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शनिवार, 21 सितंबर 2019

रिफ्रेशर कोर्स ‘अर्पित’ ने खोली उच्च श‍िक्षा के गुरुओं की पोल

उच्‍च शिक्षण संस्‍थानों में शिक्षा की हकीकत बताने पर एक रिपोर्ट आई है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा उच्‍च शिक्षण संस्‍थानों में कार्यरत शिक्षकों के लिए पिछले वर्ष एक रिफ्रेशर कोर्स ज्‍वॉइन करने हेतु जो परीक्षा आयोजित की गई थी, उसमें 40 प्रतिशत शिक्षक फेल हो गए।
दरअसल मानव संसाधन मंत्रालय ने उच्‍च शिक्षण संस्‍थानों की गुणवत्‍ता व यहां के शिक्षकों के ज्ञान को परखने को एक ऑनलाइन रिफ्रेशर कोर्स ‘ARPIT‘ (ऐनुअल रिफ्रेशर प्रोग्राम इन टीचिंग) जारी किया। इसमें शामिल होने के लिए एक शुरुआती टेस्‍ट होना था। अकर्मण्‍यता का इससे बड़ा नमूना और क्‍या हो सकता है कि इस रिफ्रेशर कोर्स ‘अर्पित’ को लेकर उच्‍च शिक्षण संस्‍थानों में पढ़ा रहे लगभग 15 लाख शिक्षकों में से सिर्फ 51000 शिक्षकों ने ही रजिस्‍ट्रेशन कराया और उनमें से भी सिर्फ 6,411 शिक्षक ही शामिल हुए जिसमें से भी 40 प्रतिशत शिक्षक फेल हो गए।
यूं इस कोर्स को करना अनिवार्य नहीं था परंतु इसे पदोन्‍नति से जोड़ा गया था, बावजूद इसके इतनी बड़ी संख्‍या में शिक्षकों का ‘रिफ्रेशर कोर्स टेस्‍ट’ में फेल होना ये बताता है कि उच्‍च शिक्षा में बदहाली और शिक्षकों की जो ‘दयनीय’ दशा है, वह दरअसल इकतरफा है, जानबूझकर प्लान्ट की गई है । इस इकतरफा ‘स्‍थापित की गई तस्‍वीर’ में कहीं भी ना तो शिक्षकों की अकर्मण्‍यता का जि़क्र आता है और न ही शैक्षिक माफियागिरी का। निश्‍चित जानिए ना तो इन फेल हुए 40 प्रतिशत का उल्‍लेख होगा और ना ही उन 14 लाख 40 हजार का जिन्‍होंने परीक्षा केलिए रजिस्‍ट्रेशन ही नहीं कराया।
बहरहाल शिक्षक संघों द्वारा हमारे सामने बनाई गई तस्‍वीर में शिक्षकों को सदैव बेचारा बताकर सरकारों को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है जबकि तस्‍वीर का दूसरा रुख जो आज हमारे सामने 40 % के रूप में आया, वह उच्‍च शिक्षा के इन कमजोर कंधों की हकीकत बयान करता है। वह यह भी बताता है कि देश के करदाताओं का पैसा इन जैसे ना जाने कितने अकर्मण्‍यों पर बरबाद किया जा रहा है। कम तनख्‍वाह, अतिरिक्‍त कार्य के अलावा बात बात पर जिंदाबाद मुर्दाबाद करते शिक्षक संघों, यूनीवर्सिटी यूनियनों के जरिए संस्‍थानों पर हावी रहने की निकम्‍मी-प्रवृत्‍ति ने शिक्षण कार्य की गुणवत्‍ता को तो प्रभावित किया ही है, साथ ही उन्‍हें परजीवी की भांति गैरजिम्‍मेदार भी बना दिया और नतीजा हमारे-आपके सबके सामने है कि हम अपने बच्‍चों के भविष्‍य को आखिर किसके हाथों सौंपते चले आ रहे हैं।
नियम तो ये होना चाहिए कि जो देश के भविष्‍य का निर्माण करने को नियुक्‍त ऐसे सभी लोग अपनी योग्‍यता समय-समय पर सिद्ध करने को बाध्‍य हों क्‍योंकि तभी उच्‍च शिक्षा में आगे बढ़ा जा सकता वरना अभी तक तो हम सरकार पर शिक्षाबजट कम होने का आरोप लगाकर कबूतर की भांति असल समस्‍या को देखकर आंखें ही बंद करते आए हैं।

