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गुरुवार, 8 जून 2017

बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्टी नहीं खाते

मुनव्‍वर राणा साहब लिखते हैं कि -

सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछाकर,
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते...


ये अशआर पढ़ते हुए हम भूल जाते हैं कि अब हमें उल्‍टे कदमों पर चलना सिखाया जा रहा है  और ये प्रयास पूरी सफलता के साथ आगे बढ़ रहा है। जी हां, तनाव का एक भरापूरा बाजार  क्रिएट किया जा चुका है, आवश्‍यकताओं की मार्केटिंग में रिसर्च, प्रोडक्‍ट और कंज्‍यूमर तक पहुंचने  की ट्रिक्‍स बताई जाने लगी हैं। हर हाल में इस बात से बचा जा रहा है कि हम अपनी जड़ों की  ओर ना देख सकें क्‍योंकि क्रिएटेड माहौल के साथ हमें अपनी जड़ों से जितना विमुख किया जा  सकेगा, उतना ही मार्केट के ज़रिए हम कैप्‍चर हो सकेंगे यानि उसके Addicted Consumer बन  सकेंगे।

मार्केटिंग के इसी घमासान के बीच 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है, देश से लेकर  विदेश तक योग की माया और महिमा फैल रही है।

कितना अजीब लगता है कि अब सरकारों को हमें योग सिखाना पड़ रहा है, योग जो घर-घर में  सूर्य प्रणाम और सूर्य को अर्घ्‍य से सूर्यासन तक अपना विस्‍तार पाता था, आज उसी योग के  माध्‍यम से शरीर को स्‍वस्‍थ रखने की अपील सरकारों को करनी पड़ रही है। इस 21 जून के आते  आते तो योग पर रोजाना लेक्‍चर भी होंगे और संकल्‍प भी लिए जाऐंगे मगर 21 जून के बाद  अगले वर्ष की 21 जून तक जिंदगी फिर उसी ढर्रे पर आ जाएगी ज़िंदगी... जड़ों से कटने का  इससे बड़ा और वीभत्‍स उदाहरण दूसरा कोई हो सकता है क्‍या।
यह हमें पुरातन कथाओं में सुनाया जाता रहा है कि जो पौधे हमेशा आसमान की ओर ऊर्ध्‍वगति  से बढ़ते दिखाई देते हैं उनकी जड़ें उन्‍हें उतना ही अधिक मजबूती के साथ पृथ्‍वी से जोड़े रखती हैं  इसीलिए वे अपना वर्तमान और भविष्‍य दोनों ही पृथ्‍वी और आकाश से पोषित करते हैं। तभी  पौधों को वृक्ष बनने के लिए किसी मार्केटिंग की जरूरत नहीं पड़ती।

आज दो शोध रिपोर्ट पढ़ीं, एक में कहा गया है कि ''Dirt is Good'' और दूसरी में बताया गया कि  ''Sleep Therapy'' से वजन कम होता है। दोनों ही रिपोर्ट हमें उन जड़ों की याद दिलाती हैं  जिसमें धूल में खेलना बच्‍चों का शगल माना जाता था और बच्‍चे धूल में खेल कर ही बड़े हो जाते  थे बिना किसी क्रोनिक डिसीज के। विडंबना देखिए कि अब लाखों रुपए शोध पर खर्च कर यह  बताया जा रहा है कि बच्‍चे यदि धूल में खेलेंगे तो उन्‍हें एलर्जी, अस्‍थमा, एक्‍जिमा और डायबिटीज  जैसे रोग नहीं होंगे।

दूसरी शोध रिपोर्ट कहती है कि अच्‍छी नींद से वजन कम होता है, ये बिल्‍कुल नाक को घुमाकर  पकड़ने वाली बात है। अच्‍छी नींद के लिए बहुत आवयश्‍क है शारीरिक मेहनत करना और जब  व्‍यक्‍ति शारीरिक तौर पर मेहनत करेगा तो पूरे शरीर की मांसपेशियां थकेंगीं, निश्‍चित ही  मानसिक तौर पर भी थकान होगी और नींद अच्‍छी आएगी। नींद अच्‍छी आएगी तो मोटापा हावी  नहीं होगा। हास्‍यास्‍पद लगता है कि जब ऐसी रिपोर्ट्स को ''शोधार्थियों की अनुपम खोज'' कहा  जाता है।

