अब छोड़ो भी
Blog of Alaknanda singh
शुक्रवार, 6 मार्च 2026
बेटी के सामने सरेआम फांसी पर लटके और मुस्कुराते पिता ने ही लिख दी थी ईरान की बर्बादी की कहानी
मंगलवार, 20 जनवरी 2026
इसे वो पढ़ें जो हर वक्त कहते हैं कि ''क्या करें...फुरसत ही नहीं मिल रही''....
पहले ऊपर का चित्र देखिए फिर पढ़िए आज की ये पोस्ट...ये उनके लिए है जो हर वक्त काम और काम से घिरे रहते हैं..गोया ये कोई सफल होने की या यूं कहें कि सफल होते दिखने की शर्त हो...तो इसे वो पढ़ें जो हर वक्त कहते हैं कि ''क्या करें...फुरसत ही नहीं मिल रही''....
जब से आपने काम करना शुरू किया है, आपका दिमाग सालों से ओवरटाइम कर रहा है, तब भी जब आप छुट्टी पर होते हैं।
ज़्यादातर लोगों के लिए काम के बाद एक नॉर्मल शाम कुछ ऐसी होती है:
1- आपके बच्चे बातें कर रहे होते हैं।
2- आपका पार्टनर अपने दिन के बारे में बता रहा होता है।
3- आप सिर हिला रहे होते हैं, लेकिन आपका दिमाग अभी भी उस मीटिंग रूम में होता है।
और यह पैटर्न हर जगह आपका पीछा करता है जैसे कि-
- किचेन में सब्ज़ियाँ काट रहे हैं मगर छूटी हुई डेडलाइन के बारे में सोच रहे हैं
- परिवार के साथ डिनर कर रहे हैं मगर मन ही मन अपने मैनेजर की कही बात दोहरा रहे हैं।
- छुट्टी पर गए हैं परंतु WhatsApp और ईमेल चेक करने से बाज नहीं आते, स्वयं से ही बहाना बनाते हैं कि "बस ज़रा सा ही तो देखा है"
- सोने की कोशिश करते हैं परंतु मन ही मन कल की स्लाइड डेक को एडिट कर रहे होते हैं
- नहाते समय भी मन ही मन किसी कलीग से बहस कर रहे होते हैं।
बाहर से, आप ठीक दिखते हैं।
आपके पास नौकरी है, घर है, फ़ोन है, ज़िंदगी "ठीक-ठाक" दिखती है।
मगर अंदर, आपका नर्वस सिस्टम अपना स्विच ऑफ़ करना भूल गया है।
एक ऐसी कीमत है जो आपकी पेस्लिप पर कभी नहीं दिखती।
- आपका ध्यान। आपकी नींद।
- जिन लोगों से आप प्यार करते हैं उनके साथ आपका सब्र।
- बिना कमाए खुशी महसूस करने की आपकी काबिलियत।
आपको लगने लगता है कि यह बस बड़ा होने जैसा है।
इसलिए आप शांत इशारों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
- जिस तरह आप छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाते हैं।
- जिस तरह छुट्टियां वैसी ही चिंता के साथ एक अलग जगह जैसी लगती हैं।
- जिस तरह आपका शरीर कभी हल्का महसूस नहीं करता, रविवार दोपहर को भी नहीं।
एक समय पर, यह काम के बारे में होना बंद हो जाता है। यह एक नर्वस सिस्टम बन जाता है जिसे अब याद नहीं रहता कि जब कुछ भी गलत न हो तो सुरक्षित कैसे महसूस किया जाए।
यह प्रोडक्टिविटी नहीं है। यह क्रोनिक सर्वाइवल है।
2025 में, पूरे भारत में 500 से ज़्यादा लोग जो अलग-अलग लेवल पर इसी तरह के रूटीन से गुज़र रहे थे, ऐसे लोगों को लेकर एक किताब आई है #RelaxPlayThrive , जिसके ज़रिए एक पैटर्न देखा गया कि अलग-अलग सैलरी, अलग-अलग शहर, अलग-अलग कहानियाँ हैं सबकी परंतु बदलाव के लिए सभी लालायित हैं ।
दिमाग 24x7 काम कर रहा है, शरीर जिन्हें घर आना नहीं आता था। अच्छी खबर यह है कि आपका सिस्टम इसे फिर से सीख सकता है।
आपको दिन में सिर्फ़ पाँच से दस मिनट, छोटी-छोटी रेगुलर आदतें चाहिए, और ज़िंदगी अंदर से बाहर तक अलग लगने लगती है।
सबसे अच्छी बात यह है कि यह सब तब हो सकता है जब आप Relax Play Thrive खेलते हैं।
शनिवार, 3 जनवरी 2026
इंसानी क्रूरता की गवाह यह तस्वीर #Epic है... वाह LepaRadić
यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति 7 मई, 1945 को हुई जब जर्मन सशस्त्र बलों ने मित्र राष्ट्रों के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण अगले दिन, 8 मई को प्रभावी हुआ मगर इस बीच प्रभावित लोगों ने इंसान की क्रूरता का हर वो पहलू देख लिया था जिसके दिए जख्मों को आज जमाना बीत जाने के बाद भी नहीं भरा जा सका। इसीबीच एक तस्वीर सामने आई तो सोचा कि इसे सभीे के साथ शेयर करूं।
हिटलरशाही के खिलाफ खड़े रहकर फांसी का फंदा गले में डलवाने वाली #LepaRadić की है ये तस्वीर, वो एक #Bosnian टीनेजर थी जिसे #WorldWarII के दौरान #Nazis को गोली मारने के लिए फांसी दे दी गई थी।
उसके आखिरी पलों में... हिटलर की फौज ने उसके साथियों के नाम बताने के बदले उसकी जान बख्शने की पेशकश की। उसने मना कर दिया, और कहा: "मैं अपने लोगों की गद्दार नहीं हूं। जिनके बारे में तुम पूछ रहे हो, वे तब सामने आएंगे जब वे सभी बुरे लोगों को, आखिरी वाले तक, खत्म करने में कामयाब हो जाएंगे।"
