा होगा किस तरह। किसी ठोस योजना के बिना क्‍या सुप्रीम कोर्ट अपनी मंशा को पूरा करा पाएगा। 

एक आंकड़े के अनुसार जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्‍या कुल कैदियों का करीब 67 प्रतिशत है। तो अब कौन यह बताएगा कि हुजूर आप ही तो हैं इस कुव्‍यवस्‍था को जन्‍म देने और इसे आगे बढ़ाने वाले। कौन बताए सुप्रीम कोर्ट को कि विचाराधीन कैदियों का ये अपार प्रतिशत आपकी इस ''न्याय प्रक्रिया'' से ही उपजा है।

निश्‍चित ही अब ऐसे विचाराधीन कैदियों को रिहा करने के बारे में कोई ठोस फैसला लिया जाना चाहिए जो छोटे-छोटे अपराधों के लिए सालों से सलाखों के पीछे हैं। जो जमानत राशि नहीं  चुका पाने अथवा जमानती का इंतजाम न कर पाने के कारण संभावित सजा की अवधि से भी अधिक समय अंदर गुजार चुके हैं। एक गणना के अनुसार उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ एवं उत्तराखंड में विचाराधीन कैदियों की संख्या सर्वाधिक है। तो सवाल किस पर उठना चाहिए ?

किसी आतंकी की फांसी पर रोक के लिए एक रात में केस निपटाने वाले इन्‍हीं माननीय न्‍यायाधीशों ने इस बारे में समीक्षा समितियों को अगले छह महीने तक सिर्फ मासिक बैठक कर राहत के उपाय खोजने को कहा है।

क्‍या अब समय नहीं आ गया कि अब उच्‍चतम न्‍यायालय, उच्‍च न्‍यायालयों या जिला अदालतों से भी सवाल किये जाएं और मुकद्दमों के निपटारे की समयसीमा तय की जाये। चूंकि अब सोशल मीडिया पर हर घटना-अपराध का क्षीर-नीर देर सबेर सामने आ ही जाता है और दोषी कौन, सुबूत किसके पक्ष में हैं या किसके खिलाफ साजिश हुई, यह तक चर्चा का विषय बनता है लिहाजा न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगना स्‍वाभाविक है।

रही बात अवमानना के डंडे की तो उसका भी डर अब लोगों के मन से निकलता जा रहा है। इसके ज्‍वलंत उदाहरण हैं सबरीमाला मंदिर पर दिया गया निर्णय और अयोध्‍या के मंदिर-मस्‍जिद मामले पर की गई गैरजरूरी टिप्‍पणी।

न्‍यायपालिका को अब समझना होगा कि धन और रसूख के बल पर तारीखों में अटकाने वाली कुव्‍यवस्‍था को दूर करने के लिए स्‍वयं उसे अपने लिए मानदंड स्‍थापित करने होंगे क्‍योंकि समय की कसौटी पर अब तो स्‍वयं न्‍यायाधीश और पूरी की पूरी न्‍यायप्रक्रिया भी है। न्‍यायप्रक्रिया को साबित करना है कि वह किस तरह निष्‍पक्ष रहकर समय रहते उचित फैसला सुना सकती है।

राजा और रंक के लिए कानून की अलग-अलग परिभाषाएं अब ज्‍यादा दिनों तक नहीं चल पाएंगी। विचाराधीन कैदियों पर ठोस उपाय के लिए समीक्षा समितियों को 6 महीने का समय देना बताता है कि न्‍यायव्‍यवस्था कितनी संवेदनशील है। यदि यही संवेदनशीलता है तो विधायिका और न्‍यायपालिका में फर्क कहां रह जाता है।

कुल मिलकर देखा जाए तो न्‍यायपालिका पर अब दोहरी जिम्‍मेदारी है। एक ओर उसे जहां विधायिका के दिन-प्रतिदिन गिरते स्‍तर को संभालना है वहीं दूसरी ओर आम आदमी में न्‍यायिक प्रक्रिया का भरोसा कायम रखना है, क्‍योंकि यदि देश के आम इंसान को यह आखिरी उम्‍मीद भी टूटती नजर आई तो तय जानिए कि लोकतंत्र के खतरे में पड़ने का जुमला सार्थक सिद्ध होने में ज्‍यादा समय नहीं लगेगा।

इस व्‍यवस्‍था पर न्‍यायाधीशों के चिंतन को कवि संजय पटवा जी के शब्‍दों में कुछ यूं कहा जा सकता है...

बंद कर दिया सांपों को सपेरे ने यह कहकर,
अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आ रहा है।

-सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

गधातंत्र, उल्‍लूतंत्र, गिद्धतंत्र और भीड़तंत्र

हम सब उस 'गधातंत्र' की बानगी बन गए हैं जो किसी एक शब्‍द, घटना या किसी एक बयान पर अपनी दबी हुई इच्‍छाओं की खोह से बाहर निकलते हैं और एक ऐसे 'उल्‍लूतंत्र' में तब्‍दील हो जाते हैं जो किसी की बात नहीं सुनते...बस एक हुजूम होता है...डरावना हुजूम। फिर यही उल्‍लूतंत्र, कुछ स्‍वार्थी तत्‍वों से जुड़कर एक 'गिद्धतंत्र' के रूप में हमें  निचोड़ता जाता है, वो भी इस तरह कि लोकतंत्र तो छोड़िए इंसानियत भी नहीं बचती।

यह तंत्र फिर 'भीड़तंत्र' में तब्‍दील होकर अपनी मनमानी करता हुआ वो सारी जायज़-नाजायज़ मांगें मनवाता जाता है जिसे अराजकता को पनपने का एक और मौका मिलता है और हम कठपुतलियों की भांति उनके पंजों में भिंचे तमाशाई बनकर रह जाते हैं।

इस मिले-जुले पूरे तंत्र को उजागर करती हैं दो घटनाएं जो कि मुआवजा मांगने से जुड़ी हैं। कल एक ओर जहां बुलंदशहर बवाल में मारे गएइंस्‍पेक्‍टर के परिजनों ने मुआवज़ा घोषित हो जाने के बावजूद ढेर सारी मांगें सरकार के सामने रख दीं तो दूसरी ओर इसी बवाल में मारे गए स्‍थानीय युवक के परिजनों ने भी मुआवजे के रूप में 50 लाख रुपये की मांग की। विरोध प्रदर्शन में शामिल मृतक युवक के पिता का कहना है कि निर्दोष युवक पुलिस की गोली से मरा इसलिए उसे भी मुआवजा चाहिए।

इंस्‍पेक्‍टर के परिजनों को मुआवजे की धनराशि के अलावा ज़मीन, इंटर कॉलेज, मुफ्त शिक्षा, पत्नी को नौकरी और चाहिए जबकि सब जानते हैं कि मारे गए इंस्‍पेक्‍टर सुबोध सिंह करोड़ों रुपए मूल्‍य की चल-अचल संपत्ति के मालिक थे। ये संपत्ति उन्‍होंने महज वेतन से तो एकत्र नहीं की होगी। इन्‍हीं इंस्‍पेक्‍टर के परिजनों को विभागीय पुलिसकर्मियों द्वारा एकदिन का वेतन देने की घोषणा अलग से की गई है। आगे और कहां कहां से धन इकठ्ठा होगा, अभी कहा नहीं जा सकता।

मुआवजे की इस रससाकशी के बीच दोषी कौन, निर्दोष कौन, यह बहस पीछे खिसक जाती है। पुलिस भी निर्दोष नहीं कही जा सकती क्‍योंकि उसने न तो उक्त संवेदनशील क्षेत्र में मुस्‍लिमों के इज्‍तिमा के लिए हुई गौकशी की शिकायतों को गंभीरता से लिया और ना ही मौके की नजाकत को भांपकर कदम उठाने की जरूरत समझी।

दूसरी ओर विरोध प्रदर्शन कर रहे युवकों ने हथियारों का प्रयोग करके अपना पक्ष कमजोर कर दिया। कुल मिलाकर क्षेत्र में पुलिस और गौ तस्‍करों के बीच पनपे संबंधों ने अराजक स्‍थिति बनाई और घटना इस भयावह रूप में बदल गई। इस तरह तो मुआवजे का हकदार कोई नहीं। न वो पुलिस जिसने समय रहते शिकायत पर गौर किया और न प्रदर्शनरी जिन्‍होंने कानून हाथ में लेकर सही-गलत का फैसला खुद कर लिया।

किसी मृतक के परिजनों की नियम विरुद्ध मांगों को किसी तरह उचित नहीं कहा जा सकता और उन मांगों को सरकारी धन की वर्षा करके पूरा करना भी जायज नहीं ठहराया जा सकता क्‍योंकि सरकारी पैसा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होती, वह अंतत: वह जनता का ही पैसा होता है। मृतक के प्रति सहानुभूति को उसके परिजन किस तरह भुनाते हैं, इसके अब एक आदि नहीं अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं। सरकारी खजाने को मुआवजे की रेवड़ियां बांटने वाली प्रवृत्‍ति से बचाना ही होगा।
ज़रा सोचिए कि यदि इसी धन का प्रयोग हम समाज को शिक्षित, सभ्‍य और सुसंस्‍कृत बनाने के लिए करें तो...क्‍या भीड़तंत्र से मुक्‍ति नहीं पा सकते। क्‍या लाश का सौदा करने या मुआवजे लेने व देने की राजनीति से छुटकारा नहीं पा सकते...जरूर पा सकते हैं और तब संभवत: कोई किसी को गधातंत्र, उल्‍लूतंत्र, गिद्धतंत्र और भीड़तंत्र में नहीं बदल पाएगा।
समाज शिक्षित होगा तो निश्‍चित ही वह अपने अधिकारों को तो समझेगा ही, साथ ही कर्तव्‍यों के प्रति भी जागरूक होगा। सभ्‍य, शिक्षित व सुसंस्‍कृत समाज किसी के बहकावे में नहीं आएगा तो भीड़तंत्र का हिस्‍सा नहीं बनेगा और समाज भीड़तंत्र का हिस्‍सा नहीं बनेगा तो बुलंदशहर जैसी अराजकता भी पैदा नहीं होगी।

