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शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

निदा फ़ाजली और मुनव्‍वर राणा आखिर हैं क्‍या ?

उस दिन मैं मशहूर शायर निदा फ़ाजली साहब के बारे में पढ़ रहा था। 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ तो निदा फ़ाजली के अब्‍बा भी पाकिस्‍तान चले गए किंतु निदा फ़ाजली नहीं गए।
निदा फ़ाजली साहब का मानना था कि जो भी दंगे हो रहे हैं, उनका कारण हिंदू या मुसलमान नहीं हैं। उनका कारण इंसान हैं, चाहे उनका वास्‍ता किसी मजहब से हो। वो हिंदू हों या मुसलमान, सिख हों या ईसाई।
निदा फ़ाजली के अनुसार इंसान जहां भी होगा, वहां वह ऐसे हालात पैदा कर लेगा क्‍योंकि वह उसकी फितरत में शामिल है।
1947 में हुए बंटवारे के वक्‍त निदा फ़ाजली कितने जवान रहे होंगे, इसका अंदाज तो लगाया जा सकता है किंतु यह अंदाज लगाना मुश्‍किल है कि उस समय उनकी जो सोच थी, वह इतनी परिपक्‍व कैसे थी कि आज भी न केवल हिंदुस्‍तान के संदर्भ में बल्‍कि विश्‍वभर के संदर्भ में पूरी तरह सच्‍ची साबित हो रही है।
जरा विचार कीजिए कि यदि समस्‍या सिर्फ हिंदू या मुसलमान की होती तो दुनिया के उन तमाम मुल्‍कों में एक ही मजहब के लोग परस्‍पर एक दूसरे की जान के दुश्‍मन क्‍यों बने हुए हैं।
पाकिस्‍तान जैसे लगभग शत-प्रतिशत मुस्‍लिम आबादी वाले देश में आतंकवादी अपने ही निर्दोष भाई-बंधुओं का कत्‍ल क्‍यों कर रहे हैं। यहां तक कि उन मासूम बच्‍चों को भी निशाना बनाने से परहेज नहीं करते, जिन्‍हें ठीक से न मजहब का पता होता है और न वो उनके मकसद से वाकिफ होते हैं।
पाकिस्‍तान के अलावा सीरिया, ईरान, इराक और अफगानिस्‍तान से लेकर दुनिया के तमाम मुस्‍लिम मुल्‍कों में कौम के रक्‍त पिपाशु सक्रिय हैं जिससे साबित होता है कि निदा फ़ाजली साहब सौ फीसद सही थे।
अब बात करें हिंदुस्‍तान की तो यहां भी सवाल हिंदू, मुस्‍लिम या सिख का नहीं है। सवाल उन लोगों का है जिनकी समूची राजनीति ही वैमनस्‍यता पर टिकी है।
चूंकि मुंसिफ भी वही हैं और मुज़रिम भी वही इसलिए उनकी पूरी भूमिका कभी सामने नहीं आ पाती। जितनी और जो आ भी पाती है, वह भी राजनीति की चौसर का हिस्‍सा होती है लिहाजा सबूत व गवाहों के अभाव में दम तोड़ देती है। वो देर-सवेर बेदाग साबित होते हैं।
राजनीति में सक्रिय ऐसे रक्‍त पिपाशु न तो किसी एक मजहब में हैं और न किसी एक दल में। यह हर दल में और हर मजहब में घुसे हुए हैं।
जहां तक इनकी सामर्थ्‍य का प्रश्‍न है तो वह इतने शक्‍तिशाली हैं कि उनके अपने दल और उनके अपने नेता भी उन पर लगाम लगाने में असमर्थ हैं क्‍योंकि वहां वोटों की राजनीति तथा सत्‍ता पर कायम रहने अथवा सत्‍ता कब्‍जाने की चाहत आड़े आ जाती है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस दौर की राजनीति संभवत: राजनीति के उस मुकाम तक जा पहुंची है जहां से नीचे गिरने लायक कुछ बचा ही नहीं है। ऐसे में किसी कौम का कोई एक व्‍यक्‍ति मरे या सैकड़ों-हजारों मारे जाएं, राजनेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता।
