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मंगलवार, 17 मई 2016

For GOD sake… इन्हें भगवान मानना बंद करो

उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में इस बार धर्म की जिस गंगा को हम प्रत्यक्ष बहते देख रहे हैं, धर्म के उस सनातन स्वरूप को  लेकर लगभग हर धार्मिक चैनल 24 घंटे एक से बढ़ कर एक आख्यान-व्याख्यान पेश कर रहा है। दूसरी ओर बड़े-बड़े मठाधीश और महामंडलेश्वर व शंकराचार्य अपनी बेढंगी वेशभूषा और स्टाइल को लेकर चर्चा का विषय बने हुए हैं।
सिंहस्थ कुंभ में ऐसी ही एक चर्चा के केंद्रबिन्दु बने हुए हैं जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामंडलेश्वरों में से एक पायलट बाबा जिनके 17 शिष्य भी महामंडलेश्वर हैं और धर्म-आध्यात्म के क्षेत्र में कई जनकल्याणकारी काम कर रहे हैं।  दरअसल, पायलट बाबा अपनी विदेशी श‍िष्याओं को लेकर चर्चा में हैं।
सिंहस्थ में यूं तो पायलट बाबा और उनकी विदेशी शिष्याओं ने काफी पहले से डेरा जमा लिया था लेकिन इस बीच अचानक उनकी जापानी शिष्या और महामंडलेश्वर केको आइकावा ने सिंहस्थ छोड़ दिया और जापान चली गईं। महामंडलेश्वर केको आइकावा इंटरनेशनल एजुकेशन संस्था की वाइस प्रेसीडेंट हैं। उनकी संस्था पर कम्प्यूटर एजुकेशन के नाम से देशभर में 500 करोड़ रुपए की ठगी करने का आरोप है। संस्था ने सिर्फ एक रुपए में कम्प्यूटर की शिक्षा देने के नाम पर देशभर में विभिन्न संस्थाओं को 50-50 हजार रुपए लेकर फ्रेंचाइजी दी थी।
केको आइकावा की इस संस्था ने कम्प्यूटर शिक्षा का सारा खर्चा वहन करने का दावा किया था लेकिन फ्रेंचाइजी के नाम पर पैसे लेने के बाद कोई शिक्षा नहीं दी गई। देशभर में पीड़ित लोगों ने इस इंटरनेशनल एजुकेशन संस्था के खिलाफ डेढ़ दर्जन से ज्यादा केस दर्ज कराए थे। कहा जा रहा है यह मामला फिर से उछलने के बाद कथित तौर पर केको आइकावा ने सिंहस्थ शिविर छोड़ दिया। अब सवाल यह है क‍ि यद‍ि आरोप बेबुनयिाद हैं तो आख‍िर पायलट बाबा की यह जापानी शिष्या इस तरह अचानक गायब क्यों हो गई।
पायलट बाबा की यह शिष्या महामंडलेश्वर केको आइकावा पिछले सिंहस्थ ( 2004) में के दौरान भी चर्चाओं में थीं क्योंकि तब उन्होंने बाबा के शिविर में ही समाधी लगाई थी। जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामंडलेश्वर पायलट बाबा ने ही आइकावा को महामंडलेश्वर की उपाधि दिलवाई थी। यह बात अलग है कि इस बार आइकावा गलत वजहों से सुर्खियों में हैं।
पायलट बाबा ने अपनी सफाई में इन सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि आइकावा माता की तबियत ठीक नहीं होने की वजह से वह दिल्ली गई हैं। पायलट बाबा ने कुछ लोगों पर संस्था को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए कहा कि संस्था अपना काम कर रही है।
इन आरोपों-प्रत्यारोपों से एक बात तो निश्चित है कि कहीं कोई चिंगारी तो है, जिससे धुंआ उठ रहा है। हममें से अध‍िकांश लोग जानते हैं कि धर्म की आड़ आजकल ''धंधे'' के लिए बड़ी मुफीद बनी हुई है, ऐसे में आइकावा माता हों या स्वयं पायलट बाबा, किसी को भी पूरी तरह दूध का धुला नहीं माना जा सकता। इसके अलावा भी अनेक प्रश्न सिंहस्थ में तैर रहे हैं। 
ऐसे में उन सब तथाकथति भक्तों को भी सोचना होगा जो बड़े पदवीधारी इन बाबाओं के यहां बिना यह सोचे-समझे दंडवत करते हैं, शीश नवाते हैं क‍ि वह इस काबिल हैं भी या नहीं। एक लोकोक्ति है- पानी पीजे छान के, गुरू कीजै जान के। आजकल तो जानना और भी जरूरी हो गया है।
पायलट बाबा और आइकावा तो बस एक उदाहरणभर हैं, वरना सोचिए क‍ि जिस देश में बुंदेलखंड, लातूर और तेलंगाना की भूमि प्यासी हो, उस देश में बेहद लग्जरी गाड़‍ियों और मिनरल वॉटर पीने वाले बाबाओं को तो साक्षात् ईश्वर वैसे ही मिला हुआ है, वे ही सही मायनों में उपदेश दे सकते हैं कि जो मिल रहा है उसी में खुश रहो क्योंक‍ि उन्हें तो सबकुछ  ''मिल'' रहा है। उन्हें दो जून के दो ग्रास के लिए हाड़ मांस नहीं गलाना पड़ रहा। धर्म की ये व्याख्या आम लोगों को इसीलिए लुभाती है कि वो उसकी तह में जाने के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं निकाल पाते और जो धर्म पर चलने की बात कहता है (आचरण नहीं करता), वो उसे ही देवदूत की भांति पूजने लगते हैं तथा स्वयं अपने ही हाथों से किसी पायलट बाबा को या किसी आइकावा को गढ़ देते हैं।
यह बात हमें समझ लेनी चाहिए कि जो ईश्वर को खोजने स्वयं निकले हों या खोजने का नाटक कर रहे हों, वो भला किस तरह अपने अनुयायियों को ईश्वर के मार्ग पर चलने को कहेंगे। उन्हें तो ट्रस्ट, ऑरगेनाइजेशन, इंटरनेशनल संस्थाएं, धर्मार्थ चलाए जा रहे आलीशान आश्रम और मिलेनियर श‍िष्य अपने ऐसेट्स के रूप में दिखते हैं।
सिर्फ चंद दिनों तक घर, परिवार, समाज तथा भौतिक सुखों के त्याग का नाटक करके बेहिसाब सुख-सुविधाएं जुटा लेने वाले ये तथाकथित साधु-संत यद‍ि वाकई ईश्वर के निकट होते तो उन्हें न श‍िष्य-शिष्याओं के किसी लाव-लश्कर की जरूरत होती और न उन सामाजिक भक्तों की ज‍ो अनैतिक तरीकों से पूंजी एकत्र करके ईश्वर की जगह इनके चरणों में शांत‍ि तलाशते हैं।
अनैति‍क तरीकों से संप्पति जुटा लेने वाले बाबाओं के ये भक्त इतना भी नहीं सोचते क‍ि जिनका अपना जीवन अशांति से भरा पड़ा है, वह क्या तो किसी को शांत‍ि का मार्ग बताएंगे और क्या धर्म का मार्ग दिखाएंगे।

