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शनिवार, 5 अप्रैल 2025

क्या सुप्रीम कोर्ट वक्फ बिल को निरस्त कर सकता है, समझें संवैधानिक प्रावधान


 क्या वक्फ संशोधन बिल असंवैधानिक है? असंवैधानिक कहने का अर्थ है कि यह देश के संविधान के अनुसार नहीं है, यानी इसमें जो बातें कही गई हैं, वह देश के कानून के विपरीत हैं. इसी बात को आधार बनाकर सांसद मोहम्मद जावेद और असदुद्दीन ओवैसी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं. अब सवाल यह है कि जिस विधेयक को संसद ने पूरी संवैधानिक व्यवस्था के साथ संसद से पास किया है, क्या सुप्रीम कोर्ट उस पर स्टे करेगा? 

वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को संसद ने पास कर दिया है. इस बिल को लोकसभा ने 2 अप्रैल और राज्यसभा ने 3 अप्रैल को पारित किया. यह विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करके कानून का रूप ले लेगा. विधेयक के कानून बनने की जो प्रक्रिया होती है, उसपर यह विधेयक पूरी तरह से सटीक बैठता है, बावजूद इसके इसे असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है. इस परिस्थिति में देशवासियों के मन में यह सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस बिल को निरस्त कर सकता है? इस सवाल  का जवाब हमारा संविधान देता है. 
कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के अधिकारों पर क्या कहता है संविधान 
भारतीय लोकतंत्र जिन स्तंभों पर खड़ा है वे हैं-कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका. भारत का संविधान लिखित है और उसमें इन तीनों स्तंभों की भूमिका और अधिकार स्पष्ट तौर पर बताए गए हैं. संविधान ने तीनों स्तंभों के कार्यों का बंटवारा किया है और यह भी सुनिश्चित किया है कि तीनों स्तंभों में कभी टकराव ना हो और ऐसा भी ना हो कि किसी की शक्ति अत्यधिक और किसी की कम हो जाए. संविधान ने तीनों स्तंभों को जो कार्य दिए हैं वे इस प्रकार हैं-
विधायिका यानी वह संस्था जो कानून बनाती है
कार्यपालिका यानी वह संस्था जो कानून को देश में लागू करती है
न्यायपालिका इस बात की निगरानी करती है कि जो कानून बने हैं, उनका सही से पालन हो रहा है या नहीं

देश के इन तीनों स्तंभों के बीच शक्ति का संतुलन भी बनाया गया है. विधायिका कार्यपालिका को प्रश्न पूछकर नियंत्रित करती है और उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकती है. जबकि कार्यपालिका विधायिका को भंग करने की क्षमता रखती है. वहीं न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा करता है, ताकि संविधान के अनुसार काम हो.
वक्फ बिल के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?
वक्फ बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो याचिकाएं दाखिल की गई हैं, उसमें संविधान यानी देश के कानून के अनुसार कोई गलती नहीं हुई है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का काम ही है संविधान की व्याख्या करना. अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट उस बिल के साथ क्या करेगा, जिसे संसद पास कर चुकी है? इस संबंध में विधायी मामलों के जानकार अधोध्या नाथ मिश्रा ने बताया कि संविधान में यह व्यवस्था है कि ना तो सुप्रीम कोर्ट और ना ही संसद यानी ना तो न्यायपालिका और ना ही विधायिका एक दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप करते हैं. इस लिहाज से जब किसी विधेयक को संसद पास कर चुकी है, तो सुप्रीम कोर्ट उसे निरस्त कर देगा, यह संभव नहीं है. हां, यह हो सकता है कि बिल के किसी खास क्लॉज यानी कंडिका पर आपत्ति हो, तो सुप्रीम कोर्ट उसे देख सकता है और अगर उसे उचित लगे तो वह उसपर कुछ सुझाव विधायिका को दे सकता है. लेकिन यह सुझाव होगा, जजमेंट नहीं. यह संभव नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट वक्फ बिल पर स्टे लगा दे, क्योंकि वक्फ बिल को पूरी तरह संविधान सम्मत प्रक्रियाओं के तहत लाया गया है. अगस्त 2024 में यह बिल संसद में पेश किया गया, उसके बाद इसे विस्तृत चर्चा के लिए जेपीसी के पास भेजा गया. जेपीसी ने इस बिल पर कई तरह के सुझावों पर गौर किया और फिर उसमें बदलाव भी किया. जेपीसी की सिफारिशों के साथ बिल संसद में फिर आया और संसद द्वारा पास किया गया. बिल पर बहस हुई है, सभी पार्टियों को बोलने का मौका भी मिला है, इसलिए इसे पेश करने की जो व्यवस्था है वह पूरी तरह न्याय सम्मत है. 
-Legend News

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

सामाजि‍क व्यवस्थाओं के साथ ख‍िलवाड़ है समलैंगिक विवाह की बात


 समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्‍यता देने की याचिका कर रही सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपना फैसला सुना दिया है. इस पीठ के 5 में से 4 जजों ने बारी-बारी से अपना फैसला सुनाया. सबसे पहले CJI डी वाई चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में समलैंगिकों को शादी का अधिकार देने की बात पर जोर दिया.  इसके अलावा उन्‍होंने समलैंगिकों के साथ होने वाले भेदभाव को दूर करने को लेकर निर्देश भी जारी किये.

सुप्रीम कोर्ट बेंच के चारों जजों के फैसलों का लब्‍बोलुआब

- किसी भी तरह का कानून बनाने का अधिकार संसद का है, इसलिए समलैंगिक विवाह पर कानून बनाने के लिए भी वहीं विचार होना चाहिए. - सॉलिटर जनरल ने सुनवाई के दौरान कहा था कि य‍दि जरूरी हुआ तो संसद इस बारे में एक उच्‍चस्‍तरीय समिति बनाकर विचार करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील के प्रति सहमति दिखाई. - भारतीय संविधान में शादी का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन रिलेशनशिप को मान्‍यता दी गई है. इसलिए यदि कोई समलैंगिक जोड़ा अपने रिश्‍ते को किसी भी प्रकार से प्रकट करने के लिए स्‍वतंत्र है.

- बच्‍चा गोद लेने के अधिकार को लेकर CJI और जस्टिस भट्ट के बीच काफी मतांतर दिखा. CJI इसके पक्ष में थे, जबकि जस्टिस भट्ट ने इसका विरोध किया (जस्टिस भट्ट ने इसकी वजह को पढ़ने से मना कर दिया). - समलैंगिक विवाद को कानूनी मान्‍यता देने से महिलाओं पर इसके दुष्‍प्रभाव पड़ने की बात रेखांकित हुई. जस्टिस भट्ट ने कहा कि अभी घरेलू हिंसा और दहेज से जुड़े कानूनों में महिला के रूप में पत्‍नी को काफी अधिकार हैं, जो खतरे में पड़ सकते हैं. 

- समलैंगिकों के साथ किसी भी तरह के भेदभाव को दूर करने के मुद्दे पर सभी जस्टिस एकमत थे. और  CJI चंद्रचूड़ ने इसके लिए विस्‍तृत दिशा निर्देश जारी किये. 

अब बात आती है क‍ि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में गे राइट्स विशेषकर शादी के अधिकारों को लेकर विरोध क्यों कर रही थी? अगर विरोध कर रही थी तो उसके तर्क क्या थे? और उन तर्कों के आधार पर यदि समाज के पड़ने वाले प्रभाव को देखा जाए तो किस उथल-पुथल की आशंका जताई गई थी. 

पति और पत्नी के अलग-अलग राइट्स हैं, पर कैसे पता चलेगा, कौन पति-कौन पत्नी?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कुछ पॉइंट्स ऐसे रखे थे जो निश्चित तौर पर समाज में बड़े पैमाने पर समस्या का कारण बन सकते हैं. दरअसल सेम सेक्स मैरिज में यह समझना कठिन होगा कि कौन पति है तो कौन पत्नी है. इसलिए बहुत से ऐसे कानून जो महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाए गएं हैं उनपर एक्शन कैसे होगा यह सरकार के लिए चिंता का विषय है. जैसे सेम सेक्स मैरिज के बाद अगर तलाक की नौबत आती है तो कानून कैसे काम करेगा? 