कहीं उस गौवंश के नाम पर हिंसा की जाती है जो खुद अपने जीवन-यापन के लिए गली-गली और सड़क-सड़क आवारा घूम रहा है। कूड़े के ढेरों पर से गंदगी खाकर अपने उदर की पूर्ति कर रहा है…और कहीं मंदिर, मस्‍जिद, गुरुद्वारों तथा धार्मिक ग्रंथों की आड़ में हिंसा के बीज बोए जा रहे हैं जहां से निकलने वाली हर आवाज़ तथा जिनमें दर्ज़ एक-एक शब्‍द मानवता का संदेश देता है…शांति का उद्घघोष करता है।
घोर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि समाज का वो बुद्धिजीवी तबका भी राजनेताओं की चाल में फंस रहा है जिससे उम्‍मीद की जाती है कि वह विषम परिस्‍थितियों या संक्रमण काल में समाज को दिशा दिखाने के लिए आगे आयेंगे।
चिंता इस बात की नहीं कि बुद्धिजीवी कहलाने वाले ये लोग देश के हालातों पर अपना रोष किस तरह प्रकट कर रहे हैं, चिंता इस बात की है कि उन्‍होंने अपना बुद्धि-विवेक ताक पर रख दिया है।
बुद्धिजीवियों की इस जमात से कोई यह पूछने वाला नहीं कि यदि उन्‍हें देश पर इतना बड़ा खतरा मंडराता नजर आ रहा है और सत्‍ता के शिखर पर बैठे व्‍यक्‍ति विशेष अथवा दल विशेष से इतनी ही निराशा है तो वह खुद समाज व देश को बचाने के लिए कौन से प्रयास कर रहे हैं।
क्‍या समाज व देश के प्रति उनकी जिम्‍मेदारी सिर्फ चंद रचनाएं लिख देने और उनकी एवज में पहले तो हर हथकंडा अपनाकर पुरस्‍कार हासिल करने तथा फिर उसी पुरस्‍कार को लौटा देने तक सीमित है। क्‍या इसके अलावा उनकी समाज के प्रति कोई जिम्‍मेदारी नहीं बनती।
आज अपने पुरस्‍कार लौटाने वाले बुद्धिजीवियों व रचनाधर्मियों में से तमाम तो ऐसे हैं जिन्‍हें पुरस्‍कार लौटाने की घोषणा करने से पहले तक नई पीढ़ी जानती भी नहीं थी। आमजन को भी यह पता नहीं था कि उन्‍हें किस कार्य के लिए और कब पुरस्‍कृत किया गया जबकि मुंशी प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, हजारी प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम या शिवानी से आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग वाकिफ़ है।
आज ही के दौर में अपनी रचनाओं के साथ-साथ अपनी शख्‍सि़यत के बल पर अलग पहचान रखने वाले दिग्‍गज शायर मुनव्‍वर राणा ने सही कहा है कि जो लोग पुरस्‍कार लौटा रहे हैं वह थके हुए लोग हैं और उन्‍हें अपनी योग्‍यता पर भरोसा नहीं रहा।
स्‍वतंत्रता के आंदोलन की ओर मुड़कर देखिए तो आपको मुनव्‍वर राणा की कही हुई बातों का अर्थ शायद समझ में आ जाए, जब अनेक रचनाधर्मियों, बुद्धिजीवियों तथा पत्रकारों ने कलम के साथ-साथ समाज के बीच सक्रिय होकर भी स्‍वतंत्रता सेनानियों का साथ निभाया था और उसकी खातिर जेलयात्रा भी की थी।
निदा फ़ाजली और मुनव्‍वर राणा जैसी शख्‍सियतों का मक़सद यदि तथाकथित बुद्धिजीवियों की समझ में आ जाए तो नि:संदेह कभी कोई राजनेता अपने नापाक इरादों में कामयाब नहीं हो सकता।
नाराजगी ज़ाहिर करना और समाज के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराना हर इंसान का अधिकार भी है और कर्तव्‍य भी लेकिन यदि उस नाराजगी के पीछे कोई निजी स्‍वार्थ अथवा छद्म मकसद छिपा हो तो वह बेमानी हो जाती है। फिर राजनीति और नेकनीयती में फर्क कहां रह जाता है। यूं तो अक्‍सर राजनेता ही एक-दूसरे पर राजनीति करने का आरोप लगाते रहते हैं लेकिन वो तो राजनेता हैं, उनके आरोप-प्रत्‍यारोप भी राजनीति से परे नहीं हैं किंतु उनका क्‍या, जो कहलाते बुद्धिजीवी हैं लेकिन फिर भी राजनीति के शिकार हो रहे हैं।