-अलकनंदा सिंह

रविवार, 2 दिसंबर 2018

2 December: तीन दशक कम नहीं होते एक अभिशाप के साथ जीने के लिए

आज 2 दिसंबर पर राष्‍ट्रीय प्रदूषण दिवस मनाया जा रहा है, ये एक सिर्फ तारीख  भर नहीं है, बल्‍कि आज तीन दशक पहले घटे उस मंजर की भयावहता है जो तीन  पीढ़ियां गुजरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ रही। जी हां, भोपाल गैस त्रासदी के  बाद तीन तीन पीढ़ियां अपंगता के साथ साथ आज भी अपना अस्‍तित्‍व खोज रही  हैं। तीन दशक कम नहीं होते एक अभिशाप के साथ जीने के लिए या यूं कहें कि  जिंदा दिखते रहने के लिए।

जब जब भोपाल गैस त्रासदी की बात होगी तो सरकारी गैरजिम्‍मेदारी के साथ-साथ  समाजसेवी संगठनों की गालबजाऊ संस्कृति की भी बात होगी ही। क्‍योंकि राष्‍ट्रीय  व अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर इस त्रासदी को भुनाने के लिए तमाम समाजसेवी संगठन  वजूद में आ गए जिन्‍हें सिर्फ ''विचार विमर्श'' करने के नाम पर भारी अनुदान  मिला और तमाम देशी-विदेशी चिंतक अपनी चिंता से इस ''त्रासदी'' को भुनाने  लगे। इन्‍होंने गैस कांड के प्रभावित लोगों पर आई आंच को साल दर साल भुनाने,  और हर 2 दिसंबर को गोष्‍ठियां कर सत्‍तारूढ़ सरकार को गरियाने के अलावा कुछ  भी ऐसा नहीं किया जो प्रभावितों को सामान्‍य जीवन का अनुभव करा सके।

हर विषय को राजनीति और खांचों में बांट देने वाले हमारे देश की मौजूदा  स्‍थितियों में कम से कम अब तो लोगों को समझ लेना चाहिए कि अपनी लड़ाई  सदैव स्‍वयं ही लड़नी होती है। जो इस मुगालते में रहते हैं कि कोई कथित  सामाजिक संगठन उनका हित करेगा, वह अपना समय नष्‍ट करते हैं। तो यह  भ्रांति कम से कम अब उन्‍हें अपने दिमाग से निकाल देनी चाहिए क्‍योंकि इन  संगठनों के मुंह अनुदानों की हड्डी लगी हुई है। 

इस संदर्भ में सुभषितरत्नाकर का एक श्‍लोक मुझे बेहद सटीक जान पड़ रहा है ...

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि  न मनोरथैः  |
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे  मृगाः ||

अर्थात् परिश्रम करने से ही सारे कार्य सिद्ध हो सकते हैं, केवल सोचने से नहीं।  जिस प्रकार सोते हुए सिंह के मुँह में हिरण कभी अपने आप प्रवेश नहीं करता।  कहने का आशय यह है कि शेर के मुँह में अपने आप ही शिकार नहीं आता, उसे  शिकार करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। इस सुभाषित में उद्यमिता  के  महत्व को प्रतिपादित किया गया है...।

इसी तरह गैस त्रासदी की पीड़ित पीढ़ियों को सरकारों व एनजीओ की ओर देखना  छोड़ अब अपने लिए और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने ही स्‍तर पर  चौतरफा प्रयास करने होंगे। चाहे वो ज़मीन में घुसे प्रदूषणकारी कैमिकल्‍स को दूर  करने की बात हो, गलते शरीरों को संभालना हो या आर्थिक स्‍थिति की बात हो,  अब निर्भरता नहीं स्‍वयं का उद्यम करना होगा। देशी विधाओं के ज़रिए अपना  इलाज़ स्‍वयं करने के साथ साथ अपनी भावी पीढ़ियों को स्‍वयं उद्यम करके खड़ा  होने की ओर जाना होगा। बेचारगी को भुनाने वालों से सावधान रहना होगा।

आज तीन दशक बाद भी भोपाल गैस कांड पर प्रभावितों को समझना होगा कि जो  स्‍वयं अपनी सोच नहीं रखते अथवा अपने प्रयास नहीं करते, वे मोहरे तो बन  सकते हैं, स्‍वयंसिद्ध नहीं बन सकते। अपने अधिकार और  रहम के बीच जितना  फंसेंगे, उतना ही उबरने में देर लगेगी।

- अलकनंदा सिंह

 



गुरुवार, 25 अक्तूबर 2018

क्‍या याद है ईरान की रेहाना जब्बारी... जो #MeToo कहते-कहते अपनी लड़ाई हार गई, Death Anniversary आज

आज Death Anniversary पर याद करें रेहाना जब्बारी को जिसे 25 अक्टूबर, 2014 को तेहरान की एक जेल में फांसी दे दी गई
रेहाना जब्बारी…जी हां रेहाना जब्बारी ही नाम था उस लड़की का जो अपने बलात्‍कारी से खुद को बचाने में नाकाम भी हुई और अपने बलात्‍कारी की मौत के आरोप में गिरफ्तार भी कर ली गई और मौत के घाट उतार दिया गया।

