मंगलवार, 26 सितंबर 2023

NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल जीरो करने पर क्यों मचा है बवाल, ये है पूरा मामला


 व‍िपक्ष से लेकर स्वयं मेडीकल लाइन के जानकारों के बीच बहस का मुद्दा बन गया है NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल को स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 'जीरो' कर देना.

मगर इसके पीछे की वजह जो मुझे समझ में आई है वह यह है क‍ि देशभर के सरकारी और प्राइवेट मेडीकल कॉलेजों में पीजी स्तर की लगभग 13 हजार से ज्यादा खाली पड़ी सीटों को भरा जा सके.  क्योंक‍ि स‍िर्फ एक सीट पर सरकार की ओर से 3 करोड़ रुपये खर्च क‍िये जाते हैं और 13 हजार सीटों का मतलब है एक पूरी की म‍िन‍िस्ट्री खड़ी कर देना.  तो इस भारी नुकसान को बचाने के ल‍िए परसेंटाइल को जीरो कर द‍िया गया.  

NEET-PG के क्वालीफाइंग परसेंटाइल जीरो करने का मतलब है, जिस भी बच्चे ने NEET-PG एग्जाम दिया, इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने 0 नंबर पाए या निगेटिव मार्क्स आए, वे काउंसलिंग के लिए एलिजिबल माने जाएंगे. इस फैसले का रिजल्ट ये रहा कि 0 नंबर वाले 14 स्टूडेंट्स, निगेटिव स्कोर वाले 13 और 1 स्टूडेंट -40 स्कोर वाला भी NEET PG के लिए क्वालीफाई माना जाएगा.

NEET-PG नेशनल लेवल का एंट्रेंस टेस्ट है. इस टेस्ट के जरिए देश भर में PG मेडिकल सीटों पर दाखिला दिया जाता है. एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए मेडिकल काउंसिल कमेटी ने कहा, इस साल अब तक बची खाली PG सीटों के लिए एलिजिबिलिटी जीरो परसेंटाइल कर दी जाएगी. 

ऐसी छूट क्यों देनी पड़ी 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक काउंसलिंग के दो राउंड हो जाने के बाद तक भी मेडिकल कॉलेजों में PG की करीब 13 हजार सीटें खाली रह गईं. यह पहली बार है जब एलिजिबिलिटी कट-ऑफ को पूरी तरह से हटा दिया गया है ताक‍ि सीटें भरी जा सकें. एक सीट पर तीन करोड़ खर्च करने वाली सराकर के ल‍िए यह काफी नुकसानदेह था क‍ि 13,245 खाली रह गई सीटों को हर हाल में भरा जाए.

कौन दे सकता है NEET PG एग्जाम

NEET PG एग्जाम वे कैंडिडेट्स देते हैं तो MBBS कर चुके हैं. ये कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट होता है. इसमें मल्टीपल चॉइस के सवाल आते हैं, जिसमें मेडिकल सब्जेक्ट्स के टॉपिक कवर किए जाते हैं. इस परीक्षा के जरिए रैंक, परसेंटाइल, कैंडिडेट की एलिजिबलिटी और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स और इंस्टीट्यूट में प्रिफ्रेंस तय किया जाता है. इसी के जरिए ये कय किया जाता है कि कैंडिडेट मेडिकल स्टडीज के लिए सभी एजुकेशनल दायरों को पूरा करता हो.

क्या है परसेंटाइल- 

परसेंटाइल एक स्टेटिस्टिकल Measure है जिसके जरिए आप ये तुलना कर सकते हैं कि कॉम्पटिशन में आपने कितनों से बेहतर किया. उदाहरण से समझिए. एक अंग्रेजी का टेस्ट हुआ. इस टेस्ट में आपका परसेंटाइल ये बताएगा कि कितने लोगों ने आपसे कम और ज्यादा स्कोर किया है.

पेपर में हिस्सा लेने वालों टेस्ट स्कोर इकट्ठा किए और उन्हें एक ऑर्डर में lowest to highest रखा, मान लेते हैं पेपर में कुल 100 स्कोर पाए. यदि आपको 80 नंबर मिले, तो इसका मतलब है कि परीक्षा देने वाले 80 लोगों ने आपसे कम नंबर पाए. ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने 100 में से 80 लोगों से बेहतर प्रदर्शन किया. यदि आप 90वें परसेंटाइल में हैं, तो आपने 100 में से 90 लोगों से बेहतर प्रदर्शन किया. यदि आप 50वें परसेंटाइल में हैं, तो आपने आधे लोगों (100 में से 50) के बराबर ही अच्छा प्रदर्शन किया है.

