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सोमवार, 1 सितंबर 2014

राधा बनते जाना है और ...बस !

राधाष्‍टमी पर 

ओशो द्वारा कृष्ण पर दिए गए प्रवचन को लेकर कभी अमृता प्रीतम ने लिखा था-
'' जिस तरह कृष्ण की बाँसुरी को भीतर से सुनना है, ठीक उसी तरह ‘भारत—एक सनातन यात्रा’ को पढ़ते-सुनते, इस यात्रा पर चल देना है। और कह सकती हूँ कि अगर कोई तलब कदमों में उतरेगी, और कदम इस राह पर चल देंगे, तब वक्त आएगा कि यह राह सहज होकर कदमों के साथ चलने लगेगी, और फिर ‘यात्रा’ शब्द अपने अर्थ को पा लेगा !''
यात्रा... ,  जी हां ।  एक  ऐसा  अनवरत  सिलसिला जिसे किसी ठांव  या  मकसद की  हमेशा  जरूरत  होती  है । जिसे हर हाल में मंज़िल की तलाश होती और मंज़िल को पाना ही लक्ष्‍य। यूं तो यात्रा का अर्थ बहुत गहरा है मगर जब यह यात्रा एक धारा बनकर बहती है तो अनायास ही वह अपने उद्गम की ओर आने को उत्‍सुक रहती है । यही उत्‍सुकता धारा को राधा बना देती है।

राधा कोई एक किसी ग्‍वाले कृष्‍ण की एक सुन्‍दर सी प्रेयसी का नाम नहीं, ना ही वो केवल वृषभान की दुलारी कन्‍या है बल्‍कि वह तो अनवरत हर कृष्‍ण अर्थात् ईश्‍वर के प्रत्‍येक अंश-अंश से मिलने को आतुर रहने वाली हर उस आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति के रूप में बहने वाली धारा का नाम है जो भौतिकता के नश्‍वरवाद से आध्‍यात्‍मिक चेतना की ओर बहती है, उसमें एकात्‍म हो जाने को... बस यहीं से शुरू होती है किसी के भी राधा हो जाने की यात्रा ।
इसी 'राधा होते जाने की प्रक्रिया' को ओशो अपने प्रवचनों में कुछ यूं सुनाते हैं—‘‘पुराने शास्त्रों में राधा का कोई जिक्र नहीं । वहां गोपियाँ  हैं, सखियाँ  हैं, कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और रास की लीला होती है। राधा का नाम पुराने शास्त्रों में नहीं है। बस इतना सा जिक्र है, कि सारी सखियों में कोई एक थीं, जो छाया की तरह साथ रहती थीं। यह तो महज सात सौ वर्ष पहले 'राधा' नाम प्रकट हुआ । उस नाम के गीत गाए जाने लगे, राधा और कृष्ण को व्‍यक्‍ति के रूप में प्रस्‍थापित  किया गया । इस नाम की खोज में बहुत बड़ा गणित छिपा है । राधा शब्द बनता है धारा शब्द को उलटा कर देने से।
‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम धारा है। और धारा शब्द को उलटा देने से राधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता बनती है।’’
ओशो जिस यात्रा की बात करते हैं—वह अपने अंतर में लौट जाने की बात करते हैं। एक यात्रा धारामय होने की होती है, और एक यात्रा राधामय होने की....।
यूं तो विद्वानों ने राधा शब्‍द और राधा के अस्‍तित्‍व तथा राधा की ब्रज व कृष्‍ण के जीवन में उपस्‍थिति को लेकर अपने नज़रिये से आध्‍यत्‍मिक विश्‍लेषण तो किया ही है, मगर लोकजीवन में आध्‍यत्‍म को सहजता से पिरो पाना काफी मुश्‍किल होता है ।
दर्शन यूं भी भक्‍ति जैसी तरलता और सरलता नहीं पा सकता इसीलिए राधा भले ही ईश्‍वर की आध्‍यात्‍मिक चेतना में धारा की भांति बहती हों मगर आज भी उनके भौतिक- लौकिक स्‍वरूप पर कोई बहस नहीं की जा सकती।
ज्ञान हमेशा से ही भक्‍ति से ऊपर का पायदान रहा है, इसीलिए जो सबसे पहला पायदान है भक्‍ति का, वह आमजन के बेहद करीब रहता है और राधा को आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति से ज्‍यादा कृष्‍ण की प्रेयसी मान और उनकी अंतरसखी मान उन्‍हें किसी भी एक सखी में प्रस्‍थापित कर उन्‍हें अपना सा जानता है। ये भी तो ईश्‍वर की ओर जाने की धारा ही है, बस रास्‍ता थोड़ा लौकिक है, सरल है...।
ब्रज में समाई हुई राधा ... कृष्ण के नाम से पहले लगाया हुआ मात्र एक नामभर नहीं हैं और ना ही राधा मात्र एक प्रेम स्तम्भ हैं जिनकी कल्‍पना किसी कदम्ब के नीचे कृष्ण के संग की जाती है। भक्‍ति के रास्‍ते ही सही राधा फिर भी कृष्‍ण के ही साथ जुड़ा हुआ एक आध्यात्मिक पृष्ठ है, जहाँ द्वैत अद्वैत का मिलन है। राधा एक सम्पूर्ण काल का उद्गम है जो कृष्ण रुपी समुद्र से मिलती है ।
समाज में प्रेम को स्‍थापित करने के लिए इसे ईश्‍वर से जोड़कर देखा गया और समाज को वैमनस्‍यता से प्रेम की ओर ले जाने का सहज उपाय समझा  गया इसीलिए श्रीकृष्ण के जीवन में राधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं। हो सकता है कि राधा का कृष्‍ण से  ये  संबंध शास्‍त्रों में ना हो मगर लोकजीवन में प्रेम को पिरोने का सहज उपाय बन गया। और इस तरह जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी।

