गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

देश को बेइज्‍ज़त करने के कुत्‍सित-अभियान... क्‍या ये देशद्रोह नहीं

सूचनाओं की बेलगाम आवाजाही एक ओर जहां कानून-व्‍यवस्‍था और  शासन-प्रशासन पर सवालिया निशान लगाती है वहीं दूसरी ओर समाज  को भी संवेदनाहीन बनाने का काम करती है। पिछले लगभग तीन चार  साल से मैं देख रही हूं कि 'यूं ही' तैरती भ्रामक सूचनाओं के आधार  पर अर्धसत्‍य और यहां तक कि अफवाहों को भी सत्‍य सिद्ध करने की  कोशिश में लोग 'किसी भी हद तक' चले जाते हैं। दु:ख की बात यह है  कि इस झूठ को कोई अन्‍य नहीं, बल्‍कि मीडिया ही जनजन तक पहुंचा  रहा है और सिलसिलेवार ढंग से कुछ गैरसरकारी संगठन इसे प्रदर्शनों  के जरिए देश से लेकर विदेशों तक पहुंचाने में मदद करते हैं। जिससे  देश और समाज की छवि बिगड़ रही है।

यूं तो इस नकारात्‍मकता को समय-समय पर मुंहतोड़ जवाब भी मिला  है, मगर बुरी तरह लताड़े जाने के बावजूद विध्‍वंसकारी सोच इतनी  आसानी से कहां रुकती हैं।

पिछले तीन दिनों में तीन घटनाओं का जो सच सामने आया है, वह  यह बताने के लिए काफी है कि देश की छवि को ध्‍वस्‍त करने के लिए  किस तरह बाकायदा ''कुत्‍सित-अभियान'' चलाए गए और देश-विदेशों में  इस आशय का विभ्रम फैलाया गया कि भारत में एक खास किस्‍म के  लोग, एक खास पार्टी तथा एक खास विचारधारा द्वारा ''कितने जघन्‍य  अपराध'' किए जा रहे हैं।

पहली घटना का सच

गत दिनों ''हिंदू आतंकवाद'' जैसे शब्‍द को फैलाए जाने का सच तब  सामने आना जब एनआईए कोर्ट ने 2007 में हुए हैदराबाद की मक्का  मस्जिद ब्लास्ट केस के मुख्‍य आरोपी स्वामी असीमानंद सहित सभी 5  सह आरोपियों को 11 साल बाद कुल 226 गवाहों के बयान और 411  कागजाती सुबूत पेश किए जाने के बावजूद बरी कर दिया। कोर्ट के  आदेश ने परोक्ष रूप से तत्‍कालीन रॉ अधिकारी आरवीएस मणि की  उस निजी तहकीकात को भी सच साबित किया जिसके अनुसार घटना  के लिए दोषी पाए गए पाकिस्‍तान के हूजी आतंकियों  को बाकायदा  रचे गए एक षड्यंत्र के तहत रिहा करते हुए निर्दोष लोगों को फंसाकर  हिंदू आतंकवाद अथवा भगवा आतंकवाद का नाम दिया गया। खैर ''हिंदू  आतंकवाद'' के नाम पर प्‍लांट की गई इस स्‍टोरी का ''द एंड'' तो कोर्ट  के निर्णय से गत 16 तारीख को हो ही गया, साथ ही वह इस हकीकत  से भी परिचित करा गया कि किस तरह हिंदू अब तक खास  राजनीतिक पार्टियों का सॉफ्ट टारगेट रहा है।

दूसरी घटना का सच

पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने कल बताया कि ट्रेन में सफर कर रहे  जुनैद की हत्‍या बीफ के कारण नहीं, बल्‍कि सीट को लेकर हुए झगड़े  के कारण हुई। इसी जुनैद को लेकर असहिष्‍णुता का ढिंढोरा पीटने वाले  गिरोह ने किस तरह बैनरों सहित देश-विदेश तक प्रदर्शन किया था,  यह आपको भी जरूर याद होगा।

अब सुनिए तीसरी घटना का सच

मुझे लगता है कि ये सर्वाधिक घिनौनी घटना है। होली के अवसर पर  दिल्‍ली यूनीवर्सिटी के रामजस कॉलेज की एक छात्रा ने अपने ऊपर  सीमेन से भरा गुब्‍बारा फेंके जाने की बात कही थी। कथित पीड़िता ने  इसके लिए सोशल मीडिया को हथियार बनाया और उसके बाद सक्रिय  हुए तथाकथित हिमायती तख्‍तियां लेकर निकल पड़े थे।इस घिनौने  लेकिन आधारहीन दुष्‍प्रचार की हवा भी कल आई फोरेंसिक रिपोर्ट ने  निकाल दी और बता दिया कि गुब्‍बारों में सीमेन नहीं था।

इन तीनों घटनाओं का सच सामने आने के बाद आप क्‍या सोच रहे हैं?  यही ना कि कोई सोच के इतने निचले स्‍तर तक कैसे जा सकता है।  कोई भी संगठन, पार्टी, व्‍यक्‍ति या मीडिया हाउस अपने समाज और  अपने देश का सिर इस तरह शर्म से झुकाने पर आमादा क्‍यों हो जाता  है, और वह भी विदेशों तक में।
दरअसल, ये वही तत्‍व हैं जो गांव-खेतों में, आदिवासी लिबास में,  अपनी गृहस्‍थी चला रही महिलाओं में, मां-बाप की सेवा करते बच्‍चों   में देश के पिछड़ेपन को खोजते हैं। ये वही तत्‍व हैं जो अब तक  देश-विदेश से ''मिल रहे'' धन में कमी आने पर बिलबिला रहे हैं। गोया  कि समाजसेवा सिर्फ प्‍लेकार्ड्स और प्रदर्शनों से ही चलती हो।

उक्‍त तीनों घटनाओं को लेकर प्रोपेगंडा खड़ा करने में कई तो मीडिया  हाउसेज चलाने वाले वो ''तथाकथित सेक्‍यूलर शामिल हैं, जो ''बेचारे'' व ''सत्‍यान्‍वेषी'' होने का ठेका लिए हुए हैं''।

बहरहाल, अच्‍छी खबर यह है कि कल दिल्‍ली हाईकोर्ट ने कठुआ  मामले में बच्‍ची की तस्‍वीर ज़ाहिर करने पर मीडिया घरानों को ऐसी  ही गैरजिम्‍मेदारी पर दंडित करते हुए 10-10 लाख का ज़ुर्माना लगाया  है और आइंदा के लिए ताक़ीद भी किया है कि वे 'सनसनी' और  'ब्रेकिंग न्‍यूज' के लिए नियमों के विपरीत जाकर कोई ऐसी सूचना  समाज के सामने पेश ना करें जो घृणा और विद्वेष फैलाती हो अथवा  किसी की प्रतिष्‍ठा को ध्‍वस्‍त करती हो।

भले ही हाईकोर्ट ने कठुआ गैंगरेप व हत्‍या के मामले में बच्‍ची की  फोटो ज़ाहिर करने पर ये ज़ुर्माना लगाया है परंतु बात ''इतनी सी ही''  नहीं है। अब समय आ गया है कि हम स्‍वयं किसी भी घटना पर जस  का तस विश्‍वास ना करें, देश की छवि को बिगाड़ने वाले कोई भी हों,  उनका सच जानने के लिए हमें स्‍वयं सब्र के साथ रियेलिटी चेक  अवश्‍य कर लेना चाहिए।

सोशल मीडिया और खबरों के इस भयावह बवंडर में देश की नकारात्‍मक छवि पेश करने वालों की ये हरकतें क्‍या किसी देशद्रोही कृत्‍य से कम हैं...और क्‍या अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी के नाम पर देश के खिलाफ षड्यंत्र रचने की छूट दी जा सकती है। किसी खबर को प्‍लांट करना और उसे चरणबद्ध तरीके से ''खास मकदस'' पाने  तक प्रसारित करते रहना भी देशद्रोह है। देशद्रोह सिर्फ तभी नहीं होता  जब हम देश के दुश्‍मनों का पक्ष लेकर बोलें...देशद्रोह तब भी होता है  कि जब हम अपने देश को बेइज्‍ज़त करने के लिए साजिश के तहत  किसी भी हद तक चले जायें।

शायद वह समय आ गया है कि अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का दायरा निर्धारित किया जाए और यह भी तय किया जाए कि अभिव्‍यक्‍ति की  स्‍वतंत्रा का मतलब देश की अस्‍मिता से खिलवाड़ करना कभी नहीं  हो सकता।
दलगत राजनीति की निकृष्‍टता वहां तक तो सहन की जा सकती है  जहां तक उससे मात्र 'दल' ही प्रभावित हो रहे हैं किंतु जब देश को  उसकी ''दलदल'' में घसीटा जाने लगे तो निश्‍चित ही वह अक्षम्‍य  अपराध बन जाता है। 
- अलकनंदा सिंह     

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

बूढ़े बरगद को बचाने के लिए लगाई गई है सलाइन ड्रिप

















अकसर हम नेगेटिव खबरों को ही अपनी चर्चा का केंद्रबिंदु मानकर समाचार सूत्रों को गरियाते रहते हैं और साथ ही वही समाचार देखते भी रहते हैं मगर  जबकुछ करने की बात आती है तो अपना पल्‍ला झाड़ने से भी गुरेज नहीं करते। आज आपको एक ऐसे ही अद्भुत समाचार से परिचित करवा रही हूं, जो हमारे भीतर  कुछ करने का जज्‍़बा तो भरेगा ही साथ दूसरों को गरियाने से पहले स्‍वयं की ओर देखने को भी बाध्‍य करेगा। समाचार  हैदराबाद के तेलंगाना के महबूबनगर जिले से आया है। 