यह लड़की, सिर्फ़ 17 साल की थी जब इसे मौत की सज़ा सुनाई गई।
वो बोली- मैं चाहती हूं कि यह पता चले, और यह कि मैं याद किए जाने की हकदार बनी रहूं, यह भी सच है कि वह मौत से डरती थी, हां, लेकिन वह इतनी बहादुर थी कि उसने अपने देश के लोगों को धोखा देने के बजाय फांसी पर चढ़ना पसंद किया।
गुरुवार, 1 जनवरी 2026
इन आठ कविताओं से करें नववर्ष का स्वागत.. देश और विदेश के कवियों की रचनाओं का कलेक्शन
नए की परिभाषा क्या है, मुझे नहीं मालूम कि इसे कैसे परिभाषित करूं। सोचती हूं कि जो बीत गया उसके बासीपन की बात करूं या जो अभी अभी आया है उसकी ताजगी पर कुछ लिखूं ..तो क्या इतनाभर करने से नए को परिभाषित कर पाऊंगी... संभवत: नहीं.. क्योंकि यह एक अहसास है जो नवागत से जुड़ी अनेक संभावनाओं पर टिका है... इन्हीं संभावनाओं पर हमारे देश और विदेश के कवियों ने जो कुछ लिखा, उसका कलेक्शन यहां नए साल पर अपने-अपने मायने दर्ज कराता हुआ दिखता है। तो आइये उन्हीं की नज़र से करें स्वागत नवागत का...
कुछ आठ कविताओं को मैंने नववर्ष के स्वागत के लिए चुना है।
1. नववर्ष का सर्वप्रथम कवि सोहनलाल द्विवेदी की कविता से 2026 का स्वागत करें -
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;
दीनों दुखियों का त्राण लिये
मानवता का कल्याण लिये,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।
संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिये,
मेरे भारत के लिये नई
प्रेरणा नया उत्थान लिये;
मुर्दा शरीर में नये प्राण
प्राणों में नव अरमान लिये,
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!
युग-युग तक पिसते आये
युग-युग तक पिसते आये
कृषकों को जीवन-दान लिये,
कंकाल-मात्र रह गये शेष
मजदूरों का नव त्राण लिये;
श्रमिकों का नव संगठन लिये,
पददलितों का उत्थान लिये;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!
सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिये,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिये;
जीवन में नूतन क्रान्ति
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!
2. दूसरे नंबर पर प्रकृति का संपूर्ण चित्र उकेरती कवि जगदीश व्योम की 'नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन' को पढ़ें ... अच्छा लगेगा
आमों पर खूब बौर आए
भंवरों की टोली बौराए
बगिया की अमराई में फिर
कोकिल पंचम स्वर में गाए
फिर उठें गंध के गुब्बारे
फिर महके अपना चन्दन वन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !
गौरैया बिना डरे आए
घर में घोंसला बना जाए
छत की मुंडेर पर बैठ काग
कह कांव-कांव फिर उड़ जाए
मन में मिसिरी घुलती जाए
सबके आंगन हों सुखद सगुन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!
बच्चों से छिने नहीं बचपन
बच्चों से छिने नहीं बचपन
वृद्धों का ऊबे कभी न मन
हो साथ जोश के होश सदा
मर्यादित बनी रहे फैशन
जिस्मों की यूं न नुमाइश हो
बदरंग हो जाए घर आंगन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!
घाटी में फिर से फूल खिलें
फिर स्त्री के शिकारे तैर चलें
बह उठे प्रेम की मन्दाकिनी
हिम-शिखर हिमालय से पिघलें
सोनी मचले, महिवाल चले
रांझे की हीर करे नर्तन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !
विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
विज्ञान ज्ञान के छुए शिखर
पर चले शांति के ही पथ पर
हिन्दी भाषा के पंख लगा
कम्प्यूटर जी पहुंचें घर-घर
वह देश रहे खुशहाल `व्योम'
धरती पर जहां प्रवासी जन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !
3. तीसरे नंबर पर मैं सुप्रसिद्ध रूसी कवयित्री अन्ना अख्मातोवा की रचना देना चाहूंगी- 'नए साल का गीत' जिसे बीसवीं सदी की वैश्विक कविता के प्रमुख स्वर के रूप में समादृत किया गया। इसे कांता द्वारा हिंदी में अनुवादित कर 'पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव' के रूप में हमें सुलभ कराया गया। इसी संकलन से ली हुई नवर्ष पर लिखी उनकी रचना ये रही ...।
बादल की छाया में थका चाँद,
धुँधली डालता है निगाह
पहाड़ी पर।
छह जनों के लिए लगी थी मेज़,
और ख़ाली थी सिर्फ़ एक जगह।
नए साल को आते देख रहे हैं
मेरे पति, मैं, और मेरे दोस्त।
रँगी हैं क्यों मेरी उँगलियाँ
जैसे ख़ून से?
ज़हर की तरह जलती क्यों शराब?