राधा की लौकिक कथायें बताती हैं कि प्रेम कभी भी शरीर की अवधारणा में नहीं सिमट सकता ... प्रेम वह अनुभूति है जिसमें साथ का एहसास निरंतर होता है। न उम्र... न जाति... न ऊंच नीच ... प्रेम हर बन्धनों से परे एक आत्मशक्ति है , जहाँ सबकुछ हो सकता है ।
यदि हम कृष्ण और राधा को हर जगह आत्मिक रूप से उपस्थित पाते हैं तो आत्मिक प्यार की ऊंचाई और गहराई को समझना होगा। कृष्‍ण इसीलिए हमारे इतने करीब हैं कि उन्‍हें सिर्फ ईश्वर ही नहीं बना दिया, उन्‍हें लड्डूगोपाल के रूप में लाड़ भी लड़ाया है तो वहीं राधा के संग झूला भी झुलाया है और रास भी रचाया है।

जब कृष्‍ण जननायक हैं तो भला राधा हममें से ही एक क्‍यों न मान ली जायें...जो सारे आध्‍यात्‍मिक तर्कों से परे हों, फिर चाहे वो आत्‍मा की गंगोत्री से  धारा बनकर  वापस कृष्‍ण में समाने को राधा बनें और अपनी यात्रा का पड़ाव पा लें या फिर बरसाने वाली राधाप्‍यारी...संदेश तो एक ही है ना दोनों का कि प्रेम में इतना रम जाया जाये कि ईश्‍वर तक पहुंचने को यात्रा  कोई भी हो उसकी हर धारा राधा बन जाये, एकात्‍म हो जाये...।
- अलकनंदा सिंह

