गुरुवार, 17 सितंबर 2026

OTT प्लेटफॉर्म्स के ल‍िए खतरे की घंटी बना Subscription Fatigue


 कोरोना काल के दौरान OTT प्लेटफॉर्म्स भारत में मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम बनकर उभरे। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। हर प्लेटफॉर्म अलग सब्सक्रिप्शन मांग रहा है, हर बड़ा कंटेंट किसी एक ही ऐप पर “एक्सक्लूसिव” हो गया है और हर साल कीमतें भी बढ़ रही हैं। इसका असर यह है कि भारतीय दर्शक अब एक नई तरह की थकान महसूस कर रहा है। इंडस्ट्री की भाषा में इसे “Subscription Fatigue” कहा जाता है, यानी OTT खर्चों से थकता दर्शक।

पहले एक बिल था, अब एक दर्जन ऐप्स

केबल टीवी के दौर में मामला काफी आसान था- एक DTH कनेक्शन, एक मंथली रिचार्ज और सैकड़ों चैनल्स। लेकिन OTT के दौर में यह पूरा फॉर्मूला बदल गया है। अब हर प्लेटफॉर्म का अपना कंटेंट किला है और अपनी अलग दीवारें हैं।

Ormax Media की ताजा रिपोर्ट (2025) के मुताबिक भारत में OTT दर्शकों की संख्या 60.12 करोड़ तक पहुंच चुकी है। यानी देश की 41% आबादी किसी न किसी रूप में ऑनलाइन वीडियो देखती है। इनमें से पेड सब्सक्रिप्शंस की संख्या 14.82 करोड़ है। भारत का OTT मार्केट 2025 में $5.4 बिलियन का हो चुका है और 2034 तक इसके $28.1 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।

हालांकि इन चमकदार आंकड़ों के पीछे एक असुविधाजनक सच भी छिपा है। भारतीय दर्शक अब प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती संख्या और लगातार बढ़ती कीमतों से ऊबने लगा है। 

Subscription Fatigue क्या है?

Subscription Fatigue वह मनोवैज्ञानिक थकान है, जो तब पैदा होती है जब दर्शकों को लगने लगता है कि OTT प्लेटफॉर्म्स की संख्या जरूरत से ज्यादा हो गई है। लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि कौन-सा कंटेंट किस प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

इसके साथ ही हर प्लेटफॉर्म अलग से पेमेंट मांग रहा है। किसी एक शो के लिए एक ऐप, तो दूसरी फिल्म के लिए दूसरा ऐप लेना पड़ता है। कंटेंट पूरी तरह बिखर गया है- एक शो यहां, दूसरा वहां।

दर्शकों की परेशानी सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। हर महीने OTT पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन कई लोगों को उसके मुकाबले उतनी “वैल्यू” महसूस नहीं होती। यही वजह है कि लोग अब OTT सब्सक्रिप्शंस से थकान महसूस करने लगे हैं।

यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका जैसे मैच्योर OTT मार्केट्स में भी लोग अब अपने सब्सक्रिप्शंस को रोटेट करने लगे हैं। यानी एक महीने Netflix लिया, अगले महीने Disney+, फिर जरूरत खत्म होने पर कैंसल कर दिया। भारत में भी यही पैटर्न धीरे-धीरे उभरता दिखाई दे रहा है।

भारतीय घर का मंथली OTT बिल: असली हिसाब

आइए एक सामान्य शहरी परिवार का हिसाब देखते हैं, जो सभी मुख्य OTT प्लेटफॉर्म्स सब्सक्राइब करती है:

प्लेटफॉर्म

प्लान (2026)

Netflix (Standard)

₹499/माह

Amazon Prime Video

₹299/माह

JioHotstar (Premium)

₹299/माह

Sony LIV (Premium monthly)

₹399/माह

Zee5 (All Languages + KidZ)

₹299/माह

कुल मासिक खर्च (approx.)

~₹1,795/माह

यानी सिर्फ इन पांच OTT प्लेटफॉर्म्स पर ही अगर सालाना पैकेज लिया जाए, तो दर्शकों का खर्च लगभग ₹8,000 से ₹10,000 तक पहुंच जाता है। इसमें अगर Crunchyroll (anime), Lionsgate Play या कोई रीजनल OTT प्लेटफॉर्म भी जोड़ दिया जाए, तो यह खर्च और ज्यादा बढ़ जाता है।

MiQ की Advanced TV Report India के अनुसार भारतीय दर्शक औसतन 3 स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स subscribe करते हैं और इस पर करीब ₹1,360 प्रति माह खर्च करते हैं। यह आंकड़ा भारत के मध्यम वर्ग के लिए किसी बड़े बोझ से कम नहीं है, क्योंकि जरूरी खर्चों के बाद बचने वाली कमाई पर पहले से ही कई जिम्मेदारियां होती हैं।

Netflix ने मार्च 2026 में अमेरिका में अपने प्लान्स की कीमत एक बार फिर बढ़ाई। पिछले 6 साल में यह 5वीं बार है, जब कंपनी ने कीमतों में इजाफा किया है। हालांकि भारत में Netflix के प्लान्स फिलहाल नहीं बदले गए हैं- Mobile ₹149, Standard ₹499 और Premium ₹649- लेकिन पिछले ट्रेंड बताते हैं कि अमेरिका में कीमतें बढ़ने के 6-12 महीने बाद उसका असर भारत में भी देखने को मिलता है।

वहीं, JioHotstar ने जनवरी 2026 से अपने प्रीमियम सालाना प्लान की कीमत ₹1,499 से बढ़ाकर ₹2,199 कर दी। यानी इसमें करीब 47% की बढ़ोतरी हुई है।

Amazon Prime Video ने June 2025 से अपने स्टैंडर्ड प्लान में विज्ञापन दिखाने शुरू कर दिए हैं। अब विज्ञापन मुक्त कंटेंट देखने के लिए यूजर्स को ₹699 प्रति वर्ष या ₹129 प्रति माह अलग से चुकाने पड़ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या कीमत को लेकर संवेदनशील भारतीय बाजार यह बढ़ता OTT खर्च लंबे समय तक झेल पाएगा? 

OTT इंडस्ट्री की असली लाइफलाइन फिलहाल Telecom Bundling बनती जा रही है

Reliance Jio का ₹749 वाला पोस्टपेड प्लान Netflix Basic, Amazon Prime Lite और JioHotstar तीनों का एक्सेस एक साथ देता है। वहीं Airtel के Xstream bundles में भी कई OTT सर्विसेज शामिल हैं। यानी बड़ी संख्या में यूजर्स को OTT का डायरेक्ट बिल अलग से नहीं भरना पड़ता, क्योंकि उसका खर्च उनके मोबाइल रिचार्ज में ही जुड़ा होता है।

यह मॉडल इसलिए कारगर माना जा रहा है, क्योंकि इसमें यूज़र्स को अलग-अलग पेमेंट करने का झंझट नहीं रहता। साथ ही टेलीकॉम कंपनियों की सब्सक्राइबर रिटेंशन बेहतर होती है और OTT प्लेटफॉर्म्स को एक भरोसेमंद सब्सक्राइबर बेस मिल जाता है।

हालांकि यह समाधान पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। Bundled प्लान्स में अक्सर सिर्फ बेसिक टियर ही मिलता है। HD या 4K क्वॉलिटी और प्रीमियम प्लान्स के लिए यूज़र्स को अलग से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा जैसे-जैसे टेलीकॉम प्लान्स महंगे हो रहे हैं, वैसे-वैसे यह “फ्री” OTT भी लोगों को महंगा पड़ने लगा है।

OTT का साइलेंट क्राइसेस है पॉसवर्ड शेयरिंग

भारत में एक OTT सब्सक्रिप्शन को घर के कई लोग, दोस्त और रिश्तेदार मिलकर इस्तेमाल करते हैं। यह कोई सिक्रेट नहीं, बल्कि एक आम सामाजिक प्रैक्टिस बन चुकी है।

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर OTT प्लेटफॉर्म्स पॉसवर्ड शेयरिंग को प्रभावी तरीके से रोक दें, तो वे अपने पेड सब्सक्राइबर बेस को दोगुना तक बढ़ा सकते हैं। Netflix ने पॉसवर्ड शेयरिंग रोकने के लिए दुनियाभर में सख्ती शुरू की थी। इसका फायदा कंपनी को तुरंत मिला। सिर्फ Q2 2023 में ही Netflix को 59 लाख नए सब्सक्राइबर्स मिले, जबकि इससे एक साल पहले इसी तिमाही में कंपनी ने 10 लाख सब्सक्राइबर्स खो दिए थे।

लेकिन भारत में यह तरीका उतना आसान नहीं है। यहां सबसे बड़ी समस्या एफोर्डबिलिटी (affordability) यानी लोगों की खर्च करने की क्षमता है। अगर कोई परिवार अब तक एक ही Netflix अकाउंट मिल-बांटकर चला रहा था और अब सभी को अलग सब्सक्रिप्शन लेना पड़े, तो कई लोग सीधा कहेंगे- “Netflix बंद कर दो।”

इसी वजह से भारत में पॉसवर्ड शेयरिंग को पायरेसी का एक “सॉफ्ट वर्जन” माना जाने लगा है। लोग पैसे कम खर्च करना चाहते हैं, लेकिन अपने पसंदीदा कंटेंट को छोड़ना भी नहीं चाहते।

तेजी से ऐडवर्टाइजिंग की तरफ लौट रहे हैं OTT प्लेटफॉर्म्स

OTT इंडस्ट्री इस समय एक बड़ा U-turn लेती दिखाई दे रही है। जिन प्लेटफॉर्म्स ने शुरुआत में सिर्फ सब्सक्रिप्शन मॉडल के दम पर अपनी पहचान बनाई थी, वे अब तेजी से ऐडवर्टाइजिंग की तरफ लौट रहे हैं।

SVOD यानी Subscription Video On Demand- यह Netflix-style पेड मॉडल है, जहां दर्शकों को कंटेंट देखने के लिए हर महीने या सालाना शुल्क देना पड़ता है। वहीं AVOD यानी ऐडवर्टाइजिंग Video On Demand- YouTube-style मॉडल है, जिसमें कंटेंट मुफ्त होता है, लेकिन बीच-बीच में विज्ञापन दिखाए जाते हैं। अब OTT इंडस्ट्री का झुकाव तेजी से AVOD मॉडल की तरफ बढ़ रहा है।

Amazon Prime Video ने जून 2025 में अपने स्टैंडर्ड प्लान को AVOD मॉडल में बदल दिया। इसका मतलब यह है कि अब रेगुलर प्राइम मेंबर्स को भी कंटेंट देखते समय विज्ञापन दिखाई देते हैं। अगर कोई यूज़र विज्ञापन-मुक्त अनुभव चाहता है, तो उसे इसके लिए अलग से पैसे देने पड़ते हैं।

वहीं Netflix का ad-supported tier भी तेजी से नए सब्सक्राइबर्स जोड़ रहा है। FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के मुताबिक AVOD अब OTT रेवेन्यू ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन बनता जा रहा है और इसकी रफ्तार SVOD मॉडल से भी ज्यादा तेज है।

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत मूल रूप से फ्री कंटेंट का बाजार माना जाता है। YouTube, MX Player और JioCinema के फ्री cricket स्ट्रीमिंग एक्सपेरिमेंट्स ने यह बात साफ कर दी है।

IPL 2023 में जब JioCinema ने फ्री स्ट्रीमिंग शुरू की, तो टूर्नामेंट के पहले 17 मैचेस में ही 550 करोड़ cumulative video views दर्ज किए गए। वहीं फाइनल मुकाबले के दौरान एक साथ 3.2 करोड़ concurrent व्युअर्स जुड़े, जो एक नया वर्ल्ड रिकॉर्ड था। यह वह स्केल है, जहां तक किसी भी पेड OTT प्लेटफॉर्म का पहुंचना बेहद मुश्किल माना जाता है। इसी वजह से माना जा रहा है कि भारत में सिर्फ पैसे देकर चलने वाला OTT मॉडल लंबे समय तक टिक नहीं पाएगा।

आज OTT की दुनिया में दर्शकों को अपनी पसंद के कंटेंट के हिसाब से अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स का सब्सक्रिप्शन लेना पड़ रहा है।

अगर आप क्रिकेट फैन हैं, तो JioHotstar जरूरी है, क्योंकि IPL राइट्स उसी के पास हैं। अगर आप फुटबॉल देखना पसंद करते हैं, तो उसके लिए अलग प्लेटफॉर्म चाहिए। WWE देखने वालों को Sony LIV लेना पड़ता है। Anime पसंद करने वाले दर्शकों के लिए Crunchyroll जरूरी हो जाता है। वहीं Hollywood का लेटेस्ट कंटेंट देखने के लिए Netflix या Prime का सहारा लेना पड़ता है। यानी अब दर्शकों को कंटेंट के हिसाब से अलग-अलग OTT सब्सक्रिप्शंस लेने पड़ रहे हैं।

केबल टीवी के दौर में स्थिति काफी अलग थी। उस समय “one pack, many channels” का मॉडल चलता था। लेकिन OTT के दौर में अब “many ऐप्स, many bills” नई रियलटी बनती जा रही है।