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

शिक्षक दिवस: ‘नौकरी की सोच’ से आगे की बात

The point beyond 'job thinking'
यूं तो आज शिक्षक दिवस है और शिक्षा व शिक्षकों को लेकर कसीदे पढ़े जायेंगे, उनकी समस्यायें गिनाईं जाएंगी, सरकारों से उनके लिए क्‍या करें क्‍या ना करें, आदि आदि समाधान बताए जाऐंगे, जो स्‍वयं कुछ नहीं कर सके वे दूसरों को उपदेश देंगे कि शिक्षक दिवस पर ये करें, वो ना करें… आदि आदि। निश्‍चित जानिए कि आज का दिन शिक्षकों की ”बेचारगी” का रोना रोने में जाएगा। गुरुकुल की महान परंपरा वाले देश में इस तरह का रुदाली-रुदन अच्‍छा नहीं, ये तो शिक्षकों का डिमॉरलेजाइशन ही हुआ ना।
बहरहाल मैं अपनी बात यहीं से शुरू करती हूं कि आखिर क्‍यों ‘गुरू को पूजने वाले हम’ स्‍वयं का विक्‍टिमाइजेशन करने के आदी होते गए, गरीब और गरीबी को कथित रूप से महिमामंडित करते रहे। इस बेचारगी के रोने में कब स्‍वाभिमान तिल तिल कर समाप्‍त होता गया, पता ही नहीं चला।
शिक्षकों को लेकर हम इतना रोए कि ये विक्‍टिमाइजेशन की प्रवृत्‍ति रग रग में समाती चली गई, नतीजा यह रहा कि पूरे समाज को शिक्षित करने वाला शिक्षक ही अपने स्‍वाभिमान और कर्तव्‍य को ‘नौकरी’ के लबादे में लपेटकर स्‍वयं को हद दर्जे तक लगातार गिराता गया। स्‍तर यहां तक गिरा कि नौकरी के लिए शिक्षक हिंसक विरोध प्रदर्शनों पर उतर आए।
अकर्मण्‍यता, राजनीति, विरोध-प्रदर्शनों का पर्याय क्‍यों होते गए शिक्षक। शिक्षा देने वाले ही जब हिंसा पर उतारू हो जाऐंगे तो शिक्षा देगा कौन और कैसी होगी वह शिक्षा, आज के दिन ये भी सोचना जरूरी है। शिक्षादान को नौकरी में समेटकर हमने जो भूल कीं, अब उसे सुधारने का समय आ गया है।
सम्‍मान पाने के लिए सम्‍मान देना भी जरूरी है, और जो अपने कर्म को ही सम्‍मान नहीं दे सकता वह सम्‍मान पाने का अधिकार खो देता है। ये सम्‍मान किसी सरकार या संस्‍था से लिए जाने वाला सम्‍मान नहीं, बल्‍कि अपनी ही नज़रों में अपने सम्‍मान की बात है। तभी तो उन्‍हें ही श्रेष्‍ठ शिक्षक कहा जाता है जो नि:स्‍वार्थ शिक्षा देने में यकीं रखते हैं। संपन्‍नता नहीं, सुख खोजेंगे…अधिकार से पहले कर्तव्‍य को अंजाम देंगे तो ही समझ आएगा कि शिक्षक दिवस पर अब शिक्षकों को अपनी यात्रा का रुख किस ओर करना चाहिए।

रविवार, 4 अगस्त 2019

जब मेंड़ ही खेत को खाने लगे तो खेत का अस्‍तित्‍व बचेगा कैसे?

