रविवार, 27 जनवरी 2019

संस्‍कृति-संसद में मुस्‍लिम चिंतकों ने दिया देश के लिए एक सुखद संकेत

प्रयागराज कुंभ के दौरान दो दिन पूर्व आयोजित संस्‍कृति-संसद  में आजादी के बाद पहली बार मुस्‍लिम चिंतकों के मुंह से यह  सुना गया कि भारत में मुस्‍लिम अल्‍पसंख्‍यक नहीं,  बल्‍कि दूसरी सबसे बड़ी आबादी है।
इन चिंतकों में राष्‍ट्रीय मुद्दों व मुस्‍लिम समाज पर बारीक नज़र रखने वाले मुखर वक्‍ता डा. सैयद रिजवान अहमद भी शामिल थे।

संस्‍कृति-संसद में सभी मुस्‍लिम चिंतकों द्वारा मुस्‍लिमों का  गणनात्‍मक सत्‍य स्‍वीकारना भरतीय गणराज्‍य के लिए सुखद  संकेत माना जा सकता है।
कौन नहीं जानता कि देश के मुस्‍लिम समाज में आज भी प्रगतिवाद बनाम कट्टरवाद का युद्ध जारी है और संख्‍या बल के नजरिए से कट्टरवाद हमेशा प्रगतिवाद पर हावी रहा है। इस समाज में यह सब इसलिए ज्‍यादा है क्‍योंकि यह मदरसा संस्‍कृति से बाहर ही नहीं निकल पाया। मदरसों  के जिस माहौल में बच्‍चे शिक्षा ग्रहण करते हैं, उसे देश की  प्रगति के सापेक्ष नहीं कहा जा सकता।

हर सुधारवाद को मुस्‍लिम धर्म पर संकट माना जाता रहा है  इसीलिए अल्‍पसंख्‍यक-अल्‍पसंख्‍यक की रट लगाते हुए आज भी  देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी विकास के आधुनिक ढांचे से  दूर खड़ी हुई है। ऐसा न होता तो ज्‍यामितीय गति से बढ़  रही मुस्‍लिम जनसंख्‍या के बावजूद समाज की महिलाओं को  तीनतलाक खत्‍म करने व निकाह हलाला जैसी कड़वी  सच्‍चाइयों के लिए सरकार और कोर्ट का मुंह ना देखना पड़ता।

देश के संसाधनों का बराबर उपयोग करते हुए भी मुस्‍लिमों का  विक्‍टिमाइजेशन ना तो स्‍वयं मुस्‍लिम समाज की प्रगति के  पक्ष में है और ना ही देश के सौहार्द्र के।
जाहिर है कि मुस्‍लिमों को वोटबैंक के तौर पर इस्‍तेमाल करने के लिए उन्‍हें जानबूझकर अल्‍पसंख्‍यक बनाए रखा गया ताकि राष्‍ट्रीय फैसलों में उनकी गैरमौजूदगी बनी रहे और वो नेताओं के मोहरे की तरह इस्‍तेमाल होते रहें। इसीलिए आजतक दूसरी सबसे बड़ी आबादी के बावजूद मुस्‍लिमों का कोई एक नेता राष्‍ट्रीय राजनीति में दूर-दूर तक नहीं दिखता।