विशेष वर्ग में तलाक का कानून भी सभी लोगों के लिए एक बन सकता है? ट्रांस मैरिज में पत्नी कौन होगा? गे मेरिज में कौन पत्नी होगा? गे मेरिज में कौन पत्नी होगा? इसका दूरगामी प्रभाव होगा. अभी जो कानून प्रचलन में है उसमें पत्नी गुजारा भत्ता मांग सकती है, लेकिन समलैंगिक शादियों में क्या होगा? कैसे निर्धारित होगा कौन पति है कौन पत्नी है? 

महिलाओं के अधिकारों की चर्चा करते हुए मेहता कहते रहे कि दहेज हत्या या घरेलू हिंसा के मामले जटिल हो जाएंगे.  'अगर कानून में पति या पत्नी की जगह सिर्फ स्पाउस या पर्सन कर दिया जाए, तो महिलाओं को सूर्यास्त के बाद गिरफ्तार न करने के प्रावधान कैसे लागू होंगे?'  

अनैतिक संबंधों में छूट की होगी डिमांड 
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक बहुत सेंसिटिव मुद्दे को उठाया था.  उन्होंने सेम सेक्स मैरिज को मौलिक अधिकार बताए जाने को बेहद जटिल बताया था. मेहता ने कहा था कि सेम सेक्स मैरिज को मान्यता के दावे को मौलिक अधिकार समझकर अगर सही माना जाए तो भविष्य में और बहुत से नैसर्गिक अधिकारों की डिमांड शुरू हो जाएगी.समाज में नजदीकी वर्जित संबंध जैसे नियम परंपराएं मानव समाज की ही बनाई हुई हैं. मेहता कहते हैं कि सेक्सुअल ओरिएंटेशन और पसंद के अधिकार के दावे शुरू हो सकते हैं.  दरअसल पसंद के अधिकार और सेक्सुअल ओरिएंटेशन के मामले को याचिकाकर्ता ने उठाया है और सेम सेक्स में इसी आधार पर शादी की मान्यता की गुहार लगाई है.  मेहता का कहना है कि इसी आधार पर आने वाले समय में तो वर्जित संबंधों में रिलेशनशिप के मामलों को पसंद का मामला बताया जाएगा.  और सेक्सुअल ओरिएंटेशन का मामला बताकर राइट्स की मांग की जाएगी.

समाज सुधार का हक समाज को है 
देश में समाज सुधार का इतिहास बहुत पुराना है. सती प्रथा और विधवा विवाह के लिए बंगाल में जबरदस्त अभियान चला. बाल विवाह की उम्र बढ़ाने की बात हो या कोई बड़े सामाजिक बदलाव लाने वाले हर कदम पर बड़े पैमाने पर समाज में बहस हुई है. विधवा पुनर्विवाह के मुद्दे पर बंगाल में खूब बवाल हुआ था. महिलाओं की शादी की उम्र घटाने और एज ऑफ कंसेंट बिल को लेकर बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले अलग-अलग खेमों में बंट गए.  बंगाल में राधाकांत देब और महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक, स्वामी विवेकानंद, श्री अरबिंदो और महात्मा गांधी चाहते थे कि विदेशी शासक भारत की जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं और हिंदू रीति-रिवाजों के बारे में कानून बनाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं मिलना चाहिए.  

इनका कहना था कि बुद्ध, आदि शंकराचार्य, गुरु नानक और ज्योतिबा फुले जैसे महान समाज सुधारकों ने अपने संदेश समाज सुधार का आगे बढ़ाया. 

समलैंगिकों की शादी को कानूनी दर्जा देने के बारे में देश में सार्वजनिक बहस कराने के लिए कोई खास कोशिश होती नहीं दिखी. LGBTQIA++ कम्युनिटी भले ही इस पर चर्चा कर रही हो, लेकिन प्रस्तावित बदलावों से जिस तरह का बड़ा असर पड़ने वाला है, उसे देखते हुए कोई बड़ी सामाजिक बहस होती चाहिए थी. जो भी चर्चा है, वह दिल्ली की कानूनी बिरादरी के एक छोटे से तबके में और इंग्लिश मीडिया में दिख रही है. भारत लोकतांत्रिक संविधान से चलता है, ऐसे में यह मानना कि इंडियन स्टेट सेम सेक्स मैरिज जैसे विषय पर फैसला करने लायक नहीं है, एक मजाक ही है. 

मनचले लोगों को बहाना मिल जाएगा 

समाज में ऐसे लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है जिनका सेक्सुअल ओरिएंटेशन कुछ समय बाद बदल जाया करता है.  तमाम राजा महाराजाओं, मुगल शासकों का इतिहास बताता है कि इन्होंने शादी भी की , उनसे बच्चे भी हुए और इनके संबंध सेम सेक्स वाले से भी रहे. बॉलीवुड हो या भारतीय राजनीति , बिजनेस वर्ल्ड हो या फैशन संसार  हर जगह इस तरह के किस्से आम हैं. बीस साल सफल वैवाहिक जीवन के बाद अगर किसी का सेक्सुअल ओरिएंटेशन बदलता है तो इसे क्या कहा जाएगा?  सेक्सुअल ओरिएंटेशन बदलने की घटनाएं बड़े लोगों में ही नहीं छोटे कस्बों और गांवों में भी देखने की मिलती है.यहां बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो दोनों तरह के संबंधों में हैं. इनमें महिलाएं और पुरुष दोनों ही शामिल हैं. तमाम ऐसी महिलाएं हैं जिनके कई बच्चे होने के बाद वो सेम सेक्स रिलेशनशिप में है.  

कानून बनाने से पहले जनता को ये फैसला करने की सुविधा देनी होगी जिससे पता लगाया जा सके कि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से विपरीत लिंग के साथ आकर्षित है या सेम सेक्स के लिय़े. इस तरह का कानूनी अधिकार मिलने से निश्चित रूप से अरबन इलीट को ही फायदा मिलने वाला है. 

- अलकनंदा स‍िंंह

 


शनिवार, 16 सितंबर 2023

जान‍िए नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के बारे में , कैसे होगा आमजन को फायदा


 नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड से सुप्रीम कोर्ट के जुड़ जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित मामलों से लेकर अदालत के आदेश और मुकदमे की तारीख तक पता चल सकेगी. यूं तो अब तक इससे देशभर की जिला अदालतें और हाइकोर्ट जुड़े थे परंतु अब इससे सुप्रीम कोर्ट भी जुड़ गया है. 

नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (NJDG) यानी राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड ने अपना पहला और महत्वपूर्ण चरण पूरा कर लिया है.

इस समय देश की 18735 से ज्यादा अदालतें इससे जुड़ चुकी हैं. मतलब, कोई भी व्यक्ति अब अदालतों की पेंडेंसी जान सकता है. अपने मुकदमों के फैसले आदि भी देखे जा सकते हैं. इस तरह यह कहा जा सकता है कि अब तक परदे के पीछे छिपी न्यायिक व्यवस्था में भी एक ऐसा पारदर्शी सिस्टम लागू हो गया है जी आमजन को संतोष प्रदान करेगा.

कैसे मिलेगा नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड का फायदा

NJDG के लागू करने से पूरी न्यायिक व्यवस्था ऑनलाइन हो गई है. अब कोई भी व्यक्ति यह जान सकता है कि देश में कितने मुकदमे लंबित हैं. वह यह भी जान सकता है कि उसके मुकदमे में क्या फैसला आया या सुनवाई के दौरान अदालत ने क्या आदेश किया है? अगली तारीख क्या पड़ी है? इसकी शुरुआत कई साल पहले हुई थी. धीरे-धीरे प्रोजेक्ट आगे बढ़ता गया और अब अपने अंतिम मुकाम तक पहुंच गया, मतलब सुप्रीम कोर्ट भी इसके दायरे में आ गया.