स्पोर्ट्स राइट्स को लेकर प्लेटफॉर्म्स के बीच होड़ ने यह समस्या और बढ़ा दी है। अब लगभग हर बड़ी स्पोर्ट्स लीग किसी एक OTT प्लेटफॉर्म पर ही देखने को मिलती है। ऐसे में दर्शकों के पास दो ही रास्ते बचते हैं- या तो उस प्लेटफॉर्म का सब्सक्रिप्शन लें, या फिर अपना पसंदीदा मैच और कंटेंट छोड़ दें।

भारत कई भाषाओं वाला देश है और रीजनल OTT प्लेटफॉर्म्स ने इस बात को अच्छी तरह समझा है। Hoichoi (बंगाली), ManoramaMAX (मलयालम), Sun NXT (तमिल, तेलुगु) और Chaupal (पंजाबी) जैसे प्लेटफॉर्म्स ने अपनी-अपनी भाषाओं के दर्शकों के बीच मजबूत पहचान बनाई है।

Market Research Future के मुताबिक 2025 में रीजनल language content में 40% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह trend साफ दिखाता है कि दर्शक अपनी भाषा में कंटेंट देखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। लेकिन यहां भी सबसे बड़ी समस्या वही है- हर रीजनल ऐप का अलग subscription।

उदाहरण के तौर पर, अगर मुंबई में रहने वाला कोई मराठी परिवार Bengali content भी देखना चाहता है, तो उसे national OTT प्लेटफॉर्म्स के अलावा दो रीजनल ऐप्स का अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या रीजनल OTT प्लेटफॉर्म्स अपने survival के लिए telecom bundling या national aggregation का रास्ता अपनाएंगे? 2026 में यह OTT इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ा strategic सवाल माना जा रहा है।

Cable Operator की वापसी

OTT इंडस्ट्री में अब एक नई संभावना भी दिखाई दे रही है। जैसे पहले cable operators एक ही subscription में सैकड़ों चैनल्स उपलब्ध कराते थे, वैसे ही अब OTT aggregator ऐप्स का चलन बढ़ सकता है। Tata Play Binge पहले से इस मॉडल पर काम कर रही है। इसमें users को एक ही app में कई OTT प्लेटफॉर्म्स का एक्सेस और एक ही billing system मिलता है। Smart TV ecosystems और broadband bundles में भी यह trend तेजी से दिखाई देने लगा है। अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल हो जाता है, तो यह subscription fatigue का सबसे practical समाधान बन सकता है। हालांकि सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि OTT प्लेटफॉर्म्स आपस में revenue share करने के लिए कितने तैयार होते हैं।

सब्सक्रिप्शन fatigue के बीच एक बड़ा बदलाव Connected TV है

सब्सक्रिप्शन fatigue के बीच एक बड़ा बदलाव Connected TV यानी CTV के रूप में भी देखने को मिल रहा है। Ormax की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में active CTV users की संख्या 12.92 करोड़ तक पहुंच गई है। यह 2024 के मुकाबले 87% की बड़ी छलांग है।

FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के अनुसार यह करीब 6.8 करोड़ CTV households तक फैल चुका है, जिनमें से 4 करोड़ weekly active हैं।

इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में CTV ऐडवर्टाइजिंग revenues 42% बढ़कर ₹9,900 करोड़ तक पहुंच गए। वहीं WPP की TYNY 2026 report का अनुमान है कि 2026 में CTV ऐडवर्टाइजिंग में 22% की growth देखने को मिलेगी।

यह advertisers के लिए एक नई opportunity बनकर उभर रहा है। जैसे-जैसे लोग पेड सब्सक्रिप्शंस से हटकर फ्री और ad-supported प्लेटफॉर्म्स की तरफ बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे ब्रैंड्स को बड़े स्क्रीन पर टार्गेटेड ऐडवर्टाइजिंग का मौका मिल रहा है। अनुमान है कि CTV ऐडवर्टाइजिंग 2026 तक ₹8,000 करोड़ तक पहुंच सकती है।

भारतीय दर्शक अक्सर शिकायत करता है- कुछ देखने को नहीं

OTT इंडस्ट्री में एक दिलचस्प स्थिति भी देखने को मिलती है। आज 600 करोड़ वीडियोज, हजारों शोज और दर्जनों प्लेटफॉर्म्स मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय दर्शक अक्सर शिकायत करता है- “कुछ देखने को नहीं।”

यह स्थिति जरूरत से ज्यादा कंटेंट होने की वजह से बनती है। जब देखने के लिए बहुत ज्यादा विकल्प होते हैं, तो लोग समझ नहीं पाते कि आखिर क्या देखें।

Auto-debit frustration, मंथली सब्सक्रिप्शन रिमाइंडर्स और अलग-अलग ऐप्स में कंटेंट ढूंढने की परेशानी- यह सब मिलकर व्युअर्स को मानसिक रूप से थका देता है। MiQ की रिपोर्ट के मुताबिक 67% भारतीय व्युअर्स आने वाले समय में अपने streaming सब्सक्रिप्शंस बढ़ाने की सोच रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ वही दर्शक प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती कीमतों से नाराज भी हैं। यही उलझन भारतीय OTT बाजार की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

सबसे बड़ा फायदा डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री को

अगर दर्शक पेड सब्सक्रिप्शंस कम करते हैं और फ्री या ad-supported प्लेटफॉर्म्स की तरफ जाते हैं, तो इसका सबसे बड़ा फायदा डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री को मिल सकता है।

FICCI-EY की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग 2025 में 26% बढ़कर ₹94,700 करोड़ ($11.4 बिलियन) तक पहुंच गई। अनुमान है कि 2028 तक यह आंकड़ा ₹1,39,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा।

YouTube अकेले 2030 तक भारत में $3.05 बिलियन का ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू जनरेट करेगा।

OTT प्लेटफॉर्म्स पर ऐड इन्वेंट्री बढ़ने से ब्रैंड्स को टार्गेटेड और डेटा संचालित वीडियो ऐडवर्टाइजिंग का बेहतर मौका मिलेगा। वहीं Connected TV पर प्रीमियम ऐप प्लेसमेंट्स की वैल्यू भी लगातार बढ़ेगी।

2026 और उसके बाद भारत का OTT landscape कई बड़े बदलावों से गुजर सकता है

Consolidation: छोटे OTT प्लेटफॉर्म्स या तो बड़े प्लेटफॉर्म्स में merge हो सकते हैं या फिर बाजार से बाहर हो सकते हैं। बढ़ते competitive pressure में survival आसान नहीं रहेगा।

Flexible Pricing:  भविष्य में वीकली प्लान्स, event-based सब्सक्रिप्शंस (जैसे सिर्फ IPL सीजन के लिए) और माइक्रो-पेमेंट्स जैसे एक्सपेरिमेंट्स बढ़ सकते हैं।

Hybrid Models का विस्तार: फ्री + विज्ञापन वाला टियर लगभग हर प्लेटफॉर्म पर स्टैंडर्ड बन सकता है। वहीं सिर्फ पेड मॉडल धीरे-धीरे लग्जरी सेगमेंट तक सीमित हो सकता है।

AI-Powered Personalization: आने वाले समय में OTT प्लेटफॉर्म्स की कंटेंट सुझाव इतनी बेहतर हो सकती है कि लोगों को अलग-अलग ऐप्स पर जाकर कंटेंट ढूंढने की जरूरत न पड़े। उन्हें एक ही जगह अपनी पसंद का ज्यादा कंटेंट आसानी से मिल सकता है।

MPA यानी Media Partners Asia के मुताबिक 2030 तक भारत में SVOD सब्सक्रिप्शंस की संख्या 357 मिलियन तक पहुंच सकती है। इसके साथ भारत, China को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे बड़ा SVOD सब्सक्रिप्शन मार्केट बन सकता है। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब OTT प्लेटफॉर्म्स सही कीमत पर अच्छा कंटेंट देकर दर्शकों को बेहतर अनुभव दे पाएंगे।

बदलती आदतों और डिजिटल मनोरंजन के बदलते कारोबार की कहानी

भारत में OTT की कहानी अब सिर्फ technology और entertainment तक सीमित नहीं रह गई है। यह लोगों की बदलती आदतों और डिजिटल मनोरंजन के बदलते कारोबार की कहानी बन चुकी है।

एक तरफ देश में 60 करोड़ से ज्यादा OTT व्युअर्स हैं, Connected TV की पहुंच तेजी से बढ़ रही है और भारत दुनिया का सबसे बड़ा SVOD मार्केट बनने की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन दूसरी तरफ OTT प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती कीमतें, अलग-अलग ऐप्स में बंटा कंटेंट, पॉसवर्ड शेयरिंग की समस्या और बढ़ता खर्च लोगों को परेशान भी कर रहा है।

यही वजह है कि भारत में OTT का भविष्य सिर्फ महंगे सब्सक्रिप्शंस पर नहीं टिका होगा। आने वाले समय में वही प्लेटफॉर्म ज्यादा सफल होंगे, जो कम कीमत, अच्छे कंटेंट, विज्ञापन और आसान एक्सेस के बीच सही संतुलन बना पाएंगे। जो प्लेटफॉर्म दर्शकों की जरूरत और उनकी जेब- दोनों को समझेगा, वही सबसे आगे निकलेगा।
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रविवार, 6 सितंबर 2026

क्यों हुआ छोटी-सी फोटोकॉपी की दुकान पर मुकद्दमा, मालिक का नाम था #धर्मपाल_सिंह


 दुनिया के तीन बड़े अकादमिक प्रकाशकों ने एक छोटी-सी फोटोकॉपी की दुकान पर मुकदमा कर दिया।

वह दुकान दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी कैंपस में थी। वहां एक ही मालिक था और वह सिर्फ 50 पैसे प्रति पेज में फोटोकॉपी करता था।

मुकदमा करीब 4 साल चला। आखिरकार दुकान जीत गई और इस मामले के बाद कानून की व्याख्या भी बदल गई।

उस दुकान के मालिक का नाम था #धर्मपाल_सिंह।

उन्होंने 1998 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के अंदर एक छोटी-सी लाइसेंस प्राप्त जगह में रमेश्वरी फोटोकॉपी सर्विस शुरू की थी।

काम बहुत सीधा था।

प्रोफेसर अपने छात्रों के लिए पढ़ने वाली किताबों और लेखों की एक लिस्ट तैयार करते थे। मान लीजिए किसी को Agrarian Sociology पढ़नी है, तो उसमें 33 अलग-अलग रीडिंग्स हो सकती थीं, जो 33 अलग-अलग किताबों में मौजूद थीं।

इनमें से ज्यादातर किताबें इतनी महंगी थीं कि एक छात्र के महीने के बजट से भी बाहर हो जाती थीं। कई किताबों की लाइब्रेरी में सिर्फ एक कॉपी होती थी।

धर्मपाल सिंह उन किताबों के जरूरी अध्यायों की फोटोकॉपी करते, उन्हें एक साथ बांधकर एक बंडल बना देते और छात्रों को बेचते थे।

इसे "कोर्स पैक" कहा जाता था।

कीमत थी—सिर्फ 50 पैसे प्रति पेज।

यानी एक अमेरिकी सेंट से भी कम।

धर्मपाल सिंह ने अपने काम को एक वाक्य में समझाया था—

अगर किसी छात्र को एक कोर्स के लिए 33 अलग-अलग रीडिंग्स पढ़नी हैं, तो अलग-अलग किताबों से उन्हें इकट्ठा करने में कई महीने लग सकते हैं। मैं सारी सामग्री एक ही पैक में देकर छात्रों का काम आसान करता हूं।

लेकिन अगस्त 2012 में दुनिया के तीन बड़े अकादमिक प्रकाशकों—Oxford University Press, Cambridge University Press और Taylor & Francis—ने दिल्ली हाई कोर्ट में इस दुकान और दिल्ली यूनिवर्सिटी के खिलाफ मुकदमा कर दिया।

उन्होंने अदालत से मांग की कि दुकान को कॉपीराइट वाली सामग्री की फोटोकॉपी करने से हमेशा के लिए रोक दिया जाए।

2012 के अंत तक अदालत ने एक अस्थायी रोक भी लगा दी।

बिना किसी पूर्व सूचना के एक कमिश्नर दुकान पर भेजा गया। उसने दुकान में मौजूद कॉपियों की सूची बनाई और कई कॉपियां जब्त कर लीं।

लेकिन इसके बाद कहानी ने एक अलग मोड़ लिया। छात्र सामने आ गए। दो समूह—एक छात्रों का और दूसरा शिक्षा तक आसान पहुंच के लिए काम करने वाला—औपचारिक रूप से इस मामले में प्रतिवादी बनने के लिए अदालत पहुंचे। यानी वे फोटोकॉपी की दुकान के पक्ष में खड़े हो गए। अदालत ने उन्हें केस में शामिल होने की अनुमति दे दी।

मार्च 2013 में दुनिया भर के 309 लेखकों और शिक्षाविदों ने प्रकाशकों को एक खुला पत्र लिखकर मुकदमा वापस लेने की अपील की।

हैरानी की बात यह थी कि उन 309 लोगों में से 33 ने उन्हीं किताबों को लिखा था, जिनकी कॉपी को लेकर कॉपीराइट उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। यानी लेखक खुद अपनी किताबों की फोटोकॉपी करने वाली उस दुकान के समर्थन में खड़े थे। फिर आया 16 सितंबर 2016।

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ ने पूरा मुकदमा खारिज कर दिया।

उन्होंने अपने फैसले में कहा कि साहित्यिक रचनाओं पर कॉपीराइट ऐसा कोई स्वाभाविक या ईश्वर प्रदत्त अधिकार नहीं है, जिससे लेखक को उस रचना पर पूर्ण और असीमित मालिकाना हक मिल जाए।

प्रकाशकों ने इस फैसले के खिलाफ अपील की।

लेकिन 9 दिसंबर 2016 को दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि भारतीय कानून के तहत शिक्षण और पढ़ाई के उद्देश्य से कॉपीराइट वाली सामग्री को दोबारा तैयार करना कॉपीराइट उल्लंघन नहीं है।

कोर्स पैक बनाने के लिए प्रकाशक से लाइसेंस या अनुमति लेना जरूरी नहीं है—भले ही किताब का काफी हिस्सा कॉपी किया गया हो—अगर उसका इस्तेमाल वास्तव में पढ़ाने और शिक्षा के उद्देश्य से उचित है।

इसके बाद प्रकाशकों ने यह मुकदमा पूरी तरह वापस ले लिया।

और वह छोटी-सी फोटोकॉपी की दुकान?

