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शनिवार, 16 जुलाई 2016

ये कैसा धर्म है जो इतना डरा हुआ है... जिसे हर बात-बेबात पर खतरा दिखाई देने लगता है ?

आज पाकिस्तानी मॉडल कंदील बलोच की हत्या से ना जाने कितने सवाल जहन में आ रहे हैं जो ये सोचने पर विवश कर रहे हैं कि आख‍िर इस्लाम के नाम पर, गैर मजहब के नाम पर, महिलाओं (औरत शब्द का प्रयोग मैं नहीं करूंगी क्योंकि इस शब्द का प्रयोग अरब देशों में महिला के जेनाइटल भाग को संबोध‍ित करने के लिए किया जाता रहा है मगर उर्दू में आते-आते इसे महिलाओं के ही लिए प्रयोग किया जाने लगा) के नाम पर एक पूरा का पूरा धर्म इतना डरा हुआ क्यों है कि उसे सब अपने विरुद्ध जाते दिखाई दे रहे हैं।
क्यों उसके धर्म गुरू इतने भीरू हो गए हैं कि भटकी हुई सोच और हावी होती क्रूरता को वे कंट्रोल नहीं कर पा रहे। 
दशकों से चलता आ रहा ये तंगदिली का खेल फतवों से आगे ही नहीं बढ़ पा रहा। यदि कहीं बढ़ रहा है तो वह हथ‍ियार, खूनखराबा, जो जहालत के नए नए प्रतिमान गढ़ रहा है, जो अपने लिए तमाम प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए सफाइयां तलाश रहा है। अपनी जाहिल सोच को जस्टीफाई करने पर आमादा है। 
आख‍िर क्या वजह है कि पूरी दुनिया में जहां कहीं भी कत्लोआम और आतंकवादी वारदात होती हैं वहां बतौर गुनहगार कथित  इस्लामपरस्त जरूर मौजूद होता है।
मैं देशों और आतंकवाद पर ना जाते हुए आज ही घटे क्रूर घटनाक्रम ''कंदील बलोच की हत्या '' के ही मुद्दे पर आती हूं. इसके मानने वाले इतने तंगदिल हैं कि कंदील बलोच के वीडियो को, उसकी सेंसेशनल बने रहने की  ख्वाहिश को सहन नहीं कर पाए और उसे उसके अपनों ने ही मौत की नींद सुला दिया।
सोशल मीडिया पर चल रही खबरें बताती हैं कि कंदील के इस कथ‍ित ''गुनाह'' के कितने चाहने वाले थे जिसमें पुरुष ही नहीं औरतें भी हैं, सब पूछ रहे हैं कि 'आज़ाद ख्याल लड़की से क्या इस्लाम ख़तरे में था'।
क़ंदील बलोच की हत्या के बाद लोग सोशल मीडिया पर उन्हें याद कर रहे हैं। क़ंदील की हत्या उन्हीं के भाई ने कर दी है, पंजाब पुलिस ने इसकी पुष्टि की है।
पाकिस्तानी मीडिया इसे ऑनर किलिंग यानी सम्मान के नाम पर क़त्ल तो बता रहा है मगर उसकी डरपोक प्रवृत्त‍ि उन कारणों की ओर रुख नहीं करती जो उस देश को जहालत के गर्त में धकेल रहे हैं।  पाकिस्तान में ही नहीं भारत में भी क़ंदील बलोच की खबरें ट्विटर पर टॉप ट्रेंड हो रही हैं।
बहरहाल, पाकिस्तानी फ़िल्मकार शर्मीन ओबैद ने लिखा, "ऑनर किलिंग में क़ंदील बलोच की हत्या. हमारे ऑनर किलिंग विरोधी क़ानून बनाने से पहले कितनी महिलाओं को अपनी जान देनी होगी."

भारतीय अभिनेत्री रिचा चड्ढा ने लिखा, "भ्रूण के रूप में लड़कियां बाप के हाथों मारी जाती हैं, सम्मान के नाम पर भाइयों के हाथों मारी जाती हैं और पत्नी के रूप में दहेज़ के लिए मारी जाती हैं.'

मीशा शफ़ी ने लिखा, "क्या आपने कभी सुना है कि किसी बहन ने अपने भाई की बैग़ैरती के लिए उसकी हत्या कर दी हो? नहीं. ये सम्मान का नहीं पितृसत्ता का मामला है."

मंसूर अली ख़ान ने लिखा, "प्रिय मीडिया, ग़ैरत (सम्मान) के नाम पर क़त्ल जैसी कोई चीज़ नहीं होती. ये वाक्य ही अपने आप में अपमानजनक है."