बहरहाल, संस्कृति-संसद में माथे पर तिलक लगाकर व  कुर्ताधोती पहनकर पहुंचने वाले डा. सैयद रिजवान अहमद ने  कुंभनगर में वर्तमान राजनीति, मुस्‍लिम धर्म-चिंतन और  मुस्‍लिम समाज को राष्‍ट्रवाद के परिप्रेक्ष्‍य में देखते हुए अपनी  प्रतिक्रिया बेबाकी से दी। डा. रिजवान ने कहा कि हमें यह हर  हाल में स्‍वीकरना ही होगा कि हम 'सिर्फ भारतीय हैं',  'अल्‍पसंख्‍यक नहीं', हमारे पूर्वज एक ही थे, समयान्‍तर में बस  हमारी पूजा पद्धतियां अलग हुई हैं। संस्‍कृति-संसद में सभी  मुस्‍लिम चिंतकों ने कहा कि हिंदू समाज आज भी बंटा हुआ  है, इसे धर्माचार्यों को देखना होगा, मुस्‍लिमों को हम देख लेंगे  और देश की संस्‍कृति को बचाने व समृद्ध करने के लिए अब  संयुक्‍त प्रयास बेहद जरूरी हैं और इन्‍हें हर हाल में अंजाम तक  ले जाना होगा। टोपी और चंदन का परस्‍पर आदान-प्रदान  करना होगा तभी हमारी संस्कृति भारतीयता की ऊंचाइयां छू  सकेगी।
अब देखना यह होगा कि कुंभनगर से किया गया मुस्‍लिम  चिंतकों का ये सुखद आवाह्न देश, समाज और राजनीति की  किस-किस धरा से निकलता हुआ आगे बढ़ पाता है।