दूसरे राउंड की काउंसल‍िंंग के बाद भी  13,245 खाली रह गईं
NEET-PG काउंसलिंग सेशन जुलाई में हुआ, MCC ने इसके लिए कट-ऑफ परसेंटाइल 50 सेट की. कुल 800 नंबरों में से 582 पाने वाले को 100th परसेंटाइल दिया गया. इस मुताबिक सीटें भरी जानें लगीं और दूसरे राउंड के बाद 13,245 खाली रह गईं. इन मेडिकल कॉलेजों में सबसे बड़ी तादाद में खाली सीटों की संख्या All-India quota के तहत रही, जो कि 3000 थी. ये सीटें DNB डॉक्टर्स के लिए थी.

मेडिकल में मास्टर्स डिग्री करने के लिए तीन कोर्स हैं. MD (Doctor of Medicine), MS (Master of Surgery), DNB (Diplomate of National Board) हैं.  DNB भी पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल क्वालीफिकेशन है जो NBE की ओर से भारत में ऑफर की जाती है. ये डिग्री MD, MS के बराबर मानी जाती है. इसके लिए जरिए  मेडिकल और सर्जिकल में अलग अलग स्पेशलाइजेन मिलता है.

एक एमबीबीएस सीट के ल‍िए सरकार 3 करोड़ रुपये करती है खर्च 

शासकीय मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस सीट पर दाखिला लेने वाले एक छात्र को डॉक्टर बनाने में सरकार तीन करोड़ रुपये खर्च करती है. इसमें डॉक्टर/प्रोफेसर का वेतन, कॉलेज का इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर प्रयोगशाला, हॉस्टल और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) में मान्यता के आवेदन का खर्च शामिल है. 

इस परेशानी के मद्देनजर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन समेत सभी मेडिकल एसोसिशएंस ने हेल्थ मिनिस्ट्री से परसेंटाइल कट-ऑफ को 20 तक कम करने की अपील की थी. 

इसके जवाब ने MCC ने मांगे गए नंबर तक परसेंटाइल घटाने की बजाय उसे जीरो (0) तक घटा दिया. 0 परसेंटाइल का मतलब है, जिस भी बच्चे ने NEET-PG एग्जाम दिया, इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने 0 नंबर पाए या निगेटिव मार्क्स आए, वे काउंसलिंग के लिए एलिजिबल माने जाएंगे. इस फैसले का रिजल्ट ये रहा कि 0 नंबर वाले 14 स्टूडेंट्स, निगेटिव स्कोर वाले 13 और 1 स्टूडेंट -40 स्कोर वाला भी NEET PG के लिए क्वालीफाई माना जाएगा.

इसका मतलब सीधा है कि अगर आपने नीट पीजी में अप्लाई किया है, अपीयर हुए हैं या अगर आप उस परीक्षा में केवल बैठे भी हैं तो भी आप उस सीट के दावेदार हैं. अगर कॉलेज में सीट है तो आप उस सीट के लिए आवेदन कर सकते हैं. अभी तक दो राउंड की काउंसलिंग हो चुकी है और तीसरे राउंड की काउंसलिंग शुरू होगी, जिसमें स्टूडेंट्स अपनी चॉइस भरेंगे और वो इन छह से सात हजार मेडिकल सीटों के लिए अप्लाई कर सकेंगे.

IMA ने बयान जारी किया

केंद्र सरकार की ओर से यह पत्र राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBE) को भी भेजा गया था. ये NEET PG द्वारा आयोजित किया जाता रहा है. इसके साथ ही मंत्रालय के चिकित्सा परामर्श प्रभाग और सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों (स्वास्थ्य) को भेजा गया था. इस आदेश के जवाब में आईएमए ने एक बयान जारी कर स्वास्थ्य मंत्री का आभार किया गया है. उन्होंने  कहा कि उसने सरकार से ऐसा करने का अनुरोध किया था. बीते वर्ष काउंसलिंग के आखिरी दौर के लिए क्वालीफाइंग परसेंटाइल  को घटाकर 30 करा गया था. उस वक्त लगभग 4 हजार सीटें खाली हो गई थीं. सरकार के इस कदम के जरिए स्ट्रीम में पीजी सीटें भरने का लक्ष्य रखा है.

- अलकनंदा स‍िंंह 

https://www.legendnews.in/single-post?s=why-is-there-an-uproar-over-reducing-the-qualifying-percentile-of-neet-pg-to-zero-understand-the-complete-mathematics--12352

शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

'ऋग्वेद' का 'नासदीय सूक्त' देता है ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर हर सवाल का जवाब

हम सभी के मन में कभी न कभी ये सवाल जरूर आया होगा कि आखिर इस ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई। जब स्टीफन हॉकिंग की ब्रह्मांड के जन्म को लेकर 'बिग बैंग' थ्योरी आई थी तो लोगों की इस विषय के बारे में जानने की उत्सुकता और बढ़ गई, लेकिन साथ ही साथ इस बात को लेकर बहस भी छिड़ गई कि ब्रह्मांड के निर्माण को लेकर दी गई इस वैज्ञानिक व्याख्या से बहुत पहले ही वेद इससे जुड़े कई तथ्य बताये जा चुके हैं जो बिग बैंग थ्योरी के काफी करीब हैं। बिग बैंग थ्योरी में इस बात की व्याख्या करने की कोशिश की गई है कि किस प्रकार करीब 15 अरब साल पहले इस ब्रह्मांड की रचना हुई थी। ऋग्वेद में काफी दिलचस्प तरीके से ब्रह्मांड की रचना की प्रक्रिया बताई गई है। 