उमैर जावेद ने लिखा, "कैसा दयनीय छोटी सोच वाला देश है. हमें अपने आप पर ही शर्म आ रही है."
वहीं नज़राना गफ़्फ़ार ने लिखा, "उनके बेटे और पति की तस्वीरें प्रकाशित करने वाली मीडिया भी इसके लिए ज़िम्मेदार है. आपने भी उनके क़त्ल को उक़साया है."

महीन तसीर ने लिखा, "क़ंदील के बारे में लोगों के व्यक्तिगत विचार भले ही जो भी हों लेकिन क़त्ल को सही नहीं ठहराया जा सकता. उनके भाई को फ़ांसी होनी चाहिए."

सुंदूस रशीद ने लिखा, "एक पुरुष की इज़्ज़त महिला के शरीर में क्यों होती हैं?"

प्रमोद सिंह ने लिखा, "पाकिस्तानी मॉडल क़ंदील बलोच की हत्या.. ज़रा सा आज़ाद ख़याल वाली लड़की से भी इस्लाम खतरे में पड़ गया था!"

अजब है ये सोच। पाकिस्तान में क़दील बलोच के वीडियो को लोग ख़ूब देखते थे लेकिन उसे बुरा भी कहते रहे तो क्या कंदील पाकिस्तानी समाज का दोहरा चरित्र उजागर करती हैं? यूं भारत भी इस सोच से अलहदा नहीं है। भारतीय भी चाहते हैं चटपटे और सेंसेशनल वीडियो देखना साथ ही ये भी कि उनके घर की महिलायें इस बावत सोचें भी नहीं। मगर यह भी सच है कि भारत में हम बोल सकते हैं कि पुरुषों की ये दोहरी सोच स्वयं उन्हीं की कमजोरी जाहिर करती है, इसके ठीक उलट पाकिस्तान या किसी भी इस्लामिक देश में महिलाऐं बोलना तो दूर, वो अपनी भावनाएं जाहिर तक नहीं करा सकतीं। और जो कराने का साहस करती भी हैं उन्हें कंदील बलोच के हश्र को देखना होता है ।
अब वक्त आ गया है कि पूरी दुनिया में ''एक ही धर्म पर'' उसकी तंगदिली पर तमाम एंगिल से उठ रही उंगलियों की बावत मंथन हो, धर्म गुरू सोचें कि आख‍िर ''खून'' में डूबता-उतराता ये धर्म कब तक अपनी वकालत करेगा कि वह कट्टरपंथी नहीं है, वह शांति की बात करता है ।
- Alaknanda singh


शनिवार, 9 जुलाई 2016

पाकिस्तान में ईधी और कश्मीर में वानी: किसका इस्लाम सच्चा ?

एक मजहब, एक धरती, लगभग एक जैसा खानपान और तो और रवायतें भी एक जैसी मगर जब एक आइने में इनकी दो तस्वीरें नज़र आऐं तो…तो क्या कीजिऐगा…
जी हां, आइना एक, शक्लें दो…ये हम पर है कि इंसानियत का कौन सा रूप है हमें देखना और दिखाना है ।

हम भारत में हैं तो बात पहले कश्मीर से शुरू करनी होगी। कश्मीर में कल मारे गए एक दहशतगर्द बुरहान वानी की मौत पर खून बहाने वाले कश्मीरी युवा, अलगाववादियों और आतंक के सरगनाओं द्वारा कश्मीर की हरी धरती को लाल करने की जिद ने मजहब का जो रंग व शक्ल दिखाई, वह उस शक्ल से एकदम अलग थी, एकदम विपरीत थी जो पाकिस्तान में आज समाजसेवी अब्दुल सत्तार ईधी के मरने के बाद दिखी। मजहब एक ही है मगर मकसद बदल जाने से उद्देश्य बदल गए और इसका इंसानियत से वास्ता भी बदल गया।