इन दोनों ही शोधकार्यों पर मुनव्‍वर राणा के ये अशआर बिल्‍कुल फिट बैठते हैं कि-

''हंसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते,
बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्ठी नहीं खाते।


सो जाते हैं फुटपाथ पे अखबार बिछाकर,
मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।।''


बहरहाल, अपनी जड़ों से दूर भागते हम लोग इन शोधकार्यों के बूते अपना जीवन जीने पर  इसलिए विवश हुए हैं कि हमने योग और पारंपरिक जीवनशैली से पूरी तरह दूरी बना ली है। अब  उस तक वापस लौटने के लिए बाजार का सहारा लेना पड़ रहा है, नींद की गोलियां और फैटबर्निंग  टैबलेट्स लेनी पड़ रही हैं। बच्‍चों को अस्‍थमा-डायबिटीज जैसी बीमारियां हमारी ही देन है।
 

इससे भी ज्‍यादा शर्मनाक बात ये है कि योग करने और स्‍वस्‍थ रहने लिए सरकारों को आगे आना  पड़ रहा है। अभी सिर्फ देरी हुई है, दूरी नहीं बनी...इसलिए अब भी समय है कि हम अपनी जड़ों  की ओर... अपनी पारंपरिक जीवन शैली की ओर लौट लें, आधुनिकता से जिऐं मगर इसके दास  ना बनें तभी तो योग शरीर के साथ मन को भी स्‍वस्‍थ रख पाएगा, वरना बाजार तो हमें कैप्‍चर  करने को करोड़ों के वारे-न्‍यारे कर ही रहा है ताकि हम उसके सुरसा जैसे मुंह में समा जाएं।
 

