मंगलवार, 27 जुलाई 2021

ॐ महाकालयम् महावीर्यं शिव वाहनं- नंदी, जो कि‍ कामशास्त्र के रचनाकार भी थे

श्रावण मास प्रारंभ होते ही भगवान शंकर की आराधना का पूरे भारत में एक अलग ही आनंद होता है परंतु भगवान शंकर केअनन्‍य गण व उनके आलयों के प्रहरी नंदी को लेकर आज कुछ ल‍िखना चाह रही हूं। 

एक आम सी मान्‍यता है क‍ि नंदी बैल थे, तो क्‍या सच में ऐसा था। सवाल बड़े हैं परंतु जवाब सब के सब अनुमानों में घ‍िरे हुए हैं। 

यूं तो माइथॉलॉज‍िकल उपन्‍यासकार अमीश त्र‍िपाठी की "मेलुहा" में नंदी राजा दक्ष के व‍ि‍श्‍वासपात्र दरबारी थे, उनका आकर व‍िशाल व मोटा व बुद्ध‍ि स्‍थ‍िर थी। हम सभी जानते हैं क‍ि स्‍थ‍िर बुदध‍ि क‍िसी भी व्‍यक्‍त‍ि के प्रभावशाली होने की पहली शर्त होती है। संभवत: इसील‍िए श‍िव के अनंग म‍ित्र के रूप में सामने आए नंदी परंतु इस उपन्‍यास से हटकर देखें तो नंदी का पौराण‍िक व्‍यक्‍त‍ित्‍व इससे भी कहीं अध‍िक बड़ा व महत्‍वपूर्ण था और वो महत्‍वपूर्ण कार्य था कामशास्‍त्र की रचना।

सामान्‍यत: सनातन व्‍याख्‍याओं में नंदी शिव के निवास स्‍थान कैलाश के द्वारपाल हैं, वे शिव के वाहन भी हैं जिन्हें प्रताकात्‍मक रूप से "बैल" के रूप में शिवमंदिरों में प्रतिष्ठित किया जाता है। संस्कृत में 'नन्दि' का अर्थ प्रसन्नता या आनन्द है। नंदी को शक्ति-संपन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है इसील‍िए वे प्रस‍िद्ध कामशास्‍त्र की रचना कर पाए परंतु आमतौर पर अब भी ज‍िस उथ्‍ज्ञलेपन के साथ "काम" की व्‍याख्‍या की जाती है वह इस शास्‍त्र की अवधारणा से कतई अलग है। ॠष‍ि वात्‍यायन के कामसूत्र की प्रस‍िद्ध‍ि से सद‍ियों पूर्व ही नंदी ने हमें इस शास्‍त्र से पर‍िच‍ित करा द‍िया था।  

 हिन्दू धर्म के चार सिद्धांत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से काम के कई अर्थ है। काम का अर्थ कार्य, इच्छा और आनंद से है। प्रत्येक हिन्दू को सर्वप्रथम धर्म का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ब्रह्मचर्य आश्रम इसी से संबंधित है। धर्म और संसार का ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही व्यक्ति को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर अर्थ का चिंतन करना चाहिए। सभी तरह के सांसारिक सुख प्राप्त करने के बाद व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य मोक्ष या मुक्ति होना चाहिए।

भारतीय कामशास्त्र काम अर्थात संभोग और प्रेम करने की कला का शास्त्र है। प्राचीन काल में चार वेदों के साथ ही चार अन्य शास्त्र लिखे गए थे- धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र। चारों शास्त्र ही मनुष्य जीवन का आधार है। चारों से अलग मनुष्य जीवन की कल्पना भी नहीं कही जा सकती। कामशास्त्र पर आधारित ही बहुत बाद में वात्स्यायन ने कामसूत्र लिखा।

शैव परम्परा में नन्दि को नन्दिनाथ सम्प्रदाय का मुख्य गुरु माना जाता है, जिनके ८ शिष्य हैं- सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्कुमार, तिरुमूलर, व्याघ्रपाद, पतंजलि, और शिवयोग मुनि। ये आठ शिष्य आठ दिशाओं में शैवधर्म का प्ररसार करने के लिए भेजे गये थे।

कामशास्त्र के अधिक विस्तृत होने के कारण आचार्य श्वेतकेतु ने इसको संक्षिप्त रूप लिखा, लेकिन वह ग्रंथ भी काफी बड़ा था अतः महर्षि ब्राभव्य ने ग्रन्थ का पुनः संक्षिप्तिकरण कर उसे एक सौ पचास अध्यायों में सीमित एवं व्यवस्थित कर दिया। बाद में इसी शास्त्र को महर्षि वात्स्यायन ने क्रमबद्ध रूप से लिखा। कहते हैं कि आचार्य चाणक्य ने ही वात्स्यायन नाम से यह ग्रंथ लिखा था। हालांक‍ि अधिकृत प्रमाण के अभाव में महर्षि वात्स्यायन का काल निर्धारण नहीं हो पाया है। परन्तु अनेक विद्वानों तथा शोधकर्ताओं के अनुसार महर्षि ने अपने विश्वविख्यात ग्रन्थ कामसूत्र की रचना ईसा की तृतीय शताब्दी के मध्य में की होगी। 

बहरहाल भगवान श‍िव के अनन्‍य गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय के अलावा के अत‍िर‍िक्‍त नंदी को उनके ज्ञान, कर्तव्‍यन‍िष्‍ठा और समर्पण के ल‍िए गणों में व‍िशेष स्‍थान प्राप्‍त है। 


नंदी कैसे बने शिव के गण

शिव की घोर तपस्या के बाद शिलाद ऋषि ने नंदी को पुत्र रूप में पाया था। शिलाद ऋषि ने अपने पुत्र नंदी को संपूर्ण वेदों का ज्ञान प्रदान किया। एक दिन शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नाम के दो दिव्य ऋषि पधारे। नंदी ने अपने पिता की आज्ञा से उन ऋषियों की उन्होंने अच्छे से सेवा की। जब ऋषि जाने लगे तो उन्होंने शिलाद ऋषि को तो लंबी उम्र और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया लेकिन नंदी को नहीं।

तब शिलाद ऋषि ने उनसे पूछा कि उन्होंने नंदी को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया? इस पर ऋषियों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने जानकर पूछा क्या बात है पिताजी। तब पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में ऋषि कह गए हैं इसीलिए मैं चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं।

इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं उम्रभर आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं। नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया।

सुमेरियन, बेबीलोनिया, असीरिया और सिंधु घाटी की खुदाई में भी बैल की मूर्ति पाई गई है। इससे प्राचीनकल से ही बैल को महत्व दिया जाता रहा है। भारत में बैल खेती के लिए हल में जोते जाने वाला एक महत्वपूर्ण पशु रहा है। बैल को महिष भी कहते हैं जिसके चलते भगवान शंकर का नाम महेष भी है।
शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है
जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। आमतौर पर खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है।

एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें वानर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि वानरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

और अंत में नंदी प्रार्थना –------

ॐ महाकालयम महावीर्यं शिव वाहनं उत्तमम गणनामत्वा प्रथम वन्दे नंदिश्वरम महाबलम्

- अलकनंदा स‍िंंह

भारतीय मूल के ब्रिटिश उपन्यासकार संजीव सहोटा #SunjeevSahota बुकर पुरस्कार के लिए नामित


