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रविवार, 28 जनवरी 2018

भपंग वादन से हुई समानांतर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन की शुरूआत

जयपुर। समानांतर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन प्रतिरोध का पंजाबी साहित्य, कविता अनंत, कहानी बुरे दिनों में और भारतीय लोकतंत्र का उत्तर सत्य विषय पर विभिन्न सत्रों का आयोजन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में श्रोताओं की भागीदारी रही।
उत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत सुबह 9 बजे राजस्थान के मशहूर लोकवाद्य भपंग वादक यूसुफ खान मेवाती और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत भपंग वादन से हुई।
इसके बाद मुक्तिबोध मंच पर रचना पाठ : कहानी बुरे दिनों में सत्र में हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार अरुण असफल, अनिल यादव, तस्लीम खान, संतोष दीक्षित ने कहानी पाठ किया। इन समकालीन कथाकारों ने वर्तमान समय और समाज से जुड़ी कहानियों का वाचन किया एवं उन पर अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र का संचालन कथाकार उदय शंकर ने किया।
बिज्जी की बैठक मंच पर कविता अनंत सत्र में देश के जाने माने कवि विष्णु खरे, सुरजीत पातर, नरेश सक्सेना, देवी प्रसाद मिश्र ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित ने किया।
प्रतिरोध का पंजाबी साहित्य सत्र हुआ। जिसमें पंजाबी के सुपरिचित रचनाकारों डॉ. तेजवंत एस. गिल, वरियाम सिंह संधु, सुखदेव सिंह, डॉ. सरबजीत सिंह और प्रो. सुरजीत जाज की सहभागिता रही। इन सभी रचनाकारों ने पंजाबी साहित्य में प्रतिरोध की स्थितियों पर प्रकाश डाला।
कविता अनंत सत्र :
इस सत्र में प्रतिष्ठित कवि देवी प्रसाद मिश्र ने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ किया। उनकी कविता ‘सत्य को पाने में मुझे अपनी दुर्गति चाहिए” के जरिए साहित्य संस्कृति, राजनीति, फिल्म, क्रिकेट और मनुष्य जीवन की विसंगतियों पर गहरा कटाक्ष किया। उनकी कविता में जीवन की विद्रूपताओं पर गहरा हस्तक्षेप जान पड़ता है। उन्होंने फासिस्टवाद के चेहरे और राजनीति के घिनौनेपन का चित्रण भी एक कविता ‘मुझे एक वैकल्पिक मनुष्य चाहिए” में किया। इसी प्रकार तीन जनें शीर्षक से सुनाई कविता में अपसंस्कृति और अमानवीयता का सजीव चित्रण किया।
वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने हमारे जीवन मूल्यों में आ रही निरंतर गिरावट, धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति और सद्भावना के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की कोशिशों को बेनकाब करने वाली कविताओं का पाठ किया। उनकी कविता ‘रंग” में कहा गया- ‘मजा आ गया, आकाश हिंदू हो गया अभी ठहरों बारिश आने दीजिए, सारी धरती मुसलमान हो जाएगी”। इसी प्रकार मातृ ऋण शीर्षक से उनकी कविता में कहा गया-‘हमने धरती को माता कहा और उसे कुभी पाक बना दिया। बूढ़ी होते ही गौ-माता को घर से बाहर निकाल दिया, कुछ बच्चे अपनी मां को खा जाते हैं भारत माता अपनी खैर मना”। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविताएं बांसुरी और शिशु शीर्षक भी सुनाई। बांसुरी कविता में उन्होंने सुनाया-भूख मिटाने के लिए कीड़ों ने बांसों में छेद कर दिए, कीड़ों को पता ही नहीं था कि वह संगीत के क्षेत्र में एक आविष्कार कर रहे हैं। अब जब भी बजाता हूं बांसुरी तो बांसों का रोना भी सुनाई देता है। गिरना कविता में उन्होंने जीवन में आ रहे आदर्श मूल्यों में गिरावट को इंगित किया। इसी प्रकार साहित्य अकादमी से समादृत पंजाबी प्रसिद्ध कवि सुरजीत पातर और हिंदी के लोकप्रिय कवि विष्णु नागर ने भी अपनी कविताओं में समाज के आज के परिदृश्य को रेखांकित किया।
लेखक से मिलिए सत्र
हरीश भादानी नुक्कड़ में लेखक से मिलिए सत्र के तहत हिंदी के जाने माने रचनाकार डॉ. जितेन्द्र भाटिया से वरिष्ठ कवि एवं व्यंग्यकार फारुक आफरीदी ने संवाद किया। भाटिया ने चीन के कथाकारों की रचनाओं के अनुवाद की चर्चा करते हुए कहा कि चीनी कथा साहित्य में लोक जीवन उभरकर सामने आता है। उन्होंने चीनी लेखक की कथा ‘आई क्यू टेस्ट” तथा अन्य कहानियों का पाठ भी किया। संवाद में यह बात उभरकर आई कि चीन का लेखन भाषा की दृष्टि से चीनी भाषा अन्य भाषाओं की अपेक्षा भारत के निकट है।
जितेन्द्र भाटिया ने आज की साहित्यिक पत्रिकाओं के संदर्भ में कहा कि एक जमाने में सारिका पत्रिका के संपादक कमलेश्वर जहां रचनाकारों की समस्त रचनाएं खुद पढ़ा करते थे और रचनाओं की अशुद्धियों पर विशेष ध्यान देते थे। वहीं वर्तमान युग में बिरले ही है जो अपनी पत्रिका में छपी रचनाओं को पढ़ते हो। भाटिया ने बताया कि वह पिछले कई वर्षों से कहानी, उपान्यास, नाटक और अनुवाद कार्य में जुटे हुए हैं। विगत छह-सात वर्षों से साहित्य के समकालीन परिदृश्यों पर पहल पत्रिका में 21वीं शताब्दी की लड़ाईयां शीर्षक से कालम लिखते रहे हैं। इसी प्रकार कथा देश के लिए भी उन्होंने ‘सोचो साथ क्या जाएगा” श्रृंखला लिखी है। उन्होंने कहा कि एक लेखक को अपनी स्वयं की कठिनाइयों को पार करना होता है। अपनी कठिनाइयों से मुक्त होकर ही वह अच्छा साहित्य रच सकता है।
जितेन्द्र भाटिया ने बताया कि वह अपने ब्लॉग में ‘कंकरीट के जंगल में गुम होते श़हर” शीर्षक से एक श्रृंखला लिख रहे हैं जिसमें शहरों के बदलते चेहरे और वहां के जनजीवन को रेखांकित करने का प्रयास होगा। उनका अनुभव था कि पिछले दस वर्षों में ढाई हजार नए शहर बस गए हैं। यह शहरी गांवों से आए हैं। यह एक प्रकार का विस्थापन है। आज दुनिया में 20 फीसद पानी की कमी है। पर्यावरण की चिंताओं से भी लेखक मुक्त नहीं रह सकता। लेखक को अपनी निगाहें समय और समाज पर निरंतर गड़ाए रखनी पड़ती है।
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शनिवार, 27 जनवरी 2018