वह आज भी मौजूद है।

अगली बार जब कोई आपसे कहे कि बौद्धिक संपदा का कानून हमेशा उसी के पक्ष में होता है जिसके पास सबसे महंगे वकील हों, तो धर्मपाल सिंह की कहानी याद रखना।

दुनिया के तीन सबसे बड़े अकादमिक प्रकाशकों ने चार साल तक आधे रुपये प्रति पेज की फोटोकॉपी करने वाली एक छोटी-सी दुकान को बंद कराने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। और आखिर में...

वे हार गए।

साभार: संकल‍ित 

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

चरण स्पर्श (पैर छूने) के नियम...जब भी कोई पैर छुए तो आपको क्या करना चाहिए?


 पुराने समय से ही परंपरा चली आ रही है कि जब भी हम किसी विद्वान व्यक्ति या उम्र में बड़े व्यक्ति से मिलते हैं तो उनके पैर छूते हैं। इस परंपरा को मान-सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। ये बात तो सभी जानते हैं कि बड़ों के पैर छूना चाहिए, लेकिन जब कोई हमारे पैर छुए तो हमें क्या-क्या करना चाहिए?

इस परंपरा का पालन आज भी काफी लोग करते हैं। चरण स्पर्श करने से धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, हमारे पैर छुए तो उन्हें आशीर्वाद तो देना ही चाहिए, साथ ही भगवान या अपने इष्टदेव को भी याद करना चाहिए। आमतौर पर हम यही प्रयास करते है कि हमारा पैर किसी को न लगे, क्योंकि ये अशुभ कर्म माना गया है। जब कोई हमारे पैर छूता है तो हमें इससे भी दोष लगता है। इस दोष से बचने के लिए मन ही मन भगवान से क्षमा मांगनी चाहिए।

शास्त्रों में लिखा है कि-

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति रोज बड़े-बुजुर्गों के सम्मान में प्रणाम और चरण स्पर्श करता है। उसकी उम्र, विद्या, यश और शक्ति बढ़ती जाती है।

जब भी कोई हमारे पैर छूता है तो उस समय भगवान का नाम लेने से पैर छूने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक फल मिलते हैं। आशीर्वाद देने से पैर छूने वाले व्यक्ति की समस्याएं खत्म होती हैं, उम्र बढ़ती है और नकारात्मक शक्तियों से उसकी रक्षा होती है। हमारे द्वारा किए गए शुभ कर्मों का अच्छा असर पैर छुने वाले व्यक्ति पर भी होता है। जब हम भगवान को याद करते हुए किसी को सच्चे मन से आशीर्वाद देते हैं तो उसे लाभ अवश्य मिलता है। किसी के लिए अच्छा सोचने पर हमारा पुण्य भी बढ़ता है।

चरण स्पर्श (पैर छूने) के नियम...

पैर छूने की परंपरा: सनातन धर्म, संस्कृति और परंपरा में संतों के और बड़ों बुजुर्गों के पैर छूने की परंपरा है, परंतु क्या आप जानते हैं कि कुछ लोगों से पैर छुआना वर्जित है या यह कहें कि कुछ लोगों को पैर नहीं छूना चाहिए

कुंवारी कन्या: कुंवारी कन्याओं को किसी के पैर नहीं छूना चाहिए या यदि कोई कुंवारी कन्या आपके पैर छूने का प्रयास करें तो उसे रोक दें अन्यथा आपको पाप लगेगा। छोटी बच्चियों और कन्याओं के तो पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।

बेटियां : किसी भी पिता को अपनी बेटियों से पैर नहीं छुआना चाहिए। बेटियों को भी चाहिए कि वह पिता के पैर नहीं छुए अन्यथा पिता को पाप लगता है। बेटियों को देवी का रूप माना जाता है इसलिए उनसे चरण नहीं छुआना चाहिए।

बहुएं : कुछ समाज में बहुएं अपनी सास के पैर छू सकती है, परंतु श्वसुर के नहीं क्योंकि बहुएं घर की लक्ष्मी होती हैं।

यदि आप मंदिर में हैं और आपको वहां पर कोई बड़ा-बुजुर्ग या सम्मानीय व्यक्ति मिल जाता है तो आप पहले भगवान को प्रणाम करें क्योंकि मंदिर में भगवान से बड़ा कोई नहीं होता। भगवान के सामने किसी के पैर छूना मंदिर और भगवान का अपमान माना जाता है।

पूजा कर रहे व्यक्ति के पैर छूना: यदि कोई व्यक्ति मंदिर या घर में पूजा कर रहा है उस दौरान उसके पैर छूना उचित नहीं है। ऐसे में दोनों को ही पाप लगता है। दूसरी बात इससे पूजा में बाधा उत्पन्न होती है।

सोये हुए व्यक्ति के पैर छूना : यदि कोई व्यक्ति सो रहा है या लेटा हुआ है तो उस समय उसके पैर नहीं छूना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इससे लेटे हुए व्यक्ति की उम्र घटती है। केवल मरे हुए व्यक्ति के ही पैर छुए जाते हैं।

श्मशान से लौटे व्यक्ति के पैर छूना: यदि कोई सम्‍मानित व्‍यक्ति या बड़े-बुजुर्ग श्‍मशान घाट से लौट रहे हैं तो उन्हें देखकर कई लोग उनके पैर छूने लगते हैं जो कि गलत है। अंतिम संस्कार से लौटने पर व्यक्ति अशुद्ध हो जाता है ऐसे में उसके पैर छूना वर्जित है। स्नान करने के बाद ही उसके पैर छू सकते हैं। इसी प्रकार श्मशान में भी किसी के पैर नहीं छूना चाहिए।

अशुद्ध व्यक्ति : यदि आप किसी कारण से अशुद्ध हो गए हैं या जिसके आप पैर छूना चाहते हैं वह अशुद्ध है तो दोनों ही स्थिति में पैर नहीं छूना चाहिए। इसे दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ सकता है।

भांजा भांजी : यदि आप किसी के भांजे हैं तो आपको मामा मामी के पैर नही छूना चाहिए क्योंकि भांजा या भांजी पूजनीय होते हैं। मामा मामी को पाप लगता है।

पत्नी : पति पत्नी का रिश्ता बहुत ही पवित्र रिश्ता होता है और यह सांझेदारी का रिश्ता होता है। परंतु पति को कभी भी अपनी पत्नी के पैर नहीं छूना चाहिए क्योंकि इससे पत्नी को पाप लगता है।

किसी बड़े के पैर क्यों छूना चाहिए?

पैर छूना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा नहीं है, यह एक वैज्ञानिक क्रिया है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ी है। पैर छूने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता, बल्कि बड़ों के स्वभाव की अच्छी बातें भी हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छूने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे शारीरिक कसरत होती है। आमतौर पर तीन तरीकों से पैर छुए जाते हैं।

• पहला तरीका - झुककर पैर छूना

• दूसरा तरीका- घुटने के बल बैठकर पैर छूना

• तीसरा तरीका- साष्टांग प्रणाम करना

• झुककर पैर छूना: झुककर पैर छूने से हमारी कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है।

• घुटने के बल बैठकर पैर छूना: इस विधि से पैर छूने पर हमारे शरीर के जोड़ों पर बल पड़ता है, जिससे जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।

• साष्टांग प्रणाम: इस विधि में शरीर के सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए सीधे तन जाते हैं, जिससे शरीर का स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा, झुकने से सिर का रक्त प्रवाह व्यवस्थित होता है जो हमारी आंखों के साथ ही पूरे शरीर के लिए लाभदायक है।

पैर छूने के तीसरे तरीके (साष्टांग प्रणाम) का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार खत्म होता है। किसी के पैर छूने का मतलब है उसके प्रति समर्पण भाव जगाना। जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार खत्म हो जाता है।

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

एक कदम आयुर्वेद की ओर: आज बात करेंगे जामुन की... जिसका हर अंग औषधि है


 
आजकल मैं एलोपैथी से आज‍िज आए अपने हेल्थ सेक्टर की दुर्दशा देखकर होम्योपैथी व आयुर्वेेद का कुछ कुछ अध्ययन कर रही हूं ..इसी कड़ी में  आज जामुन के करतबों की बात करना बहुत जरूरी लगा..तो सोचा शेयर करूं क‍ि इस नायाब औषध‍ि और बहुमूल्य प्राकृत‍िक देन को हम कि‍तना  कम कर के आंकते रहे...।    
बरसात के मौसम में बाजारों में नजर आने वाला गहरे बैंगनी रंग का जामुन केवल स्वादिष्ट फल ही नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा, आयुर्वेद और वैज्ञानिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण वृक्ष माना जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसकी जड़, छाल, पत्तियां, फल और लकड़ी—हर हिस्सा किसी न किसी रूप में उपयोगी है। यही कारण है कि इसे “औषधीय गुणों का भंडार” कहा जाता है।
अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं।
जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।
पहले के जमाने में गांवो में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है।
दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ जल के स्तोत्र बंद नहीं हुए हैं।
भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।
स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है।
एक रिसर्च के मुताबिक, जामुन के पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाए जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।
सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाए, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे मिक्स करके पी सकते हैं।
जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं. इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।

जामुन की गुठली सेहत के लिए बहुत गुणकारी होती है। यह मुख्य रूप से ब्लड शुगर को नियंत्रित करने, पाचन तंत्र सुधारने और शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करती है।
जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल कि‍या जाता था ।
जर्नल ऑफ आयुर्वेद एंड इंटीग्रेटेड मेडीकल साइंसेज में वाहरा पी. , रेडेकर एस., पवार एस., पाट‍िल वी. ने अपनी र‍िसर्च में कहा है क‍ि - 

पौधों ने कई सदियों से इंसानों को हर्बल कॉस्मेटिक्स दिए हैं और समय के साथ उनका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। सिज़ीगियम क्यूमिनी, जो मायर्टेसी परिवार से है और जिसे आमतौर पर यूजेनिया जंबोलाना के नाम से जाना जाता है, फाइटोकेमिकल्स से भरपूर होता है। जामुन या ब्लैक प्लम, भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है, जिसमें श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान जैसे देश शामिल हैं। यह पेड़ ट्रॉपिकल और सबट्रॉपिकल क्लाइमेट में फलता-फूलता है, और अक्सर जंगलों, नदी के किनारों और खुले खेतों में उगता है। जामुन के कॉस्मेटिक फायदों पर हाल ही में की गई जांच इस रिव्यू का मुख्य टॉपिक है। जामुन के इन फॉर्मूलेशन की खासियत यह है कि इनमें एंटी-एजिंग, एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट जैसे फायदेमंद गुण होते हैं, और ये फोटोएजिंग को भी कम करते हैं। मुख्य फाइटोकॉन्स्टिट्यूएंट्स में टैनिन, फ्लेवोनोइड्स, टेरपेनोइड्स, सैपोनिन, फेनोलिक एसिड और एसेंशियल ऑयल्स शामिल हैं। सिज़ीगियम क्यूमिनी फार्माकोलॉजिकल और आयुर्वेदिक दोनों तरह के फायदे दिखाता है, जो कॉस्मेटिक फॉर्मूलेशन में एक कीमती हिस्सा है। लिटरेचर रिव्यू और अलग-अलग रिसर्च स्टडीज़ के अनुसार, सिज़ीगियम क्यूमिनी (पत्ती) और (बीज) तेलों में एंटीकोलेजनेज, एंटी-इलास्टेस और एंटी-हायल्युरोनिडेस एक्टिविटीज़ देखी गईं। इसलिए, हेल्दी स्किन के लिए कॉस्मेटिक तैयारियों में एस. क्यूमिनी तेलों पर विचार किया जाना चाहिए। जामुन कॉस्मेटिक और कॉस्मेटिक इंडस्ट्री दोनों में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।