आकर्षक—जग—उठा मेज़बान
भरा हुआ ले कर गिलास।
पीता हूँ मैं धरती के लिए—
हमारे अपने वन क्षेत्रों से भरी—
स्थित हैं हम सब जहाँ।
एक दोस्त ने देखा मेरा चेहरा,
सहसा किया कुछ याद, प्रभु जाने, क्या,
और बोला ज़ोर से :
पीता हूँ मैं उसके गीतों के लिए,
जीवित हैं हम सब जिन में।
किंतु वह तीसरा, समझे बिना,
जैसे ही निकला बाहर अँधेरे में,
मेरे सोच का देते हुए जवाब, बोला :
पीना चाहिए हमें उसके लिए,
अभी तक नहीं है जो हमारे साथ।
4. चौथा नंबर आता है तेलुगू कविता 'मन्मथावाहन' का... जिसे रायप्रोलु वेंकट सुब्बाराव ने लिखा और इसका हिंदी में अनुवाद किया है हनुमच्छास्त्री अयाचित ने जिसे ' साहित्य अकादेमी' द्वारा पुस्तक : भारतीय कविता 1954-55 में प्रकाशित गया।
हनुमच्छास्त्री अयाचित (Hanumachchastri Ayachit) एक विद्वान और लेखक थे, जिन्होंने तेलुगु भाषा और साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया, खासकर हिंदी में 'तेलुगु और उसका साहित्य' नामक पुस्तक लिखी, जो तेलुगु साहित्य का एक परिचयात्मक अध्ययन है, जिसमें उन्होंने स्वयं को 'हनुमच्छास्त्री, अयाचित' के रूप में प्रस्तुत किया है।
तो लीजिए ये रही नववर्ष पर लिखी 'मन्मथावाहन'-
हे प्रभु!
हे नववर्ष मन्मथ!
इस नव वर्षारंभ के उत्सवों में
हमारे मनोरथ जब मधु मार्ग पर अग्रसर होते हैं,
तब प्रेम के साथ हम तुम्हारा आमंत्रण कर रहे हैं।
आओ न!
सरोवर की लहरों रूपी शीतल शय्याओं पर
झूमने वाले कमलों को भ्रमर-कन्याएँ
इस उष:काल में मंगलकारी काकली ध्वनियों से जगा रही है।
रसालों के अरुण पल्लव समूह
चारों दिशाओं में सुगंध फैलाते हैं
और इस समय मदमाते कोकिल
अपने मधुर कंठों से कलनाद की वर्षा
करते हुए झूम रहे हैं।
वन नटी के चरणों में जूही के फूल
ऐसी शोभा दे रहे हैं, मानो नवनीत के घुँघरू हों।
अशोक-पुष्पों से शोभित पृथ्वी पर
चैत्र पर्व के रसमय भोजन से आलसी बने हुए शुकों की
श्रुतिमधुर ध्वनियाँ
सरल कोमलता के साथ सुनाई दे रही है।
5. अब आते हैं पांचवें नंबर पर शानदार रचनाकार हरिवंशराय बच्चन पर... हालांकि आज की ये उद्धृत रचना फ़ारसी कवि उमर ख़य्याम की रुबाइयों (चार पंक्तियों वाली कविताओं) से प्रेरित होकर लिखी थी, जहाँ 'मधुशाला' जीवन की अस्थिरता और क्षणभंगुरता के बीच प्रेम, ज्ञान और आनंद खोजने का प्रतीक बन जाती है, जिसमें मदिरा, साकी (परोसने वाला), प्याला और मधुशाला (शराबखाना) जीवन के दर्शन के रूपक हैं। पुस्तक का नाम : ख़य्याम की मधुशाला भाग 4 में उन्होंने नववर्ष पर कुछ यूं लिखा-
नई तरु-आभा, नवल समीर
जनाते, आया नूतन वर्ष,
जर्जरित इच्छाएँ भी आज
पा रहीं यौवन का उत्कर्ष।
मनीषी भोग रहे एकांत,
एक मधुऋतु उनके भी पास—
ज्वलित कर मूसा का तरु-ज्योति,
समीरण ईसा का उच्छवास।
6. छठवें नंबर पर मैंने बाबा नागार्जुन को रखा है- 'चंदू, मैंने सपना देखा ' शीर्षक से लिखी गई ये कविता नव वर्ष पर न पढ़ी जाये , ऐसा हो नहीं सकता। नामवर सिंह के संपादन में प्रतिनिधि कविताएँ के (पृष्ठ 46) पर बाबा ने चंदू के माध्यम से गागर में सागर भर दिया।
चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेक़ाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, ख़ूब पतंगें लूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर
7. सातवें नंबर पर राजस्थानी साहित्य में आधुनिक कहानी के प्रमुख हस्ताक्षर माने जाने वाले पेशे से शिक्षक रहे श्री साँवर दइया ने नव वर्ष पर पूरे 365 दिनों में हर रोज का बखान कितने साधारण शब्दों में कहा है। आधुनिक भारतीय कविता संचयन राजस्थानी (1950-2010) (पृष्ठ 88) से ली गई ये रचना देखिए ज़रा---
पलस्तर उतरती दीवार पर
लटकाया जब नया कैलेंडर
छाती के सामने आकर खड़े हो गए
तीन सौ पैंसठ दिन।
मेरी / रोज़ छुलती साँस जानती है
कैसे कटता है एक-एक दिन
पिछले साल / न होली-दीवली लापसी
न सावन में सातू / ऋतुएँ बदलीं
और हमने भोगे परिणाम
मुट्ठी भर लोगों की / झूठी बातों में आया
वह हरामी का हाड़—हर्ष
कभी नहीं आकर खड़ा हुआ मेरे आँगन में
आज से फिर / मैं हूँ
और सामने हैं / ये तीन सौ पैंसठ दिन!