जब कर्तव्‍य पर सिर्फ और सिर्फ पैसा हावी होने लगे और ”सरकारी नौकरी” इस बात की गारंटी हो कि बिना कुछ किए धरे भी तनख्‍वाह आपको मिल ही जाएगी तो वही होता है जो आजकल उत्‍तर प्रदेश के कमोवेश सभी सरकारी स्‍कूलों में हो रहा है। यहां मौजूद 90 प्रतिशत शिक्षक, शिक्षा व्‍यवस्‍था को इसी प्रकार पलीता लगा रहे हैं। यूं भी जब मेंड़ ही खेत को खाने लगे तो खेत का अस्‍तित्‍व ही कहां बचेगा। प्रदेश की शिक्षा व्‍यवस्‍था इसी तरह अपने अस्‍तित्‍व को मिटते देख रही है।
सृजनात्‍मकता, नवोन्‍मेष को धता बताते हुए शिक्षामित्र, बीटीसी, बीएड, डीएड, डीएलएड, टीईटी, सीटीईटी के माध्‍यम नौकरी प्राप्‍त लगभग दर्जनभर से ज्‍यादा तरह के पदों पर ”कार्य” करने वाले शिक्षकों की भरमार के बावजूद प्राइमरी शिक्षा को स्‍वयं शिक्षकों ने ही मजाक बनाकर रख दिया है।
बच्‍चे स्‍कूलों से नदारद हैं, शिक्षक स्‍कूल आ ही नहीं रहे और यदि आ भी रहे हैं तो कक्षाएं नहीं ले रहे। बच्‍चे पहाड़े, पीएम, सीएम , जिले का नाम, दिन व महीनों तक के नाम नहीं बता पा रहे। आखिर इसके लिए कौन जिम्‍मेदार है। सरकार इसके लिए जब तनख्‍वाह दे रही है तो यह जिम्‍मेदारी किसकी है।
पिछले लगभग दो हफ्तों से मथुरा जिला प्रशासन लगातार जिले के सभी सरकारी स्‍कूलों में चेकिंग कर रहा है, आख्‍या में अनुपस्‍थित शिक्षकों की तनख्‍वाह काटी जाने की संस्‍तुति भी एडीएम कर रहे हैं, एबीएसए, बीएसए द्वारा रेगुलर चेकिंग न करने की शिकायत लिखित में दे रहे हैं, परंतु कुछ भी काम नहीं आ रहा और स्‍कूलों में शिक्षकों की मनमानी अपने चरम पर है।
शिक्षकों की इस सीनाजोरी के लिए मीडिया भी उतना ही दोषी है क्‍योंकि जब-जब शिक्षकों के धरना प्रदर्शन होते हैं तो बड़ी सी हेडलाइन, इनकी दुर्दशा को लेकर छापते हैं या दिखाते हैं परंतु शिक्षा की इस तरह दुर्दशा करने पर उन्‍हीं शिक्षकों के खिलाफ मीडिया एक शब्‍द नहीं लिखता।
हर महीने बंधी-बंधाई तनख्‍वाह के बावजूद शिक्षामित्र, सहायक शिक्षक आदि पदों पर बैठे अकर्मण्‍य लोग, बच्‍चों को शिक्षित करना तो दूर स्‍वयं ही अनुशासन तोड़ने के बहाने ढूढ़ते रहते हैं। वेतन भत्‍तों के लिए मरने-मारने पर हर वक्‍त आमादा तथा बात-बात में हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट पहुंचने वाले इन ”कथित” ठेकेदार शिक्षकों के बूते प्रदेश की शिक्षा व्‍यवस्‍था अपनी दुर्दशा से नहीं निकल सकती।
एक कड़वा सच ये भी है कि शिक्षा व्‍यवस्‍था जिन कांधों पर चढ़कर दौड़नी चाहिए थी, वे सिर्फ इसे ढो रहे हैं। अपने ”हालातों” के चलते शिक्षा जैसे उच्‍च्‍तम मानदंड वाले क्षेत्र में ”नौकरी” कर रहे 90 प्रतिशत शिक्षकों में शिक्षा देने का जज्‍़बा पूरी तरह से गायब है। जो स्‍वयं ही शिक्षा के मायने नहीं जानते, उनसे भला बच्‍चों को शिक्षित करने की आशा कैसे रखी जाए।
बहरहाल, ये हालात चिंतनीय हैं क्‍योंकि करोड़ों के बजट के बाद भी रिजल्‍ट शून्‍य है। वक्‍त आ गया है कि अब सरकार को ड्रेस, बस्‍ते, जूते, मिड डे मील से आगे बढ़कर सोचना होगा ताकि सरकारी स्‍कूलों में पढ़ने आने वाले बच्‍चों के भविष्‍य के साथ खिलवाड़ न हो सके।
शिक्षकों से तो इतना ही कहा जा सकता है कि…
ख्वाहिशों का मोहल्ला बहुत बड़ा होता है..
बेहतर है हम ज़रूरतों की गली में मुड़ जाएं..और अपने कर्तव्‍य को निभायें।
-अलकनंदा स‍िंह