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

गुरू पूर्णिमा : चेतना को परमात्‍मा तक पहुंचाने का पर्व


गुरु के महात्मय को समझने के लिए ही प्रतिवर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व  मनाया जाता है। गुरू पूर्णिमा कब से शुरू हुई यह कहना मुश्किल है, लेकिन गुरू पूजन की यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है क्‍योंकि उपनिषदों में भी ऐसा माना गया है कि आत्मस्वरुप का ज्ञान पाने के अपने कर्त्तव्य की याद दिलाने वाला, मन को दैवी गुणों से विभूषित करनेवाला, गुरु के प्रेम और उससे प्राप्‍त ज्ञान की गंगा में बार बार डुबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देनेवाला जो पर्व है – वही है ‘गुरु पूर्णिमा’ ।
इसी पूर्णिमा के दिन ही भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, १८ पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। इसीलिए ये लोक मान्‍यता बनी है कि इस दिन जो शिष्य ब्रह्मवेत्ता गुरु के चरणों में संयम-श्रद्धा-भक्ति से उनका पूजन करता है उसे वर्षभर के पर्व मनाने का फल मिलता है।
ईश्‍वर के लिए गुरू का मार्गदर्शन अत्‍यंत आवश्‍यक माना गया है। गीता में भी श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन  से कहा -
मय्ये व मन आघत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि भय्येव, अत ऊर्ध्व न संशयः ॥8/12
अर्थात् “हे अर्जुन ! तू मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ संशय नहीं है।”
किसी को गुरु से कितना मिला, किसी को अधिक किसी को कम क्यों मिला, इसके मूल में यही कारण है कि जिसने गुरु के बताये आदर्शों में मन व बुद्धि को लगा दिया, संशय मन से निकाल दिया, श्रेष्ठता के प्रति समर्पण कर दिया, उसका सारा जीवन ही बदल गया।
गुरू और शिष्‍य के सुप्रामेंटल रिलेशन्‍स के बारे में दार्शनिक श्री अरविन्द कहते थे “डू नथिंग ट्राइ टू थिंक नथिंग विह्च इज अनवर्थी टू डिवाइन” अर्थात् जो देवत्वधारी सत्ता के योग्य न हो, ऐसा कोई भी कार्य न करो, यहां तक कि ऐसा करने की सोचो भी मत ।
श्री रामकृष्ण परमहंस ने तो और एक कदम आगे बढ़कर यही कहा कि कामिनी काँचन से दूर परमात्म सत्ता में मन-बुद्धि को लगाने पर स्वयं ईश्वर गुरु के रूप में आकर मार्गदर्शन करते हैं। देखा जाये आदर्श शिष्‍य के लिए समर्पण एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति का रूपांतरण कर देती है और जब श्रेष्ठ गुरु के प्रति यही समर्पण होता है तो व्यक्ति तत्सम हो जाता है। उपनिषदों में कहा गया है कि व्‍यक्‍ति को तप करने से सिद्धि तो मिल सकती है, किन्तु भगवान नहीं मिल सकता जबकि समर्पण से गुरु व भगवान दोनों एक साथ मिल जाते हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे-”सामान्य गुरु कान फूँकते हैं, अवतारी महापुरुष-सदगुरु प्राण फूँकते हैं।” ऐसे सदगुरु का स्पर्श व कृपा दृष्टि ही पर्याप्त है । परमहंस जी  एक ऐसी ही सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए। अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पास बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का उन्हें अवसर मिला।
गुरू-शिष्‍य के बीच संबंध और गुरू की महत्‍ता को रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसी दास जी ने भी कुछ यूं कहा है-
गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं , सपनेहुँ सुख सुलभ न तेहिं ।
उदाहरण बताते हैं कि इस एक आध्‍यात्‍मिक संबंध की वास्तविकता,  कि समर्पण भाव से गुरु के निर्देशों का परिपालन करने वालों को जी भर कर गुरु के अनुदान भी मिले हैं।
श्रद्धा की परिपक्वता, समर्पण की पूर्णता, शिष्य में अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देती है। उसके सामने देहधारी गुरु की अंत:चेतना की जितनी भी रहस्यमयी परतें होती हैं सब की सब एक एक करके खुलने लगती हैं। शिष्‍य के सामने इनका ठीक-ठीक खुलना शास्त्रीय भाषा में गुरु के परमतत्‍व का प्राकट्य ही तो होता है। गुरु का यह रूप जान लेने पर मौन व्याख्या शुरू हो जाती है। बिल्‍कुल ऐसे जैसे कि हृदय में निःशब्द शक्ति का जन्‍म हो रहा हो । जन्म लेने से पूर्व ही प्रश्‍नों का उत्‍तर मिलने लग जाता है ।
स्वामी विवेकानन्द की दो शिष्याएँ थीं एक नोबुल (निवेदिता), दूसरी क्रिस्टीन (कृष्ण प्रिया)। स्वामी जी से निवेदिता तो तरह तरह के सवाल पूछतीं परन्तु कृष्ण प्रिया चुप रहतीं। स्वामी जी ने उनसे पूछा-”तेरे मन में जिज्ञासाएँ नहीं उठतीं?” उसने कहा-”उठती हैं पर आपके जाज्वल्य समान रूप के समक्ष वे विगलित हो जाती हैं, मेरी जिज्ञासाओं का मुझे अंतःकरण में समाधान मिल जाता है।” लगभग यही स्थिति हम सबकी हो, यदि हम अपनी गुरुसत्ता के शाश्वत रूप व गुरुसत्ता के संस्कृति सत्य को ध्यान में रखें कि “जब तक एक भी शिष्य पूर्णता प्राप्ति से वंचित है, गुरु की चेतना का विसर्जन परमात्मा में नहीं हो सकता।” सूक्ष्म शरीरधारी वह सत्ता अपने शिष्यों, आदर्शोन्मुख संस्कृति साधकों की मुक्ति हेतु सतत् प्रयत्नशील है व रहेगी जब तक कि अंतिम व्यक्ति भी इस पृथ्‍वी पर मुक्त नहीं हो जाता ।
गुरू और शिष्‍य के बीच संबंधों की पवित्रता को लेकर आज की स्थिति बड़ी विषम हो चुकी है। विगत वर्षों में कई गुरुओं के कारनामों ने इस संबंध को तार तार करके रख दिया है।ऐसा लगता है कि चारों ओर नकली ही नकली गुरु भरे हैं। ये बिल्‍कुल ऐसे ही हैं जैसे कि पानी में रहने वाला सांप, जिसके  मुंह का आकार छोटा मगर चेष्‍टायें बड़ी होती हैं । इन्‍हीं 'चेष्‍टाओं' के कारण वह मेंढक को निगलने की कोशिश में मुँह में तो उसे जकड़ लेता है पर दोनों के लिए मुश्‍किल हो जाती है । पनेले सांप के गले से मेंढक बाहर निकलने को ताकत लगाता है , और वह मेंढक को गले में उतारने के लिए । आज गुरु व शिष्य दोनों की स्थिति ऐसी है। फिर भी सत्‍य और संकल्‍प के साथ सदगुरू की खोज और उसका सानिध्‍य पाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता और इस गुरू पूर्णिमा पर  हमारा ध्‍येय यही होना चाहिए ।
- अलकनंदा सिंह