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बुधवार, 13 नवंबर 2013

ये ऊबे हुये लोगों का शगल है या...?

''हर सिक्‍के के दो पहलू होते हैं'' अकसर ये जुमला भारतीय जीवन दर्शन को  बेहद सकारात्‍मक ढंग से समझाने के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है। इसी प्रक्रिया  में जो अपने पास है उसकी खुशी मनाने और जो नहीं है, उसका शोक न मनाने  के लिए भी कहा जाता है।
आज एक सर्वे की रिपोर्ट पढ़ी जिसके अनुसार विश्‍वभर में होने वाली कुल  आत्‍महत्‍याओं में से एक बड़ा प्रतिशत विकसित देशों के उन लोगों का है जो  अपने जीवन से ऊबे हुये थे, सुविधा-समपन्‍नता से ऊबे हुये थे। इन्‍हें भौतिक  सुख-सुविधाओं में डूबने के बाद भी चैन नहीं मिला, वे कुछ और भी चाहते थे  जीवन से...अपने आप से, दोस्‍तों से, व्‍यवसाय से, नौकरी से और अपने परिजनों  से...।
मैं इस संदर्भ में अपने देश की उस सनातन सोच को धन्‍यवाद देती हूं जिसके  द्वारा स्‍थापित हर नियम में समग्र समाज के हित को साधकर चला गया और  उसी के आधार पर सबका कल्‍याण करने की परिपाटी बनी। तभी तो वसुधैव  कुटुंबकम की परिकल्‍पना साकार हुई। और जब बात समग्र की हो तो आत्‍महत्‍या  की वजह कम से कम ऊब तो कभी नहीं हो सकती। शायद यही कारण है कि  जीवनदर्शन के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाले हमारे देश की गिनती  इस सर्वे में नहीं है। यूं तो दर्शन शास्‍त्र में भी कहा गया है कि ऊबने का सीधा  सीधा संबंध सब्‍जेक्‍ट और ऑब्‍जेक्‍ट से है।
सर्वे के इस आंकलन में सब्‍जेक्‍ट हैं वो व्‍यक्‍ति जो अपनी विशेषता ''सुविधा  संपन्‍नता'' के अतिवाद से ग्रस्‍त हुए और आत्‍महत्‍या करने तक की स्‍थिति में  पहुंचे। निश्‍चित ही उन्‍हें अपनी संपन्‍नता को दर्शाने के लिए एक ऑब्‍जेक्‍ट की  तलाश रही होगी। किसी भी व्‍यक्‍ति को किसी वस्‍तु या जीवन से ऊब तभी हो  सकती है जब उसके पास संसाधन तो पर्याप्‍त हों परंतु उन्‍हें प्रयोग करने के लिए  कोई ऑब्‍जेक्‍ट मौजूद न हो। खैर, आत्‍महत्‍या की वजह चाहे जो हो लेकिन  नि:संदेह यह कायरता है, जीवन देने वाले ईश्‍वर का अपमान है।
दरअसल हर भारतीय के संस्‍करों में यह शामिल होता है कि जीवन है.. तो  कठिनाइयां भी हैं, कठिनाइयां हैं तो उन्‍हें पार करने की चुनौतियां भी। हर  भारतीय के जीवन का पल-पल चुनौतियों से जूझने और उससे पार होने की  कसौटी के पेंडुलम पर नाचता रहता है। हां, कुछ लोग इनसे घबराकर तो  आत्‍महत्‍या करते हैं मगर इसमें सुविधा-संपन्‍नता से ऊबे हरगि़ज नहीं होती।  विकसित देशों की इस 'ऊब' से हम यानि भारतीय कब तक अछूते रह पायेंगे,  यह कहना तो मुश्‍किल है मगर इतना अवश्‍य कहा जा सकता है कि यदि हम  अपनी लोकोक्‍तियों में निहित जीवन दर्शन पर अमल करते रहें और ''कम खाने  व गम खाने'' जैसी कहावतों का मर्म समझें तो देश में अति अमीर और अति  गरीब के बीच बढ़ती खाई को रोका जा सकता है और इससे नाकामियों के कारण  उपजी आत्‍महत्‍याओं को बहुत कम किया जा सकता है।
बस, जरूरत है तो उस सनातन जीवनदर्शन को फिर से समझने और समझाने  की, जहां बाकायदा हर उम्र के लिए एक नियत दर्शन उपस्‍थित है...जहां ब्रह्मचर्य  से लेकर संन्‍यास तक का प्राविधान है...जहां आत्‍महत्‍या के लिए न कोई जगह  तब थी और ना ही कोई वजह अब है।
 - अलकनंदा सिंह

रविवार, 9 जून 2013

....नज़रों से गिरा देते हैं

मशहूर शायर अहमद फ़राज़ साहब का ये शेर आईपीएल क्रिकेट के मौजूदा हालातों और हश्र की ओर बखूबी इशारा करता है कि-

''हम दुश्मनों को भी पाकीज़ा सजा देते हैं ''फ़राज़ ''
हाथ उठाते नहीं ...............नज़रों से गिरा देते हैं ''

3 w यानि wealth..women..wine..की मंशा के साथ शुरू किये गये आईपीएल में महज एक स्‍पॉट फिक्‍सिंग के उजागर होने ने प्‍याज के छिलकों की तरह सारी कहानियों को परत दर परत उतार कर दिया रख दिया है ।
वो हकीकतें भी सरेआम कर दीं जो कथित 'बड़े' लोगों की रंगीनियों को आसमान पर बैठा रही थीं।
आईपीएल टीमों के उन खरीददारों की मंशा भी उजागर कर गई ये स्‍पॉट फिक्‍सिंग से लोगों के जज्‍़बातों को कौड़ियों में तोलने की हिमाकत कर गये।
सचमुच 'इंक्रेडिबिल' है इंडिया की यह तस्‍वीर कि एक ओर भुखमरी मिटाने के लिए मां बाप अपने बच्‍चों को बीड़ी बनाये जाने वाले तेंदू पत्‍तों को उबालकर पिला रहे हैं ताकि बच्‍चों को नशा बना रहे और वे भोजन की मांग ना करें। 
इतना ही नहीं भोजन के बंदोबस्‍त में वे खुद को भी बंधुआ बनाने से नहीं हिचकिचा रहे...ये तो रही मजबूरी की बंधुआगिरी मगर जो खुद की बोली लगाने से लेकर देश के सबसे ज्‍यादा देखे जाने वाले खेल की धज्‍जियां उड़ा रहे हैं, वे जो अपने प्रशंसकों और खेल की भावना को तहस नहस करने में जुटे रहे, वे जो बुकीज के इशारों पर बंधुआ बने रहे...वे जो देश की इज्‍़जत को कोई कसर नहीं छोड़ रहे...ये तो वो हैं जो पकड़े गये अभी कितने ऐसे कथित खिलाड़ी होंगे जो बंधुआगिरी का फ़र्ज निभा रहे होंगे। उनके ऊपर तो तरस भी नहीं खाया जा सकता।
आज भले ही बीसीसीआई और सरकार व कोर्ट मिलकर इस मामले की जड़ों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं मगर क्रिकेट प्रेमियों की भावनाओं के साथ जो कुछ हुआ उसे तो फ़राज़ साहब का उक्‍त शेर बखूबी उकेरता है कि .....नज़रों से गिरा देते हैं ।
- अलकनंदा सिंह