-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

निराला के राम और साहित्यकारों का फुल वॉशआउट

साहित्यि‍क निरपेक्षता के लिए जब मौजूदा समय को संक्रमण काल कहा जा रहा है, तब आज ठीक नवमी के दिन निराला जी द्वारा रचित   ‘राम की शक्ति पूजा’ के निहितार्थ समझ में आ रहे हैं। कल विजय दशमी है और कल ही साहित्य अकादमी की वो महत्वपूर्ण बैठक है जिसके बहाने तमाम साहित्यकार अपने भविष्य का रास्ता तय करेंगे। कल की बैठक का जो भी लब्बोलुआब निकले,  लेकिन आज मेरा ये लिखना सर्वथा आवश्यक है कि तब आखिर ऐसा क्या था कि हमारे रचनाकार व साहित्यकार जन- जन के दिलों तक समाए और राम की शक्ति पूजा (निराला) या कामायनी ( जयशंकर प्रसाद ) जैसी निरापद रचनायें दे सके। वे किसी भी शूरवीर नायक से कमतर नहीं थे, तो आज ऐसा क्या हो गया है कि पूरी की पूरी रचनात्मकता ही कठघरे में आ खड़ी हुई।
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ रचना में यह भलीभंति उद्धृत किया है कि रावण को मारने से पूर्व जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने आठ दिनों तक 108 नीलकमलों से यज्ञ करते हुए देवी महाशक्ति का आह्वान किया, तब नवें दिन 108 नीलकमलों में दो नीलकमल कम रह गए, देवी परीक्षा ले रही थीं क्योंकि राम तो दो नीलकमल लाने के लिए यज्ञ से उठ नहीं सकते थे, अचानक उन्हें याद आया कि बचपन में मां उन्हें राजीव-नयन कह कर बुलाती थीं…यानि जिनके नेत्र नीलकमल के समान हों, बस यह सोचते ही उन्होंने तूणीर साधा और अपने नेत्र निकालने को आतुर हो उठे… सत्य और निष्ठा के इस मार्ग पर उनके इस निर्भीक कदम का स्वयं देवी शक्ति ने स्वागत किया और सुविजय का आशीर्वाद दिया ।
निराला जी ने इस वृत्तांत को पढ़ते हुए आज भी वह पूरा का पूरा दृश्य आंखों के सामने आ जाता है और साथ ही आ जाता है वो साहस जो मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा को युगों युगों तक के लिए प्रतिष्ठापित कर गया ।
कल साहित्य अकादमी की बैठक से पहले आज विक्रम सेठ और अनीता देसाई का भी अकादमी पुरस्कार लौटाने वाला धमकी भरा बयान छप गया कि वे भी ‘आहत’ हैं देश में फैल रही असहिष्णुता से। यह साहित्य अकादमी पर बेजां दबाव बनाने का एनआरआई प्रयास है।
दबाव तो वह भी बेजां ही रहा होगा कि जब मशहूर शायर मुनव्वर राणा साहब ने 7 अक्तूबर को ही कहा कि अगर आप सम्मान लौटा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप थक चुके हैं, अपनी कलम पर आपको भरोसा नहीं है. लाख-डेढ़ लाख रुपये का सम्मान लौटाना बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात यह है कि आप अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को सुधारें.’ और अगले 10 – 12 दिनों में ही उनकी निष्ठा इस तरह बदलीं कि 18 अक्तूबर को स्वयं उन्होंने भी अपना अवार्ड लौटा दिया। वह अपने ही हौसलों वाले बयानों से मुकर गए, ठीक ऐसे ही जैसे कि अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल की कथ‍ित सहिष्णुता और निरपेक्षता दिखी।
कमाल की बात है ना कि साहित्यकार आदमी हैं या सिक्का, जिन्हें पलटने के लिए धार्मिक सहिष्णुता और अभ‍िव्यक्ति की आजादी जैसे  शब्दों का सहारा लिया और सत्ताओं के खांचों ने आज के रचनाकारों की असल तस्वीर हम सबको दिखाई। यह कैसे संभव है कि एक ही जैसी घटनाएं किसी खास सत्ता काल में अभ‍िव्यक्ति की आजादी का सवाल बन जाएं तो वैसी ही घटना किसी दूसरे सत्ताकाल में वक्ती जज़्बात का प्रदर्शन भर मानीं जाएं।
अब तो साहित्य अकादमी के हित और समाज के हित की बात करने वाले साहित्यकारों के कथन पर विश्वास करना भी मुश्किल हो रहा है कि कौन …क्यों…किसलिये…और कब कह रहा है। किसके कथन को सच मानें और किसे ड्रामेबाज कहें। जो कुछ भी रचनात्मक दिख रहा है वह कथ‍ित ”असहिष्णुता” के नाम पर लामबंदी के नाम स्वाहा हुआ जा रहा है।
आज गोपालदास नीरज जी ने कहा है कि साहित्यकार वर्तमान केंद्र सरकार को लांक्ष‍ित करके अपनी ‘अवार्ड लौटाऊ’ धमकियों से यह ज़ाहिर करवा रहे हैं कि वे पिछली सरकारों के किस तरह अंधभक्त रहे हैं। एक स्वायत्त संस्था साहित्य अकादमी को एक सरकारी संस्था की तरह ट्रीट करने वाले बुद्धिजनों के अपनी इस बकझक में ये भी याद नहीं रहा कि अतिरंजना में वे साहित्य अकादमी को ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।
आज तो मुझे यह लिखने में भी डर लग रहा है कि मुनव्वर राणा साहब की तरह नीरज जी भी तो कहीं अपने पुरस्कार वापस करने नहीं जा रहे ???? किसकी बात पर भरोसा किया जाए।
कल दशहरा भी है, अपने सारे कुविचारों को फुल वॉशआउट करने का समय, जो हो रहा है अच्छा ही है, साहित्यिक जगत के लिए भी एक खास किस्म के नाजीवाद से मुक्ति का समय है ये। हमाम सबका सच सामने ला रहा है। एक और बात पक्की है कि आने वाली पीढ़ी आज के इन साहित्यकारों को रचनात्मकता के लिए नहीं बल्कि एक खास कॉकसगीरी के लिए याद करेगी। जहां साहित्यकार शब्दों की नहीं व्यक्ति की शक्ति पूजा कर रहे हैं। जहां देश पीछे रह गया है और उसे खांचों में बांटने वाले स्वयं को राम निरूपित करने में लगे हैं।
बहरहाल, पुरस्कार लौटाऊ साहित्यकारों का आंकड़ा जब ‘चालीसवें’ में चल रहा है तब समझ में आ रहा है कि निराला जी के ‘राम’ और उनकी ‘शक्ति पूजा’ की आज भी इतनी निरपेक्ष स्वीकार्यता कैसे संभव है। निश्चित ही वे महाप्राण निराला जी थे जो स्वार्थों से घि‍रे दशकंधरों (साहित्यकारों) के अहंकार का नाश करने की उक्ति, अपनी रचना के माध्यम से पहले ही बता गये।

अंत में उन्हीं की कृति ‘राम की शक्ति पूजा’ के 5वें भाग से ये पंक्तियां ….पढ़ें…..