चूं क‍ि आयुर्वेद किसी एक बीमारी के लिए फिक्स दवा नहीं बताता, बल्कि शरीर की प्रकृति के अनुसार इलाज करता है। तो पहले अपने शरीद की प्रकृत‍ि समझें... तब जामुन को लेकर उक्त तथ्य अपनी जरूरत अनुसार प्रयोग क‍िये जा सकते हैं। दैन‍िक जीवन में भी जामुन की लकड़ी, गुठली का बुरादा आद‍ि को इस्तेमाल में लाकर देखें... गजब का र‍िजल्ट देते हैं। 



- अलकनंदा स‍िंंह 


रविवार, 2 अगस्त 2026

#गोखरू: एक ऐसी जड़ी बूटी है जो सदियों से मानव स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद ही साबित हुआ


हर जगह आजकल इस मौसम में बहुतायत में हैं गोक्षुर या गोखरू । ये छोटा गोखरू है।  

दो तरह का होता है छोटा एवं बड़ा गोखरू 

नपुंसकता और किडनी रोगों का काल है गोखरू :- शीघ्र उत्पादन करेंगे गोखरू निर्मित योग का

गोखरू वर्षा ऋतु में जमीन पर फैलकर बढ़ने वाला, शाखा-प्रशाखायुक्त पौधा होता है। इसके तने 1.5 मी लम्बे, और जमीन पर फैले हुए होते हैं। शाखाओं के नये भाग मुलायम होते हैं; पत्ते चने के पत्तों के समान, परन्तु आकार में कुछ बड़े होते हैं। इसके फूल पीले, छोटे, चक्राकार, कांटों से युक्त, चमकीले लगभग 0.7-2 सेमी व्यास या डाइमीटर के होते हैं।

इसके फल छोटे, गोल, चपटे, पांच कोण वाले, 2-6 कंटक युक्त व अनेक बीजी होते हैं। इसकी जड़ मुलायम रेशेदार, 10-15 सेमी लम्बी, हल्के भूरे रंग के एवं थोड़े सुगन्धित होते हैं। गोखुरू अगस्त से दिसम्बर महीने में फलते-फूलते हैं।

गोखरू में पोटेशियम, नाइट्रेट, विटामिन सी, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फ्लेवोनोइड्स, सैपोनिन्स, एल्कलॉइड्स, और खनिज तत्व जैसे कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं. ये सभी पोषक तत्व शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं और कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते है विशेषकर नाइट्रेट जो कि 

रक्त वाहिकाओं को चौड़ा करने और रक्त प्रवाह को बेहतर बनाने में मदद करता है जिससे सभी जीवन अंगों को बल मिलता है हृदय तथा यौन अंगों को बल मिलता है 

सैपोनिन्स यौन स्वास्थ्य और हार्मोन संतुलन में जबर मदद करते हैं जिससे पुरूषों तथा महिलाओं दोनों को ही यौनेच्छा की कमी महसूस नहीं होती 

एल्कलॉइड्स को मूत्रवर्धक प्रभाव के लिए जाना जाता है और किडनी को स्वस्थ रखने में मदद करता है तथा मूत्रमार्ग की परेशानियां दूर करते हैं 

गोखरू में मौजूद कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम जैसे खनिज तत्व हड्डियों को मजबूत बनाने और मांसपेशियों की कार्यक्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं.

टेस्टोस्टेरान हार्मोन ही वो हार्मोन है जो एक पुरुष को मर्द बनाता है उसके यौनांग मांसपेशियों के विकास और रखरखाव का जरिया है 

गोखरू को टेस्टोस्टेरोन बूस्टर के रूप में जाना जाता है, जो पुरुषों के लिए बहुत जरूरी होता है। टेस्टोस्टेरोन एक हार्मोन है, जो पुरुषों के यौन विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इतना ही नहीं पुरुषों की मांसपेशियों को बढ़ाने, हड्डियों को मजबूत करने और पुरुषों के प्रजनन क्षमता को बेहतर रखने में मदद करता है।

2 ग्राम गोखुर के फल चूर्ण को 2-3 नग सूखे अंजीर के साथ दिन में तीन बार कुछ दिनों तक लगातार सेवन करने से दमा में लाभ होता है। गोक्षुर तथा अश्वगंधा को समान मात्रा में लेकर उसके सूक्ष्म चूर्ण में 2 चम्मच मधु मिलाकर दिन में दो बार 250 मिली दूध के साथ सेवन करने से सांस संबंधी समस्या एवं कमजोरी में लाभ मिलता है।

 गोखरू का काढ़ा पिलाने से जिसकी पाचन शक्ति कमजोर है उसको भोजन पचाने में आसानी होती है। गोखरू के 30-40 मिली काढ़ा   में 5 ग्राम पीपल के चूर्ण का मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पीने से पाचन-शक्ति बढ़ती है। यह गोखरू का उपयोग बड़ा लाभकारी है।

गोखरू के सेवन से पथरी को प्राकृतिक तरीके से निकालने में मदद मिलती है। 5 ग्राम पतंजलि गोखरू चूर्ण को 1 चम्मच मधु के साथ दिन में तीन बार खाने के बाद ऊपर से बकरी का दूध पिलाने से अश्मरी टूट-टूट कर निकल जाती है। या फिर सीधे ही गोखरू पंचांग स्वरस को 30 मिली सुबह निराहार एक गिलास पानी के साथ लिया जाए तो पित्ताशय तथा आंतों के साथ साथ गुर्दों की भी सफाई होती है तथा बनी कश्मीरी यानी पत्थरियां निकल जाती हैं

अगर किसी कारण गर्भाशय में दर्द हो रहा है तो गोखरू का सेवन बहुत गुणकारी होता है। 5 ग्राम गोखरू फल, 5 ग्राम काली किशमिश और दो ग्राम मुलेठी इनको पीसकर सुबह शाम सेवन करने से गर्भाशय के दर्द से राहत मिलती है।

अगर स्पर्म काउन्ट कम होने के कारण आपके पिता बनने में समस्या उत्पन्न हो रही है तो गोखरू का सेवन इस तरह से करें। गोखरू के 20 ग्राम फलों को 250 मिली दूध में उबालकर सुबह शाम पिलाने से स्पर्म या वीर्य संबंधी समस्याएं कम होती है। इसके अलावा 10 ग्राम गोखरू एवं 10 ग्राम शतावर को 250 मिली दूध के साथ उबालकर पिलाने से स्पर्म का काउन्ट और क्वालिटी बढ़ती है तथा शरीर को शक्ति मिलती है।  या फिर कैप्सूल में भरकर 500 mg प्रति दूध के साथ जल के साथ लिया जा सकता है

250 ग्राम गोखरू फल को दो लीटर पानी में उबालना है जब तक वो आधा न रह जाए फिर इसे छानकर बोतल में भरकर रख लें 

30-30-30 मिली सुबह दोपहर शाम आधा कप पानी मिलाकर पिएं किडनी संबंधित बीमारियों में तथा बढ़े हुए क्रिएटिनिन और यूरिया में आशातीत लाभ होता है युरिनरी ट्रैक इंफेक्शन और पेशाब की रूकावट दूर होती है शुरूआती किडनी रोग का अचूक उपाय है 

गोखरू एक नर्वाइन टॉनिक के रूप में काम करती है, जो नसों से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के साथ अनिद्रा, तनाव और चिंता से राहत दिलाने में भी फायदेमंद है।


साभार:  

डॉ० जयवीर सिंह

अवधूत आयुर्विज्ञान संस्थान पिंडारा फ्लाईओवर
गोहाना रोड़ नजदीक राजमहल पैलेस जींद हरियाणा
7393050000
9350272972

सोमवार, 27 जुलाई 2026

माधवन: एक ऐसा रोल मॉडल जो युवा ''अर्चक स्वामी'' भी है और बेहतरीन इंजीन‍ियर भी


  ये #Video उनके ल‍िए जो अपनी संस्कृत‍ि और श‍िक्षा को अलग अलग करके देखते हैं, जो जात‍ि-व‍िभेद के व‍िष को प्रत‍िपल समाज में घोलकर प्रसन्न होते हैं... 

शिक्षा तभी सार्थक बनती है, जब वह ज्ञान के साथ संस्कार और संस्कृति से भी जुड़ती है। अपनी संस्कृति से जुड़ी, संस्कारों से समृद्ध और ज्ञान से संपन्न पूरी एक पीढ़ी का नेतृत्व करते हैं माधवन जो एक युवा ''अर्चक स्वामी'' हैं। माधवन एक युवा अर्चक स्वामी हैं जिन्होंने बोइंग छात्रवृत्ति पर एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी की है और वे मयादुथुराम/मदुरांथकम् रामार मंदिर में सेवा करते हैं। वे आधुनिक तकनीक और प्राचीन परंपरा के अनूठे संगम का प्रतीक हैं।

माधवन की खास‍ियत यह है क‍ि इन्होंने IIT चेन्नई से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में PhD की है और बैंगलोर की एक कंपनी में डायरेक्टर के तौर पर काम करते हैं। अपने बिज़ी शेड्यूल के बावजूद, माधवन अपने मदुरंथकम रामर कैंकर्य को प्राथम‍िकता देते हैं।

सर्व प्रथम मदुरांथकम के बारे में जान लें- 

मधुरांथकम चेन्नई से लगभग 75 km दक्षिण में एक खूबसूरत जगह है। चेन्नई से जाते समय, मधुरांठकम चेंगलपट्टू पार करने के बाद GST रोड पर पड़ता है। मधुरांठकम में श्री कोथंडारामर का एक अद्भुत मंदिर है। पुराने दिनों में, इस जगह को वकुलारण्य क्षेत्रम कहा जाता था, क्योंकि यह जगह बहुत सारे मगिज़म पेड़ों ) वाला जंगल था । इस जगह के दूसरे नाम भी थे जैसे मधुरांठका चतुर्वेधी मंगलम, वैकुंड वर्धनम, थिरुमाधुरई और थिरुमंदिरा थिरुपथी। इस मंदिर की कहानी रामायण काल ​​से ही जुड़ी हुई है। मधुरांठकम में श्री विपांडकर नाम के एक पुराने संत रहते थे, जो भगवान विष्णु की तपस्या कर रहे थे। वह इस जगह पर श्री करुणाकर पेरुमाल के साथ-साथ श्री भू देवी और श्री नीला देवी की मूर्तियों की पूजा कर रहे थे। उस समय, श्री राम को जंगल में निकाल दिया गया था, जहाँ उन्होंने श्री सीता देवी को खो दिया था और उन्हें वापस लाने के लिए श्रीलंका जा रहे थे। विपांडकर को पता चला कि श्री राम श्रीलंका की ओर बढ़ रहे हैं और उन्हें इस जंगल से गुज़रना होगा। विपांडकर गए और श्री राम को अपने आश्रम में बुलाया और आगे बढ़ने से पहले कुछ देर रुकने के लिए कहा। श्री राम ने विपांडकर की प्रार्थना मान ली और थोड़ी देर रुके और ऋषि के साथ श्री करुणाकर पेरुमाल की पूजा की। मधुरान्थकम से निकलते समय, विपांडकर ने श्री राम से ज़ोर दिया कि उन्हें कुछ और समय तक यहीं रहना चाहिए। श्री राम ने संत से कहा कि वह रावण को हराने, सीता देवी को वापस लाने के मिशन पर हैं और उन्हें लंबे समय तक रुकने और लंका से वापस आते समय संत की मेहमाननवाज़ी स्वीकार करने का भरोसा दिया। रावण को मारने के बाद, श्री राम, श्री सीता और श्री लक्ष्मण के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या वापस जा रहे थे। विपांडकर से किए वादे के अनुसार, श्री राम रास्ते में मधुरान्थकम में रुके और पुष्पक विमान से उतर गए। ऋषि विपांडकर को भगवान श्री राम के दर्शन करने का सौभाग्य मिला, उन्होंने श्री सीता देवी का हाथ पकड़कर शादी की मुद्रा में दर्शन किए थे। श्री राम कुछ दिनों तक संत के घर पर रहे और फिर अयोध्या चले गए। जाते समय, श्री राम अपने साथ श्री करुणाकर पेरुमाल, श्री भू देवी और श्री नीला देवी को ले गए और अयोध्या में भगवान की पूजा की। बाद में, पट्टाभिषेकम के कई सालों बाद, श्री राम ने श्री हनुमान को श्री करुणाकर पेरुमाल को मधुरान्तकम वापस ले जाने और यहाँ भगवान की स्थापना करने और उनकी पूजा करने के लिए कहा। श्री हनुमान ने श्री करुणाकर पेरुमाल की स्थापना की और रेगुलर पूजा करने लगे। एक बार, श्री राम ने यहाँ श्री हनुमान को उसी मुद्रा में दर्शन दिए जैसे उन्होंने संत विपांडकर को दर्शन दिए थे (श्री सीता का हाथ पकड़कर)।