- अलकनंदा सिंह
 

शुक्रवार, 13 मई 2016

आसमान में सुराख करते हौसलों का नाम है किन्नर अखाड़ा

ओशो ने कहा था कि प्रकृति और परिवर्तन दो ही शाश्वत हैं, और किन्हीं दो परिवर्तनों के बीच जो है वही समय है। समय का अर्थ ही होता है दो परिवर्तनों के बीच का फासला। उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ में इस बार समय के इसी फासले को तय किया जा रहा है। कुछ किया जा चुका है, कुछ करना बाकी है। परिवर्तन की बयार को धर्म के उच्चतम स्थान पर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है।

जो पहला और महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ क‍ि जिन्हें आज तक मां बाप अपनी औलाद मानने से भी कतराते थे और अनाथ छोड़ देते थे ताकि समाज में शर्मिंदगी ना उठानी पड़े, आज वही किन्नर सिंहस्थ में पेशवाई कर रहे हैं। अपना अखाड़ा बनाकर धर्म के इस महाकुंभ में अपनी सशक्त मौजूदगी दिखा रहे हैं।

बेशक इसमें विभिन्न स्तर पर लड़ी गई लंबी लड़ाई के बाद मिली जीत का बहुत बड़ा हाथ है,  मगर उन हौसलों को कोई कैसे भुला सकता है जो स्वयं पर हंसने वालों को बता सके कि यदि जीवन परमात्मा का दिया हुआ है तो शारीरिक विकृति या कमी भी उसी की देन है। फिर किस पर हंसना और क्यों हंसना। सिंहस्थ कुंभ में अखाड़े की पेशवाई से इस ‘तीसरी ताकत’ का नया आगाज करके किन्नरों ने हमें प्रकृति के नियम, ईश्वर व हमारे समाज की गहराई व परिवर्तनों को समेट लेने की ताकत भी दिखाई।
नए अस्तित्व की इस नई पेशवाई ने इस मामले में भी इतिहास रच दिया कि अब से पहले कभी यह नजारा नहीं दिखा और न दिख सकता था, कम से कम कुंभ जैसे महाधार्मिक आयोजन में तो इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी।
इस मायने में 21 अप्रैल की वह चिलचिलाती धूप वाली दोपहर सचमुच ऐतिहासिक थी कि सर्वथा उपेक्षित, दब-छिपकर अनाम जिंदगी बिताने वालों का झंडा ऐसे धार्मिक आयोजन में गर्व से ऊंचा लहरा रहा था।
संन्यासियों के पवित्र 13 अखाड़ों के साथ-साथ एक नया अखाड़ा उनके अस्तित्व की एक नई इबारत लिख चुका था। मौका पहले पहल की पेशवाई का था सो सिंहस्थ में उसकी पेशवाई कुछ ज्यादा ही धूमधाम से निकली, पहली बार कोई पेशवाई मुस्लिम-बाहुल्य तोपखाना मुहल्ले से निकली।
ऐसे में कितना लाजिमी था किन्नर अखाड़े की प्रमुख लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का ये कहना कि ”हमारी लड़ाई वजूद की है और इस पेशवाई ने हमारे वजूद को एक नया आयाम दे दिया है।” निश्चित ही ये सही है।
अभी कुछ साल पहले तक इस वजूद का हम ज़‍िक्र तक करने में कतराते थे किंतु अखाड़ा अब उनके अस्तित्व की पहचान का आयाम है। इसका उद्देश्य भी बड़ा है, जैसे कि देशभर के किन्नरों को जोड़ना, उनके जीवनयापन का बंदोबस्त करना और वृद्धाश्रम जैसी सुविधाएं भी मुहैया कराना।