8. आठवें नंबर पर रफ़ीक़ शादानी की पुस्तक 'जियौ बहादुर खद्दरधारी' के (पृष्ठ 39) से ली गई ये रचना ''नवा साल आवा'' आपको गुदगुदाने के अलावा गहरा तंज़ करते हुए नए साल का नया परिचय देती है।
आँधी चली केतना भूचाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा
मनुस अपने अस्थान से हटि गवा जब
मुसाफिर कय गठरी गला कटि गवा जब
डकैती कय सामान सब बँटि गवा जब
पता नाहीं केहिकै टरंकाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।
सगरी बुराइन कय हद होइ गई जब
गरीबी कय फरियाद रद होइ गई जब
इन्सानियत केर भद होइ गई जब
स्वागत करै का जौ चंडाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।
असली भगत जौ करै तोर पूजा
ओका मिलै खाय का आलू भूजा
पंडित औ मुल्ला कय हय काम दूजा
वनहीं के हिस्से मा तर माल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।
जाड़े कय मौसम दुहाई-दुहाई
बिलोकी मियाँ खाँय मुर्गा मलाई
नेता के कमरे मा गद्दा रजाई
सायर के हिस्से मा तिरपाल आवा
तब जाइके ई नवा साल आवा।
नववर्ष की शुभकामनाओं संग आज बस इतना ही... रील और मीम के इस डिजिटल युग में इन्हीं शानदार रचनाओं के साथ विचारों को बनाए रखिए... ।
- अलकनंदा सिंंह
रविवार, 28 दिसंबर 2025
उन्नाव मामला: रेप केस में किसी को कैसे फंसाया जाता है इसका क्लासिक उदाहरण है
दिल्ली में कुलदीप सेंगर को अंतरिम जमानत मिलने के बाद से सियासती गिद्ध फिर से रेपकेस में अपना एजेंडा ढूढ़ लाए जबकि केस अभी कोर्ट में है। मगर हाथरस रेप केस की भांति इसमें भी प्रधानी चुनावों की रंजिश के तहत आरोप प्रत्यारोप लगे। कुछ सच वाले बिंदु ये भी हैं, ज़रा गौर से पढ़ें।
रेप केस में किसी को कैसे फंसाया जाता है इसका क्लासिक उदाहरण उन्नाव मामला है। आरोप लगाने वाली लड़की अपना पहला बयान दर्ज कराती है। पूरी घटना विस्तार में बताती है। इसका-उसका नाम बताती है। कहीं भी मुख्य आरोपी शुभम सिंह की बहन नाम नहीं आता। फिर अचानक उसे और बयान दर्ज कराने वालों याद आता है कि शुभम की बहन को भी फंसाना है। तो एक लाईन लिखवा दी जाती है कि इस सबमें शुभम की बहन भी शामिल थी। फिर ये लाइन बढ़वाने वालों को याद आता है कि कैसे शामिल थी, उसका रोल क्या था ये तो पहले बताया ही नहीं। तो एक शब्द "बराबर" बीच में घुसाया जाता है।
पहले नहीं लिखा था तो caret (^) लगा कर लिखना पड़ता है। "बराबर" शब्द घुसाए जाने के बाद अब शुभम की बहन का रोल तथाकथित रूप से रेप करने वालों के जितना ही हो गया।
हमारे कानून के अनुसार लड़की का इतना बयान किसी को आरोपी बनाने के लिए काफी होता है। पुलिस अधिकारी भी लड़की के बयान के आधार पर चार्जशीट लगा देते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि उन पर किसी को बचाने का आरोप लग जाएगा। तो शुभम की बहन भी आरोपी बन गई।
लड़की को कांफिडेंस आ गया कि इतनी आसानी से किसी को फंसाया जा सकता है तो कुछ महीने बाद उसने कुलदीप सिंह सेंगर का नाम भी बढ़ा दिया। प्रियंका गांधी ने "लड़की हूं लड़ सकती हूं" वाला तमाशा शुरू कर दिया। अब जरा कोई बताए कि क्या शुभम की बेकुसूर बहन लड़की नहीं थी?
