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शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

26 वें विश्व पुस्तक मेले में सबसे ज्‍यादा किताब बिकी ‘औरत और इस्लाम’

देश में तीन तलाक और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर चल रही बहस की वजह से लोगों में इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को जानने की ललक बढ़ी रही और लोग, विशेष तौर पर महिलाएं, यहां आयोजित विश्व पुस्तक मेले में इससे संबंधित किताबें खरीद रही हैं.
प्रगति मैदान में चल रहे 26 वें विश्व पुस्तक मेले में इस्लामी किताबों का प्रकाशन करने वाले कई प्रकाशक आए हैं. वे उर्दू भाषा के अलावा हिन्दी और अंग्रेजी में भी कई किताबों को लेकर आए हैं.
उनका कहना है कि सबसे ज्यादा इस्लाम में औरतों की स्थिति एवं अधिकारों का वर्णन करने वाली किताबें बिक रही हैं.
मरकज़ी मकतबा इस्लामी पब्लिशर्स के मेराज खालिद ने बताया कि ‘औरत और इस्लाम’ नाम की किताब सबसे ज्यादा बिक रही है जिसके अंग्रेजी संस्करण का नाम ‘वूमन राइट्स इन इस्लाम’ है.
उन्होंने बताया कि इस पुस्तक को खरीदने वालों में महिलाएं अधिक हैं और उनमें भी गैर मुस्लिम महिलाओं की संख्या ज्यादा है और वे इस पुस्तक का अंग्रेजी या हिन्दी संस्करण ले रही हैं.
वहीं इस्लामी बुक सर्विस लिमेटिड के नसीम अहमद ने बताया कि मेले में ‘पैगंबर की पत्नियां’, ‘पैगंबर की बेटियां’, ‘पति पत्नी के अधिकार’, ‘इस्लाम में पारिवारिक मूल्य’, ‘वूमन इन इस्लाम’ जैसी किताबें अधिक बिक रही हैं.
उन्होंने बताया कि इन किताबों में सबसे ज्यादा ‘वूमन इन इस्लाम’ बिक रही है और इसके खरीदारों में अधिकतर गैर मुस्लिम युवा हैं जो बड़ी तादाद में इस किताब को खरीद रहे हैं.
उन्होंने बताया कि इस किताब को मिली प्रतिक्रिया को देखते हुए उन्होंने इसकें हिंदी तजरुमे का काम शुरू कर दिया है और कुछ दिनों में यह किताब हिन्दी में भी उपलब्ध होगी.
इस स्टॉल पर किताब खरीद रहे तुषार ने बताया कि टीवी और अखबारों में सब अपनी अपनी बात करते हैं. कोई कहता है कि ”महिलाओं को अधिकार है तो कोई कहता है अधिकार नहीं है. इतना कंफ्यूजन है कि कुछ समझ ही नहीं आता है कि कौन सही है इसलिए यहां से किताबें खरीद रहे हैं ताकि असल स्थिति मालूम हो.”
वहीं जावेद ने बताया कि उन्हें उर्दू नहीं आती है और इस्लाम में अधिकतर किताबें उर्दू में होती है. यहां कुछ प्रकाशक ”हिन्दी और अंग्रेजी में पुस्तकें लेकर आए हैं जिन्हें हम खरीद रहे हैं ताकि थोड़ी दीनी जानकारी हो और लोगों के सवालों के जवाब दे सकें.”
मरकज़ी मकतबा इस्लामी पब्लिशर्स के मेराज खालिद ने बताया कि इस्लाम में महिलाओं के मुकाम का वर्णन करने वाली पुस्तकों के अलावा जिहाद और आतंकवाद के बारे में लिखी किताबें भी पाठक ले रहे हैं. इनमें भी गैर मुस्लिमों की संख्या अधिक है. -Agency

-www.legendnews.in

गुरुवार, 11 जून 2015

तो क्या इन हैवानों के लिए कोई कुछ नहीं बोलेगा

दुनिया से गुलामी प्रथा का खात्मा हुए 19वीं शताब्दी से अबतक न जाने कितने बदलाव आए और दुनिया को तरक्की के नए नए आयाम दे गए मगर आईएस के रोजाना के कारनामे हमें बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देते हैं कि क्या सचमुच यज़ीदी औरतों पर वे जो अपनी हैवानियत के प्रयोग कर रहे हैं,  उसका अंत क्या उनका सफाया कर देने भर से हो जाएगा । क्या उनके सफाए से वो ''मानसिकता'' भी खत्म हो जाएगी जो औरतों, लड़कियों और बच्चों के शरीरों पर अपना युद्ध लड़ती है। उनकी आत्मा रौंद कर अपने परचम फहराती है । 

विश्व के अन्य देशों की बात छोड़ दें , वो तो इस हैवानियत को सिर्फ देख रहे हैं , यूएन भी उन यज़ीदी औरतों की खबरों पर अपने उपदेश झाड़ रहा है मगर कोई कुछ नहीं कर रहा। और मीडिया की तो बात क्या कही जाए...?  औरतों के रोते हुए चेहरों से वे सब के सब भारी पैसा बना रहे हैं। उन औरतों के नुचे हुए शरीर के पीछे छुपी उनकी नुची हुई आत्मा को कोई न देख पा रहा है और न ही दिखा पा रहा है।