2007 से 2014 तक चले इस मुक़दमे के बाद शनिवार, 25 अक्टूबर, 2014 को रेहाना को तेहरान की एक जेल में फांसी दे दी गई। माना जा रहा है कि रेहाना ने मौत के कुछ महीने पहले अपनी माँ के नाम एक ऑडियो संदेश भेजा था जिसे उन्होंने अपनी वसीयत भी बताया था। नेशनल काउंसिल ऑफ़ रेज़िसटेंस ऑफ ईरान ने उस संदेश का अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध कराया था, यह हिन्दी अनुवाद उसी के आधार पर किया गया है।
रेहाना जब्बारी के बारे में दुनिया को पहली बार 2007 में पता चला। तब उनकी उम्र महज 19 साल थी। उन्हें हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। रेहाना का कहना था कि ईरान के ख़ुफ़िया मामलों के मंत्रालय के पूर्व कर्मचारी 47 वर्षीय मुर्तज़ा अब्दुलाली सरबंदी ने उनका बलात्कार करने की कोशिश की थी और वो अपना बचाव भर कर रही थीं।
रेहाना को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपील की गई, प्रयास किए गए। सोशल मीडिया पर उन्हें मौत की सज़ा से बचाने के लिए अभियान चलाया गया लेकिन सब बेअसर रहा। ईरान सरकार पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा।
ईरान के क़िसास क़ानून के अनुसार जिस परिवार के व्यक्ति की हत्या हुई है वो चाहे तो हत्या के अभियुक्त की फांसी माफ़ कर सकता है। ऐसे में संबंधित व्यक्ति को कारावास की सज़ा होती है या अन्य प्रकार का हर्जाना देना होता है। मृतक के परिवार का मानना है कि रेहाना ने ये हत्या साजिशन की थी। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयतुल्लाह ख़ुमैनी भी रेहाना का मृत्युदंड माफ कर सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
यहां पढ़ें – रेहाना जब्बारी का अनुवादित संदेश उनकी माँ के नाम
प्यारी शोले
मुझे आज पता चला कि अब मेरी क़िसास की बारी आ गई है. मुझे इस बात कि दुख है कि आपने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि मैं अपनी ज़िंदगी की किताब के आख़िरी पन्ने तक पहुँच चुकी हूँ. आपको नहीं लगता कि मुझे ये जानना चाहिए था? आप जानती हैं कि मैं इस बात से कितनी शर्मिन्दा हूँ कि आप दुखी हैं. आपने मुझे आपका और अब्बा का हाथ चूमने का मौक़ा क्यों नहीं दिया?
दुनिया ने मुझे 19 बरस जीने का मौक़ा दिया. उस अभागी रात को मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी. उसके बाद मेरे जिस्म को शहर के किसी कोने में फेंक दिया जाता, और कुछ दिनों बाद पुलिस आपको मेरी लाश की पहचान करने के लिए मुर्दाघर ले जाती और वहाँ आपको पता चलता है कि मेरे साथ बलात्कार भी हुआ था. मेरा हत्यारा कभी पकड़ा नहीं जाता क्योंकि हमारे पास उसके जितनी दौलत और ताक़त नहीं है. उसके बाद आप अपनी बाक़ी ज़िंदगी ग़म और शर्मिंदगी में गुज़ारतीं और कुछ सालों बाद इस पीड़ा से घुट-घुट कर मर गई होतीं और ये भी एक हत्या ही होती.
लेकिन उस मनहूस हादसे के बाद कहानी बदल गयी. मेरे शरीर को शहर के किसी कोने में नहीं बल्कि कब्र जैसी एविन जेल, उसके सॉलिटरी वार्ड और अब शहर-ए-रे की जेल जैसी कब्र में फेंका जाएगा. लेकिन आप इस नियति को स्वीकार कर लें और कोई शिकायत न करें. आप मुझसे बेहतर जानती हैं कि मौत ज़िंदगी का अंत नहीं होती.
आपने मुझे सिखाया है कि हर इंसान इस दुनिया में तजुर्बा हासिल करने और सबक सीखने आता है. हर जन्म के साथ हमारे कंधे पर एक ज़िम्मेदारी आयद होती है. मैंने जाना है कि कई बार हमें लड़ना होता है. मुझे अच्छी तरह याद है कि आपने मुझे बताया था कि बघ्घी वाले ने उस आदमी का विरोध किया था जो मुझपर कोड़े बरसा रहा था लेकिन कोड़ेवाले ने उसके सिर और चेहरे पर ऐसी चोट की जिसकी वजह से अंततः उसकी मौत हो गयी. आपने मुझसे कहा था कि इंसान को अपने उसूलों को जान देकर भी बचाना चाहिेए.
जब हम स्कूल जाते थे तो आप हमें सिखाती थीं कि झगड़े और शिकायत के वक़्त भी हमें एक भद्र महिला की तरह पेश आना चाहिए. क्या आपको याद है कि आपने हमारे बरताव को कितना प्रभावित किया है? आपके अनुभव ग़लत थे. जब ये हादसा हुआ तो मेरी सीखी हुई बातें काम नहीं आयीं. अदालत में हा़ज़िर होते वक़्त ऐसा लगता है जैसे मैं कोई क्रूर हत्यारा और बेरहम अपराधी हूँ. मैं ज़रा भी आँसू नहीं बहाती. मैं गिड़गिड़ाती भी नहीं. मैं रोई-धोई नहीं क्योंकि मुझे क़ानून पर भरोसा था.
लेकिन मुझपर ये आरोप लगाया गया कि मैं जुर्म होते वक़्त तटस्थ बनी रही. आप जानती हैं कि मैंने कभी एक मच्छर तक नहीं मारा और मैं तिलचट्टों को भी उनके सिर की मूँछों से पकड़कर बाहर फेंकती थी. अब मैं एक साजिशन हत्या करने वाली कही जाती हूँ. जानवरों के संग मेरे बरताव की व्याख्या मेरे लड़का बनने की ख़्वाहिश के तौर पर की गयी. जज ने ये देखना भी गंवारा नहीं किया कि घटना के वक़्त मेरे नाख़ून लंबे थे और उनपर नेलपालिश लगी हुई थी.
जजों से न्याय की उम्मीद करने वाले लोग कितने आशावदी होते हैं! किसी जज ने कभी इस बात पर सवाल नहीं उठाया कि मेरे हाथ खेल से जुड़ी महिलाओं की तरह सख्त नहीं हैं, ख़ासतौर पर मुक्कबाज़ लड़कियों के हाथों की तरह. और ये देश जिसके लिए आपने मेरे दिल में मुहब्बत भरी थी, वो मुझे कभी नहीं चाहता था. जब अदालत में मेरे ऊपर सवाल-जवाब का वज्र टूट रहा था और मैं रो रही थी और अपनी ज़िंदगी के सबसे गंदे अल्फ़ाज़ सुन रही थी तब मेरी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया. जब मैंने अपनी ख़ूबसूरती की आख़िरी पहचान अपने बालों से छुटकारा पा लिया तो मुझे उसके बदले 11 दिन तक तन्हा-कालकोठरी में रहने का इनाम मिला.
प्यारी शोले, आप जो सुन रही हैं उसे सुनकर रोइएगा नहीं. पुलिस थाने में पहले ही दिन एक बूढ़े अविवाहित पुलिस एजेंट ने मेरे नाखूनों के लिए मुझे चोट पहुँचायी. मैं समझ गयी कि इस दौर में सुंदरता नहीं चाहिए. सूरत की ख़ूबसूरती, ख़्यालों और ख़्वाबों की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आँखों और नज़रिए की ख़ूबसूरती और यहाँ तक कि किसी प्यारी आवाज़ की ख़ूबसूरती भी किसी को नहीं चाहिए.
मेरी प्यारी माँ, मेरे विचार बदल चुके हैं और इसके लिए आप ज़िम्मेदार नहीं है. मेरी बात कभी ख़त्म नहीं होने वाली और मैंने इसे किसी को पूरी तरह दे दिया है ताकि जब आपकी मौजूदगी और जानकारी के बिना मुझे मृत्युदंड दे दिया जाए तो उसके बाद इसे आपको दे दिया जाए. मैं आपके पास अपने हाथों से लिखी इबारत धरोहर के रूप में छोड़ी है.
हालाँकि, मेरी मौत से पहले मैं आपसे कुछ माँगना चाहती हूँ, जिसे आपको अपनी पूरी ताक़त और कोशिश से मुझे देना है. दरअसल बस यही एक चीज़ है जो अब मैं इस दुनिया से, इस देश से और आपसे माँगना चाहती हूँ. मुझे पता है आपको इसके लिए वक़्त की ज़रूरत होगी. इसलिए मैं आपको अपनी वसीयत का हिस्सा जल्द बताऊँगी. आप रोएँ नहीं और इसे सुनें. मैं चाहती हूँ कि आप अदालत जाएँ और उनसे मेरी दरख़्वास्त कहें. मैं जेल के अंदर से ऐसा ख़त नहीं लिख सकती जिसे जेल प्रमुख की इजाज़त मिल जाए, इसलिए एक बार फिर आपको मेरी वजह से दुख सहना पड़ेगा. मैंने आपको कई बार कहा है कि मुझे मौत की सज़ा से बचाने के लिए आप किसी से भीख मत माँगिएगा लेकिन यह एक ऐसी ख़्वाहिश है जिसके लिए अगर आपको भीख माँगनी पड़े तो भी मुझे बुरा नहीं लगेगा.
मेरी अच्छी माँ, प्यारी शोले, मेरी ज़िंदगी से भी प्यारी, मैं ज़मीन के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं नहीं चाहती कि मेरी आँखे और मेरा नौजवान दिल मिट्टी में मिल जाए. इसलिए मैं भीख माँगती हूँ कि मुझे फांसी पर लटकाए जाने के तुरंत बाद मेरे दिल, किडनी, आँखें, हड्डियां और बाक़ी जिस भी अंग का प्रतिरोपण हो सके उन्हें मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और किसी ज़रूरतमंद इंसान को तोहफे के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग मिलें उसे मेरा नाम पता चले, वो मेरे लिए फूल ख़रीदे या मेरे लिए दुआ करे. मैं सच्चे दिल से आपसे कहना चाहती हूँ कि मैं अपने लिए कब्र भी नहीं चाहतीं, जहाँ आप आएँ, मातम मनाएँ और ग़म सहें. मैं नहीं चाहती कि आप मेरे लिए काला लिबास पहनें. मेरे मुश्किल दिनों को भूल जाने की आप पूरी कोशिश करें. मुझे हवाओं में मिल जाने दें.
दुनिया हमें प्यार नहीं करती. इसे मेरी ज़रूरत नहीं थी. और अब मैं इसे उसी के लिए छोड़ कर मौत को गले लगा रही हूँ. क्योंकि ख़ुदा की अदालत में मैं इंस्पेक्टरों पर मुक़दमा चलावाऊँगी, मैं इंस्पेक्टर शामलू पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं जजों पर मुक़दमा चलवाऊँगी और देश के सुप्रीम कोर्ट की अदालत के जजों पर भी मुक़दमा चलवाऊँगी जिन्होंने ज़िंदा रहते हुए मुझे मारा और मेरा उत्पीड़न करने से परहेज नहीं किया. दुनिया बनाने वाली की अदालत में मैं डॉक्टर फरवंदी पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं क़ासिम शाबानी पर मुक़दमा चलवाऊँगी और उनसब पर जिन्होंने अनजाने में या जानबूझकर मेरे संग ग़लत किया और मेरे हक़ को कुचला और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कई बार जो चीज़ सच नज़र आती है वो सच होती नहीं.
प्यारी नर्म दिल शोले, दूसरी दुनिया में मैं और आप मुक़दमा चलाएंगे और दूसरे लोग अभियुक्त होंगे. देखिए, ख़ुदा क्या चाहते हैं. ..मैं तब तक आपको गले लगाए रखना चाहती हूँ जब तक मेरी जान न निकल जाए. मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ.
रेहाना
01, अप्रैल, 2014
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह , Legend News