गुरुवार, 11 दिसंबर 2025
अलख निरंजन का अर्थ क्या, संन्यासी क्यों करते रहते हैं इसका उच्चारण
अलख संस्कृत भाषा के शब्द अलक्ष्य (न लक्ष्यते लक्षकर्म्मणि) का तद्भव रूप है। जो लक्ष्य न हो पाए वह अलक्ष्य है। जिसे पारिभाषित नहीं किया जा सकता है, जिसका भेद करना सम्भव नहीं है, जिसे जाना न जा सके, जो दृश्य नहीं है, जो ज्ञात नहीं है, जो प्रत्यक्ष न हो, जो अगोचर हो, जो चिह्नित न किया जा सके, जो किसी भी प्रकार की प्रवृत्तियों से युक्त न हो। परब्रह्म ईश्वर के लिए यही कुछ कहा जाता है।
अलख ^१ वि॰ [सं॰ अलक्ष्य]
१. जो दिखाई न पड़े । जो नजर न आए । अदृश्य । अप्रत्यक्ष । उ॰—बुधि, अनुमान, प्रमान, स्त्रुति किऐं नीठि ठहराय । सूछम कटि परब्रह्म की, अलख, लखी नहि जाय ।-बिहारी र॰, दो॰ ६४८ ।
२. अगोचर । इंद्रियातीत । उ॰—जे उपमा पटतर लै दीजै ते सब उनहिं न लायक । जौ पै अलख रह्मौ चाहत तौ बादि भए ब्रजनायक ।-सूर॰, २ ।४६४५ ।
३. ईश्वर का एक विशेषण । उ॰—प्रलख अरूप अबरन सो करता । वह सबसों सब वहि सों बरता ।-जायसी (शब्द॰) । मुहा॰—अलख जगाना=(१) पुकारकर परमात्मा का स्मरण करना या कराना । (२) परमात्माके नाम पर भिक्षा माँगना । यौ॰—अलखधारी । अलखनामी । अलखनिरंजन । अलखपुरुष= ईश्वर । अलखमंव=निर्गुण संत संप्रदाय में ईश्वर मंत्र ।
अलख ^२ संज्ञा पुं॰ ब्रह्मा । ईश्वर
निरञ्जन (निर्गतमञ्जनं कज्जलं तदिव समलमज्ञानं वायस्मात्) वह है जो बिना अञ्जन का हो; दोषरहित हो; अज्ञान से रहित हो; जो किसी भी प्रकार की माया से प्रभावित न हो; निर्मल हो; किसी प्रकार के आवेग, वासना, लालसा, राग, क्रोध, अनुराग, आदि गुणों से युक्त न हो; निष्कलङ्क हो; निर्गुण हो; उसे निरञ्जन कहा जाता है। महादेव, शिव, अथवा ईश्वर के लिए इस विशेषण का प्रयोग किया जाता है।
निरंजन ^१ वि॰ [सं॰ निरञ्जन]
१. अंजन रहित । बिना काजल का । जैसे, निरंजन नेत्र ।
२. कल्मषशून्य़ । दोषरहित ।
३. माया से निर्लिप्त (ईश्वर का एक विशेषण) ।
४. सादा । बिना अंजन आदि का ।
निरंजन ^२ संज्ञा पुं॰
१. परमात्मा ।
२. महादेव ।
अतः अलख निरञ्जन का आह्वान उस निर्गुण, निराकार, अपरभाषित ईश्वर के लिए है; यह अलख निरञ्जन का उद्घोष गोरक्षनाथ (अथवा गोरखनाथ) ने आरम्भ किया मानते हैं। कहते हैं कि इसी उद्घोष के साथ गोरखनाथ ने भर्तृहरि को दीक्षा के लिए प्रेरित किया।
तो कुछ इसे भगवान दत्तात्रेय का जयघोष कहते हैं।
मंगलवार, 25 नवंबर 2025
आज सदियों के घाव भर रहे हैं, सदियों की वेदना विराम पा रही है, सदियों का संकल्प सिद्ध हो रहा है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामभक्तों को संबोधित करते हुए कहा, आज संपूर्ण भारत, संपूर्ण विश्व राममय है। हर रामभक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष, असीम कृतज्ञता, अपार अलौकिक आनंद है। सदियों के घाव भर रहे हैं। सदियों की वेदना आज विराम पा रही है। सदियों का संकल्प आज सिद्धि को प्राप्त हो रहा है। आज उस यज्ञ की पूर्णावती है, जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक प्रज्ज्वलित रही। जो यज्ञ एक पल भी आस्था से डिगा नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटा नहीं।
यह धर्म ध्वजा भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज
यह धर्म ध्वज ‘प्राण जाय पर वचन नहीं जाए’ के वचन की प्रेरणा बनेगा
पीएम मोदी ने कहा, यह ध्वज सत्यमेव जयते का आह्वान करेगा। यह धर्म ध्वज उद्घोष करेगा कि सत्य में ही धर्म स्थापित है। यह ‘प्राण जाय पर वचन नहीं जाए’ के वचन की प्रेरणा बनेगा। यह संदेश देगा कि विश्व में कर्म और कर्तव्य की प्रधानता हो। यह प्रार्थना करेगा कि भेदभाव, पीड़ा, परेशानी से मुक्ति और समाज में शांति और सुख हो। हम ऐसा समाज बनाएं, जहां गरीबी न हो और कोई दुखी न हो।
यह ध्वज दूर से ही रामलला के जन्मभूमि के दर्शन कराएगा
उन्होंने कहा, जो लोग किसी कारण मंदिर नहीं आ पाते और दूर से ध्वज को प्रणाम करते हैं, उन्हें भी उतना ही पुण्य मिलता है। यह ध्वज दूर से ही रामलला के जन्मभूमि के दर्शन कराएगा। विश्व के करोड़ों राम भक्तों को इस क्षण की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। उन सभी भक्तों और दानवीरों का भी आभार व्यक्त करता हूं कि जिन्होंने मंदिर निर्माण में अपना सहयोग दिया।
अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श आचरण में बदलते हैं
प्रधानमंत्री ने कहा, अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श आचरण में बदलते हैं। यही वह नगरी है, जहां से श्रीराम ने अपना जीवन पथ शुरू किया। इसी अयोध्या ने संसार को बताया कि कैसे एक व्यक्ति समाज की शक्ति से उसके संस्कारों से पुरुषोत्तम बनता है। जब राम अयोध्या से गए तो युवराज राम थे, लेकिन जब लौटे तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर आए। इसमें अगिनत लोगों की भूमिका रही। विकसित भारत बनाने के लिए सामूहिक स्तर की भूमिका है।