 ​ब्रह्मांड बनने से पहले की स्थिति कैसी थी​ 
ब्रह्मांड के निर्माण को लेकर अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग व्याख्या की गई है। सनातन धर्म में 'ऋग्वेद' का 'नासदीय सूक्त' ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर कई आश्चर्यजनक व्याख्या करता है। 

इसमें बताया गया है कि ब्रह्मांड बनने से पहले की स्थिति कैसी थी, फिर ब्रह्मांड बनने की शुरुआत कैसे हुई और कैसे इसका विस्तार होता चला गया। यह बेहद दिलचस्प और सोचने वाली बात है कि आज जब विज्ञान इतनी तरक्की कर चुका है, तब भी वह बड़ी मुश्किल से ब्रह्मांड की संरचना को लेकर कुछ ही मुद्दों पर बात कर सकता है जबकि सनातन धर्म में इसकी चर्चा हजारों साल पहले की जा चुकी है। 

नासदीय सूक्त ऋग्वेद के 10 वें मण्डल का 129 वां सूक्त है। 'नासद्' (= न + असद् ) से आरम्भ होने के कारण इसे 'नासदीय सूक्त' कहा जाता है। इसका सम्बन्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है। विद्वानों का विचार है कि इस सूक्त में भारतीय तर्कशास्त्र के बीज छिपे हैं।

सोचने की बात यह भी है कि आविष्कार के बिना महर्षियों ने आखिर कैसे इस बात को समझा होगा, जाना होगा और इसे पुख्ता किया होगा।


ब्रह्मांड के रहस्यों से जुड़े सवालों के जवाब मिलते हैं​ 
ऋग्वेद के 'नासदीय सूक्त' में ब्रह्मांड से जुड़ी सारी जानकारियां सूक्ति के माध्यम बताई गई हैं लेकिन इन सूक्तियों का अर्थ स्पष्ट और सरल नहीं है इसलिए आम लोगों के लिए इसे समझना मुश्किल है। हालांकि कई जानकारों द्वारा इन सूक्तियों की व्याख्या सरल शब्दों में की गई है ताकि इससे मिली जानकारी वैज्ञानिक शोधों में इस्तेमाल की जा सके। नासदीय सूक्त में सात ऐसे मंत्र या सूक्ति बताये गये हैं जिसके माध्यम से ब्रह्मांड के रहस्यों से जुड़े सवालों के जवाब मिलते हैं।  

ब्रह्मांड की रचना से पहले न तो अंतरिक्ष था, न समय​ 
पहले सूक्त के अनुसार ब्रह्मांड की रचना से पहले ना तो 'सत् (जो है)' था, ना ही 'असत् (जो नहीं है)' था; ना ही आकाश था, ना ही पृथ्वी थी और ना ही पाताल लोक था। यानि ब्रह्मांड की रचना से पहले न तो अंतरिक्ष था, न समय और न ही कोई भौतिक पदार्थ। केवल शून्य और अंधकार था। बिग बैंग थ्योरी के अनुसार भी अंतरिक्ष पहले से मौजूद नहीं था बल्कि इसकी रचना बहुत ही अजीबोगरीब स्थिति में हुई है। उनके अनुसार इसकी शुरुआत सबसे पहले ब्लैक होल के केंद्र भाग में मौजूद ‘विलक्षणता’ (सिंगुलैरिटी) से हुई होगी, जहाँ एक अनंत घनत्व वाला सूक्ष्म बिंदु आया और उसमें विस्फोट हुआ। यही घटना 'बिग बैंग' कहलाई। उस विस्फोट से न केवल 'द्रव्य-पदार्थ' का निर्माण हुआ बल्कि 'अंतरिक्ष' और 'समय' की भी रचना हुई। वेद के अनुसार ब्रह्मांड के निर्माण के समय जो 'नाद' अर्थात् 'ध्वनि' उत्पन्न हुई थी, वह था 'अम्भास' और बिग बैंग के अनुसार वह ध्वनि 'ऊँ' से मिलती-जुलती थी। 