रूटीन के ऑर्डर का भी मिलेगा अपडेट

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ के इस फैसले की पीएम नरेंद्र मोदी ने भी सराहना की है. कल्पना यह है कि अदालती फैसले, रूटीन के ऑर्डर भी रोज के आधार पर यहां अपडेट हों. ऐसा हो भी रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जहां कहीं चूक हो रही होगी, वहां भी चीजें रफ्तार पकड़ लेंगी. क्योंकि अब किसी भी जज के लिए यह छिपाना मुश्किल होगा कि उसके मुकदमे में क्या चल रहा है? अब इसे सिस्टम के अंदर बैठा कोई भी पर्यवेक्षक देख सकेगा.

देश में कितनी अदालतों की जरूरत, यह पता चलेगा

इसके लागू होने का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अदालतों को मैप करते हुए असल में पता करना आसान हो जाएगा कि देश में असल में कितनी अदालतों की जरूरत है. मतलब जब भी केंद्र एवं राज्य सरकारें नीतिगत निर्णय लेना चाहेंगी तो उन्हें मदद मिलेगी. विश्व बैंक ने इसके शुरुआती दिनों में ही भारत के इस प्रोजेक्ट की सराहना की है. जमीन के विवाद देश में बड़ी समस्या हैं. इनके निस्तारण में काफी वक्त लगता है.

4.44 करोड़ से ज्यादा मुकदमे पेंडिंग

उन्होंने कहा, NJDG से जुड़ी वेबसाइट के माध्यम से मैं देख पा रहा हूं कि देश में इस समय 4.44 करोड़ से ज्यादा कुल मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं. इनमें सिविल के 1.10 करोड़ केस सिविल मामलों के तथा 3.33 करोड़ केस क्रिमिनल के हैं. यही वेबसाइट बता रही है कि बीते एक साल में 2.75 करोड़ मामले अदालतों में बीते एक साल से पेंडिंग हैं. इनमें दो करोड़ से ज्यादा क्रिमिनल और 66 लाख से ज्यादा सिविल केस हैं. 98771 मामले 30 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग हैं. पांच लाख से ज्यादा मामले 20 से 30 साल से पेंडिंग हैं. वेबसाइट में जितना खोजते जाएंगे तो यहां छोटी से छोटी जानकारी मिलेगी.



गुरुवार, 10 नवंबर 2022

क्‍या है छावला रेप एंड मर्डर केस, जिसके सभी आरोपी सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए ?


 10 साल पुराने 19 साल की एक युवती से बलात्कार और उसकी हत्या वाला छावला रेप एंड मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर 2022 को फैसला सुनाते हुए  तीनों आरोपियों को रेप और मर्डर के आरोप से बरी कर दिया। ज़ाहिर है कि लोग तो गुस्‍से में आने ही थे। आखिर इतने जघन्य अपराध के मामले में कोई दोषी क्‍यों नहीं पाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है, उससे पता चलता है कि इस केस की पूरी जांच में ही गलतियां हुईं और फिर सुनवाई में भी यही हाल रहा।


आइए देखते हैं कि छावला रेप एंड मर्डर केस क्या है?

9 फरवरी साल 2012, युवती अपने ऑफिस से लौट रही थी। कुतुब विहार इलाके से तीन लोगों ने उसे किडनैप कर लिया। शिकायत होने पर पश्चिम दिल्ली के छावला पुलिस स्टेशन में अपहरण का मामला दर्ज किया गया। 13 फरवरी को पुलिस ने तीन आरोपियों को अरेस्ट किया। उनकी कार जब्त की। युवती का क्षत-विक्षत शव हरियाणा में रेवाड़ी जिले के रोढाई गांव के एक खेत में मिला, ऐसा पुलिस ने बताया था।

छावला रेप मामले में ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में क्या हुआ? 

26 मई 2012 को निचली अदालत ने तीनों आरोपियों के खिलाफ किडनैपिंग, रेप, मर्डर और दूसरे अपराधों में आरोप तय किए। करीब दो साल बाद 13 फरवरी को कोर्ट ने तीनों आरोपियों को रेप और मर्डर का दोषी करार दिया। उसी साल 19 फरवरी को सुनाए गए फैसले में अदालत ने कहा था कि दोषियों पर कोई रहम नहीं की जा सकती, लिहाजा फांसी की सजा सुनाई जा रही है।

इस फैसले के खिलाफ दोषियों ने अपील की, लेकिन हाई कोर्ट ने उसी साल अगस्त में अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत से सुनाई गई फांसी की सजा सही है। उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में आया। पूरी सुनवाई के बाद 7 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यू यू ललित, जस्टिस रवींद्र भट और जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच ने आरोपियों को बरी कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए जो सवाल

कोर्ट ने कहा कि किसी भी जांच अधिकारी ने आरोपियों की टेस्ट-आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई। लिहाजा आरोपियों की शिनाख्त ठीक तरीके से तय नहीं हो सकी।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने इंडिका कार 13 फरवरी 2012 को जब्त की और कहा कि इसी कार में पीड़िता को किडनैप किया गया था, लेकिन किसी भी गवाह ने इस कार का रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं देखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीट कॉन्सटेबल्स से पूछताछ और जिरह नहीं की गई, जिससे ‘आरोपियों की गिरफ्तारी की पूरी कहानी शक के दायरे में आ गई।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन हालात में आरोपियों को अरेस्ट किया गया और कार को जब्त किया गया, उससे ‘अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गई स्टोरी पर गहरे शक पैदा होते हैं।’ कोर्ट ने कहा कि इस बात का सबूत भी साफ नहीं है कि जिस जगह पर पीड़िता का शव मिलने की बात बताई गई, वहां सबसे पहले कौन पहुंचा था।

पुलिस ने कहा था कि पीड़िता का शव रेवाड़ी जिले के गांव के एक खेत में तीन दिनों तक पड़ा रहा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शव के सड़ने के कोई संकेत नहीं मिले थे और इस बात की गुंजाइश बेहद कम है कि तीन दिनों तक खेत में खुले पड़े रहने पर भी शव को कोई न देखे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का पूरा केस ‘परिस्थितियों से जुड़े सबूत’ पर टिका था। जो सबूत पेश किए गए, उनको ‘परिस्थितियों से मिलाकर’ देखने पर साबित होता है कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का दोष साबित करने में नाकाम रहा। ‘दोष सिद्ध करने के लिए जिन परिस्थितियों का हवाला दिया जाता है, उनसे एक कंप्लीट चेन बननी चाहिए। ऐसी चेन जिससे इस नतीजे पर पहुंचने में कोई शंका न रह जाए कि अपराध आरोपियों ने ही किया था, किसी और ने नहीं। परिस्थितियों से जुड़े सबूत इस तरह कंप्लीट होने चाहिए कि आरोपियों के दोषी होने के सिवा और किसी हाइपोथेसिस की बात ही न हो पाए।’

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों और पीड़िता की डीएनए प्रोफाइलिंग और मैचिग के लिए सैंपल कलेक्शन, स्टोरेज और उसकी जांच के बारे में भी सवाल उठाए। आरोपियों और पीड़िता के सभी सैंपल जांच एजेंसी ने 14 फरवरी और 16 फरवरी 2012 को लिए थे। ये सैंपल जांच के लिए 27 फरवरी 2012 को लैबोरेटरी भेजे गए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कलेक्शन से लेकर लैबोरेटरी में भेजे जाने के बीच सैंपल ‘पुलिस स्टेशन के मालखाना में पड़े रहे। ऐसे हालात में नमूनों से छेड़छाड़ की आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता। न तो ट्रायल कोर्ट और न ही हाई कोर्ट ने इस बात की जांच की थी कि डीएनए रिपोर्ट्स के नतीजों का आधार क्या था। न ही उन्होंने यह देखा कि जांच करने वाले एक्सपर्ट ने सही तरीका अपनाया या नहीं। ऐसा कोई सबूत सामने नहीं था, लिहाजा डीएनए प्रोफाइलिंग से जुड़ी सारी रिपोर्ट संदेह के दायरे में आ गईं, खासतौर से यह देखते हुए कि जांच के लिए भेजे गए नमूनों का कलेक्शन और उनको सील करने की प्रक्रिया भी शक के दायरे में है।’