 -अलकनंदा सिंह

रविवार, 13 जनवरी 2019

जानिए…क्‍या है अघोर संप्रदाय, और कैसे होते हैं अघोरी साधु

“अघोर दर्शन का सिद्धांत है आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करना है और ईश्वर से मिलना तथा ईश्‍वर के साक्षात्‍कार हेतु शुद्धता के नियमों से भी परे चले जाना.”
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज का कुंभ मेला शुरू होने में अब सिर्फ़ एक दिन का समय बचा है.
कुंभ के दौरान गंगा में डुबकी लगाने के लिए देश-विदेश से संगम किनारे पहुंचे तमाम संप्रदायों के हज़ारों साधु इकट्ठा हुए हैं.
इन्हीं साधुओं में एक वर्ग ऐसा भी है जिसे लेकर आम जनमानस के बीच भय की स्थिति बनी रहती है. साधुओं के इस वर्ग को ‘अघोरी समुदाय’ कहते हैं.
ऐसी अवधारणा है कि अघोरी श्मशान घाट में रहते हैं, जलती लाशों के बीच खाना खाते हैं और वहीं सोते हैं.
इस तरह की बातें भी प्रचलित हैं कि अघोरी नग्न घूमते हैं, इंसानी मांस खाते हैं, खोपड़ी में खाना खाते हैं और दिन-रात गांजा पीते रहते हैं.
लंदन में ‘स्कूल ऑफ़ अफ्रीकन एंड ओरिएंटल स्टडीज़’ में संस्कृत पढ़ाने वाले मैलिंसन कई अघोरी साधुओं के साथ बातचीत के आधार पर बताते हैं, “अघोरी मत स्वाभाविक वर्जनाओं का सामना करके उन्हें तोड़ने में यकीन रखते हैं. वे अच्छाई और बुराई के सामान्य नियमों को ख़ारिज करते हैं. आध्यात्मिक प्रगति का उनका रास्ता अजीबोगरीब प्रक्रियाओं, जैसे कि इंसानी मांस और अपना मल खाने जैसी चीज़ों से होकर गुज़रता है. लेकिन वो ये मानते हैं कि दूसरों द्वारा त्यागी गई इन चीज़ों का सेवन करके वे परम चेतना को प्राप्त करते हैं.”
ऑक्सफ़र्ड में पढ़ाई कर चुके मैलिंसन एक महंत और गुरु भी हैं लेकिन उनके समुदाय में अघोरी समुदाय की प्रक्रियाएं वर्जित हैं.
अघोरियों का इतिहास
अगर अघोरी संप्रदाय के इतिहास की बात करें तो ये शब्द 18वीं शताब्दी में चर्चा का विषय बना लेकिन इस संप्रदाय ने उन प्रक्रियाओं को अपनाया है जिसके लिए कपालिका संप्रदाय जाना जाता था.
कपालिका संप्रदाय में इंसानी खोपड़ी से जुड़ी तमाम परंपराओं के साथ-साथ इंसान की बलि देने की भी प्रथा थी लेकिन अब ये संप्रदाय अस्तित्व में नहीं है.
हालांकि, अघोर संप्रदाय ने कपालिका संप्रदाय की तमाम चीजों को अपने जीवन में शामिल कर लिया है.
हिंदू समाज में ज़्यादातर पंथ और संप्रदाय तय नियमों के मुताबिक़ चलते हैं.
संप्रदायों को मानने वाले संगठनात्मक ढंग से नियमों का पालन करते हैं. आम समाज से सरोकार बनाकर रखते हैं लेकिन अघोरियों के साथ ऐसा नहीं है. इस संप्रदाय से जुड़े साधु अपने घर वालों से संपर्क खत्म कर देते हैं और बाहर वालों पर भरोसा नहीं करते हैं.
मैलिंसन बताते हैं, “अघोरी संप्रदाय में साधुओं के बौद्धिक कौशल में काफ़ी अंतर देखा जाता है. कुछ अघोरी इतनी तीक्ष्ण बुद्धि के थे कि राजाओं को अपनी राय दिया करते थे. एक अघोरी तो नेपाल के एक राजा का सलाहकार भी रहे हैं.”
कोई नफ़रत नहीं
अघोरियों पर एक किताब ‘अघोरी: अ बायोग्राफ़िकल नॉवल’ लिखने वाले मनोज ठक्कर बताते हैं कि लोगों के बीच उनके बारे में भ्रामक जानकारी ज़्यादा है.