 लंदन। भारतीय मूल के ब्रिटिश उपन्यासकार संजीव सहोटा इस साल के प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार की काल्पनिक कथा की श्रेणी के अपने उपन्यास ‘चाइना रूम’ के लिए नामित हुए हैं। जजों ने मंगलवार को उनके उपन्यास की प्रशंसा करते हुए उसे आव्रजकों के अनुभव पर लाजवाब मोड़ बताया है। हालांकि सहोटा के लिए मुकाबला बेहद कड़ा रहने वाला है क्योंकि उनके साथ इस साल कुल 13 लोगों को नामित किया गया है जिसमें नोबेल विजेता काजू इशिगुरो और पुलित्जर पुरस्कार विजेता रिचर्ड पावर्स भी शामिल हैं।

1960 में पंजाब से आए थे ब्रिटेन
40 वर्षीय संजीव सहोटा के बाबा-दादी 1960 में पंजाब से ब्रिटेन आ गए थे। वर्ष 2015 में भी सहोटा के उपन्यास ‘द ईयर ऑफ रनअवेज’ को बुकर पुरस्कार के लिए नामित किया जा चुका है। उन्हें वर्ष 2017 में साहित्य के लिए यूरोपीय यूनियन के पुरस्कार से भी नवाजा गया था। संजीव सहोटा के उपन्यास ‘चाइना रूम’ को वर्ष 2020 के अक्टूबर और 2021 सितंबर के बीच ब्रिटेन और आयरलैंड में प्रकाशित 158 अंग्रेजी उपन्यासों में से चुना गया है। बुकर पुरस्कार के जजों का कहना है कि दो कालों और महाद्वीपों के बीच के अंतर को ‘चाइना रूम’ उपन्यास में एक साथ पिरोया गया है। आव्रजकों के अनुभवों पर आधारित इसके कथानक में बेहद रोचक मोड़ है। इस पीड़ा को बेहद सुलझे तरीके से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचते हुए दिखाया गया है। करारी और स्पष्ट भाषा में उपन्यास में बेहद नाटकीय घटनाक्रम दर्शाया गया है। सहोटा ने बड़ी सहजता से इस बोझिल विषय को भी प्रेम, उम्मीद और विनोद से भर दिया है।
3 नवंबर को होगा विजेता का ऐलान
सहोटा के अलावा बुकर पुरस्कार के नामित उपन्यासों की 2021 की सूची में जापानी मूल के ब्रिटिश लेखक काजू इशीगोरा की ‘लारा एंड द सन’ को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीकी लेखक डेमन गैलुट की ‘द प्रामिस’ और अमेरिकी लेखक रिचर्ड्स पावर की ‘बिवाइल्डरमेंट’ को भी नामित किया गया है। जजों के पैनल की अध्यक्ष और इतिहासकार माया जैसनआफ ने कहा कि यह सभी किताबें अपने पाठकों को अपनी अनसुनी कहानियों से बांधे रखती हैं। इस साल बुकर के लिए नामित 13 किताबों में दो अमेरिकियों पेट्रीशिया लाकवुड की पहली बार नामित किताबें ‘नो वन इज टाकिंग अबाउट दिस’ और नाथन हैरिस की ‘द स्वीटनेस आफ वाटर’ भी शामिल हैं। 14 सितंबर को इनमें से छह किताबों का चयन होगा और विजेता की घोषणा लंदन में एक समारोह के दौरान तीन नवंबर को होगी।

प्रस्‍तुत‍ि- अलकनंदा स‍िंंह

मंगलवार, 6 जुलाई 2021

इस षडयंत्र का भी इलाज़ होगा मगर धीरे धीरे


 मैक्सिकन कवि जोस इमिलिओ पाचेको की एक कव‍िता है “दीमकें” ज‍िसमें पाचेको ने दीमक का एक “हथ‍ियार” की तरह प्रयोग बखूबी बताया है। कव‍िता इस प्रकार है-

और दीमकों से
उनके स्वामी ने कहा —
नीचे गिरा दो उस घर को।

और वे
लगातार जुटी हुई हैं
इस काम में
जाने कितनी ही पीढ़ियों से,
सूराख़ बनातीं,
अन्तहीन खुदाई में तल्लीन।

किसी दुष्टात्मा की तरह
निर्दोषिता का स्वांग किए,
पीले मुँह वाली चीटियाँ,
विवेकहीन, गुमनाम दास,
किए जा रही हैं
अपना काम
दायित्व समझ कर,
फ़र्श के नीचे
किसी वाहवाही
या शाबासी की
अपेक्षा किये बिना ही।

उनमें से हर एक
सन्तुष्ट भी है,
अपना बेहद मामूली
पारिश्रमिक लेकर।

पूरी की पूरी कव‍िता आज हमारे देश के उन चौतरफा दुश्‍मनों पर एकदम सटीक बैठती है ज‍िन्‍हें देश में हर हाल में अशांत‍ि, अस्‍थ‍िरता, लाचारी और वैमनस्‍यता, आतंकवाद को फैलाने का लक्ष्‍य द‍िया जा रहा है। मैंने लक्ष्‍य की बात इसल‍िए की क्‍योंक‍ि कश्‍मीर में धारा 370 हटने के बाद सीएए का व‍िरोध, द‍िल्‍ली में दंगे से लेकर मतांतरण तक हर मिलती कड़ी बता रही है क‍ि ये एक सोची समझी वो साज‍िश थी जो सामने आती गई परंतु इस साज‍िश की दीमकें अपने लक्ष्‍य में अब भी लगी हैं। जहां उनके सुबूत मि‍ल रहे हैं, वहां सफाई हो रही है परंतु जहां वे नज़र नहीं आ रहीं वहां खतरा बरकरार है। सरकारें व सुरक्षा एजेंस‍ियां तो लगी ही हैं अपने प्रयास में, परंतु नागर‍िक के तौर पर सावधान तो हमें भी रहना होगा। फि‍लहाल दो खबरें ऐसी हैं जो इन दीमकों के मूल षड्यंत्र को सामने ला रही हैं, इत्‍तेफाकन दोनों ही खबरों का मास्‍टरमाइंड “इंटरनेशनल मीड‍िया” है और बतौर भारतीय पत्रकार ये हमारे ल‍िए शर्म की बात है क‍ि हमारे देश के कुछ मीड‍िया संस्‍थान भी इनके सहयोगी की भूम‍िका में है। हां, खुशी की बात ये है क‍ि इस षड्यंत्र का खुलासा भी हो रहा है।
बीबीसी, न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स, हफ़िंगटन पोस्ट, वाशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल ने तो बाकायदा भारत की मौजूदा सरकार के ख‍िलाफ अभ‍ियान चला रखा है। ये मीड‍िया द्वारा पर‍िभाष‍ित कथ‍ित उदारवाद का वो घोर कट्टरवादी चेहरा है जि‍स पर आम नागर‍िक आंख मूंदकर व‍िश्‍वास करते रहे हैं।