-Legend News
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025
भारत के बदलते कानूनी सिस्टम में जेंडर-न्यूट्रल न्याय और फाइनेंशियल आज़ादी की ओर एक जरूरी कदम
दिल्ली हाईकोर्ट ने गुज़ारा भत्ता और मेंटेनेंस के मामलों में नया बेंचमार्क सेट किया
एक ऐतिहासिक फैसले में, दिल्ली हाई कोर्ट ने यह फिर से तय किया है कि तलाक के मामलों में गुज़ारा भत्ता और मेंटेनेंस को कैसे देखा जाना चाहिए - जिससे फैमिली लॉ के सबसे संवेदनशील पहलुओं में से एक में क्लैरिटी, निष्पक्षता और बैलेंस आया है।
हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 25 के तहत, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि:
अलग होने के बाद गुज़ारा भत्ता अपने आप मिलने वाला अधिकार नहीं है।
इसका असली मकसद फाइनेंशियल मुश्किलों को रोकना है, न कि इनकम को बराबर करना या मुआवज़े के तौर पर देना।
अगर कोई पति या पत्नी फाइनेंशियली आज़ाद और आत्मनिर्भर है, तो वे सिर्फ इसलिए गुज़ारा भत्ता क्लेम नहीं कर सकते क्योंकि शादी खत्म हो गई है।
हालांकि, जिन्होंने घर या बच्चों को संभालने के लिए अपना करियर या नौकरी छोड़ दी, वे सही सपोर्ट के हकदार हैं - उनका योगदान भी उतना ही ज़रूरी है।
यह प्रोग्रेसिव फैसला कानून के सामने समानता के विचार को मज़बूत करता है, यह पक्का करते हुए कि:
असली फाइनेंशियल ज़रूरतों की रक्षा की जाए।
मेंटेनेंस कानूनों के गलत इस्तेमाल को रोका जाए।
हर मामले को संवेदनशीलता और निष्पक्षता से जज किया जाए।
यह भारत के बदलते कानूनी सिस्टम में जेंडर-न्यूट्रल न्याय और फाइनेंशियल आज़ादी की दिशा में एक कदम आगे है।
मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025
हमारा इतिहास: उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के बुधनी में भी है सूर्य मंदिर, जानना जरूरी है
उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के बुधनी स्थित सूर्य मंदिर मूलतः एक भव्य स्थापत्य संरचना थी, जिसमें एक विशाल मंडप और एक बरामदे सहित दो मंजिला गर्भगृह था, जो सभी जटिल नक्काशी और आधार-उभरी हुई आकृतियों से सुसज्जित थे। आज, मंदिर के केवल कंकाल अवशेष ही बचे हैं।
प्रवेश द्वार सूक्ष्म मूर्तिकला से अलंकृत है, जबकि चौखट और चित्रवल्लरी विष्णु के दस अवतारों को प्रमुखता से दर्शाती हैं, जिनमें लक्ष्मी मध्य फलक पर विराजमान हैं। केंद्रीय देवता सूर्य स्थानक मुद्रा (खड़ी मुद्रा) में हैं।
मंदिर त्रिरथ योजना का अनुसरण करता है और ग्रेनाइट से निर्मित है। अनुमान है कि इसका निर्माण 10वीं-11वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का है।
पूर्वमुखी शिव मंदिर, दन्नैक के प्रांगण के पश्चिम में स्थित है। यह वर्तमान भूतल से नीचे स्थित है, इसलिए इसे 'भूमिगत मंदिर' का लोकप्रिय नाम प्राप्त हुआ है। शिलालेखों में इसे प्रसन्न विरुपाक्ष कहा गया है, और शैलीगत विश्लेषण से पता चलता है कि मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था। 15वीं और 16वीं शताब्दी के दौरान, मंदिर का विस्तार किया गया और कई मंडप जोड़े गए।
मंदिर के स्वरूप में एक संधार गर्भगृह, एक अंतराल और एक सभामंडप है, जिसके उत्तर और दक्षिण में दो उप-मंदिर हैं, साथ ही एक बंद मंडप है जिसके आगे एक अखंड दीपस्तंभ है। मंदिर के शीर्ष पर कदंब-नागर शैली का शिखर है, जो उप-मंदिरों को सुशोभित करने वाले शिखरों के समान है।
महामंडप के उत्तर में एक स्तंभयुक्त हॉल और स्तंभ स्तंभ है, जबकि दक्षिण की ओर एक अन्य मंदिर और स्तंभ स्तंभ है जिसके साथ एक प्रवेश द्वार है। महामंडप के पूर्वी भाग में वेदियाँ और एक अन्य प्रवेश द्वार है।
मुख्य मंदिर के उत्तर-पश्चिम में एक अलग संरचना है जिसमें एक गर्भगृह और एक अंतराल है, और दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक छोटा उप-मंदिर है। इस संरचना में पूर्वमुखी एक महाद्वार शामिल है।
दक्षिण में प्रांगण के बाहर एक अलंकृत कल्याणमंडप है, जो 1513 ई. में कृष्णदेवराय द्वारा प्रसन्न विरुपाक्ष को दिए गए शाही अनुदान को दर्ज करने वाले एक उत्कीर्ण शिलापट्ट के लिए उल्लेखनीय है।
रविवार, 12 अक्टूबर 2025
राम मंदिर के ध्वज पर बना पेड़ बैंगनी फूलों वाला कोविदार, जानिए इसकी कहानी
राम मंदिर के शिखर पर फहराए जाने वाले ध्वज का आकार-प्रकार और रंग रूप तय हो गया है। विवाह पंचमी के दिन 25 नवंबर को आयोजित ध्वजारोहण समारोह में पीएम नरेंद्र मोदी 191 फीट ऊंचे राम मंदिर के शिखर पर यह ध्वज फहराएंगे। त्रिकोण आकृति में भगवा रंग के 11 फीट चौड़े और 22 फीट लंबे ध्वज को फहराएंगे, जिस पर सूर्यवंशी और त्रेता युग का चिह्न स्थापित किया जाएगा। इसमें वो काविदार वृक्ष भी होगा जिसे लेकर आज बहुत चर्चा हुई ...आप भी जानिए इसके बारे में...
