दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनावों में जाट राजनीति हमेशा से एक बड़ा और प्रभावी समीकरण रही है। डीयू के छात्र चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के प्रभाव वाले जाट और गुर्जर समुदाय के उम्मीदवार मुख्य भूमिका निभाते हैं। मुख्य छात्र संगठन जैसे ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) और NSUI (नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया) अक्सर जीत सुनिश्चित करने के लिए जाट या गुर्जर चेहरों को मैदान में उतारते हैं। कई बार समुदाय विशेष के मजबूत उम्मीदवार टिकट न मिलने पर निर्दलीय उतरते हैं, जिससे पारंपरिक दलों के समीकरण बिगड़ते हैं—जैसे 2026 में दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की।
2026 के डूसू चुनावों में अध्यक्ष पद के लिए सीधा मुकाबला 'जाट बनाम मीणा' (ABVP के यश डबास और NSUI के विजय शंकर मीणा के बीच) देखने को मिला, जिसमें ABVP के जाट उम्मीदवार यश डबास ने बाजी मारी।
DUSU चुनाव में आख़िरकार ABVP की 4 में से 3 पदों पर विजय हुई, एक उपाध्यक्ष पद निर्दलीय के पास गया जो NSUI का बाग़ी है। विद्यार्थी परिषद् ने बे'इज़्ज़ती को टाल दिया।
अगर ज़रा सी भी गड़बड़ होती तो इसपर बातें होने लगतीं कि कैसे Gen Z अब भाजपा के साथ नहीं है। कांग्रेस का छात्र संगठन उपाध्यक्ष पद झटक सकता था, लेकिन दीपांशु शौक़ीन को टिकट न देकर उसने वो मौक़ा भी गँवा दिया। छात्र राजनीति से ही निकले कन्हैया कुमार NSUI के प्रभारी हैं, उन्हें फटकार पड़ेगी।
राहुल गाँधी लगातार 'छात्रों की गूँज' कार्यक्रम के जरिए नई पीढ़ी को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में इसी पीढ़ी द्वारा किए गए आंदोलन के बाद देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में ABVP की जीत भाजपा को बहुत राहत देगी।