हाल ही में चाइना डेली को लेकर एक स्वतंत्र विश्लेषक की रि‍पोर्ट जारी हुई है, ज‍िसमें बताया गया है कि‍ चाइना डेली ने पिछले छह महीनों में अमेर‍िका के प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को लाखों डॉलर का भुगतान किया। ज‍िन संस्‍थानों को भुगतान क‍िया गया उनमें टाइम पत्रिका, विदेश नीति पत्रिका, द फाइनेंशियल टाइम्स, लॉस एंजिल्स टाइम्स, द सिएटल टाइम्स, द अटलांटा जर्नल-संविधान, द शिकागो ट्रिब्यून, द ह्यूस्टन क्रॉनिकल और द बोस्टन, वाशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल हैं, ज‍िन्‍हें पेड न्‍यूज़ की भांत‍ि खबरें देनी थीं और उन्‍होंने दीं भी। इन सभी खबरों की थीम ही मोदी व‍िरोध था और इन सभी समाचार पत्रों में छपने व भारी मात्रा में धन म‍िलने के कारण तमाम भारतीय पत्रकार भी अपनी भड़ास न‍िकालने लगे, वो भी ब‍िना ये सोचे समझे क‍ि वे दरअसल पीएम मोदी का नहीं देश का व‍िरोध कर रहे हैं।


न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने तो हद ही कर दी, उसने तो सीधा एक व‍िज्ञापन पत्रकारों की भर्ती के ल‍िए ऐसा न‍िकाला ज‍िसमें व‍िशेषज्ञता के तौर पर पीएम मोदी को लेकर “अलोचनात्‍मक लेख” ल‍िखना ही योग्‍यता का आधार रखा गया। बहरहाल, व‍िदेशी अखबारों में पैसा चाहे चाइना डेली दे या कोई और, वे मोदी व‍िरोधी लेख ल‍िखकर देश के व‍िश्‍वास पर आघात करें या धर्मांतरण करवाकर सामाज‍िक ढांचे को ब‍िगाड़ने में लगें, मगर अब इतना तय है क‍ि हमारी व्‍यवस्‍था में लगी दीमकों का अब चुनचुनकर सफाया क‍िया जाएगा, चाहे वो खुद को क‍ितना भी तुर्रम खां क्‍यों ना समझ रही हों क्‍योंकि हर छद्मयुद्ध के ल‍िए अलग पेस्‍टीसाइड होता है।

इसीलिए कवि जोस इमिलिओ पाचेको की रचना आज भी उतनी ही प्रासंग‍िक है जो सिर्फ अपना अलग पेस्‍टीसाइड खोज रही है, बस।

- अलकनंदा स‍िंंह


बुधवार, 16 जून 2021

ज़रूरी थी सफेदपोश षडयंत्रकार‍ियों के संग-संग ट्व‍िटर पर भी कार्यवाही

“आसमानी ताबीज़” के नाम पर मह‍िलाओं की अस्‍मत से ख‍िलवाड़ करने वाले अपराधी को बचाने वालों के साथ साथ ट्व‍िटर के ल‍िए भी बड़ा सबक होगी यूपी पुल‍िस द्वारा कल की गई कार्यवाही।


प‍िछले कई सालों से ट्व‍िटर को हथ‍ियार बनाकर व‍िषवमन करने वाले सफेदपोश षडयंत्रकार‍ियों का एक ऐसा ग‍िरोह सोशलमीड‍िया प्‍लेटफॉर्म पर सक्र‍िय है जो हर हाल में देश के सद्भाव को म‍िटा देना चाहता है ताक‍ि अराजकता फैले और इसके फैलते ही व‍िश्‍व को बताया जाये क‍ि देखो भारत में मुस्‍ल‍िमों को लेकर असह‍िष्‍णुता क‍ितनी बढ़ गई है, परंतु अब ऐसा हो ना सकेगा क्‍योंक‍ि इस तरह के षडयंत्र व प्रपंचों को प्‍लेटफॉर्म स्‍पेस देने के ल‍िए ट्व‍िटर भी बराबर का दोषी माना जाएगा।


यूपी पुल‍िस ट्व‍िटर पर भी इसील‍िए कार्यवाही कर पाई क्‍योंक‍ि केंद्र सरकार के आदेश ना मानने के कारण ट्व‍िटर की इंटरमीड‍ियरी दर्ज़ा अब समाप्‍त हो चुका है, उसका “कानूनी सुरक्षा कवच” टूट गया है क्योंकि ट्विटर ने अब तक नए आईटी नियमों को लागू नहीं किया इसलिए उसका लीगल प्रोटेक्शन खुद-ब-खुद खत्म हो गया है।


अत: कल इसी का फायदा उठाते हुए देश में पहली बार ऐसा हुआ क‍ि फेक न्यूज़ फैलाने का माध्‍यम बने ट्विटर को भी FIR की जद में ले ल‍िया गया।


बहरहाल, यूपी पुल‍िस ने स्‍वयं को “फैक्‍ट-चेकर” बताने वाले पोर्टल AltNews के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर, पत्रकार राणा अयूब, न्‍यूज पोर्टल द वायर, कांग्रेस के कश्‍मीरी नेता सलमान न‍िजामी व मसकूर उस्‍मानी, डा समा मोहम्‍मद, पत्रकार व लेखक सबा नकवी जैसे सफेदपोश षडयंत्रकार‍ियों पर फेक न्यूज़ फैलाने के आरोप में FIR करके बड़ा संदेश द‍िया है।


दरअसल, AltNews के मोहम्मद जुबैर द्वारा कल एक “एंटी ह‍िंदू प्रोपेगंडा” ट्व‍िटर पर शुरु क‍िया गया और इसे एक प्लान‍िंग के तहत उक्‍त आरोप‍ियों द्वारा आगे र‍िट्वीट क‍िया जाता रहा, ज‍िसमें एक वीडियो शेयर कर आरोप लगाया गया कि लोनी में अब्दुल समद नाम के एक मुस्‍ल‍िम बुजुर्ग को पीटकर उससे जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाया गया। पुल‍िस जांच में पता चला कि पीटने वाले आरोपितों में आरिफ, आदिल और मुशाहिद आद‍ि मुस्‍ल‍िम भी शामिल थे अत: ये मामला ताबीज के नाम पर मह‍िलाओं की अस्‍मत से ख‍िलवाड़ का निकला, ज‍िसमें अब्दुल समद नामक व्‍यक्‍त‍ि ने क्षेत्र की उन ह‍िंदू-मुस्‍ल‍िम मह‍िलाओं का शोषण क‍िया ज‍िनको बच्‍चा नहीं हो रहा था और वे इसके फरेब में फंसती चली गईं। पर‍िजनों ने इसील‍िए अब्दुल समद की मज़ामत कर दी ज‍िसे AltNews के मोहम्मद जुबैर ने अपनी पूरी की पूरी मंडली (नेता और अन्‍य पत्रकार डॉक्‍टर) के साथ इस मामले को “मुस्‍ल‍िम मॉबल‍िंच‍िंग” कहकर दुष्‍प्रचार‍ित क‍िया। यूं तो मोहम्मद जुबैर ने अनेक बार फेक न्यूज़ फैलाई है परंतु इस बार ‘जय श्री राम’ को बदनाम करने का उसका दांव उल्‍टा पड़ गया और FIR दर्ज हो गई। इसके अलावा भ्रम फैलाने वाले टूलक‍िट मामले में “मैनुपुलेट‍िड मीड‍िया” टैग लगाकर सच्‍चाई को दबाने वाले ट्व‍िटर ने इस पूरे मामले पर चुप्‍पी साध ली। दुष्‍प्रचार करने वाली पूरी मंडली को कानून का क ख ग बताना जरूरी था।


कहते हैं ना क‍ि दंडप्रक्र‍िया में कानून का “भय” आवश्‍यक होता है, यूपी पुल‍िस की कार्यवाही से इतना तो अवश्‍य होगा अभी तक जो ट्व‍िटर केंद्र सरकर से आंखें तरेर रहा था, वह अब स्‍वयं को बचाने में लगेगा।