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

राम और रावण की आपबीती, रामलीला के बाद

अभी भी उनमें रोल वाला कुछ राम बाकी था तो कुछ रावण भी… परंतु डायलॉग थोड़े बदले बदले से थे… दोनों अभी तक कॉस्‍ट्यूम में थे… मंच की खुमारी और वास्‍तविकता के दरम्‍यां दोनों अब भी झूल रहे थे
एक महीने से रामलीला की जो तैयारियां जोरशोर से चल रही थीं, उसमें निराहार रहकर राम और रावण की भूमिका निबाहने वाले पात्रों ने पूरे नाट्य-रंग में अपनी धार्मिक कला उड़ेल कर रख दी थी, परंतु हर साल की तरह आज भी वे उसी चौराहे पर हैं…खाली हाथ, भूखे पेट और आयोजकों से पारिश्रमिक पाने की आस में, दो दिन बाद आने का आश्‍वासन लेकर अपने अपने घर जाने को विवश।
‘लीला’ का खोल अभी पूरी तरह से उतरा नहीं था। मैदान वाला रावण तो हजारों रुपये लगाकर फूंक दिया जाएगा मगर मंच से उतरे इन राम और रावण का क्‍या…बिना पारिश्रमिक के न राम के घर चूल्‍हा जलेगा न रावण के बच्‍चे त्‍यौहार मना पाऐंगे। इन चिंताओं में तैरते उतराते रामलीला मंच के बगल वाली गली में चाय की दुकान पर दोनों अपनी थकान मिटाने पहुंचे।
मंच का परदा गिरने के बाद अब श्रद्धा और घृणा को एकसाथ निबाहकर दोनों कैरेक्‍टर से बाहर रीयल लाइफ से दो-चार हो रहे थे। अभी भी उनमें रोल वाला कुछ राम बाकी था तो कुछ रावण भी… परंतु डायलॉग थोड़े बदले बदले से थे… दोनों अभी तक कॉस्‍ट्यूम में थे… मंच की खुमारी और वास्‍तविकता के दरम्‍यां दोनों अब भी झूल रहे थे, 
आप भी सुनिए राम और रावण की आपबीती के ये अंश…
रावण का वध करने वाले राम बोले – भाई लीला तो ख़त्म। अब क्या?
रावण बोले- यही सोच रहा हूँ, कि अब क्‍या ?
राम- सच कहूँ, अब थक गया ये लीला खेलते खेलते।
रावण- ये विष्णु जी और शिवजी जो ना करा दें, ये किया कराया तो सब विष्णु जी और शिवजी का है…एक सारस्‍वत ब्राह्मण को गत्‍ते-फूंस-पटाखे में दबवाकर बड़े खुश हो रहे होंगे दोनों।
राम- क्‍या बताऊं भाई, स्क्रिप्ट ही हमें ऐसी दे दी वरना तू ही बता…बता क्या मैं तुझे मारता?
रावण- बात तो स्‍क्रिप्‍ट की ही है भाई, वरना देवी सीता को मैं क्या अपने यहाँ लाता। शिव शिव शिव…(हाथ से क्षमारूप में दोनों कानों को छूता हुआ)
राम- तू भी तो जानता है कि मैं ही कहां सीता जी से इतना दूर रहने वाला था। और वो लव कुश…आज भी टीस होती है।
रावण- पता है भाई, मंदोदरी उस दिन कितना लड़ी थी मुझसे। और देख ना मेरा भी तो अपना बेटा, अपना भाई…।
राम- भाई दिक्कत तो ये है कि हमारे जरिये प्रभु जिन लोगों को शिक्षा देना चाह रहे थे, उन्होंने क्या सीखा?
रावण- आज तो दोनों ही गाली खा रहे हैं। देख ना, तू तो हीरो था, फिर भी तुझे कोसने से बाज नहीं आते लोग ?
राम- मुझे लगता है भाई, पर तेरे अच्छे दिन जरूर आ रहे हैं। पिछले कुछ सालों से लोग तेरे ही गुण ज्यादा गाते हैं। एकाध संस्‍थाएं भी बन गई हैं, चंदा उगाही करने को। वैसे कहते हैं कि रावण बुराई की खान था और कहीं किसी ने तो नेतागिरी के लिए अपना नाम ही रावण रख लिया।
रावण- ना रे, ऐसा कुछ नहीं है। एक आध गलती से सारे गुण कोई छुप जावें का ! बेवकूफ हैं जो ऐसा करते हैं। हर बात बेबात में कोई वाद ढूंढ़ लेते हैं और फिर विवाद करते हैं। बखान तो यूं देवें, जैसे खुद घणे संत ठहरे।
राम- ये तेरी भाषा को क्या हो गया भाई? बनियों की पैसे वाली रामलीलाएं देखकर तू भी वैसे ही बोलन लग गया।
रावण- अच्‍छा, जि बात है, अपनी भाषा भी तो देख ले भाई। चल छोड़ इसे, क्या तू तू और क्‍या मैं मैं, इसमें कुछ ना रक्‍खा।
राम- सच कहूँ मैं उसी दिन मर गया था, जब तू मरा था। रावण नहीं तो राम का क्या काम! पर भाई, ये बता जब मैंने बुराई का अंत कर दिया था तो फिर ये इतनी बुराई कहाँ से आ गयी? और तो और हर साल ही आ जाती है।
रावण- अब कई रावण हैं भाई। लोग होते रावण हैं, बनकर राम दिखाते हैं। कम से कम हममें ये होड़ तो ना थी। भाई गत्ते के पुतले फूंकना आसान है। अपनी भीतर की लंका कोई नहीं जलाना चाहता।
राम- पर विष्णु जी और शिव जी को क्या हो गया? वो क्यों नहीं कुछ करते।
रावण- बेचारे खुद भी हैरान परेशान हैं अब नीचे वालों की लीला देखकर। कोई नई लीला रचेंगे अब। पता है उस दिन दुखी होकर कह रहे थे, क्या नहीं था इस मनुष्य के पास। मुक्ति तक पहुंचने की ताकत केवल इसी के पास थी। सब सुख थे। फिर भी बेड़ा गर्क किया हुआ है अपना। और हमें भी दुखी करता है।
राम- बड़ा गुस्सा आता है भाई, हमारे नाम को बिगाड़ दिया इन धरती वालों ने।
रावण- मुझे तो केवल राम मार सकता था। लेकिन अब देख ना, मंच पर कैसे कैसे लोग तीर चला रहे मुझ पर।
राम- हाँ भाई, हम तो ऊपर और नीचे वालों की अलग अलग लीला में फंसकर रह गए हैं। जब जी चाहे अपने मतलब साध लेते हैं हमसे लोग।
रावण- नई रामायण रचनी पड़ेगी भाई। आज तुझे मेरे जैसा शरीफ रावण ना मिलेगा।
राम- सच्ची बात, बहुत ज्ञानी है तू भाई। मन से तो तू राम है मेरे भाई।
रावण- चल हम तो लीला कर रहे थे, पर इन नीचे वाले रावणों की कौन सी गति होगी?
राम- कुछ ना पता भाई। देखे जा, अब क्‍या क्या होगा।
रावण- भाई चल, अब जल्दी चलते हैं, ऊपर पूरा कुनबा इंतज़ार कर रहा होगा हमारा।
राम- हाँ भाई चल, ये कपड़े और ताम झाम सहन नहीं होते अब।
रावण- (दस सिर वाला मुकुट उतारकर रखते हुए) पता है उस दिन एक बच्चे ने देख लिया था, मुझे बिना मुकुट के, खींचकर पापा को लाया देखो दो दो राम, दो दो राम।
राम- अच्छा किया तूने तुरंत ये बुराई का मुकुट पहन लिया वरना मंच पर भसड़ फैल जाती।
रावण- चल भाई, चल। इन कपड़ों की तह करके वापस भी रखने हैं। अगली बार भी तो इन्हें ही पहनना है। और सुन इनमें फिनायल की गोली जरूर डाल देना वरना बनिया हमसे इसके पैसे भी वसूल लेगा…अभी तक गनीमत है कि चाय के पैसे नहीं वसूलता…।
एक लंबी अंगड़ाई लेते हुए दोनों उठे, चलने से पहले एक दूसरे के गले में हाथ डाले और शहरयार की ग़ज़ल का मुखड़ा बड़ी तरन्‍नुम में उठाया…और चल पड़े…
ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन सा दयार है
हद-ए-निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है
ये क्या जगह है दोस्तो…
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 17 सितंबर 2018

Junior Doctors: कौन कहता है कि ये …धरती पर दूसरे भगवान हैं

हम लोग अकसर यह सुनते हुए बड़े हुए हैं कि डॉक्‍टर तो धरती पर भगवान का दूसरा रूप होते हैं, परंतु होटल में शराब पीने से रोकने पर शनिवार रात को आगरा के Junior-Doctors ने जो हंगामा मचाया उसने उन्‍हें जनसामान्‍य से मिली इस उपाधि से तिलांजलि दिलवा दी।
तमाम अविश्‍वास अर्जित करके आमजन के दिलों से तो डॉक्‍टर्स पहले ही उतर चुके हैं, अब वे किसी भी स्‍तर का अपराध करने से नहीं चूक रहे। आगरा एस. एन. मेडीकल कॉलेज के Junior-Doctors ने तो चार कदम आगे बढ़कर ये साबित भी कर दिया।
यूं तो चिकित्‍सा क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों से पेशेगत संवेदनशीलता का अभाव और अधिक से अधिक पैसा कमाने की लिप्‍सा इस कदर सिर चढ़कर बोली है कि डॉक्‍टर अब भगवान तो दूर, उल्‍टे कसाई की भूमिका में आ गये हैं। निजी क्षेत्र के डॉक्‍टर्स की बात तो जाने दीजिये, वहां तो एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक किसी मरीज की जि़ंदगी पैसों से तोली जाती है।
बाकायदा पैकेज पर चल रहे निजी क्षेत्र के अस्‍पतालों को मरीज इंसान कम, कमर्शियल सब्‍जेक्‍ट अधिक नज़र आता है। निजी क्षेत्र में लोगों की सेहत का ”व्‍यापार” चला रहे इन डॉक्‍टर्स के अधिकारों और व्‍यापारिक हितों के लिए तो पूरी की पूरी एक संस्‍था है ”इंडियन मेडीकल ऐसोसिएशन” परंतु कभी इनके कर्तव्‍यों को लेकर या मानवीय हितों के लिए इस संस्‍था ने कुछ भी किया हो, ऐसा उदाहरण मेरी तो समझ में नहीं आता।
विश्‍वास ना हो तो किसी भी प्राइवेट अस्‍पताल, नर्सिंग होम, मल्‍टीस्‍पेशिएलिटी हॉस्‍पीटल जाकर वहां कतारबद्ध बैठे मरीजों और उनके तीमारदारों से पूछ कर देख लीजिए, पूरा व्‍यापार समझ में आ जाऐगा। खालिस गिव एंड टेक पर टिका निजी चिकित्‍सा क्षेत्र का ये उसूल कि जैसा पैसा दोगे, वैसा ही इलाज़ मिलेगा। इस पर हालांकि काफी कुछ पहले भी लिखा जा चुका है परंतु फिलहाल मामला आगरा मेडीकल कॉलेज के जूनियर डॉक्‍टर्स के आततायी होने का है।
डॉक्‍टरों के आतंक की हालिया घटना के अनुसार शनिवार देर रात आगरा के अशोका होटल में एक साथी डॉक्‍टर का जन्‍मदिन मनाने गए जूनियर डॉक्‍टर्स ने पहले तो बार बंद होने पर हंगामा किया, होटल स्‍टाफ से मारपीट की और फिर सूचना पर पहुंची पुलिस के साथ भी मारपीट कर पुलिसकर्मियों की वर्दी तक फाड़ दी व उनके स्‍टार्स नोंच दिए। इसके बाद गिरफ्तार किए गए जूनियर डॉक्‍टर्स को छुड़ाने के लिए दबाव बनाने को कल यानि रविवार के दिन उनके साथी डॉक्‍टर्स ने नारेबाजी करते हुए सैकड़ों मरीजों को मेडीकल कॉलेज से बाहर निकाल दिया। मरीज फुटनाथ पर सोने को विवश रहे, वे गिड़गिड़ाते रहे। इसी बीच एक बच्‍चे ने दम तोड़ दिया किंतु डॉक्‍टर्स नहीं पसीजे।
इतने पर भी जी नहीं भरा तो हड़ताल कर दी। अभी तक 25 जूनियर डॉक्‍टर्स जेल में हैं…आगे क्‍या होगा पता नहीं, परंतु असंवेदनशील जूनियर डॉक्‍टर्स की इस हरकत ने ये तो पक्‍का कर ही दिया कि अब ये रिवाज़ हर जनसामान्‍य पर खासकर उस वर्ग पर जो सरकारी चिकित्‍सा के भरोसे है, के लिए जानलेवा हो रहा है।
इससे पहले जुलाई में मानदेय को दोगना कर 65000 करने को लेकर पूरे मध्‍यप्रदेश के जूनियर डॉक्‍टर्स हड़ताल पर गए थे, इसी तरह बीआरडी मेडीकल कॉलेज गोरखपुर के जूनियर डॉक्‍टर्स ने सजर्री के औज़ारों से ही मरीजों व उनके तीमारदारों पर जानलेवा हमला कर दिया था…ये तो अभी-अभी के उदाहरण हैं।
इन जूनियर डॉक्‍टर्स के लिए ना तो एस्‍मा (आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून) का कोई अर्थ रह गया है और ना ही उस शपथ (Hippocratic Oath) का जो ज़िंदगी बचाने के लिए दिलवाई जाती है।
जूनियर डॉक्‍टर्स में स्‍थापित हो चुकी स्‍वार्थी प्रवृत्‍ति अब आपराधिक रूप में हमारे सामने है, इस पराकाष्‍ठा से हमें ही जूझना होगा। इसके लिए जरूरी है कि इन छद्म अपराधियों के लिए स्‍थापित परिभाषाएं बदली जाएं।
इन भगवानों की बदरंग सूरत को उजागर करके जनकल्‍याण के लिए नासूर बने इस पेशे की स्‍याह तस्‍वीर का पूरा सच सामने आना चाहिए वरना धरती के कथित भगवान कसाईखाने की मानिंद हर रोज हमारे टैक्‍स से हमें ही जिबह करते रहेंगे और हम…मुंह टापते रह जाऐंगे?
सोचना तो होगा ही…कि आगरा हो या गोरखपुर अथवा मध्‍यप्रदेश की घटनायें अब आगे और ना होने पायें।
-अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