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की मदद के लिए नियुक्त की गईं वकील सोनिया माथुर ने डीएनए रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। माथुर का कहना था कि नमूनों की कलेक्शन प्रक्रिया शक के घेरे में है। उनका कहना था कि फोरेंसिक एविडेंस न तो वैज्ञानिक और न ही कानूनी रूप से साबित होता है, लिहाजा इसे आरोपियों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी सोनिया माथुर की इस राय से इत्तिफाक जताया।

पुलिस ने जो इंडिका कार जब्त की थी, उसकी सीट कवर पर मिले खून के धब्बों और सीमेन को जांच के लिए CFSL भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ब्लडस्टेन और सीमेन को जांच के लिए भेजे जाने के ब्योरे को भरोसे लायक नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि इस बात का कोई साफ सबूत नहीं है कि जब्त किए जाने के बाद से जांच के लिए CFSL भेजे जाने तक कार किसके पास थी। यह भी साफ नहीं था कि इस दौरान कार को सील किया गया था या नहीं।

अभियोजन पक्ष ने कहा था कि पीड़िता के शव से आरोपी का बाल मिला था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह दावा विश्वास करने लायक नहीं दिखता। कोर्ट ने कहा कि दावा किया जा रहा है कि बाल पीड़िता के शव से मिला, लेकिन वह शव खेत में करीब तीन दिन और तीन रात तक खुले में पड़ा था।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में हुई सुनवाई के बारे में भी काफी कुछ कहा। आइए देखते हुए कोर्ट ने क्या कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने सचाई तक पहुंचने के प्रयास नहीं किए। बेंच ने कहा कि ट्रायल के दौरान ‘कई बड़ी गलतियां’ हुई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट का सेक्शन 165 जज के सवाल पूछने के अधिकार से जुड़ा है और यह सेक्शन ट्रायल कोर्ट को इस बात का ‘असीमित अधिकार’ देता है कि वह सच तक पहुंचने के लिए सुनवाई के किसी भी चरण में गवाहों से कोई भी सवाल पूछ सकता है। बेंच ने कहा, ‘कई फैसलों में यह बात कही जा चुकी है कि जज से चुपचाप अंपायरिंग करने की अपेक्षा नहीं की जाती है। इसके बजाय यह उम्मीद की जाती है कि जज ट्रायल में सक्रियता दिखाएंगे और सही नतीजे पर पहुंचने के लिए गवाहों से सवाल करेंगे।’

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की गिरफ्तारी से लेकर सैंपल कलेक्शन सहित पूरी जांच प्रक्रिया में गलतियां पाईं। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में हुए ट्रायल पर भी सवाल उठाए। आखिर में इस साल 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों से ठीक से जिरह नहीं की गई थी और आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई के उनके अधिकार से वंचित रखा गया।

कुलमिलाकर देश में कानून का राज स्‍थापित करने का सपना हमें बहुत दूर दिखाई देता है क्‍योंकि न्‍याय की आस को धूमिल करने की उतनी ही दोषी हैं जितनी कि पुलिस कार्यवाही।  है ना कमाल की बात आरोपियों को बचने का हरसंभव प्रयास करती दिखती ये संस्‍थाऐं पूरे सिस्‍टम का मखौल उड़ा रही हैं और हम अब भी चुप हैं।

Compiled: Legend News 

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

बदलाव की बेहद अच्छी शुरुआत हैं सुप्रीम कोर्ट के ये दो न‍िर्णय…


 पूरे देश में अपराध संबंधी आंकड़े जुटाने वाली एजेंसी एनसीआरबी के आंकड़े देखकर तो कभी-कभी ऐसा लगता है क‍ि भारत एक झगड़ालू देश है परंतु अब इन्हीं आंकड़ों को कम करने के ल‍िए सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में द‍िए गए दो न‍िर्णयों से बड़ी राहत म‍िलने वाली है।

कानूनी पचड़ेबाजी में पड़े व्यक्त‍ि के ल‍िए न्याय की अंत‍िम आस सुप्रीम कोर्ट होता है, सो उसके ये न‍िर्णय न‍िश्च‍ित ही पूरे देश को बड़ा लाभ पहुंचाने वाले हैं।

पहला मामला ये है
कल सुप्रीम कोर्ट ने दीवानी मुकद्दमों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण आदेश द‍िया क‍ि यद‍ि ‘वादी पक्ष’ रज़ामंदी से ‘आउट ऑफ कोर्ट’ सेटलमेंट करने यान‍ि केस को आपसी सहमत‍ि से न‍िपटाने का इच्छुक हो तो उसकी कोर्ट फीस पूरी की पूरी वापस कर दी जाएगी। चूंक‍ि स‍िव‍िल मुकद्दमों की फीस ‘कोर्ट फीस मुकद्दमा वैल्यू एक्ट” के ह‍िसाब से तय की जाती है इसलिए कोर्ट इसे 10% से लेकर 25% तक जमा कराता है लेकिन दशकों तक घ‍िसटने वाले दीवानी मुकद्दमे की कोर्ट फीस कभी वापस नहीं म‍िलती थी।
इस फैसले से जहां ‘आउट ऑफ कोर्ट’ सेटलमेंट करने को प्रोत्साहन म‍िलेगा वहीं बेवजह सालों साल घ‍िसटने वाले और कोर्ट पर बोझ बढ़ाने वाले ऐसे मामलों की संख्या में कमी भी आएगी। ज़ाह‍िर है क‍ि ये एक न‍िर्णय कोर्ट्स का क‍ितना बोझ कम करेगा, इसका स‍िर्फ अंदाज़ा लगाकर ही बेहद खुशी हो रही है।

दूसरा मामला
क‍िसी भी समाज और खासकर लोकतांत्र‍िक समाज में स्वयंसेवी संगठन यान‍ि एनजीओ का बहुत योगदान होता है परंतु जब यही योगदान गलत कारणों से संदेहों और स्वार्थ में घ‍िरकर कानून का दुरुपयोग करने लगे तो वही होता है जो सुप्रीम कोर्ट ने क‍िया। खबर हालांक‍ि 5 द‍िन पुरानी है परंतु है सबक देने वाली क‍ि एक एनजीओ सुराज़ इंडिया ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में लगातार 64 जनहित याच‍िकायें दाख‍िल कीं और सभी बेबुन‍ियाद व‍िषयों पर।

5 दिसम्बर 2017 को पहली सुनवाई जस्ट‍िस खेहर ने की थी ज‍िसमें उनपर 25 लाख रुपये का ज़ुर्माना लगाया गया था। इसका पटाक्षेप अब 17 फरवरी 2021 को तब हुआ, जब तीन घंटे की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने NGO के अध्यक्ष राजीव दह‍िया पर न केवल 25 लाख का जुर्माना लगा रहने द‍िया बल्क‍ि उन्हें आजीवन कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने से भी उन्हें बैन कर दिया। इतना ही नहीं ज़ुर्माना न भरने के कारण दह‍िया के ख‍िलाफ ज़मानती वारंट भी जारी क‍िया।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने इस सुराज इंडिया ट्रस्ट बनाम भारत संघ मामले में NGO के अध्यक्ष राजीव दह‍िया से कहा क‍ि “आप हमारा वक्त बर्बाद मत कीजिए। आप रुकावट पैदा कर रहे हैं। आपने कोर्ट में 64 जनहित याचिकाएं दाखिल कींं। कोर्ट के पास और भी काम हैं। लोग जेल में हैं। क्या सड़क हादसों में मारे गए लोग इंसाफ के हकदार नही हैं, महिलाओं, बच्चों और गरीब लोगों का क्या जो इंसाफ के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, महिलाएं और बच्चे मोटर वाहन क्लेम का इंतजार कर रहे हैं।

