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बुधवार, 16 जून 2021

ज़रूरी थी सफेदपोश षडयंत्रकार‍ियों के संग-संग ट्व‍िटर पर भी कार्यवाही

“आसमानी ताबीज़” के नाम पर मह‍िलाओं की अस्‍मत से ख‍िलवाड़ करने वाले अपराधी को बचाने वालों के साथ साथ ट्व‍िटर के ल‍िए भी बड़ा सबक होगी यूपी पुल‍िस द्वारा कल की गई कार्यवाही।


प‍िछले कई सालों से ट्व‍िटर को हथ‍ियार बनाकर व‍िषवमन करने वाले सफेदपोश षडयंत्रकार‍ियों का एक ऐसा ग‍िरोह सोशलमीड‍िया प्‍लेटफॉर्म पर सक्र‍िय है जो हर हाल में देश के सद्भाव को म‍िटा देना चाहता है ताक‍ि अराजकता फैले और इसके फैलते ही व‍िश्‍व को बताया जाये क‍ि देखो भारत में मुस्‍ल‍िमों को लेकर असह‍िष्‍णुता क‍ितनी बढ़ गई है, परंतु अब ऐसा हो ना सकेगा क्‍योंक‍ि इस तरह के षडयंत्र व प्रपंचों को प्‍लेटफॉर्म स्‍पेस देने के ल‍िए ट्व‍िटर भी बराबर का दोषी माना जाएगा।


यूपी पुल‍िस ट्व‍िटर पर भी इसील‍िए कार्यवाही कर पाई क्‍योंक‍ि केंद्र सरकार के आदेश ना मानने के कारण ट्व‍िटर की इंटरमीड‍ियरी दर्ज़ा अब समाप्‍त हो चुका है, उसका “कानूनी सुरक्षा कवच” टूट गया है क्योंकि ट्विटर ने अब तक नए आईटी नियमों को लागू नहीं किया इसलिए उसका लीगल प्रोटेक्शन खुद-ब-खुद खत्म हो गया है।


अत: कल इसी का फायदा उठाते हुए देश में पहली बार ऐसा हुआ क‍ि फेक न्यूज़ फैलाने का माध्‍यम बने ट्विटर को भी FIR की जद में ले ल‍िया गया।


बहरहाल, यूपी पुल‍िस ने स्‍वयं को “फैक्‍ट-चेकर” बताने वाले पोर्टल AltNews के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर, पत्रकार राणा अयूब, न्‍यूज पोर्टल द वायर, कांग्रेस के कश्‍मीरी नेता सलमान न‍िजामी व मसकूर उस्‍मानी, डा समा मोहम्‍मद, पत्रकार व लेखक सबा नकवी जैसे सफेदपोश षडयंत्रकार‍ियों पर फेक न्यूज़ फैलाने के आरोप में FIR करके बड़ा संदेश द‍िया है।


दरअसल, AltNews के मोहम्मद जुबैर द्वारा कल एक “एंटी ह‍िंदू प्रोपेगंडा” ट्व‍िटर पर शुरु क‍िया गया और इसे एक प्लान‍िंग के तहत उक्‍त आरोप‍ियों द्वारा आगे र‍िट्वीट क‍िया जाता रहा, ज‍िसमें एक वीडियो शेयर कर आरोप लगाया गया कि लोनी में अब्दुल समद नाम के एक मुस्‍ल‍िम बुजुर्ग को पीटकर उससे जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाया गया। पुल‍िस जांच में पता चला कि पीटने वाले आरोपितों में आरिफ, आदिल और मुशाहिद आद‍ि मुस्‍ल‍िम भी शामिल थे अत: ये मामला ताबीज के नाम पर मह‍िलाओं की अस्‍मत से ख‍िलवाड़ का निकला, ज‍िसमें अब्दुल समद नामक व्‍यक्‍त‍ि ने क्षेत्र की उन ह‍िंदू-मुस्‍ल‍िम मह‍िलाओं का शोषण क‍िया ज‍िनको बच्‍चा नहीं हो रहा था और वे इसके फरेब में फंसती चली गईं। पर‍िजनों ने इसील‍िए अब्दुल समद की मज़ामत कर दी ज‍िसे AltNews के मोहम्मद जुबैर ने अपनी पूरी की पूरी मंडली (नेता और अन्‍य पत्रकार डॉक्‍टर) के साथ इस मामले को “मुस्‍ल‍िम मॉबल‍िंच‍िंग” कहकर दुष्‍प्रचार‍ित क‍िया। यूं तो मोहम्मद जुबैर ने अनेक बार फेक न्यूज़ फैलाई है परंतु इस बार ‘जय श्री राम’ को बदनाम करने का उसका दांव उल्‍टा पड़ गया और FIR दर्ज हो गई। इसके अलावा भ्रम फैलाने वाले टूलक‍िट मामले में “मैनुपुलेट‍िड मीड‍िया” टैग लगाकर सच्‍चाई को दबाने वाले ट्व‍िटर ने इस पूरे मामले पर चुप्‍पी साध ली। दुष्‍प्रचार करने वाली पूरी मंडली को कानून का क ख ग बताना जरूरी था।