ये है कोविदार का वृक्ष, यह भी अयोध्या के राजध्वज में होगा। अयोध्या शोध संस्थान ने ऐसा 2023-24 में ही निर्धारित कर लिया था। यह पूर्ण शोध पर आधारित है।
भरत जी जब पादुका लेकर नंदीग्राम गए, तो वहां यही ध्वज लगाया था। वाल्मीकि रामायण में भी इसका वर्णन है।
According to - Plant and Animal Diversity in Valmiki Ramayana -- इसका बॉटैनिकल नेम Bauhinia purpurea है native of myanmar है (कोविदार) .. ये कचनार की फैमिली का है ....मेडिसिनल इस्तेमाल की वजह से इसे राजवृक्ष भी मान लिया गया.
अगर पौराणिक मान्यताओं को साइंस से जोड़ें तो कोविदार शायद दुनिया का पहला हाइब्रिड प्लांट होगा. ऋषि कश्यप ने पारिजात के साथ मंदार को मिलाकर इसे तैयार किया था. दोनों ही पेड़ आयुर्वेद में बेहद खास माने जाते हैं. इनके मेल से बना पेड़ भी जाहिर तौर पर उतना ही अलग था.
पारिजात और मंदार को मिलाकर हाइब्रिड तरीके से तैयार किया था क्योंकि दोनों ही पेड़ आयुर्वेद में बेहद खास हैं. कसैले गुण के कारण मेडिसिनल इस्तेमाल की वजह से इसे राजवृक्ष भी मान लिया गया
ध्वज पर सूर्य के साथ कोविदार वृक्ष बना हुआ होगा. कोविदार अयोध्या का राजवृक्ष था, जिसका जिक्र वाल्मीकि पुराण में भी है. माना जाता है कि ये दुनिया का पहला हाइब्रिड पेड़ है, जिसे ऋषि कश्यप ने बनाया था.
रामायण कांड में नाम आता है
पौराणिक मान्यता के अनुसार, महर्षि कश्यप ने कोविदार वृक्ष को बनाया था. वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका बार-बार उल्लेख मिलता है. जैसे राम के वन जाने के बाद भरत उन्हें मनाकर लौटाने के लिए निकलते हैं. वे लाव-लश्कर के साथ जंगल पहुंचे, जहां श्रीराम भारद्वाज मुनि के आश्रम में थे. शोर सुनकर लक्ष्मण को किसी सेना के हमले की आशंका हुई, लेकिन जब उन्होंने ऊंचाई पर जाकर देखा तो रथ पर लगे झंडे पर कोविदार पहचान गए. तब वे समझ गए कि अयोध्या से लोग आए हैं.
शोध पत्रिकाओं में भी नाम
वैज्ञानिकों के लिए बनी यूरोपियन सोशल नेटवर्किंग साइट 'रिसर्च गेट' में भी इसपर शोध छप चुका है. 'प्लांट एंड एनिमल डायवर्सिटी इन वाल्मीकि रामायण' नाम से प्रकाशित रिसर्च में राम के वन प्रवास के दौरान भी कई पेड़ों का जिक्र मिलता है. इसी में कोविदार का भी उल्लेख है. कोविदार कचनार की प्रजाति का वृक्ष होता है, जो श्रीराम के समय अयोध्या और आसपास के राज्यों में खूब मिलता था. इसकी सुंदरता और मेडिसिनल इस्तेमाल की वजह से इसे राजवृक्ष भी मान लिया गया.
ऋषि ने कैसे तैयार किया वृक्ष
अगर पौराणिक मान्यताओं को साइंस से जोड़ें तो कोविदार शायद दुनिया का पहला हाइब्रिड प्लांट होगा. ऋषि कश्यप ने पारिजात के साथ मंदार को मिलाकर इसे तैयार किया था. दोनों ही पेड़ आयुर्वेद में बेहद खास माने जाते हैं. इनके मेल से बना पेड़ भी जाहिर तौर पर उतना ही अलग था.
रंग-रूप कैसा है
कोविदार का वैज्ञानिक नाम बॉहिनिया वैरिएगेटा है. ये कचनार की श्रेणी का है. संस्कृत में इसे कांचनार और कोविदर कहा जाता रहा. कोविदार की ऊंचाई 15 से 25 मीटर तक हो सकती है. ये घना और फूलदार होता है. इसके फूल बैंगनी रंग के होते हैं, जो कचनार के फूलों से हल्के गहरे हैं. इसकी पत्तियां काफी अलग दिखती हैं, ये बीच से कटी हुई लगती हैं. इसके फूल, पत्तियों और शाखा से भी हल्की सुगंध आती रहती है, हालांकि ये गुलाब जितनी भड़कीली नहीं होती.