ये एक बड़ा सबक है उन संस्थाओं और व्यक्त‍ियों के ल‍िए जो अपनी स्वार्थपूर्त‍ि के ल‍िए सुप्रीम कोर्ट को याच‍िकाओं से पाटे जा रहे हैं। सोचने वाली बात है क‍ि जहां प्रत‍िद‍िन सैकड़ों केस सुनवाई और न‍िर्णय की आस में सुप्रीम कोर्ट की ओर देखते हों वहीं एक के बाद एक लगातार 64 याच‍िकाएं आख‍िर क्यों और क‍िस मानस‍िकता के तहत दाख‍िल की गईं।

न‍िश्च‍ित ही सुप्रीम कोर्ट के उक्त दोनों न‍िर्णय कोर्ट की कार्यप्रणाली और लंब‍ित मुकद्दमों के ल‍िए अच्छी ‘शुरुआत’ कहा जा सकता परंतु अभी स‍िर्फ शुरुआत है। आम आदमी को समय से न्याय अब भी टेढ़ी खीर है, ज‍िस पर खरा उतरने के ल‍िए कई मील के पत्थर पार करने होंगे।

- अलकनंदा स‍िंंह 

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

बेनकाब हो रही है... आइने के दूसरी ओर वाली सूरत

 जो आइने के सामने खड़े होकर अपनी ही सूरत देखने के आदी होते हैं, वे भूल जाते हैं क‍ि दूसरी ओर का नज़ारा उन्हें भी उतना ही नंगा करके द‍िखा रहा होता है और फ‍िलहाल कृष‍िकानूनों को रद्द करने पर अड़े क‍िसान संगठन इसी स्थ‍ित‍ि में आ पहुंचे हैं क्योंक‍ि कमेटी के सामने पेश ना होने की बात ' न‍िकाल ' कर वे अपने ही बुने जाल में जा फंसे हैं। 


फ‍िलहाल तो देश में अध्यादेश के माध्यम से लाए गए तीनों कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगा दी है और एक कमेटी का गठन करने का आदेश दिया है। इससे पहले कोर्ट ने कमेटी के पास न जाने की बात पर किसानों को फटकार लगाई है।  इससे त‍िलम‍िलाए क‍िसान संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट को ही चेतावनी देते हुए कहा है क‍ि सुप्रीम कोर्ट के रोक का कोई फायदा नहीं है क्योंकि यह सरकार का एक तरीका है कि हमारा आंदोलन बंद हो जाए। यह सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है यह सरकार का काम था, संसद का काम था और संसद इसे वापस ले। जब तक संसद में ये वापस नहीं होंगे हमारा संघर्ष जारी रहेगा। 

बहरहाल लोकतंत्र‍ के नाम पर 45 द‍िन से द‍िल्ली-एनसीआर की सीमाओं को रोक अराजकता का ''शाहीन बाग पैटर्न'' अब अपने सचों को स्वयं खोलने लगा है।   

अपने मन मुताब‍िक स्वत: संज्ञान लेने का अध‍िकार रखने वाली सुप्रीम कोर्ट ने फ‍िलहाल तो उन रास्तों को खोल द‍िया जो क‍ि देश की कानून व्यवस्था को चुनौती देने के ल‍िए आगे भी अख़्त‍ियार क‍िये जा सकेंगे। 

क‍िसान आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कल जो कुछ कहा, वह संवैधान‍िक संस्था व लोकतंत्र का अच्छा खासा अपमान है जो चुन‍िंदा संगठनों की हठधर्म‍िता को और बढ़ावा देगा क्योंक‍ि इससे पहले भी शाहीन बाग के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने ''वार्ताकार'' भेजने वाला ऐसा ही कदम उठाया था ज‍िसकी पर‍िणत‍ि द‍िल्ली-दंगों के रूप में देश ने भोगी।  

कृष‍ि-कानूनों को संसद में पेश करते समय जो व‍िपक्षी दल  गैर हाज़‍िर रहे और ''मुद्दाव‍िहीन'' होने की अपनी कमजोरी व तड़प को लोकसभा स्पीकर के सामने ब‍िल की कॉपी फाड़कर व संसद भवन के अहाते में भूख हड़ताल पर बैठकर ढंक रहे थे, वे ही कानून पार‍ित होते ही अब अपनी इसी कमजोरी व तड़प को द‍िल्ली की सीमाओं पर ज़ाह‍िर कर रहे हैं, अब वे अराजकता को हथ‍ियार बना रहे हैं, व‍ह भी तब जबक‍ि कोरोना से देश लड़ भी रहा है और बैक्सीन के ज़र‍िए पूरी दुन‍िया में ख्यात‍ि भी कमा रहा है।  

एक और तथ्य व‍िचारणीय है क‍ि सुप्रीम कोर्ट ने क‍िसान संगठनों से  ''आंदोलन में बुजुर्गों, बच्चों व मह‍िलाओं पर उपस्थ‍ित‍ि क्यों'' पर कोई सवाल ही क्यों नहीं क‍िया । यद‍ि इस एक सवाल पर कोर्ट गंभीर होकर सवाल उठाता तो तमाम परतें खुदबखुद खुल जातीं। वो चाहता तो स्वत: संज्ञान लेकर समाचारों के आधार पर ही बहुत कुछ पूछ सकता था, क‍ि आख‍िर ज‍िन ' गरीब' क‍िसानों को कानूनों से खतरा है, वे इस ''5 स्टार सुवि‍धा वाले टेंट-ब‍िरयानी-काजूबादम का हलवा-24 घंटे का लंगर'' वाला आंदोलन आख‍िर अफोर्ड क‍िस सोर्स के माध्यम से कर पा रहे हैं। 

कई सच बहुत कड़वे हैं बशर्ते सुप्रीम कोर्ट खोलने पर आए तो...।   

इसी बात पर न‍िज़ाम रामपुरी का शेर देख‍िए क‍ि -

अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो, 

और ये भी देखते हैं कोई देखता न हो।  

- अलकनंदा स‍िंंह 


शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

My Lord, आप भी सोचिए कि मॉब लिंचिंग पर कानून की जरूरत ही क्‍यों पड़ी ?

