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बुधवार, 3 जनवरी 2018

लिखी गईं नई इबारतें...कि ये ख्‍वाहिशें रूमानी नहीं हैं...

आज के विषय पर सबसे पहले पढ़िए मेरे चंद अशआर.....

ये परेशानियां जिस्‍मानी नहीं हैं
ये ख्‍वाहिशें रूमानी नहीं हैं
और ये खिलाफतें भी रूहानी नहीं हैं
कि अब ये आवाज़ें उठ रही हैं
उन जमींदोज वज़ूदों की जानिब से,
आहिस्‍ता-आहिस्‍ता से, 
तो कहीं पूरे ज़ोर शोर से
गोया अब शिद्दतें अंजाम तक पहुंचेंगी
कि लिखी जा रही हैं नई इबारतें।



देश ज़ुदा हैं...परेशानियां भी ज़ुदा...मगर अब मुस्‍लिम महिलाओं ने अपनी आवाज़ उठाना शुरू  कर दिया है और अब ये आवाज़ें भारत व अफगानिस्‍तान से होकर ईरान तक पहुंच चुकी हैं।  ये उनकी संगठनात्‍मक शक्‍ति का ही उदाहरण हैं।

आप भी क्रमवार नज़र डालिए इन अभियानों पर-


भारत में लिखी गई नई इबारत-

वज़ूद मापने की यदि कोई इकाई होती तो आज इसकी सर्वाधिक जरूरत मुस्‍लिम महिलाओं  को होती। खुशखबरी है कि भारतीय मुस्‍लिम महिलाएं नए साल आने तक उठ खड़ी हुई हैं, वे  उठ खड़ी हुई हैं उन बंदिशों के खि़लाफ जो उनके वज़ूद पर भारी पड़ रहीं थीं। उनकी  संगठनात्‍मक भावना प्रबल हुई तभी तो सुप्रीम कोर्ट के रास्‍ते तीन तलाक़ बिल लोकसभा में  पास हो पाया।

नाइश हसन, अंबर ज़ैदी, रूबिका लियाक़त, ताहिरा हसन, शाइस्‍ता अंबर से शुरू हुआ ये सफर  आखिर में इशरत जहां तक आकर ठहरा नहीं है। पानी की तरह इन महिलाओं ने चट्टानों के  बीच से रास्‍ता निकाल लिया है। मौलानाओं द्वारा स्‍थापित रेगुलेटरी-बॉडीज को नारी शक्‍ति ने  धता बताई है। मुस्‍लिम महिलाओं ने जता दिया है कि पुरुष अब अपने बनाए नियमों को फिर  से खंगालें। बहरहाल, भारतीय मुस्‍लिम महिलाओं का तो ये आग़ाज़ है जिसे अंजाम तक चलते  जाना है।
उनकी इस जद्दोजहद की ये जीत ही तो है कि 2017 के आखिरी रेडियो संबोधन में प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी द्वारा ''मन की बात'' के तहत यह बात उल्‍लेख न की जाती कि अब मुस्‍लिम  महिलाओं को बिना ''महरम'' के ही ''हज पर जाने की सुविधा'' सरकार ने शुरू कर दी है और  इसमें तमाम महिलाओं ने स्‍वयं को हज पर जाने के लिए एनरोल भी करा लिया है। अब तक  हज पर जाने के लिए ''महरम'' यानि पुरुष अभिभावक का होना महिलाओं की सुरक्षा की  गारंटी माना जाता था मगर अब कोई महिला यदि अकेले हज पर जाना चाहती है तो उसे  ''महरम'' के नाम पर रोका नहीं जा सकता।

अफगानिस्‍तान #WhereIsMyName हैशटैग ने छेड़ा 'अजी-सुनती हो' कहने के खिलाफ  अभियान -