My Lord, आप भी सोचिए कि मॉब लिंचिंग पर कानून की जरूरत ही क्‍यों पड़ी ?

सुप्रीम कोर्ट अकसर गंभीर मामलों पर ”स्‍वत: संज्ञान” लेता रहता है मगर आपने कभी सुना है कि उसने न्‍यायव्‍यवस्‍था के भीतर पनप चुके दलदल की बावत स्‍वत: संज्ञान लिया हो।
मुकद्दमों के अंबार, तारीख पर तारीख, विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा, अपीलों के चक्रव्‍यूह से जूझते आम आदमी की व्‍यथा पर उसने कभी स्‍वत: संज्ञान लिया हो। ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आता। कभी सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश क्‍यों नहीं दिया कि इस ”निश्‍चित समय” में ” इतने मुकद्दमे” हर हाल में निपटा ही दिये जाएं और नहीं निपटाने पर कोर्ट के सम्‍माननीय न्‍यायाधिकारियों को ”ठोस कारण बजाने के लिए तैयार” रहना होगा…या सुप्रीम कोर्ट ने कभी इस बावत स्‍वत: संज्ञान लिया कि क्‍यों उसके आदेश ज़मीन पर नहीं उतर पाते, क्‍यों वे सिर्फ बड़े लोगों और सरकारों द्वारा ”आड़” लेने के काम आते हैं।
अपनी इस ”स्‍वत:संज्ञानी” प्रवृत्‍ति की ओर सुप्रीम कोर्ट ने कभी नहीं सोचा, वरना जिस मॉब लिंचिंग के लिए वह सरकारों से कानून बनाने को कह रहा है, वह और कुछ नहीं स्‍वयं न्‍यायव्‍यवस्‍था के भीतर पैदा हो चुकी सड़ांध ही है जिसने कानून के राज पर से विश्‍वास हटा दिया है और लोग भीड़तंत्र के ज़रिए अपना फैसला स्‍वयं करने लगे हैं।
भीड़ में इकठ्ठे हुए लोग अब अपना आक्रोश दबा नहीं पा रहे बल्‍कि निकाल रहे हैं, कानूनों के अंबार में उन्हें न्‍याय की आशा अपने लिए कहीं दिखाई ही नहीं देती। जेलों में बढ़ती भीड़ न्‍याय व्‍यवस्‍था को अपने भीतर झांकने की चेतावनी देती रही है मगर इसे अनसुना ही किया जाता रहा। काश! इस अराजक स्‍थिति की ओर कभी सुप्रीम कोर्ट ने स्‍वत: संज्ञान लिया होता तो लोगों में आशा बंधती कि निश्‍चित समय में उन्‍हें न्‍याय मिल जाएगा और अपराधी को सजा।
कल जब सुप्रीमकोर्ट मॉब लिंचिंग पर अपने कथित ”कड़े-रुख” से सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा था, ठीक उसी समय बिहार के बेगूसराय में भीड़ ने चार हथियारबंद अपराधियों को उनके किये की सजा दे भी दी। ना तारीख… ना गवाह और फैसला ऑन द स्‍पॉट। यहां भीड़ ने उन चार में से दो को तो पीट-पीट कर ही मार डाला, तीसरे को पुलिस बचाकर ले गई और चौथा फरार हो गया। ये चारों बदमाश दो मोटरसाइकिलों पर हथियार लहराते हुए एक छात्रा को खोजते-खोजते न सिर्फ स्‍कूल तक जा पहुंचे बल्‍कि टीचर की कनपटी पर कट्टा रखकर धमकाने लगे। यह माज़रा देख बच्‍चों ने शोर मचाया तो पास ही खेतों में काम कर रही मजदूर-किसान महिलायें आईं और बदमाशों को घेर लिया। फिर पुरुषों द्वारा बदमाशों की पिटाई कर उन्‍हें उनके अंजाम तक पहुंचा दिया गया।
अब करते रहिये मॉब लिंचिंग पर बहस दर बहस, तलाशते रहिए भीड़ में से उन 8-10 लोगों को और ढूंढ़ते रहिए गवाह। अगर कानून बनाना ही है तो मॉब लिंचिंग से पहले स्‍वयं न्‍यायव्‍यवस्‍था के ”अलंबरदारों” को अपने लिए बनाना होगा ताकि आमजन में यह विश्‍वास जाग सके कि कोर्ट आधी रात को सिर्फ ”पहुंच वालों” के लिए ही नहीं खुलतीं बल्‍कि उन आमजनों के मामले निपटाने को भी गंभीरता से निपटाती हैं जो सालोंसाल कोर्ट-वकील-गवाह-तारीख-फैसला और फिर से अपील-तारीख-फैसला में ज़िंदगी जाया कर देते हैं। कई बार तो पीढ़ियां हो जाती हैं मगर न्‍याय नहीं मिलता, विचाराधीन रहते हुए ही जेलों में ही मर-खप जाते हैं।
यहां भीड़ के इस वहशियाने तरीके को जायज नहीं ठहरा जा सकता मगर आखिर ये अराजक स्थिति आई कैसे कि कानून पर विश्‍वास की बजाय लोग स्‍वयं फैसला करने लगे हैं। उन्‍हें कोर्ट के चक्रव्‍यूह से ज्‍यादा आसान लग रहा है भीड़ बनकर मामले को ‘निपटाना’। दरअसल जबतक हम समस्‍या की जड़ तक नहीं पहुंचेंगे तब तक इसके लिए कितने भी कानून बना लिए जायें, कुछ भी हासिल नहीं होने वाला क्‍योंकि कानून बना दिये जाने के बाद भी न्‍याय के लिए आना तो कोर्ट की शरण में ही पड़ेगा ना।
कोर्ट तक पहुंचने की लंबी प्रक्रिया और उसमें भी अगर सुबूत ना मिलें (या तलाशे ना जायें) तो अपराधी के हित में फैसला आने जैसी स्‍थितियां ही भीड़ को कानून अपने हाथ में लेने का कारक बनीं हैं।
हकीकत तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट की आत्‍ममुग्‍धता उसे न्‍याय व्‍यवस्‍था की इस सड़ांध को देखने ही नहीं दे रही। ये आत्‍ममुग्‍धता ही है कि सरकारों के खिलाफ आदेश पर आदेश देने में तो सुप्रीम कोर्ट रातदिन एक किये है मगर चरमराई न्‍याय व्‍यवस्‍था उसे दिखाई नहीं देती, और अब यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश आदेश सरकारी फाइलों में तो रहते हैं, ज़मीन पर दिखाई नहीं देते।
-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 5 सितंबर 2018