आइने का पहला एक रुख देख‍िए-
बीबीसी में वुसुतुल्लाह खान लिखते हैं- ”अब्दुल सत्तार ईधी के निधन की सूचना आने के बावजूद कराची के क़रीब तरीन इलाके खरादर के ईधी फाउंडेशन ट्रस्ट के कंट्रोल रूम में काम एक लम्हे के लिए भी नहीं रु का.
जहां-जहां से इमरजेंसी कॉल आ रही हैं, वहां-वहां एंबुलेंस ज़ख़्मी-बीमार लोगों को लेने आ-जा रही है.
अज़ीब लोग हैं जो शोक में तो डूबे हैं लेकिन एक मिनट भी अपना काम नहीं रोक पा रहे. कंट्रोल रूम का ऑपरेटर कॉलर्स को ये तक नहीं कह रहा है कि आज रहने दो, तुम्हारे मोहल्ले से कल लावारिस लाश उठा लेंगे. बस ईधी साहब का अंतिम संस्कार होते ही तुम्हारे बीमार के लिए एंबुलेंस रवाना कर देंगे.
कोई ये नहीं कह रहा कि आज कॉल मत करो, आज हम बंद हैं, सदमे से निढाल हैं. आज हमारे बाप का इंतकाल हो गया है.
पूरे पाकिस्तान के पौने चार सौ ईधी केंद्रों में कोई सरगर्मी एक पल के लिए भी नहीं रुकी, ऐसा लगता है ईधी साहब परलोक नहीं, बस कुछ दिनों के लिए विदेशी दौरे पर गए हैं.
इसे कहते हैं शो मस्ट गो ऑन.”
उक्त लफ्जों से उस एक अदना से दिखने वाले मगर पाकिस्तान जैसे उथल पुथल वाले देश में अपनी उपस्थ‍िति दर्ज कराने वाले ईधी फाउंडेशन के अध्यक्ष समाज सेवी अब्दुल सत्तार ईधी को श्रद्धांजलि दी जा रही है।

वहीं अब आइने का दूसरा रुख देखिए-
कश्मीर में बुरहान वानी के मरने के बाद सबसे पहले तो कश्मीर के ही पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ट्वीट करते हैं कि बुरहान ने जीते जी जो तबाही नहीं मचाई, वह उसकी मौत के बाद मचेगी… इसका अर्थ क्या लगाया जाए कि जिस देश का नमक खा रहे हैं कश्मीरी अलगाववादी, जिस देश के आमजन का टैक्स हजम किए जा रहे हैं कश्मीरी आतंकवादी, उसी देश के ख‍िलाफ हथ‍ियार उठा रहे हैं और उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि समस्या राजनीतिक है, बुरहान जैसों का मरना कोई जलजला ले आएगा। नमक हलाली ना करने वालों को क्या कहते हैं, क्या ये भी बताना पड़ेगा। बुरहान जैसे गद्दारों और देश तोड़ने वालों के लिए जो लोग अपने आंसू जाया कर रहे हैं, क्या उन्हें उन पुलिसकर्म‍ियों और सेना के जवानों की शहादत दिखाई नहीं देती जो एक कश्मीर को बचाने के लिए अपना खून बहा रहे हैं। आतंकियों की मौत को शहादत कहने वाले क्या अब भी नहीं समझ रहे कि आईएसआईएस भी अपने लड़ाकों को शहीद कहता है।

निश्च‍ित जानिए कि भस्मासुरों की जमात चाहे कितना भी कहर बरपा ले मगर वो उस ओहदे को कभी हासिल नहीं कर सकती जो ओहदा इंसानियत की सेवा करने से हासिल होता है। इसीलिए आज भले ही बुरहान वानी के सरमाएदारों ने जूलूस निकाल कर कश्मीर में खूनी प्रदर्शन किया और उसे अलगाववादियों का समर्थन भी मिल रहा हो मगर वह वो इज्जत वो श्रद्धा कभी हासिल नहीं कर सकते जो अब्दुल सत्तार साहब ने बिना किसी की मदद के अपनी सेवा से हासिल की।

बहरहाल, अब ये तो  हमें ही तय करना होगा कि समाज को बचाने वालों को ज्यादा अहमियत देनी है या उन बददिमागों को जो खून बहाने पर आमादा हैं।

सच तो यह है क‍ि कश्मीर आज जिस मुकाम पर खड़ा है वहां से उसकी वापसी तभी संभव है जब दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कुछ कठोर निर्णय लिए जाएं और आतंकवादियों के साथ-साथ अलगाववादियों को भी अब तक के उनके किए की माकूल सजा द‍िलाई जाए अन्यथा पाकिस्तान में तो ईधी जैसे किसी शख्स की शक्ल में आइने के दो पहलू नजर भी आ रहे हैं, कश्मीर में आने वाली नश्लें उसके लिए भी तरस जाएंगी।