इस सब को देखकर तो निदा फ़ाजली साहब का दर्शन शत-प्रतिशत सही साबित होता है कि समस्‍या जाति-धर्म या खान-पान नहीं है, समस्‍या इंसान खुद है। वो इंसान जिसे कदम-कदम पर इंसानियत सिखानी पड़ती है। यही एकमात्र ऐसी इकाई है, जो खुद को सृष्‍टि की सर्वश्रेष्‍ठ रचना बताती है लेकिन इंसानियत के मौलिक धर्म से सर्वथा अनभिज्ञ है और जिसे मानव होते हुए मानवता का पाठ एक-दो मर्तबा नहीं, बार-बार पढ़ाना पड़ता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

काश ! हर दिल मुनव्वर हो जाए तो कोई बात बने …

साहित्य अकादमी पुरस्कार को ठुकराने वाले लेखकों के पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तरीके से लोग व्याख्या कर रहे हैं और पुरस्कार को ठुकराने के पीछे छुपी उनकी अपनी स्ट्रैटिजिक महात्वाकांक्षाओं- आकांक्षाओं का ब्यौरा दर ब्यौरा सामने रख रहे हैं।
इस सबके पीछे गत दिनों दादरी में घटी गौमांस खाने पर हत्या किये जाने की घटना को आधार बनाया गया है। राजनैतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक जगत के ये वरिष्ठ लोग आहत हैं या आहत होने का दिखावा कर रहे हैं, यह धीमे धीमे सबके सामने आता जा रहा है।
ऐसे में कोई यदि ये कहे कि ”जिस उत्तर प्रदेश में ये घटना घटी, उस प्रदेश में नेता नहीं दलाल रहते हैं, उस प्रदेश के धर्मगुरू गाय के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं, उत्तर प्रदेश में मसला गाय का नहीं 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव का है,” तो आप क्या कहेंगे?
यही ना कि ये फरिश्ता कहां से आ टपका जो इस सोचविहीन समाज में ऐसी बातें कर रहा है। हो सकता है कि आप ये भी कहें कि इस व्यक्ति को या तो कोई खौफ नहीं है या इसे लालच नहीं है उस जमात में बैठने का जो साहित्य जगत को भी राजनीति का अखाड़ा बनाने पर आमादा रहती है।
जी हां! ये हैं मशहूर शायर मुनव्वर राणा, जिन्होंने सहारनपुर के मुशायरे में भाग लेने से पहले मीडिया के सामने अपने जज़्बात साझा करते हुए यह सब कहा। मुनव्वर राणा व अनवर जलालपुरी सहारनपुर के मेला ”गुघाल” के अवसर पर आयोजित होने वाले मुशायरे में शामिल होने पहुंचे थे।
मुनव्वर राणा साहब की लाजवाब शख्स‍ियत के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं है। और कल तो उन्होंने सरेमीडिया उक्त बात कहकर न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति की ज़मींदोज़ हो चुकी साख को लानत मलानत भेजी बल्कि उस साहित्यिक जमात के विचारों को भी ललकारा जो आजकल देश की सेक्यूलर छवि को लेकर बड़े चिंतित हैं। ये वही साहित्यिक जमात है जो आयातित सेक्यूलरिज्म के नाम पर अनर्गल लिखने और बोलने को सच्ची साहित्यिक साधना कहती है, बिना ये सोचे कि हमारे देश का समाजवाद दुनिया के किसी और देश में नहीं, उन देशों में भी नहीं जहां के समाजवाद को ये के साहित्यिक वरिष्ठजन इसे ढो रहे हैं। ये वही जमात है जो कला या साहित्य साधना के नाम पर चरित्रों के कोने- कोने को भ्रष्ट करती है। ये वही जमात  है जिसके लिए शराब और बीफ  साहित्यिक गोष्ठियों का मेन