चेतन भगत ने नए अंदाज में किया नई किताब The Girl in Room 105 का खुलासा

चेतन भगत उन चंद युवा लेखकों में से हैं जो जानते हैं कि चर्चा में बने रहने के लिए कब, क्या और कैसे करना चाहिए। पिछले दिनों जन्माष्टमी पर उन्होंने अनोखे अंदाज में यह खुलासा किया कि उनकी नई किताब द गर्ल इन रूम 105 (The Girl in Room 105) के पात्र का नाम भी कान्हा के ही नाम पर है।
दरअसल, चेतन के हर उपन्यास में नायक का नाम श्रीकृष्ण के पर्यायवाची नाम पर है।
चेतन ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि हरि (five point someone), श्याम (one night @ the call center), गोविंद(3 mistakes of my life), क्रिश (2 states), गोपाल(Revolution 2020), माधव (Half Girlfriend) राधिका, ब्रजेश (One Indian Girl) और अब केशव…. मेरी सारी किताबों के नायक कृष्ण हैं, जन्माष्‍टमी की शुभकामनाएं…
अपनी नई किताब ‘द गर्ल इन रूम 105’ के लिए अपना चिरपरिचित बाजार तैयार करने के लिए वे इन हथकंडों को भी अपना रहे हैं। दरअसल अपने पाठकों से किताब का परिचय कराने के लिए चेतन ने बाकायदा इसका ट्रेलर लांच किया है। अभिनेता विक्रांत मैसी इस ट्रेलर में अपनी कहानी बता रहे हैं।
माना जा रहा है कि इस सबके पीछे फिल्म निर्माता मोहित सूरी का हाथ है। कहीं इस पर वेब सीरिज या फिल्म बनाने का इरादा तो नहीं है… पाठक समझदार हैं और वे चेतन से इस संबंध में तीखे सवाल भी कर रहे हैं। पाठकों ने चेतन को बधाई दी है तो कुछ ने उनके मार्केट स्ट्रेटजी पर तंज भी कसे हैं।
ट्रेलर देखने के बाद भगत का यह उपन्यास उनके पिछले रोमांटिक उपन्यास की तरह नहीं नजर आ रहा है। उन्होंने इसे एक अलग टैगलाइन ‘एन अनलव स्टोरी’ दी है।
क्या है कहानी
चेतन के इस उपन्यास की कथा केशव राजपुरोहित (निसंदेह, आईआईटी के पूर्व) के आसपास घूमती है, जो एक कोचिंग सेंटर में पढ़ाता है और अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड जारा को भुलाने की कोशिश कर रहा है।
जारा एक कश्मीरी मुस्लिम लड़की है, जबकि केशव संघ के एक बड़े नेता का बेटा है। कहानी का प्लॉट कश्मीर और आतंकवाद के आसपास का नजर आता है। चेतन ने अपनी किताब के बारे में लोगों के सवालों का जवाब देने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया। यह भी बताया कि पहले की तरह अपनी कहानी के लिए मुख्य किरदार का नाम कृष्ण के नाम पर ही रखा है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि उनकी किताब के ट्रेलर को काफी पसंद किया जा रहा है। यू-ट्यूब पर जारी इस ट्रेलर के नीचे आ रहे कमेंट मिलेजुले हैं। यहां एक तरह की जंग भी मिल रही है और चेतन को पसंद करने वाले पाठकों का प्यार भी…
यह किताब अक्टूबर में बाजार में आ जाएगी। लेखक का दावा है कि यह ‘चेतन भगत की चिरपरिचित लव स्टोरी से थोड़ी अलग है।

-Alaknanda Singh

रविवार, 19 अगस्त 2018

Rape संबंधी आरोपों के लिए नज़ीर पेश करता एक महिला जज का फैसला

किसी अपराध के लिए कानून बनने के साथ ही उसे ध्वस्‍त करने के तरीके भी ईज़ाद कर लिए जाते हैं। हमारे देश में कानून का दुरुपयोग कोई नया नहीं है और हमारे देश में ही क्‍यों दुनिया के सभी देशों में यही होता है तभी तो क्राइम दिनों-दिन अपने वीभत्‍स रूप में हमारे सामने आता रहता है।
समाजिक ताने-बाने को ध्‍वस्त किए बिना कानून का राज बनाए रखने में कार्यपालिका तथा न्‍याय पालिका का खासा योगदान होता है।
कहा भले ही जाता हो कि अधिकारी का कोई जेंडर नहीं होता मगर निर्णय देते समय न्‍यायिक अधिकारी का जेंडर अपराध के पीछे की सच्‍चाई को जानने में सहायक होता ही है। यह साइकोलॉजिकल कारण है, इससे मुंह नहीं फेरा जा सकता। वह पुरुष है तो भी और स्‍त्री है तो भी, तमाम दिमागी मकड़जालों के साथ वह अपनी विचारशक्‍ति से अपने निर्णय को तोलता है।
कोई न्‍यायिक अधिकारी अगर कानूनी लीक पर ही चलना चाहे तो बात अलग है, परंतु इन्‍हीं में से कुछ ऐसे भी होते हैं जो कानूनी धाराओं के साथ-साथ बदलते रिश्‍तों तथा मानवीय एवं सामाजिक कारणों को देखते हुए अपने निर्णय सुनाते हैं।
ऐसा ही एक निर्णय कल यमुनानगर/हरियाणा की क्राइम अगेन्‍स्‍ट वीमन की न्‍यायाधीश पूनम सुनेजा की अदालत से आया। मामला था 19 साल तक दुष्‍कर्म किये जाने का। न्‍यायाधीश सुनेजा ने कहा कि महिला के बयान विश्‍वास योग्‍य नहीं हैं। 19 साल तक आपसी सहमति से बने संबंध, दुष्‍कर्म की श्रेणी में नहीं आ सकते। व्‍यापारी के यहां घरेलू काम करने वाली महिला ने 19 साल तक दुष्‍कर्म का आरोप लगाते हुए कोर्ट से न्‍याय की मांग की थी जिसकी सुनवाई कर अपने 38 पेज के फैसले में न्‍यायाधीश ने व्‍यापारी को दुष्‍कर्म के आरोप से बरी कर दिया।
कोई सामान्‍य बुद्धि वाला व्‍यक्‍ति भी जान सकता है कि पीड़िता 19 साल तक कथित तौर पर दुष्‍कर्म करवाती रही और चुप भी रही, फिर अचानक उसका ज़मीर जागा और वह अदालत जा पहुंची न्‍याय मांगने।
गौरतलब है कि एंटी रेप लॉ में बिना किसी सुबूत के दुष्‍कर्म पीड़िता के बयान ही अपराध साबित करने के काफी माने गए हैं, बलात्कार जैसे अपराधों के खिलाफ कड़ी सजा के प्रावधान करने के मकसद से नए कानून में कहा गया है कि अपराधी को कड़े कारावास की सजा तक दी जा सकती है जो 20 साल से कम नहीं होगी और इसे आजीवन कारावास तक में तब्दील किया जा सकता है।
इस कानून से अपने हित साधने और टारगेट बनाकर पुरुषों को ब्‍लैकमेल करने के लिए भी महिलाओं को एक टूल की तरह इस्‍तेमाल किया जाता है, जिसके कारण कई बार वास्‍तविक पीड़िताओं को इसका खमियाजा भुगतना पड़ता है। ऐसा करने वाले अपराधियों और ब्‍लैकमेलर्स का एक माइंडसेट बन चुका है कि आरोप लगाओ और बिना सुबूत के किसी को भी ज़लील करवा दो। ऐसे में आरोपित व्‍यक्‍ति या तो ब्‍लैकमेल होता रहता है या फिर वह समझौता कर भारी राशि चुकाता है क्‍योंकि वह जेल जाने के साथ-साथ जलील नहीं होना चाहता।
हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण लगभग हर रोज आते हैं कि पीड़िताएं घर में अकेली होती हैं… उनके परिजन घर से बाहर होते हैं…नामजद लोग आते हैं… बारी बारी से तमंचे की नोंक पर दुष्‍कर्म करते हैं… धमकी देते हुए चले जाते हैं…पीड़िता भयवश आरोपियों के चले जाने के बाद भी चिल्‍लाती नहीं है…और फिर कई दिनों बाद कथित पीड़िता अपने पति या पिता के साथ जाकर पुलिस में केस दर्ज कराती है वह भी नामज़द…और नामज़दगी के कारण फिर शुरू होता है बारगेनिंग का सिलसिला…। ऐसे में कोई भी कह देगा कि इस पूरे घटनाक्रम में पीड़ता कितनी ”निरीह” थी।
ऐसा ही मामला था 19 साल से दुष्‍कर्म की कथित पीड़ित महिला का जिसमें न्‍यायाधीश पूनम सुनेजा ने तर्कशक्‍ति का सहारा लिया और सच में सही फैसला सुनाया। इसे एतिहासिक फैसला भी कहा जा सकता है।
दुष्‍कर्म विरोधी कानून से पहले हम दहेज विरोधी कानून तथा एससी/एसटी कानून का दुरुपयोग भलीभांति देख चुके हैं और समाज को इसका खामियाजा भुगतते भी देखते हैं। कितने परिवारों को इस कानून के दुरुपयोग की वजह से कंगाल होते और महिला तथा बच्‍चों तक को इसमें पिसते देखा गया है। अब समाज में दुष्‍कर्म के मामलों की अच्‍छी-खासी बढ़ोत्तरी बताती है कि महिलाओं के अबला एवं निरीह होने की जो तस्‍वीर सामने रखी जाती है, वह पूरा सच बयां नहीं करती। उसमें ‘छद्म’ की भी मिलावट बड़े पैमाने पर होती जा रही है, समाज में फैलते ”फरेब के इस नए एंगल” पर भी काम करना होगा अन्‍यथा जिस कानून को महिलाओं के लिए वरदान माना जा रहा है कल वहीअभिषाप साबित हो सकता है।
विश्‍वास की जिस धुरी पर टिककर महिला और पुरुष के संबंध समाज की रचना करते हैं, वह विश्‍वास ही पूरी तरह टूट गया तो समाज का छिन्‍न-भिन्‍न होना तय है। और समाज छिन्‍न-भिन्‍न हो गया तो बचेगा क्‍या। रिश्‍ते-नाते सब बेमानी हो जाएंगे, साथ ही बेमानी हो जाएगा यह कानून भी क्‍योंकि कानून का मकसद अंतत: सामाजिक समरसता कायम करना ही होता है न कि समाज का तोड़ना।
न्‍यायाधीश पूनम सुनेजा धन्‍यवाद की पात्र हैं कि उन्‍होंने 19 सालों की सहमति को बलात्‍कार मानने से इंकार कर दिया। किसी भी न्‍यायाधीश का फैसला अपने स्‍तर से एक नज़ीर पेश करता है और वह नज़ीर बहुत काम करती है। पूनम सुनेजा ने भी निश्‍चित ही एक ऐसी ही नज़ीर पेश की है।
- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 13 अगस्त 2018

कहने को तो वेश्‍या एक ऐसा शब्‍द है जिसे बोलने में माइक्रो सेकेंड ही लगते हैं मगर...

