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शनिवार, 11 मार्च 2017

क्रोध लाल रंग, ईर्ष्‍या हरे रंग, आनंद जीवंतता पीले रंग से जुड़े होते हैं

श्री श्री रविशंकर  ने  कहा कि चैतन्य होकर हम अज्ञानता और नकारात्मकता के काले रंग को मिटा सकते हैं। इससे हमारे जीवन में आनंद और जीवंतता के पीत रंग के साथ-साथ और भी कई रंग भर जाते हैं। इस आनंद का उत्सव शरीर और मन के साथ-साथ चेतना भी मनाती है
होली (13 मार्च) पर श्री श्री रविशंकर का चिंतन…
संसार रंग भरा है। प्रकृति की तरह ही रंगों का प्रभाव हमारी भावनाओं और संवेदनाओं पर भी पड़ता है। हमारी प्रत्येक भावना एक निश्चित रंग से सीधी जुड़ी होती है। जैसे माना जाता है कि क्रोध लाल रंग से, ईष्र्या हरे रंग से, आनंद और जीवंतता पीले रंग से जुड़े होते हैं। गुलाबी रंग को हम प्रेम से, नीले को विस्तार से, सफेद रंग को शांति से, केसरिया  को त्याग से और जामुनी को हम ज्ञान से जोड़कर देखते हैं। कुल मिलाकर, प्रत्येक मनुष्य रंगों का एक फ व्वारा प्रतीत होता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा हिरण्यकशिपु प्रजा के बीच स्वयं को ईश्वर के रूप में स्थापित करना चाहता था, जबकि उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु-भक्त था। अपने पुत्र के विचारों को बदलने का हिरण्यकशिपु ने हर संभव प्रयास किया। बहन होलिका की गोद में बैठाकर उसे अग्निकुंड में भी जलाने का प्रयास किया, लेकिन वह विफल रहा। प्रह्लाद की भक्ति में इतनी गहराई थी कि पिता का कोई भी अनुचित कार्य उसे अपने विचारों से डिगा नहीं सका।
दरअसल, प्रह्लाद ने चैतन्य होकर अज्ञानता के काले रंग को मिटाने में पूर्ण सफलता पा ली थी। देखा जाए तो हिरण्यकशिपु स्थूलता का प्रतीक है और प्रह्लाद आनंद और श्रद्धा का प्रतीक है। चेतना को भौतिकता तक सीमित नहीं किया जा सकता। हिरण्यकशिपु भौतिकता से सब कुछ प्राप्त करना चाहता था। कोई भी जीव अपने विचारों की शक्ति से भौतिकता से परे हो सकता है।
होलिका अतीत की प्रतीक है और प्रह्लाद वर्तमान के आनंद का प्रतीक है। यह प्रह्लाद की भक्ति ही थी, जो उसे आनंद और जीवंत (पीत रंग) बनाए रखती थी। आनंद और जीवंतता के होने से जीवन उत्सव बन जाता है। भावनाएं आपको अग्नि की तरह जलाती हैं, पर यह रंगों की फु हार की तरह होनी चाहिए, तभी जीवन सार्थक होता है। अज्ञानता में भावनाएं कष्टकारी होती हैं, लेकिन ज्ञान के साथ जुड़कर यही भावनाएं जीवन में रंग भर देती हैं। जीवन रंगों से भरा होना चाहिए। हम कई भूमिका निभाते हैं।
ये भूमिकाएं और भावनाएं स्पष्ट होनी चाहिए, अन्यथा कष्ट निश्चित है। घर में यदि आप पिता का रोल निभा रहे हैं, तो अपने कार्यस्थल पर वैसा रोल नहीं निभा सकते। जब अलग-अलग भूमिकाओं का हम जीवन में घालमेल करने लगते हैं, तो फिर उलझने लगते हैं और गलतियां करने लग जाते हैं। जीवन में जो भी आप आनंद का अनुभव करते हैं, वह आपको स्वयं से ही प्राप्त होता है।
आपको जो जकड़ कर बैठा है, जब आप उसे छोड़कर शांत बैठ जाते हैं, तो इसी समय से आपकी ध्यानावस्था शुरू हो जाती है। ध्यान में आपको गहरी नींद से भी ज्यादा विश्राम मिलता है, क्योंकि आप सभी इच्छाओं से परे होते हैं। यह मस्तिष्क को गहरी शीतलता देता है और आपके तंत्रिका-तंत्र को पुष्ट करता है।
उत्सव चेतना का स्वभाव है, जो उत्सव मौन से उत्पन्न होता है, वह वास्तविक है। यदि उत्सव के साथ पवित्रता जोड़ दी जाए, तो वह पूर्ण हो जाता है। केवल शरीर और मन ही उत्सव नहीं मनाता है, बल्कि चेतना भी उत्सव मनाती है। इसी स्थिति में जीवन रंगों से भर जाता है।