वह बताते हैं, “अघोरी बेहद सरल होते हैं और प्रकृति के साथ रहना पसंद करते हैं. वह किसी तरह की कोई डिमांड नहीं करते.”
“वह हर चीज़ को ईश्वर के अंश के रूप में देखते हैं. वह न तो किसी से नफ़रत करते हैं और न ही किसी चीज को ख़ारिज करते हैं इसीलिए वे किसी जानवर और इंसानी मांस के बीच भेदभाव नहीं करते हैं. इसके साथ ही जानवरों की बलि उनकी पूजा पद्धति का एक अहम अंग है.”
“वे गांजा पीते हैं लेकिन नशे में रहने के बाद भी अपने बारे में उन्हें पूरा ख्याल रहता है”
मैलिंसन और ठक्कर दोनों ही विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे काफ़ी कम लोग हैं जो अघोरी पद्धति का सही ढंग से पालन कर रहे हैं.
हालांकि, ठक्कर मानते हैं कि “अघोरी किसी से पैसे नहीं लेते और सभी के कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं. वे इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि कोई संतान-प्राप्ति के लिए आशीर्वाद मांग रहा है या घर बनाने के लिए.”
किस भगवान की पूजा करते हैं अघोरी
अघोरी सामान्यत: शिव की पूजा करते हैं, जिन्हें विनाश का देवता कहा जाता है. इसके साथ ही वह शिव की पत्नी शक्ति की भी पूजा करते हैं.
उत्तर भारत में सिर्फ़ पुरुष ही अघोरी संप्रदाय के सदस्य बन सकते हैं लेकिन बंगाल में महिलाओं को भी श्मशान घाट पर देखा जा सकता है. हालांकि, महिला अघोरियों को कपड़े पहनने होते हैं.
ठक्कर कहते हैं, “ज़्यादातर लोग मौत से डरते हैं. श्मशान घाट मौत का प्रतीक होते हैं लेकिन अघोरियों की शुरुआत यहीं से होती है. वे लोग आम लोगों के मूल्यों और नैतिकता को चुनौती देना चाहते हैं.”
समाज सेवा में शामिल
अघोरी साधुओं को समाज में सामान्यता: स्वीकार्यता हासिल नहीं है लेकिन बीते कुछ सालों में इस समुदाय ने समाज की मुख्य धारा में शामिल होने की कोशिश की है.
कई जगहों पर अघोरियों ने लेप्रसी (कोढ़) को रोकने के लिए अस्पतालों का निर्माण किया है और उनका संचालन भी कर रहे हैं.
मिनेसोटा आधारित मेडिकल कल्चरल और एंथ्रोपॉलिजिस्ट रॉन बारेट ने इमोरी रिपोर्ट के साथ इंटरव्यू में बताते हैं, “अघोरी उन लोगों के साथ काम कर रहे हैं जिन्हें समाज में अछूत समझा जाता है. एक तरह से लेप्रसी ट्रीटमेंट क्लीनिक ने श्मशान घाट की जगह ले ली है. और अघोरी बीमारी के डर पर जीत हासिल कर रहे हैं.”
कुछ अघोरी साधु फ़ोन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी इस्तेमाल करते हैं.
इसके अलावा सार्वजनिक स्थानों पर जाते समय कुछ अघोरी साधु कपड़े भी पहनते हैं.
अघोरियों की संख्या का आकलन लगाना तो मुश्किल है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अघोरियों की संख्या हज़ारों में होनी चाहिए.
कुछ अघोरियों ने सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया है कि उन्होंने मृत शरीरों के साथ सेक्स किया है. लेकिन वे गे सेक्स को स्वीकार्यता नहीं देते.
ख़ास बात यह है कि जब अघोरियों की मौत हो जाती है तो उनके मांस को दूसरे अघोरी नहीं खाते. उनका सामान्य तौर पर दफ़नाकर या जलाकर अंतिम संस्कार किया जाता है.
Courtsey-BBC