“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीव नयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”
कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।
“होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

– अलकनंदा सिंह

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

निदा फ़ाजली और मुनव्‍वर राणा आखिर हैं क्‍या ?

उस दिन मैं मशहूर शायर निदा फ़ाजली साहब के बारे में पढ़ रहा था। 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ तो निदा फ़ाजली के अब्‍बा भी पाकिस्‍तान चले गए किंतु निदा फ़ाजली नहीं गए।
निदा फ़ाजली साहब का मानना था कि जो भी दंगे हो रहे हैं, उनका कारण हिंदू या मुसलमान नहीं हैं। उनका कारण इंसान हैं, चाहे उनका वास्‍ता किसी मजहब से हो। वो हिंदू हों या मुसलमान, सिख हों या ईसाई।
निदा फ़ाजली के अनुसार इंसान जहां भी होगा, वहां वह ऐसे हालात पैदा कर लेगा क्‍योंकि वह उसकी फितरत में शामिल है।
1947 में हुए बंटवारे के वक्‍त निदा फ़ाजली कितने जवान रहे होंगे, इसका अंदाज तो लगाया जा सकता है किंतु यह अंदाज लगाना मुश्‍किल है कि उस समय उनकी जो सोच थी, वह इतनी परिपक्‍व कैसे थी कि आज भी न केवल हिंदुस्‍तान के संदर्भ में बल्‍कि विश्‍वभर के संदर्भ में पूरी तरह सच्‍ची साबित हो रही है।
जरा विचार कीजिए कि यदि समस्‍या सिर्फ हिंदू या मुसलमान की होती तो दुनिया के उन तमाम मुल्‍कों में एक ही मजहब के लोग परस्‍पर एक दूसरे की जान के दुश्‍मन क्‍यों बने हुए हैं।
पाकिस्‍तान जैसे लगभग शत-प्रतिशत मुस्‍लिम आबादी वाले देश में आतंकवादी अपने ही निर्दोष भाई-बंधुओं का कत्‍ल क्‍यों कर रहे हैं। यहां तक कि उन मासूम बच्‍चों को भी निशाना बनाने से परहेज नहीं करते, जिन्‍हें ठीक से न मजहब का पता होता है और न वो उनके मकसद से वाकिफ होते हैं।
पाकिस्‍तान के अलावा सीरिया, ईरान, इराक और अफगानिस्‍तान से लेकर दुनिया के तमाम मुस्‍लिम मुल्‍कों में कौम के रक्‍त पिपाशु सक्रिय हैं जिससे साबित होता है कि निदा फ़ाजली साहब सौ फीसद सही थे।
अब बात करें हिंदुस्‍तान की तो यहां भी सवाल हिंदू, मुस्‍लिम या सिख का नहीं है। सवाल उन लोगों का है जिनकी समूची राजनीति ही वैमनस्‍यता पर टिकी है।
चूंकि मुंसिफ भी वही हैं और मुज़रिम भी वही इसलिए उनकी पूरी भूमिका कभी सामने नहीं आ पाती। जितनी और जो आ भी पाती है, वह भी राजनीति की चौसर का हिस्‍सा होती है लिहाजा सबूत व गवाहों के अभाव में दम तोड़ देती है। वो देर-सवेर बेदाग साबित होते हैं।
राजनीति में सक्रिय ऐसे रक्‍त पिपाशु न तो किसी एक मजहब में हैं और न किसी एक दल में। यह हर दल में और हर मजहब में घुसे हुए हैं।
जहां तक इनकी सामर्थ्‍य का प्रश्‍न है तो वह इतने शक्‍तिशाली हैं कि उनके अपने दल और उनके अपने नेता भी उन पर लगाम लगाने में असमर्थ हैं क्‍योंकि वहां वोटों की राजनीति तथा सत्‍ता पर कायम रहने अथवा सत्‍ता कब्‍जाने की चाहत आड़े आ जाती है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस दौर की राजनीति संभवत: राजनीति के उस मुकाम तक जा पहुंची है जहां से नीचे गिरने लायक कुछ बचा ही नहीं है। ऐसे में किसी कौम का कोई एक व्‍यक्‍ति मरे या सैकड़ों-हजारों मारे जाएं, राजनेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता।
कहीं उस गौवंश के नाम पर हिंसा की जाती है जो खुद अपने जीवन-यापन के लिए गली-गली और सड़क-सड़क आवारा घूम रहा है। कूड़े के ढेरों पर से गंदगी खाकर अपने उदर की पूर्ति कर रहा है…और कहीं मंदिर, मस्‍जिद, गुरुद्वारों तथा धार्मिक ग्रंथों की आड़ में हिंसा के बीज बोए जा रहे हैं जहां से निकलने वाली हर आवाज़ तथा जिनमें दर्ज़ एक-एक शब्‍द मानवता का संदेश देता है…शांति का उद्घघोष करता है।