हालांकि जैसी कि अपेक्षा थी, सभी 13 धार्मिक अखाड़ों ने दबी जुबान से किन्नर अखाड़े का विरोध किया लेकिन किन्नरों ने शास्त्रार्थ की चुनौती देकर सबको मुंह बंद रखने पर मजबूर कर दिया।
बहरहाल, कुंभ के बहाने किन्नरों ने एक और मुकाम छू लिया है जिससे एक सकारात्मक आशा जगती है।
अभी तो ये यात्रा की शुरुआत है, और बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। पेशवाई का पूरा मैनेजमेंट संभाल रहीं नाज फाउंडेशन की संस्थापक व सामाजिक कार्यकर्ता अंजली गोपालन कहती हैं, ”बदलाव आना अच्छा है लेकिन हर स्तर पर भेदभाव मिटाना होगा। आज भी किन्नरों को नौकरी नहीं मिलती, स्कूल में परेशानी आती है, लोग अजीब नजर से देखते हैं, बिना शिक्षा कुछ संभव नहीं है।” निश्चित ही इसके लिए कानून बनाने की जरूरत है।
एक और पदाध‍िकारी रेवती भी कहती हैं कि समाज को अपना नजरिया बदलना होगा। यह हकीकत है कि किन्नरों को कोई कमरा तक नहीं देता, स्लम में कमरा मिलता भी है तो दोगुनी कीमत पर। पब्लिक ट्रांसपोर्ट में लोग तमाशा समझते हुए सरेआम फ्री सेक्स की बात करते हैं।
इस संदर्भ में एक फिल्म बड़े ही मार्मिक ढंग से किन्नरों की मानसिक स्थ‍िति को दर्शाती है, यह फिल्म है ” द डैनिश गर्ल (2015)।  इस फिल्म में आयनर वेगेनर अपनी पत्नी से कहता है, ”रोज सुबह मैं खुद से वादा करता हूं कि मैं पूरा दिन पुरुष बनकर गुजारूंगा पर मैं लिली की तरह सोचता हूं, उसकी तरह ख्वाब देखता हूं, वह हमेशा यहीं रहती है, यह शरीर मेरा नहीं है, मुझे इसे छोड़ना ही होगा।” हमें और हमारे समाज को हर आयनर के अंदर छिपी किसी ना किसी लिली को पहचानना होगा और समाज को इस बदलाव का हिस्सा बनाना होगा।
शायर दुष्यंत की मशहूर लाइनों ”कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो” को समाज के सामने साबित कर दिखाया है किन्नर अखाड़े ने । आगे क्या होगा, यह तो कहना मुश्किल है परंतु फिलहाल किन्नरों के हौसले ने इसका आगाज सिंहस्थ कुंभ में किन्नर अखाड़े की पेशवाई करके कर ही दिया है। ऐतिहासिक बन गया है उज्जैन का ये कुंभ, जहां लोगों की कतार हर वक्त नजर आती है और परिवर्तन की आहट सुनाई दे रही है।
परिवर्तन, प्रकृत‍ि का नियम है। यद‍ि प्रकृत‍ि में परिवर्तन नहीं होगा तो सब-कुछ ठहर जाएगा। और ठहरी हुई हर चीज विनाश की परि‍चायक है। समाज का भी समय के साथ परिवर्तन होना आवश्यक है। ठहरा हुआ समाज हो या ठहरा हुआ पानी, दोनों से सड़ांध आने लगती है। समाज को इस सड़ांध से मुक्त रखने के लिए ईश्वर की उस रचना का सम्मान हमें करना ही होगा जिसे अब तक हम हिंजड़े, क‍िन्नर, छक्के अथवा ट्रांसजेंडर जैसे नामों से संबोधित करते रहे हैं और जिसे मात्र उप‍हास का पात्र समझकर दबी हुई कामुक इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम बनाते रहे हैं।
– अलकनंदा सिंह