–Alaknanda singh

रविवार, 19 जून 2016

ब-ज़रिए Twitter : तो क्या पाकिस्तान अब कठमुल्लावाद से मुक्ति चाहता है

पिछले कुछ महीनों से हम जिस पाकिस्तान को कठमुल्लाओं से घ‍िरा पाते थे , उसमें तब्दीली आने की उम्मीद जागी है और इस उम्मीद का सबब बना है सोशल साइट Twitter के ज़रिए आती कुछ खबरों को देखकर । इन खबरों ने न सिर्फ पाकिस्तानी नियामक संस्थाओं, नेताओं और कथ‍ित इस्लामी ठेकेदारों और इन्हें बढ़ावा देने वाले इनके सरमाएदारों के स्वार्थी  नज़रिए को उजागर कर दिया बल्कि यह भी जता दिया कि अगर अवाम जाग जाऐ तो इसी तरह बख‍िया उधेड़ी जाती है जैसे कि इन तीन खबरों में उधेड़ी जा रही है। लोग गुस्से का इज़हार कर रहे हैं और इज़हार कर पा रहे हैं इसीको बदलाव का वायस माना जा सकता है।
ये तीनों खबरें देख‍िए –
खबर नं. एक- 19 june
रमज़ान शो पर पाबंदी से पाक सोशल मीडिया नाराज़
पाकिस्तान के ट्विटर यूज़र देश की मीडिया नियामक संस्था के दो रमज़ान शो के प्रसारण पर रोक लगा देने से ग़ुस्से में हैं. पाकिस्तान की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी यानी पेमरा (पीईएमआरए) ने अभिनेता और टीवी शो होस्ट शब्बीर अबू तालिब के आज टीवी और न्यूज़ वन प्राइवेट चैनल पर चलने वाले रमज़ान शो पर पाबंदी लगा दी है.
पेमरा के अनुसार उन्हें रमज़ान से जुड़े शो के प्रसारण के बारे में व्हाट्सऐप, ट्विटर और टेलीफ़ोन कॉल के ज़रिए 1,000 से अधिक शिकायतें मिली. इन्हीं शिकायतों के आधार पर उन्होंने शुक्रवार को पाबंदी जारी की है. शिकायत करने वालों का कहना है कि शो में उत्तेजक सामग्री का प्रसारण किया गया.
हमज़ा अपने शो “रमज़ान हमारा ईमान” में अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय और ईशनिंदा क़ानून के बारे में चर्चा करते दिखते हैं.
ट्विटर पर लोग पेमरा के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ जमकर बरसे.
यूजर इमरान ग़ज़ाली ने ट्विट किया, “@iamhamzaabbasi पर प्रतिबंध लगाने के लिए #PEMRA को शर्म आनी चाहिए. अथॉरिटी टीवी पर सभी तरह का कूड़ा दिखाने की इजाज़त देती है लेकिन एक व्यक्ति पर हमला करती है!”
काशिफ़ एन चौधरी नाम के यूज़र का कहना है, “ऐसे देश पर दया आती है जहां आपके सवाल पूछने पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं. “क्या सभी देशवासियों के अधिकार समान नहीं हैं?” जिन्ना का पाकिस्तान रो रहा है! #PEMRA”
इसी तरह, ट्विटर यूज़र इलमाना ने ट्विट किया, “#HamzaAliAbbasi ने इंसानी जीवन की पवित्रता को बनाए रखने पर एक उचित सवाल उठाया और मुल्ला उनकी जान के प्यासे हो गए.”
इससे पहले पेमरा ने रमज़ान महीने के दौरान रेप, हत्या, डकैती और आत्महत्या जैसे अपराधों को दिखाने वाले शो पर पाबंदी का ऐलान किया था.
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खबर नं. 2- 12 june
जब धर्म का कारोबारी ये सब कर रहा था तब उसका रोज़ा था
पाकिस्तान में एक इस्लामी राजनेता की सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हो रही है. उन्होंने एक टीवी शो में नारीवादी कार्यकर्ता मार्वी सर्मद के लिए भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया था. शुक्रवार को एक निजी चैनल के कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के दौरान जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ़ज़ल) के नेता हाफ़िज़ हमीदुल्ला ने मार्वी सर्मद को गालियां दीं.
कार्यक्रम में एक अन्य मेहमान बेरिस्टर मसरूर की टिप्पणी पर जब मार्वी ने कहा कि ‘मैं सहमत हूँ’ तब हमीदुल्ला और मार्वी के बीच बहस शुरू हो गई जो धमकी और गाली-गलौच तक पहुँच गई. मार्वी ने हमीदुल्ला की आलोचना अपने फ़ेसबुक पन्ने और ट्विटर पर की है.
उन्होंने लिखा, “जब धर्म का कारोबारी ये सब कर रहा था तब उसका रोज़ा था.”