शब्‍दों की ताकत बताने वाली टिप्‍पणी



शब्‍दों का चयन सोच समझकर करना चाहिए, क्‍योंकि रोष में बोला गया एक भी घातक शब्‍द तलवार से भी ज्‍यादा भयानक वार कर सकता है और शब्‍द वाण से लक्षित व्‍यक्‍ति  (यदि वह निर्दोष है तो) का जीवन हमेशा के लिए बदल जाता है। हालांकि बोलने वाले को इसका अहसास भी नहीं होता कि उसने किस तरह एक समूचे व्‍यक्‍तित्‍व की हत्‍या करने का अपराध किया है। हद तो तब होती है जब शब्‍दवाण चलाने वाला स्‍वयं को ''सही-सिद्ध'' करने में लग जाता है। 

दक्षिण भारत का ऐसा ही एक मामला कल सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुना गया, जिसमें एक महिला द्वारा एक युवती को ''वेश्‍या'' कहने पर उस युवती ने आत्‍महत्‍या कर ली। सुप्रीम कोर्ट ने आत्‍महत्‍या के लिए उकसाने में दोषी महिला रानी उर्फ सहायारानी की सजा को बरकरार रखा और ''शब्‍दों की ताकत बताने वाली'' उक्‍त टिप्‍पणी की।

कहने को तो वेश्‍या एक ऐसा शब्‍द है जिसे बोलने में माइक्रो सेकेंड ही लगते हैं मगर ये एक समूचे वजूद को तिलतिलकर मारने के लिए अहिंसक दिखने वाला हिंसक तरीका है, इस एक शब्‍द में बोलने वाले की मानसिकता और उसके लक्ष्‍य का भलीभांति पता तो चल ही जाता है।

कम से कम में ज्‍यादा घातक वार करने वाला ये शब्‍द एक स्‍त्री के लिए कई चुनौतियां एकसाथ पेश करता है जिसमें सबसे कठिन चुनौती होती है स्‍वयं को निर्दोष साबित करना और इससे स्‍वयं को मुक्‍त करा पाना। इसकी सफाई में कहा गया एक-एक शब्‍द उसको झकझोर कर रख देता है। चारित्रिक दोष बताने वाला ये एक शब्‍द अक्सर बिना सुबूतों के ही अपनी प्रचंड मारक शक्‍ति से वार करता है। इससे जूझते हुए कुछ महिलाएं सामना करती हैं तो कुछ किसी सबक के रूप में लेती हैं और कुछ ऐसी भी होती हैं दिल पर ले बैठती हैं, जैसा कि उक्‍त मामले में सामने आया है।

निश्‍चित ही आत्‍महत्‍या करने वाली युवती वेश्‍या नहीं थी और ना ही उसकी ऐसी प्रवृत्‍ति रही होगी, तभी तो वह इस शब्‍द को सहन नहीं कर पाई और आत्‍मघात कर बैठी परंतु ऐसे शब्‍दवाणों को चलाने वालों से जूझना कहीं ज्‍यादा सही होता, बजाय इसके कि आत्‍महत्‍या कर ली जाये। किसी भी चारित्रिक दोष के आरोप से स्‍वयं को मुक्‍त करा पाना आसान नहीं होता, स्‍वयं को बार-बार तोलना पड़ता है। 

साइकोलॉजिकल थेरेपी में इस बात का ज़िक्र भी है कि जो लोग शब्‍दों के ज़रिए दूसरों को दुख पहुंचाने की मंशा रखते हैं, दरअसल वे स्‍वयं नकारात्‍मक सोच वाले और असुरक्षित होते हैं। इसी से ही वे इतना डर जाते हैं कि घातक शब्‍दों का सहारा लेते हैं ताकि कहीं कोई उनकी कमजोरी को ना समझे।

मेरा मानना तो ये है कि जो व्‍यक्‍ति अपने ही चरित्र व सुरक्षा को लेकर डरा होता है, उसी का दिमाग ढंग से नहीं सोच पाता और किसी कमजोर पर अपनी इसी सोच का ज़हर उगल देता है। जब यह सोच किसी महिला पर उड़ेली जाती है तब ''वेश्‍या'' कहना किसी को गरियाने के लिए सबसे आसान है।

कम से कम दूसरों को पराजित करने के लिए चारित्रिक दोष जताने वाले शब्‍दों से तो बचा ही जाना चाहिए वरना परिणाम ऐसे ही होते हैं, जिनके बारे में अब सुप्रीम कोर्ट को बताना पड़ रहा है कि शब्‍दों की मार सबसे भयानक होती है। शब्दों की ताकत, तलवार और गोली की ताकत से अधिक होती है।

अब हमें सोचना होगा कि समाज में अपनी ताकत दिखाने के लिए अपशब्‍दों का सहारा न लिया जाए क्‍योंकि अपशब्‍द किसी की जान भी ले सकते हैं और सुप्रीमकोर्ट की सुनवाई का आधार भी बन सकते हैं।

शब्‍दों की मारक क्षमता निश्‍चित तौर पर किसी भी हथियार से ज्‍यादा घातक होती है इसलिए शब्‍दों का सही चयन न सिर्फ बहुत से विवादों से बचाता है बल्‍कि आपके संस्‍कारों का भी परिचायक होता है।

शायद ही किसी को इस बात में संदेह हो कि शालीन शब्‍दों का प्रयोग करके भी अपनी बात पूरी ताकत के साथ कही जा सकती है। जरूरत है तो बस अपने शब्‍दों पर और उन शब्‍दों में निहित शक्‍ति को समझने की।

-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 8 अगस्त 2018

सुप्रीम कोर्ट दुखी है…

सुप्रीम कोर्ट दुखी है…मुज़फ्फ़रपुर शेल्‍टर होम कांड के बाद देवरिया से आई भयानक खबर से त्रस्‍त है वह… कि देशभर में यह क्या हो रहा है, लेफ्ट, राइट और सेंटर…सब जगह रेप हो रहा है, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार हर छह घंटे में एक लड़की का रेप हो रहा है। देशभर में प्रति वर्ष 38 हजार से ज्यादा रेप हो रहे हैं। देश में सबसे ज्यादा रेप मध्य प्रदेश में हो रहे हैं, दूसरा नंबर यूपी का है…आदि-आदि।
तो आज बात इस पर होनी चाहिए कि आखिर क्‍यों जरूरत पड़ी शेल्‍टर होम्स की, क्‍यों शेल्‍टर होम्स जैसी सरकारी या सरकार से सहायता प्राप्‍त व्‍यवस्‍थाएं इतनी बदहाल हैं कि हालात की मारी अबलाओं को आश्रय की जगह नर्क भोगने पर मजबूर होना पड़ता है। यहां पहुंचने वाली लड़कियां चाहे जवान हों, या नन्‍हीं बच्‍चियां, किशोरवय हों या अधेड़ महिलाएं, और यहां तक कि वृद्धाएं ही क्‍यों न हों, सभी आहत होती हैं। शारीरिक बल के साथ इनका आत्‍मबल भी काफी हद तक टूट जाता है। धन पास नहीं होता और अपनों से बेज़ार होती हैं। आखिर वे सब इस दशा तक पहुंचती कैसे हैं।
कहने को तो घर वालों का दुर्व्‍यवहार पहला कारण बताया जाता है मगर इस दुव्‍यर्वहार की जड़ों में जायें तो समाज की ढहती व्‍यवस्‍थाएं असली वजह हैं।
वृद्धाश्रमों की तरह ही शेल्‍टर होम खोलने की जरूरत तब पड़ी जब समाज ने अपना दायित्‍व निभाना छोड़ दिया। समाज की संरचना का औचित्‍य ही यदि पीछे छूटने लगे तो ऐसी स्‍थितियां पैदा होना स्‍वाभाविक है। समाज किसी एक व्‍यक्‍ति का नाम नहीं, बल्‍कि समूह में, समूह के लिए, समूह के द्वारा स्‍थापित कुछ ऐसे मानदंड हैं जो सबके लिए एक जैसे हैं। समाज की एक भी कड़ी कमजोर पड़ते ही सारी व्‍यवस्‍थाएं ध्‍वस्‍त हो जाती हैं। फिर ये कमजोर कड़ी ही शेल्‍टर होम और वृद्धाश्रमों को जन्‍म देती हैं। यदि समाज अपनी जिम्‍मेदारी निभाता तो शेल्‍टर होम बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। ज़रा सोचिए कि क्‍योंकर कोई भी अपनों को छोड़कर आएगा। मानसिक दिव्‍यांग महिलायें हों, किसी के प्‍यार में पड़कर घर छोड़ देने वाली लड़कियां हों या परिजनों की मार से बचने को घर से भागे लड़के हों।
इन सभी के साथ एक बात समान है कि अपनों से मिली ‘अनदेखी’ ने उन्‍हें सरकारी अथवा गैर सरकारी टुकड़ों पर पलने को विवश कर दिया जिसका फायदा संस्‍था के संचालकों ने उठाया क्‍योंकि सरकारी व्‍यवस्‍थाएं उस अंधी सुरंगों की तरह हैं जहां घुसने के बाद वापसी का कोई रास्‍ता होता ही नहीं। यदि होता भी है तो वो इतना संकरा और दूरूह होता है कि उसमें से निकल पाना, हर किसी के बस की बात नहीं होती।
इसके लिए लंबी व जटिल कानूनी प्रक्रिया ही असली जिम्‍मेदार है। हर कथित समाजसेवा के लिए निवाला बांटने वाली हमारे सरकारें कभी यह देखना ही नहीं चाहतीं कि किसी महिला का पहला निष्‍कासन भले ही ”सामाजिक निष्‍क्रियता” के चलते उसके घर से होता हो मगर पूरी तरह हताश व निराश वह सरकारी प्रक्रिया के कारण ही होती हैं। सरकारी अमले से लेकर कोर्ट-कचहरी तक उसे ऐसी मानसिक व शारीरिक यातनाएं देते हैं कि उसके पास उनसे समझौता करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। ज़रा-ज़रा सी बात पर आधी रात को प्रभावशाली लोगों की सुनवाई करने वाले न्‍यायाधीश महिलाओं के साथ हो रहे अत्‍याचार पर पानी सिर के ऊपर आने का इंतज़ार करते हैं। समाज की तरह ही इन माननीयों के पास तमाम बहाने हैं। सरकारों को इस मामले में लापरवाही के लिए फटकार लगाने वाली न्‍याय व्‍यवस्‍था ”न्‍याय में देरी के लिए” अपनी ओर से कोई कदम नहीं उठा रहीं। इसके लिए वह भी सरकार का मुंह देखती है। सरकार से न्‍यायधीशों के हितों का टकराव अब कोई नई बात नहीं रह गई।
नतीजा ये कि निराश्रितों को उनके घर भेजने में व्‍यवस्‍था को इतना समय लग जाता है कि तब तक कोई सेक्‍स रैकेट संचालक, कोई मानव तस्‍करी में लिप्‍त गिरोह उन्‍हें अपना शिकार बनाने में कामयाब हो जाता है।
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि आधी आबादी को घर से बेघर करने के लिए पहले परिवार और फिर आसपास का ”प्रश्‍न ना करने वाला” निष्‍क्रिय समाज तो दोषी है ही, सरकारी व्‍यवस्‍थाएं और न्‍यायपालिका की लेट-लतीफी भी उतनी ही जिम्‍मेदार है। ऐसे हर घटना का ठीकरा सरकारों के सिर फोड़ने से पहले अदालतों को अपने गिरेबां में एकबार अवश्‍य झांक लेना चाहिए।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा कल मुजफ्फरपुर शेल्‍टर होम रेप केस की सुनवाई करते हुए सरकारी व्‍यवस्‍था को लेकर की गई ‘टिप्‍प्‍णी’ पर बिल्‍कुल फिट बैठती हैं कुंवर नारायण की यह कविता-
कोई दुख,
मनुष्‍य के साहस से बड़ा नहीं,
हारा वही है,
जो लड़ा नहीं।
तो हमें पारिवार नामक संस्‍था को बनाए रखने के लिए दूसरों के दुख के भागीदार बनने वाले सामाजिक मूल्‍यों को तो पुनर्स्‍थापित करना ही होगा, साथ ही अपने आसपास भी नज़र रखनी होगी। लापरवाह केवल सरकारें ही नहीं, हम भी हैं जो अपनी आंखें मूंदकर ”अकेली महिलाओं” के साथ हुए इस अपराध के भागीदार कहे जा सकते हैं। 
-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 1 अगस्त 2018