कहां मिलता है ये पेड़ कोविदार की प्रजाति के पेड़ जैसे कचनार अब भी हिमालय के दक्षिणी हिस्से, पूर्वी और दक्षिणी भारत में मिलते हैं. इंडिया बायोडायवर्सिटी पोर्टल की मानें तो कोविदार अब भी असम के दूर-दराज इलाकों में मिलता है. जनवरी से मार्च के बीच इसमें फूल आते हैं, जबकि मार्च से मई के बीच फल लगते हैं.
इन बीमारियों में राहत
आयुर्वेद में इसके सत्व का उपयोग स्किन की बीमारियों और अल्सर में होता है. इसकी छाल का रस पेट की क्रॉनिक बीमारियां भी ठीक करने वाला माना जाता है. जड़ के बारे में कहा जाता है कि सांप के काटे का भी इससे इलाज हो सकता है. ये बातें फार्मा साइंस मॉनिटर के पहले इश्यू में बताई गई हैं.
शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025
करवाचौथ अर्थात् करक चतुर्थी...जहां छलनी से देखे जाने का नाटक नहीं है
सन् 1713 में रत्नाकर भट्ट द्वारा रचित ‘जयसिंहकल्पद्रुम’ में #करवाचौथ व्रत का अधिकार केवल स्त्रियों को है। इसमें भगवान् शिव-पार्वती और भगवान् कार्तिकेय की पूजा होती है। चंद्रोदय पर अर्घ्य अर्पित किया जाता है। आजकल छलनी से पति को देखने का नाट्य चल पड़ा है, जो शास्त्रसम्मत नहीं है।
गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025
दिगम्बर आपको अपने चरणों में जगह दे पंडिज्जी ...नमन पद्मभूषण छन्नूलाल जी
काशी का घाट, शोक में भी उल्लास का गीत और अध्यात्म... शिवत्व में विलीन हो गए पंडित छन्नूलाल मिश्र
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज पंडित छन्नूलाल मिश्र का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया. आजमगढ़ में जन्मे पंडित छन्नूलाल ने ठुमरी और पुरब अंग को अपनी भावपूर्ण गायकी से अमर बनाया. वह किराना-बनारस घराने के प्रतिनिधि थे. उन्हें 2020 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था.
वो जानते थे कोयल और मोर किस स्वर में बात करते हैं। उन्हें बात करना आता था चकवा, चकई और चकोर से।
वो जब गाते थे, तब जेठ की झुलसाती धूप में फागुन का चटक रंग समा जाता। चैत खिल जाता हमारे रोम-रोम में और पता चलता कि पेड़ पर बोल रही कोयल भी किसी विरहन की दुश्मन हो सकती है।
बाबा विश्वनाथ और तुलसीदास को जीवन का केंद्रीय स्वर बनाकर प्रेम का आलाप लेने वाले पंडित जी को वो साधारण श्रोता भी सुन सकता था, जो नहीं जानता दादरा, कहरवा, बड़ा ख्याल और छोटा ख्याल का अंतर।
लेकिन मेरा ख्याल ये है कि आज बनारस के तानपुरे का वो तार टूट गया, जिसके गूंजने से पूरी दुनिया के मंचो पर बनारस शान से गूंजता था।
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि पंडित जी। आपके बिना तो अब चैत भी रोएगा, फागुन में काशी का मसान भी। रोएगी आज कोयल, सेजिया पर लेटकर विरहन।
आज आखिरी बार काशी आएंगे काशी के अपने सबसे दुलारे सप्तक, पद्मभूषण छन्नूलाल जी। कुछ देर बड़ी गैबी वाले घर की दीवारों को अलविदा कहने। जहां आने और रहने पिछले कई सालों से छटपटाते रहे। और फिर मसाने की होरी गाकर जिस मणिकर्णिका के हवाले शवों की राख से होली को काशी के उत्सव की धुन बनाया, वहां हमेशा के लिए बाबा की हथेली पर सो जाने। क्या कहते हैं उसे, चिरनिद्रा…।
काशी और उसे घाट में तुरपे मसाने की होरी, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी के राग आज हमेशा के लिए याददाश्त का सबसे जहीन टुकड़ा बन गया है।
शुक्रवार, 19 सितंबर 2025
जीवन के शतपथ: मणिकर्णिका घाट पर शांत हो चुकी चिताभस्म पर मुखाग्नि देने वाला 94 क्यों लिखता है
#शुक्ल_यजुर्वेद का एक विशाल और प्रामाणिक ब्राह्मण ग्रंथ #शतपथ_ब्राह्मण जीवन के सौ मार्ग या जीवन के शतपथ का वर्णन किया गया है, जिसमें यज्ञों के विधि-विधान के साथ-साथ सांस्कृतिक तत्वों, सामाजिक जीवन का वर्णन और ब्रह्म विद्या का विस्तार से उल्लेख है। इसके अंतिम भाग #बृहदारण्यक_उपनिषद में, जो स्वयं जीवन की उच्च शिक्षाओं का मार्ग प्रशस्त करता है।
काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है। यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।
जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।
अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।
गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है।मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।
आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी।
100 शुभ कर्मों की गणना
धर्म और नैतिकता के कर्म
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
20.नियमित ध्यान और योग
सामाजिक
और पारिवारिक कर्म
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग
आध्यात्मिक.और.व्यक्तिगत.कर्म
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना
सेवा.और.दान.के.कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान
नैतिक.और.मानवीय.कर्म
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना
विधि के अधीन.
6 कर्म
95.हानि
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपय
- Alaknanda Singh