जल के समान हर ओर अंधकार था 
दूसरे सूक्त के अनुसार उस समय न तो 'मृत्यु' थी और न ही अमरता। दिन-रात का भी नामो-निशान नहीं था। जल के समान हर ओर अंधकार था। केवल एक ऊर्जा अस्तित्व में थी, जिसमें वायु की अनुपस्थिति थी। उन्होंने इस ऊर्जा के स्रोत को 'परम तत्व' कहा और यह भी बताया कि इसी ऊर्जा से ब्रह्मांड में अन्य चीजों का जन्म हुआ है, केवल प्राण को छोड़कर। इस परम तत्व से बाकी चीजें ऐसे बाहर निकलकर आईं, जैसे फेफड़े से एक झोंके के रूप में हवा बाहर निकलकर आती है। वेद में बताये गये ऊर्जा के स्रोत 'परम तत्व' की व्याख्या जैसी ही व्याख्या भी बिग बैंग थ्योरी करता है। उनका भी मानना है कि जब अंतरिक्ष की रचना हुई थी, तो वह बहुत गर्म था और आज जो चार मूलभूत बल ( गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत चुम्बकीय बल, न्यूक्लियर फोर्स और वीक इनटेरेक्शन फोर्स) काम करते हैं, उस समय वे सब मिलकर एक थे। जैसे-जैसे ब्रह्मांड ठंडा होता गया, ये सारे बल अलग होते चले गये। उनका मानना है कि आज जो भी चीजें मौजूद हैं, उन सबकी उत्पत्ति ब्रह्मांड से ही हुई है, जिसे वेद ने 'परम तत्व' कहा है। वेद में दिन और रात नहीं होने की बात भी प्रमाणित होती है क्योंकि उस वक्त सूर्य और चंद्रमा का निर्माण नहीं हुआ था, तो दिन और रात होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। 

ब्रह्मांड में पहले केवल अंधेरा था ​
घटना को समझना असंभव था। पहले एक लहराता द्रव्य अस्तित्व में आया, जिसे 'सलिल' कहा गया और उसके आसपास एक हल्का पदार्थ फैला था जिसे 'अभु' कहा गया। उनके अनुसार वह शायद ऊष्मा से विकसित हो गया था। वेद में यहाँ तारों और आकाशगंगा के निर्माण की बात कही जा रही है। बिग बैंग थ्योरी के अनुसार भी शुरुआती के कुछ लाख वर्ष तक 'पदार्थों' और 'ऊर्जाओं' का निर्माण होता रहा, इसी प्रक्रिया को ऋषियों ने रहस्यमयी घटना कहा था। उन वर्षों में 'फोटॉन', 'इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन' से टकराता रहा और उसने एक अपारदर्शी द्रव्य का निर्माण किया। लगभग एक लाख वर्ष बाद जब ब्रह्मांड का तापमान कम हुआ, तो प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन ने मिलकर हाईड्रोजन परमाणु का निर्माण किया। हाईड्रोजन पारदर्शी होता है, जिसने उस सैकडों सालों से बन रहे उन अपारदर्शी द्रव्यों को पारदर्शी किया जिसे हम आज अंतरिक्ष कहते हैं। बाद में धीरे-धीरे आकाशगंगा और तारों का निर्माण होना भी शुरु हुआ। 

उस समय ब्रह्मांड में कोई दिशा नहीं थी​ 
आगे की सूक्तियों में ऋषि यह बताते नजर आते हैं कि कैसे अंतरिक्ष में छोटे-बड़े 'गेलेक्सीज' का निर्माण हुआ। इन गेलेक्सीज में काफी मात्रा में गैस और धूल थी, जिससे 'ग्रहों', 'उपग्रहों' और 'उल्का पिंडों' का निर्माण हुआ। इस सिद्धांत के लिए सूक्त में 'स्वध' और 'प्रयति' शब्द का इस्तेमाल हुआ है। वो दिशाओं के बारे में भी बताते हैं कि उस समय ब्रह्मांड में कोई दिशा नहीं थी। ऊपर किसे कहें या नीचे किसे कहें, या तिरछा किस तरफ है, कहा नहीं जा सकता था। बाद की सूक्तियों में वह यह सवाल करते नजर आते हैं कि यह बताना बहुत मुश्किल है कि सबकुछ की रचना कैसे हुई। कोई नहीं जानता कि जीवन और जीव की शुरुआत कैसे हुई? कोई नहीं बता सकता कि ईश्वर के सहयोग से सबकुछ अस्तित्व में आया या नहीं? कोई नहीं जानता कि इस ब्रह्मांड का सर्वेसर्वा कौन है? ऋषि अनुमान लगाते हुए कहते हैं कि शायद केवल उच्च शक्ति ही है, जो बता सकती है कि ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई या फिर क्या पता उस उच्च शक्ति के ऊपर भी कोई शक्ति हो।

नासदीय सूक्त में रिसर्च से जुड़े सवालों के जवाब पहले से मौजूद थे​ 
खैर, बिंग बैंग थ्योरी भी ब्रह्मांड के केवल शुरुआती प्रक्रिया की व्याख्या करता है और वह भी आगे कहीं बन कहीं पहेली बनकर रह जाता है या ईश्वर जैसे शब्दों से जुड़ जाता है। उसके पास भी सारे सवालों के जवाब नहीं हैं। लेकिन भले ही आज आधुनिक शोधकर्ता, ब्रह्मांड के आगे के सवालों के जवाब ढूंढ रहे हों, वो इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि 'नासदीय सूक्ति' में उनकी शुरुआत के रिसर्च से जुड़े सवालों के जवाब पहले से मौजूद थे।  

शनिवार, 16 सितंबर 2023

जान‍िए नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के बारे में , कैसे होगा आमजन को फायदा


 नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड से सुप्रीम कोर्ट के जुड़ जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित मामलों से लेकर अदालत के आदेश और मुकदमे की तारीख तक पता चल सकेगी. यूं तो अब तक इससे देशभर की जिला अदालतें और हाइकोर्ट जुड़े थे परंतु अब इससे सुप्रीम कोर्ट भी जुड़ गया है. 

नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (NJDG) यानी राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड ने अपना पहला और महत्वपूर्ण चरण पूरा कर लिया है.

इस समय देश की 18735 से ज्यादा अदालतें इससे जुड़ चुकी हैं. मतलब, कोई भी व्यक्ति अब अदालतों की पेंडेंसी जान सकता है. अपने मुकदमों के फैसले आदि भी देखे जा सकते हैं. इस तरह यह कहा जा सकता है कि अब तक परदे के पीछे छिपी न्यायिक व्यवस्था में भी एक ऐसा पारदर्शी सिस्टम लागू हो गया है जी आमजन को संतोष प्रदान करेगा.

कैसे मिलेगा नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड का फायदा

NJDG के लागू करने से पूरी न्यायिक व्यवस्था ऑनलाइन हो गई है. अब कोई भी व्यक्ति यह जान सकता है कि देश में कितने मुकदमे लंबित हैं. वह यह भी जान सकता है कि उसके मुकदमे में क्या फैसला आया या सुनवाई के दौरान अदालत ने क्या आदेश किया है? अगली तारीख क्या पड़ी है? इसकी शुरुआत कई साल पहले हुई थी. धीरे-धीरे प्रोजेक्ट आगे बढ़ता गया और अब अपने अंतिम मुकाम तक पहुंच गया, मतलब सुप्रीम कोर्ट भी इसके दायरे में आ गया.

रूटीन के ऑर्डर का भी मिलेगा अपडेट

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ के इस फैसले की पीएम नरेंद्र मोदी ने भी सराहना की है. कल्पना यह है कि अदालती फैसले, रूटीन के ऑर्डर भी रोज के आधार पर यहां अपडेट हों. ऐसा हो भी रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जहां कहीं चूक हो रही होगी, वहां भी चीजें रफ्तार पकड़ लेंगी. क्योंकि अब किसी भी जज के लिए यह छिपाना मुश्किल होगा कि उसके मुकदमे में क्या चल रहा है? अब इसे सिस्टम के अंदर बैठा कोई भी पर्यवेक्षक देख सकेगा.

देश में कितनी अदालतों की जरूरत, यह पता चलेगा

इसके लागू होने का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अदालतों को मैप करते हुए असल में पता करना आसान हो जाएगा कि देश में असल में कितनी अदालतों की जरूरत है. मतलब जब भी केंद्र एवं राज्य सरकारें नीतिगत निर्णय लेना चाहेंगी तो उन्हें मदद मिलेगी. विश्व बैंक ने इसके शुरुआती दिनों में ही भारत के इस प्रोजेक्ट की सराहना की है. जमीन के विवाद देश में बड़ी समस्या हैं. इनके निस्तारण में काफी वक्त लगता है.

4.44 करोड़ से ज्यादा मुकदमे पेंडिंग

उन्होंने कहा, NJDG से जुड़ी वेबसाइट के माध्यम से मैं देख पा रहा हूं कि देश में इस समय 4.44 करोड़ से ज्यादा कुल मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं. इनमें सिविल के 1.10 करोड़ केस सिविल मामलों के तथा 3.33 करोड़ केस क्रिमिनल के हैं. यही वेबसाइट बता रही है कि बीते एक साल में 2.75 करोड़ मामले अदालतों में बीते एक साल से पेंडिंग हैं. इनमें दो करोड़ से ज्यादा क्रिमिनल और 66 लाख से ज्यादा सिविल केस हैं. 98771 मामले 30 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग हैं. पांच लाख से ज्यादा मामले 20 से 30 साल से पेंडिंग हैं. वेबसाइट में जितना खोजते जाएंगे तो यहां छोटी से छोटी जानकारी मिलेगी.



शनिवार, 2 सितंबर 2023

जान‍िए दुन‍िया की लाइब्रेरि‍यों के बारे में...गोरखपुर में भी बन रही है देश की सबसे बड़ी लाइब्रेरी


 प्राचीन समय में भारत से काफी दूर एक देश हुआ करता था असीरिया। करीब 5000 साल पहले वहां का अंतिम राजा था अशुरबनीपाल, जो दुनिया का सबसे ताकतवर राजा माना जाता था।