तो इस तरह मदुरंथकम का एरी काथा रामर मंदिर भगवान राम की ऐतिहासिक झील-रक्षक कथा, स्वामी रामानुज के पंचसंस्कार और पीढ़ियों से चली आ रही निष्ठावान दिव्य सेवा (कैंकर्य) के लिए प्रसिद्ध है। 

एरी काथा रामर के बारे में एक तथ्य प्रस‍िद्ध है क‍ि 18वीं शताब्दी में ब्रिटिश कलेक्टर लियोनेल प्लेस के समय भारी बारिश से झील का बांध टूटने पर भगवान राम और लक्ष्मण ने स्वयं पहरा देकर नगर की रक्षा की थी। और यह वही पवित्र स्थल है जहाँ स्वामी रामानुज को स्वामी पेरिया नंबि द्वारा 'पंचसंस्कार' (दीक्षा) प्राप्त हुई थी। यहाँ भगवान राम माता सीता का हाथ थामे हुए दिव्य मुद्रा में विराजमान हैं।

अब कैंकर्य सेवा प्रथा के बारे में जान लें क‍ि कैंकर्य (सेवा परंपरा) वंशानुगत सेवा है ज‍िसे   स्थानीय अर्चक परिवार और विशिष्ट आचार्यों द्वारा लगभग 37 पीढ़ियों से निरंतर निस्वार्थ सेवा व कैंकर्य किया जा रहा है। मंदिर में वेदम और दिव्य प्रबंधम के नित्य पाठ की प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया जाता है। 

माधवन इसे पूर्णरूपेण न‍िभा रहे हैं। ये बताता है क‍ि पांड‍ित्य एक कर्म नहीं वह पूरा का पूरा समाजशास्त्र है ज‍िसमें #संस्कृति सबसे ऊपर है...आराध्य की सेवा स‍िर्फ पूजा पद्धत‍ि नहीं है बल्क‍ि एक सांस्कृत‍िक धरोहर है जो अगली पीढ़ी में प्रवाह‍ित होती जाती है। माधवन इसका उदाहरण हैं।  

This #Video is for those who view their culture and education as separate, who delight in spreading the poison of caste discrimination in society every day...

Education becomes meaningful only when it is connected to values ​​and culture, along with knowledge. Leading an entire generation rooted in culture, enriched with values, and rich in knowledge, is Madhavan, a young "Archak Swami," who holds a PhD in Aeronautical Engineering from IIT Chennai and works as a director in a Bangalore-based company. Despite his busy schedule, Madhavan prioritizes his Maduranthakam Ramar Kainkaryam.

Scholarship is not a single act; it is a complete sociology, with #culture at its core.

- अलकनंदा स‍िंंह 


शनिवार, 20 जून 2026

अफ़सोस, राम लल्ला के नाम पर सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है


 अफ़सोस, सबसे बुरा डर सच होता दिख रहा है। राम लल्ला के नाम पर एक स्कैम हो रहा है। और यहाँ बताया गया है कि यह सिर्फ़ क्रिमिनल गड़बड़ी से कहीं ज़्यादा क्यों है।

ताज़ा खबर यह है कि SIT राम मंदिर डोनेशन चोरी की जांच में चंपत राय के साथी टीनू यादव के ख़िलाफ़ लीगल एक्शन की तैयारी कर रही है, सूत्रों का कहना है। डोनेशन गिनने वाले स्टाफ़ और बैंक अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी केस दर्ज हो सकते हैं। गिरफ़्तारी हो सकती है। शिकायत करने वाले अनिल मिश्रा का आरोप है कि डोनेटेड सोने की कोई रसीद नहीं दी गई और उनका दावा है कि बाद में उन्हें बताया गया कि सोना पहले ही पिघला दिया गया था।

ये डिटेल्स बताना बहुत दुख की बात है। राम मंदिर सिर्फ़ किसी देवता को ईंट-पत्थर से बनी श्रद्धांजलि नहीं है। यह उससे कहीं ज़्यादा है। यह एक सिंबल है जो हिंदू सभ्यता की विरासत को फिर से पाने का प्रतीक है। एक विरासत जो पहले बसने वालों के बसने से खतरे में पड़ी और बाद में एक पॉलिटिकल सोच से, जिसने हिंदू सभ्यता की शान को वापस पाने या उसकी तारीफ़ करने की किसी भी कोशिश को गलत तरीके से सेक्युलरिज़्म पर हमला बताया।

ठीक इसीलिए ये आरोप इतने परेशान करने वाले हैं। कोई सोच सकता था कि हिंदू विरासत को वापस पाने के इस बड़े प्रोजेक्ट के निशान उन लोगों के हाथों में सबसे सुरक्षित होंगे जिन्होंने इस आंदोलन को लीड किया था। अब इन खुद को "आस्था के रखवालों" कहने वालों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे खुद को साबित करें और यह पक्का करें कि वे उन्हीं तोड़-फोड़ और बेअदबी के कामों में शामिल न हों जिनके खिलाफ वे लंबे समय से लड़ते आ रहे हैं।

- Legend News

रविवार, 7 जून 2026

रुद्रपटनम शामशास्त्री: ज‍िन्होंने आचार्य चाणक्य के ल‍िखे 'अर्थशास्त्र' को गुमनामी से न‍िकाल हम तक पहुंचाया


 क्या आपने कभी सोचा है कि अगर मैसूर के एक सरकारी दफ्तर की धूल खाती आलमारी से ताड़ के पत्तों का एक बंडल न मिला होता, तो क्या हमें कभी पता चलता कि भारत के पास ढाई हजार साल पहले ही राजनीति, कूटनीति और अर्थशास्त्र का दुनिया का सबसे महान ग्रंथ मौजूद था? हम सब आचार्य चाणक्य और उनके 'अर्थशास्त्र' का नाम गर्व से लेते हैं, लेकिन इस महान ग्रंथ को गुमनामी के गहरे अंधेरे से निकालकर आधुनिक दुनिया के सामने लाने वाले असली भगीरथ कोई और नहीं, बल्कि रुद्रपटनम शामशास्त्री थे। वे एक ऐसे 'मौन तपस्वी' विद्वान थे, जिन्होंने अगर अपनी जिंदगी के कई साल पांडुलिपियों की खाक छानने में न लगाए होते, तो चाणक्य का ज्ञान हमेशा के लिए इतिहास के मलबे में दफन हो जाता।

शामशास्त्री का जन्म १८६५ में कर्नाटक के हासन जिले के एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर संस्कृत और प्राचीन लिपियों को जानने की एक अजीब सी तड़प थी। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर संस्कृत में महारत हासिल की और बाद में मैसूर के 'ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में एक लाइब्रेरियन और क्यूरेटर के रूप में काम करना शुरू किया। उस समय इस संस्थान का काम राजा-महाराजाओं और पुराने मठों से मिली प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजना था। यह काम बेहद उबाऊ और थका देने वाला था, जहाँ दिन भर धूल, दीमकों और सड़ते हुए ताड़ के पत्तों के बीच बैठना पड़ता था। लेकिन शामशास्त्री के लिए यह किसी खजाने की खोज जैसा था।

साल १९०४ की बात है, जब शामशास्त्री लाइब्रेरी के एक कोने में रखी उन पांडुलिपियों की कैटलॉगिंग बना रहे थे जिन्हें बरसों से किसी ने छुआ तक नहीं था। तभी तंजावुर के एक अज्ञात विद्वान ब्राह्मण द्वारा दान किए गए ताड़ के पत्तों का एक धूल धूसरित बंडल उनके हाथ लगा। वह लिपि आधुनिक कन्नड़ या देवनागरी नहीं थी, बल्कि 'ग्रंथ लिपि' थी, जो प्राचीन काल में संस्कृत लिखने के लिए दक्षिण भारत में इस्तेमाल होती थी। जब शामशास्त्री ने उन पत्थरों जैसे कड़े हो चुके पत्तों को धीरे-धीरे पलटना और पढ़ना शुरू किया, तो उनके रोंगटे खड़े हो गए। शुरुआती श्लोक में लिखा था कि यह अर्थशास्त्र प्राचीन आचार्यों के सिद्धांतों को संकलित करके बनाया गया है। शामशास्त्री समझ गए कि उनके हाथ में जो दस्तावेज है, वह कोई आम कहानी या कविता नहीं है। यह आचार्य चाणक्य का वह 'अर्थशास्त्र' था, जिसके बारे में दुनिया ने सिर्फ दूसरी किताबों में सुना था, लेकिन जिसका कोई सजीव वजूद पिछले १५०० सालों से किसी ने नहीं देखा था। पूरी दुनिया के इतिहासकार यह मान चुके थे कि यह ग्रंथ हमेशा के लिए विलुप्त हो चुका है।

ग्रंथ का मिलना तो सिर्फ शुरुआत थी, असली परीक्षा तो अब शुरू होनी थी। ताड़ के वे पत्ते वेंटिलेज और सदियों पुराने थे, कई जगह से टूट रहे थे और उन पर लिखी स्याही धुंधली हो चुकी थी। शामशास्त्री रोज़ घंटों मोमबत्ती या दीये की रोशनी में, मैग्निफाइंग ग्लास लेकर बैठते थे। वे एक-एक अक्षर को डिकोड करते, उसका मिलान करते और फिर उसे कागज़ पर उतारते। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में कूटनीति और शासन व्यवस्था के लिए ऐसे प्राचीन तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल किया था जो २०वीं सदी की शुरुआत के संस्कृत विद्वानों के लिए भी अजनबी थे। इसके समाधान के लिए शामशास्त्री ने कई-कई दिनों तक एक-एक शब्द के सही अर्थ को खोजने के लिए अन्य प्राचीन ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। लगभग पांच साल की हाड़-तोड़ दिमागी मेहनत और बिना किसी सरकारी मदद के, रात-रात भर जागकर उन्होंने पूरे ग्रंथ का अनुवाद और संपादन पूरा किया।

साल १९०९ में शामशास्त्री ने चाणक्य के 'अर्थशास्त्र' का पहला अंग्रेजी अनुवाद दुनिया के सामने रखा। इस प्रकाशन ने पूरी दुनिया के बौद्धिक जगत में एक भूचाल ला दिया। उस समय तक ब्रिटिश और पश्चिमी इतिहासकार यह ढिंढोरा पीटते थे कि भारत के पास कभी कोई राजनीतिक समझ या शासन चलाने का व्यवस्थित ज्ञान नहीं था और भारतीय तो सिर्फ पूजा-पाठ में डूबे रहते थे। शामशास्त्री की इस खोज ने पश्चिमी अहंकार को चूर-चूर कर दिया। दुनिया ने देखा कि जब यूरोप कबीलों में जी रहा था, तब भारत के पास टैक्स सिस्टम, जासूसी नेटवर्क, विदेश नीति, आपदा प्रबंधन और युद्ध कला पर इतना विस्तृत और वैज्ञानिक ग्रंथ मौजूद था। जर्मनी और यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान शामशास्त्री के इस काम को देखने मैसूर आने लगे।

शामशास्त्री के इस योगदान की भव्यता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के चांसलर और मैसूर के महाराजा के बीच एक बैठक चल रही थी, तो मैसूर के राजा ने महामना मदन मोहन मालवीय जी से पूछा कि वे उनके राज्य के लिए क्या कर सकते हैं? मालवीय जी ने तुरंत उत्तर दिया कि मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, बस मुझे अपने राज्य के विद्वान शामशास्त्री के दर्शन करा दीजिए, जिन्होंने भारत का खोया हुआ गौरव वापस दिलाया है। जब महात्मा गांधी मैसूर यात्रा पर आए, तो वे भी विशेष रूप से शामशास्त्री से मिलने पहुंचे और देश के इस अनमोल रत्न के सामने अपना सिर झुकाया।

इतना बड़ा काम करने के बाद भी शामशास्त्री कभी आत्मप्रशंसा के जाल में नहीं फंसे। वे मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और बाद में पुरातत्व विभाग के निदेशक भी रहे, लेकिन उनका रहन-सहन हमेशा एक साधारण दक्षिण भारतीय शिक्षक जैसा ही रहा। वे अक्सर कहते थे कि मैंने कुछ नया नहीं लिखा, मैंने तो बस उस ऋषि के ज्ञान पर जमी धूल को साफ किया है। साल १९४४ में यह महान मनीषी चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गया। आज हम जब भी मौर्य साम्राज्य की भव्यता, चाणक्य नीति की अचूकता और अखंड भारत के सिद्धांतों पर चर्चा करते हैं, तो उस चर्चा की नींव में रुद्रपटनम शामशास्त्री की उसी लाइब्रेरी के कोने में की गई खामोश साधना का पसीना छुपा होता है।

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शनिवार, 6 जून 2026

मुंह पर कॉकरोच का मास्क...पीठ पर लदा कॉकरोच की छाप वाला पंजा..उफ!