मेन्यू होता है। ये कैसा समाजवाद है इनका, मुनव्वर साहब ने इन साहिबानों के समाजवाद पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि गाय को जो बेचे या मारे, वह सबसे बड़ा गुनहगार है। बीफ मुद्दे पर दो पक्षों द्वारा की जा रही राजनीति म‍हज 2017 के चुनावों तक है। जब दादरी का पीड़‍ित परिवार राज्य और केंद्र सरकारों के प्रयास व स्वयं अपने गांव वालों की दिलेरी से मुतमईन है तो फिर आजम खान जैसे नेता या कोई आदित्यनाथ जैसे धर्मगुरू द्वारा इस प्रकरण में बयानबाजी के आखिर क्या मायने हैं।
प्रदेश के मुख्यमंत्री अख‍िलेश यादव और नगर विकास मंत्री आजम खान द्वारा उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की ओर से प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को सम्मानित किए जाने के सवाल पर मुनव्वर राणा ने कहा कि जो उर्दू की आत्मा को नहीं जान सके वे ही पुरस्कार समिति के अध्यक्ष बने हुए हैं। आख‍िर ये कैसा मजाक है उर्दू के साथ।
अनवर जलालपुरी के संग प्रेस वार्ता कर रहे मुनव्वर राणा साहब ने उर्दू अकादमी के चेयरमैन बनाने की प्रक्रिया और नीयत दोनों पर सवाल उठाए कि नाकाबिल लोग अगर राजनैतिक रसूख के बल पर चेयरमैन बनेंगे तो अकादमी और उर्दू जबान दोनों का गर्त में जाना निश्चित है। उनका ये कहना कि कोई शायर है और मुसलमान है सिर्फ इसी के बूते उर्दू अकादमी का चेयरमैन नहीं बनाया जा सकता। उसमें नेताओं की चौखट चूमने से ज्यादा भाषा के सम्मान का गुण होना चाहिए।
उर्दू अकादमी का चेयरमैन बनाने के पीछे मुसलमान होना कोई वजह नहीं होनी चाहिए इसी तरह उर्दू की बेहतरी के लिए उर्दू अकादमी की जरूरत नहीं, अकादमी बना देने से उर्दू का भला होने वाला नहीं है क्योंकि अकादमी को लेकर प्रदेश सरकार की मंशा अच्छी नहीं है। सरकार और सरकार के मंत्रीगणों ने उर्दू अकादमी को अय्याशी का अड्डा बना रखा है।
मुनव्वर राणा का ये कहना कि जिस दिन प्रदेश के मुसलमान सपा सरकार में शामिल मुस्लिम नेताओं के पीछे चलना छोड़ देंगे तथा लाल बत्ती वालों का गिरेबां पकड़ लेंगे, उसी दिन प्रदेश के मुस्लिमों के हालत सुधर जाएंगे।
ये वो झकझोरते सवाल हैं जो मुनव्वर राणा साहब ने उर्दू के भविष्य, साहित्य की छीछीलेदर करती समाजवादी जमात और गाय को लेकर हो रही राजनीति पर दागे व स्वयं मुसलमानों की भटकी हुई दिशा व दशा पर उठाए।
निश्चित ही भूखों मरती गायों की ओर कभी मुड़कर न देखने वाले, गौशालाओं के नाम पर देश-विदेश से भारी दान इकठ्ठा करने वाले धर्मगुरूओं की आज अचानक गाय और बीफ मुद्दे पर उमड़ी करुणा और दया हो या आजम खान के उर्दू और मुसलमानों के लिए बहते आंसू, इनको आइना दिखाने वाले मुनव्वर राणा व अनवर जलालपुरी इंसानियत की जिस सूरत की बात करते हैं उसके लिए बार- बार तहेदिल से यही निकलता है कि काश ! हर दिल मुनव्वर हो जाए तो कोई बात बने …
मुनव्वर साहब के ही शब्दों में —-
यहाँ वीरानियों की एक मुद्दत से हुकूमत है
यहाँ से नफ़रतें गुज़री है बरबादी बताती है
लहू कैसे बहाया जाय यह लीडर बताते हैं
लहू का ज़ायक़ा कैसा है यह खादी बताती है
ग़ुलामी ने अभी तक मुल्‍क का पीछा नहीं छोड़ा
हमें फिर क़ैद होना है ये आज़ादी बताती है….
– अलकनंदा सिंह