हमीदुल्ला पाकिस्तानी संसद के उच्च सदन सीनेट के सदस्य भी हैं. ट्विटर पर बहुत से लोगों ने सांसद और इस्लामी नेता हमीदुल्ला के व्यवहार को शर्मनाक़ बताया है.
मुनिज़ा-ए-जहांगीर (@MunizaeJahangir ) ने लिखा, “मैं मार्वी पर हमीदुल्ला के शारीरिक और ज़बानी हमले की निंदा करती हूँ. जमीयत और उनका समर्थन करने वाले नेताओं को शर्म आनी चाहिए.”
एक अन्य यूज़र डॉक्टर राशिद अली ने लिखा, “मैं मार्वी सिर्मद का फ़ैन नहीं हूं लेकिन हमीदुल्ला का व्यवहार शर्मनाक है. एक तोता याद तो कर सकता है लेकिन समझ नहीं सकता.”
शफ़ाक़त महमूद (‏@Shafqat_Mahmood ) ने लिखा, “ये महिलाओं के प्रति उनके नज़रिए का उदाहरण है.”
वहीं कुछ लोगों ने मार्वी की आलोचना भी की है.
तलहा बिन हामिद (@talhamid ) ने लिखा, “मार्वी की आलोचना क्यों नहीं हो रही है? क्या महिला और उदारवादी होना का मतलब ये है कि वो धर्मगुरू के साथ बुरा बर्ताव करें और बच जाएं.”
काशिफ़ (@aSuaveJerk ) ने ट्वीट किया, “मुझे नहीं लगता कि हाफ़िज़ हमीदुल्ला ने सिर्मद को पीटने की कोशिश की, न ही हालात इतने ख़राब थे. सिर्मद के दावों पर शक होता है.”
कुछ लोगों ने ये भी कहा कि इन दोनों को राष्ट्रीय टीवी की बहसों से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए
सबीना सिद्दीक़ी (@sabena_siddiqi ) ने लिखा, “राष्ट्रीय टीवी पर भद्दी लड़ाई. मार्वी और मुल्ला दोनों को टीवी की बहसों से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए.”
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खबर नं. 3- 28 may
पेमरा ने कंडोम के विज्ञापनों के रेडियो और टीवी प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया
पाकिस्तान में प्रसारण नियामक संस्था पेमरा ने कंडोम के विज्ञापनों के रेडियो और टीवी प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया है.
सभी मीडिया संस्थानों को भेजे गई एक अधिसूचना में पेमरा ने टीवी और रेडियो चैनलों से परिवार नियोजन साधनों के विज्ञापनों के प्रसारण पर तुरंत रोक लगाने के लिए कहा है.
पेमरा को ग़ैर ज़रूरी परिवार नियोजन साधनों के विज्ञापन के बारे में शिकायतें मिली थीं जिन पर कार्रवाई करते हुए ये क़दम उठाया गया है.
अधिसूचना में कहा गया है कि मासूम बच्चों पर ऐसे प्रॉडक्टों के विज्ञापनों का ग़लत असर पड़ सकता है.
पाकिस्तान में कंडोम के विज्ञापन कम ही प्रसारित किए जाते हैं और परिवार नियोजन जैसे विषयों पर बात भी कम ही होती है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ देश के कट्टरपंथियों और रूढ़िवादियों के विरोध को देखते हुए विज्ञापनकर्ता इससे दूर ही रहते हैं.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पाकिस्तान की एक तिहाई आबादी को परिवार नियोजन साधन तक पहुँच नहीं है, हालाँकि पाकिस्तान की आबादी सालाना दो प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रही है.
सोशल मीडिया पर पेमरा के इस निर्णय की कई लोग आलोचना कर रहे हैं.
फ़हमिदा इक़बाल ख़ान ने ट्वीट किया, “पेमरा कुछ तो समझदारी दिखाओ. ये 21वीं सदी है, कृपया जनजागरूकता अभियान को न रोको.”
एक यूजर ने @aunty_karachi हैंडल से ट्वीट किया, “पेमरा को अश्लीलता पर फ़़ोकस करना चाहिए जागरूकता पर नहीं!”
इमरान सईद ख़ान ने ट्वीट किया, “प्रिय पेमरा, परिवार नियोजन विज्ञापनों को बैन मत करो. इन दिनों कुछ अवांछित वयस्क गर्भनिरोधकों की जानकारी नहीं होने के कारण पैदा हुए.”
गुल बुख़ारी ने ट्वीट किया, “काश पेमरा अफ़सरों के माता-पिता ने कंडोम का इस्तेमाल किया होता.” एक अन्य यूज़र नाइला इनायत ने ट्वीट किया, “किसी को पेमरा को बताना होगा कि विज्ञापनों का प्राथमिक उद्देश्य क्या है. क्या वे इस्लामिक विचारधारा परिषद से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं?”
– Alaknanda singh