सुप्रीम कोर्ट अकसर गंभीर मामलों पर ”स्‍वत: संज्ञान” लेता रहता है मगर आपने कभी सुना है कि उसने न्‍यायव्‍यवस्‍था के भीतर पनप चुके दलदल की बावत स्‍वत: संज्ञान लिया हो।
मुकद्दमों के अंबार, तारीख पर तारीख, विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा, अपीलों के चक्रव्‍यूह से जूझते आम आदमी की व्‍यथा पर उसने कभी स्‍वत: संज्ञान लिया हो। ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आता। कभी सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश क्‍यों नहीं दिया कि इस ”निश्‍चित समय” में ” इतने मुकद्दमे” हर हाल में निपटा ही दिये जाएं और नहीं निपटाने पर कोर्ट के सम्‍माननीय न्‍यायाधिकारियों को ”ठोस कारण बजाने के लिए तैयार” रहना होगा…या सुप्रीम कोर्ट ने कभी इस बावत स्‍वत: संज्ञान लिया कि क्‍यों उसके आदेश ज़मीन पर नहीं उतर पाते, क्‍यों वे सिर्फ बड़े लोगों और सरकारों द्वारा ”आड़” लेने के काम आते हैं।
अपनी इस ”स्‍वत:संज्ञानी” प्रवृत्‍ति की ओर सुप्रीम कोर्ट ने कभी नहीं सोचा, वरना जिस मॉब लिंचिंग के लिए वह सरकारों से कानून बनाने को कह रहा है, वह और कुछ नहीं स्‍वयं न्‍यायव्‍यवस्‍था के भीतर पैदा हो चुकी सड़ांध ही है जिसने कानून के राज पर से विश्‍वास हटा दिया है और लोग भीड़तंत्र के ज़रिए अपना फैसला स्‍वयं करने लगे हैं।
भीड़ में इकठ्ठे हुए लोग अब अपना आक्रोश दबा नहीं पा रहे बल्‍कि निकाल रहे हैं, कानूनों के अंबार में उन्हें न्‍याय की आशा अपने लिए कहीं दिखाई ही नहीं देती। जेलों में बढ़ती भीड़ न्‍याय व्‍यवस्‍था को अपने भीतर झांकने की चेतावनी देती रही है मगर इसे अनसुना ही किया जाता रहा। काश! इस अराजक स्‍थिति की ओर कभी सुप्रीम कोर्ट ने स्‍वत: संज्ञान लिया होता तो लोगों में आशा बंधती कि निश्‍चित समय में उन्‍हें न्‍याय मिल जाएगा और अपराधी को सजा।
कल जब सुप्रीमकोर्ट मॉब लिंचिंग पर अपने कथित ”कड़े-रुख” से सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा था, ठीक उसी समय बिहार के बेगूसराय में भीड़ ने चार हथियारबंद अपराधियों को उनके किये की सजा दे भी दी। ना तारीख… ना गवाह और फैसला ऑन द स्‍पॉट। यहां भीड़ ने उन चार में से दो को तो पीट-पीट कर ही मार डाला, तीसरे को पुलिस बचाकर ले गई और चौथा फरार हो गया। ये चारों बदमाश दो मोटरसाइकिलों पर हथियार लहराते हुए एक छात्रा को खोजते-खोजते न सिर्फ स्‍कूल तक जा पहुंचे बल्‍कि टीचर की कनपटी पर कट्टा रखकर धमकाने लगे। यह माज़रा देख बच्‍चों ने शोर मचाया तो पास ही खेतों में काम कर रही मजदूर-किसान महिलायें आईं और बदमाशों को घेर लिया। फिर पुरुषों द्वारा बदमाशों की पिटाई कर उन्‍हें उनके अंजाम तक पहुंचा दिया गया।
अब करते रहिये मॉब लिंचिंग पर बहस दर बहस, तलाशते रहिए भीड़ में से उन 8-10 लोगों को और ढूंढ़ते रहिए गवाह। अगर कानून बनाना ही है तो मॉब लिंचिंग से पहले स्‍वयं न्‍यायव्‍यवस्‍था के ”अलंबरदारों” को अपने लिए बनाना होगा ताकि आमजन में यह विश्‍वास जाग सके कि कोर्ट आधी रात को सिर्फ ”पहुंच वालों” के लिए ही नहीं खुलतीं बल्‍कि उन आमजनों के मामले निपटाने को भी गंभीरता से निपटाती हैं जो सालोंसाल कोर्ट-वकील-गवाह-तारीख-फैसला और फिर से अपील-तारीख-फैसला में ज़िंदगी जाया कर देते हैं। कई बार तो पीढ़ियां हो जाती हैं मगर न्‍याय नहीं मिलता, विचाराधीन रहते हुए ही जेलों में ही मर-खप जाते हैं।
यहां भीड़ के इस वहशियाने तरीके को जायज नहीं ठहरा जा सकता मगर आखिर ये अराजक स्थिति आई कैसे कि कानून पर विश्‍वास की बजाय लोग स्‍वयं फैसला करने लगे हैं। उन्‍हें कोर्ट के चक्रव्‍यूह से ज्‍यादा आसान लग रहा है भीड़ बनकर मामले को ‘निपटाना’। दरअसल जबतक हम समस्‍या की जड़ तक नहीं पहुंचेंगे तब तक इसके लिए कितने भी कानून बना लिए जायें, कुछ भी हासिल नहीं होने वाला क्‍योंकि कानून बना दिये जाने के बाद भी न्‍याय के लिए आना तो कोर्ट की शरण में ही पड़ेगा ना।
कोर्ट तक पहुंचने की लंबी प्रक्रिया और उसमें भी अगर सुबूत ना मिलें (या तलाशे ना जायें) तो अपराधी के हित में फैसला आने जैसी स्‍थितियां ही भीड़ को कानून अपने हाथ में लेने का कारक बनीं हैं।
हकीकत तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट की आत्‍ममुग्‍धता उसे न्‍याय व्‍यवस्‍था की इस सड़ांध को देखने ही नहीं दे रही। ये आत्‍ममुग्‍धता ही है कि सरकारों के खिलाफ आदेश पर आदेश देने में तो सुप्रीम कोर्ट रातदिन एक किये है मगर चरमराई न्‍याय व्‍यवस्‍था उसे दिखाई नहीं देती, और अब यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश आदेश सरकारी फाइलों में तो रहते हैं, ज़मीन पर दिखाई नहीं देते।
-अलकनंदा सिंह

बुधवार, 8 अगस्त 2018

सुप्रीम कोर्ट दुखी है…

सुप्रीम कोर्ट दुखी है…मुज़फ्फ़रपुर शेल्‍टर होम कांड के बाद देवरिया से आई भयानक खबर से त्रस्‍त है वह… कि देशभर में यह क्या हो रहा है, लेफ्ट, राइट और सेंटर…सब जगह रेप हो रहा है, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार हर छह घंटे में एक लड़की का रेप हो रहा है। देशभर में प्रति वर्ष 38 हजार से ज्यादा रेप हो रहे हैं। देश में सबसे ज्यादा रेप मध्य प्रदेश में हो रहे हैं, दूसरा नंबर यूपी का है…आदि-आदि।
तो आज बात इस पर होनी चाहिए कि आखिर क्‍यों जरूरत पड़ी शेल्‍टर होम्स की, क्‍यों शेल्‍टर होम्स जैसी सरकारी या सरकार से सहायता प्राप्‍त व्‍यवस्‍थाएं इतनी बदहाल हैं कि हालात की मारी अबलाओं को आश्रय की जगह नर्क भोगने पर मजबूर होना पड़ता है। यहां पहुंचने वाली लड़कियां चाहे जवान हों, या नन्‍हीं बच्‍चियां, किशोरवय हों या अधेड़ महिलाएं, और यहां तक कि वृद्धाएं ही क्‍यों न हों, सभी आहत होती हैं। शारीरिक बल के साथ इनका आत्‍मबल भी काफी हद तक टूट जाता है। धन पास नहीं होता और अपनों से बेज़ार होती हैं। आखिर वे सब इस दशा तक पहुंचती कैसे हैं।
कहने को तो घर वालों का दुर्व्‍यवहार पहला कारण बताया जाता है मगर इस दुव्‍यर्वहार की जड़ों में जायें तो समाज की ढहती व्‍यवस्‍थाएं असली वजह हैं।
वृद्धाश्रमों की तरह ही शेल्‍टर होम खोलने की जरूरत तब पड़ी जब समाज ने अपना दायित्‍व निभाना छोड़ दिया। समाज की संरचना का औचित्‍य ही यदि पीछे छूटने लगे तो ऐसी स्‍थितियां पैदा होना स्‍वाभाविक है। समाज किसी एक व्‍यक्‍ति का नाम नहीं, बल्‍कि समूह में, समूह के लिए, समूह के द्वारा स्‍थापित कुछ ऐसे मानदंड हैं जो सबके लिए एक जैसे हैं। समाज की एक भी कड़ी कमजोर पड़ते ही सारी व्‍यवस्‍थाएं ध्‍वस्‍त हो जाती हैं। फिर ये कमजोर कड़ी ही शेल्‍टर होम और वृद्धाश्रमों को जन्‍म देती हैं। यदि समाज अपनी जिम्‍मेदारी निभाता तो शेल्‍टर होम बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। ज़रा सोचिए कि क्‍योंकर कोई भी अपनों को छोड़कर आएगा। मानसिक दिव्‍यांग महिलायें हों, किसी के प्‍यार में पड़कर घर छोड़ देने वाली लड़कियां हों या परिजनों की मार से बचने को घर से भागे लड़के हों।
इन सभी के साथ एक बात समान है कि अपनों से मिली ‘अनदेखी’ ने उन्‍हें सरकारी अथवा गैर सरकारी टुकड़ों पर पलने को विवश कर दिया जिसका फायदा संस्‍था के संचालकों ने उठाया क्‍योंकि सरकारी व्‍यवस्‍थाएं उस अंधी सुरंगों की तरह हैं जहां घुसने के बाद वापसी का कोई रास्‍ता होता ही नहीं। यदि होता भी है तो वो इतना संकरा और दूरूह होता है कि उसमें से निकल पाना, हर किसी के बस की बात नहीं होती।
इसके लिए लंबी व जटिल कानूनी प्रक्रिया ही असली जिम्‍मेदार है। हर कथित समाजसेवा के लिए निवाला बांटने वाली हमारे सरकारें कभी यह देखना ही नहीं चाहतीं कि किसी महिला का पहला निष्‍कासन भले ही ”सामाजिक निष्‍क्रियता” के चलते उसके घर से होता हो मगर पूरी तरह हताश व निराश वह सरकारी प्रक्रिया के कारण ही होती हैं। सरकारी अमले से लेकर कोर्ट-कचहरी तक उसे ऐसी मानसिक व शारीरिक यातनाएं देते हैं कि उसके पास उनसे समझौता करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। ज़रा-ज़रा सी बात पर आधी रात को प्रभावशाली लोगों की सुनवाई करने वाले न्‍यायाधीश महिलाओं के साथ हो रहे अत्‍याचार पर पानी सिर के ऊपर आने का इंतज़ार करते हैं। समाज की तरह ही इन माननीयों के पास तमाम बहाने हैं। सरकारों को इस मामले में लापरवाही के लिए फटकार लगाने वाली न्‍याय व्‍यवस्‍था ”न्‍याय में देरी के लिए” अपनी ओर से कोई कदम नहीं उठा रहीं। इसके लिए वह भी सरकार का मुंह देखती है। सरकार से न्‍यायधीशों के हितों का टकराव अब कोई नई बात नहीं रह गई।
नतीजा ये कि निराश्रितों को उनके घर भेजने में व्‍यवस्‍था को इतना समय लग जाता है कि तब तक कोई सेक्‍स रैकेट संचालक, कोई मानव तस्‍करी में लिप्‍त गिरोह उन्‍हें अपना शिकार बनाने में कामयाब हो जाता है।
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि आधी आबादी को घर से बेघर करने के लिए पहले परिवार और फिर आसपास का ”प्रश्‍न ना करने वाला” निष्‍क्रिय समाज तो दोषी है ही, सरकारी व्‍यवस्‍थाएं और न्‍यायपालिका की लेट-लतीफी भी उतनी ही जिम्‍मेदार है। ऐसे हर घटना का ठीकरा सरकारों के सिर फोड़ने से पहले अदालतों को अपने गिरेबां में एकबार अवश्‍य झांक लेना चाहिए।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा कल मुजफ्फरपुर शेल्‍टर होम रेप केस की सुनवाई करते हुए सरकारी व्‍यवस्‍था को लेकर की गई ‘टिप्‍प्‍णी’ पर बिल्‍कुल फिट बैठती हैं कुंवर नारायण की यह कविता-
कोई दुख,
मनुष्‍य के साहस से बड़ा नहीं,
हारा वही है,
जो लड़ा नहीं।
तो हमें पारिवार नामक संस्‍था को बनाए रखने के लिए दूसरों के दुख के भागीदार बनने वाले सामाजिक मूल्‍यों को तो पुनर्स्‍थापित करना ही होगा, साथ ही अपने आसपास भी नज़र रखनी होगी। लापरवाह केवल सरकारें ही नहीं, हम भी हैं जो अपनी आंखें मूंदकर ”अकेली महिलाओं” के साथ हुए इस अपराध के भागीदार कहे जा सकते हैं। 
-अलकनंदा सिंह

