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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

खून का पानी हो जाना

''खून का पानी हो जाना'', ये एक कहावत है जिसे कभी निर्लज्जता कभी कायरता और कभी- कभी कमजोर मन से जोड़ा जाता है। चिकित्सा विज्ञान में यही खून जब पानी होने लगता है तो व्यक्ति शारीरिक व मनोवैज्ञानिक दोनों ही स्तर पर लाइलाज होने लगता है। जो भी हो, मगर इस एक वाक्य के निहितार्थ अनेक हैं। कई अर्थों में, कई संदर्भों में इसे अलग अलग मायनों के साथ प्रयोग किया जाता रहा है।

आजकल की परिस्थ‍ितियों में इसका काफी उपयोग किया जा रहा है।

सामरिक स्तर पर हमारी सेना ने बता दिया कि ''खून के पानी हो जाने'' से पहले ही यदि दुश्मन को उसी के घर में शांत बैठने के लिए बाध्य कर दिया जाए तो न केवल देश की सीमाऐं सुरक्ष‍ित रहेंगीं बल्कि देश के खून में एक रवानगी आएगी जो प्रगति के लिए, विश्व में सकारात्मक संदेश देने के लिए बेहद जरूरी है।

उरी हमले के बाद पाकिस्तान से आयातित आतंकवादियों पर भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक कर उनके तमाम लांच पैड्स को ध्वस्त किया और उन्हें धूल चटा दी। जाहिर है सेना का ''खून, खून था... पानी नहीं'' था। उसमें गर्मी थी... आतंक के खि‍लाफ एक लौ जल रही थी। सेना  चाहती थी कि यह गर्मी उन लोगों को भी महसूस हो जो हमार ज़मीं और हमारे लोगों पर बुरी नज़र रखे हैं।

''खून के पानी हो जाने'' का राजनैतिक उदाहरण भी आजकल सोशल मीडिया की शान बना हुआ है। जेडीयू के डा. अजय आलोक हों, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के संजय निरुपम हों या फिर कांग्रेस के ही युवराज राहुल गांधी क्यों न हों, सभी ने अपने अपने निर्लज्ज बयानों व भाषणों से बता दिया है कि ''खून के पानी हो जाने'' पर ही हम सीमा पर रोज-ब-रोज हो रही शहादतों का मखौल उड़ाने की बेशर्म हिम्मत कर पाते हैं। उनका अपमान कर सकते हैं।

सर्जिकल स्ट्राइक के लिए हौसला बंधाने वाले प्रधानमंत्री व रक्षा मंत्री से लेकर डीजीएमओ तक से इसके सुबूत मांग सकते हैं, ना देने पर उन्हें सैनिकों के खून की दलाली करने वाला कह सकते हैं।

बेशक इतनी बेशर्मी के लिए हिम्मत चाहिए, और वो तभी आ सकती है जब व्यक्ति का खून पानी हो गया हो, जब वह देश हित और दुश्मन के हित में फर्क कर पाने की मानसिक हालत में ही ना हो।

इनकी रगों में बह रहा खून,  निश्चित ही पानी बन चुका है जो यह महसूस नहीं कर पा रहा कि आजादी के साढ़े छह दशक बाद देश को ऐसा नेतृत्व मिला है जो पूरे विश्व में भारत को सेंटर ऑफ नेसेसिटी और सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बनाने के प्रयास में जुटा हुआ है। अब देश के पास शांति के कबूतर उड़ाने का समय नहीं है और ना हम देखेंगे, या हम देख रहे हैं, जैसे तकिया कलाम इस्तेमाल करने वाला शासन है।

अब नेतृत्व कहता है क‍ि नई पीढ़ी को विश्व का सिरमौर बनाना है... कमर कसनी होगी... और ये वही कर सकता है जो अपनी रगों में खून की गर्मी को महसूस करता हो, मगर उसकी इस श‍िद्दत को वो लोग नहीं जान सकते जो अपने खून को पानी कर चुके हों।

ये अपनी रगों में पानी लेकर चलने वाले ''वही लोग'' हैं जो कुछ अखलाकों की ''इच्छा'' के लिए गायों की हत्या पर रोष तक जाहिर नहीं करते, पयूर्षण पर्व में गोमांस की बिक्री बंद कर दिए जाने पर इसे धर्म की आजादी से जोड़ते हैं, गौमांस पार्टियों का आयोजन करते हैं, स्वयं को हिन्दू कहने में शर्म महसूसकरते हैं, हैदराबाद यूनीवर्सिटी में रोहित वेमुला द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने पर केंद्र सरकार को जिम्मेदार बताते हैं, जेएनयू में भारत के टुकड़े करने वालों को हीरो बनाने पर तुले रहते हैं तथा कश्मीर के सेपरेटिस्ट को अपना भाई बताते हैं।

ये वही लोग हैं जो अलगाववादियों द्वारा मुंह पर दरवाजा बंद करने के बावजूद उनकी चिरौरी करते हैं। राजनीति में जयचंदों की इतनी बड़ी फौज आखि‍र देश के उत्थान में क्या सहयोग कर पाएगी, अब यह बताने की कतई जरूरत नहीं।