कहते हैं ना क‍ि दंडप्रक्र‍िया में कानून का “भय” आवश्‍यक होता है, यूपी पुल‍िस की कार्यवाही से इतना तो अवश्‍य होगा अभी तक जो ट्व‍िटर केंद्र सरकर से आंखें तरेर रहा था, वह अब स्‍वयं को बचाने में लगेगा।


बहरहाल ट्व‍िटर और उसे माध्‍यम बनाने वाले “षडयंत्रकारी व अपराधि‍यों” द्वारा अब पूरे वाकये को बतौर सबक ल‍िया जाना चाह‍िए वरना अभी तो शुरुआत है, कार्यवाही का जो रास्‍ता यूपी पुल‍िस ने खोल द‍िया है, उस पर अब अन्‍य सरकारें भी चलेंगी ही।

- अलकनंदा स‍िंंह

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मीड‍िया: अपने ही हाथों से मैला कर ल‍िया अपना ग‍िरेबां

 



मीड‍िया के न‍िकम्मेपन और ग‍िरावट ने अब तो सारी हदें पार कर दी हैं। कभी ज‍िस वर्ग को समाज और वंच‍ितों के ल‍िए प्राणवायु माना जाता था, आज मीड‍िया का वही वर्ग और उसके कर्मचारी ( ज‍िन्हें पत्रकार तो हरग‍िज नहीं कहा जा सकता) अपनी सारी क्रेड‍िब‍िल‍िटी खो चुके हैं। अब ये चीखने वाले कथ‍ित पत्रकार क‍िसी मज़लूम की ज़‍िंदगी व न्याय के ल‍िए र‍िपोर्ट‍िंग नहीं करते, वे पुल‍िस व प्रशासन के अध‍िकार‍ियों के काले कारनामों को दबाने के आदी हो चले हैं , समाज में कहां क्या बुरा हो रहा है, इसपर नज़र नहीं डालते।

वे सुशांत स‍िंह राजपूत, र‍िया चक्रवर्ती से लेकर कंगना रानौत पर गला फाड़ फाड़कर तो च‍िल्लाते हैं, परंतु उन्हीं की नाक के नीचे गाज़ियाबाद के विकास नगर, लोनी में 16 वर्ष की नाबाल‍िग बहन को छेड़ रहे शोहदों द्वारा भाई को ही धारदार हथ‍ियार से घायल करने की खबर नहीं होती है, जबक‍ि उल्टा शोहदे ने ही लड़की के भाई पर जयश्रीराम ना बोलने पर जात‍िसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने की र‍िपोर्ट करा दी गई। लड़की के अनुसार इससे पहले भी कई बार आरोपी अभिषेक जाटव ने अश्लील हरकतों के साथ छेड़ा है।