बहरहाल ट्व‍िटर और उसे माध्‍यम बनाने वाले “षडयंत्रकारी व अपराधि‍यों” द्वारा अब पूरे वाकये को बतौर सबक ल‍िया जाना चाह‍िए वरना अभी तो शुरुआत है, कार्यवाही का जो रास्‍ता यूपी पुल‍िस ने खोल द‍िया है, उस पर अब अन्‍य सरकारें भी चलेंगी ही।

- अलकनंदा स‍िंंह

गुरुवार, 27 मई 2021

बाहर आने लगी है “भगवानों” की संस्‍था #IMA के भीतर की गंदगी

 योग गुरू बाबा रामदेव द्वारा ऐलोपैथी को एक असफल चिकित्सा पद्धति कहे जाने के बाद से ऐलोपैथी डॉक्‍टरों की स्वयंसेवी संस्था “आईएमए” भड़की हुई है, इसकी उत्‍तराखंड शाखा ने तो योगगुरू पर 1000 करोड़ का मानहान‍ि केस तक दायर कर द‍िया है, साथ ही आईएमए के राष्‍ट्रीय महासचिव डॉ. जयेश लेले ने दिल्ली के आईपी एस्टेट थाने में शिकायत दर्ज कराई है, तो दूसरी ओर धर्मांतरण के लिए अपने कार्यालय का दुरुपयोग करने के लिए @IMAIndiaOrg प्रमुख डॉ जॉनरोस ऑस्टिन जयालाल के खिलाफ भी आपराधिक शिकायत दर्ज की गई है।

मैं आज यहां बाबा रामदेव के पक्ष में कुछ नहीं ल‍िख रही क्‍योंक‍ि ज‍िस तरह आधा सच नुकसान दायक होता है उसी तरह सही समय और सही मंच पर ना बोला सत्‍य भी गर‍िमाहीन हो जाता है, बाबा ने ऐसा ही सत्‍य बोला है।

इस पूरे घटनाक्रम में अब तक कथ‍ित “भगवानों” की संस्‍था “आईएमए” के भीतर की गंदगी, लोगों की सेहत से ख‍िलवाड़ करती देशद्रोही गत‍िव‍िध‍ियां सामने आ रही हैं। ऐलोपैथ‍ी से रोगों का इलाज़ करने वाले भारतीय डॉक्‍टरों के प्रत‍ि जनता के “अव‍िश्‍वास” को 327,207 डॉक्‍टरों की संस्‍था आईएमए के अपने रवैये ने और पुख्‍ता कर द‍िया है क‍ि उसे बाबा के बयान पर तो घोर आपत्‍त‍ि है परंतु वो उन प्रश्‍नों का जवाब नहीं देना चाहती जो स्‍वयं उसे ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।

जैसे क‍ि-

1. सरेआम ह‍िंदुओं का ईसाई धर्मांतरण करने में ल‍िप्‍त आईएमए के मौजूदा अध्‍यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टीन जयलाल के बयान क‍ि “सरकार और डॉक्‍टरों ने नहीं कोरोना को तो यीशु ने भगाया, इसल‍िए कोरोना से बचना है तो यीशु की शरण में आओ”, को क्‍या कहेंगे।

2. व‍िदेशी फार्मा कंपन‍ियों के साथ दशकों पुरानी लॉब‍िंग से भारी धन लेकर उनके प्रोडक्‍ट का प्रचार, आयुर्वेद सह‍ित अन्‍य च‍िक‍ित्‍सा पद्धत‍ियों के प्रत‍ि घृणा और भ्रम को बढ़ाना क्‍या है, इसके ल‍िए संस्‍था को व‍िदेशों से भारी रकम भी प्राप्‍त हुई।

3.  आईएमए ने 2007 में Pepsico कंपनी से 50,00,000 में उसके उत्‍पादों का व‍िज्ञापन करने का करार क‍िया जबक‍ि ट्रॉप‍िकाना जूस, सीर‍ियल, ओट्स सह‍ित उसके सभी प्रोडक्‍ट भारी कैलोरीज, बच्‍चों की लंबाई कम करने और मोटापा बढ़ाने वाले साब‍ित हुए। #CorporateDalals की भंत‍ि ब्रि‍टिश कंपनी Reckitt के उत्‍पाद Dettol Soap, Dettol व Lyzol को प्रचार‍ित क‍िया, इसी कड़ी में Dabur, ICICI , procter & gamble , Abbott india भी तो हैं।

4. इसी तरह एलईडी बल्ब, वॉल पेंट, पंखे, साबुन, तेल, वाटर प्यूरीफायर आदि को सर्टिफिकेट बांटना है? दरअसल रामदेव की वजह से उनकी दुकान बंद है, जिनकी स्थानीय/विदेशी कंपनियां पैसे से सर्टिफिकेट बांट रही हैं।

5. इसके अलावा प्लाईवुड, कोलगेट, टायलेट क्लीनर आदि प्रोडक्ट्स को बैक्टीरिया फ्री, वायरस फ्री और अमका फ्री ढिमका फ्री का सर्टिफिकेट भी तो आईएमए ही बांट रही है।

6. संस्‍था पदाध‍िकारी सह‍ित कमोवेश सभी ऐलोपैथ‍िक डॉक्‍टर्स व‍िदेश यात्रायें, बच्‍चों की पढ़ाई और मीट‍िंग्‍स,कॉ्रेंसेस तक स्‍पांसर कराते हैं, आख‍िर ये उसे कैसे जायज ठहरायेंगे। उनके पास फार्मा कंपनी के साथ साथ पैथ लैब्स,  मेडिकल र‍िप्र‍िजेंटेट‍िव, मेडिकल स्‍टोर्स के साथ साथ स्‍वयं की ऊंची फीस व हर स्‍टेप पर कमीशनखोरी से होने वाली अत‍िर‍िक्‍त कमाई के व्यवसायि‍क मॉडल पर है कोई जवाब।

आईएमए के ल‍िए बाबा का मौजूदा बयान तो बहाना बन गया क्‍योंक‍ि बाबा के देशी प्रोडक्‍ट इस संस्‍था के ईसाई धर्मांतरण मानस‍िकता वाले अध्‍यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टीन जयलाल को वैयक्‍त‍िक रूप से और संस्‍था से जुड़े व‍िदेशी ब्रांड्स को आर्थ‍िकरूप से नुकसान पहुंचा रहे थे, सो ये तो पुरानी खुन्‍नस है, न‍िकलनी ही थी।

बाबा का कुसूर इतना था क‍ि उन्‍होंने बड़बोलापन द‍िखाते हुए आचार्य सुश्रुत द्वारा “निदान स्थानम” में ल‍िखी बात ही दोहरा दी थी क‍ि-
“यद‍ि कोई एक चिकित्सा उपचार, बीमारी (जैसे क‍ि कोरोना) के कारण का इलाज करने में विफल रहता है और इसके अपने दुष्प्रभाव (sideeffect) होते हैं जिससे कई अन्य बीमारियां (Black fungus) जन्‍म लेती हों तो वह एक “असफल चिकित्सा पद्धति” है।

ज़ाह‍िर है कि लगभग  7000 cr के कोव‍िड धंधे में हजारों करोड़ के प्राइवेट हॉस्पिटल, ज‍िनका एक-एक दिन का चार्ज लाखों मेें होता है, की अगर कोई ऐसे पोल खोलेगा तो बुरा तो लगेगा ही ना, आईएमएम को भी लग गया और ठोक द‍िया बाबा पर मुकद्दमा, देखते हैं अब ऊँट क‍िस करवट बैठता है।