घोर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि समाज का वो बुद्धिजीवी तबका भी राजनेताओं की चाल में फंस रहा है जिससे उम्‍मीद की जाती है कि वह विषम परिस्‍थितियों या संक्रमण काल में समाज को दिशा दिखाने के लिए आगे आयेंगे।
चिंता इस बात की नहीं कि बुद्धिजीवी कहलाने वाले ये लोग देश के हालातों पर अपना रोष किस तरह प्रकट कर रहे हैं, चिंता इस बात की है कि उन्‍होंने अपना बुद्धि-विवेक ताक पर रख दिया है।
बुद्धिजीवियों की इस जमात से कोई यह पूछने वाला नहीं कि यदि उन्‍हें देश पर इतना बड़ा खतरा मंडराता नजर आ रहा है और सत्‍ता के शिखर पर बैठे व्‍यक्‍ति विशेष अथवा दल विशेष से इतनी ही निराशा है तो वह खुद समाज व देश को बचाने के लिए कौन से प्रयास कर रहे हैं।
क्‍या समाज व देश के प्रति उनकी जिम्‍मेदारी सिर्फ चंद रचनाएं लिख देने और उनकी एवज में पहले तो हर हथकंडा अपनाकर पुरस्‍कार हासिल करने तथा फिर उसी पुरस्‍कार को लौटा देने तक सीमित है। क्‍या इसके अलावा उनकी समाज के प्रति कोई जिम्‍मेदारी नहीं बनती।
आज अपने पुरस्‍कार लौटाने वाले बुद्धिजीवियों व रचनाधर्मियों में से तमाम तो ऐसे हैं जिन्‍हें पुरस्‍कार लौटाने की घोषणा करने से पहले तक नई पीढ़ी जानती भी नहीं थी। आमजन को भी यह पता नहीं था कि उन्‍हें किस कार्य के लिए और कब पुरस्‍कृत किया गया जबकि मुंशी प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, हजारी प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम या शिवानी से आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग वाकिफ़ है।
आज ही के दौर में अपनी रचनाओं के साथ-साथ अपनी शख्‍सि़यत के बल पर अलग पहचान रखने वाले दिग्‍गज शायर मुनव्‍वर राणा ने सही कहा है कि जो लोग पुरस्‍कार लौटा रहे हैं वह थके हुए लोग हैं और उन्‍हें अपनी योग्‍यता पर भरोसा नहीं रहा।
स्‍वतंत्रता के आंदोलन की ओर मुड़कर देखिए तो आपको मुनव्‍वर राणा की कही हुई बातों का अर्थ शायद समझ में आ जाए, जब अनेक रचनाधर्मियों, बुद्धिजीवियों तथा पत्रकारों ने कलम के साथ-साथ समाज के बीच सक्रिय होकर भी स्‍वतंत्रता सेनानियों का साथ निभाया था और उसकी खातिर जेलयात्रा भी की थी।
निदा फ़ाजली और मुनव्‍वर राणा जैसी शख्‍सियतों का मक़सद यदि तथाकथित बुद्धिजीवियों की समझ में आ जाए तो नि:संदेह कभी कोई राजनेता अपने नापाक इरादों में कामयाब नहीं हो सकता।
नाराजगी ज़ाहिर करना और समाज के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराना हर इंसान का अधिकार भी है और कर्तव्‍य भी लेकिन यदि उस नाराजगी के पीछे कोई निजी स्‍वार्थ अथवा छद्म मकसद छिपा हो तो वह बेमानी हो जाती है। फिर राजनीति और नेकनीयती में फर्क कहां रह जाता है। यूं तो अक्‍सर राजनेता ही एक-दूसरे पर राजनीति करने का आरोप लगाते रहते हैं लेकिन वो तो राजनेता हैं, उनके आरोप-प्रत्‍यारोप भी राजनीति से परे नहीं हैं किंतु उनका क्‍या, जो कहलाते बुद्धिजीवी हैं लेकिन फिर भी राजनीति के शिकार हो रहे हैं।
इस सब को देखकर तो निदा फ़ाजली साहब का दर्शन शत-प्रतिशत सही साबित होता है कि समस्‍या जाति-धर्म या खान-पान नहीं है, समस्‍या इंसान खुद है। वो इंसान जिसे कदम-कदम पर इंसानियत सिखानी पड़ती है। यही एकमात्र ऐसी इकाई है, जो खुद को सृष्‍टि की सर्वश्रेष्‍ठ रचना बताती है लेकिन इंसानियत के मौलिक धर्म से सर्वथा अनभिज्ञ है और जिसे मानव होते हुए मानवता का पाठ एक-दो मर्तबा नहीं, बार-बार पढ़ाना पड़ता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