ये पत्रकार इससे भी अनभ‍िज्ञ रहते हैं क‍ि गाज़ियाबाद पुल‍िस द्वारा लड़की के भाई पर ही ‘शोहदे को मारने’ का आरोप लगाकर SC-ST एक्ट में केस दर्ज करने की लापरवाही आख‍िर कैसे की गई। वो तो भला हो सोशल मीड‍िया का ज‍िस पर ये तस्वीर वायरल हो गई और अब गाज‍ियाबाद की पुल‍िस व उनके प‍िठ्ठू पत्रकारों का ये गठजोड़ बेनकाब हो गया।

पुल‍िस की ये र‍िपोर्ट डीसीआरबी में देखने के बाद भी क्राइम बीट संभालने वाले गाज‍ियाबाद के पत्रकारों को ये नहीं सूझता क‍ि आख‍िर पूरी बस्ती जाटव समाज की, छेड़ने वाले जाटव समाज के तो एक अकेला ब्राह्मण लड़का सैकड़ों जाटव समाज के घर के बीच कैसे उनको मार लेगा और कैसे उन्हें जयश्रीराम बोलने को बाध्य करेगा ?

जात‍िगत आधार पर यद‍ि यही मामला उल्टा होता तो टीआरपी के नाम पर यही पत्रकार थाली लोटा लेकर पीछे पड़ जाते। लोनी के व‍िकासनगर का ये मामला अकेला मामला नहीं, SC-ST एक्ट में दर्ज हजारों फर्जी मामले ऐसे हैं जो बदले की भावना से ल‍िखवाए गए। ब्राह्मण सह‍ित सभी सवर्णों के प्रत‍ि दुर्भावना को कैश करने का माध्यम बन गया है ये एक्ट परंतु क‍िसी मीड‍िया हाउस ने इस संदर्भ में कुछ नहीं क‍िया।

बात ब्राह्मण और दल‍ित की नहीं है, और ना ही लड़की से छेड़छाड़ व स‍िर फाड़ देने की है… बात तो उस ज‍िम्मेदार तबके ”मीड‍िया” की अवसरवाद‍िता की है जो अपने ही ग‍िरेबां को अपने ही हाथों से मैला कर रही है। हमें पढ़ाया गया था क‍ि पत्रकार‍िता की पहली सीढ़ी ही प्रश्नों के साथ ही शुरू होती है.. कहां , क्या, कौन, कब, क‍िसने, क‍िसको , क‍सि‍तर‍ह आद‍ि प्रश्न जबतक नहीं उभरेंगे तब तक पत्रकार‍िता अपने उद्देश्य को हास‍िल नहीं कर सकती परंतु अब … अब तो हो ये रहा है क‍ि सुबह सुबह ही मीड‍िया मैनेजमेंट की ओर से मीट‍िंग में मुद्दे तय कर द‍िये जाते हैं और गरीब, मजलूम, अन्याय, बदइंतजामी से सुव‍िधानुसार मुंह फेर ल‍िया जाता है।

व‍िडंबना ये है क‍ि भरोसा खो चुका मीड‍िया अब अपनी इस ग‍िरावट के ल‍िए क‍िसी और को दोष भी नहीं दे सकता क्यों क‍ि ये सब उसके अपने लालच व स्वार्थ ने क‍िया है। बस एक शेर और बात खत्म क‍ि

संभला तो कभी भी जा सकता है, कोश‍िश तो करे कोई…
इस कुफ्र की दीवार को हल्का ही धक्का काफी है… ।