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

शोषण की नई भाषा गढ़ता 'फंसाने' का चलन और बच्‍चियां

Photo Courtsy: Google
कल अंतर्राष्‍ट्रीय बालिका दिवस पर बेटियों के लिए बहुत कुछ सुना,  देखा और पढ़ा भी। सभी कुछ बेहद भावनात्‍मक था। कल इसी बालिका  दिवस पर बच्‍चियों को सुप्रीम कोर्ट ने भी बड़ी सौगात दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने बालविवाह जैसी कुरीतियों पर प्रहार करते हुए ऐतिहासिक  निर्णय दिया कि अब नाबालिग पत्‍नी से संबंध बनाने को 'रेप' माना  जाएगा और इसमें पॉक्‍सो एक्‍ट के तहत कार्यवाही होगी।
आदेश का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि उक्‍त निर्णय देश के सभी  धर्मों, संप्रदायों और वर्गों पर समान रूप से लागू होगा। कोर्ट ने इसके  साथ ही रेप के प्रावधान आईपीसी की धारा 375 के 'अपवाद'-2 में जो  उम्र का उल्‍लेख '15 से कम नहीं' दिया गया है, को हटाकर '18 से कम  नहीं' कर दिया। इस 'अपवाद-2' में 15 वर्ष की उम्र वाली लड़की के साथ  विवाह के उपरांत यौन संबंध बनाने को 'रेप नहीं' माना गया था।

ज़ाहिर है ये 'अपवाद-2' ही उन लोगों के लिए हथियार था जो बालविवाह  को संपन्‍न कराते थे। बाल विवाह निवारण कानून की धारा 13 से प्राप्‍त  आंकड़े बताते हैं कि हर अक्षय तृतीया पर हमारे देश में हजारों बाल  विवाह होते हैं, जिसके बाद कम उम्र की दुल्‍हनें यानि बच्‍चियों को  यौनदासी बनने पर विवश किया जाता है।
हम सभी जानते हैं कि दंड के बिना कोई भी कुरीति से जूझना आसान  नहीं होता है क्‍योंकि यह समाज में घुन की तरह समाई हुई है।  ऐसे में  यह ऐतिहासिक फैसला इससे निपटने के लिए बड़ा हथियार साबित  होगा। बच्‍चियों के हक में इसके दूरगामी परिणाम भी अच्‍छे होंगे। हम  जानते हैं कि पति-पत्‍नी के बीच 'बराबरी के अलावा जीवन व व्‍यक्‍तिगत  आजादी का अधिकार' देने वाले कानून भी हैं मगर विवाहित नाबालिगों  के साथ ज्‍यादती भी तो कम नहीं हैं।

बच्‍चियों के शारीरिक व मानसिक विकास की धज्‍जियां उड़ाई जाती रही  हैं, और यह सिर्फ इसलिए होता रहा क्‍योंकि सरकारें विवाहोपरांत संबंध  को परिभाषित करते हुए रेप की धारा में 'अपवाद-2' को जोड़कर  बालविवाह बंद करने का फौरी ढकोसला करती रहीं और बच्‍चियां इनकी  भेंट चढ़ती रहीं। इतना ही नहीं, यौन संबंध बनाने को सहमति की उम्र  भी 15 से बढ़ाकर 18 तब की गई, जब निर्भया केस हुआ।   

इंडिपेंडेंट थॉट नामक संगठन की याचिका पर दिए गए इस ऐतिहासिक   फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्‍यवस्‍था दी है कि 18 वर्ष से कम उम्र की  पत्‍नी के साथ सेक्‍स 'रेप' ही होगा और लड़की की शिकायत पर पुलिस  रेप का केस दर्ज कर सकती है।

कोर्ट के आदेश की आखिरी लाइन ''लड़की की शिकायत मिलने पर  पुलिस रेप का केस दर्ज कर सकती है'' बस यही आखिरी लाइन कोर्ट के  फैसले की इस नई व्‍यवस्‍था के दुरुपयोग की पूरी-पूरी संभावना पैदा  करती है। मेरी आशंका उस आपराधिक मानसिकता को लेकर है जो हर  कानून को मानने से पहले उसके दुरुपयोग के बारे में पहले ही अपने  आंकड़े बैठा लेती है।

दहेजविरोधी कानून, बलात्‍कार विरोधी कानून, पॉक्‍सो, यौन शोषण की  धाराएं किस कदर मजाक का विषय बन गए हैं, इसके उदाहरण हर रोज  बढ़ते जा रहे हैं। अनेक निरपराध परिवार जेल में सिर्फ इन कानूनों के  दुरुपयोग की सजा भुगत रहे हैं। अब महिला-पुरुष के बीच स्‍वाभाविक  संबंध भी आशंकाओं से घिरते जा रहे हैं। इन सभी कानूनों को अब  महिलाऐं भी ब्‍लैकमेलिंग के लिए खूब प्रयोग करने लगी हैं।