आज बस एक खबर भर है कि यौन हिंसा से जुड़े एक यूएन प्रतिनिध‍ि की रपट के अनुसार इराक और सीरिया से अपहृत किशोरियों को आईएस आतंकी गुलामों के बाजार में सिगरेट के एक पैकेट की कीमत पर बेच रहे हैं। इस रपट को तैयार करने वाले क्या बिल्कुल वैसा ही व्यवहार नहीं कर रहे जैसे कि कोई फोटो जर्नलिस्ट जलते हुए या डूबते हुए व्यक्ति से इंटरव्यू ले रहा हो... और उस फोटो से वो नाम कमाने की जुगत लगा रहा हो...। 

ये हकीकत अप्रैल में जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है जब यूएन के विशेष दूत जैनब बांगुरा इराक और सीरिया का दौरा कर लौटे । उन्होंने आईएस के चंगुल से जसतस छूटी किशोरियों और औरतों के मुंह से हृदयविदारक दास्तां सुनीं । लड़कियों ने बताया कि किसी भी क्षेत्र पर कब्जा करने के बाद आतंकी वहां की औरतों , लड़कियों को अपहृत कर लेते हैं फिर सरेआम उन्हें नहलाकर निर्वस्त्र या करके उनकी बोली लगाई जाती है , कभी कभी तो एक सिगरेट के पैकेट की कीमत या एक शर्त या फ‍िर कुछ डॉलर में उन्हें बेच दिया जाता है । तुर्की लेबनान जॉर्डन के श‍िविरों में इनकी दुदर्शा की कहानियां अटी पड़ी हैं। फिलहाल बांगुरा इन पर रपट तैयार कर रहे हैं, मगर रपट से उन औरतों और लड़कियों के दर्द को सुना तो जा सकता है मगर तब तक कितना दर्द उनमें बह चुका होगा , इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता ।

क्या आईएस के जुल्म के मारी औरतों की ये खबरें हमारे देश के इस्लामी हुनरमंदों तक नहीं पहुंच रहीं ?
भारत के उलेमा इस बावत बोलने में तंगदिली क्यों दिखा रहे हैं ?
कहीं ऐसा तो नहीं कि आईएस की मानसिकता से भारतीय इस्लामिक विद्वान भी इत्त‍िफाक रखते हों ?
भारतीय उलेमा आईएस की हैवानियत पर चुप्पी साध कर आख‍िर ज़ाहिर क्या कराना चाहते हैं ?
उनकी सोच क्या सिर्फ देश में सियासती फैसलों पर अपनी नाराजगी जताने तक स‍िमटकर रह गई है ?
शिया हों , सुन्नी हों, कुर्द हों, यज़ीदी हों ... कोई भी हों औरत तो औरत होती है , यौन अपराध किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता । इन अपराधों के नतीजतन जो बच्चे पैदा होंगे, आख‍िर उनकी मानसिकता कितनी घातक हो सकती है। जेनेटिक्स पर साइकोलॉजिकल इफेक्ट नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यहीं पर बात आ जाती है नैतिकता की, इंसानियत के पतन की,  इंतिहाई जहालत की ... मगर भारतीय इस्लामिक विद्वानों की इस बावत चुप्पी ठीक नहीं है।

बात बात पर अपना विरोध जताने जो लोग इलेक्ट्रानिक मीडिया का मुंह ताकते हैं , क्या वे दो शब्द भी आईएस के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं रखते ?

ये मजहब की कौन सी परिभाषा है जो शरीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बनाने से तो मना करती है मगर जुल्म के खि‍लाफ मुंह भी नहीं खोलती ?

भारत में तो योग पर भी बवेला कर देते हैं यही विद्वान... गोया कि उनके बच्चे कहीं नैतिक हो गए तो उनके चंगुल से निकल जाऐंगे ... मगर  इराक में जो हो रहा है उस पर चुप्पी इसके इस्लामिक ज्ञान पर प्रश्नचिन्ह लगाती है । यूं तो आईएस की सताई औरतों की आह स्वयं आईएस को तो देर सबेर खत्म कर ही देगी , मगर इस पर चुप्पी साधने वालों को भी  कठघरे में खड़ा करेगी जो मजहब की रोटी खाते हैं।
भारत अपने हाल ही के निर्णयों से विश्व के केंद्र में आया हुआ है । इस समय भारतीय इस्लामिक विद्वानों और अकीदतमंदों को इसका फायदा उठाते हुए आईएस के औरतों पर जुल्मों के खिलाफ एकजुट हो आगे आना चाहिए।  

निश्चति ही भारतीय इस्लामिक विद्वानों को इस बावत अपनी ओर से अंतर्राष्ट्रीय प्रयास करने चाहिए ताकि जुल्म करने वालों की अगली पीढ़ी हैवान बनने से बचाई जा सके। ये ज़हालत और जुल्म की इंतिहा है , इसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

जहालत और जुल्म के इस दौर पर अज़हर इनायती का एक शेर है बिल्कुल सही बैठता है -

जहाँ से इल्म का हम को ग़ुरूर होता है
वहीं से होती है बस इब्तिदा जहालत की

- अलकनंदा सिंह