महबूबनगर में स्थित बरगद का पेड़ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बरगद का पेड़ है। इसका अस्तित्व संकट में है, इसे बचाने के लिए अब इसे सलाइन ड्रिप चढ़ाई जा रही है। इसे फिर से जीवित करने के लिए यह कोशिश की जा रही है।
दुनिया भर में मशहूर पिल्लामर्री स्थित 700 साल पुराना यह पेड़ खत्म होने की कगार पर आ गया है। पेड़ पर दीमक का प्रकोप इतना है कि वह इसे खोखला किए जा रहे हैं। इसी कारण पेड़ का कुछ हिस्सा भी गिर चुका है। दिसंबर 2017 के बाद से यहां पर्यटकों का आना-जाना प्रतिबंधित किया जा चुका है। ऐसे में पेड़ का इलाज किया जा रहा है। इंजेक्शन से डाल्यूटेड केमिकल्स लगाए जा रहे हैं ताकि दीमक खत्म किया जा सके।
तने से केमिकल डालने पर नहीं मिली सफलता 
पेड़ का इलाज करने के लिए पहले इसके तने में केमिकल डाला गया लेकिन यह नाकामयाब रहा। फिर वन विभाग ने फैसला लिया कि जिस तरह अस्पताल में मरीज को सलाइन में दवा मिलाकर बूंद-बूंद चढ़ाई जाती है वैसे ही पेड़ में बूंद-बूंद करके सलाइन की बोतल से केमिकल चढ़ाया जाए।
बूंद-बूंद चढ़ाई जा रही ड्रिप 
अधिकारियों ने सलाइन ड्रिप में केमिकल मिलाया। इस तरह से सैकड़ों बोतलें तैयार की गईं। इन बोतलों को पेड़ में हर दो मीटर की दूरी पर लटकाया गया। उसके बाद पेड़ में बूंद-बूंद करके यह ड्रिप चढ़ाई जा रही है।
तीन एकड़ में फैला है यह विशाल पेड़
महबूबनगर जिला वन अधिकारी चुक्का गंगा रेड्डी ने बताया कि पेड़ इतना बड़ा है कि लगभग तीन एकड़ जमीन पर फैला है। पेड़ को बचाने के लिए उन लोगों ने विशेषज्ञ और आईएफएस ऑफिसर रहे मनोरंजन भंजा की सलाह ली। पेड़ को बचाने के लिए तीन तरह से इलाज और संरक्षण शुरू किया गया। पेड़ में बने छेदों में केमिकल डाला गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। बाद में सलाइन ड्रिप से केमिकल चढ़ाया जाना शुरू किया गया। अब यह फॉर्म्युला काम कर रहा है।
तीन तरीकों से हो रहा इलाज
पहले तरीके से संरक्षण करने के लिए पेड़ में सलाइन चढ़ाया जा रहा है। दूसरा पेड़ के जड़ों में केमिकल डायल्यूटेड पानी डाला जा रहा है। वहीं तीसरा तरीका पेड़ को सपॉर्ट के लिए अपनाया गया है। उसके आस-पास से कंक्रीट का स्ट्रक्चर बनाया गया है ताकि उसके भारी शाखाएं गिरने से बच सकें। पेड़ के तने को बचाने के लिए उसे पाइप्स और पिलर्स से सपॉर्ट दिया गया है।
अधिकारी खुद कर रहे निगरानी 
दिसंबर के महीने तक यह पेड़ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र था। यहां दूर-दूर से पर्यटक पेड़ को देखने आते थे। तब इसकी देखभाल का जिम्मा पर्यटन विभाग को था। पर्यटन विभाग का करना है कि उन्होंने पेड़ के संरक्षण के लिए तमाम प्रयास किए लेकिन कोई भी प्रयोग उसे दीमकों से बचाने में सफल नहीं रहा।
वन विभाग ने इस पेड़ के संरक्षण की जिम्मेदारी वापस ले ली और अब इसके जीर्णोद्धार के लिए काम हो रहा है। जिलाधिकारी रोनाल्ड रॉस ने बताया कि वह व्यक्तिगत तौर पर इस संरक्षित पेड़ के इलाज की निगरानी कर रहे हैं। अब पेड़ की हालत स्थिर है। उम्मीद है कि उसे कुछ ही दिनों में सामान्य कर लिया जाएगा। उच्चाधिकारियों से बात के बाद यहां पर्यटकों का आना फिर से शुरू किया जाएगा।

अब बताइये ये प्रयास हमारे व आपके भीतर कितनी सकारात्‍मकता भर गया, अगर भर गया है तो आज से ही नकारात्‍मक समाचारों से दूरी बनाकर देखिये, कितना सुकून मिलता है।


- Legend News/ Agency

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

… ये मील के पत्‍थरों से आगे का सफर है

मशहूर शायर बशीर बद्र साहब का एक शेर है- 

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है

आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा...

ये फ़कत एक शेर नहीं, उस जज्‍़बे का अक्‍स है जिसे आजकल हम रेसलिंग मैट्रेस, बॉक्‍सिंग रिंग्‍स, बैडमिंटन कोर्ट्स, शूटिंग रेंज नापते और मंजिलों की ओर बढ़ते कदमों के रूप में देख रहे हैं।
यूं भी जब मंजिलों पर नज़र हो तो बीच का रास्‍ता कितना लंबा है, कितना मुश्‍किलों भरा है, दुश्‍वारियों से कैसे लड़ना है, कौन इसमें साथ देता है और कौन पैर पकड़कर नीचे ले आने की कोशिश करता है, यह सब मायने तो रखता है मगर एक सबक की तरह। इन्‍हीं तमाम सबकों से जूझते-पार पाते हुए मिली मंज़िल के रूप में पोडियम पर मेडल लहराते हुए चेहरे कहीं भुलाए जा सकते हैं भला।

गांव की गली, पहाड़ों, दर्रों, जंगलों से पोडियम तक की राह कितनी कठिन रही होगी, यह तो हम सिर्फ कल्‍पना ही कर सकते हैं। इस सफ़र में आगे बढ़ने की खुशी कई गुना तब और बढ़ जाती है जब इन बच्‍चियों के सपनों को मां-बाप की आंखें देखती हैं।

हमारे खिलाड़ी लड़कों के साथ-साथ एक से बढ़कर एक मील के पत्‍थरों को नापती लड़कियां जब पोडियम पर खड़ी होती हैं तो उनके घर, गांव, मां-बाप, सब सातवें आसमान पर होते हैं। ऑस्‍ट्रलिया के गोल्‍डकोस्‍ट में चल रहे कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में अब ये नज़ारा आम सा हो गया है कि कौन कितने मेडल लेगा। सिर्फ लड़कियों का हौसला ही क्‍यों, तारीफ के हकदार हमारे लड़के भी हैं ।

मैं इसलिए कह रही हूं कि किसी एक की हौसलाअफज़ाई के फेर में हम दूसरों को कमतर नहीं आंक सकते। कोई भी विभेदकारी सोच खेलों में उच्‍चतर परिणाम नहीं दे सकती। लड़कियां अभी तक इसी विभेदकारी सोच के कारण ही तो पीछे बनीं रहीं, हालांकि अब भी उनकी गति कम ही है मगर खुशी है कि सफर शुरू हो चुका है।

इसलिए खेलों को हर हाल में जेंडरन्‍यूट्रल रखना ही होगा क्‍योंकि मेहनत लड़के भी कर रहे हैं और लड़कियां भी, मगर लड़कियां ज्‍यादा तारीफ की हकदार इसलिए हैं क्‍योंकि उन्‍हें खेल में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ संसाधनों की ही ज़रूरत नहीं थी, उन्‍हें  वो हौसला भी चाहिए था जो खेल को महारत हासिल करने तक के रास्‍ते को पार करने के लिए जरूरी होता है।

बशीर बद्र साहब के शेर की रौशनी में कहूं तो ये हौसले ही वो मील के पत्‍थर थे जो मंज़िल पाने का वायस बने। यही वो मंज़िलें हैं जिन्‍हें पाने के लिए बच्‍चियों ने अपनी जान हथेली पर रखी और उनके मां-बापों ने अपने घर व मवेशियों को भी बेचने में गुरेज़ नहीं किया। हां, इनमें से कुछ बेटियां संपन्‍न और मध्‍यम वर्ग से भी आईं मगर जो हासिल किया, वह स्‍वर्णिम है। 

बहरहाल, मीराबाई चानू, संजीता चानू, पूनम यादव, मनु भाकर, हीना सिद्धू , श्रेयसी सिंह, मनिका बत्रा, निक्की प्रधान ने एक ऐसी श्रृंखला बनाई है जिसे लगातार आगे ले जाने की चुनौतियां सबके सामने होंगी।

हम तो इस कामयाबी पर बहज़ाद लखनवी के लफ्ज़ों में इन बच्‍चियों को आगे बढ़ते देखना चाहेंगे कि- 

''ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए''।
-अलकनंदा 

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

घुमक्‍कड़ी के कारण ही केदारनाथ पांडेय से राहुल सांकृत्‍यायन तक का सफर कर गए वो

9 अप्रैल, 1893 को जन्‍मे केदारनाथ पांडेय कब और कैसे राहुल सांकृत्‍यायन बन गए, इसके पीछे उनकी हजारों मील लंबी यात्रायें रहीं। दूर पहाड़ों और नदियों के बीच दुर्लभ ग्रंथों की खोज में भटकने के बाद, उन ग्रंथों को खच्चरों पर लाद कर अपने देश में लाने वाले महापंडित राहुल सांकृत्यायन ही थे। उनका निधन भी अप्रैल माह में ही 14 तारीख 1963 को हो गया।