बॉलीवुड और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे बंदों की कमी नहीं है जि‍नके शरीर में बहने वाला खून कब का पानी हो चुका है जो स्वयं को ''देशहित'' से अलहदा रखने में शान समझते हैं। कला और साहित्य के क्षेत्र से आशा की जाती है कि कम से कम इनकी ''आत्मा'' तो बाकी रहे, इन्हें दर्द समझ में आए, इनके अंदर देश के प्रति स्वाभ‍िमान जगाने की क्षमता हो मगर एक सर्जिकल स्ट्राइक और उरी हमले के शहीदों के उदाहरण ने इनकी कलई खोल दी कि बॉलीवुड का ही नहीं साहित्य का भी अपना अंडरवर्ल्ड होता है जो देश के दुश्मनों की लार पोंछता हुआ उनकी खि‍दमत में बिछ जाता है।

अवार्ड वापसी करने वाले साहित्यकारों का ''खून तो तभी पानी'' हो चुका था जब इन्होंने देश के टुकड़े करने वालों को अभ‍िव्यक्ति की आजादी के तहत अपना सपोर्ट दिया था। ऐसे में भला हम इन साहित्यकारों से उम्मीद भी कैसे करें कि इनका खून दुश्मन की हरकतों पर खौलेगा। रही बात बॉलीवुड की, तो उससे जुड़े अध‍िकांश लोगों का खून कब का पानी बन चुका है वरना चार दिन तक मीडिया इन्हें देशप्रेम याद दिलाता रहा और ये पाकिस्तान का ही राग अलापते रहे कि '' कला सरहदों में कैद नहीं की जा सकती''।

यह बॉलीवुड ही है जो कला से ज्यादा मनी लांड्रिंग और ब्लैकमनी के बारे में चिंतित रहता है और पाकिस्तानी कलाकार उनके इस काम में अच्छा ज़रिया बनते हैं तो उनके लिए देश क्या...और देश के दुश्मन क्या।
बहरहाल जिनका खून पानी हो चुका है , अब  जरूरत उनके सर्जिकल स्ट्राइक की भी है। इसे कौन करेगा और कब , बस इसी का इंतज़ार है।