- अलकनंदा स‍िंंह 

http://legendnews.in/the-filth-inside-the-gods-organization-has-started-coming-out/

शनिवार, 22 मई 2021

पत्रकार‍िता की आड़ में पीड़‍ितों को न‍िगलता “बड़ों” का रसूख

तहलका के संपादक तरुण तेजपाल यौन उत्‍पीड़न के मामले में बरी 
    #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र ने ब‍िल्‍कुल ठीक           कहा है कि-

   एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
   धार पर रक्खे सब के चेहरे हैं
   रेत का हम लिबास पहने हैं
   और हवा के सफ़र पे निकले हैं।

   #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र के इस शेर को मैं         आज की पत्रकार‍िता द्वारा आदतन “चयन‍ित व‍िषयों पर ही अपनी र‍िपोर्ट” के मामले में प्रयोग कर रही हूं। कल तहलका के संपादक तरुण तेजपाल को गोवा कोर्ट द्वारा यौन उत्‍पीड़न के मामले में बरी क‍िए जाने के बाद से ही ये अभ‍ियान शुरू हो गया। चूंक‍ि गोवा में भाजपा की सरकार ने अब इस मामले को हाईकार्ट ले जाने की बात कही, तभी से पूरी की पूरी पत्रकार ब‍िरादरी खांचों में बंट गई।

कांग्रेस समर्थक पत्रकारों का एक खांचा तेजपाल की तरफदारी में लगा था तो दूसरा खांचा भाजपा पर मामले को कोर्ट ले जाने में जल्‍दबाजी और पीड़‍िता द्वारा पुल‍िस में श‍िकायत “दर्ज़ ना कराने” के बावजूद उन्‍हें राजनैत‍िक कारणों से फंसाया जाना बता रहा था मगर इस बीच जो सबसे शर्मनाक रहा, वह था तेजपाल का संद‍िग्‍ध चर‍ित्र और उस पर पत्रकार‍िता की रहस्‍यमयी चुप्‍पी। हालांक‍ि ये चुप्‍पी घटना (2013) के समय इतनी गहरी नहीं थी परंतु कल से तो पत्रकारों ने मुंह ही सीं ल‍िया है जबक‍ि सभी जानते हैं क‍ि आठ साल बाद ये न‍िर्णय अभी मात्र सेशन कोर्ट से ही आया है, गोवा सरकार की मानें तो अंत‍िम न‍िर्णय आने में समय लगेगा। इस बीच मीड‍िया की ये चुप्‍पी तेजपाल के रसूख का मूक सर्मथन करती द‍िख रही है।

तेजपाल के रसूख का अंदाज़ा इसी बात से भी लगा सकते हैं क‍ि उसे बलात्कार, यौन उत्पीड़न और जबरन बंधक बनाने के सभी आरोपों से बरी कराने में पीड़‍िता के ख‍िलाफ कुल 11 बड़े व नामी वकील पैरवी में लगे रहे। इनमें राजीव गोम्स, प्रमोद दुबे, आमिर ख़ान, अंकुर चावला, अमित देसाई, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, अमन लेखी, संदीप कपूर, राजन कारंजेवाला और श्रीकांत शिवाडे जैसे हाइलीपेड वकील रहे और इन्‍होंने 156 गवाहों की सूची में से मात्र 70 गवाहों से ही जिरह की और इसी आधार पर फैसला सुना द‍िया गया।

वकीलों की इतनी बड़ी फौज की भी वजह थी क‍ि न‍िर्भया केस के बाद बलात्कार की जस्टिस वर्मा कमेटी द्वारा तय की गई नई परिभाषा ‘फ़ोर्स्ड पीनो-वैजाइनल पेनिट्रेशन’ के तहत तेजपाल का ये मामला किसी रसूखदार व्यक्ति के खि‍लाफ़ आया पहला केस था। उधर 2013 में विशाखा गाइडलाइन्स पर बने नए कानून के तहत सभी कार्यालयों के ल‍िये “कार्यस्‍थल पर यौन उत्पीड़न” की जांच और फ़ैसले के लिए इंटर्नल कम्प्लेनेंट्स कमेटी बनाना आवश्‍यक था इसील‍िए नवंबर 2013 में पीड़‍िता ने अपने दफ़्तर को चिट्ठी लिख पूरे मामले की जानकारी दी थी और जांच की मांग की थी परंतु उस वक़्त तक तहलका मैगज़ीन में कोई इंटरनल कम्प्लेनेट्स कमेटी थी ही नहीं। हालांक‍ि वो चाहती तो क्रिमिनल लॉ के सेक्शन 354 (ए) के तहत पुलिस के पास भी जा सकती थी परंतु तेजपाल का रसूख यहां भी हावी था। अत: मामला सामने आने के बाद गोव सरकार को आगे आना पड़ा।

इसके बावजूद कई अख़बारों, वेबसाइट और टीवी चैनलों ने तरुण तेजपाल और महिला सहकर्मी की एक-दूसरे को और दफ़्तर को लिखे ई-मेल्स बिना सहमति लिए छाप दिए थे। इंटरनेट पर अब भी शिकायतकर्ता की अपनी संस्था #Tehelka  को लिखी वो ई-मेल मौजूद है जिसमें उनके साथ की गई हिंसा का पूरा विवरण था, ये ई-मेल केस के कुछ ही समय बाद ‘लीक’ हो गया था।  इतना सब लीक होने के बाद भी अब पत्रकारों द्वारा तेजपाल का “इस तरह” स्‍वागत करना बहुत कुछ कह रहा है।

बहरहाल अब जब कि‍ सेशन कोर्ट से तेजपाल बरी हो गया है तब हमारे (पत्रकारों) ल‍िए ये गंभीरता से सोचने का समय है क‍ि पीड़‍ितों की आवाज़ उठाने वाली पत्रकार‍िता को अब पूरी तरह र‍िवाइव क‍िया जाए ताक‍ि पत्रकार‍िता भाजपा, कांग्रेस, वामपंथी आद‍ि के खांचों में ना बंटे क्‍योंक‍ि आज भी “बड़ों” का रसूख ना जाने क‍ितने पीड़‍ितों को न‍िगलने को आतुर है। ऐसे में वे जो अपनी आवाज़ स्‍वयं नहीं उठा सकते, इसलिए उनकी आवाज़ बना जा सके ताक‍ि राजनैत‍िक दलों, मीड‍िया हाउस के बड़े ओहदेदारों द्वारा खांचों में बांटकर पत्रकार‍िता को मोहरे की तरह इस्‍तेमाल होने से रोक सकें।

और अंत में सभी पत्रकारों से यही कहूंगी क‍ि हमें अपना ग‍िरेबां चुस्‍त दुरुस्‍त रखने के ल‍िए ही सही,  #ज़फ़र_इक़बाल_ज़फ़र के ही शब्‍दों में “रेत का लिबास पहनकर हवा के सफ़र पे निकलने” वाली बेवकूफ़ी से बचना चाह‍िए।

-अलकनंदा स‍िंंह 

सोमवार, 17 मई 2021

हे सरकार! एक ऑड‍िट इनके द‍िमाग का भी हो

आपदा से जूझते अपने देश के स्‍वास्‍थ्‍य ढांचे को लेकर राजनैत‍िक दुष्‍प्रचार ने अब तो सारी सीमाएं लांघ दी हैं, समझ में नहीं आता क‍ि कोई इतना कैसे ग‍िर सकता है। कोरोना काल में जब सभी राजनैत‍िक पार्ट‍ियों को केंद्र सरकार के साथ म‍िलकर आपदा से दो-दो हाथ करने चाह‍िए, तब वे दुष्‍प्रचार के चरम पर जा रहे हैं।