 



ज‍िस जीव का नाम लेते ही मेरे शरीर में एक अजीब सा घ‍िनौना अहसास जागने लगे ऐसे में जब चारों ओर इन्हीं कॉकरोची च‍ित्रों से भरा ऐसा नजारा द‍िखे तो सोच‍िए मन क‍ितने भीतर तक घ‍िन से भर गया होगा...जी हां, आज कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर मंतर पर प्रदर्शन था... ''था''  इसल‍िए ल‍िखा, क्योंक‍ि यह प्रयास बुरी तरह फेल हुआ। स्वयं इस पार्टी को जन्म देने वाला द‍िल्ली की गर्मी से घबराकर भाग खड़ा हुआ। 

बहरहाल अराजकता फैलाने का ये कोई पहला प्रयास नहीं था। मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के प्रयास तो नरेंद्र मोदी के सत्ता सँभालने के तुरंत बाद ही शुरू कर दिया गया था। इन्हें ये नहीं मालूम क‍ि मामूली से कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना अच्छे अच्छों को मांज देता है.... फ‍िर शत्रुहंता योग ईश्वर भी सहायक होता है... तो भइया बचके रहना था ना..।

अभ‍िजीत के. स‍िंह ने इस संबंध में बढ़‍िया ल‍िखा है क‍ि जब 2015 में मोदी सरकार ने विराट अनुभव वाले गजेंद्र चौहान को FTII का अध्यक्ष बनाया 4 महीने से भी अधिक समय तक विरोध प्रदर्शन किया गया। एक तरह से ये धमकी थी कि आप संस्थानों में अपनी विचारधारा के लोग नहीं बिठा सकते, और विशेषकर फ़िल्मी दुनिया में तो हस्तक्षेप नहीं ही कर सकते।

उसी वर्ष भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के बहाने किसानों को भड़काने की कोशिश की गई। यानी, किसानों को भड़काने की साज़िश भी पुरानी थी। अन्ना हजारे से लेकर मेधा पाटकर जैसों को जोड़ा गया। 2015 में ही भारतीय सेना में बगावत की ज़मीन तैयार करने का कुटिल प्रयास हुआ। OROP के बहाने सेना-इकोसिस्टम में घुसपैठ की कोशिश हुई।

अंत में थक-हारकर इन्होंने सोचा कि गुजरात भाजपा का पुराना गढ़ है और मोदी-शाह इसी प्रयोगशाला से निकले हैं तो सबसे पहले घर में वार किया जाए। पाटीदार आंदोलन भड़का दिया गया। एक 21 साल का लड़का यूँ ही आंदोलन का चेहरा नहीं बन गया। बाद में हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल हो गए। अब भाजपा में हैं।

2016 आते-आते ये रोहित वेमुला नाम का शिगूफा लेकर आ गए और एक ऐसा व्यक्ति जो दलित नहीं था उसके बहाने दलितों को सरकार के ख़िलाफ़ करने की कोशिश की गई। फिर JNU में कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसों को पैदा करके अफजल गुरु को कल्ट साबित करने की कोशिश हुई। फिर ये राष्ट्रीय राजधानी को घेरने की साज़िश में लग गए। अंततः इन्हें जाट आरक्षण का मुद्दा मिला और पंजाब-हरियाणा में आग लगाने का तानाबाना बुना गया। यशपाल मलिक जैसों को खड़ा किया गया।

फिर इन्होंने सोचा कि भारत की कमज़ोर नस कश्मीर को छुआ जाए। वहाँ आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद जमकर युवाओं को भड़काया गया। हिज़्बुल-हुर्रियत से लेकर तमाम अलगाववादियों को सक्रिय कर दिया गया। पाकिस्तान से समर्थन आ ही गया। इन्हें अंदाज़ा नहीं था कि इसी कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35A के हटने के बाद पूर्ण लोकतंत्र लागू होगा और पाकिस्तान में घुस-घुसकर ऑपरेशंस होंगे।

पाटीदार आंदोलन की भीड़ देखकर और गुजरात में आने वाले चुनाव को देखकर इन्होंने फिर मोदी-शाह के गढ़ में दलित आंदोलन भड़काया और जिग्नेश मेवाणी को पैदा किया। इस तरह इनका 2016 ख़त्म हुआ और ये मोदी सरकार का कुछ नहीं उखाड़ पाए।

फिर इन्हें लगने लगा कि भाजपा को उसी की पिच पर परास्त किया जाए और उस क्षेत्र को चुना जाए जहाँ पार्टी अबतक पाँव नहीं जमा पाई है। ये पहुँचे तमिलनाडु। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ जल्‍लीकट्टू को लेकर माहौल बनाया गया। PETA खुलकर शामिल हुआ। फिर ये अलग-अलग जगह अलगाववाद भड़काने की कुटिल योजना में लग गए। पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग में गोरखालैंड के लिए आंदोलन भड़काया गया।

2018 आते-आते ये समझ चुके थे कि मोदी सरकार और मजबूत हो रही है। ऐसे में इन्होंने 2019 की तैयारी शुरू कर दी। भीमा-कोरेगाँव के बहाने फिर से दलित-वामपंथी गठबंधन बनाने की कोशिश हुई, अर्बन नक्सलियों को काम पर लगाया गया। प्रकाश आंबेडकर से लेकर 'एल्गर परिषद' तक सब बुद्धिजीवी वर्ग में मोदी सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने में लग गए। सरकार ने धर-पकड़ शुरू की तो एमनेस्टी-CIVICUS जैसी संस्थाएँ अर्बन-नक्सलियों के समर्थन में उतर आईं।

गुजरात, रोहित वेमुला और भीमा-कोरेगाँव के बाद दलितों को भड़काने की एक और कोशिश हुई और इस बार भी जल्लिकट्टु की तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बहाना बनाया गया। SC/ST एक्ट को लेकर ख़िलाफ़ देशभर में आग लगाई गई। मोदी सरकार ने क़दम पीछे लिए और जिस तरह से भूमि अधिग्रहण वाले अध्यादेश को लैप्स हो जाने दिया था वैसे ही इस बार एक्ट के कड़े प्रावधानों को पुनः स्थापित किया। तमिलनाडु के थूथुकुडी में एंटी-स्टरलाइट प्रोटेस्ट्स हुए।

फिर इन्हें लगा कि हमला सीधे हिन्दू धर्म पर करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री पर से शर्त हटा दिया। तृप्ति देसाई और रेहाना फातिमा जैसे नास्तिकों व हिन्दू विरोधियों की चाल सफल हुई। पूरे केरल में हिन्दू सड़क पर उतर आए, लेफ्ट सरकार ने जमकर लाठियाँ बरसाईं और केस पर केस दर्ज किए।

खैर... इतना कुछ होने के बावजूद 2019 में एक बार फिर से भाजपा पहले से भी अधिक बहुमत के साथ सत्ता में आ गई तो विदेश में बैठी ताक़तों के कान खड़े हो गए। तबतक दुनियाभर में मोदी की जन-कल्याणकारी व जन-उत्थान की योजनाओं का डंका बज चुका था। विदेश में मोदी के जाते ही गर्वित भारतीय प्रवासी समुदाय उत्साहित हो जाता था। तख़्तापलट की साज़िश रचने वाली शक्तियों ने इस बार कुछ बड़ा करने की सोची।

किसान और मुसलमान - दो वर्ग चुने गए। किसानों में भी पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शक्तिशाली किसान। बिहार-बंगाल वाले मेहनती किसान नहीं। शाहीन बाग़ में CAA के ख़िलाफ़ तम्बू लग गया और दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का। साल भर ड्रामा चलता रहा, AAP सरकार दोनों को दाना-पानी देती रही। तबतक मोदी सरकार भी समझ चुकी थी कि बल-प्रयोग से मामला बिगड़ेगा। किसानों की बात मानते हुए तीनों कृषि क़ानून स्वयं प्रधानमंत्री ने TV पर आकर वापस लेने की घोषणा की। शाहीन बाग़ उपद्रव दिल्ली दंगों में परिवर्तित हुआ और हिन्दुओं का नरसंहार हुआ, तब दंगाइयों पर कार्रवाई शुरू हुई। हिकेन्स नेक को काटकर भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा रखने वाला शरजील इमाम जेल गया।

2020-21 में इन दोनों उपद्रवों के विफल होने के बाद विदेश में बैठी ताक़तों को बहुत बड़ा झटका लगा। वो समझ नहीं पा रहे थे कि करें क्या। उन्होंने कोरोना महामारी को ही औजार बनाने की ठानी। लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों में भय पैदा करने की कोशिश हुई। उनसे प्रदर्शन करवाए गए। इसी बीच हाथरस में एक लड़की की मौत के बहाने दलितों को फिर से भड़काया गया। इन्हें योगी में मोदी से भी बड़ा ख़तरा नज़र आने लगा। चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' जैसे खिलाड़ी उभरे। योगी के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचे जाने लगे। 2022 में योगी की वापसी हुई। गैंग को झटका लगा, ये कन्फ्यूज्ड हो गए।

कांग्रेस पार्टी परेशान हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा मुद्दा चुनें। पत्रकारों को अपने पाले में करके सड़क से लेकर संसद तक पेगासस जैसे जासूसी सॉफ्टवेयर के ख़िलाफ़ माहौल बनाया गया और इज़रायल के साथ सम्बन्ध ख़राब करने की कोशिश की गई।

2022 में इन्हें अग्निपथ का मुद्दा मिल गया। इन्हें लगने लगा कि अग्निवीर योजना से भारतीय सेना और अधिक ऊर्जावान व युवा हो जाएगी। इनके लिए ख़तरे की घंटी बज गई और इन्होंने देशभर में युवाओं को भड़काकर सार्वजनिक संपत्तियों का जमकर नुक़सान करवाया। FTII के समय इन्होंने फ़िल्म जगत को चुना था, आख़िरकार 2022 में ये खेल जगत पर पहुँचे। फिर से हरियाणा की एक लॉबी को सक्रिय किया गया और बृजभूषण शरण सिंह को बलि का बकरा चुना गया। पहलवानों ने जमकर आंदोलन किया, बृजभूषण WFI अध्यक्ष नहीं रहे और उन्हें सांसदी का टिकट नहीं मिला। विनेश फोगाट विधायक बन गईं। हालाँकि, ये आंदोलन भी विफल हुआ। बृजभूषण के बेटे सांसद बने और WFI अध्यक्ष पद पर उन्होंने अपने वफादार को बिठाया।

अंततः ये अम्बानी-अम्बानी करके भी थक चुके थे तो इन्होंने सोचा कि अडानी पर वार करते हैं। हिंडेनबर्ग को लाया गया। अडानी के ख़िलाफ़ रिपोर्ट पब्लिश करवाकर कंपनी के शेयर्स गिरा दिए गए। अमेरिका में केस करवा दिए गए। अंत में हुआ क्या? हिंडेनबर्ग बंद हो गया। पिछले ही दिनों अमेरिका ने अडानी के विरुद्ध चल रहे सारे मुक़दमों को बंद करने का ऐलान किया।

गुजरात, तमिलनाडु, कश्मीर, केरल और पश्चिम बंगाल के बाद इन्होंने नॉर्थ-ईस्ट को चुना। एक हिन्दू समाज को जनजातीय का दर्जा न मिल पाए, इसके लिए पूरे मणिपुर को जला दिया गया। फिर से कोर्ट के एक फ़ैसले को पकड़ा गया। जमकर विदेश से फंड आए, सारे चर्च आग लगाने में जुट गए और भाजपा को अपनी ही चुनी हुई सरकार को बरख़ास्त करना पड़ा। सैकड़ों लोग मारे गए। मैतेई हिन्दुओं के लिए किसी को सहानुभूति नहीं रही, ईसाई कुकी के लिए दुनियाभर से आवाज़ें आने लगीं।

मणिपुर के साथ-साथ महाराष्ट्र में भी इनका गेम चल रहा था। वहाँ मनोज जरांगे को पैदा करके मराठा आरक्षण को फिर से उभार दिया गया। जगह-जगह समाजों को लड़ाया जाने लगा। तबतक जाति जनगणना और आंबेडकर का मुद्दा उठाया ही जा चुका था। आरक्षण और संविधान ख़त्म करने के शिगूफे को चुनावी माहौल में ढाला गया। NEET पेपर लीक के कारण सरकार घिरी ही हुई थी, इस बहाने इन्हें बांग्लादेश और नेपाल में Gen Z प्रदर्शनों को भारत में दोहराने के सपने आने लगे। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले किसानों को भी फिर से एक्टिव किया गया और किसान आंदोलन वापस शुरू करवा दिया गया।

फिर... 2024 में BJP अकेले दम पर बहुमत से दूर रह गई और उसकी 240 सीटें आईं। विपक्षी खेमे में जमकर जश्न मनाया गया। हालाँकि, TDP-JDU ने सरकार तो बनवा दी लेकिन नीतीश-नायडू पर दबाव बनाया जाने लगा। मोदी सरकार संघ परिवार की पुरानी नीतियों पर ज़ोर-शोर से आगे बढ़ने लगी तब इन्हें समझ आया कि इतनी आसानी से मोदी-शाह को मात नहीं दी जा सकती। सारे उपक्रम फेल हुए।