बुधवार, 9 जनवरी 2019

कथाकार ममता कालिया ने कहा, अब बहुत हो चुकीं घर की बातें

विश्व पुस्तक मेले का एक दिन ’21वीं शताब्दी में स्त्री’को समर्पित रहा। यह दिन, दो सत्रों में स्त्री विमर्श के नए पहलुओं को अभिव्यक्त करने के लिए था। इसमें हमारे समय के प्रतिनिधि स्त्री स्वरों ने शिरकत की।
समकालीन साहित्य में स्त्री चिंतन ने अनेक नए आयाम विश्व स्तर पर प्राप्त किए हैं। यह विमर्श मात्र न होकर विचार-विमर्श में रूपांतरित हो गया।
दो विषय क्रमशः
’21वीं सदी में स्त्री का आकाश’ और ‘स्त्री आज़ादी की चुनौतियां और मीडिया’ पर विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। इन दो सत्रों के प्रतिभागी थे वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया, चर्चित कथाकार गीताश्री, प्रसिद्ध कवयित्री अनामिका, वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन और युवा लेखिका ज्योति चावला।
इन दो सत्रों की गंभीर चर्चा में उभरकर आए विचारों में वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया जी ने कहा: “अब बहुत हो चुकीं घर की बातें, अब अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व पर आइए।”
विमर्श पर बात करते हुए ममता कालिया ने कहा विमर्श शब्द को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकते। साथ ही अन्य चिन्तकों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि स्त्री विमर्श को कई लेखकों ने ‘दर्जी की तरह रेडी-मेड बना दिया।’ आज के समाज में सबसे सुखद ये हुआ है कि स्त्री ने इस विमर्श को पहचाना और उस पर लिखना प्रारंभ किया। अंत में ममता कालिया ने कहा : “बी बोल्ड नॉट कोल्ड”।
‘साहित्य में स्त्री का समय’ पर गीताश्री का कहना था कि मेरी पीढ़ी नई पीढ़ि नैतिकता से टकराती है, पुरानी नैतिकता को छोड़ती है, मनुष्य का अपनी देह के साथ सहज संबंध में स्त्रियों ने अपने सत्य को पहचाना।
स्त्रियों में यह भय कि वह धर्म पर नहीं बोलतीं, इसमें धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है। पितृसत्ता समाज के संदर्भ में वे कहती हैं कि कोई मकान स्त्री के नाम कर दो। स्त्री की आधुनिकता उनसे ही जुड़ी है।
अनामिका जी ने स्त्री विमर्श पर नवीन संदर्भ जोड़े। उन्होंने राहुल सांकृत्यायन की पंक्ति उद्धृत की – अंगना तो विदेश भयो”…स्त्री की यह स्थिति समय के साथ धीरे-धीरे टूटी है। सभी विधाओं का स्वरूप बदला है जैसे- फि‍ल्म, मीडिया, विज्ञापन में… अंत में अनामिका जी ने कहा ‘लगातार पेड़ लगाते रहिए, जलवायु जरूर बदलेगी’।
जयंती रंगनाथन ने अपनी अम्मा का उदाहरण देते हुए तीन बातें स्त्री विमर्श को उजागर करते हुए कहीं- पहली, विवाह के कारण अपनी पढ़ाई मत छोड़, दूसरी, तुम्हें जो चाहिए उसकी राह खुद बनानी होगी। तीसरी एक लड़की 20 मिनट से अधिक रसोईघर में न रुके क्योंकि ऐसी स्त्री अपने बारे में नहीं सोच सकती। इस उदाहरण को उन्होंने अपने जीवन में उतारा और उन्होंने कहा कि ऐसे ही मैंने ये सब पाया। अंत में जयंती ने कहा – आज एक मध्यवर्ग की लड़की भी ये सोचने लगी है यदि उसके घर की खिड़की टूटी है तो वो ये सपना देखती है कि सबसे पहले मैं कमा कर ऐसा घर खरीदूंगी जिसमें खिड़की हो। इन बातों में विमर्श के साथ ही बदलाव की झलक भी देखने को मिलती है।
ज्योति चावला ने समाज के बदलते हुए सकारात्मक पक्ष सामने रखे जिनके लिए उन्होंने फिल्म व विज्ञापन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मुझे आजकल की फिल्मों में ये सबसे अच्छा लगता है कि ज्यादातर अंत में पिता बेटी से कहता है कि “तुम जो करना चाहती हो वही करो।” एक स्कूटी के विज्ञापन की पंक्ति ‘अब पीछे क्या बैठना’ इन सभी बातों में स्त्री विमर्श की स्वतंत्र झलक देखने को मिलती है।

सोमवार, 7 जनवरी 2019

अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन से नयनतारा सहगल का नाम हटाया गया