बतौर उदाहरण दुष्‍प्रचार के पहले मामले में केजरीवाल सरकार ने लगातार ऑक्‍सीजन स‍िलेंडर्स, ऑक्‍सीजन कंसेंटेटर्स, वेंटीलेटर्स की कमी बताई और इसकी ज‍िम्‍मेदारी केंद्र पर डाली। भ्रम और झूठ का भरपूर भूत खड़ा क‍िया गया परंतु जैसे ही ऑड‍िट हुआ तो सारा सच सामने आ गया और ज‍िन उपकरणों को लेकर वे कमी का रोना रो रहे थे, अचानक वो इतनी बहुतायत में आ गए कि‍ वे उन्‍हें दान देने की बात करने लगे।

इसी तरह अब वैक्सीन पर रोना जारी है। दो द‍िन पहले द‍िल्‍ली में ही पोस्‍टर लगाए गए क‍ि ‘मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दी?’ इस दुष्‍प्रचार के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत ज‍िन 25 लोगों को गिरफ्तार किया गया उनके पक्ष में राहुल गांधी, द‍िग्‍व‍िजय स‍िंह समेत द‍िल्‍ली के आप व‍िधायक अमानतुल्‍ला खान आद‍ि ने ट्विवर पर ‘मुझे भी गिरफ्तार करो’ का अभियान चलाकर इसे प्रोफाइल पिक्चर बनाया, साथ ही ल‍िखा क‍ि ‘सुना है ये पोस्टर 𝗦𝗛𝗔𝗥𝗘 करने से पूरा 𝗦𝗬𝗦𝗧𝗘𝗠 कांपने लगता है…’।

व‍िदेशों को वैक्‍सीन मुहैया कराने का सच 
न‍िश्‍च‍ित रूप से क‍िसी अंधे व्‍यक्‍त‍ि को तो रास्‍ता द‍िखाया जा सकता है परंतु जो देखते हुए अंधा बनने का नाट‍क करे, उसे कौन दृष्‍ट‍ि दे। वैक्‍सीन को दूसरे देशों में भेजने पर क‍िए जा रहे कांग्रेस व आप के दुष्‍प्रचार के पीछे भी यही बात है जबक‍ि हकीकत यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के समझौते एवं कच्चे माल के एवज में वाणिज्यिक करार के तहत वैक्सीन देने की “बाध्यताा” है।

भारत ने 7 पड़ोसी देशों बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि को 78 लाख 50 हजार वैक्सीन अनुदान के तहत उपलब्ध कराया। इन आंख वाले अंधों को कौन समझाए क‍ि 2 लाख डोज संयुक्त राष्ट्र संघ के उस शांति बल के लिए सहायता स्वरूप दी गईं जिसमें 6600 तो भारतीय सैनिक ही हैं, अन्य देशों को दिए गए कुल वैक्सीन का यह करीब 16% है।

विदेशों को दिए गए 6 करोड़ 63 लाख वैक्सीन के डोज का करीब 84 प्रतिशत डोज वाणिज्यिक समझौते व लाइसेंसिंग करार के तहत उन देशों को दिया गया जिनसे हमें वैक्सीन तैयार करने के लिए कच्चा माल व लाइसेंस मिला है।

यूके को बड़ी मात्रा में वैक्सीन इसलिए देनी पड़ी क्योंकि सीरम इंस्टिट्यूट जिस कोविशिल्ड वैक्सीन का निर्माण कर रही है उसका लाइसेंस यूके के ‘ऑक्सफोर्ड एक्स्ट्रा जेनिका’ से प्राप्त हुआ है और “लाइसेंसिंग करार” के तहत उसे वैक्सीन का डोज देना जरूरी है।

इसके अलावा वाणिज्यिक समझौते के तहत सऊदी अरब को 12.5 प्रतिशत वैक्सीन देनी है क्योंकि जहां उससे पेट्रोलियम का आयात होता है वहीं बड़ी संख्या में वहां रह रहे भारतीयों को दो डोज मुफ्त वैक्सीन देने का उसने भारत से समझौता किया है।

इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन से हुए एक समझौते के तहत कुल निर्यात का 30 प्रतिशत वैक्सीन ‘को-वैक्स फैसिलिटी’ को दिया जाना है।

तो कुल म‍िलाकर बात ये है कि‍ ज‍िस बुद्ध‍ि के पैमाने का प्रदर्शन राहुल गांधी करते रहे हैं, उसमें “वाण‍िज्‍यक करार” को समझ पाना मुश्‍क‍िल ही लगता है। शहर और गांव के हर चौराहे पर कोई न कोई एक ऐसा नमूना आपको म‍िल ही जाएगा जो कपड़े फाड़ता हुआ जोर जोर से चीखता है परंतु उसे कोई गंभीरता से लेता ही नहीं, राहुल गांधी का भी यही हाल है। केंद्र सरकार की बजाय केवल पीएम के प्रत‍ि दुष्‍प्रचार का यह तरीका उन्‍हें कहीं का नहीं छोड़ेगा, बेहतर होगा क‍ि वो अपनी तरह व‍िदेशों में तो देश की फजीहत ना करायें क्‍यों कि‍ इनके द‍िमाग और कुप्रवृत्‍त‍ियों का ऑड‍िट तो नहीं कराया जा सकता।

– अलकनंदा स‍िंह

सोमवार, 10 मई 2021

‘पाखंड की प्रत‍िष्ठा’ से वैक्सीन पर प्रोपेगंडा जीवि‍यों के मंसूबे…


कव‍ि जयशंकर प्रसाद की एक कव‍िता है ‘पाखंड की प्रत‍िष्ठा’, इस कविता के माध्‍यम से उन्होंने भलीभांत‍ि बताया है क‍ि क‍िस तरह कोई पाखंडी अपने देश, अपनी संस्कृत‍ि तथा आमजन का जीवन दांव पर लगा कर उन्हें त्राह‍ि-त्राह‍ि करते देख आनंद‍ित होता है। कव‍िता में कहा गया है क‍ि –

स्मृतियों के शोर में अब से मौन मचाया जायेगा,
धुर वैचारिक अट्टहास में सुस्मित गाया जायेगा,
कुंठा के आगार में किंचित मुक्ति बांधी जाएगी,
भय आच्छादित मेड़ लगाकर प्रेम उगाया जायेगा.