सोनम वांगचुक को पालपोसकर बड़ा किया गया कि कम से कम लद्दाख में तो आग लगे और चीन को ही ख़ुश किया जाए। इस बार सरकार होशियार थी, तुरंत जेल में पटक दिया। लद्दाख में ये मणिपुर दोहरा नहीं पाए। तमाम विदेशी NGO बंद होने और NGOs को विदेशी फंडिंग बंद होने के कारण पूरा इकोसिस्टम दबाव में है। ये बहुत कुछ करने की औक़ात नहीं रखते हैं अब। ये नरेंद्र मोदी के लिए तैयारियाँ कर रहे थे, अमित शाह आउट ऑफ सिलेबस आ गए इनके लिए।

पूरा विश्व युद्ध में है, पेट्रोल-डीजल की किल्लत है, विपक्ष अब इधर ही उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समस्या के आने से पूर्व ही देशवासियों को आगाह करके रखते हैं। Gen Z को फिर से NEET के बहाने भड़काने की कोशिश चल रही है, सुगम परीक्षाएँ संचालित करवाना सरकार के लिए चुनौती है और ये समस्या जायज भी है। सरकार को इसपर काम करना होगा। एक बार फिर से खालिस्तानी किसानों को भड़काने की कोशिश हो रही है।

इसके बाद आया कॉकरोच का नंबर! तो इन तिलचट्टों यान‍ि ग‍िजग‍िजी सोच वाले कथ‍ित 'युवाओं' से सबको बहुत उम्मीदें थीं। सोशल मीडिया पर जमकर फॉलोवर्स मिले बाद में पता चला क‍ि ये सब बॉट के जर‍िए लाये गए थे इसील‍िए ज़मीन पर डफली गैंग के अलावा कोई नहीं पहुँचा। दिल्ली में AAP और पश्चिम बंगाल में TMC की हार ने ऐसा सदमा दिया है कि बड़े से बड़े रिजीम चेंज एक्सपर्ट्स भी भारत आकर पानी माँग रहे थे। कॉकरोचों वाली तैयारी बड़ी थी, लेकिन देश की मनोरंजन-पसंद जनता ने इन जोकरों को भाव नहीं दिया और जमकर मजे लिए। अभिजीत दीपके तो वृंदा करात का चेला निकला और सौरव दास से गर्मी नहीं बर्दाश्त हो रही।

हमें सजग रहना है। विदेशी ताक़तें सामान्यतः हार नहीं मानतीं लेकिन कोरोना से लेकर युद्ध जैसी स्थितियों में भी भारत ने जिस तरह के धैर्य का परिचय दिया है और यहाँ के नेतृत्व ने जिस तरह की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, उसने भारत विरोधी शक्तियों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने को विवश कर दिया है। जो श्रीलंका से लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल तक में सफल हो गया, वो भारत में मनोरंजन का मसाला बनकर रह गया।


गुरुवार, 28 मई 2026

श्रीराम ने लक्ष्मण जी को मेघनाथ से अंतिम युद्ध से पहले भिक्षा मांगने क्यों भेजा

 
जब सुबह मेघनाद से लक्ष्मण का अंतिम युद्ध होने वाला था | वह मेघनाद जो अब तक अविजित था | जिसकी भुजाओं के बल पर रावण युद्ध कर रहा था | आप्रितम योद्धा ! जिसके पास सभी युद्धस्त्र थे | उस दिन सुबह सुबह लक्ष्मण जी, राम जी का आशीर्वाद लेने के लिए जाते है, उस समय भगवान राम पूजा कर रहे थे ! पूजा समाप्ति के पश्चात राम जी ने हनुमानजी से पूछा अभी कितना समय हुआ है युद्ध होने में? हनुमानजी ने कहा कि अभी कुछ समय है | यह तो प्रातःकाल है | भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा ! यह पात्र लो भिक्षा मांगकर लाओ, जो पहला व्यक्ति मिले उसी से कुछ अन्न मांग लेना | सभी आश्चर्य में पड़ गए | आशीर्वाद की जगह भिक्षा ! लक्ष्मण जी जब भिक्षा मांगने के लिए निकले तो उन्हे सबसे पहले रावण का सैनिक मिल गया! आज्ञा अनुसार वे उनसे भिक्षा मांगते है और वो सैनिक भी उन्हें कुछ अन्न दे देता है | लक्ष्मण जी वह अन्न लेकर भगवान राम को अर्पित कर दिए | तत्पश्चात रामजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया …विजयी भवः | भिक्षा का मर्म किसी को समझ नही आया ! कोई पूछ भी नही सकता था... फिर भी यह प्रश्न तो रह ही गया… फिर भीषण युद्ध हुआ | अंत में मेघनाद ने त्रिलोक की अंतिम शक्तियों को लक्ष्मण जी पर चलाया | ब्रह्मास्त्र , पशुपात्र , और सुदर्शन चक्र | इन अस्त्रों की कोई काट नही थी | लक्ष्मण जी सिर झुकाकर इन अस्त्रों को प्रणाम किए | सभी अस्त्र उनको आशीर्वाद देकर वापस चले गए | उसके बाद राम का ध्यान करके लक्ष्मण जी ने मेघनाथ पर बाण चलाया ! वह हंसने लगा और उसका सिर कटकर जमीन पर गिर गया | उसकी मृत्यु के पश्चात संध्या के समय हनुमानजी ने पूछ ही लिया! प्रभु उस भिक्षा का मर्म क्या है ?


भगवान मुस्कराने लगे, और बोले में लक्ष्मण को जनता हूं… वह अत्यंत क्रोधी है लेकिन युद्ध में बहुत ही विनम्रता की आवश्यकता पड़ती है ! विजय तो वही होता है जो विनम्र हो | में जनता था मेघनाद ! ब्रह्मांड की चिंता नहीं करेगा| वह युद्ध जीतने के लिए दिव्यास्त्र का प्रयोग करेगा ! इन अमोघ शक्तियों के सामने विनम्रता ही काम कर सकती थी | इसलिए मेने लक्ष्मण को सुबह झुकना बताया ! एक वीर शक्तिशाली व्यक्ति जब भिक्षा मांगेगा तो विनम्रता स्वयं प्रवाहित होगी | लक्ष्मण ने मेरे नाम से बाण छोड़ा था… यदि मेघनाथ उस बाण के सामने विनम्रता दिखाता तो में भी उसे क्षमा कर देता |


इसलिए किसी भी बड़े धर्म युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए विनम्रता और धैर्य का होना अत्यंत आवश्यक है…

(संकल‍ित कहान‍ियां) 

सोमवार, 25 मई 2026

अज फ‍िर चर्चा में है इलीट ग्रुप की 'मीट‍िंग्स' का आलीशान ठिकाना... जिमखाना क्लब


 केंद्र सरकार ने लुटियंस दिल्ली के ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब पर बड़ा फैसला लेते हुए 5 जून तक उन्हें कैंपस खाली करने का आदेश दिया है. इसी आदेश के बाद अब आमजन के ल‍िए कौतूहल का व‍िषय बना ज‍िमखाना क्लब अब चर्चा के केंद्र में आ गया है और साथ ही चर्चा में आ गए हैं वो लोग भी जो इस क्लब और इसकी रवायतों की आड़ में ना जाने क्या क्या कुचक्र रचते रहे हैं।

करीब 1200 सदस्यों वाले इस क्लब में एंट्री बहुत मुश्किल से मिलती है. हर साल 100 नए लोगों को मेंबरशिप मिलती है. इस क्लब में मेंबरशिप के लिए 35-37 सालों का इंतजार करना पड़ता है. क्लब में 14000 लोगों की मेंबरशिप होगी. 3000 से अधिक एप्लीकेशन अभी भी वेटिंग  में है. लोग मोटी फीस चुकाकर इस क्लब की सदस्यता लेते हैं. अब ये क्लब मुश्किल में फंस गया है. 


बात अब सोचने की ये है क‍ि भारी भरकम मेंबरश‍िप फीस का इस्तेमाल क्या स‍िर्फ क्लब के रखरखाव में क‍िया जाता था, आख‍िर 27 एकड़ में बनी क‍िसी भी ब‍िल्ड‍िंंग के रखरखाव में क्या करोड़ों खर्च हो सकते है , वह भी कागजों दर्ज है क‍ि साफसफाई माली, फीस और केटर‍िंंग में  ये बड़ी रकम खर्च होी थी...मगर ये तो रहा वो तथ्य जो कागजों में है परंतु तस्वीर का दूसरा रुख एक ऐसे जमावड़े को रेखांक‍ित करता है जो क‍िसी तरह से न तो देशह‍ित का सोचता था और ना ही जनह‍ित का। ये क‍िसी से छुपा नहीं है क‍ि शाहीन बाग और यूसीसी और सीआईए  तथा क‍िसान आंदोलानों को हवा देने का काम इसी क्लब में बैठे ''इलीट'' लोग करते थे। 


बहरहाल अब फि‍लहाल तो केंद्र सरकार ने इनके पेट और मंसूबों पर जोरदार लात मारी ही दी है तो अब क‍िसी ''तोड़फोड़'' वाले आंदोलन को अगर देखें तो आश्चर्य  ना करें। 


दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास भले ही 113 साल पुराना हो, लेकिन देश में अंग्रेजों के जमाने में बने ऐसे एलीट क्लब की नींव 150 साल पहले पड़ी. सबसे पहले जिमखाना क्लब मुंबई में 1875 में खुला, जबकि दिल्ली में 1913 में. लुटियंस दिल्ली के पावर सेंटर 2 सफदरजंग रोड) में दिल्ली जिमखाना क्लब (DGC) महज सोशल क्लब नहीं है, बल्कि ब्रिटिश इतिहास, सत्तानशीनों के सियासी चर्चा के साथ एलीट क्लास के के मनोरंजन का केंद्र रहा है. केंद्र सरकार ने 27.3 एकड़ में फैले जिमखाना क्लब की बेशकीमती जमीन का लीज डीड रद्द कर 5 जून तक क्लब खाली करने का आदेश दिया है. ये प्रधानमंत्री आवास (लोक कल्याण मार्ग) के ठीक बगल  में है. सरकार ने इस क्लब को सुरक्षा और सैन्य जरूरतों की वजह से हाथ में लेने का फैसला किया है.

सेना प्रमुख की एंट्री रोक दी थी
भारत के पहले कमांडर इन चीफ फील्ड मार्शल केएम करियप्पा (तब जनरल) एक शाम क्लब के डाइनिंग हॉल में प्रवेश कर रहे थे, लेकिन कैजुअल ड्रेस में होने के कारण स्टाफ मेंबर ने उन्हें गेट पर ही रोक दिया. करियप्पा बिना किसी गुस्से के चुपचाप अपनी गाड़ी में लौटे, कपड़े बदले और फिर अंदर आए. उन्होंने उस स्टाफ की तारीफ की. 1930 और 1940 के दशक में जब भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था, तब यह क्लब ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय नेताओं के बीच एक अनौपचारिक चर्चा का केंद्र था. जिन्ना, नेहरू और पार्टी पॉलिटिक्स का ये केंद्र था.

कलकत्ता से दिल्ली आई राजधानी तो बना दिल्ली जिमखाना क्लब
किंग जॉर्ज पंचम ने 1911 में दिल्ली दरबार के दौरान इंडिया की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने की घोषणा की. इसके बाद दिल्ली में अंग्रेजी प्रशासनिक अधिकारियों और सैन्य अफसरों की बाढ़ सी आ गई. इन्हीं नौकरशाहों, फौजी अफसरों के मनोरंजन, खेलकूद के लिए 3 जुलाई 1913 को इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब बना, जिसमें से इंपीरियल शब्द आजादी के बाद हटाया गया.इस क्लब की मुख्य इमारत को 1920-30 के दशक में ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट टी रसेल ने डिजाइन किया था. रसेल ने कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति हाउस, जो पहले कमांडर इन चीफ का आवास था और बाद में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आधिकारिक निवास बना.

वायसराय की बीवी का स्विमिंग पूल
शुरुआत में जिमखाना क्लब का स्विमिंग पूल नहीं था. वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) में भी नहीं. वायसराय लॉर्ड विलिंगडन की पत्नी को स्विमिंग का बेहद शौक था, लेकिन उन्हें प्राइवेट  स्विमिंग पूल का इस्तेमाल करना पड़ता था. फिर उन्होंने खुद 21 हजार का डोनेशन देकर जिमखाना क्लब में स्विमिंग पूल बनवाया. 

विंबलडन के बाहर सबसे ज्यादा ग्रास कोर्ट
दिल्ली जिमखाना क्लब परिसर में 26 एक्टिव ग्रास टेनिस कोर्ट (घास के मैदान) हैं. लंदन के विंबलडन जैसी कुछ जगहों को छोड़कर ये सबसे बड़ी संख्या है. भारत के कई डेविस कप मैचों की मेजबानी इस क्लब ने की है.

देश के विभाजन का वक्त
देश का बंटवारा 1947 में हुआ तो भारत-पाकिस्तान की सेनाएं भी अलग हुईं. सेना की रेजीमेंटों के सिख, हिंदू और मुस्लिम अफसर यहीं आखिरी बार मिले और आखिरी ड्रिंक शेयर की थी. वो उनके लिए भावुक विदाई का पल था.