मराठी भाषा के सबसे बड़े साहित्यिक कार्यक्रम अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन से साहित्यकार नयनतारा सहगल का नाम हटा दिया गया है.
11 से 13 जनवरी को यवतमाल में 92वें साहित्य सम्मेलन का आयोजन होना है. इसका उद्घाटन साहित्यकार नयनतारा सहगल को करना था और उन्हें उद्घाटन भाषण भी देना था लेकिन आयोजकों ने ऐन मौक़े पर उन्हें इस सम्मेलन में आने से मना कर दिया.
उनके इस सम्मेलन में शामिल होने पर पहली बार महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने आपत्ति जताई थी उनका कहना था कि इसका उद्घाटन किसी मराठी साहित्यकार द्वारा ही किया जाना चाहिए जबकि नयनतारा अंग्रेज़ी की लेखिका हैं.
किसानों के लिए काम करने वाले शेतकरी न्याय आंदोलन समिति ने भी नवनिर्माण सेना का समर्थन किया था.
‘असहमतियों को दबाने की कोशिश’
नयनतारा ने बीबीसी मराठी से बातचीत में कहा, “मैं इस कार्यक्रम में क्यों नहीं आ सकती इसको लेकर आयोजकों ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है. उन्होंने सिर्फ़ यह कहा है कि कुछ अपरिहार्य कारणों से इस कार्यक्रम में न आएं. असहमतियों को दबाने कि कोशिश सिर्फ़ महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि पूरे देश में हो रही है.”
“महाराष्ट्र जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में जो यह हुआ है, उससे मुझे बुरा लग रहा है. मैंने मुंबई और महाराष्ट्र में बहुत से साहित्य से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है लेकिन आयोजकों के इस रवैये से मैं दुखी हूं.”
शेतकरी न्याय आंदोलन समिति के देवानंद पवार कहते हैं कि उनकी भूमिका सिर्फ़ इतनी ही थी कि उनका मानना था कि अंग्रेज़ी लेखक के हाथ से उद्घाटन नहीं होना चाहिए लेकिन सहगल की अवमानना का उनका उद्देश्य नहीं था, आयोजकों को इस पर पहले ही विचार करना चाहिए था और इस तरह से सहगल को ऐन मौक़े पर न आने को कहकर माफ़ी मांगनी चाहिए.
सम्मेलन के मुख्य आयोजक अखिल भारतीय मराठी महामंडल के अध्यक्ष श्रीपाद जोशी का कहना है कि महामंडल लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर करता है लेकिन इस सम्मेलन में व्यवधान उत्पन्न करने की धमकी कुछ लोगों ने दी थी तो इसी वजह से यह फ़ैसला लिया गया था और उन्हें बुलाने का फ़ैसला स्थानीय आयोजकों ने लिया था.
साहित्य सम्मेलन के कार्याध्यक्ष रमाकांत कोलते का कहना है कि कुछ लोगों ने उनकी भाषा पर सवाल उठाए थे कि वह अंग्रेज़ी की लेखिका हैं.
कौन हैं नयनतारा सहगल
नयनतारा सहगल जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयालक्ष्मी पंडित और रंजीत सीताराम पंडित की बेटी हैं. नेहरू परिवार से जुड़े होकर भी उन्होंने आपातकाल का जमकर विरोध किया था.
1986 में इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. सहगल प्रधानमंत्री मोदी की आलोचक रही हैं. देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दबाने और बढ़ती कट्टरता के विरोध में शुरू हुए अवॉर्ड वापसी अभियान के दौरान नयनतारा पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकारों में से एक थीं.
साहित्य सम्मेलन में सहगल जो भाषण देने वाली थीं उसकी प्रति बीबीसी मराठी को प्राप्त हुई है जिसमें उन्होंने देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता, मॉब लिंचिंग, इतिहास के पुनर्लेखन, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता आदि जैसे मुद्दों पर जमकर हिंदुत्व विचारधारा की आलोचना की है.
अपने लिखित भाषण में नयनतारा ने अपने माता-पिता के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका का ज़िक्र करते हुए कहा है कि उन्होंने हज़ारों स्वतंत्रता सेनानियों के साथ देश के लिए लड़ाई लड़ी क्योंकि उनमें आज़ादी को लेकर जुनून था लेकिन क्या वह जुनून आज भी है.
उन्होंने लिखा है, “क्या हम उन पुरुष-महिलाओं का सम्मान करते हैं जो हमसे पहले चले गए हैं, जिनमें से कइयों ने लड़ते हुए जानें दी हैं ताकि भविष्य के भारतीय स्वतंत्र जी सकें. मैं यह सवाल इसलिए पूछ रही हैं क्योंकि हमारी स्वतंत्रता खतरे में है.”
उन्होंने अपने भाषण में लिखा है कि लोग क्या खा रहे हैं, क्या पहन रहे हैं और उनकी क्या विचारधारा है, आज सब पर सवाल किए जा रहे हैं और धर्म के नाम पर नफ़रत के बीज बोए जा रहे हैं.
उन्होंने लिखा कि नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे उच्च संस्थान हिंदुत्व की नफ़रत का शिकार हो रहे हैं.
नयनतारा कहती हैं कि वह हिंदू होते हुए और उनका सनातन धर्म में विश्वास होते हुए वह हिंदुत्व को कभी स्वीकार नहीं कर सकती.


Courtsey: BBC