- अलकनंदा सिंह



सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

Thank U नाना…आपने अंधों के शहर में आइना तो दिखाया

नाना ने आज 'कलाकार देश के सामने खटमल हैं' बोलकर जिस तरह बेबाकी से बॉलीवुड के कथ‍ित ''कलाकारों '' का सच बयान किया है, वह अंधों के शहर को आइना दिखाने जैसी बात है। मैं नाना की फिल्मों की ही नहीं बल्कि उनकी निभाई सामाजिक भूमिकाओं की भी फैन हूं मगर उनकी ये बेबाकी बॉलीवुड के कई घ‍िनौने सच सामने ला देती है। जिन कलाकारों की भूमिकाओं को हम एंज्वाय करते हैं, उनकी बेवकूफाना बातें बतातीं हैं कि उनकी फिल्मों का ''सुपरहिट तत्व'' कितना खोखला होता है। 
भारत द्वारा PoK में घुसकर आतंकियों पर Surgical Strike करने के बाद आतंकी वारदातों और आतं‍की समूहों के ख‍िलाफ एक शब्द भी नहीं बोलने वाले पाकिस्तानी एक्टर्स के उस सच को सामने ला दिया है जो बरसों से भारतीय फिल्म जगत में घुसपैठ तो कर रहा था लेकिन उसके ख‍िलाफ कोई मुखर होकर बोलता नहीं था।   गायक अभ‍िजीत भट्टाचार्य ने आवाज बुलंद की तो किसी ने उनका साथ नहीं दिया और अब पाकिस्तानी एक्टर्स व सिंगर्स की मंशा सामने आ रही है क‍ि वह बॉलीवुड तथा भारत को अपने लिए सिर्फ और सिर्फ एक मंडी समझते रहे हैं।
जहां तक मुझे जानकारी है पाकिस्तानी गायकों व कलाकारों को सिर्फ फिल्मों में ही नहीं बल्कि रियेलिटी शो में भी भारतीय फिल्म और टीवी इंडस्ट्री के ऐसे कॉकस का साथ मिला हुआ है जो भारतीय प्रतिभाओं के न सिर्फ पेट पर लात मार रहे थे बल्कि अवांछित गतिविध‍ियों में भी लिप्त हैं।
प्रसिद्ध गायक राहत फतेह अली खान इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं जिन्हें मनी लांड्रिंग केस में भारत आने से ही रोक दिया गया था।
फिल्म इंडस्ट्री के प्रोड्यूसर्स की सबसे पुरानी संस्था आईएमपीपीए ने पाकिस्तानी कलाकारों पर बॉलीवुड में काम करने की पाबंदी लगाने के बाद सलमान खान, करन जौहर, महेश भट्ट जैसों के बयान बता रहे हैं कि उनके पाकिस्तानी फेवर के पीछे सब कुछ इतना सीधा- साधा नहीं है, सच की परतें अभी और भी हैं जो पाकिस्तान से वाया दुबई यहां आ रही हैं।
ये बॉलीवुड इंवेस्टमेंट का वो अंडरवर्ल्ड है, जो अपनी लक्ष्मन रेखा में किसी कलाकार को घुसने नहीं देता, जो खेमों और कैंपों में बंटा हुआ है, उसे पाकिस्तानी कलाकार इसीलिए भाते हैं कि वो इन कैंप्स के लिए ''बेस्ट पपेट'' साबित होते हैं। जो टूरिस्ट वीजा पर आते हैं और यहां जो भी कमाते हैं, उसका खुलासा करने को बाध्य नहीं किए जाते ल‍िहाजा बॉलीवुड की ब्लैक कमाई का चक्रव्यूह बदस्तूर चलता रहता है। 
इसके ठीक विपरीत नाना पाटेकर का पत्रकारों से ये कहना कि देश पहले है, बाक़ी सब बाद में, यह बताता है कि जो देश के भीतर बैठकर देश की जड़ें कुतरने की कोश‍िश में हैं, वे चाहे हिंदुस्तानी कलाकार हों या पाकिस्तानी, अब मुखौटों में नहीं छुप पाऐंगे।
नाना पाटेकर ने कहा, "मुझे लगता है पाकिस्तान, कलाकार ये बातें बाद में, पहले मेरा देश. देश के अलावा मैं किसी को जानता नहीं और न मैं जानना चाहूंगा."
"हम कलाकार देश के सामने खटमल की तरह इतने से हैं, हमारी क़ीमत कोई नहीं है, पहले देश है."
पाकिस्तानी कलाकारों के मुद्दे पर बॉलीवुड में राय बंटी होने पर उन्होंने कहा, "बॉलीवुड क्या कहता है मैं नहीं जानता, मैंने ढाई साल सेना में गुज़ारे हैं तो मुझे मालूम है कि हमारे जो जवान हैं उनसे बड़ा हीरो कोई हो नहीं सकता दुनिया में."
उन्होंने कहा, "हमारे असली हीरो सेना के जवान हैं, हम तो बहुत मामूली और नकली लोग हैं. हम जो बोलते हैं .उस पर ध्यान मत दो."
पाटेकर ने पत्रकारों से कहा, "तुम्हें समझ में आया मैं किनके बारे में बोल रहा हूँ तो मैं उन्हीं के बारे में बोल रहा हूँ."
उन्होंने कहा, "हम जो पटर-पटर करते हैं उस पर ध्यान मत दो, इतनी अहमियत मत दो किसी को. उनकी औक़ात नहीं है उतनी अहमियत की."
निश्चित ही जो नाना ने कहा, कभी उसकी तस्दीक जावेद अख्तर कर चुके हैं।
इस मसले पर भारत के कुछ बुद्धिजीवी भी पाकिस्तानी कलाकारों के पक्ष में खड़े नजर आते हैं, वह भी इस तर्क के साथ कि कला और आतंकवाद को अलग करके देखा जाना चाहिए। इन बुद्धिजीवियों को कौन समझाए कि कोई कला कभी राष्ट्रहित से बड़ी नहीं हो सकती। राष्ट्र की कीमत पर कला को बढ़ाने की वकालत करने वालों को यह बात समझनी होगी ।
अदनान सामी जैसे कलाकार, तारिक फतह जैसे बुद्धिजीवी जो सच पाकिस्तान का बयां करते हैं, वह हमारे इन ''कथ‍ित बॉलीवुड के अमनपसंदों और बातचीत के पैरोकरों'' को कब दिखाई देगा, यह तो नहीं कहा जा सकता, अलबत्ता नाना पाटेकर जैसे राष्ट्रभक्त कलाकार इनकी आंखों को किरक‍िरा अवश्य करते रहेंगे।
अब मामला कमाई का ही नहीं, और ना ही दुबई कनेक्शंस व इंवेस्टमेंट कॉकस का रह गया है, यह चार कदम आगे बढ़कर राष्ट्र और इस पर आए आतंकवाद के खतरे से जुड़ गया है। हमारे सुपरस्टार्स के ''ऊंचे कदों'' के लिए ये ताकीद है कि अब बस, बहुत हो गया ढोंगों का बाजार ... ।
अब या तो इस बाजार की आड़ में अपनी काली कमाई के लिए राष्ट्र की अस्म‍िता के साथ ख‍िलवाड़ करने का घिनौना खेल बंद कर दो अन्यथा जिस जनता ने आज सिर-आंखों पर बैठाकर सितारों का दर्जा दिलवा रखा है, वही उस मुकाम तक ले जाएगी जहां बड़े-बडे सितारे इस कदर गर्दिश में समा जाते हैं क‍ि इतिहास भी उन्हें दोहराने की जहमत नहीं उठाता। 
- अलकनंदा सिंह