कहते हैं कि उसका साम्राज्य बेबीलोन, असीरिया, पर्सिया और इजिप्ट तक फैला हुआ था। वह जानता था कि अगर दुनिया पर राज करना है तो किताबों और कला को जानना जरूरी है।
उसने दुनिया के तमाम हिस्सों से किताबें मंगवाईं और एक बड़ी लाइब्रेरी बनवाई, जहां इन किताबों को सहेजा गया। इस लाइब्रेरी में प्राचीन मेसोपोटामिया की सभ्यता और इतिहास के अलावा रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, गणित और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ीं किताबें थीं।
दुनिया जीतने का सपना संजोने वाले अलेक्जेंडर द ग्रेट ने भी नील नदी के किनारे अलेक्जेंड्रिया में काफी बड़ी लाइब्रेरी बनवाई थी।
भारत पर 200 सालों से ज्यादा समय तक राज करने वाले अंग्रेज भी लाइब्रेरी की अहमियत जानते थे। तभी तो 1835 में ब्रिटिश संसद में भारत में अंग्रेजी शिक्षा की वकालत करने वाले लॉर्ड मैकाले ने भारत के ज्ञान-विज्ञान की खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की अलमारी में भारत और अरब का संपूर्ण देशी साहित्य समा सकता है।
जब भी कहीं जाते, 60 ऊंटों पर लादकर किताबें लेकर जाते
10वीं सदी की बात है, जब ईरान में साहिब इब्न अब्बाद नाम के एक महान लेखक और साहित्य-संरक्षक हुए। कहते हैं कि उन्होंने 500 कवि, लेखकों और दार्शनिकों को पैसों से मदद की और नवाब मुअदुद्दौला के दरबार को अरब की दुनिया में ज्ञान और दर्शन का बड़ा केंद्र बना दिया।
इनको किताबों से इस कदर मोहब्बत थी कि उन्होंने अपनी एक पर्सनल लाइब्रेरी बनाई, जिसमें करीब दो लाख किताबें थीं। जब भी ये कहीं जाते तो अपने साथ 60 ऊंटों का काफिला लेकर जाते, जिनकी पीठ पर किताबों का गट्ठर होता। ऊंटों का यह काफिला एक तरह से मोबाइल लाइब्रेरी थी।
किताबें इंसान की प्रगति और सभ्यता की गवाह रही हैं। इंसान ने जब से लिखना और कागज बनाना सीखा, तब से किताबें पढ़ने और कलेक्शन का काम होता आ रहा है।
‘द ग्रेट लाइब्रेरी ऑफ अलेक्जेंड्रिया’ इन्हीं लाइब्रेरियों में से एक थी। ऐसे ही हजारों साल पहले नालंदा विश्वविद्यालय की विशाल लाइब्रेरी में कई देशों के छात्र पढ़ा करते थे। आधुनिक दौर में भारत की सबसे बड़ी लाइब्रेरी कोलकाता की रही जिसके कई बार नाम भी बदले गए। 
कुछ समय से देश में लाइब्रेरी को लेकर धार्मिक रुझान भी बढ़ा है। 
यूपी में बन रही देश की सबसे बड़ी आध्यात्मिक लाइब्रेरी
यूपी के गोरखपुर में देश की सबसे बड़ी आध्यात्मिक लाइब्रेरी को मंजूरी मिली है। चंपा देवी पार्क के 25 एकड़ एरिया में गोरखपुर विकास प्राधिकरण इस लाइब्रेरी को बनाएगा। इसके अंदर भारतीय सभ्यता और संस्कृति का स्टडी मैटेरियल मौजूद होगा। 500 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले इस पुस्तकालय में पेपरबुक और डिजिटल बुक दोनों रूप में अध्ययन किया जा सकेगा। 
अमेरिकी लाइब्रेरी में 470 भाषाओं में हैं 17 करोड़ किताबें
अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में 200 साल पुरानी ‘लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ में 17 करोड़ से अधिक किताबें हैं। इस लाइब्रेरी को अमेरिका के संघीय ढांचे की सबसे पुरानी सांस्कृतिक विरासत माना जाता है। इसकी वॉशिंगटन में तीन और वर्जीनिया में एक इमारत है, जिनमें दुनिया की 470 भाषाओं में किताबें हैं।
1812 में अमेरिका और ब्रिटेन के बीच हुए युद्ध में अंग्रेजों ने इस लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया था। इसमें किताबों के ज्यादातर ओरिजिनल कलेक्शन खाक हो गए। 1815 में इसे दोबारा शुरू करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन के निजी कलेक्शन से 6,487 किताबें खरीदी गईं।
दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी लंदन में, यहां हर साल आतीं 30 लाख किताबें