हजारों मील दूर पहाड़ों और नदियों के बीच दुर्लभ ग्रंथों की खोज में भटकने के बाद, उन ग्रंथों को खच्चरों पर लाद कर अपने देश में लाने वाले महापंडित राहुल सांकृत्यायन ही थे। घुमक्कड़ी को वे धर्म मानते थे। घुमक्कड़ी उनके जीवन का मूल मंत्र रही। आज दुनिया उन्हें एक यायावर, इतिहासविद, तत्त्वान्वेषी, युगपरिवर्तनकार साहित्यकार के रूप में जानती है। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिंदी साहित्य में सराहनीय है।
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में 9 अप्रैल, 1893 को जन्मे राहुल सांकृत्यायन के बचपन का नाम केदारनाथ पांडेय था। उनके पिता गोवर्धन पांडेय किसान थे। उनके बचपन में ही माता कुलवंती का देहांत गया। उनका पालन-पोषण उनके नाना-नानी ने किया था। प्राथमिक शिक्षा के लिए उन्हें गांव के ही एक मदरसे में भेजा गया। उनका विवाह बचपन में ही कर दिया गया था, पर राहुल ने गृहस्थी बसाने के बजाय कुछ और ही सोच रखा था। वे किशोरावस्था में घर छोड़ कर चले गए और एक मठ में साधु बन गए। बाद में कलकत्ता चले गए। सन 1937 में उन्होंने रूस के लेनिनग्राद में एक स्कूल में संस्कृत अध्यापक की नौकरी की और उसी दौरान ऐलेना नामक महिला से दूसरी शादी कर ली।
’सन 1930 में श्रीलंका जाकर उन्होंने बौद्ध धर्म पर शोध किया और तभी से वे ‘रामोदर साधु’ से ‘राहुल’ हो गए। सांकृत्य गोत्र के कारण सांकृत्यायन कहलाए। उनके ज्ञान भंडार के कारण काशी के पंडितों ने उन्हें ‘महापंडित’ की उपाधि दी और इस तरह वे केदारनाथ पांडे से महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गए।
साहित्य के प्रति रुझान
राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य ही नहीं, भारत के कई अन्य क्षेत्रों के लिए भी शोध कार्य किया। उन्होंने धर्म, दर्शन, लोकसाहित्य, यात्रा साहित्य, इतिहास, राजनीति, जीवनी, कोष, प्राचीन ग्रंथों का संपादन कर विविध क्षेत्रों में अहम काम किया।
राजनीतिक जीवन
राहुल सांकृत्यायन ने कई सामाजिक कुरीतियों को भी तोड़ा। एक बार उन्होंने बलि प्रथा के विरुद्ध व्याख्यान दिया तो अयोध्या के पुरोहित की हिंसा का शिकार होना पड़ा। जब वे तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में गए तो सत्ता के लोभी सुविधापरस्तों की तीखी आलोचना की। वे सत्य का साथ देते थे और इसी का उदाहरण सन 1947 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में दिया उनका भाषण है। उस समय उन्होंने जो भाषण दिया, वह अल्पसंख्यक संस्कृति और भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। नतीजतन उन्हें पार्टी की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। अपनी पुस्तक ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ और ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में मार्क्सवाद पर प्रकाश डाला है।
पटना संग्रहालय स्थित बिहार रिसर्च सोसाइटी में इन ग्रंथों को सहेजकर रखा गया है। इनका डिजिटलाइजेशन भी हो चुका है। मगर इनका अनुवाद अभी होना बाकी है
प्रमुख कृतियां
’अलग-अलग देशों की यात्रा के कारण वे बहुभाषी बने। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, पालि, भोजपुरी, उर्दू, पर्शियन, अरबी, तमिल, कन्नड़, तिब्बती, फ्रेंच और रूसी आदि भाषाओं में कई किताबें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियां हैं-
कहानी संग्रह : सतमी के बच्चे, वोल्गा से गंगा, बहुरंगी मधुपुरी, कनैला की कथा। उपन्यास : जीने के लिए, बाईसवीं सदी, जय यौधेय, भागो नहीं दुनिया को बदलो, मधुर स्वप्न, विस्मृत यात्री, दिवोदास।
आत्मकथा : मेरी जीवन यात्रा
जीवनी : बचपन की स्मृतियां, सरदार पृथ्वीसिंह, नए भारत के नए नेता, अतीत से वर्तमान, लेनिन, स्तालिन, कार्ल मार्क्स, माओ-त्से-तुंग, घुमक्कड़ स्वामी, मेरे असहयोग के साथी, जिनका मैं कृतज्ञ, वीर चंद्रसिंह गढ़वाली, सिंहल घुमक्कड़ जयवर्धन, कप्तान लाल, महामानव बुद्ध और सिंहल के वीर पुरुष।
यात्रा साहित्य : मेरी तिब्बत यात्रा, मेरी लद्दाख यात्रा, किन्नर देश की ओर, चीन में क्या देखा, तिब्बत में सवा वर्ष, रूस में पच्चीस मास, घुमक्कड़-शास्त्र
सम्मान
साहित्य अकादेमी पुरस्कार, पद्म भूषण, त्रिपिटिकाचार्य
निधन : दार्जिलिंग में 14 अप्रैल 1963 को उनका निधन हो गया।
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 27 मार्च 2018

नीड़ से बेदखल होने वाले मां-बापों के हक़ में... एक कदम

पहले आप डा. हरिवंशराय बच्‍चन की आत्‍मकथा के दूसरे खंड ''नीड़ का निर्माण फिर फिर'' की उन पंक्‍तियों को पढ़िए जो आज के इस लेख पर खरी उतरती हैं, हालांकि संदर्भ अलग-अलग हैं मगर दोनों के अर्थ एक ही है ।

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,

रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आ‌ई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,

रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से ऊषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

अब मैं अपनी बात कहती हूं...आज इन पंक्‍तियों को जिस संदर्भ में मैंने उद्धृत किया है, वह हमारे उन ''परित्‍यक्‍त-परिजनों'' से संबंधित है जिन्‍हें उनकी अपनी संतानों ने संपत्‍ति हथियाने के बाद शारीरिक व मानसिक स्‍तर पर प्रताड़ित करके नीड़ (घर) से दूर कर दिया और हालात के मारे ये लोग अब वृद्धाश्रमों की चौखट पर ''खाली हाथ'' बैठे खून के आंसू रोने को विवश हैं ।

दो दिन पहले आगरा स्‍थित रामलाल वृद्धाश्रम से आई खबर को एडिट करते हुए जो सच्‍चाई सामने आई, वह परवरिश में खोट, लालची प्रवृत्‍ति और ज़माने के दस्‍तूर जैसी दलीलों में नहीं छुपाई जा सकती।

खबर थी कि- 

''वृद्धजनों पर अत्याचार और उन्‍हें प्रताड़ित करने की घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। खबर के अनुसार प्रताड़नाओं के हद से गुजर जाने के बाद कई वृद्धजन  कैलाश मन्दिर के पास स्थित Ramlal Ashram में आ गये। जहां आश्रम के अध्यक्ष शिव प्रसाद शर्मा ने उन सभी का स्‍वागत-सत्‍कार किया गया और सभी को आश्रम में शरण दी।
अभी 1 माह में वहां ऐसे 25 दादा-दादी का आगमन हुआ है, जिनमें से कई को तो काउसिंलिग के द्वारा उनके परिजनों के पास भेज दिया गया, बाकी 15 का समझौता नहीं हो पाया लिहाजा उन्हें आश्रम में शरण दे दी गई।'' 

यहां पढ़ें पूरी खबर-

http://legendnews.in/respected-in-the-ramlal-ashram-of-the-old-age-expelled-from-the-homes/

यह  हमारे समाज की वो सूरत है जिसे भद्दा बनाने के लिए हम स्‍वयं ही दोषी हैं । जिन लैंगिक, आर्थिक असमानताओं से जुड़े विचारों को हमने ही समाज में पिरोया, ये सब उसके आफ्टर इफेक्‍ट्स हैं । जब आज से लगभग दो-तीन दशक पहले वृद्धजनों को तिरस्‍कृत किया जाने लगा तभी समाज की ओर से गंभीर प्रयास नहीं हुए। हालांकि ''हैल्‍पएज इंडिया'' जैसी गैरसरकारी संस्थाओं ने जिम्‍मेदारी संभाली भी, मगर वृद्धजनों की संख्‍या को देखते हुए यह प्रयास नाकाफी था। ''हैल्पएज-इंडिया'' ने 2014 में जारी अपनी रिपोर्ट के अंदर खुलासा किया था कि भारत में 10 करोड़ से अधिक बूढ़े लोग रहते हैं। इनमें से करीब एक करोड़ लोगों को उनके ही बच्चों ने सम्पत्ति विवाद के चलते घर से बाहर निकाल दिया है।

इत्‍तेफाकन उसी दिन इसी खबर के साथ एक और खबर आ गई कि केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय इसके लिए माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक देखभाल एवं कल्याण अधिनियम 2007 में संशोधन करने जा रहा है। बच्चों द्वारा सम्पत्ति अपने नाम करवा लेने के बाद बूढ़े माता-पिता को घर से निकाल देने की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए संशोधित अधिनियम को कैबिनेट की मंज़ूरी मिलते ही राज्‍य सरकारों को भेज दिया जाएगा। इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी राज्यों की होगी।

अधिनियम से जुड़े ये दो खास बिंदु हैं जिन्‍हें आप भी अवश्‍य जान लें- कि...
वित्तीय मदद सीमा बढ़ेगी
मां-बाप को जीवनयापन के लिए बच्चों की ओर से हर माह दी जाने वाली वित्तीय मदद (10 हजार रुपए) की सीमा भी हटाई जाएगी।

पीड़ित मां-बाप यहां शिकायत कर सकेंगे
राज्यों में मैंटीनैंस ट्रिब्यूनल या अपीलेट ट्रिब्यूनल में पीड़ित मां-बाप इसकी शिकायत कर सकेंगे। इन ट्रिब्यूनल के पास सिविल कोर्ट के अधिकार हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 53.2 प्रतिशत मामले ऐसे हैं जिनमें माता-पिता से दुर्व्यवहार का कारण सिर्फ सम्पत्ति है।

हालांकि ये सारी खबरें वृद्धजनों के प्रति एक सहानुभुति जगाती हैं और होना भी ऐसा ही चाहिए मगर यह उन वृद्धजनों को चौकन्‍ना भी करती हैं जो बच्‍चों पर ''अतिनिर्भर'' होकर हम अपनी आत्‍मनिर्भरता को कम करते जाते हैं। हम स्‍वयं अपनी ओर भी देखें और आंकलन करें कि जो गलतियां अब तक औरों से होती रहीं हैं, वे अब आगे हमसे न दोहराई ना जाऐं।

आगरा का रामलाल आश्रम जो कर्तव्‍य निभा रहा है, हमें उससे एक कदम आगे के बारे में सोचना होगा। जैसाकि वृंदावन में सुलभ संस्‍था के प्रयासों के बाद उत्‍तरप्रदेश सरकार ने किया। पहले बात-बात पर घरवालों की लालची-क्रूर प्रवृत्‍ति और तमाम अन्‍य कुप्रवृत्‍तियों का रोना रोने वाली ''वृंदावन की विधवाओं'' का आत्‍मनिर्भर होते जाना हमें बताता है कि जीवन के  सफ़र में  बनी-बनाई अवधारणाओं के अलावा भी जबतक जीवन है, बहुत कुछ करके उन बहुतों के काम आया जा सकता है जो जरूरतमंद हैं।

इस सबके बावजूद मैं यहां उन संतानों के लिए कुछ भी नहीं कह पा रही...एक शब्‍द भी नहीं...कतई नि:शब्‍द हूं... क्‍योंकि लालच और अपने माता-पिता की अवहेलना करने वाले जिस घृणा के पात्र है, उसे तो मेरे शब्‍द भी व्‍यक्‍त नहीं कर पा रहे।

सरकार के नीतिगत प्रयास, हैल्‍पऐज इंडिया के सहयोग और वृद्धाश्रमों की सेवा के बाद...