इस मंथन का हिस्‍सा बनकर तो देखिए

जैसा कि कूर्म पुराण और विष्‍णु पुराण में कहा गया है कि जब  संसार में आसुरी शक्‍तियों का शासन चरम पर था तब संतुलन बनाने  के समुद्र मंथन की युक्‍ति निकाली गई। ना तो आसुरी शक्‍तियां  (जैसा कि कथाओं में बताया जाता है) भयानक शक्‍ल वाली थीं और  ना ही अजीबो-गरीब लिबास-अस्‍त्र-शस्‍त्रों वाली थीं बल्‍कि वो एक ऐसे  विचार वाली थीं जो सभ्‍य समाज के लिए तकलीफदेह थीं।
इसीलिए  समुद्र मंथन की जरूरत पड़ी।

मंथन कोई एक घटना नहीं थी बल्‍कि ब्रह्मांड के सृष्‍टिचक्र को   दुरुस्‍त करने का एक जरिया था और बहुत जरूरी था क्‍योंकि  जब-जब आसुरी शक्‍तियां और निकृष्‍ट सोच हावी होती है तब-तब  ऐसे किसी मंथन की आवश्‍यकता पड़ती ही है।

फिलहाल कई विश्‍वस्‍तरीय ''एस्‍ट्रोनॉमिकल स्‍टडीज'' की मानें तो हमें  प्रत्‍यक्षत: दिखाई ना देने वाली मंथन की ये प्रक्रिया 2008 से शुरू भी  हो चुकी है जो 2020 में अपने सद्विचारों-सद्कृत्‍यों-सद्भावनाओं को  सामने लाना शुरू कर देगी।

यूं भी हमारे ग्रंथ बताते हैं कि मंथन में सबसे पहले हलाहल ही  निकला था। आज भी हलाहल ही निकल रहा है, जो घोर आपराधिक  सोच व कृत्‍यों के रूप में हमारे सामने है।

यहां एक और बात गौर करने लायक है कि उक्‍त एस्‍ट्रोनॉमिकल  स्‍टडीज के साथ कुछ एस्‍ट्रोलॉजिकल स्‍टडी भी जुड़ गई हैं। उदाहरण  के लिए 1943 के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है जब एक साल के  अंदर ही तीन-तीन ग्रहण पड़ रहे हैं। जबकि ग्रहण सामान्‍यत: जोड़े में  पड़ते हैं। साथ में मंगल ग्रह का धरती के करीब आना, जोकि  आकस्‍मिक घटना नहीं है। 2020 में प्‍लूटो (यमग्रह अथवा प्‍लेनेट  ऑफ हेल) और शनि (न्‍यायग्रह) के एक साथ आने की पूर्वस्‍थिति ही  है जो एक दूसरे से सिर्फ 6 डिग्री पर होंगे तथा एक दूसरे को  प्रभावित करेंगे और मंथनस्‍वरूप निकलेगा आज की आपराधिक सोचों  को दूर करने का ''फल''।

आजकल तो ऐसी-ऐसी आसुरी घटनाएं हमारे सामने आ रही हैं जिन  पर विश्‍वास करना मुश्‍किल होता है। जैसे कि बुराड़ी व बिहार में एक  सुशिक्षित परिवारों द्वारा सामूहिक आत्‍महत्‍या कर लेना, ब्‍लूव्‍हेल  चैलेंज में बच्‍चे ही नहीं बड़ों द्वारा भी स्‍वयं अपनी हत्‍या (इसे  आत्‍महत्‍या कहना ठीक नहीं लग रहा) किया जाना, सामूहिक  बलात्‍कार, बकरी जैसे जानवर के साथ सामूहिक बलात्‍कार, बच्‍चियों  के साथ जघन्‍यतम अपराध और मॉब लिंचिंग। ऐसी घटनाओं का  सिलसिला अब ''किकी डांस चैलेंज'' पर आ पहुंचा है, हालांकि जैसा  कि समय बता रहा है ये अभी और बढ़ेगा।

''किकी डांस चैलेंज'' में कनाडा के रैपर ड्रेक के एक गाने ''किकी डू यू  लव मी'' के एक डांस मूव को धीमी गति से चलती कार से सड़क पर  कूदकर दिखाना होता है साथ ही वापस कार में चढ़ना होता है, अभी  तक इसमें कई जाने जा चुकी हैं और तमाम चेतावनियों के बाद भी  ''खाये-अघाए' और बौराए'' लोग इसे रोजाना एक्‍सेप्‍ट भी कर रहे हैं।


बहरहाल, मंथन के इस दौर में हमारी जिम्‍मेदारी और बढ़ जाती है  कि ऐसी आपराधिक सोचों व घटनाओं पर विलाप करने तथा  एस्‍ट्रोनॉमिकल व एस्‍ट्रोलॉजिकल के बहाने दूसरों को गरियाने की  बजाय स्‍वयं अपने कर्तव्‍य पर ध्यान केंद्रित करें एवं समाज को  सकारात्‍मक सोच से भरने का हरसंभव प्रयास करें।

ये समय संक्रमणकारी विचारों से बचकर अपने आसपास की  गतिविधियों पर नज़र रखने का भी है। किसी को अकेला या संदिग्‍ध  स्‍थिति में देखें तो उसे टोकें। एक बार का टोकना किसी भी गलत  विचार को मार सकने में बहुत कारगर होता है। इस एक कदम से हम भी किसी अपराध की संभावना को रोक सकते हैं।

प्राकृतिक बदलाव को तो हम नहीं रोक सकते और ना ही उसे गति दे  सकते हैं परंतु निजी स्‍तर पर किसी घटना के प्रति ''हमें क्‍या या  हमारे साथ तो नहीं हुई'' वाली सोच को जरूर बदल सकते हैं। सभ्‍य  समाज बनाने की दिशा में इतना प्रयास भी काफी है।

किकी चैलेंज हो या बलात्‍कार अथवा मॉब लिंचिंग सभी में भीड़ का  हिस्‍सा बनने या रुककर फोटो लेने की बजाय स्‍वयं अपनी जिम्‍मेदारी  निभायें तो सार्थक परिणाम सामने आ सकते हैं। 

भीड़तंत्र हर युग में अच्‍छी सोच को प्रभावित करने की कोशिश करता  रहा है लिहाजा आज भी कर रहा है, किंतु याद रहे कि भीड़ में  दिमाग नहीं होता और इसीलिए बुद्धिमान लोग हमेशा भीड को  नियंत्रित करने में सफल रहे हैं।

बेहतर होगा कि कठपुतली बनने की बजाय, डोर थामने वाले बनो।    मात्र शोर मचाकर आप भीड़तंत्र के उद्देश्‍य की पूर्ति ही करते हैं  इसलिए चुपचाप मंथन का हिस्‍सा बनिए। विश्‍वास कीजिए कि सदा  की भांति इस दौर में भी जीत सद्विचारों की ही होगी और अंतत:  नतीजे सार्थक निकलेंगे। 

- अलकनंदा सिंह