कार्यस्‍थल पर महिला कर्मचारी हों या घरों में काम करने वाली मेड, मन  मुताबिक शादी न होने पर 'बहू' द्वारा दहेज मांगने का आरोप लगाने का  चलन हो या अपनी बच्‍ची या बच्‍चे को आगे कर पॉक्‍सो के तहत  'फंसाने' का चलन। इन सबका दुरुपयोग जमकर हो रहा है मगर इन  सामाजिक-उच्‍छृंखलताओं और बदले की भावनाओं का तोड़ तो तब तक  नहीं हो सकता जब तक कि समाज के भीतर से आवाज न उठे।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इतना तो अवश्‍य होगा कि समाज  की बेहतरी और 'सच में पीड़ित' बच्‍चियों के लिए लड़ने वालों को हौसला  मिल जाएगा।

इन्‍हीं विषयों पर मैं कुछ इस तरह सोचती हूं कि-

रोज नए प्रतिमान गढ़े
रोज नया सूरज देखा
पर अब भी राहु की छाया का
भय अंतस मन से नहीं गया,
लिंगभेद का ये दानव,
अपने संग लेकर आया है-
कुछ नए राहुओं की छाया,
कुछ नई जमातें शोषण की,
कि सीख रही हैं स्‍त्रियां भी-
अब नई भाषाएं शोषण की।

-अलकनंदा सिंह

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

तीन तलाक: बात निकल चुकी है दूर तलक जाने के लिए...

आज कल मुस्लिम महिलाएं Center of debate हैं। जब से सात अक्तूबर को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिमों में जारी तीन तलाक, निकाह हलाला तथा बहुविवाह प्रथाओं का विरोध किया और लैंगिक समानता एवं धर्मनिरपेक्षता के आधार पर इन पर दोबारा गौर करने की वकालत की, तभी से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, उसके पदाध‍िकारी जफरयाब जिलानी और इस्लाम के तमाम  ठेकेदार कमर कस कर मैदान में आ डटे हैं कि आख‍िर सुप्रीम कोर्ट, विध‍ि आयोग या केंद्र सरकार की हिम्मत कैसे हुई शरियत (7वीं सदी के कानून ) के कानून में दखल देने की।

तीन तलाक के विरोधी बड़ा खम ठोंक रहे हैं कि 90 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं शरिया कानून का समर्थन करती हैं। उनका यही दावा सवाल उठा रहा है कि जब ऐसा है तो तीन तलाक के विरोध में किया गया सर्वे का रिजल्ट 92% क्यों आया। महिलाओं के प्रति होती रही ज्यादती के लिए क्यों पर्सनल बोर्ड ने अभी तक कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाए। क्यों कोर्ट को दखल देने की जरूरत पड़ी और क्यों केंद्र सरकार को बाध्य होना पड़ा वो सच बताने के लिए जिसे अभी तक पर्सनल बोर्ड ने हिजाब में रखा हुआ था।

बहस के बहाने ही सही, ये जरूरी था कि इस्लाम-शरियत तथा कुरान के जो टॉपिक्स टैबू बनाकर रखे गये, वो सबके सामने आएं। इसके लिए पहले शाहबानो प्रकरण से जो बहस तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के दब्बूपन के कारण below the carpet कर दी गई थी, वही आज केंद्र सरकार ने Center of debate बना दी है। इसके लिए सरकार या सुप्रीम कोर्ट को दोषी बताना पर्सनल लॉ बोर्ड की खुद की अहमियत कम कर देगा क्योंकि इस बार भी एक भुक्तभोगी महिला ने ही अपने लिए सुप्रीम कोर्ट में न्याय मांगा है।

ये एक अभ‍ियान है जिसकी शुरूआत तो एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के इन प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी मगर अब मुस्लिम महिला मंच ने इसके आगे की कमान संभाल ली है। बहस की सूत्रधार शायरा बानो उत्तराखंड की हैं, जिन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि उसके साथ क्रूर बर्ताव करने वाले पति ने उसे तीन बार तलाक बोल कर अपनी ज़िन्दगी से अलग कर दिया। शायरा बानो का कहना है कि पर्सनल लॉ के तहत मर्दों को हासिल तलाक-ए-बिदत यानी तीन बार तलाक कहने का हक़ महिलाओं को गैरबराबरी की स्थिति में रखने वाला है।

शायरा ने अपनी याचिका में निकाह हलाला के प्रावधान को भी चुनौती दी है। इस प्रावधान के चलते तलाक के बाद कोई महिला दोबारा अपने पति से शादी नहीं कर सकती। अपने पूर्व पति से दोबारा शादी करने के लिए उसे पहले किसी और मर्द से शादी कर तलाक लेना पड़ता है।

याचिका में मुस्लिम मर्दों को 4 महिलाओं से विवाह की इजाज़त को भी चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि ये सभी प्रावधान संविधान से हर नागरिक को मिले बराबरी और सम्मान के साथ जीने के अधिकार के खिलाफ हैं। ऐसे में मुस्लिम महिलाओं को बराबरी और सम्मान दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लीकेशन एक्ट के सेक्शन 2 को असंवैधानिक करार देना चाहिए। इस सेक्शन में इन प्रावधानों का ज़िक्र है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अनिल दवे और ए के गोयल की बेंच ने इस याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब माँगा जिस पर कानून एवं न्याय मंत्रालय ने अपने हलफनामे में लैंगिक समानता, धर्मनिरपेक्षता, अंतर्राष्ट्रीय नियमों, धार्मिक प्रथाओं और विभिन्न इस्लामी देशों में मार्शल लॉ का उल्लेख करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत को तीन तलाक और बहुविवाह के मुददे पर नए सिरे से निर्णय देना चाहिए।
जाहिर है कि सातवीं सदी के इस इस्लामी कानून को आज 21वीं सदी में भी जस का तस लागू किया जाना सिर्फ शादीशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए ही नहीं पूरे मुस्लिम समाज के लिए भी खतरनाक है।

मुस्‍ल‍िमों में ‘तीन तलाक’ की प्रथा पर बैन लगाने से जुड़े भारतीय मुस्‍ल‍िम महिला आंदोलन की मांग का यूपी की प्रथम महिला काजी ने भी समर्थन किया है। हिना जहीर नकवी ने इस प्रथा को ‘कुरान की आयतों का गलत मतलब निकाला जाना’ करार दिया है।
नकवी ने इस प्रथा पर तत्‍काल प्रभाव से बैन लगाने की मांग भी की। नकवी ने कहा कि मौखिक तौर पर तलाक देने की प्रथा का बेजां इस्‍तेमाल हुआ है। इसने मुस्‍ल‍िम महिलाओं की जिंदगी को खतरे में डाल दिया है। इससे सिर्फ तलाक को बढ़ावा मिल रहा है। यहां तक कि कुरान में इस तरह का कोई निर्देश नहीं दिया गया, जिससे मौखिक तलाक को बढ़ावा दिया जाए। यह कुरान की आयतों को गलत मतलब निकाला जाना है।’ 
गौरतलब है कि करीब 50 हजार मुस्‍ल‍िम महिलाओं व पुरुषों ने तीन तलाक की प्रथा पर बैन से जुड़ी याचिका पर दस्‍तखत किए हैं। अब इसमें राष्‍ट्रीय महिला आयोग से दखल देने की भी मांग मुस्लिम महिला मंच कर रहा है।
देखते हैं कि इस बहस और टकराव का परिणाम क्या निकलेगा, बहरहाल बात निकल चुकी है दूर तलक
जाने के लिए... 
मशहूर कव्वाल साबरी ब्रदर्स ने अमीर खुसरो के शब्दों को क्या खूब गाया है-
बहुत कठिन है डगर पनघट की...मुस्लिम महिलाओं की इस डगर की कठिनाई तो अभी शुरु हुई है, परंतु इतना भरोसा है कि न्याय अवश्यंभावी है।

- अलकनंदा सिंह