अब एक बार फिर डा. हरिवंशराय 'बच्‍चन' के उस 'नीड़ के निर्माण' की आवश्‍यकता है जो इन वृद्धजनों की ससम्‍मान वापसी करा सके, साथ ही आर्थिक -पारिवारिक-सामाजिक सुरक्षा दे सके और देने के साथ साथ उस सुरक्षा का अहसास भी करा सके।

-अलकनंदा सिंह 

गुरुवार, 22 मार्च 2018

पैसे की हवस: महिला खेलरत्‍नों से ये उम्‍मीद नहीं थी

सरकारी खर्चे पर ऐश करते परिजन भ्रष्‍टाचार की मुख्‍य वजह


जो राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हों...जो राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से लेकर पद्म पुरस्‍कारों से सुशोभित किये जा चुके हों...जो एक एक टूर्नामेंट से करोड़ों रुपये कमा रहे हों...जिनके लिए तमाम सरकारी सुविधाओं सहित गाड़ी, बंगला का अंबार लगा हो, उनसे आप ये उम्‍मीद तो नहीं कर सकते कि वो ज़रा से खर्चे के लिए भ्रष्‍टाचार कर रहे होंगे।

आटे में नमक बराबर हो या पूरा आटा ही सना हुआ हो, मगर भ्रष्‍टाचार तो भ्रष्‍टाचार ही रहेगा ना।  जी हां, भ्रष्‍टाचार की ये खबर किसी मामूली व्‍यक्‍ति से नहीं, बल्‍कि हमारी उन दो खेल विभूतियों से जुड़ी है जो  देश की नई उम्‍मीदों को ''पर देकर उड़ान भरने'' के लिए प्रसिद्ध हैं। ये हैं बैडमिंटन की स्‍टार पीवी सिंधु और साइना नेहवाल।

दरअसल, ऑस्‍ट्रेलिया के गोल्‍ड कोस्‍ट में आयोजित कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में हिस्‍सा लेने के लिए जा रही पीवी सिंधु के साथ उनकी माता विजया पुसरला और साइना के साथ उनके पिता हरवीर सिंह को ''सरकारी खर्चे'' पर बतौर बैडमिंटन अधिकारी जाने के लिए ओलंपिक संघ के नौकरशाहों ने पूरा बंदोबस्‍त कर दिया था जबकि इन दोनों खिलाड़ियों के माता-पिता का किसी खेल से कोई वास्‍ता नहीं है, फिर भी वो भारतीय दल की लिस्ट में बतौर अधिकारी शामिल किए गए। हालांकि अच्‍छी बात ये रही कि खेल मंत्री ने इन्‍हें ''सरकारी खर्चे'' पर भेजने से मना कर दिया है। 

बात यहां किसी खिलाड़ी के माता या पिता को सरकारी खर्चे पर भेजने की नहीं है, बात है उस भ्रष्‍टाचारी प्रवृत्ति की जो सरकार के और हमारे टैक्‍स का दुरुपयोग करने से जुड़ी है।
इन दोनों ही खिलाड़ियों के खेल का हम  सम्मान करते हैं मगर उनके भ्रष्‍टाचार को कतई बर्दाश्‍त नहीं किया जा सकता। ये इनके द्वारा जानबूझकर किया जाने वाला एक गंभीर अपराध है।

भ्रष्‍टाचारी प्रवृत्ति और पैसे की हवस का कोई अंत नहीं होता, कोई अंधा व्‍यक्‍ति भी कह देगा कि इतना कमा लेने के बाद तो ये खिलाड़ी अपने परिजनों को निजी खर्चे पर दुनिया में कहीं की भी सैर करा सकती हैं ।

बहराहल, तारीफ करनी होगी खेलमंत्री राज्‍यवर्धन सिंह राठौर की, जिन्‍होंने खेलों में सरकारी पैसे की ''लूट'' करने वाले इंडियन ओलंपिक संघ की कारगुजारी पर न केवल शिकंजा कसा बल्‍कि इस धांधली के लिए जिम्‍मेदार लोगों को ''संभल जाने'' की चेतावनी भी दे दी।

इससे पहले तो 2012 में लंदन ओलंपिक में सानिया मिर्जा की मां नसीम मिर्जा ''टेनिस मैनेजर'' बनकर  सरकारी खर्चे पर यात्रा कर ही चुकी हैं। ये तो वो मामले हैं  जो संज्ञान में आए , वरना दबे छुपे मामलों का तो बस अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। करोड़पति खिलाड़ियों की इस हरकत से हमें चौकन्‍ना रहने की हिदायत भी मिलती है और यह भी कि तमाम पुरस्‍कारों से नवाजे जाने वाले  भी हमारी आंखों में धूल झोंक सकते हैं।

कहते हैं ना कि जब भोजन पेट से ऊपर खा लिया जाए तो वह अफरा कर देता है, राज्‍य व केंद्र सरकारों को यह भी सोचना होगा कि किसी पदक को जीतने के बाद किसी भी खिलाड़ी को सरआंखों पर बिठाते हुए उन पर जो धनवर्षा की जाती है, उसे भी खत्‍म किया जाना  चाहिए।

इनाम-इकराम तो हौसलाअफजाई का माध्‍यम होते हैं मगर उतना ही जितना जरूरत हो। इस तरह गाड़ी-बंगला देकर इन पर ''लुटाया गया'' धन ना जाने कितने ऐसे खिलाड़ियों की ज़िंदगी संवार सकता है जो एक रैकेट तक खरीदने के लिए अपनी तमाम जमापूंजी को दांव पर लगा देते हैं, देश में अब भी आमजन के बच्‍चों के लिए खेल सुविधायें पाना अनिश्‍चित नहीं तो दुरूह अवश्‍य है।

जो भी हो, इस खुलासे से बड़े स्‍तर पर खिलाड़ियों द्वारा धनलाभ के लिए की जाने वाली ओछी हरकतें हमें सबक जरूर देती हैं और बताती हैं कि बेशुमार दौलत, शौहरत तथा इज्‍जत पाने के बावजूद पैसे की हवस किसी को कितने नीचे गिरा सकती है। फिर वह चाहे कोई पुरुष हो या महिला।

पीवी सिंधु और सानिया नेहवाल का यह अपराध इसलिए कहीं अधिक गंभीर हो जाता है कि सामान्‍य तौर पर महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक संवेदनशील तथा अधिक नेकनीयत माना जाता रहा है।

- अलकनंदा सिंह

बुधवार, 21 मार्च 2018

बीसवेंं अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार घोषित

भोपाल । साठ महत्वपूर्ण ग्रंथोंं के सर्जक एवं चार सौ चित्रों के चित्रकार स्व. अम्बिका प्रसाद दिव्य की स्मृति में विगत उन्नीस वर्षो से दिये जा रहे राष्ट्रीय ख्याति के दिव्य पुरस्कारो की घोषणा उनकी जन्म जयन्ती 16मार्च 2018 को साईंनाथ नगर, महाबली कोलार, भोपाल स्थित साहित्य सदन में आयोजित एक सादा समारोह में श्री जगदीश किंजल्क ने की ।
इस वर्ष के पुरस्कारों में उपन्यास विधा में श्रीमती कुसुम खेमानी (कोलकाता ) को उनके उपन्यास ” जडिया बाई ” को दिया जायेगा । द्वितीय और तृतीय क्रम में आने वाले उपन्यास में ” हेमू ” ( डॉक्टर तारकेश्वर उपाध्याय ) ” मोतीहारी एवं चतुर्भुज ” (डॉक्टर अरविंद जैन भोपाल ) को दिव्य प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे । व्यंग्य विधा में श्री सुदर्शन सोनी (भोपाल ) को उनकी कृति आरोहण के लिए दिया जायेगा । इसके साथ ही दिव्य प्रशस्ति पत्र पाने वाले व्यंग्यकार हैं श्री आलोक सक्सेना (दिल्ली ) उनकी कृति ” पप्पू बन गया अफसर ” एवं बिहारी दुबे ( पन्ना ) को उनकी कृति ” चौंकना मना है ” के लिये प्रदान किये जायेंगे ।कहानी विधा में वीकानेर की इंजीनियर श्रीमती आशा शर्मा को उनकी कृति ” उजले दिन मटमैली शामें ” को दिव्य पुरस्कार प्रदान किया जायेगा ।
दिव्य प्रशस्ति पत्र पाने वाली लेखिकायेंं हैं डॉक्टर सुमन लता श्रीवास्तव (जबलपुर ) कृति ” कटघरे “
काव्य विधा में कविता के साथ नयी कविता एवं गजल विधा को शामिल किया गया है नयी कविता के लिए सुश्री लक्ष्मी रूपल , जीरकपुर ( पंजाब ) की कृति ” तेरा पानी मेरा पानी ” को दिव्य पुरस्कार प्रदान किया जायेगा । अहमदाबाद के घमंडी राम किशोर मेहता, कृति “अंधेरे का समाजवाद ,”श्री गंगा शरण प्यासा (मरैना ) कृति ” गंगा हजारिका ” श्री ब्रज श्रीवास्तव( विदिशा ) को उनकी कृति ” ऐसे दिन का इंतजार “तथा श्री शैलेंद्र सिंह शैल कति ” तन्हा साया ” को प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे । बाल साहित्य के अंतर्गत भोपाल के डाक्टर परशुराम शुक्ल को उनकी कृति ” परमचंद के कारनामे ” के लिये दिव्य पुरस्कार प्रदान किया जायेगा । इसी क्रम में प्रशस्ति पत्र गुडगांव के श्री घमंडीलाल अग्रवाल को उनकी कृति “नये निराले गीत ” के लिये दिया जाएगा ।
निबन्ध विधा का दिव्य पुरस्कार जबलपुर की लेखिका डॉक्टर तनूजा चौधरी को उनकी कृति साठोत्तर लेखिकाओं का ” स्त्री-विमर्श ” के लिये दिया जाएगा एवं दिव्य प्रशस्ति पत्र चौन्ने की डॉक्टर ए . फातिमा को उनकी कृति “डॉक्टर विश्व नाथ त्रिपाठी के साहित्य में चित्रित ग्रामीण जीवन सभ्यता के लिए दिया जायेगा । इस वर्ष देश के विभिन्न अंचलोअं से दिव्य पुरस्कारों हेतु 156 पुस्तकें प्राप्त हुईं ।
राष्ट्रीय ख्याति के दिव्य पुरस्कारों के सम्मानीय निर्णायक
विद्वान हैं – श्री रामदेव भारद्वाज (कुलपति ) 2- श्री प्रभु दयाल मिश्र 3- डॉक्टर राधा बल्लभ शर्मा 4- श्री घनश्याम सक्सेना 5- डॉक्टर विनय राजाराम 6- श्री मयंक श्रीवास्तव 7- श्रीमती विजय लक्ष्मी विभा 8-राजेन्दर नागदेव 9 – श्री हरि जोशी 10- श्री पी.डी खैरा 11- श्री अरुण तिवारी 12- श्री राधेलाल विजघावने 13- डॉक्टर सुनीता खत्री 14- श्री राग तैलंग 15-श्री मती राजो किंजल्क ।
स्मरणीय है कि राष्ट्रीय ख्याति के दिव्य पुरस्कार विगत बीस वर्षो से प्रदान किये जा रहे हैं । संयोजक श्री जगदीश किंजल्क ने बताया कि इक्कीसवे दिव्य पुरस्कारों के लिये कृतियाँ शीघ्र ही आमंत्रित की जायेंगी ।
प्रस्‍तुति: अलकनंदा सिंह