मुनव्वर राना ने कहा, थके हुए लोग लौटा रहे हैं पुरस्‍कार और सम्‍मान

लखनऊ। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने कहा है कि साहित्‍यकारों के विरोध का यह तरीका बताता कि वे थक चुके हैं और उन्हें अपनी कलम पर भरोसा नहीं है. मुनव्‍वर राना ने कहा कि विरोध का यह तरीका गलत है।गौरतलब है कि केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए देशभर में बड़ी संख्या में साहित्यकार साहित्य अकादमी पुरस्कार और नागरिक सम्मान लौटा रहे हैं, लेकिन मुनव्वर राना ने विरोध के इस तरीके पर सवाल उठाया है.
राना ने कहा, ‘लेखक का काम समाज को सुधारना है. हमें समाज की चिंता करनी चाहिए.’
अपनी पुस्तक ‘शाहदाबा’ के लिए 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू भाषा) से सम्मानित मुनव्वर राना ने कहा कि अगर आप सम्मान लौटा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप थक चुके हैं. उन्होंने कहा, ‘अपनी कलम पर आपको भरोसा नहीं है. लाख-डेढ़ लाख रुपये का सम्मान लौटाना बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात यह है कि आप अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को सुधारें.’
राना ने कहा कि जिन घटनाओं के विरोध में सम्मान लौटाए जा रहे हैं, वे समाज के अलग-अलग समूहों ने की हैं. उन्होंने कहा कि हमारा विरोध समाज के उन लोगों से है, न कि हुकूमत से.
राना ने कहा कि सम्मान लौटाने को विचारधारा से जोड़ना गलत है. विचारधारा कोई भी हो, साहित्यकार जिन मूल्यों के लिए काम करते हैं, वे भिन्न नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी स्वायत्तशासी संगठन है. यह पूरी तरह सरकारी संस्था नहीं है. अगर सरकार ऐसी संस्था में दखल देती है तो यह गलत है.
उन्होंने कहा, ‘मैंने ऐसे ही दखल के खिलाफ उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी से इस्तीफा दिया था.’

सोमवार, 26 मई 2014

शायर मुनव्वर राना ने दिया पद से इस्तीफा

लखनऊ। 
मशहूर शायर मुनव्वर राना ने आज उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने संस्थान के चेयरमैन पर गम्भीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा है. राना ने बताया, ‘मैंने मुख्यमंत्री को इस्तीफा दे दिया है. यह ओहदा सम्भालते वक्त हमने कहा था कि अगर हम उर्दू की खिदमत नहीं कर सके तो कुर्सी छोड़ देंगे. हमें हमारे ही साथियों ने काम नहीं करने दिया. हम जो बनाना चाहते थे उसे बिगाड़ दिया जाता था. हमें अकादमी के फैसलों में शरीक करना तो दूर, हमें जानकारी तक नहीं दी जाती थी. ऐसे में मेरे पास इस्तीफे के अलावा कोई चारा नहीं था.’
इस साल फरवरी में उर्दू अकादमी के अध्यक्ष का पद सम्भालने वाले राना ने अकादमी के चेयरमैन नवाज देवबंदी पर आरोप लगाया कि देवबंदी को अकादमी के कामों के लिये फुरसत ही नहीं है.
राना ने कहा कि उनके कहने के बावजूद साहित्यकारों के बीमे की योजना और जिलों में उर्दू कोचिंग केन्द्रों की स्थापना पर कोई काम नहीं हुआ. इसके अलावा अकादमी द्वारा अदीबों को दिये जाने वाले इनाम भी चार साल से नहीं बंटे. बंटना तो दूर, उसकी कोई तैयारी ही नहीं है.
इस सिलसिले में जब देवबंदी से संपर्क करने की कोशिश की गयी तो उनसे संपर्क नहीं हो सका.
-एजेंसी