लंदन में मौजूद ब्रिटिश लाइब्रेरी कलेक्शन के लिहाज से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। ब्रिटिश लाइब्रेरी में 17 करोड़ से 20 करोड़ किताबें हैं। कहा यह भी जाता है कि इस लाइब्रेरी के कलेक्शन में हर साल 30 लाख नई किताबें जुड़ती हैं।
कहा जाता है कि आयरलैंड और यूके में प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक की प्रतियां विभिन्न भाषाओं डिजिटल और हार्ड कॉपी में इस लाइब्रेरी में मौजूद हैं। यह लाइब्रेरी 1 जुलाई 1973 को स्थापित की गई थी। इससे पूर्व यह लाइब्रेरी ब्रिटिश म्यूजियम का हिस्सा हुआ करती थी।
चीन के पास है दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी
शंघाई लाइब्रेरी चीन की सबसे बड़ी पब्लिक लाइब्रेरी है। यह शंघाई लाइब्रेरी सिस्टम का हिस्सा है, जिसमें करीब 5.6 करोड़ किताबें हैं। इसका न सिर्फ दुनिया की टॉप 3 लाइब्रेरी में शुमार है बल्कि दूसरी सबसे ऊंची लाइब्रेरी भी है। इसकी इमारत 24 मंजिला ऊंची है। शंघाई लाइब्रेरी 1847 के आसपास बनाई गई थी।
कनाडा की लाइब्रेरी में सेव है एक पेटाबाइट डिजिटल इन्फॉर्मेशन
‘लाइब्रेरी एंड आर्काइव्स कनाडा’ को LAC के नाम से भी लोग जानते हैं। इसमें 5.4 करोड़ से ज्यादा किताबें हैं। इस पर देश की डॉक्यूमेंट्री हेरिटेज को संरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है। LAC को साल 2004 में बनाया गया था। इस लाइब्रेरी में एक पेटाबाइट की डिजिटल इन्फॉर्मेशन भी सुरक्षित है।
‘श्राइन ऑफ द बुक लाइब्रेरी’ का दो तिहाई हिस्सा धरती के नीचे
यह पश्चिमी जेरूसलम में इस्राइल म्‍यूजियम का एक भाग है। यहां कई पुरातन पांडुलिपियां रखी गई हैं। इसका दो-तिहाई भाग धरती के नीचे है। इस लाइब्रेरी को अपने खास डिजाइन के लिए भी जाना जाता है।
अमेरिका में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं जातीं लाइब्रेरी
इंटरनेट के इस युग में जहां ज्यादातर लोग मोबाइल या लैपटॉप से चिपके रहते हैं, वहां अमेरिकी लाइब्रेरी में किताबें पढ़ने को ज्यादा महत्व देते हैं।
4 साल पहले गैलप पोल के एक सर्वे में पाया गया कि अमेरिका में छुट्टी के दिनों में लाइब्रेरी भरी रहती। स्टूडेंट्स भी 2019 में लाइब्रेरी का उपयोग करने में आगे रहे। सर्वे में पाया गया कि महिलाएं, पुरुषों की तुलना में लगभग दो बार ज्यादा लाइब्रेरी जा रही हैं।
लाइब्रेरी के इस्तेमाल पर प्यू रिसर्च सेंटर ने 2016 में एक सर्वे किया जिसमें पता चला कि लगभग 80 फीसदी वयस्क अमेरिकी लाइब्रेरीज के सोर्स पर भरोसा करते हैं।
मुगल शासक हुमायूं की लाइब्रेरी की सीढ़ियों से गिरकर हुई थी मृत्यु
कहते हैं मुगल शासक हुमायूं किताबें पढ़ने और संजोने का बेहद शौकीन था लेकिन उसका ज्यादातर वक्त युद्ध और इधर-उधर भागने में बीता। हालांकि वह इन अभियानों में भी पुस्तकें अपने साथ ले जाया करता था।
एक रात में जब वह गुजरात के अभियान पर था तब अचानक कुछ जंगली एवं पहाड़ी कबाइली लोगों ने उस पर आक्रमण कर दिया, जिसके कारण उसे पीछे हटना पड़ा।
उसकी बहुत सारी अच्छी और दुर्लभ किताबें वहीं रह गईं। इन किताबों में से एक “तैमूरनामा” भी थी जिसकी प्रतिलिपि मौलाना सुल्तान अली और उस्ताद बेहज़ाद द्वारा चित्रित की गई थी।
1555 में दिल्ली फतह करने के बाद उसने वैज्ञानिक स्टडी और रिसर्च पर ध्यान दिया। भारत और दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों से विद्वानों को जमा किया। किताबें इकट्‌ठा कीं और शेर मंडल को दीनपनाह लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया। मगर अगले साल ही दीनपनाह की सीढ़ियों से गिरकर हुमायूं की मृत्यु हो गई। यह जगह दिल्ली के पुराना किला इलाके में आज भी मौजूद है।
दुनिया में ऐसी चलती फिरती लाइब्रेरीज भी मौजूद हैं जो बच्चों के अलावा हर उम्र के पुस्तक प्रेमियों के लिए भी कौतूहल की वजह बन सकती है। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ मोबाइल लाइब्रेरीज के बारे में-