रविवार, 18 मार्च 2018

ये किस दयार पर खड़े हैं हम...कि देवी भी हम और गाली भी

आज से नवदुर्गा हमारे घरों में विराजेंगी, पूरे नौ दिन देश में ऋतुओं के  माध्‍यम से जीवन में उतरते नवसंचार को उत्‍सवरूप मनाने के दिन हैं। एक  समाज के तौर पर  इन नौ दिनों में हम अपने संस्‍कारों के किस किस स्‍तर  को समृद्ध करें और सोच के किस स्‍तर को परिष्‍कृत करें, यह भी सोचना  आवश्‍यक हो गया है। यह कैसे संभव है कि एक ओर हमें 'दुर्गा' कहा जाए और  दूसरी ओर हमारे ही नाम पर गालियों का अंबार लगा दिया जाए।

सोच का यही ''संकट'' हमारी सारी आराधनाओं और सारी खूबियों को मिट्टी में  मिलाए दे रहा है।

मंदिरों में भारी भीड़ और हर मंदिर में देवी प्रतिमा को निकटतम से निहारने  की होड़ के बीच यह प्रश्‍न अनुत्‍तरित ही रह जाता है कि आखिर हम किस देवी  की आराधना कर रहे हैं और क्‍यों कर  रहे हैं।

देवी-पूजा के अर्थ एवं औचित्‍य को समझाने वाला शायद ही कोई मंदिर किसी  के सामने हो क्‍योंकि अगर ऐसा होता तो आज ''गालियां'' शब्‍द विलोपित हो  गया होता।

मां-बहन का नाम लेकर दी जाने वाली इन ''गालियों'' का समाजशास्‍त्र ऐसा है  कि हर वर्ग, धर्म, समाज, प्रदेश, वर्ण में ये समानरूप से मौजूद हैं। इन्‍हें  आजतक कोई मिटा तो नहीं पाया, बल्‍कि अब इनका विस्‍फोटकरूप हमारे  सामने आ रहा है कि अब ये गालियां महिलाओं की जुबान पर भी बैठती जा  रही हैं। शारीरिक बनावट से लेकर शारीरिक संबंधों को घिनौने अंदाज़ में पेश  करने वाली ये महिलायें, अब पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला रही हैं।

साहित्‍य से लेकर सोशल मीडिया तक इन नए ज़माने की महिलाओं की गालियों  वाली अभिव्‍यक्‍ति हमें सामाजिक और संस्‍कारिक तौर पर ग़रीब बना रही है।  प्रत्‍यक्षत: आधुनिक होने के नाम पर सोच का एक ऐसा निकृष्‍टतम स्‍तर उभर  रहा है जिसका जिम्‍मा अब स्‍वयं इन महिलाओं ने उठा लिया है और इनमें से  ना तो कोई निम्‍न वर्ग से है और ना ही कम पढ़ी-लिखी। 

पुरुषों से बराबरी करनी है तो बुद्धि-कौशल-सामाजिक सरोकारों को और ऊंचा  उठाने के लिए करें ना कि उनके दोषों को अपनाकर। जिन्‍हें दूर करने की  जिम्मेदारी अभी तक कम से कम घर की महिलाऐं निभा रही थीं आज उन्‍हीं  की बच्‍चियां गालियों में स्‍वयं के ही शरीर को नंगा कर रही हैं। तो फिर किस  देवी की आराधना करें हम।

शक्‍ति आराधना किसी देवी स्‍वरूपा मूर्ति की आराधना नहीं है, ऋतुओं के  संधिकाल में अपनी ऊर्जा को एक जगह संचित करके उसकी अनुभुतियों को  स्‍वयं के भीतर महसूस करने का पर्व है ये। इस पर्व पर यदि हम समाज में  मौजूद उक्‍त ''गालियों वाली'' शाश्‍वत-स्‍थितियों को बदल  पाने का संकल्‍प और  साहस दिखायें तो संभवत: दुर्गा मंदिरों से उतर कर हमारे दिलों में बैठ जायें  और फिर उन्‍हें तलाशने किसी भी मंदिर जाना ही नहीं पड़ेगा।


देवी दुर्गा का रूप बताई जाने वाली हर महिला के ''संबंधों'' को तार तार करने  वाली ये गालियां सोच के उस निम्‍नतर स्‍तर को दर्शाती हैं जिसके अभी तक  हम पुरुषों को जिम्‍मेदार ठहराते आए थे। मां-बहन की गालियां आमतौर पर  पुरुष ही दिया करते थे और महिलाओं को गालियां मुश्किल से ही हजम होती हैं  क्‍योंकि सब उन पर ही तो पड़ती हैं।
अमूमन मां...बहन...बेटी...के ही नाम पर ये गालियां चलती रहीं और कुलीन  वर्ग इसे निम्‍नवर्गीय मानकर महिलाओं के आगे अपशब्‍द कहने से बचता रहा  परंतु अब तो स्‍थिति उलट रही है। सामाजिक ताने-बाने के लिए ये उल्‍टी  स्‍थिति भयानक भी है।

ऋग्‍वेद में कहा गया है- “आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:”
Let noble thoughts come to us from every side.(Rigveda 1-89-1)

ऋग्‍वेद के इस सूत्र को याद रखते हुए आज मैं बस ये कामना ही कर सकती हूं  कि हम सभी (पुरुष व महिलायें) अपने संस्‍कारों को सहेजने का और ऐसी गिरी  हुई सोचों के उभरने का विरोध करें और अधिक ना सही कम से कम अपनी  नई पीढ़ी को इसके प्रकोप से बचा सकें। यही होगी नवदुर्गा की सच्‍ची आराधना  और यही होगा नव संवत्‍सर का नव संकल्‍प।
- अलकनंदा सिंंह

गुरुवार, 8 मार्च 2018

हमें अष्‍टभुजी रहने दो, औज़ार ना बनाओ

Painting by arun samadder aparajita- on womens day 
देवि दुर्गा की अष्‍टभुजाएं देखी हैं आपने? सभी भुजाओं में कोई ना कोई अस्‍त्र-शस्‍त्र मौजूद होता है जबकि शक्‍ति दुर्गा की भुजाओं में होती है, ना कि उन अस्‍त्र-शस्‍त्रों में। ऐसे में सवाल यह उठता है कि फिर अस्‍त्र-शस्‍त्रों को उनके हाथों में क्‍यों दर्शाया गया है? राक्षसों का नाश तो देवि अपनी भुजाओं से ही कर सकती थीं।
दरअसल, यह सब शस्‍त्र प्रतीक हैं उस शक्‍ति के जो वे भुजाएं वहन करती हैं।
सीधा सीधा अर्थ यह है कि करुणा, दया और प्रेम के साथ-साथ हर महिला अपने भीतर एक ऐसी शक्‍ति समाहित रखती है जो समय-समय पर उसे ना सिर्फ राक्षसों से बचाती है, बल्‍कि स्‍वयं अपने उत्‍थान के लिए आवश्‍यक ऊर्जा भी प्रदान करती रहती है।
राक्षसों की मौजूदगी सिर्फ प्रत्‍यक्षत: शारीरिक रूप से प्रताड़ित करती दिखे ऐसा नहीं है, वो मानसिक रूप से तोड़ने में भी कोई कसर नहीं छोड़ती। तब ऐसे में महिलाएं अपनी भुजाओं में समाहित शक्‍ति का प्रयोग करती हैं, ये शक्‍ति स्‍वत:स्‍फूर्त संचालित होती है। कब चुप रहना है, कब बोलना है, कब अपनी शक्‍ति का इस्‍तेमाल करना है, कब उसे शांत रखकर घर-बाहर शांति बनाए रखनी है। सामंजस्‍य बनाए रखना हम महिलाओं का स्‍वाभाविक गुण होता है परंतु अब ये समीकरण बदलने लगे हैं।
महिलाओं पर शारीरिक हिंसा से संबंधित समाज-कल्‍याण विभाग के आंकड़े और देश की विभिन्‍न न्‍यायालयों में दायर मामलों को देखें तो 80% मामलों में आरोपपत्र झूठे लगाए जाते हैं, जिन्‍हें बाद में वापस ले लिया जाता है। वापस लिए गए मामलों में सभी वादी महिलाएं स्‍वयं को निर्दोष साबित करते हुए पारिवारिक दबाव अथवा टारगेट किए गए ”दोषी पुरुष” को अज्ञात बताकर पहचानने से के इंकार करके ”सशर्त-समझौते” को अंजाम देती हैं। ये ”सशर्त-समझौते” कैश अथवा काइंड के तौर पर ”काम आ” जाते हैं। महिलाएं यदि दलित वर्ग से हुईं तो दोषी बताए गए पुरुष को न्‍यायिक ही नहीं सामाजिक प्रतिष्‍ठा के स्‍तर पर चुनौतियों का सामना करना होता है। जितनी बड़ी उसकी प्रतिष्‍ठा, उतना ही बड़ी समझौता राशि। ऐसे में वास्‍तविक पीड़ित महिला के प्रति भी सहानुभूति संशयों में घिर जाती है और इसका सीधा-सीधा लाभ अत्‍याचारियों का मिलता है।
इसी तरह वैवाहिक अदालतों में कुछ ऐसे मामलों को मैंने रुबरू देखा है, जिनमें शादी के बाद किसी भी स्‍तर पर अनबन हो जाने अथवा सोची गई सुविधाओं मिलने में किसी भी प्रकार की कमी होने पर वह दहेज प्रताड़ना का केस तो बनाती ही हैं, साथ ही मर्यादाओं की सीमा लांघकर भी आरोप लगाने के काम करती हैं। जैसे आजकल अनबन होने पर पति को नपुंसक बता देना और उसके साथ-साथ ससुराल के अन्‍य पुरुषों पर यौन शोषण का आरोप लगाना आम बात हो गई है। किसी भी परिवार के लिए इस तरह के आरोपों को झेलना बहुत मुश्‍किल होता है। सच्‍चाई तो तब सामने आती है जब कथित तौर पर नपुंसक घोषित किए गए पुरुष की दूसरी शादी के बाद उसके बच्‍चे भी हो जाते हैं।
कुल मिलाकर आज महिला दिवस पर तमाम कसीदों के इतर यह भी जानना जरूरी है कि अब जबकि महिलाएं हर क्षेत्र में अपना डंका बजा रही हैं तब उनकी स्‍वतंत्रता के साथ आ चुकीं बुराइयों से भी रुबरू हुआ जाए क्‍योंकि झूठे आरोपों से महिलाओं की अपनी प्रतिष्‍ठा भी दांव पर लगती है।
इस प्रगतिवादी और महिलाओं के लिए अच्‍छे समय के साथ ही हमें अपराध की ओर धकेलती उच्‍छृंखलता और अपनी वास्‍तविक स्‍वतंत्रता में अंतर करना होगा, पीड़ित और पीड़क में अंतर करना होगा।
देवि दुर्गा जिन अष्‍टभुजाओं के बल पर हमें नतमस्‍तक होने को बाध्‍य करती हैं, इसका अर्थ ही यह है कि हम महिलायें एक बार में अष्‍टचक्र कार्य कर सकने में सक्षम होती हैं। बस हमें अपनी अष्‍टभुजाओं में निहित बल को ”तिर्यक” होने से बचाना होगा वरना हमें मात्र औज़ार की भांति प्रयोग किये जाने से कोई नहीं रोक सकता। ध्‍यान रखना होगा कि औज़ार अथवा शस्‍त्र की अपनी कोई शक्‍ति नहीं होती।
आज इस महिला दिवस पर महिलाओं की शक्‍ति को निश्‍चितत: सम्‍मान मिलना चाहिए मगर इस शक्‍ति के बहाने आ रहे दोषों से भी तो आंखें नहीं फेरी जा सकतीं। समग्रता ही हमारे अपने बल, बुद्धि और संपूर्ण अस्‍तित्‍व को निखारेगी। हम अपने अष्‍टभुजी रूप को सार्थकता दे पायें और किसी और का औज़ार न बने इसके लिए स्‍वयंसिद्धा तो बनना ही पड़ेगा।
- अलकनंदा सिंह