-अलकनंदा स‍िंंह  

शनिवार, 30 मई 2020

चकाचौंधी पत्रकार‍िता में खोए जा रहे फीन‍िक्स पत्रकारों के नाम…30 मई

1826 में 30 मई की तारीख को जब हिंदी भाषा में ‘उदन्त मार्तण्ड’ के नाम से पहला समाचार पत्र निकाला गया तब यह द‍िन सदैव के ल‍िए पत्रकार‍िता व पत्रकारों के ल‍िए ऐत‍िहास‍िक, वैचार‍िक पर‍िघटना के बतौर पत्रकार‍िता द‍िवस के रूप में मनाया जाने लगा। आज भले ही लॉकडाउन में पत्रकारों व पत्रकार‍िता के ल‍िए सशरीर कसीदे ना पढ़े जायें परंतु ऑनलाइन माध्यमों में इन कसीदों में कोई कमी भी नहीं रखी जाएगी।
मैं इनको कसीदे इसल‍िए कह पा रही हूं क‍ि ना तो इनसे पत्रकार‍िता का कोई लेना देना होगा और ना ही पत्रकारों की दशा को लेकर कुछ गंभीर क‍िया जाएगा। ये तो खाल‍िस ”पत्रकारों के नाम एक द‍िन” पर गालबजाऊ प्रक्र‍िया ही रहेगी। पत्रकार‍िता के नाम पर नेताग‍िरी करने वालों द्वारा ”ये कमी है -वो कमी है ” जैसे कुछ रोने रोए जायेंगे, कुछ चने के झाड़ों पर चढ़ाए जायेंगे, कुछ को सम्मानि‍त क‍िया जाएगा, कभी पूरी न होने वाली कुछ मांगें सरकारों से रखी जाएंगी… और बस… एक द‍िन और पत्रकारों – पत्रकार‍िता के ल‍िए यूं ”कुर्बान” कर द‍िया जाएगा।
इस सारी नेताग‍िरी के बावजूद पत्रकार‍िता तो सदैव ही कठ‍िनाइयों से जूझती आई है, पत्रकार‍िता व इसकी स्वतंत्रता को अपने कंधों पर यहां तक ढोकर ले आए पत्रकारों की अन‍िश्च‍ितता तो जहां थी, आज तक वहीं खड़ी है। वह मीड‍िया घरानों की शोषणकारी नीत‍ियों का श‍िकार है, पीत पत्रकार‍िता से भी जूझ रहा है। स्वयं अपनी पहचान का संकट तो है ही, पार‍िवार‍िक व आर्थ‍िक चुनौत‍ियों से भी दोचार हो रहा है। फ्रीलांसर हों या अवैतन‍िक मीड‍ियाकर्मी, स्ट्र‍िंगर हों या जॉब से न‍िकाले जाने की धमकी के साथ ऑफ‍िस आने को व‍िवश क‍िए गए पत्रकार सभी का हाल एक ही है।
उसूलों के तौर पर राख हो चुकी पत्रकार‍िता और फीन‍िक्स की भांत‍ि इससे जीव‍ित हो उठने वाले ये पत्रकार ज‍िन वि‍वशताओं में काम कर रहे हैं उसमें ये सोचना तो कतई बेमानी है क‍ि जो सच द‍िखाया, पढ़ाया या सुनाया जा रहा है, वह सच में ”सच” ही होगा। चकाचौंधी पत्रकार‍िता में ये फीन‍िक्स खोए जा रहे हैं। एक संस्थान से दूसरे , दूसरे से तीसरे में जाकर अपनी र‍िपोर्ट्स को एक टेबल से दूसरी पर ख‍िसकाने को बाध्य हैं। ऐसा ही चलता रहा तो समाचारों के जंगल के तौर उभर रहे सोशल मीड‍िया प्लेफॉर्म्स के जमाने में कहां बचेगी पत्रकार‍िता?
अंततोगत्वा पत्रकार‍िता द‍िवस पर आज बहुत कुछ बोला जाएगा, चौथा खंभा का माल‍िक, सच का पहरेदार, फलां योद्धा कहकर भरमाया जाएगा और ना जाने क्या क्या कसीदों से द‍िन में ही स्वप्न द‍िखाये जायेंगे… मैं घोर सकारात्मक रहने वाली भी ये सच बखूबी जानती हूं क‍ि एक पत्रकार का वेतन तक जहां मीड‍िया संस्थान के माल‍िक की दया और चरणवंदना पर न‍िर्भर करता हो, वहां पत्रकार‍िता या पत्रकार के ल‍िए इन सारे ”चोंचलों” से आगे सोचना भी बेकार है।
- अलकनंदा स‍िंह