आवारा पूंजी के वर्चस्व को चुनौती देने खड़ा हुआ समानांतर साहित्य उत्सव


जयपुर। राजस्‍थान की राजधानी जयपुर में तीन दिवसीय समानांतर साहित्य उत्सव यानी पीएलएफ का शनिवार से शुभारंभ हो गया। इस समानांतर साहित्य उत्सव का उदघाटन साहित्यकार विभूति नारायण, मैत्रेयी पुष्पा, अर्जुन देव चारण, राजेंद्र राजन, विष्णु खरे, नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई ने दीप प्रज्जवलित करके किया।
स्वागत उद्बोधन में पीएलएफ के अध्यक्ष ऋतुराज ने कहा कि यह आयोजन राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ का एक छोटा सा प्रयास है। यह पहल इस तरह की है जैसे किसी शिशु ने एक बड़ी झील पर पत्थर फेंकने की कोशिश की हो।
उन्होंने कहा कि आजकल जो लिट् फेस्ट हो रहे है, ऐसे आयोजन सिर्फ आवारा पूंजी के वर्चस्व के खेल है। पीएलएफ एक समानांतर प्रतिरोध करने की कोशिश है सत्ता और बाजार के समीकरण को चुनौती देती है। यह एक वैकल्पिक हस्तक्षेप भी है।


उन्होंने कहा कि पीएलएफ का आयोजन ख्यातनाम साहित्यकारों की बैचेनी है।
फेस्टिवल के संयोजक कृष्ण कल्पित ने कहा कि दुनिया में जो लिट् फेस्ट हो रहे हैं, वह पूंजीवाद का घिनौना चेहरा है। आवारा पूंजी, पूंजीवाद के अवशेष की तरह लिट् फेस्ट जैसे आयोजन हो रहे हैं। कल्पित ने कहा कि लिट् फेस्ट के समानांतर साहित्य उत्सव करने की पहल का उद्देश्य यह है कि भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को एक मंच मिल सके।
उन्होंने कहा कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में 90 फीसदी सत्र अंग्रेजी भाषा के होते है, और पूरी तरह से जेएलएफ का आयोजन बाजारवाद पर आधारित होता है। कल्पित ने चेताया कि अंग्रेजी का बाजार ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह है और अंग्रेजी के लेखक ट्रेडर्स के रूप में जेएलएफ में आते हैं।
वहीं इस मौके पर फेस्टिवल के मुख्य समन्वयक ईशमधु तलवार ने कहा कि यह मंच हिन्दी साहित्य का चेहरा है और पीएलएफ के जरिये एक नया आगाज़ हो रहा है।
उन्होंने कहा कि लिट् फेस्ट की तरह यहां यह कोई साहित्य का फैशन नहीं है। यहां पर सिर्फ साहित्य की वास्तविकता की बात होगी।
इस मौके पर ट्राईबल स्टूडियो की तरफ से आदिवासी कलाकारों द्वारा तैयार कलाकृतियों को स्मृति चिह्न के रूप में राजुल तिवारी और हेमंत गुप्ता ने साहित्यकारों को भेंट किया।
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