रविवार, 4 मार्च 2018

अब स्‍तनपान के नाम पर रचा जा रहा षडयंत्र

''जिस डाल पर बैठे उसी को काटने'' की मूर्खता वाली एक उक्‍ति को हम प्रसिद्ध कवि कालिदास  के लिए हमेशा से संदर्भित करते रहे हैं, मगर आज स्‍तनपान को लेकर जो शोध रिपोर्ट आई है  उसे पढ़कर यह उक्‍ति हम मांओं पर बिल्‍कुल फिट बैठती है। नैसर्गिक अधिकारों व कर्तव्‍यों को  लेकर सदियों पुरानी भारतीय सभ्‍यता का कोई सानी नहीं, इसके बाद भी यदि हम सुसंस्‍कृत  कहलाने के लिए पश्‍चिम की ओर देखें तो हमसे बड़ा मूर्ख और कौन हो सकता है।

हम भारतीय मांऐं ही नहीं, दुनियाभर की मांओं को जिस तरह ये नैसर्गिक अधिकार प्राप्‍त है  कि अपने शिशु को स्‍तनपान कराने से ना तो कोई रोक सकता है और ना ही इसके लिए  अनुमति की आवश्‍यकता होती है, ठीक उसी तरह शिशु को भी मां के दूध से कोई वंचित नहीं  रख सकता।

हमारी सदियों पुरानी परंपरा है कि शिशु की प्राकृतिक देखभाल ही उसे फिजीकली ही नहीं,  इमोशनल ताकत भी देती है। सभ्‍य समाज के लिए शिशुओं की लालन-पालन प्रणाली का बहुत  बड़ा योगदान होता है। हालांकि, अब विदेशी स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ उस पर रिसर्च कर ही रहे होंगे  और निश्‍चित जानिए किसी दिन ये रिपोर्ट भी हमारे सामने आ जाएगी कि बच्‍चे को कैसे पालें  और नई मांऐं इसे हुबहू मानेंगी भी बिना ये सोचे-समझे कि आखिर इस सबके पीछे कौन है जो  हमारी नैसर्गिकता को भी भुना रहा है। 

स्‍तनपान को लेकर पिछले कई दशकों से पश्‍चिम से ये भ्रांति फैला रहा है कि स्‍तनपान से मां  के फिगर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस नैसर्गिक सुख से मांओं को वंचित रखने के पीछे  बाजार का वो षड्यंत्र था जिसे पावडर दूध बेचने वाली विदेशी कंपनियों ने रचा ताकि मांओं की  कथित ''आज़ादी'' के नाम पर अपने प्रोडक्‍ट का लक्ष्‍य हासिल करने में कोई बाधा ना आए। इस  षड्यंत्र में बाकायदा डॉक्‍टर्स को शामिल किया गया। अब एकबार फिर इन्‍हीं डॉक्टर्स के माध्‍यम  से कहलवाया जा रहा है कि स्‍तनपान कराने से कैंसर का खतरा कम होता है। ध्‍यान दीजिए  कि कैंसर खत्‍म करने के स्‍थान पर इसका ''खतरा कम'' शब्‍द प्रयोग में लाया जा रहा है।  बाजार का एंगिल चेंज हुआ है, फिर से मांऐं निशाने पर हैं, इस बार शिशु-आहार बनाने वाली  कंपनियों पर कैंसररोधी दवायें बनाने वाली लॉबी हावी दिख रही है और निशाना बनाई जा रही  हैं नई मांऐं।
मैं इस तथ्‍य का विरोध करती हूं कि कैंसर के डर से स्‍तनपान कराया जाना चाहिए, बल्‍कि  बात ये होनी चाहिए कि स्‍तनपान हमारे नैसर्गिक कर्तव्‍य और शिशु के नैसर्गिक अधिकार के  बीच का मामला है तो इसे निर्धारित करने वाली विदेशी कंपनियां और शोध संस्‍थान आखिर  कैंसर की धौंस किसे दिखा रहे हैं, इस जानलेवा बीमारी के नाम पर बात उठाकर आखिर ये  लॉबी किसे अपनी ज़द में लेना चाहती है। इंतज़ार कीजिए अब ऐसी दवाओं के आने का जो  स्‍तनपान के इमोशनल टच के साथ कैंसर का इलाज करेंगी।

एक सभ्‍य समाज के तौर पर हमने अपनी विरासतों को तो पश्‍चिम का पिछलग्‍गू बना ही दिया  है और अपनी नैसर्गिकता की धज्‍जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आश्‍चर्य तो इस बात  पर है कि ये सब भी होता रहा है तथाकथित तरक्‍की के नाम पर। हमारी उत्‍तरआधुनिक मांओं  की इस कमजोरी का फायदा बाजारवाद की लॉबी ने जमकर उठाया क्‍योंकि दुनिया के बाजार में  भारतीय उपभोक्‍ताओं की संख्‍या 1/6 जो है।

गौरतलब है कि जिस शोध-रिपोर्ट की मैं बात कर रही हूं, उसे यूनीवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के  डा. मलामो कॉन्‍टोरियस ने अपनी टीम के साथ 1998 से 2004 तक गर्भावस्‍था से लेकर नई  मांओं तक पूरा किया। यह रिपोर्ट कहती है कि- स्‍तनपान से गुड कॉलेस्‍ट्रॉल बढ़ता है,  सर्कुलेटिंग फैट कम होता है, गले और सिर पर खून को पहुंचाने वाली कैरोटिड आर्टरीज की  मोटाई भी कम होती है, इस आर्टरी के बड़े व्‍यास को हार्ट स्‍ट्रोक से जोड़कर देखा जाता है,  स्‍तनपान से आक्‍सीटोसिन हॉर्मोन उत्‍सर्जित होता है, जिससे ब्‍लडप्रेशर कम रहता है।

इस रिपोर्ट में शोधकर्ता ये उल्‍लेख करना भूल गए या जानबूझकर नहीं किया कि जब कोई मां  अपने बच्‍चे को उठाकर छाती से भी लगा लेती है तभी कोई भी रोता हुआ बच्‍चा चुप क्‍यों हो  जाता है, स्‍तनपान कराने वाली मां के मन के भाव अपने शिशु के लिए क्‍या होते हैं, यही भाव  आजीवन शिशु के मन की तरंगों की दिशा व दशा को स्‍थापित करते हैं। क्‍या अब हम शोध  रिपोर्टों के आधार पर इन्‍हें तय करेंगे।

मैं मानती हूं कि आधुनिकता के नाम पर अब भी ऐसी मांओं की कमी नहीं जो अपने नवजात  शिशु को फुलटाइम मेड की गोद में बाजारु शिशु आहार के सहारे पलवा रही हैं, वे स्‍तनपान को  आज भी ''पिछड़ेपन'' का नाम देकर बचना चाहती हैं। भारतीय परंपराओं को ना मानने वाली  ऐसी मांऐं ही उक्‍त शोध रिपोर्टों और बाजारवाद का सॉफ्ट टारगेट होती हैं।
ऐसी मांओं के लिए इस रिपोर्ट की पॉजिटिविटी ये रहेगी कि अब वे स्‍तनपान से शिशु को  वंचित रखने से पहले सोचेंगी अवश्‍य, चाहे कैंसर से बचने का ही भय क्‍यों ना हो।

मातृत्‍व का भाव ही तो है जिसने स्‍तनपान से लेकर पालनपोषण तक की भूमिका को 
सर्वाधिक महत्‍व दिलाया। महाभारत में जब यक्ष, धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि 'भूमि  से भारी कौन?' तब युधिष्ठर जवाब देते हैं-
'माता गुरुतरा भूमेरू।' अर्थात माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।

कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि ग्‍लोबली डिजिटलाइज्‍ड युग में जब एक क्‍लिक पर सारी  जानकारियां हमारे हथेली में समाई हों तब तो कम से कम इस तरह की शोध रिपोर्टों के  भ्रमजाल से भारतीय मांऐं बच ही सकती हैं।