स्वतंत्रता से पहले हो या उसके बाद हमारे देश में सदैव से ऐसे तत्व मौजूद रहे हैं ज‍िन्हें स‍िर्फ और स‍िर्फ अपने प्रोपेगंडा से वास्ता रहा, फ‍िर चाहे इसकी कीमत आमजन को भले ही क्यों ना चुकानी पड़ी हो। ऐसी ही पूरी की पूरी एक जमात अब वैक्सीन पर हायतौबा कर रही है। इस जमात ने पहले वैक्सीन न‍िर्माण पर और अब इसके न‍िर्यात पर बावेला मचा रखा है क‍ि… वैक्सीन का न‍िर्यात रोको।

पत्रकार तवलीन स‍िंह ने तो पीएम नरेंद्र मोदी को ‘नीरो’ ही बना द‍िया, जो ”स‍िर्फ अपनी छव‍ि व‍िदेशी नेताओं के समक्ष” चमकाने में लगे हैं और इसील‍िए वैक्सीन न‍िर्यात की जा रही है। वकील प्रशांत भूषण ने कहा क‍ि प्राकृतिक रूप से ही खत्म हो रहा है कोरोना संक्रमण, तो फ‍िर निजी वैक्सीन कंपनियों को सरकारी मदद क्यों।

इन प्रोपेगंडा जीवि‍यों को सोशल मीडि‍या पर लाखों लोग फॉलो करते हैं। वैक्सीन न‍िर्यात पर हायतौबा मचाने से पहले इन्होंने वैक्सीन लगाने को लेकर भी डर फैलाया, लोगों को गुमराह किया, वैक्सीन की दक्षता पर प्रश्न खड़े किए ज‍िससे लोगों के मन में शंका पैदा हुई। जब टीकाकरण शुरू हुआ तो इन लोगों ने सबसे पहले जाकर वैक्सीन का डोज लिया और फ्री में वैक्सीन उपलब्ध कराने की माँग करने लगे। चुपके से अपना वैक्सीनेशन कराने वाले पत्रकार संदीप चौधरी हों या कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य और पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी, इन्‍होंने भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के ख‍िलाफ अभ‍ियान चला रखा है।

अब बात करते हैं वैक्सीन न‍िर्यात की, क‍ि अपनी जरूरतें पूरी करने के साथ-साथ हमारे लिए इसका न‍िर्यात क्यों जरूरी है। भारत ने अपने ‘वैक्सीन मैत्री’ कार्यक्रम के जरिए करीब 83 देशों को स्‍वदेशी कोरोना वैक्सीन भेजकर मदद की। दूसरे देशों को टीकों की आपूर्ति करना अपने देश में पर्याप्त उपलब्धता होने पर ही संभव है। इसकी लगातार निगरानी एक सशक्त समिति कर रही है। इसके अलावा भारत को वैक्सीन निर्माण के लिए कच्चा माल आयात करना पड़ता है, दुनिया भर से कच्चा माल लेकर हम वैक्सीन निर्यात पर रोक नहीं लगा सकते।

ये प्रोपेगंडाजीवी जानबूझकर इस तथ्य को छ‍िपा रहे है क‍ि वैश्व‍िक साझा सहयोग की नीत‍ि के तहत अन्तर्राष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने के नतीजे क्या हो सकते हैं? इसील‍िए कोरोना की दूसरी लहर के न‍िपटने को दूसरे देशों से लगातार मदद ऑफर की जा रही है। सार्वभौम है क‍ि शक्त‍ि हो तो सब साथी होते हैं… वैक्सीन प्रकरण पर भारत यही नीत‍ि अपना रहा है और आज जो ऑक्सीजन व दवाइयों की खेप की खेप भारत आ रही है, वह भी इसी का पर‍िणाम है। यूं भी कॉमर्शियल ऑब्लिगेशन को तोड़ना आसान नहीं होता।

वैक्सीन निर्यात से नुक्सान पर रोने वालों के ल‍िए तो मैं पुन: कव‍ि जयशंकर प्रसाद की उसी कव‍िता को उद्धृत करना चाहूंगी क‍ि –

स्मृतियों के शोर में अब से मौन मचाया जायेगा

कलम थमा दी जाएगी अब विक्षिप्तों के हाथों में,
मन का मैल… कलम से बहकर… सूखे श्रेष्ठ क़िताबों में,
चिंतन के विषयों में विष का घोल मिलाया जायेगा,
ले लेकर चटकार कलेजा मां का खाया जायेगा।

तो शपथ लें क‍ि हम भारत मां का कलेजा चीरने वाले ऐसे बुद्ध‍िजीव‍ियों की असली सूरत सामने लाते रहेंगे।
– अलकनंदा स‍िंंह 

रविवार, 25 अप्रैल 2021

''लाशनऊ और श्मशान पत्रकार‍िता'' वाले इन ग‍िद्ध पत्रकारों से आत्मग्लान‍ि की उम्मीद न करें


 



कोरोना की भयावहता के इस दौर में ज‍िसे हम एकमात्र आशा कह सकते हैं, वह है मानवीयता। क‍िसी को पथभ्रष्ट करने के ल‍िए मानवीयता और अमानवीयता के बीच एक बारीक सी लाइन होती है। और यह पथभ्रष्टता अपने चरम पर तब पहु़ंचती द‍िखाई देती है जब सत्य द‍िखाने का दावा करने वाले पत्रकार ‘चुन चुन कर’ उन तथ्यों को अपनी ल‍िस्ट में रखते हैं जो अराजकता और भय फैला सकें। असत्य और अत‍िवाद का कीड़ा उन्हें कभी लखनऊ को “लाशनऊ” बनाने तो कभी श्मशान में र‍िपोर्ट‍िंग करने तक ग‍िरने पर विवश कर देता है।

दवायें, इलाज, डॉक्टर, ऑक्सीजन की खबरों से जूझते देश के सामने जो संकट है उसे पूरी तरह अपने अंधे स्वार्थवश ये पत्रकार भुनाने में लगे हैं। ”लाशनऊ और श्मशान पत्रकार‍िता” करने वाले ग‍िद्ध पत्रकारों का एजेंडा है क‍ि क‍िसी भी तरह अपनी ना-पसंदीदा सरकारों के ख‍िलाफ यथासंभव कुप्रचार क‍िया जाये।

नकारात्मक पत्रकार‍िता का यह आलम कोरोना से जूझते आमजन को तो छोड़ि‍ए स्वयं पत्रकारों के ल‍िए शर्मनाक स्थ‍ित‍ि पैदा कर चुका है क्योंक‍ि रवीश कुमार ने जहां फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा ”लखनऊ बन गया है लाशनऊ, धर्म का नशा बेचने वाले लोगों को मरता छोड़ गए।” यहां योगी आद‍ित्यनाथ को ”धर्म का नशा बेचने वाले” ल‍िखा गया जबक‍ि जापानी इंसेफेलाइट‍िस जैसी बच्चों की संक्रामक बीमारी का सफाया करने वाले योगी आद‍ित्यनाथ की प्रत‍िबद्धता असंद‍िग्ध है।

दरअसल, हकीकत द‍िखाने का दावा कर ‘लाशनऊ’ ल‍िखने वाले रवीश कुमार हों या ‘श्मशान’ में बैठकर रिपोर्टिंग करने वाली बरखा दत्त, या फ‍िर भोपाल के श्मशान में जलती लाशों के बीच खड़े होकर फ़ोटो खिंचवाने वाले एक अख़बार के संवाददाता…एक जैसा पैटर्न अपनाते हैं। इन सभी का न‍िशाना एक ही राजनैत‍िक पार्टी की सरकार होती है जबक‍ि कोरोना से होने वाली मृत्यु तो ये भेद नहीं कर रही… अन्य उन प्रदेशों में भी मृत्युदर वही है जो उप्र, गुजरात, मध्यप्रदेश में है। कोरोना तो द‍िल्ली, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भी है, स्वयं बरखा के प‍िता भी इसकी चपेट में आ गए और बरखा को ऑक्सीजन, वेंटीलेटर बेड की भीख सोशल मीड‍िया के ज़र‍िए द‍िल्ली सरकार से उसी तरह मांगनी पड़ी ज‍िससे उप्र के महामारी पीड़‍ित दो-चार हो रहे हैं। लेकिन इन्‍हें खामियां वहीं नजर आती हैं, जहां ये अपनी गीध दृष्‍टि गढ़ाए बैठे हैं।

आपात स्थ‍ित‍ि पर भी अपना एजेंडा चलाने वाले ये पत्रकार दावा करते हैं कि भगवा धारण करने वाला मुख्यमंत्री विज्ञान से वास्ता नहीं रख सकता जबकि योगी आदित्यनाथ स्वयं विज्ञान के ही स्नातक हैं और गण‍ित में गोल्ड मेडेल‍िस्ट। इन्हीं योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश जीडीपी की रैंकिंग में देश का दूसरा राज्य बना। केवल धर्म के लिए काम करने वाला कोई मुख्यमंत्री अपने प्रदेश के लिए ये काम कर सकता है क्‍या?