प्रस्‍तुति : अलकनंदा सिंह 

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

.... ताकि बची रहे जीवन में ऊर्जा

अधि‍कांश लोग जीवन में सब कुछ अपने मन के अनुसार करने के लिए अपनी बहुमूल्य ऊर्जा को नष्ट करते रहते हैं। जब ऐसा नहीं हो पाता तो मन व शरीर पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है, हावभाव बदल जाते हैं, ऐसे में तनाव होना निश्चित है। विपरीत असर को झेलने में मन व शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा व्यय करनी पड़ती है और यही ऊर्जा का ह्रास हमें शक्तिहीन बनाता है।
इस शक्तिहीनता की स्थ‍िति से बचने का एक ही उपाय है कि ऊर्जा का संचयन किया जाये। इसके लिए उन ऊर्जा स्रोतों को पहचानना होगा जो हमारे दैनंदिन उपयोगों में आते हैं ताकि संचयन के स्रोत हमें अपने आस-पास ही मिल सकें।
इस संचित ऊर्जा से न केवल शरीर शक्तिवान बनेगा बल्कि मन अपने आध्यात्मिक चरम को छू सकेगा , तनाव से जूझने का ये सबसे बेहतर उपाय है। 
इस सबंध में श्री श्री रविशंकर कहते हैं कि हमारे शरीर को ऊर्जा चार स्रोतों से प्राप्त होती है। पहला स्रोत भोजन होता है। भोजन का सेवन पर्याप्त मात्रा में होने से आपके शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है।
ऊर्जा का दूसरा स्रोत पर्याप्त मात्रा में नींद लेना है। पर्याप्त नींद से शरीर के अवयवों को प्राकृतिक विश्राम मिल जाता है ।
ऊर्जा का तीसरा स्रोत है ज्ञान। ज्ञान के  कारण ही हम किसी वस्तु, परिस्थिति, घटना और भावना से खुश या परेशान एवं दुखी नहीं होते। ज्ञान के अभाव में दुखी और अधिक ज्ञान होने से अहंकार के बढ़ने की पूरी पूरी संभावना रहती है।
ऊर्जा का चौथा व प्रमुख स्रोत श्वास है जो प्राण शक्ति या आत्मा व शरीर को ऊर्जा देती है।
श्वास के प्रति समय के साथ सजग हो जाना ही जीवन की कलात्मकता है और यही सकारात्मक जीवन जीने की पद्धति बन सकती है।
श्वास के आवागमन की स्थ‍िति को लेकर स्वामी विवेकानंद ने कहा भी है कि श्वास के संयमित रहने से मन की शक्ति सुदृढ़ होती है, जो कि शारीरिक ऊर्जा को संरक्षित करने व इसे मानसिक व आध्यात्मिक ऊर्जा में बदलने के काम आती है ।
वास्तव में हमारे शरीर का शक्तिगृह होता है मन, जो नसों के माध्यम से संकेत भेजता है और शरीर उसी के अनुसार कार्य करता है या प्रतिक्रिया करता है। हालांकि इसमें शरीर के बलों का भी योगदान रहता है। 'शरीर के बल' वे पदार्थ हैं जो हमारे अस्तित्व को भरते हैं और जो भोजन, पानी और हवा के माध्यम से चयापचय द्वारा रिचार्जिंग जारी रखते हैं।
अत: यदि हम शरीर की ऊर्जा को बचाना और जीवन को सुखी व समृद्ध बनाना चाहते हैं तो अपनी श्वास से उपजी ऊर्जा को बचाने की ओर ध्यान दें, जिससे न सिर्फ शरीर ऊर्जावान बने वरन मन भी आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाये। तनावमुक्त जीवन को जीने के लिए ऊर्जावान मन के साथ शरीर का ऊर्जावान होना अत्यंत आवश्यक है।

- अलकनंदा सिंह