फिर भी यदि बात समझ में नहीं आती तो इतना जरूर समझ सकती हैं कि हर शोध अपूर्ण  होती है और एक नई शोध के लिए रास्‍ता बनाती है, जबकि भारतीय मनीषियों द्वारा निकाले  गए निष्‍कर्ष उस मानसिकता की देन हैं जो स्‍वास्‍थ को सबसे पहला सुख मानकर चलती है।
भारतीय मनीषियों ने पहला सुख निरोगी काया को ही बताया है, और यह सभी पर समान रूप  से लागू होता है। स्‍तनपान कराने वाली मां पर भी और उस शिशु पर भी जो स्‍तनपान करता  है। ऐसे में ''कैंसर का खतरा कम'' होने की बात तो तब की जानी चाहिए जब कैंसर होने की  संभावना हो।
यहां तो शुरू से मां के दूध को अमृत तुल्‍य बताया गया है, फिर ये कम खतरे की बात कहकर  खतरे को बनाए रखने का षड्यंत्र ही है, इससे अधिक कुछ नहीं। 

-अलकनंदा सिंह


मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

होली पर सुरीले ब्रज की संपूर्ण गाथा का नाम है समाज गायन

श्री बांकेबिहारी मंदिर में समाज गायन करते गोस्‍वामी समाज के मुखिया व अन्‍य
अभी चूंकि होली का अवसर है तो मैं अपने सुरीले ब्रज की बात ना करूं, ऐसा हो नहीं सकता।

यूं भी जब आराधना और लोकोत्‍सव एक होकर किसी संस्‍कृति को समृद्ध करते हों और अनेक वर्षों से अब तक लगातार ऐसा करते आ रहे हों, वह भी बिना किसी बाधा के तो कोई ना कोई बात ऐसी अवश्‍य होगी ही जो सर्वस्‍वीकृति से सभी तारों को आपस में गूंथे रही। 

सामूहिकता ब्रज की थाती रही है, चाहे वह गोवर्द्धन पूजा हो या होली के परंपरागत आयोजनों की सर्वाधिक लंबी अवधि। इस लंबी अवधि को मनोरंजन और गायन-वादन की जिस अद्भुत परंपरा ने बांध रखा है, आज मैं उस ''समाज गायन'' की परंपरा के बारे में बात करूंगी।

जी हां, होली के इस रंगबिरंगे अवसर पर समाज गायन के पदों का अद्भुत विन्‍यास, इसे ईश्‍वर की आराधना से जोड़ने, श्रीकृष्‍ण को बीच में बैठाकर स्‍वयं होली की क्रीड़ा में मग्‍न होने का विरल आकर्षण कैसे पिरोया जाता है, यह सब समाज गायन को सुनकर ही जाना जा सकता है। 

वृंदावन में ही स्‍वामी हरिदास की साधना स्‍थली टटी स्‍थान पर समाज गायन  
ब्रज में वसंत पंचमी से 40 दिवसीय होली की शुरुआत डांढ़ा गढ़ने के साथ होती है और उसके बाद रमणरेती (महावन) बरसाना, नंदगांव और श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान पर जमकर होली खेली जाती है। आज गोकुल की छड़ीमार होली है। इसके बाद होलिका दहन वाले दिन जलती होली से फालैन में पंडे का गुजरना और इसी दिन चतुर्वेदी समाज का रंगों से सराबोर भव्‍य डोला निकलेगा। फिर दाऊजी, जाव और नंदगांव का हुरंगा, इसके बाद मुखराई के चरकुला नृत्‍य का आयोजन और फिर बठैन और गिडोह का हुरंगा अपने निश्‍चित तिथि पर संपन्‍न होगा।

इन सभी आयोजनों के तहत मंदिरों में गाया जा रहा समाज गायन हर संगीतप्रेमी को लुभा रहा है।

ऐसा ही वृंदावन की महिमा गान संबंधी श्री हरिराम व्यास का एक पद देखिए...

धनि-धनि वृन्दावन की धरनि।
अधिक कोटि वैकुंण्ठ लोक ते, सुक-नारदमुनि बरनि।।

जहाँ श्याम की बाम केलि कुल ,धाम काम मन हरनि।
ब्रम्हा मोह्यौ ग्वाल मंडली ,भेद रहित आचरनि ।।

राधा की छवि निरखत मोही, नारायन की घरनि।
और बार कीनी बनि बनिता ,प्रेम पतिहिं अनुसरनि।।

जहाँ महीरूह राज बिराजत, सदा फूल-फल फलनि।
तहाँ "व्यास' बसि ताप बुझायौ, अतंरहित की जरनि।।
धनि-धनि वृन्दावन की धरनि ......



नीचे के वीडियो में देखिए कि कैसे होता है समाज गायन 

वसंत पंचमी से शुरू होने वले इस 40 दिवसीय उत्‍सव के की शुरूआत करीब 445 वर्ष पुरानी बताई जाती है। प्राप्‍त जानकारी के अनुसार समाज गायन की शुरुआत श्रीकृष्‍ण की आल्‍हादनी शक्‍ति राधा के बरसाना में हुई। वृंदावन शोध संस्‍थान में सुरक्षित रखी गईं पांडुलिपियों से पता चला है कि इस गायन परंपरा को सर्वप्रथम श्रीनारायण भट्ट ने शुरू किया। दक्षिण भारत में मदुरैपट्टनम के श्रीवत्स गोत्रिय तैलंग ब्राह्मण भाष्कर भट्ट के यहां जन्मे श्रीनारायण भट्ट,   नारायण के अवतार कहे जाते हैं। संवत् 1602 में नारायण भट्ट ब्रज में आए। यहां उन्होंने ब्रज का प्राकट्य करने के साथ-साथ समाज गायन में गाए जाने वाले पदों का भी संकलन किया।

क्‍या कहते हैं इतिहासकार और पांडुलिपि विशेषज्ञ  

इतिहासकारों और प्राप्‍त पांडुलिपियों के आधार पर कहा जाता है कि ब्रज भूमि लुप्त हो चुकी थी, 16वीं सदी में ब्रज के पुनरोत्थान का दौर जारी था। स्वामी हरिदास, नारायण भट्ट, गोस्वामी हित हरिवंश, चैतन्य महाप्रभु तथा महाप्रभु वल्लभाचार्य यहां आए। इन्‍होंने ब्रज की लीलाओं को प्रकाशित किया। उन्हीं में से अलग-अलग वैष्णवों के संप्रदाय के दृष्टिकोण के हिसाब से समाज गायन की पोथियां (प्रकाशित सामग्री) विकसित होती गईं।

देवालयों में विकसित हुआ समाज गायन

देवालय पद्धति के अनुसार समाज गायन के मध्य भाग में जो बैठता है, उसे समाज का मुखिया कहते हैं। समाज की पोथी में से पहले मुखिया गायन करता है, उनके पीछे अनुसरण करने वाले तान मिलाते हैं और सुरों को बांधते हुए आगे बढ़ते हैं, इन्‍हें झेला कहा जाता है, साथ ही पखावजी लोग पखावज बजाते हैं। वल्लभ कुल के वैष्णव संप्रदाय में समाज गायन को कीर्तन बोला जाता है। वैष्णव संप्रदाय की प्राप्‍त पोथियों में भगवान की बाल लीलाओं का ही वर्णन सुनने को मिलता है।

समाज की पोथी को बोलते हैं वर्षोत्सव की पोथी

वृंदावन शोध संस्थान के पांडुलिपि विशेषज्ञों के अनुसार  पहले यह पांडुलिपियां हाथों से लिखी जाती थीं। प्रिंटिंग मशीन आने के बाद यह वर्षोत्सव (समाज की पोथी) छपने लगी, लेकिन परंपरागत रूप से हाथ से लिखी जाने वाली पोथी का विशेष महत्व होता है। पोथी को वर्षोत्सव की पोथी भी कहा जाता है।

इन्‍हीं पांडुलिपियों से ज्ञात होता है कि राधाकृष्ण की कृपा से वह संवत् 1602 में ब्रज में आए। यहां उन्होंने देखा कि ब्रज मंडल के ग्राम, नगर, कुंड, तालाब व विग्रह सभी विलुप्त हो गए हैं। उन्हें यह देख कर बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने अपने साथ आए लाडिलेय प्रभु के साथ विलुप्त स्थलों का प्राकट्य किया। इसी क्रम में बरसाना के श्रीजी के श्रीविग्रह का प्राकट्य संवत 1626 में भट्ट जी ने ही किया। भट्ट जी का तिरोभाव संवत् 1700 में हुआ।

आज भी गोस्वामी समाज के मुखिया रामभरोसी गोस्वामी के पास समाज गायन की 400 वर्ष से अधिक पुरानी पोथी मौजूद हैं।

प्रदेश सरकार द्वारा संपूर्ण ब्रज को श्रीकृष्‍ण सर्किट के तौर पर विकसित किए जाने की योजना के बाद अब संभवत: समाज गायन की इस समृद्ध विरासत को और भी समृद्ध बनाया जा सकेगा और देश-विदेश को इससे परिचित कराया जा सकेगा।

अभी तो स्‍थिति यह है कि साहित्य-संस्कृति और प्राचीन परंपराओं की धारा को बचाए रखने वाले अपनी आजीविका तक निकालने को प्रतिदिन जूझते हैं, मंदिरों के अलावा कला और संगीत निस्तब्ध है, कलाकार विपन्न स्थिति में हैं। कला को जीवित रखने के लिए कलाकार को जीवित रखना होता है, यह सरकारों के साथ-साथ हम सभी के लिए चिंता और चिंतन का भी विषय है।

गायकों की विपन्‍नता के चलते हम समाज गायन जैसी भक्‍तिरस में पगी अद्भुत गायन परंपराओं को कैसे बचाए रख सकते हैं, अब इस पर विचार और प्रयास अति आवश्‍यक हैं।

समाज गायन की शास्‍त्रीयता के साथ-साथ लोक कलाओं जैसे कि ब्रज के रसिया, मल्हार, चिकाड़े का ढोला, परसोकले आदि के स्वर क्यों मौन होते जा रहे हैं? इस पर भी विचार करना आवश्‍यक है।

बहरहाल, श्रीकृष्‍ण सर्किट के तहत प्रदेश सरकार के प्रयासों से आशा तो बंधी है कि ब्रज की इन महान विरासतों से आप भी शीघ्र रूबरू हो सकेंगे।

- अलकनंदा सिंह

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

आज हुई मथुरा में श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान पर Holi