भारत की ही तरह गुजिश्‍ता साल में कट्टरपंथ की आग से सुलगते अफगानिस्‍तान के अंदर भी  वज़ूद के लिए बदलाव की आहट भी सुनने को मिली।
गौरतलब है कि इस मुल्‍क में महिलाओं के नाम लेने का चलन नहीं है। उनको किसी की  बेगम, बहन, बेटी या मां के रूप में ही संबोधित किया जाता है। इस मामले में खास बात यह  है कि अफगान समाज में महिलाओं का नाम लेना एक तरह से गुस्‍सा जाहिर करना माना  जाता है और यदा-कदा इसको अपमान के रूप में भी लिया जाता है। अब इसके खिलाफ  अफगानी महिलाओं ने आवाज़ उठानी शुरू दी है। वे चाहती हैं कि वे अपने नाम से पहचानी  जाएं।

अफगान कानून के तहत जन्‍म प्रमाणपत्र में मां का नाम भी दर्ज नहीं होता। इन सबके  खिलाफ बदलाव की मांग अफगान समाज के भीतर से ही उठी है। सोशल मीडिया में  अफगानिस्‍तान की महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने #WhereIsMyName से एक अभियान  शुरू किया, इस अभियान के माध्‍यम से महिलाएं इस व्‍यवस्‍था में बदलाव की मांग करते हुए  चाहती हैं कि उनको उनके नाम से संबोधित किया जाना चाहिए। कुछ महीनों पहले शुरू हुए  इस हैशटेग अभियान में हजारों महिलाएं शामिल हुई, साथ ही खुशखबरी ये है कि महिलाओं  के साथ प्रगतिवादी पुरुष भी उन्‍हें प्रोत्‍साहित कर रहे हैं, हौसला बढ़ा रहे हैं।

इस अभियान से जुड़ी महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है-

गुमनामी की जिंदगी से बाहर निकलने के लिए शुरू किए गए इस अभियान से जुड़ी महिला  सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अफगानिस्‍तान में महिलाओं के नाम लेने के मामले  में ऐसी पुरातनपंथी सोच है कि महिलाएं बिना किसी निजी शिनाख्‍त के ही अपना जीवन बसर  करती हैं। यहां तक कि अंतिम संस्‍कार के समय भी महिलाओं का नाम नहीं लिया जाता और  कब्र के पत्‍थर पर भी उनका नाम नहीं लिखवाया जाता, इसलिए मौत के बाद वह सिर्फ एक  ऐसी कब्र बनकर रह जाती हैं जिसकी कोई पहचान तक नहीं होती। कब्र का पत्थर भी उन्‍हें  शायद ही पहचान पाता हो।

मुस्‍लिम महिलाओं की ऐसी ही जद्दोजहद अब ईरान में भी कट्टरपंथी आयतुल्‍ला खमैनी शासन  के शुरू हो चुकी है और उसकी गंभीरता का अंदाज सड़कों पर उमड़ रही आंदोलनकारियों की  उस भीड़ से लगाया जा सकता है, जिसमें कई दर्जन लोग मारे जा चुके हैं लेकिन आंदोलन  फिर भी जारी है। अच्‍छी बात ये है कि यहां भी प्रगतिवादी ईरानी युवक महिलाओं के कंधे से  कंधा मिलाकर शासक वर्ग की गोलियां झेलने को सड़कों पर मौजूद हैं।

बहरहाल, मैं फिर से बात भारत की मुस्‍लिम महिलाओं की संगठनात्‍मक शक्‍ति की ही करूंगी  जिन्‍हें मौलवियों के कट्टरवादी रवैये के खिलाफ सरकार का भी साथ भी मिल रहा है। हालांकि,  अब भी ज्‍यादातर महिलाऐं पारिवारिक मोर्चे पर अकेली हैं और मौलवी कहते हैं कि  तलाके-बिद्दत खत्‍म होने से तमाम ''घर बिगड़ेंगे'', मौलवी ये भी कहते हैं कि ''बिना महरम''  हज जाने वाली महिला को कयामत के रोज़ सज़ा दी जाएगी।