टैंक जैसी दिखने वाली मोबाइल लाइब्रेरी कहलाती है ‘वेपन ऑफ मास इंस्ट्रक्शन’
1979 में अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में अर्जेंटीनियाई आर्ट कार मेकर और आर्टिस्ट राउल लेमेसऑफ ने टैंक जैसी दिखने वाली फोर्ड फाल्कन को मोबाइल लाइब्रेरी बनाया। 
आमतौर पर यह कहा जाता है कि कार की बॉडी में बुक्स कैसे फिक्स की जा सकती हैं, पर राउल ने ऐसा करके दिखाया। 
नीदरलैंड की संकरी गलियों के लिए बनी बेइब बस मोबाइल लाइब्रेरी
नीदरलैंड की संकरी गलियों के लिए आर्किटेक्ट जॉर्ड डेन होलैंडर ने शानदार तरीका निकाला। उन्होंने ट्रॉली के आकार की ऐसी बेइब बस (Biebbus) तैयार की, जिसमें वर्टिकल दो रूम बनाए गए हैं। इसमें नीचे के कमरे में 7 हजार के करीब बच्चों की किताबें हैं। 52 वर्ग मीटर स्पेस में 30 से 45 बच्चे बैठ जाते हैं।
दुनिया की सबसे बड़ी तैरती लाइब्रेरी गूगल ने बनाई
'एमवी लागोस होप' दुनिया की सबसे बड़ी तैरती लाइब्रेरी है। इस लाइब्रेरी को गूगल ने बनाई है। इसको गूगल बुक्स फॉर आल (जीबीए) शिप्स ऑपरेट करता है। जीबीए के पास इसी तरह की तीन और लाइब्रेरी हैं। लेकिन एमवी लागोस होप सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। यह दुनिया भर के देशों का दौरा करती रहती है। भारत में यह दो बार 1972 और 2011 में आ चुकी है। इस लाइब्रेरी को 40 देशों के करीब 400 वॉलंटियर ऑपरेट करते हैं।
उत्तराखंड के गांवों में पहुंची घोड़ा लाइब्रेरी
किताबों से लदी ऊंट की पीठ पर चलती-फिरती लाइब्रेरी से शुरू हुआ बुक लवर्स और पढ़ने के शौकीनों का सफर आज गूगल की ऑनलाइन लाइब्रेरी तक जा पहुंचा है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि किताबें ऊंट न सही टट्टू की पीठ पर लादकर आज भी उत्तराखंड के दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में पहुंच रही हैं। 
जहां न सड़कें हैं न पर्याप्त बिजली, लेकिन वहां के बच्चों को पढ़ने का शौक है और टट्टू पर लदी किताबें उनके चेहरे पर मुस्कुराहट ला देती हैं।
इस लाइब्रेरी को चलाने वाले शुभम बधानी कहते हैं कि जैसे ही मैंने ये सोचा कि मैं घोड़े पर किताबें लादकर बच्चों तक पहुंचाऊं, तो मेरा आइडिया गांवों को इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने घोड़े, टट्टू की सेवाएं तुरंत देने की बात की। वॉलंटियर्स ने इस लाइब्रेरी के लिए किताबें भी दीं और रीडिंग सेशन भी शुरू किए हैं। 
जैसे ही घोड़े की सुविधा मिली हिमोत्तम और संकल्प और यूथ फंडिंग ने आगे बढ़कर मदद की और किताबों की सुविधाएं दीं। वॉलंटियर्स गांव गांव चक्कर लगाते हैं और उन बच्चों से मिलते हैं जो किताबें पढ़ना चाहते हैं।
कई बार एक हफ्ते किताबें पढ़ने के लिए भी देते हैं। दूसरे राउंड में पुरानी किताबें लेकर फिर दूसरी नई किताबें बच्चों को दी जाती हैं।
इस तरह कम किताबें होते हुए भी बच्चों को कुछ नया लगातार पढ़ने को मिलता रहता है।
शुभम बताते हैं कि यह संस्था पूरी तरह से फंडिंग पर निर्भर है और ऐसे ही मदद करने वालों की तलाश है। अभी हमारे पास 15 साल के बच्चों के लिए किताबें हैं।
जैसे ही हमारे को आर्थिक मदद मिलेगी, हम सभी उम्र के पाठकों को किताबों मुहैया कराएंगे और इससे हमारे गांवों का दायरा भी बढ़ेगा। 
शुभम कहते हैं कि सबसे अच्छी बात ये रही कि गांव की महिलाओं में किताब पढ़ने की दिलचस्पी देखने को मिली। बच्चों के लिए होने वाले रीडिंग सेशन में हर उम्र का व्यक्ति शामिल होता है।
सबको लगता है कि हमें इससे नया सीखने को मिलता है। कुछ महिलाएं अपनी बेटियों के आती हैं। बच्चियां अगर घोड़ा देखकर खुश होती है तो किताबें देखकर उन्हें और खुशी होती है।
इसलिए किसी को भी एक अच्छी लाइब्रेरी से जुड़ने में देरी नहीं करनी चाहिए। अपने स्कूल-कॉलेज या शहर की लाइब्रेरी से जुड़िए और किताबें पढ़कर सोच को साफ-सुथरा बनाइए।
Compiled: Legend News