 आज श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान मथुरा पर हुई Holi: रंगभरनी एकादशी पर भगवान श्रीकृष्‍णजन्‍मस्‍थान की होली ने सभी दर्शकों को भी सराबोर कर दिया। इस अवसर पर ब्रज की मनभावन होली के रंगभरे उल्लास तो दिखाई ही दिया साथ ही परंपरागत ‘मयूर नृत्य’ की उमंग ने समां बांध दिया। ‘रसिया’ की तान पर नटखट गोपाल की संगीतमय आराधना ने अपनी छटा बिखेरी तो यह ब्रज की पांच हजार वर्ष पुरानी कृष्णमयी संस्कृति और लोकपरम्परा साक्षात हो गई। ब्रज की संस्‍कृति का अभिन्न अंग है श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान की ये होली।


भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के लीला मंच पर रंगभरनी एकादशी 26 फरवरी को लठामार Holi का आयोजन किया गया। होली के लिए अयोध्या से गुलाल मंगाया गया। ब्रज की होली से जुड़े स्थलों की पवित्र रज मिश्रित गुलाल की बरसात की जाएगी। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और जय श्रीकृष्ण लठामार होली समिति ने व्यवस्थाओं को पूरा कर लिया है।
संस्थान के सचिव कपिल शर्मा, सदस्य गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी ने बताया कि जन्मभूमि की अलौकिक Holi के लिए ढाल, बारह¨सगा, ढोल, नगाड़े रंग-पुत कर तैयार किए जा रहे हैं। तेल में भीगी हुरियारिनों की लाठियां भी प्रिया-प्रियतम की होली के लिए तैयार हैं। कार्यक्रम का शुभारंभ दोपहर दो बजे ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा करेंगे। महिलाओं के बैठने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। उन्होंने बताया कि होली के लिए भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या से गुलाल मंगाया गया है। ब्रज में भगवान की होली लीला से जुड़े स्थलों की पवित्र रज मिश्रित गुलाल, पुष्प की बरसा मशीनों द्वारा की गई।
251 हुरियारे-हुरियारनों ने खेली लठामार होली
श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर इस बार रावल और श्रीकृष्ण संकीर्तन मंडल के 251 हुरियारे और हुरियारिनें लठामार होली का हिस्सा बने। लहरिया रंग के लहंगा-फरिया पहनें हुरयारिनें-हुरियारों पर लाठियों से प्रहार करतीं नजर आईं वहीं पीले और सफेद धोती-कुर्ता में सजे हुरियारे उनसे हंसी-ठिठोली करते दिखे।
श्रीकृष्ण जन्मस्थान के सचिव कपिल शर्मा ने बताया कि रंगभरनी एकादशी पर परिसर में होने वाली लठामार होली को खास बनाने के लिए मंदिर प्रबंधन ने थोड़ा बदलाव किया है। पूर्व की अपेक्षा इस बार अधिक संख्या में हुरियारे व हुरियारिनों को आमंत्रित किया गया है।
विगत वर्ष 151 हुरियारे व हुरियारिनों ने इसमें भाग लिया था, इस वर्ष इनकी संख्या में इजाफा किया गया है और 251 हुरियारे और हुरियारिनों को आमंत्रित किया गया है।
भक्त यहां प्रभु के साथ Holi खेलने आते हैं,  यहां आने वाला प्रत्येक भक्त यह अहसास करता है कि वह वास्तव में ठाकुरजी के साथ ही होली खेल रहा है।
-Legend News

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

देह तक सिमटे ''कथित फरिश्‍ते''


देह तक सिमटे ''कथित फरिश्‍ते''
हम जिस आदि धर्म को ''सनातन'' कहते हैं, आज उसी के नाम पर  किस तरह गंदगी फैलाई जा रही है, उसकी बानगी हैं आध्यात्मिक  गुरू होने का दावा करने वाले दुराचारी वीरेंद्र देव दीक्षित। जी हां,  मामला कोर्ट में होने और उनके अपराधी घोषित होने से पूर्व ही उन्‍हें  शत-प्रतिशत दुराचारी कहा जा सकता है। कहते हैं ना कि आंखों के  सामने दूध में गिरी मक्‍खी को भी नहीं निगला जा सकता, ठीक उसी  तरह दीक्षित के वकील ने कल जो कुछ कोर्ट में कहा, वह उनकी  ''कुत्‍सित सोच वाली बिरादरी'' के बारे में सब-कुछ बता गया कि  उन्‍होंने बच्‍चियों के साथ ''क्‍या क्‍या न किया होगा'' और इस सोच के  आधार पर ही इन्‍हें बख्‍शा नहीं जा सकता।

आध्यात्मिक गुरू होने का दावा करने वाले वीरेंद्र देव दीक्षित के  वकील ने कल सोमवार को दिल्‍ली हाईकोर्ट में विवादास्पद बयान देते  हुए कहा कि ‘नारी नर्क का द्वार है’ और इसलिए हम लड़कियों को  आश्रम में कैद करके रखते हैं।
हालांकि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल व न्यायमूर्ति सी.  हरि. शंकर की पीठ ने दीक्षित के वकील के इस बयान पर कड़ा  एतराज जताते हुए उसे तत्काल कोर्ट से बाहर निकलवा दिया।
इससे पहले मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से  पेश अधिवक्ता ने कहा कि ‘दीक्षित न सिर्फ खुद को सबसे ऊपर  मानते हैं, बल्कि खुद को भगवान भी समझते हैं। तो इस पर भी  आश्रम के वकील ने कहा कि हम न तो कोई सोसायटी हैं और न ही  हमारे ऊपर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या किसी अन्य संस्था  का आदेश मानने के लिए बाध्य हैं क्योंकि हम कोई डिग्री या  डिप्लोमा नहीं देते हैं।

हाईकोर्ट ने जब पूछा कि आखिर यह विश्वविद्यालय कैसे कहलाता  है तो इसके जवाब में आश्रम के वकील ने कहा कि आश्रम इस  लिहाज से विश्वविद्यालय कहलाता है क्योंकि इसका संचालन खुद  भगवान कर रहे हैं। वकील ने दीक्षित को भगवान बताते हुए कहा  कि जब भगवान खुद ज्ञान दे रहे हैं तो कोई हमको विश्वविद्यालय  कहने से मना कैसे कर सकता है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि  आश्रम विश्वविद्यालय शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता क्योंकि  इसका गठन नियमों के तहत नहीं हुआ है और न ही विश्वविद्यालय  अनुदान आयोग से मान्यता प्राप्त है।

बहरहाल, दीक्षित के वकील ने बता दिया कि वह और उसका क्‍लाइंट  ''कथित भगवान'' उसी लाइन में लग गए हैं जिस लाइन को अब  तक पकड़े गए एक दर्जन से अधिक ''दुराचारी बाबाओं'' ने तैयार  किया, जो ''कथित बाबा'' अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए, यहां उनकी  कोई गिनती नहीं हुई है ।

निश्‍चित ही हम मानते हैं कि समाज की सोच में गिरावट आई है  और इसका फायदा ऐसे ही दुराचारी उठा रहे हैं तथा वासनापूर्ति के  साथ संपत्‍तियां अर्जित कर रहे हैं। ये सब हुआ ही इसलिए कि हम  अपने मूलधर्म और उसकी अवधारणा से दूर होते गए। जिस सनातन  धर्म की नींव वेदों की ऋचाओं के अनुसार रखी गई, उनमें भी कहीं  ये जिक्र नहीं है कि ''नारी नर्क का द्वार'' है।

इसी संदर्भ में ऋग्वेद के एक मंत्र का मैं उल्‍लेख करना चाहूंगी। 
जिस मंत्र का मैं उल्‍लेख कर रही हूं, उसके तीसरे मंडल के 18वें  श्‍लोक के पहले मंत्र में कहा गया है कि- 

''यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा  हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यो, आप अपने उत्पन्न होने की  आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें।'- (ऋग्वेद-3-18-1)

इस मंत्र में ना तो माता को स्‍त्री माना गया है और ना ही देहमात्र,  बल्‍कि माता को प्रकृति, धरती अथवा जन्‍मदात्री माना है और तीनों  के संदर्भ में यह मंत्र अपनी सार्थकता सिद्ध करता है। परंतु स्‍त्री को  मात्र देह भर समझाने वाले इसके औचित्‍य तक नहीं पहुंच सकते  और इन्‍हीं में शामिल हैं ऐसे ''दुराचारी बाबा''।

यूं भी जो लोग अपनी मानसिक चेतना को सिर्फ देह तक ही सीमित  रखते आए हैं, उन्‍हें फिर से ऋग्वेद की ओर ले जाने की खुशफहमी  हमें नहीं पालनी चाहिए क्‍योंकि जो व्‍यक्‍ति विकृत मानसिकता का  है, वह इस ज्ञान का दुरुपयोग ही करेगा।

ऋग्वेद ने हमें माता के जिस रूप को सहेजने का ज्ञान दिया, वह  नरक के द्वार में कब और कैसे तब्‍दील हुई और इसे तब्‍दील किसने  किया, यह अब कोई पहेली नहीं रह गई।

सनातन धर्म को ऐसे ही लोगों द्वारा विकृतरूप में पेश किया जाता  रहा है और यही कारण है कि आज देश की ही विराट विरासत को  गरियाने वालों की कमी नहीं हैं। ना मूलभाव समझा, ना ही मूलरूप।  आधे-अधूरे सच के रूप में कोई मनुस्‍मृति लेकर चौराहे पर खड़ा हो  जाता है तो कोई बाबा बनकर अपना धन-वासना का साम्राज्‍य  स्‍थापित कर ''लोगों को बेवकूफ बनाने'' में मशगूल। सनातन धर्म को  अपभ्रंशित रूप में आमजन के सामने पेश करने का ही नतीजा है कि  आज कहीं ''बाबाओं'' का घिनौना रूप सामने आ रहा है तो कहीं  उनके कुत्‍सित विचार।

देह तक सिमटे ये ''कथित फरिश्‍ते'' हमारे सनातन धर्म का कितना  नुकसान कर चुके हैं और अभी कितना करेंगे, यह दिल्‍ली हाई कोर्ट  में दीक्षित के वकील ने अपनी घिनौनी सोच से बता दिया। इस पर  यदि गौर नहीं किया गया और हम हर बाबा को धर्मरक्षक अथवा  संत-महात्‍मा मानकर पूजते रहेंगे और उन्‍हीं में से उपजते रहेंगे राम  रहीम- वीरेंद्र दीक्षित-आसाराम आदि आदि....।

- अलकनंदा सिंह