जो भी हो, अब तो मुस्‍लिम महिलायें ''मौलवियों की गिरफ्त से बाहर आ रही हैं'' और पूछ  रही हैं आखिर ये कयामत कब होगी। आखिर सब कुछ जो प्रगतिवाद की ओर ले जाता है कि  वह मुस्‍लिमविरोधी ही क्‍यों हो जाता है। महिलाओं को कठपुतली बनाकर क्‍या मौलानाओं की  हकीकत सामने नहीं आ गई। क्‍या एक महिला अकेली नहीं जा सकती। क्‍या मक्‍का तक जाने  वाली अकेली महिला किसी के लिए खतरा हो सकती है। शरियत जब वजूद में आई तब उसे  क्‍या ये पता था कि कंप्‍यूटर-स्‍मार्टफोन जैसी चीज दुनिया में आएगी या चांद के पार मंगल  और धरती के अंदर तक का अध्‍ययन महिलाएं करेंगी।
प्रश्‍न बहुत हैं, बहसें भी बहुत, लेकिन सिलसिला तो अभी शुरू हुआ है...सफ़र लंबा जरूर है  मगर इसकी मंज़िल एकदम स्‍पष्‍ट है। हम प्रतीक्षा करते हैं और प्रार्थना भी कि इस वास्‍तविक  आज़ादी के अभियान चलते रहें और मुकाम दर मुकाम अपनी मंज़िल की ओर आगे बढ़ें।


-अलकनंदा सिंह

सोमवार, 8 जून 2015

बहती गंगा है हाथ धोने से भी बाज आयें क्या...?

कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में में स्वस्थ दिमाग बसता है और स्वस्थ दिमाग से स्वस्थ चरित्र की स्थापना की होती है जिससे स्वस्थ समाज का निर्माण होता है और स्वस्थ रहने के लिए किसी भी धर्म व संप्रदाय में कोई बंदिशें नहीं लगाई गईं। फ‍िर क्यों योग दिवस मनाने को लेकर इतनी खींचातानी हो रही है। 21 जून को यदि देश अपनी इस थाती को दुनिया के सामने प्रदर्श‍ित करके जीवन के लिए अमूल्य निध‍ि 'स्वास्थ्य' के प्रति अपनी गंभीरता को प्रगट करता है या इसके जरिये राष्ट्रवाद का संदेश देता है तो उसमें गलत क्या है।
खुद को हेय दृष्ट‍ि से देखकर महान नहीं  बना जा सकता। तथाकथ‍ित समाजवाद के नाम पर भारतीय जनमानस में जो अभी तक यह धारणा बैठा दी गई कि यदि हम अपने प्राचीन महात्म्य की बात कर रहे हैं तो वह हिंदूवादी है या फ‍िर पुरातन पंथी, इस ग्रंथ‍ि से निकलना होगा। इस ग्रंथ‍ि से निकलने की कोश‍िश ही तो है कि अाज योग सिर्फ भारत का ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजि‍त होने जा रहा है।  
जनसांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार इस समय देश में युवाओं का प्रतिशत ज्यादा है और युवाओं के कंधे पर चढ़कर हम अगली सदी में देश को सर्वोच्च स्थान तक ले जाने की कामना करते हैं। ऐसे में उनके कंधों को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी किसकी है। क्या शारीरिक, मानसिक व चारित्रिक रूप से अस्वस्थ और न‍िर्बल पीढ़ी के सहारे हम देश को आगे ले जाने का स्वप्न पाल रहे हैं।
भारत जैसे युवा देश को अच्छे स्वास्थ्य के ओर ले जाना पूरे के पूरे समाज को स्वस्थ बनाना है। कुछ वर्षों पहले तक योग को लगभग भुला दिया गया था। सुबह की सैर व प्राणायाम  से लेकर व्यायाम और अखाड़ों की ओर जाने वाले युवाओं को पिछड़ा समझा जाने लगा। बाबा रामदेव के प्रात: कालीन टीवी ने  सामूहिक रूप से यदि योग को इतनी व्यापकता में लोगों तक न पहुंचाया होता तो आज भी हम योग के सामान्य से लाभों से भी अपरिचित ही होते। यह अलग बात है कि बाबा रामदेव की बात करते ही लोग उनकी व्यापारिक गत‍िविधि‍यों पर बात करने लगते हैं और उनके मूल प्रयासों को भूल जाते हैं। ऐसा नहीं था कि बाबा रामदेव से पहले योग देश में किया नहीं जा रहा था मगर उसे आमजन तक लाने का श्रेय तो बाबा को ही जाता है।
योग सिर्फ शरीर का ही नहीं मन का भी व्यायाम है और मन चाहे हिंदू का हो या मुसलमान का, स्वस्थ रहने का अधिकार तो हर व्यक्ति का है। कुछ लोगों द्वारा बवाल मचाया जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सूर्यासन करने की इजाज़त उनका धर्म नहीं देता। न जाने कहां कहां से अज़ान, वजू और आयतों के उदाहरण दिये जा रहे हैं कि अल्लाह के अलावा हम किसी के आगे सर नहीं  झुकाते जबकि सूर्य नमस्कार में पहला आसन ही सूर्य के सामने सज़दा करना है।
अगर धार्मिक दृष्टि से कहा जाये तो कोई ज़रा इन लकीर के फकीरों से पूछे कि जब सारी कायनात के ज़र्रे ज़र्रे में अल्लाह है तो सूर्य क्या उस कायनात का हिस्सा नहीं है । और यदि सामाजिक दृष्टि से देखें तो जो आज सूर्य नमस्कार को धर्म पर हमले के रूप में देख रहे हैं, वे यह भी तो बतायें कि स्वयं उन्होंने कुरान के नाम पर पूरे समाज की अस्वस्थता और मानसिक पिछड़ेपन के लिए क्या क्या कर दिया ... । क्या उन्होंने इस्लाम को इतना कमजोर और लाचार समझ रखा है जो एक स्वस्थ राष्ट्र की परिकल्पना में वह सबके साथ नहीं आ सकता। ये लोग सज़दे की बात कहकर बस विरोध करने के लिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि ये अच्छी तरह जानते हैं कि इसी तरह वे लाइमलाइट में आ सकते हैं, मीडिया में छा सकते हैं, इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को बाइट दे सकते हैं, सारी जिंदगी निकल गई जिनकी गली मोहल्लों में, वे भला क्योंकर ये मौका चूकें, बहती गंगा है हाथ धोने से भी बाज आयें ...?
पूरे विश्व में इस्लाम के नाम पर अपनी घ‍िनौनी हरकतों से जिस आईएस ने पूरे धर्म को संदेह के घेरे में ला दिया है, उस पर यही ठेकेदार कुछ कभी नहीं बोलते जबकि अपने बच्चों से स्वस्थ रहने का एक आसान सा तरीका भी इनसे बर्दाश्त नहीं हो रहा। इस्लाम की आख‍िर इतनी अलग-अलग सी परिभाषाएं क्यों हैं। निश्चित ही धर्म के नाम पर और विरोध के हथकंडों से ये उस पूरी युवा पीढ़ी के सामने ऐसे उदाहरण रख रहे हैं जो उन्हें राष्ट्र के साथ खड़ा होने से वंचित करेगा।
यह  सब भी तब हो रहा है जब ईरान और अफगानिस्तान व इंडोनेशिया जैसे खालिस मुस्लिम देशों में योग को राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जा रहा है। इस्लाम के भारतीय अलम्बरदार क्या अब ये बताने की जहमत उठायेंगे कि आख‍िर उक्त तीनों देश इस्लाम और इबादत की जो नाफरमानी कर रहे हैं, उनके लिए इनके पास क्या उपदेश हैं?
चूंकि ये सरकार बीजेपी की है तो सरकार के हर कदम पर उन्हें विरोध का अवसर मिल रहा है और अपनी तवज्जो को कैश करने का मौका भी वरना पिछली सरकारों में कोई मुद्दा ही कहां था मीडिया में छाने का... ।
बहरहाल,  योग के ज़रिये पूरे विश्व के स्वास्थ की कामना एक वृहद सोच वाला देश ही कर सकता है और जो लोग इसमें अपने अपने अड़ंगे लगा रहे हैं, वो देश के साथ साथ देशवासियों और खासकर अपनी युवा पीढ़ी को संस्कारों व उनके अच्छे स्वास्थ से वंचित रखना चाहते हैं, इसके अलावा और कुछ नहीं ।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है क‍ि ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे कि वे राष्ट्र के लिए सोच सकें क्योकि इन्हें ही सबसे ज्यादा जरूरत है प्रणायाम की और सकारात्मक सोच की भी। 
- अलकनंदा सिंह