टक्सीडो से कुर्ता-पायजामा तक ड्रेस कोड
जिमखाना क्लब में कठोर ब्रिटिश ड्रेस कोड लागू थे. क्लब के डाइनिंग हॉल और ऑफिशियल स्थानों पर डिनर जैकेट (टक्सीडो) पहनना अनिवार्य था. लंबी लड़ाई के बाद जिमखाना क्लब ने जोधपुरी, बंदगला और कुर्ता-पायजामा जैसे पारंपरिक भारतीय पोशाकों को जगह ही.

दिल्ली जिमखाना क्लब की मेंबरशिप
दिल्ली जिमखाना क्लब की सदस्यता का आवेदन शुल्क अफसरों के लिए 1 और आम नागरिकों के लिए 1.5 लाख रुपये आवेदन शुल्क है. जबकि एक बार के शुल्क के तौर पर डेढ़ लाख अफसरों और 7.5 लाख रुपये तक का चार्ज आम नागरिकों को देना पड़ता है. फिर भी यहां कोटा होने के कारण मेंबरशिप के लिए 30-40 साल की वेटिंग होती है. क्लब के करीब 5600 मेंबरों में 40 फीसदी मेंबरशिप आईएएस, आईपीएस अफसरों, 40 फीसदी डिफेंस और 20 प्रतिशत ही आम नागरिकों को मिलती हैं. हालांकि फैमिली और अन्य को मिलाकर कुल 11 से 12 हजार की तादाद होती है.

मुंबई का जिमखाना क्लब
बॉम्बे के तत्कालीन गवर्नर सर फिलिप वोडहाउस ने साउथ मुंबई के आजाद मैदान के पास बेशकीमती जमीन इसके लिए दी. पहले यहां केवल ब्रिटिश पुरुषों को प्रवेश की अनुमति थी. भारतीय नागरिकों और महिलाओं को सदस्यता मिलना तो दूर मुख्य भवन में प्रवेश तक की मनाही थी.

भारतीयों के प्रवेश की मनाही
पहले ये क्लब नस्लवाद के प्रतीक थे.भारतीयों के प्रवेश की मनाही थी. 1920-1947 के बीच भारतीय राजाओं-महाराजाओं (पटियाला, ग्वालियर और जोधपुर के महाराजा) और अमीर कारोबारियों के लिए भी जिमखाना के दरवाजे खुले.1947 के बाद भारतीय सेना के जनरलों और आईएएस (IAS) अधिकारियों के हाथ में नियंत्रण आ गया. 

जिमखाना क्लब का विवाद
क्लब में गुटबाजी, वित्तीय गड़बड़ी और प्रबंधन में वर्चस्व का विवाद बढ़ा है.प्रशासनिक अफसरों और सैन्य अधिकारियों के गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई कोर्ट तक पहुंची. सरकार ने फिर इसका मैनेजमेंट संभालने के लिए एक समिति बनाई.

जिमखाना का मतलब
जिमखाना (Gymkhana) इंग्लिश वर्ड Gymnasium (व्यायामशाला) से मिलता है, लेकिन ये हिंदुस्तानी और फारसी से बना है. ये गेंदखाना से जिमखाना बना, जहां ब्रिटिशकाल में अफसर बॉल से खेलने आते थे. लेकिन उच्चारण की वजह से इसे अंग्रेजी के जिम दूसरा फारसी शब्द  खाना (घर/स्थान) मिलाकर जिमखाना किया गया. 

शनिवार, 16 मई 2026

सभ्यता के च‍िन्ह हैं भोजशाला के ये साक्ष्य.. हम अपनी धरोहरों के ल‍िए कोर्ट का मुंह ताकने को क्यों बाध्य हैं


 धार की भोजशाला को लेकर कोर्ट में फैसला एक ऐसे मुकदमे का है, जो स्वयंसिद्ध ही था। कोई नेत्रहीन व्यक्ति भी राजा भोज के इस महान स्मारक के खंडित पत्थरों को टटोलकर बता सकता है कि वह एक मंदिर में खड़ा है। मगर भारतीय लोकतंत्र में सब कुछ संभव है। प्रकरण में दूसरे पक्ष को इस ऐतिहासिक सच का सामना करना ही चाहिए कि पहचानें केवल स्मारकों की नहीं बदली गई थीं। जब मंदिरों को तोड़कर उनके स्वरूप बदले गए तब स्थानीय आबादी की पहचानें भी साथ ही बदली गईं। इसलिए दूसरा कोई पक्ष है ही नहीं। 

दिल्ली के कुतुबमीनार कॉम्पलैक्स से लेकर गुजरात में भरूच की मस्जिद तक आप तस्वीरों को इंटरनेट पर देखिए। जूम करके देखिए। सबकी कहानी एक जैसी है। सात सौ साल का समय कम नहीं होता, जब दिल्ली-लाहौर पर कब्जा जमाने के बाद तुर्कों और मुगलों ने पूरे देश में विध्वंस मचाया। मूर्तिपूजा के जन्मजात विरोध से उपजी धर्मांधता के शिकार हुए मंदिर भारत के लिए केवल पूजास्थल नहीं थे। वे भारत की बहुकलाओं और ज्ञान परंपरा के केंद्र थे, जिन्हें मिटाकर उनकी पहचानें बदली गईं। कश्मीर का मार्त्तण्ड मंदिर, बिहार में नालंदा-विक्रमशिला, बंगाल में पंडुआ के मंदिर, मध्यप्रदेश में विदिशा, धार, उज्जैन और मांडू, गुजरात में सोमनाथ, भरूच, चांपानेर, यूपी में अयोध्या और मथुरा तो चंद बड़े नाम हैं। गाँव-गाँव में खंडित मंदिरों और मूर्तियों का अंबार लगा है। 

भारत के हर राजवंश ने अपने समय में महान निर्माण कराए। आठवीं से बारहवीं सदी के बीच कोणार्क से होलेविडु और तंजौर तक लाखों शिल्पियों, वास्तुविदों, गणितज्ञों की पीढ़ियाँ सृजन में लगी रहीं। परमार राजवंश में राजा भोज 11 वीं सदी में अपनी राजधानी धार में ही भोजशाला का निर्माण नहीं कराया था। ऐसी दो और भोजशालाएँ थीं, जिन्हें इस्लामी आक्रांताओं ने मिटाया। पहली भोजशाला थी-उज्जैन में, दूसरी धार में और तीसरी मांडू में। राजा भोज के समय इनके नाम भोजशाला नहीं थे। ये संस्कृत में भारत की ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र थे, जिनका मूल नाम था-सरस्वती कंठाभरण।

 ग्यारहवीं सदी में अपने निर्माण के बाद तीन सौ वर्षों तक ये केंद्र सक्रिय रहे। परमारों के पराभव के बाद इनका वैभव भी इस्लामी आक्रांताओं के हाथों ध्वस्त कर दिया गया। उज्जैन परमार राजाओं की पहली राजधानी थी, जिसे राजा भोज धार लेकर आए। धार का मूल नाम धारा नगरी है और मांडू उनके समय "मंडपदुर्ग' के रूप में प्रतिष्ठित पर्वतीय मनोरम केंद्र था।

परमार राजवंश और उनके महान रचनात्मक योगदान पर तीन दशक तक अध्ययन और शोध करने वाले भारतीय मुद्रा एवं मुद्रिका अकादमी के निदेशक डॉ. शशिकांत भट्ट के अनुसार उज्जैन में महाकाल मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर अनंत पेठ मोहल्ले में 1990 के दशक तक एक उपेक्षित स्मारक था, जिसका डिजाइन बिल्कुल धार की प्रसिद्ध भोजशाला जैसा है। डॉ. भट्‌ट इतिहास के विद्यार्थियों को लेकर यहाँ कई बार आए थे। उनके अनुसार कोई नहीं जानता कि कब इस पर किसी इंतजामिया कमेटी का साइन बोर्ड टंग गया और पुरातत्व विभाग का यह लावारिस स्मारक नाजायज कब्जे में चला गया। मैंने इसके भीतर देखा कि किसी प्राचीन मंदिर के स्तंभों को निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें ताजे हरे गाढ़े ऑइल पेंट से पोता गया था।

 इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान भगवतीलाल राजपुरोहित की पुस्तक "भोजराज' में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ यह वर्णन है कि धार के समान ही उज्जैन और मांडू में भी राजा भोज ने संस्कृत की पाठशालाएं निर्मित कराई थीं। उज्जैन में वह शिप्रा के पूर्वी तट पर "बिना नींव की मस्जिद' कहलाता है। इंतजामिया कमेटी के साइन बोर्ड पर इसे मस्जिद बगैर नींव ही लिखा गया। यानी एक ऐसा स्मारक जो पहले से रहा होगा, अलग से नींव की आवश्यकता ही नहीं थी।

मांडू में शाही परिसर के लंबे किंतु विस्तृत क्षेत्र के एक आखिरी कोने पर दिलावर खाँ का मकबरा है। "विक्रम स्मृति ग्रंथ' में एक अध्याय है-मांडव के प्राचीन अवशेष। इसमें लिखा है कि मकबरा 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था। किंतु मकबरे की दक्षिणी दीवार के ढहने से नटराज शिव और देवियों की अनेक प्रतिमाओं सहित शिलालेख के काले पाषाण के टुकड़े मिले थे। सरस्वती की एक खंडित प्रतिमा भी यहीं मिली थी। उज्जैन में हुई एक संगोष्ठी में डॉ. भट्‌ट "परमारों की तीन भोजशालाएं' विषय पर शोध पत्र भी पढ़ा था। किंतु मीडिया की उपेक्षा के कारण जनसामान्य में यह तथ्य आ नहीं पाए। 

इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में एक पुस्तक है-"धार एंड मांडू।' 1912 में मेजर सी.ई. लुआर्ड द्वारा लिखी गई इस किताब में दिलावर खां के मकबरे की निर्माण सामग्री के आधार पर उसने इसे एक मुस्लिम इमारत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। वह कहता है कि यहां कभी मंदिर था।

कौन था दिलावर खाँ

दिल्ली में काबिज तुगलकों के समय 1392 में दिलावर खाँ गौरी को मालवा के नियंत्रण के लिए भेजा गया था। अलाउद्दीन खिलजी के समय परमार राजवंश के आखिरी राजा महलकदेव की पराजय के बाद वे मांडू के किले पर काबिज हो चुके थे। तुगलकों के खात्मे के बाद 1401 में मालवा में दिलावर खाँ ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। संभवत: पहले ही ध्वस्त किए जा चुके परमारों के इन महान् स्मारकों को उसी मलबे से एक साथ मस्जिद और मकबरों की शक्ल दिलावर खां के समय दी गई। मांडू के हिंडोला महल, अशर्फी महल और जहाज महल में प्राचीन हिंदू भवनों के ही पत्थरों का उपयोग आज भी साफ दिखाई देता है। मांडू म्युजियम में इस्लामी दौर के विध्वंस के सबूत भी देखे जा सकते हैं।

राजा भोज का रचना संसार

संग्रहालय की लाइब्रेरी में 417 पेज का यह शोध ग्रंथ भी भगवतीलाल राजपुरोहित की रचना है। इसके विभिन्न अध्यायों में राजा भोज के महान निर्माण कार्यों की चर्चा है। वे कहते हैं कि राजा भोज स्वयं एक कवि थे। उन्होंने उच्च कोटि के 60 ग्रंथों की रचना स्वयं की थी। उनकी विद्वानों की परिषद में पाँच सौ से अधिक सृजनशील लोग थे। इनके लिए ही धार में सरस्वती कंठाभरण या शारदासदम् नाम की एक सभा का निर्माण किया गया था। इसके पेज 309 पर शारदासदम को भारती भवन भी कहा गया है। यहीं 1034 में राजा भोज ने वाग्देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई थी, जो लंदन के ब्रिटिश म्युजियम में है। यह शोध ग्रंथ हमें बताता है कि धार की तरह ही उज्जैन में भी सरस्वती कंठाभरण के नाम से एक प्रासाद निर्मित किया गया था, जिसका गर्भग्रह प्रशस्तियों के शिलाखंडों से भरा हुआ था।

गुजरात के राजा जय सिंह सिद्धराज का उज्जैन आगमन

राजपुरोहित के अनुसार राजा जयसिंह सिद्धराज 1132 में यहाँ आए थे और उन्होंने राजा भोज द्वारा लिखित विविध विषयों के ग्रंथ स्वयं देखे थे। यही नहीं, सरस्वती कंठाभरण के नाम से भी राजा भोज ने दो ग्रंथ लिखे थे। एक व्याकरण का और दूसरा काव्यशास्त्र का। पेज 315 पर उल्लेख है कि मंडपदुर्ग के छात्रावास के अध्यक्ष गोविंद भट्‌ट के पुत्र धनपति भट्‌ट को भोज ने भूमिदान की थी। एक छात्रावास का संदर्भ यह संकेत करता है कि मांडू में भी कोई विद्यापीठ अवश्य रही होगी।