ये पत्रकार और कोई नहीं बल्क‍ि कविता कृष्णन जैसे फेक न्यूज़ स्प्रैडर्स के फ्रंटलाइन वर्कर हैं जो ”ऑक्सीजन की कमी” जैसी खबरों से अराजकता और कालाबाजारी की राह तैयार कर रहे हैं। कविता कृष्णन समेत कई अन्य सोशल मीडिया यूजर्स ने दिल्ली एम्स में ऑक्सीजन की कमी के चलते इमरजेंसी वार्ड के बंद होने की फेक न्यूज़ फैलाई। इतना ही नहीं, इनकी ज़मात की ही पर्यावरण एक्टिविस्ट लिसिप्रिया कँगुजम ने भी यही फेक न्यूज़ ट्वीट की लेकिन बाद में उसे डिलीट कर दिया। ये एक पैटर्न है इन ग‍िद्धों का, जो महामारी से जूझते देश के हौसले को चीर देना चाहते हैं।

कभी स्वयं द्वारा खींची गई मरणासन्न सूडानी बच्चे और उसे ताकते बैठे ग‍िद्ध की तस्वीर पर ‘पुल‍ित्जर पुरस्कार 1994’ पाने वाले न्यूयॉर्क टाइम्स के फोटो पत्रकार केव‍िन कार्टर को अपने कृत्य पर इतनी ग्लान‍ि हुई क‍ि उन्होंने आत्महत्या कर ली परंतु इन ग‍िद्ध पत्रकारों से क्या हम कोई ”आत्मग्लान‍ि” की उम्मीद कर सकते हैं… नहीं। परंतु हमें शर्म‍िंदगी और अफसोस है क‍ि हम इन जैसे कथ‍ित पत्रकारों को ढो रहे हैं… बमुश्क‍िल अपनी साख बचाते हुए कोश‍िश कर रहे हैं क‍ि पत्रकार‍िता बची रहे।

– अलकनंदा स‍िंह 

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

राम की शक्‍ति पूजा और स्‍वशक्‍ति जागरण


 चैत्र नवरात्रि की विदाई व रामनवमी का त्‍यौहार हो और ”राम की शक्‍ति पूजा” की बात ना हो, तो चर्चा कुछ अधूरी ही लगती है।

शक्‍तिपूजा अर्थात् नकारात्‍मकता से लड़ने को स्‍वशक्‍ति का जागरण। और इसी स्‍वशक्‍ति जागरण पर पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने रचा था 312 पंक्तियों का छंद काव्‍य ” राम की शक्‍तिपूजा”। यह स्‍वशक्‍ति के जागरण का ही प्रभाव था कि मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्रीराम ने शक्‍तिपूजा के समय एक कमलपुष्‍प कम पड़ने पर अपने नेत्र को अर्पण करने का साहस किया।
और इस तरह अधर्म पर धर्म की विजय को शक्‍ति आराधना के लिए एक कमल पुष्‍प की कमी पूरी करने को अपने नेत्र देने हेतु तत्‍पर हुआ पुरुष महानायकत्‍व का सर्वोत्‍कृष्‍ट उदाहरण बन गया। अपने नेत्र देवी को समर्पित करने के लिए तूणीर उठा लिया था, सहर्ष समर्पण की ये मिसाल ही श्रीराम को भगवान और महानायक बनाती है। वो महानायक जो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के लिए प्रतिपल जुटा रहा, इसीलिए तो आज भी श्रीराम जनजन के हैं, संभवत: इसीलिए वे भगवान हैं।

निराला की पंक्‍तियों के अनुसार-

“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”

शक्‍ति की आराधना और महानायकत्‍व की स्‍थापना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, इसके लिए आज का दिन हम सनातनधर्मियों के लिए विशेष महत्‍व रखता है। जहां हम अपनी आंतरिक शक्‍तियों को जगाकर महानायकत्‍व की यात्रा की ओर कदम बढ़ाते हैं।

इस यात्रा में जो कुछ ”किंतु-परंतु” हैं भी तो वे हमारे स्‍वजागरण के बाद ही पूरे हो सकते हैं। निश्‍चित ही ना तो ये समय त्रेता युग के श्री राम का है और ना ही तूणीर उठाकर संकल्‍प सिद्धि का परंतु छोटे छोटे कदमों से ही लंबी यात्रा पूरी की जा सकती है, तो क्‍यों ना वैचारिक स्‍वतंत्रता, समाज व राष्‍ट्र को श्रेष्‍ठ, संपन्‍न व सुरक्षित बनाने के कुछ संकल्‍प स्‍वयं से किए जायें जिसमें व्‍यक्‍तिगत स्‍वतंत्रता तो हो परंतु उच्‍छृंखलता ना हो, अभिव्‍यक्‍ति की आज़ादी हो परंतु देश व व्‍यक्‍ति की अस्‍मिता से खिलवाड़ ना हो।

निश्‍चितत: समाज की प्रथम इकाई अर्थात् स्‍वयं हम और हमारे विकास के लिए भी "स्‍वशक्‍ति का जागरण" अब समय की अनिवार्यता है क्‍योंकि स्‍वशक्‍ति को जाग्रत किये बिना हम वंचित कहलायेंगे और वंचित बने रहना, दयनीय दिखते या दिखाते रहना रुग्‍णता है, और रुग्‍णता ना तो व्‍यक्‍ति को शक्‍तिवान बनाती है ना ही समाज को

हालांकि स्‍वशक्‍ति जागरण की इस यात्रा को कुछ अतिक्रमणों से भी गुजरना पड़ है जिसमें रात रात भर आवाजों के सारे डेसीबल तोड़ती देवीजागरण थे तो ”लाउडस्‍पीकर का शक्‍तिजागरण” होता था परंतु व्‍यक्‍तियों की सारी शक्‍ति इन आवाजों की भयंकरता से जूझते ही बीत जाती है। 

फ‍िलहाल तो कोरोना ने सारे कायदे कानून होम आइसोलेट कर द‍िए हैं परंतु ''पूजा के नाम पर शोर मचाते उपकरण और द‍िखावा करने वाले भक्त'' बहुत ज्यादा द‍िनों तक अपनी आदतों को संभाल नहीं पायेंगे।  न‍िश्च‍ित जान‍िए क‍ि उन्हें स्वशक्त‍ि से कोई लेना देना नहीं...रहेगा। 

बहरहाल समाज में मूल्‍यों की स्‍थापना के लिए महानायक अथवा महानायिका कहीं अलग से उतर कर नहीं आते, यह तो आमजन के बीच से ही निकलते हैं। शक्‍ति की आराधना के बाद भगवान राम की भांति ही सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के लिए कार्य करना ही आज के इस पर्व का अभीष्‍ट होना चाहिए।

- अलकनंदा स‍िंंह